Sunday, October 31, 2021

बिलासपुर अंचल में पर्यटन

पचीसेक साल पहले समाचार-पत्र के लिए मेरे द्वारा लिखा गया लेख
बिलासपुर अंचल का विस्तृत भू-भाग प्राकृतिक विविधताओं से सम्पन्न है। इस अंचल की सीमा पर एक ओर छोटी-बड़ी, ऊंची-नीची पहाड़ी श्रृंखला है, तो वहीं दूसरी ओर अंचल का मध्यभाग छत्तीसगढ़ के विशाल मैदान का हिस्सा है जिसमें महानदी और उसकी मुख्य सहायक नदी शिवनाथ के साथ-साथ हसदेव, लीलागर, आगर, हांफ, मांद जैसी छोटी नदियां प्रवाहित होती है। इस अंचल के प्राकृतिक वैविध्य में घने वन विकसित हुए और धरती की कोख में खनिज संसाधन भरा है अंचल की यह विशिष्ट स्थिति, कन्दरावासी हमारे पूर्वज आदिमानव से लेकर आधुनिक औद्योगिक विकास तक के हर पड़ाव पर, सम्यता को आकर्षित करती रही है, और उस क्रम में हमारी प्राचीन सभ्यता के चिह्न अंचल की गौरवशाली धरोहर है।

प्राकृतिक विविधताओं के रंग से सराबोर इस अंचल में इतिहास के कला-प्रमाण मिलकर, यहां पर्यटन की प्रबल संभावना का स्पष्ट संकेत देते है। पर्यटन संभावनायुक्त क्षेत्रों स्थलों को मुख्यतः प्राकृतिक दृश्य यानि नदी, झील, झरने, पहाड़, और पठार, वन-सम्पदा और वन्य जीवन, पुरातात्विक-ऐतिहासिक स्थल और स्मारक, धार्मिक तीर्थ, और आधुनिक औद्योगिक तीर्थ- कल-कारखाने, इन भागों में विभक्त किया जा सकता है। बिलासपुर जिले के अंतर्गत और सीमावर्ती अंचल में ऐसे विभिन्न महत्वपूर्ण स्थान है, जो दर्शनीय और पर्यटन संभावनायुक्त है।

प्राकृतिक सौंदर्य के स्थलों में इस अंचल का प्रसिद्ध तीर्थ अमरकंटक, जिला-सीमा से संलग्न शहडोल जिले में स्थित हैं। यहां पुण्य सलिला नर्मदा का उद्गम है, जोहिला आदि कुल अन्य नदियों के उद्गम के साथ-साथ महत्वपूर्ण नदी सोन उद्गम की मान्यता, इस स्थल से संबद्ध है, सुरम्य प्राकृतिक, दृश्यावली के साथ-साथ उत्तम स्वास्थ्यप्रद जलवायु, वन और खनिज संसाधनों की सम्पन्नता, प्राचीन मान्य पुण्य क्षेत्र नर्मदा कुण्ड, प्राचीन कर्णेश्वर मंदिर समूह के अतिरिक्त विभिन्न धर्म संप्रदायों के निर्माणाधीन तीर्थ, मठ और आश्रम, प्रत्येक रूचि के पर्यटकों का मन मोह लेने में सक्षम हैं।

बिलासपुर जिले के अंतर्गत खूंटाघाट, खुड़िया जलाशय, बांगो-हसदेव परियोजना, केन्दई प्रपात, दमऊदहरा-गुंजी-ऋषभतीर्थ आदि स्थल विशेष उल्लेखनीय हैं, खूंटाघाट और खुड़िया मूलतः प्राकृतिक सरोवर है, जिन्हेें लोक कल्याणकारी सिंचाई व अन्य योजनाओं के अंतर्गत विकसित किया गया हैं। खूंटाघाट, इस अंचल की प्राचीन राजधानी रतनपुर के निकट है और प्राचीन अभिलेखों में रतनपुर के पूर्व में पर्वत और उसके तल में बांध निर्मित कराये जाने की चर्चा है, अर्थात यह स्थल लगभग ढाई सौ वर्ष पहले चतुर्थाश में वर्तमन रूप दिया गया हैं। बांगो-हसदेव परियोजना स्थल तहसील मुख्यालय कटघोरा के निकट स्थित हैं। यहां हसदेव नदी की मनोरम-प्राकृतिक धारा को बांधकर जिले की मुख्य सिंचाई योजना को आकार देकर कृषि विकास के माध्यम से हरित-क्रांति का स्वप्न मूर्त हो रहा है। जहां खुड़िया और खूंटाघाट में विशाल जलराशि नयनाभिराम दृश्य उपस्थित होता है वहीं बांगो-हसदेव में नदी तट की ऊंचाई, तटबंध और संकरी हो गई नदी की गहराई दर्शकों का मन बांध लेती है।

बिलासपुर-अंबिकापुर सड़क मार्ग पर निजी वाहनों से यात्रा करने वालों का प्रिय स्थान हसदेव नदी का सड़क पुल और आगे चलकर नदी-प्रपात केन्दई है। वर्षाऋतु में केन्दई प्रपात की चौड़ी धारा और पानी की उड़ती बूंदे चित्र-सदृश्य प्रतीत होती है तथा ऊंचाई से गिरती जलराशि का गर्जन दर्शकों को मौन दृश्य रसपान के लिए विवश करता हैं। अन्य ऋतुओं को जलधारा पतली हो जाने से स्थल का सामान्य आकर्षण तो कम हो जाता है, किंतु वर्षाऋतु में यहां से गुजरा दर्शक, स्थिति विपर्यय का आकर्षण जरूर महसूस करता है।

दमऊदहरा, सक्ती तहसील मुख्यालय के निकट स्थित महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धार्मिक व प्राकृतिक-सौंदर्य पूर्ण स्थल पर सघन वनस्पति और पहाड़ी के साथ, जैसा कि नाम से स्पष्ट है, दहरा अर्थात् प्राकृतिक जल भराव का कुंड है। ऐतिहासिक ऋ़षभ तीर्थ की धार्मिक महत्ता का उल्लेख महाभारत में हैं और ईसा की आरंभिक सदी का चट्टान लेख भी यहां है, जिससे स्थल पर सहस्रों गायों के दान दिये जाने की जानकारी शिलांकित हैं। जिला सीमा से संलग्न रायगढ़ जिले में एक अन्य आकर्षण पर्यटन स्थल रामझरना है। जो सौ कि.मी. से भी अधिक दूरी के पर्यटकों में पिकनिक के लिये लोकप्रिय स्थल है। राम-झरना में प्रस्तावित ‘राम-गार्डन’ विकसित होने से, स्थल का महत्व अधिक हो जावेगा।

वन और वन जीवन की दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत सम्पन्न रहा है। इस अंचल धन के कटोरे का मैदानी समतल चारों ओर पहाड़ियों और वन से परिवेष्टि है। वर्तमान में जंगल विरल हो जाने से वन्य जीवन पर भी प्रभाव पड़ा है, किंन्तु शासन द्वारा वनों की हरीतिमा बनाए रखने और उसे पुनर्जीवित करने के पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं । वन और वन्य जीवन अन्योन्याश्रित है, और इस अंचल में प्रचलित ‘आरे’ के निषेध की मान्यता में, संभवतः वन-पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से, इस परम्परा में, आधुनिक विचार के बीज दिखाई देते है। कुछ अशासकीय संस्थाओं ने भी वन, पर्यावरण तथा वन्य जीवन संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है।

इस अंचल का केन्दा क्षेत्र पिछली सदी तक हाथियों के लिये पूरे देश में प्रसिद्ध था और हाथियों के तत्कालीन सामरिक राजनैतिक महत्व के कारण पूर्व राजधानी रतनपुर की पहचान थी। वर्तमान मंर जिले के अंतर्गत एकमात्र महत्वपूर्ण वनक्षेत्र, अचानकमार अभयारण्य हैं, अन्य वन क्षेत्रों की वानिकी तथा वन्य-जीवन की संख्या व विस्तार सीमित है। अचानकमार अभयारण्य हैं, अन्य वन क्षेत्रों की वानिकी तथा वन-जीवन की संख्या का विस्तार सीमित है। अचानकमार अभयारण्य क्षेत्र में शेर, चीता, भालू, सांभर, चीतल आदि प्राणियों के साथ-साथ सामान्य पशु-पक्षियों से यह वन क्षेत्र परिपूर्ण है, इसके अतिरिक्त यहां कुछ विलक्षण ‘एल्बिनोज’ की जानकारी भी मिलती हैं।

