मुक्तिबोध की कहानी है ‘क्लॉड ईथरली‘। कहानी हिरोशिमा, नागासाकी पर परमाणु बम गिराने वाले पायलट की है। कर्तव्यनिष्ठ क्लॉड अपने काम को सफलतापूर्वक अंजाम देता है, मगर उसका जीवन आत्मग्लानि से नर्क बन जाता है। मोटी सी बात इतनी है, मुक्तिबोध इस वास्तविक पात्र को ले कर जो बुनते हैं, जादुई है। सभ्यता, विभीषिका और संवेदनाओं का विचलित कर देने वाला चित्रण। नकटी घटना के साथ ऐसी और भी बातें याद आती रहीं।
घटना 29 जून 2026 की है, जिस दिन सुबह-सुबह ‘प्रस्तावित? विधायक कालोनी‘ के लिए रायपुर विमान तल के पास स्थित इस गांव के पीएम आवास वाले घरों सहित लगभग 80 घर, सरकारी जमीन पर अतिक्रमण मान कर बुलडोजर-जेसीबी से ढहा दिए गए। ‘गांव‘ नकटी, जिसका नाम ‘सज्जनपुर‘ बदलने की बात आई, तब तक गांव-बस्ती के हालात ही बदल गए। शासन-प्रशासन द्वारा पुनर्वास हेतु नया रायपुर में फ्लैट आवंटन बताया गया, ग्रामवासियों द्वारा उसे अपर्याप्त और सुविधा रहित बताया गया।
भला करना किसे नहीं भाता। अनुमान होता है कि यहां भी भर-भर भलाई की जाती रही होगी, योजना, लक्ष्य की पूर्ति के आंकड़े सुधरे होंगे। अपना कुछ भला लोगों ने खुद से कर लिया होगा। बहती गंगा में हाथ भी धुले होंगे, नियमों-प्रावधानों पर जन-सेवा हावी-प्रभावी हुआ होगा। गेहूं में घुन पिसा होगा और कुछ घुन, गेहूं के आड़ में रख कर खुद को वाजिब साबित कर रहे होंगे। यह सारी ‘भलाई‘ इकट्ठे बुराई का फोड़ा बन कर अब फूटा है। प्रजातांत्रिक व्यवस्था की खासियत यही है कि कोई एक मनमाना निर्णय नहीं ले सकता। इसके चलते व्यवहार में श्रेय की होड़ लग जाती है और विपरीत स्थिति में संयुक्त जिम्मेदारी होने के कारण, जो चाहे मुंह बचा सकता है। भारतेन्दु के नाटक ‘अंधेर नगरी‘ की तरह। यह भी ध्यान रहे कि सरकार द्वारा समय-समय पर कब्जे को नियमित करना, पट्टा देना, कर्ज की माफी जैसे अनुग्रह किए जाते रहते हैं। ऐसे मौकों पर जिन्होंने नियम-विरुद्ध लाभ नहीं उठाया, कर्ज नहीं लिया, अफसोस करते हैं। उन्हें लगता है कि उन्होंने नासमझी कर दी। इसे दूसरे उदाहरण में देखें, किसी आयोजन में निर्धारित समय पर पहुंच जाने वाले को तब अफसोस होता है, जब कार्यक्रम समय से आरंभ नहीं होता, अतिथियों तथा अन्य आमंत्रितों, संभावितों के आ जाने की प्रतीक्षा की जाती है।
तोड़फोड़ की घटना के बाद प्रभावितों की पहली प्रतिक्रिया में जनप्रतिनिधियों विधायक और सांसद के प्रति रही, ध्यान देने पर समझ में आया कि उनके प्रति आक्रोश इसलिए नहीं है कि उन्होंने घर तुड़वाया, बल्कि इसलिए है कि आश्वासन के बावजूद भी बचा क्यों नहीं पाए? गुस्सा उचित पुनर्वास न होने के कारण भी था। इस जद में प्रशासन और अन्य जनप्रतिनिधि-मंत्री भी आ गए, जिन्हें घरों को तुड़वाने के लिए जिम्मेदार माना गया। दलगत के साथ अंदरूनी गुटीय राजनीति गरमाने लगी, परतें खुलने लगीं, गांव के सरपंच, पंचायत सचिव, चरागन, पट्टा, प्रधानमंत्री आवास, बेजा-कब्जा। फिर वित्त मंत्री, राजस्व मंत्री, आवास एवं पर्यावरण विभाग, छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल, नवा रायपुर अटल नगर विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन निशाने पर आते गए। घटना छोटी-मोटी नहीं थी, लेकिन यह भी ध्यान में आता रहा कि संवेदनशील क्षेत्र की और मीडिया के पहुंच के करीब की है। ऐसा भी नहीं कि पीड़ितों की व्यथा कमतर है, मगर धरना, आंदोलन-प्रदर्शन के लिए संगठन कौशल और क्षमता की आवश्यकता होती है, इस प्रकरण में मुझे पीड़ितों का नेत्त्व करने वाले चेहरे या नाम नहीं दिखाई पड़े। संभव है कि परोक्ष प्रभावित हित-साधन करने वाले वाह्य उत्प्रेरक रहे हों।