पक्षियों की दृष्टि से शीतऋतु के प्रवासी पक्षी, इस अंचल में विशेष उल्लेखनीय हैं, अंचल के बहुसंख्य सरोवर शीतऋतु में इन आगन्तुक सालाना मेहमानों से भर जाते हैं। प्रवासी पक्षी शीत क्षेत्रों से अत्याधिक लंबी उड़ान भर कर यहां गुनगनी धूप सेंकने आते हैं महानदी की रेत में शिवरीनारायण और चंद्रपुर-बालपुर क्षेत्र में प्रसिद्ध विशाल कुररी, विचरण करने प्रवास पर आते है, इनका आगमन, उड़ान और रेत पर उतरना, मानो सम्मोहन कर देता है।

स्थानीय पर्यटन संभावना की दृष्टि से बिलापुर शहर के निकट के स्थल कानन पेंडारी और स्मृति वन का उल्लेख किया जा सकता हैं यह दोनों स्थल शासकीय, अर्धशासकीय योजनाओं के अंतर्गत विकसित वनोद्यान क्षेत्र है। कानन पेंडारी में शहर के निकट वन के वातावरण की अनुभूति और वन्य जीवों का दर्शन आकर्षण है। स्मृति वन शहर के मध्य से गुजरती अरपा नदी के बायें तट पर विकसित होते शहर का छोर है, जहां, शहर में प्रवास पर आये प्रमुख व्यक्तियों द्वारा वृक्षारोपण कराया गया है, यहां विकासशील बच्चों का पार्क, मछली घर आदि निकट भविष्य में स्थानीय पर्यटक महत्व का स्थान प्राप्त कर लेंगे।

पर्यटन संभावनायुक्त ऐतिहासिक पुरातात्विक स्थलों की सूची इस अंचल में पर्याप्त लंबी है, इसमें विशेष महत्व के स्थलों में संक्षिप्त विवरण क्रम में जिला सीमा से संलग्न रायगढ़ जिले का स्थल सिंघनपुर है, जहां हमारे पूर्वज गुफावासी आदि मानव के बर्बर स्थितियों से अगल अपनी कलाप्रियता का प्रमाण अंकित किया है। सिंघनपुर के चित्रित शैलाश्रयों का रंग अब धुंधला पड़ता जा रहा है, किंतु यहां पहंुच कर आदिम जीवन स्थितियों की कल्पना और उसका रोमांच महसूस होता है और प्रागैतिहासिक आदि मानव से अपनी समाष्टिगतता के सूत्र जुड़ने की प्रच्छन्न किंतु सहज अनुभूति में दुर्लभ क्षणों की जीवन स्मृति सुरक्षित रह जाती है।

जिले की सक्ती तहसील में सातवीं सदी इस्वी के अवशेषयुक्त प्राचीन स्थल अड़भार है, जिसकी पहचान पुराने अभिलेखों के ‘अष्टद्वार’ नामक स्थल व क्षेत्र से की गई है। यहां विशिष्ट तारकानुकृति प्रकार के शैव स्थापत्य अवशेष तथा जैन धर्म से संबंधित प्रतिमाएं भी ज्ञात है। मंदिर स्थल पर रखी प्रतिमाओं में महिषासुरमर्दिनी की भव्य विशाल प्रतिमा, लास्य व शास्त्रीय भंगिमा युक्त नटराज शिव तथा जैन तीर्थकर पार्श्वनाथ की सप्त सर्पफण छत्र युक्त प्रतिमा विशेष उल्लेखनीय है। यहां से ऐतिहासिक महत्व के प्राचीन अभिलेख व प्राचीन मृजिका दुर्ग या गढ़ भी प्रकाश में आया है। 

जांजगीर तहसील में खरौद सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी के पुरावशेषों से सम्पन्न हैं। यहां प्राचीन लक्ष्मणेश्वर मंदिर पुनर्सरचित स्मारक है, जिसमें मूल शिवलिंग स्थापित है। द्वार शाख पर नदी देवियां व द्वारपाल मूलतः विद्यमान है। मंडप में रामकथा अंकित स्तंभ तथा दो शिलालेख है। मंदिर परिसर में हिंदू धर्म से संबंधित प्रतिमाएं, जैन तोरण खंड तथा पंडित दामोदर की अभिलिखित प्रतिमा हैं। यहां दो अन्य ईट निर्मित मंदिर इन्दल देउल तथा शबरी मंदिर विशिष्ट प्रकार के शिल्प व तत्कालीन मूर्तिकला की दृष्टि से आकर्षण दर्शनीय उदाहरण है। खरौद के निकट स्थित शिवरीनारायण महानदी के बायें तट पर स्थित अंचल का प्रसिद्ध तीर्थ है। यहां के प्राचीन मंदिरों और प्रतिमाओं में शिल्पगत सौंदर्य-अलंकरण की कलचुरिकालीन कला की विशिष्ट छाप है। शिवरीनारायण मेें विभिन्न भक्त-श्रद्धालुओं और जाति समाजों के बनावाए आधुनिक मंदिर भी है इन स्थलों पर क्रमशः शिवरात्रि व माघ पूर्णिमा के अवसर पर विशाल मेला भरता है। जांजगीर का विष्णु मंदिर अधूरा होने के बावजूद स्थापत्य की दृष्टि से संपूर्ण विकसित शैली एवं तत्कालीन कला का समर्थ प्रतिनिधि हैं।

बिलासपुर तहसील में स्थित ताला पंाचवीं-छठीं सदी ईस्वी के कलावशेषों तथा विशेषकर रूद्र-शिव की विस्मयकारी प्रतिमा के कारण विश्वविख्यात हैं। यहां स्थित दो शिव मंदिर- स्थानीय नामों देवरानी व जिठानी मंदिर से जाने जाते हैं। जेठानी मंदिर का भव्य अभिकल्प और विशिष्ट स्थापत्य योनजा में विशाल अलंकृत स्तंभ, विभिन्न मुद्राओं में भारवाहक गण, वरूण, अर्द्धनारीश्वर, शिव मस्तक, महिषमर्दिनी, उपासक आदि प्रतिमाएं हैं। स्थल से लघु प्रतिमा फलकों और प्राचीन मुद्राओं की प्राप्ति विशेष उल्लेखनीय है। देवरानी मंदिर का प्रवेश द्वार मुग्धकारी है। यहां गणेश, मेष मुख गण, सूर्य, उपासक आदि प्रतिमाएं हैं, द्वार शाख के अंकन में कथानकों की जीवन्नता और कीर्तिमुखों की प्रभावोत्पादकता, अपनी सानी नहीं रखता, मनियारी तट के इस पलाश क्षेत्र का वसंत में दर्शन आल्हादित करता है।

मल्हार अंचल का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थल कहा जाता है, क्योंकि यहां ईस्वी पूर्व आठवीं सदी से तेरहवीं सदी ईसवीं और उसके बाद के विभिन्न राजवंशों, कला शैलियों से संबंधित जैन, बौद्ध व हिंदू धर्म संप्रदायों की प्रतिमाएं, सिक्के, अभिलेख आदि बहुलता से प्राप्त है। स्मारकों में पातालेश्वर, देउर व डिडिनेश्वरी देवी का मंदिर विशेष उल्लेखनीय है। केन्द्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण का स्थल संग्रह भी देखने योग्य है। रतनपुर, सुदीर्घकाल तक इस अंचल का प्रशासनिक मुख्यालय रहा है, यहां पुरावशेषों के साथ-साथ धार्मिक दर्शननार्थियों की बड़ी संख्या पूरे वर्ष भर पहंुचती है और पर्वो के अवसर पर विशाल मेला भर जाता है। यहां प्रत्येक तीसरे साल बसना के निकट गिधली ग्राम से पैदल आने वाले यादव परिवार की निष्ठा अद्वितीय है, जो इस लंबी दूरी को लगभग छः माह में पूर्ण करके समलाई की भेंट उसकी बहन महामाई से कराते हैं।

कटघोरा तहसील में प्राचीन महादेव मंदिर पाली के निर्माण व उद्धार में क्रमशः बाणवंशी शासक विक्रमादित्य प्रथम के पुत्र मल्लदेव तथा कलचुरि नरेश जाजल्लदेव का नाम अभिलिखित है। विभिन्न प्राचीन अभिलेख युक्त यह मंदिर शिव, सरस्वती, चामुण्डा, सूर्य, अष्ट दिगपाल, योगी, नर्तकी, व्याल तथा मिथुन प्रतिमाओं से सज्जित है। लाफा का चैतुरगढ़ तथा कोसगई अथवा गढ़ कोसंगा, अंचल के दो पर्वत दुर्ग हैं, चैतुरगढ़ की गणना क्षेत्र के दुर्गमतम किलों में की गई है। किले में तीन प्रवेश द्वार हैं, किंतु लाफा बगदरा होकर मुख्य प्रवेश अपेक्षाकृत आसान बना दिया गया है किले के भीतर परवर्ती कलचुरिकालीन महिषमर्दिनी का मंदिर है। मंदिर के निकट ही तालाब है जिसमें सदैव जल रहता है। यही पहाड़ी श्रृंखला जटाशंकरी-अहिरन नदी का उद्गम है।

बिलासपुर नगर में संस्कृति विभाग का पुरातत्व संग्रहालय हैं। संग्रहालय में पांचवीं सदी ईस्वी से तेरहवीं सदी ईस्वी तक का प्रतिमाएं है जो जिले के ताला, रतनपुर, गनियारी, पंडरिया, मदनपुर, सेतगंगा, सीपत आदि स्थानों से एकत्र की गई है। संग्रह में कुछ महत्वपूर्ण और दुर्लभ शिलालेख-ताम्रपत्र तथा प्राचीन सिक्के भी है। अन्य प्रदर्शित सामग्रियों में मुख्यतः शिलालेख एवं मानचित्र, सारिणी, चित्र, प्रादर्श आदि है।


Saturday, October 30, 2021

कोटगढ़

मध्य मैदानी छत्तीसगढ़, यानि मुख्यतः वर्तमान रायपुर, बिलासपुर और दुर्ग संभाग के छत्तीस गढ़, राजस्व प्रशासन की वह इकाइयां है, जो कभी रतनपुर मुख्यालय से संचालित, खालसा कहलाती थीं। इन गढ़ों की संरचनाओं में से कुछ मूलतः मराठों के पूर्वकालिक कलचुरियों द्वारा स्थापित किये गये होंगे, जैसा कि पुरातात्विक प्रमाणों से अनुमान होता है। इनके संबंध में सिलसिलेवार इतिहास, इससे संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था और गढ़-किलों में जीवन शैली, संरचना पर निश्चित ढंग से कुछ कह पाना आसान नहीं। इस स्थिति में ऐसे केंद्रों- किलों के संबंध में ग्रामवासियों की जिज्ञासा, विभिन्न दंतकथाएं गढ़ लिया करती हैं। कुछ तथ्य पीढ़ियों से चले आकर कथानक का रूप ले लेते हैं और इतिहास की सीमित सूचना एवं प्राप्तियां, इन स्थलों के संबंध में किस्सों की मदद से कुछ कह सकने का आधार बनती है।

कोटगढ़, जांजगीर-चांपा जिले के अकलतरा-बलौदा मार्ग पर स्थित है। कोटगढ़ वस्तुतः कोट और गढ़ इन दो शब्दों से मिलकर बना है। इसमें कोट- आबादी वाला हिस्सा और गढ़- किले का भाग है। इससे प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में ‘गढ़’ प्रशासनिक सेना प्रमुख व सैनिक कर्मचारियों का स्थान था जबकि किले से संबंधित सामान्य जन किले के उत्तर पूर्व में वर्तमान कोट, बरगवां एवं महमदपुर गांव के हिस्से में निवास करते थे। संलग्न गांव खटोला है, जिसे गढ़ के चारों ओर की ‘खाई का टोला‘ माना जा सकता है।

माना जाता है कि कलचुरीकालीन शिवनाथ के उत्तर में स्थित अठ्ठारह प्रमुख प्रशासनिक केन्द्रों में कोटगढ़ भी एक था। गढ़ के अधिकारी दीवान कहलाते थे और कोटगढ़ के अंतर्गत चौरासी गांव, बारह-बारह गांव के सात बरहों में विभाजित थे। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मराठा काल में अकलतरा, प्रशासनिक इकाई बना, जिसके अंतर्गत तिरसठ गांव थे। संभवतः यह कालांतर में कोटगढ़ का मुख्यालय बन गया था। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में अंग्रेज शासकों ने खरौद, अकलतरा, खोखरा, नवांगढ़, जांजगीर, किकिरदा, परगनों के चार सौ उन्चास गांवों को मिलाकर एक परगना- खरौद बना दिया। कसडोल से नियंत्रित होने वाला खरौद परगना, शिवरीनारायण तहसील बना। बाद में यही जांजगीर अनुविभाग और अब जांजगीर-चांपा जिला है।

कोटगढ़ का किला इस क्षेत्र के अधिकतर किलों की भांति ही ‘धूलि दुर्ग’ की श्रेणी का है यानि मृत्तिका-दुर्ग, मिट्टी की चौड़े-ऊंचे प्राकार, रक्षा दीवार वाला। ऐसे अन्य गढ़ों की अपेक्षा यह अधिक सुरक्षित अवस्था में हैं जिससे इनकी संरचना समझने के लिये यह प्रतिनिधि संरचनाओं में से एक है। इसका लगभग पचास फीट ऊंचा मुख्य परकोटा, प्रायः सुरक्षित है। इस परकोटे के बाहर पचास फीट चौड़ी खाई- परिखा, चारों तरफ से रक्षा की एक महत्वपूर्ण पंक्ति के रूप में अब भी विद्यमान है यद्यपि कुछ स्थानों पर खाई पट गई है। इस खाई के बाहर दूसरा बाहरी परकोटे का अंश भी अभी विद्यमान है। इस प्रकार यदि क्रमशः बाहर से रक्षा पंक्तियों की गणना की जाय तो प्रथम परकोटा, खाई, मुख्य परकोटा और पुनः खाई तथा इसके बाद गढ़ के बीचों-बीच गढ़ीदार का स्थान। इन सुरक्षा पंक्तियों में तब सशस्त्र सैनिक, खाई में पानी के जन्तु और विभिन्न बाधक वनस्पति भी हुआ करती थी।

किले के अन्दर प्रवेश के लिये दो द्वार- पूर्व व पश्चिम दिशा में हैं। इसमें पूर्वी प्रवेश द्वार, प्रमुख मार्ग है जबकि पश्चिमी द्वार आज भी चोरनी दरवाजा के नाम से जाना जाता है। मुख्य प्रवेश द्वार स्पष्टतः मराठा काल की देन है। मेहराब वाला यह प्रवेश द्वार पत्थर व गारे की जुड़ाई से निर्मित है। जिसमें नक्काशी वाले पत्थर की संरचना भी है। प्रवेश द्वार के ऊपर हिस्से में बन्दूक की नली बाहर निकालने के लिये बनाये गये लम्बवत तिरछे छेद हैं। प्रवेश द्वार से अंदर प्रवेश करने पर लगभग सौ मीटर लम्बा संकरा दर्रा दिखाई पड़ता है और इसके पश्चात् किले के अंदर का विशाल खुला प्रांगण है। प्रांगण के लगभग बीचों बीच टीला है जिसके चारों तरफ भीतरी खाई की रेखाओं का स्पष्ट अनुमान किया जा सकता है। कहा जाता है कि तब बाहरी खाई जलमोंगरा, जलकुंभी, मगर, पानी वाले सांप, जैसे प्रतिरोधी जन्तु वनस्पतियांे से पूर्ण हुआ करती थी। मुख्य द्वार मजबूत लकड़ी एवं लोहे की पट्टियों से बना विशाल पटरा था, जिसमें बाहर की ओर बड़े-बड़े लोहे के भाले निकले रहते थे। किले से संबंधित सेना या व्यक्तियों के प्रवेश हेतु यह पटरा दोनों किनारे पर लगी मोटी-मोटी जंजीरों को छोड़कर खाई के ऊपर गिरा दिया जाता था और बाद में पुनः उन्हीं जंजीरों को खींचकर मुख्य प्रवेश द्वार बंद कर दिया जाता था।

बाह्य आक्रमण की रोकथाम के लिये बाहरी परकोटा था, जिस पर सशस्त्र पहरेदार हुआ करते थे फिर प्रतिरोधी मुख्य खाई तथा उसके बाद मुख्य परकोटा था। मुख्य परकोटे से आक्रमणकारी के प्रयास को विफल करने के लिये परकोटे पर सैनिकों के अलावा पत्थर के टुकड़ों का ढेर और खौलता हुआ तेल तैयार रखा जाता था। यदि आक्रमणकारी मुख्य द्वार से प्रवेश करना चाहे तो खाई के बाद भाले युक्त पटरा बाधक बनता था और ऊपर से भी उन पर वार किया जा सकता था। यदि आक्रमणकारी प्रवेशद्वार से अन्दर प्रवेश कर भी जाय तो लम्बे और संकरे दर्रे में भी उसके लिए व्यवधान होता था। किले के भीतरी प्रांगण में सैनिकों का विशाल समूह होता था इसके पश्चात पुनः भीतरी खाई पार कर ही आक्रमणकारी गढ़ीदार तक पहुंच सकता था। सुरक्षा के दो अन्य साधनों के रूप में चोरनी दरवाजा और कथित सुरंग का उपयोग किया जाता था। बताया जाता है कि उस सुरंग का दूसरा मुहाना अकलतरा के महल (हाथी बंधान) में खुलता था।