# मेरठ के पुश्तैनी जल्लाद पवन, जिन्हें फांसी देता है, उसको क्या लगता होगा, शायद अपने मन को समझा लेता हो कि भले ही उस अपराधी ने उसके लिए कुछ गलत न किया हो, दुर्दांत अपराधी है, जिसको मौत दी जा रही है। ज्यों ‘एनकाउंटर‘ में अपराधियों को मार गिराने वालों को लगता होगा।
# 2013 में बिहार में एक रेल की पटरी पार करते, बड़ी संख्या में तीर्थयात्री कट-मरे थे। घटना के बाद ट्रेन में आग लगा दी गई थी और ड्राइवर के साथ मरपीट की खबरें आई थीं। दशहरा 2018 के अमृतसर हादसे में रेल पटरी पर आए लोगों की कट कर मौत हुई थी। घटना में ड्राइवर पर आरोप था कि उसने न तो गति धीमी की, न ही हॉर्न बजाया, जबकि ड्राइवर ने आपात ब्रेक का प्रयास किया और हॉर्न भी बजाया था। बाद में यह बात सामने आई कि जलते रावण की ओर ध्यान होने, पटाखों के शोर और धुएं के कारण ऐसा हुआ। घटना में दशहरा आयोजकों, रेल प्रशासन और ड्राइवर को दोषी मानते कार्यवाही की मांग उठी थी। ऐसी मिलती-जुलती घटना-खबर की जानकारी आती रहती है।
# दूसरी तरफ नानावटी का मुकदमा याद आता है या फिल्म ‘अचानक‘, जिसमें ऐसा फौजी जो सीमा पर जिन्हें मार गिराता है, जिनसे उसका सीधे कोई लेना-देना नहीं, उन्होंने फौजी का कुछ नहीं बिगाड़ा, फौजी उन्हें कतई नहीं जानता, व्यक्तिगत स्तर पर उसके प्रति जिन्होंने कुछ भी नहीं किया है, उन्हें मारने पर पदक मिलता है। वहीं दूसरी तरफ पत्नी के विश्वासघात के कारण स्वयं सीधे आहत होने के कारण की गई हत्या के अपराध में फांसी की सजा सुनाई गई है।
# वाल्मीकि की कथा में वाल्मीकि निरपराधों से लूट-मार करता है, यह मानते कि वह यह खुद के लिए नहीं, बल्कि अपने आश्रित परिवार-जन के लिए कर रहा है, जबकि उसका परिवार उसके कृत्य के फल में खुद को भागी मानने से इंकार करता है।
नकटी की घटना में मेरा कोई व्यक्तिगत फायदा-नुकसान नहीं हुआ है। घटना से जुड़ी खबरों को पढ़ते-देखते प्रभावितों के प्रति अन्य किसी नागरिक जैसी मानवीय संवेदना मेरे मन में भी है। घटना से जुड़े पक्षों से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित नहीं हूं। शायद इसलिए तटस्थ उन पक्षों की ओर भी सोच पा रहा हूं, जो नजर-अंदाज हैं। इस सारी भूमिका के बाद स्पष्ट हो गया होगा कि मेरे मन में चल रहा है कि नकटी-क्लॉड यानी जेसीबी-बुलडोजर ऑपरेटरों द्वारा अपना काम करते और काम के बाद उसका प्रभाव देखते-सुनते कैसा महसूस होता होगा। एक तरफ उन्हें सौंपे हुए काम को कर्तव्य-निष्ठा, सारे कौशल के साथ तत्परता से पूरा करना होता है, वहीं ऐसे किसी का घर ढहाना, जिसे वे जानते भी नहीं, कैसा लगता होगा।
देवदत्त के तीर से घायल हुए हंस और बचाने का प्रयास करने वाले सिद्धार्थ की कहानी के अंत में नीति वाक्य होता था- ‘मारने वाले से बचाने वाला बड़ा‘। किसी घटना पर सोचते हुए मन में आता है निमित्त कौन? कौन कर्ता, किसका कर्म, किस करण के द्वारा ... व्याकरण का कारक-पाठ याद आ जाता है- कर्ता-ने, कर्म-को, करण-से(के द्वारा) ... बात पाप-पुण्य की हो तो किसके खाते क्या आएगा!

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