पुराने विवरणों में बताया गया है कि परम्परा में यह किला जयसिंह का कहा जाता था। कलचुरि परिवार के सामंत-प्रशासक अकलदेव का नाम भी परंपरा में है, जिसके नाम पर अकलतरा, बसा माना जाता है। संभवतः जयसिंह-अकलदेव कलचुरिकालीन गढ़ीदार थे जबकि मराठाकालीन गढ़ीदारों में अंतिम भुवनेश्वर मिश्र बताए जाते हैं। भुवनेश्वर मिश्र की वीरता की कहानी और उनका नाम आज भी दंतकथाओं में जीवित है। इनके प्रशासन, सैन्य व्यवस्था और देवी शक्ति की कहानियां, लोग आज भी कहते है। कहा जाता है कि भुवनेश्वर मिश्र की पत्नी को देवी का वरदान प्राप्त था। दंतकथाओं प्रचलित है कि बिलईगढ़ और सोनाखान के जमींदारों से भुवनेश्वर मिश्र का द्वेष था। बरसात की एक रात को किले के ही किसी व्यक्ति का सहयोग लेकर बिलईगढ़ जमींदार किले में प्रविष्ट हो गये और किसी तरह नींद में डूबे मिश्र दंपति तक पहुंच गए। जमींदार ने ज्यों ही तलवार से मिश्र जी के गले पर प्रहार किया, तलवार स्पर्श के पूर्व ही रुक गई, कई प्रयासों के बावजूद भी जमींदार को सफलता नहीं मिली। इस आलौकिक घटना से हतप्रभ जमींदार उलटे पांव बिलईगढ़ लौट गए।

जीवन के अंतिम दिनों में भुवनेश्वर मिश्र की धर्मपत्नी, उनका साथ छोड़ चल बसीं। बताया जाता है कि इसके बाद मिश्र जी में मानसिक अस्वस्थता के लक्षण दिखाई पड़ने लगे थे। खेल प्रेमी भुवनेश्वर मिश्र डुडवा-बरौंछा (कबड्डी के रूप) का निमंत्रण भिजवाकर आये हुए लोगों को तलवार निकाल कर मार डालने की धमकी दिया करते थे और तुरंत ही भाईचारे का प्रदर्शन करने लगते। अंततः भुवनेश्वर मिश्र को फिरंगियों का सामना करना पड़ा। कहा जाता है कि मिश्र जी सुरंग या चोरनी दरवाजे के मार्ग से अपनी स्वामिभक्त घोड़ी ‘बिजली’ सहित अकलतरा महल यानि हाथीबंधान आ गए। फिरंगियों की इसकी खबर मिल गई और मिश्र जी यहां पुनः घेर लिए गए। गिरफ्तार हुए मिश्र जी ललकारते रहे कि उन्हें उनकी ‘बिजली’ मिल जाये फिर कोई हाथ लगाकर बताए, तुम बारहों फिरंगियों के सिर, धड़ से अलग दिखाई देगें। फिरंगियों ने मिश्र जी की एक न सुनी और फिर उनका क्या हश्र हुआ इसकी खबर किसी को नहीं लगी।

इस गढ़ व आसपास मराठाकालीन अवशेषों विद्यमान हैं और प्राचीनतम तिथि निर्धारण के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की कनिंघम रिपोर्ट के अनुसार इस किले की प्राचीनता यहां के एक शिलालेख की लिपि के आधार पर लगभग एक हजार साल निर्धारित की जा सकती है। विभिन्न आकार की सिलें, अन्न पीसने की पत्थर की चकरी, मनके, ईटें, बर्तनों के टुकड़े व मूर्तिशिल्प आदि को दृष्टिगत रखते हुए इस किले की प्राचीनता की संभावना दसवी सदी ईस्वी या इसके पूर्व की ही प्रतीत होती है। प्रारंभिक कलचुरी काल से अब तक लगातार इस परिसर के चतुर्दिक आबादी स्पष्ट प्रमाणित है।

कलचुरियों के छत्तीस गढ़ फिर मराठों के किले-प्रशासनिक केन्द्र, उनकी प्रणाली पर शोध व व्यवस्थित अध्ययन की आवश्यकता अब भी है। किन्तु यह काल गौरव- कोटगढ़, आज भी इतिहास का मूक साक्षी और प्रतिनिधि है।
किस्से सुनना राजसी शौक है, तो मेरे पिता स्वर्गीय सत्येन्द्र कुमार सिंह जी में यह राजसी लक्षण भरपूर था। इस लेख का आधार उनके पास जमा किस्सों और उसके आधार पर मौखिक इतिहास का स्वरूप देने के प्रयास में यह मसौदा तीसेक साल पहले तैयार किया गया, अब आंशिक संशोधन कर प्रस्तुत।

Friday, October 29, 2021

सतरंगी रतनपुर

तुमान खोल की प्राकृतिक सुरक्षा सीमा पहाड़ियों से परिवेष्टित राजसत्ता का विस्तार जब रतनपुर में आता है तो उसका मैदानी खुलेपन की दिशा में आकर्षण दिखाई पड़ता है। सत्ता संघर्ष के जंगल कानून और गुरिल्ला छापामारी का युग समाप्त होकर मैदानी साहचर्य और विकसित सभ्यता की शुरूआत का, भू-व्यवस्थापन और कर-लगान की नई प्रणाली का, राजसत्ता में जनता की महत्वपूर्ण भागीदारी का सूत्रपात रतनपुर में होता है।

महिष्मति के कलचुरियों की पौराणिक पृष्ठभूमि से विकसित इतिहास ने त्रिपुरी में अगर दिशा पाई तो दक्षिण कोसल आकर उसे ठोस विस्तार मिला। दसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में तुमानखोल के सुरक्षित घेरे में त्रिपुरी कलचुरियों की एक शाखा ने अपनी स्वतंत्र सता घोषित की जो इतिहास में कलचुरियों की रतनपुर शाखा के रूप में जानी गई । इस नई शाखा की स्थापना और इनका लगभग साढ़े सात सौ वर्षों का अद्वितीय राज्यकाल कलचुरी, आदि हैहयवंशियों को इतिहास पुराण का सर्वाधिक दीर्घकाल तक शासन करने वाले वंश के रूप में स्थापित करता है।

रतनपुर में महाप्रतापी कलचुरी शासकों रत्नदेव, पृथ्वीदेव और जाजल्लदेव, प्रतापमल्ल, बाहरसाय और कल्याणसाय जैसे इतिहास प्रमाणित शासकों का स्वर्णयुग देखा वहीं मोरध्वज और चतुर्युगों मेें राजधानी का गौरव प्राप्त कर पुराण कथाओं से महिमा-मंडित भी हुआ है।

रतनपुर के कलचुरिकालीन पुरावशेषों का झलक और कला का अद्भुत सम्मोहक संसार अब बिखर सा गया है लेकिन उनकी झांकी रायपुर व बिलासपुर संग्रहालय, रतनपुर के प्राचीन किले, महामाया मंदिर, कंठी देऊल, जूनाशहर का सतखंडा महल, बावली, बीस दुअरिया, आठ बीसा, बादल महल, कर्णाजुनी तालाब, बैराग बन, भैैरव बाबा, रामटेकरी और लखनी देवी मंदिर में देखी जा सकती है।

महामाया मंदिर को प्रतिष्ठा सिद्ध आदि शक्ति के रूप में मान्य हुई है। प्रवेश-द्वार के सामने स्तंभों पर शिलालेख है। संलग्न तालाब और प्रतिमाओं, स्थापत्य अवशेषों के सांध्य आरती का वातावरण मानो कि काल विस्तार को लांघकर दर्शनार्थी को उसी स्थिति में ला देता है। जैसा रत्नदेव ने विलक्षण अनुभव यहां प्राप्त किया था। रायपुर संग्रहालय की दो महत्वपूर्ण प्रविष्टियां रतनपुर से प्राप्त हैं, जिनमें से एक शिव-पार्वती परिणय का कल्याण सुन्दर विग्रह है, इस प्रतिमा में सोमवंशी और कलचुरि कला के संधि-स्पर्श का सौन्दर्य अत्यन्त सजीव और मनोरम है।

ऐसी ही कलात्मक मूल्य की एक अन्य प्रतिमा शालभंजिका नायिका कठी देऊल मंदिर में है जिसके आभूषण अलंकरण और समानुपातिक शारीरिक सौन्दर्य में प्राकृतिक वृक्ष और जीव-जंतुओं को संघटित किया गया है। नायिका के संग दिखाया गया विदूषक प्रदर्शित है। रायपुर संग्रहालय में रखी काले पत्थर की चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा इस क्षेत्र में प्राप्त ग्रेनाइट की सर्वाधिक बड़े आकार की प्रतिमा है। चंवरधारिणी परिचारिकाओं सहित सम्पूर्ण देवमण्डल का परिकर है तथा उपासकों में प्रतिमा निर्माण हेतु दान के इतिहास को उद्धाटित करने वाले रतनपुर से प्राप्त शिलालेख भी सुरक्षित है।

कठीदेउल मंदिर वस्तुतः विभिन्न कार्यों की सामग्रियों से संयोजित पुनः संरचना है और संभवतः मंदिर में उत्कीर्ण संतोषगिरि नामक गोसाई का समाधिस्थल है। पुरातत्व अधिकारी एवं अध्येता राहुल कुमार सिंह का इस पक्ष में प्रबल तर्क है कि इस मंदिर के नामकरण का आधार भी यही रहा होगा साथ ही इस मंदिर की गोसाई परम्परा के लिए ग्राम छतौना लगाया गया था, जो इस मान्यता की पुष्टि करता है। कंठी देऊल मंदिर की संरक्षण प्रक्रिया में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इसे पत्थर दर पत्थर अलग कर पुनः खड़ा किया है।

कंठी देऊल मंदिर में ही काले ग्रेनाइट पत्थर की लिंग पीठिका के साथ-साथ ब्रह्मा और विष्णु के बीच ज्योतिर्लिंग के समक्ष हुई प्रतियोगिता का शिल्पांकन भी अत्यन्त रोचक और महत्वपूर्ण है। इस स्मारक में कलचुरिकालीन राजपुरूष व कलचुरि मंदिरों के गजपीठ आदि स्थापत्य खंड भी जुड़े हुए है। यह दोमंजिली इमारत युगल शैली के प्रभाव का भी आभास कराती कलचुरिकालीन प्रतिमाओं का रतनपुर से संग्रह बिलासपुर संग्रहालय में किया गया है। बिलासपुर में संग्रहित प्रतिमाएं कलचुरि शासकों में संग्रहित प्रतिमाएं कलचुरि शासकों के धार्मिक सद्भाव पर प्रकाश डालती है। जैन धर्म के विभिन्न तीर्थकरों की पद्मासन व कार्योत्सर्ग मुद्रा की प्रतिमाओं में कला प्रतिमान के दर्शन तो होते ही हैं, यह भी स्पष्ट होता है कि तत्कालीन रतनपुर राज्य क्षेत्र में जैन धर्मावलंबियों को विशेष महत्व तथा उनकी धार्मिक भावनाओं को सम्मान दिया गया था। नगर प्रवेश में भैरव बाबा स्मारक है।

रतनपुर के इतिहास का एक अन्य महत्वपूर्ण भाग कल्याण साय के साथ जुड़ा हुआ है। जिसकी राजस्व डायरी में अंग्रेजी प्रशासनिक अधिकारियों ने इस पूरे क्षेत्र की जमाबंदी का परम्परागत आधार पाया था। यही वह काल था जब इस क्षेत्र की जमाबंदी का परम्परागत आधार पाया था। यही वह काल था जब इस क्षेत्र ने छत्तीसगढ़ की संज्ञा धारण कर अपनी सांस्कृतिक विशिष्टता की पहचान बनाई।

अठारहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध मराठा शासकों के साथ जुड़ा इतिहास काल है जब बैराग वन की प्रतिष्ठा कर्णार्जुनी की महत्ता फिर से पहचानी गई और रामटेकरी, मूसे खां की दरगाह, बिठोबा मंदिर, लखनी देवी, आठबीसा, बादलमहल और जूना शहर का सतखंडा महल, बीस दुअरिया और बावली की रचना हुई ।

रतनपुर के रचनाकारों, स्थपतियों, राजपुरूषों और अनाम श्रमजीवी शिल्पियों का स्मरण कला समर्पित उस युग का स्मरण है जहां धर्म, अध्यात्म और उच्चतर सांस्कृतिक मूल्यों से यह सारा अंचल सराबोर था किन्तु इसी क्रम में उन नामों का उल्लेख भी आवश्यक है जिन्होंने इतिहास के इस गौरवशाली अध्याय को पुनः सभी के सम्मुख लाने में योगदान दिया है। बाबू रेवाराम, पं. शिवदत्त शास्त्री, चीजम और नेल्सन जैसे अंग्रेज अधिकारी, वी.वी मिराशी, हीरालाल, बालचंद जैन, लोचन प्रसाद पांडेय और प्यारेलाल गुप्त, डॉ. माखन झा इन सभी विद्वानों के गंभीर शोध अध्ययन को यदि किसी ने लोकरंगों से रंगकर सहज ग्राह्य बनाया है तो वे है जनश्रुतियों और परम्पराओं के कारण कवि देवार जिनके गीतों ने इतिहास के परम्परागत अध्ययन को सदैव दिशा और गति दी है।

भाई अशोक अग्रवाल उन दिनों पत्रकारिता में सक्रिय थे। रायगढ़ उनका डेरा होता था। 'अकलतरा के असल नवरत्न, अकलतरा में स्थापित रहते हैं', :)इसलिए अब स्थायी डेरा-बासा अकलतरा। पिछले दिनों (चित्र)याद ताजा करते हुए, कि उस दौरान वे अकलतरा आते तो मौज में उनसे हुई बातों को लेख का स्वरूप मिल जाता। ऐसी ही एक चर्चा को उन्होंने इस तरह कलमबद्ध किया था।

Thursday, October 28, 2021

विरासत-वार्ता, पाठक-मंच और कलम

राजनीति जैसे इतिहास भी, और कविता तो अवश्य ही शब्दार्थ पर आश्रित प्रविधियां हैं। कविता को हम इससे विलग करके कला कहते हैं, लेकिन इसकी समानता इसी बिन्दु पर समाप्त हो जाती है। छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति विभाग के तत्वावधान में ‘विरासत वार्ता‘ की इस माह की वैचारिक गोष्ठी में डा. शिरीष ढोबले ने ‘कविता, राजनीति और इतिहास‘ पर स्थानीय राघवेन्द्र राव वाचनालय में अपना वक्तव्य रखा।

पेशे से हृदय शल्य चिकित्सक डा. ढोबले, हिन्दी कविता तथा गद्य में एक स्थापित नाम हैं। उन्होंने कविता, राजनीति और इतिहास के आपसी संबंधों को स्पष्ट करने के लिए विशिष्ट दृष्टिकोण और उदाहरणों को आधार बनाया। डा. ढोबले ने मानव शरीर विज्ञान कबीर, गीता, तिलक और विदेशी विचारक-साहित्यकारों के उद्धरणों के प्रकाश में अपनी बात रखी और कहा कि राजनीति और राजकारण के पास अर्थों का एक निराला संग्रह है, इतिहास के पास एक ऐसा संग्रह जो यथाशक्ति तथा यथाबुद्धि, राजकारण और कविता से बुद्धि उधार लेता रहता है। शब्दों की खड़िया से कौन किस समय क्या लिखता है, यह बहुधा उपलब्ध अर्थसंसार पर निर्भर करता है। यह कोष किस मनस् से, किस मानसिकता से और किस अभीष्ट से विभिन्न प्रविधियां या कलाएं चुनती है, विशेषतः किस अभीष्ट से राजनीति, इतिहास और कविता इन्हें चुनती है, इसकी पड़ताल में देखें कि किस तरह देखना था, न देखना एक मुद्दा बनता है।

गोष्ठी के चर्चा सत्र में उपस्थित नगर के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों ने वक्तव्य पर अपनी जिज्ञासाएं और शंकाएं रखी। डा. कमलेश मिश्र ने पूछा कि, क्या वे कविता, राजनीति और इतिहास को भैषजिक दृष्टिकोण से देखते हैं? डा. ढोबले ने स्पष्ट किया कि किसी भी अनुशासन के उदाहरण से इन तीनों के अंतसंबंधों की पड़ताल संभव है। सामाजिक विज्ञान का व्यक्ति इसके उदाहरण पारिवारिक स्थितियों में भी घटाकर देख सकता है। रामकुमार तिवारी ने चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जैसे-जैसे ऐतिहासिक चेतना आती है, अपने बने रहने के लिए हम रिड्यूस होते जाते हैं, इस पर डा. ढोबले ने कहा कि इतिहास की प्रविधियां, राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, लेकिन लिखा गया हर टेक्स्ट, गास्पेल नहीं होता। उसे गास्पेल की तरह न लें। राजनीति के बारे में आगे डा. ढोबले ने कहा- इसकी परिणिति दो जगह होती है, या तो चकाचौंध भरे वातावरण में या कन्संट्रेशन कैम्पों में, राजनीति में हमारे निर्णय लेने का अधिकार दूसरों के पास होता है और एक ऐसा समूह, जिसमें व्यक्ति की पहचान खो जाती हो, उन्हें मान्य नहीं। किंतु डा. हेमचंद्र पाण्डेय से चर्चा में उन्होंने यह स्पष्ट किया कि इसके मायने तंत्र अथवा व्यवस्था की खिलाफत नहीं, बल्कि वे उसकी कमी की ओर संकेत कर रहे हैं। श्री विकास शर्मा ने पूछा कि क्या आप ऐसे इतिहास की बात कर रहे हैं, जो ईर्ष्या पैदा न करें? उत्तर में डा. ढोबले ने कहा कि इतिहास से सीख लेनी चाहिए। वैज्ञानिक तथ्यों को जांचा जा सकता है लेकिन इतिहास को नहीं।

गोष्ठी में पं. श्यामलाल चतुर्वेदी, नंदकिशोर तिवारी, बल्लू दुबे, कपूर वासनिक, शाकिर अली, डा. चन्द्रशेखर तथा सुश्री अलका व शुभदा रहालकर, अंजू पासी, डा. बी.के. प्रसाद, मधुकर गोरख, डा. घनश्याम वाई.पी. डडसेना, एन.के. वर्मा, राकेश सिंह, बद्रीसिंह कटहरिया, राजेश तिवारी, सुरेश चन्द्राकर, नथमल शर्मा, एजाज कैसर, विवेक जोगलेकर, राकेश खण्डेलवाल आदि सम्मिलित हुए कार्यक्रम का संचालन श्रीमती शुभदा जोगलेकर ने किया। गोष्ठी के आरंभ में वक्ता का परिचय तथा कार्यक्रम के अंत में धन्यवाद ज्ञापन पुरातत्व अधिकारी राहुल सिंह ने किया।
यह समाचार नवभारत, बिलासपुर में 3 अक्टूबर 2002 को प्रकाशित हुआ था। ऐसी गोष्ठियां हर महीने राज्य के प्रमुख नगरों में आयोजित किए जाने की योजना थी, हुई भी, लेकिन संभवतः बिलासपुर में और वह भी नियमित न रह सकी। गोष्ठी के लिए वक्ता से अपेक्षा होती थी कि वह परचा तैयार करे, जिसकी प्रतियां गोष्ठी में उपस्थित होने वालों को दो-तीन पहले वितरित कर दी जाती थी। खासियत कि थोड़े प्रयास और व्यक्तिगत रुचि के कारण विभिन्न वर्गों के बुद्धिजीवी श्रोता, प्रतिभागी बन कर उपस्थित होते। व्यय भी नाममात्र होता। इसी प्रकार ‘पाठक मंच‘ की गोष्ठियां आयोजित होती थी, इसकी एक गोष्ठी के लिए मुझे विजयदान देथा की ‘सपनप्रिया‘ के आधार वक्तव्य का जिम्मा दिया गया था। एक अन्य गोष्ठी का समाचार, दैनिक भास्कर, बिलासपुर 29 जुलाई 2003 में इस प्रकार प्रकाशित हुआ था-

‘कोई लेखन तभी कालजयी होता है, जब उसमें लेखक की निज पीड़ा सार्वजनिक संघर्ष के सुर में तब्दील होकर समकालीन समय की सत्ता की क्रूरता व दमनात्मकता के विरुद्ध न सिर्फ आवाज मुखर करती है, बल्कि भविष्य की लड़ाइयों के लिए सूत्र भी छोड़ती है।‘ बेबी हालदार लिखित बहुचर्चित पुस्तक ‘आलोआंधारी‘ पर चर्चा के दौरान पाठक मंव की गोष्ठी में यही बात सामने आई।

वकील कनक तिवारी के कार्यालय में आयोजित नवगठित पाठक मंच की पहली गोष्ठी में ‘आलोआंधारी‘ पर चर्चा करते हुए वकील कनक तिवारी ने इस पुस्तक को एक स्त्री की जीजीविषा का, उसकी दृढता व संघर्ष यात्रा की गाथा बतलाते हुए कहा कि इसे पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है मानों हमारी अपनी बच्ची अपनी गाथा हमारे सामने कह रही हो। उन्होंने कहा कि इस गाथा की प्रमुख पात्र सातवीं कक्षा तक पढ़ी घर में कामकाज करने वाली नौकरानी है। वह अपने सपाट बयानी लहजे में अपने कष्टों, अपनी पीड़ा की कहानी सुनाती है। रिश्तों के प्रति उसकी बैलेंसिंग गजब की है। पुस्तक में बंगला संस्कृति और परंपरा की झलक है। पुस्तक का आधार वक्तव्य पढ़ते हुए शोभित बाजपेई ने कहा कि पुस्तक की प्रमुख पात्र बेबी के वर्गीय चरित्र को बखूबी नहीं उभारा गया है। बेबी की अपने ऊपर होने वाले अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की चेतना के स्वर मुखर नहीं हो पाते।

चर्चा में भाग लेते हुए राहुल सिंह ने बेबी हालदार की सपाटबयानी को ही उनका धारदार हथियार बतलाते हुए कहा कि यद्यपि यह दिखता है कि बेबी में प्रतिरोध के स्वर नहीं हैं, लेकिन यदि उसकी पीड़ा पढ़कर हमें ऐसे स्वर की अपेक्षा होती है तो यह भी एक तरीका होता है अपनी निज की पीड़ा को सार्वजनिक संघर्ष में बदलने का।

रुपरंजन घोष ने बेबी के वर्गीय चरित्र पर सवाल उठाते हुए कहा कि यद्यपि बेबी बाद में निम्न वर्ग में दिखती है परंतु उसका प्रारंभिक लालन-पालन मध्यम वर्ग में हुआ, इसलिए उसकी चेतना में मध्यवर्गीय सस्कार हावी रहेंगे। कपूर वासनिक ने कहा कि आशापूर्णा देवी और दया पवार दोनों एक्टिविस्ट हैं और विशिष्ट उद्देश्य से लेखन कार्य करते हैं। अतः दोने से बेबी हालदार की तुलना करना अप्रासंगिक है। क्योंकि बेबी के पास ऐसी कोई पृष्ठभूमि नहीं है।

नमिता घोष ने कहा कि यह उस स्त्री की व्यथा-कथा है, जो एक स्त्री होने के मर्म और स्त्री होने की पीड़ा दोनों से वाकिफ है। विवेक जोगलेकर ने कहा कि किसी भी रचना का मूल्यांकन करते समय अपनी सोच व रचनाकार की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखें व उसके बाद रचना या रचनाकार का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। रफीक खान ने कहा कि बेबी अपनी रचना के पीछे सवाल छोड़ जाती है, जो पाठक के मन में पीड़ा उत्पन्न करते हैं। यही लेखन की सफलता है।

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए पुष्पा तिवारी ने कहा- कि आलोआंधारी एक स्त्री को निज बयानी है और इससे भी अधिक व भयावह अनुभव वाली स्त्रियां देश में हैं पर उनके पास लेखन के लिए प्रोत्साहन है न छप जाने लायक सुविधाएं।

गोष्ठी में प्रख्यात चिंतक राजेश्वर सक्सेना, कवि रामकुमार तिवारी, प्रो. बृजकिशोर प्रसाद सिंह, डा. चंद्रशेखर रहालकर, प्रताप ठाकुर, कालीचरण यादव आदि उपस्थित थे। पाठक मच की अगली बैठक नौ अगस्त को दोपहर तीन बजे वकील कनक तिवारी के कार्यालय में आयोजित की गई है।

रायपुर और फिर बिलासपुर में प्रभा खेतान फाउंडेशन के ‘कलम‘ का आयोजन होने लगा। इसके सूत्रधार गौरव गिरिजा शुक्ला ‘कलम‘ में प्रत्यक्ष उपस्थिति और आयोजन में परोक्ष सहयोग का अवसर मुझे देते हैं, उन्हें अब तक यह ठीक-ठीक अनुमान नहीं कि ऐसे आयोजन मेरे लिए सहज और प्रिय क्यों है।

Wednesday, October 27, 2021

जागेश्वर प्रसाद

छत्तीसगढ़ी सेवक-जागेश्वर प्रसाद

जागेश्वर प्रसाद जी बर कुछ लिखना मो ल बड़ा मुस्किल लगथे। दू कारण से, एक तो निजी कारण कि जेकर संग बहुत आत्मीयता हो जाथे, मन के बहुत सारा भाव रथे, ओ हर शब्द म नई आ पात रहय, त थथक-पथक लागथे अउ दूसर बात कि जागेश्वर जी के बारे म मो ल अंदाजा हे कि उनकर काम कतका अकन हे, लेकिन उनकर बारे म मोर जानकारी कतका कम हे। फिर भी अतका कहि सकत हंव कि उनकर कस ‘छत्तीसगढ़ी के सेवक‘ दुर्लभ हे। ओ अपन पूरा जीवन छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी बर समर्पित कर दिहिन। कागज पत्तर, लिखा-पढ़ी, संपादन के साथ-साथ पूरा छत्तीसगढ़ भर म घूम-घूम के लोग मन ल जागृत करना, लोगन के सहयोग लेना अउ उन ल सहयोग करना।

कहूं मौका म उनकर भाषण सुनें, उग्र अउ प्रखर जागेश्वर जी सार्वजनिक मंच म जतका मर्यादित, संयत लेकिन ठोस बात रखथें, त लगथे कि कइसे एक आदमी के पूरा जीवन, ओकर अनुभव के निचोड़ आत हे। उनकर मजबूत काम आधार आय, जेला शायद बहुत झन नइ गम पात होहीं, वो तेन टाइम म साधन-सुविधा के चिंता करे बिना, छत्तीसगढ़ी के सेवा सरलग करत रहिन, जब ए काम करे बर कोनो जादा माहौल नइ रहिस। आज के पीढ़ी उनकर काम से परिचित होही त समझ पाही कि छत्तीसगढ़ी महतारी के अइसनहा भी सेवक होए हे। छत्तीसगढ़ महतारी के कोख ले अइसनहे पूत, सपूत जनमत रहंय। जागेश्वर जी कस छत्तीसगढ़ी सेवक से प्रेरणा ले के हम अपन महतारी के सेवा करत हुए अपन राज ल खुसहाल अउ सुराज बना सकत हन।

जागेश्वर प्रसाद के प्रति मेरे मन में बहुत सम्मान है, गत वर्ष उनके 75 वें जन्मदिन के अवसर पर रामेश्वर वैष्णव जी के सम्पादकत्व में ‘जागरण दूत-जागेश्वर‘ शीर्षक से जागेश्वर प्रसाद अभिनंदन ग्रंथ प्रकाशित हुआ, जिसके सहयोगी संपादक डॉ. बिहारीलाल साहू जी, रामेश्वर शर्मा जी और जी.पी. चन्द्राकर जी थे। इस संग्रह में उनके प्रति व्यक्त मेरी उक्त भावना को भी स्थान दिया गया था।

Thursday, October 21, 2021

रामनराएन

75 पार कर चुके बढ़ई बबा रामनराएन यानि रामनारायण जी पहले कपड़ा बुनते थे, कारखाना में नागकन्या बीड़ी बनाते थे, कमरीद में, तब वही मार्का चलता था। पिता, दरजी थे, मशीन सिलाई का काम करते थे, वह भी सीखा। बाबा बैद थे, लोगों की आयु गणना, ज्योतिष भी करते थे। कहते हैं- हमलोग मरार नहीं, मेहर हैं। मरार-पटेल हमसे उंची जात है। प्रयागराज से ब्राह्मणों के गुरु आते थे, चौड़ी-मोटी शिखा वाले, वे ब्राह्मणों का दान स्वीकार करते थे, अन्य किसी का नहीं, लेकिन पानी ब्राह्मणों के हाथ का भी नहीं पीते थे। खुद का भरा या मरार-पटेल के हाथ का ही पानी पीते थे, इसलिए मरार हमसे उपर हैं।

बचपन में कुछ समय मामा के यहां कमरीद में रहे, उसी समय कोरबा का पावर हाउस चालू हुआ था। वहां खरसिया से आ कर सोनार बसा था, बकरी पाला था और दीगर जात की दो पत्नियां थीं। बकरी के लिए पत्ते तोड़ कर, चारा ले जाते थे। उसके पास चांदी का मोटा काम करना सीखा। सोनार, बड़ा जालिम जुआरी था। हमेशा जीतता था। ताश के पीठ पर बुंदकी होती है, उसे बारीक सफाई से रेजर से मिटा देता था, यह काम समझा कर मुझे दिया, इससे ताश पत्ते को पीठ की ओर से भी वह पहचान लेता था। उसकी यह कलाकारी कोई नहीं पकड़ पाया। हसदेव के बाईं ओर शराब का प्रचलन बहुत था लेकिन दाहिनी ओर इक्का-दुक्का होते थे, वह भी कभी-कभार।

कमरीद में 14-15 साल की उमर में डेढ़-दो साल रहा, पीना खाना सब चलता था, लेकिन वापस गांव भैंसदा आ कर सब अपने आप छूट गया और साधु संगत भी मिल गया। टाटानगर के धनेश्वर गिरि नागा साधु आए। हमारे गांव भैंसदा आए तो जांजगीर से पुलिस उनके साथ आई, बड़े महात्मा थे। हमारे गांव में यज्ञ हुआ था। उनके बहुत से चेले थे। उनसे फिर शंभूगिरि से प्रभावित, लौ लगी तो संत-संगत करने लगे। वे भी यज्ञ कराते थे। उनके यज्ञ के लिए, मिट्टी की मूर्ति-पुतरी बनाने बनाने लगे। महादेव, पार्वती, कृष्ण भगवान। गणेश पुतरी बनाते थे तो उसके पेट में नारियल की भेली डालना होता था। खड़ाउ बनाते थे, खंजेरी ‘खोलते‘ तो उनके माटी के चोले वाली काठी तबला बजाते, लकड़ी में रमने लगी। ‘मिट्टी‘ देना या मौत-मिट्टी और काठी में जाना की ‘माटी-काठी‘ के अलग अर्थ गढ़ते, जीवन से अभिन्न इस ‘तत्व‘-ज्ञान के औजार से पत्थर, कांच, लोहा की उनकी समझ में बारीकी आने लगी।

बलौदा सोंठी में दक्खल मानिकपुरी थे। तबला खोलने के वस्ताज। 17 इंच के बीजा का टुकड़ा रखते थे। एक दिन में दो तबला खोल देते थे, उनका काम देख कर तबला खोलना सीख लिया, लेकिन एक पूरा करने में दो दिन लग जाता था। तबला खोलने में रेशा को आड़ा काटना कठिन होता है। भैंसदा के बुधु सूर्यवंशी खराद का बहुत साफ काम करते थे। चिकारा बनाते थे। निसंतान थे। उनका मिट्टी का मकान अच्छे-खासे पक्के मकान को मात देने वाला था। बढ़ईगिरी का और काम भी करते थे। कोई जात-पांत हो, सब उनकी इज्जत करते थे। किस्सागोई-क्राफ्ट के भी वे माहिर हैं। लोकनायकों और प्रसंगों का अकूत भंडार है उनका। जाति-परंपरा, विशिष्टता, गांव बसाहट और व्यवहार के अनगिन चित्र, कभी एकदम साफ और कई अमूर्त से। जैसे- पचेड़ा के दो भाई बघवा-चितवा, कुरमीपारा के। बघवा बारूद-गोला का काम जानता था, कहता कि गांव वाले परेशान करेंगे तो पूरे गांव को गोला मार कर उड़ा दूंगा। एक बार गोला बनाते हुए उसका दाहिना हाथ उड़ गया।

लकड़ी की गरम-सरद तासीर बताते हैं। लकड़ी देखकर पहचान तो कर ही सकते हैं। छोटा टुकड़ा हो तो छिलकर, आरी चलाकर, बुरादे से अनुमान कर लेते हैं; कौन सा पेड़, किस उम्र का, नदी किनारे, पहाड़ पर, रेतीली, पथरीली, मटासी, कैसी जगह के पेड़ की लकड़ी है। काम के लिए लकड़ी के पलसा, गठान, सार, रेशा, तेल, रुई की जांच-परख करते चयन करते हैं। और फिर उसका उपयोग और उसके साथ किया जाने वाला बर्ताव तय करते हैं। आरी, बसूला, रम्दा, झरी, कोरी, पटासी, बिंधना, सुम्बा, बरमा, कटरेती, रेती, सकिंजा, जमूरा, जमुक, खसखस, गिरमिट, गरारी, बदगुनिया, गुनिया; साज कर काम शुरू करते हैं। औजार में धार लगाते देख, लगता है कि मानों मधुर संगीत-सृष्टि के लिए साज मिला रहे हों। उनसे सीखी बातों में से दो खासकर याद रखता हूं, ‘खसखस नाप, पक्का नाप‘ और ‘गुनिया-बदगुनिया दोनों जरूरी‘। मेरे लिए गुरु-तुल्य हैं वे।

काम शुरू करने के लिए बिना स्नान, औजार को हाथ नहीं लगाते और बीच में पानी-पिंडुल के लिए जाना हो तो हाथ-पैर धो कर काम में बैठते हैं। ‘उत्ती मुंह थूकना भी पाप।‘ मैंने कहा, ऐसा तो रामायण में भी लिखा है, यह आपको किसी ने बताया? उन्होंने कहा, रामायण में तो ऐसा नहीं लिखा है। मैंने कहा, तुलसी मानस में नहीं, ऐसा वाल्मीकि रामायण में है। इस पर उनका जवाब था, संस्कृत ठीक से समझ नहीं पाता, इसलिए वह नहीं देखा है। उत्ती मुंह वाला नियम पालन न हो तो अच्छा नहीं लगता, इसलिए करते हैं और याद नहीं कि कब से कर रहे हैं। औजार को कोई छुए, उन्हें पसंद नहीं। कभी मीठी, कभी तल्खी से झिड़की देते, समझाते हैं, ‘तेज धार है, कट जाएगा, चोट लग जाएगी।‘ शायद ऐसा वह औजार छूने वाले के लिए नहीं, औजार के लिए सोचते हैं।

कहते हैं- कटने-चिराने और सीझ जाने के बाद भी लकड़ी में जान बची रहती है। दरवाजा बनाने पर वह पहले तो चौखट में फिट कर दिया जाता है, लेकिन कुछ समय बाद अंट-टंट होता है, सुधारना पड़ता है। दो-तीन साल में उसे समझ में आ जाता है कि अब इसी चौखट में रहना है। ऐसा ढेरों शास्त्र और अनंत लोक, उनमें जीवंत-जाग्रत है।

पिछले साल इन्हीं दिनों वे पूरी आस्था और श्रद्धा से
एन. कुजूर जी के लिए ‘इसाई का मंदिर‘ बना रहे थे।



दूसरे चित्र में बिना जोड़, कील-कांटे वाले ‘व्यास‘ के साथ, जिसे आसनी या रहल कहते हैं और उच्चारण रहर, रेहर, रेहल, रहील, राही भी होता है। ऐसे काम में उन्हें खास आनंद होता है। तारीफ करने पर कहते हैं कि बना तो कोई भी ले, लेकिन हिसाब बिठाना होता है कि खोलते-लपेटते न ढीला पड़े, न अटके।

उनकी किश्त-किश्त बातों को याद रखते, भूलता भी रहा, कभी लिखा, फिलहाल उसमें से कुछ-

  • बीजा, सरई की लकड़ी चिराई के एक साल बाद काम में ली जाती है। पहाड़ी पथरीला क्षेत्र की लकड़ी सिंगिन सरई, (बस्तर क्षेत्र की) सबसे शुद्ध, हल्का लाल होती है। इसमें कील नहीं घुसता। बीजा का गंध अच्छा होता है। बीजा के गिलास या छीलन वाला पानी शक्कर बीमारी में फायदेमंद, आंख की रोशनी बढ़ाता है। बीजा का पानी सीधे नहीं पी सकते। सागौन पानी सोखता है। सरई का पानी काटकर, दोना लगा देने पर टपकता है, पीते हैं।
  • सागौन सुन्दर और मजबूत होता है, लेकिन शुद्ध नहीं होता। औजार खाता है। इससे अधिक सुन्दर और चिकना बीजा होता है। बीजा पानी पड़ने पर लाल-पीला दाग छोड़ता है। इसी तरह हल्दू का भी पीला दाग पड़ता है।
  • सागौन में पौन इंच, सरई में एक इंच और बीजा में डेढ़ इंच पलसा (लकड़ी की बाहिरी कमजोर परत) होता है। सागोन में धागा मोटा, रुई ज्यादा रहता है, घिसाई-पालिश से चमक आती है।
  • सबसे भारी लकड़ी के क्रमशः शीशम, धोबनिन, बासिन, करही, सिरसा, इसु। शीशम और इसु में पत्थर रहता है। बरेली से फर्नीचर आता था, इसु जाति की लकड़ी काली, उसकी कारीगरी और मजबूती अच्छी होती थी।
  • तबला, ढोलकी, मृदंग, खंजेरी के लिए गोइंजा मुलायम, हल्का लकड़ी है। इससे लकड़ी वाला बड़ा मांदर बनता है, लेकिन इसमें घुन लग जाता है। बीजा सब से उपयुक्त खोलने में कठिनाई होती है। रात बीतती जाने पर गरम होता है और आवाज ठोस होती जाती है। धान के भीतर दो महीना डाल देने पर बीजा लकड़ी में दरार नहीं आती। भिर्रा से भी बाजा बनता है। खंजरी जैसे छोटे वाद्य सेमल से बन जाता है। कटहल, आम, खम्हार, कदम्ब, गोइंजा भी काम आता है। सेन्हा, सल्हिया, सिवना से भी बनाते हैं।
  • हथियार के बेंट के लिए अमरूद उपयुक्त है। फैंसी, नक्काशी के लिए अखरोट काम आता है।
  • इमारती काम में चौखट सरई, बीजा, हल्दू एक ही तरह के हैं, लेकिन हल्दू पीला हो जाता है। खम्हार में तेल नहीं रहता, वजन में हल्का। सेम्हल, महालीम भी तेल न रहने के कारण वजन में हलका होता है। सबसे ज्यादा तेल शीशम, फिर सागौन, फिर बीजा में होता है। महुआ, पपरेल में तेल रहता है, लकड़ी को कच्चे में भी जला सकते हैं।
  • दहिमन-भूरा रंग इसकी छाया विष बाधा हरती है। शराबी, पी कर इसके नीचे जाने से बचते हैं, उनका नशा उतर जाता है, पैसा बेकार जाता है। इसी तरह कुम्ही के जड़ में हल्दी, चावल से पूजा कर अगरबत्ती जला कर और प्रणाम कर, जड़ खोद लेते हैं, उसको पीसकर पिलाने पर जहर उतर जाता है।
  • धंवरा, धामिन में लचक होता है। कारी का रंग भूरा, भिरहा का रंग लाल, लचकदार लकड़ी है, टूटता नहीं। बहिंगा, कांवर और टांगी के बेंठ के काम आता है।
  • तेंदू न छिला रहे तब मजबूत, छाल निकलने के बाद कमजोर। मजबूती है लेकिन लचक नहीं होता झुका तो झुका रहेगा।
  • मटासी जमीन का बबूल सफेद और मजबूत होता है, जबकि कन्हार का बबूल लाल, कमजोर होता है, लकड़ी गाड़ा बनाने के काम आता है।
  • साजा-पानी में गल जाता है, सूखी जगह में मजबूत रहता है, ताकत रहता है।
  • नीम- शीतला माई, नीरोग, घर के दरवाजे-आंगन में शुभ। लकड़ी चिरवा कर बरसात में चार महीना जमीन में गढ़ा रहे, उसके बाद दो महीने सुखाकर तब काम में आता हैै। यों नहीं सूखता जब तक जमीन की गरमी न पाए। भगवान की मूर्ति बनती है।
  • डूमर पवित्र लकड़ी है, श्रुवा बनता है, इसकी लकड़ी से भी मूर्ति बनती है, पानी में नहीं गलता, अविनाशी माना जाता है।
  • अकोल, भूत-परेत, देवता-धामी, दिव्य शक्तियों का डेरा-बासा रहता है।
  • Sunday, October 17, 2021

    छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़िया

    छत्तीसगढ़ की भूमि का स्वभाव शांत, सौम्य और संतुष्ट है। यह विशिष्टता अगर किसी पूरे भौगोलिक खण्ड में सामान्य-सहज ढंग से उपलब्ध हो तो यह निश्चय ही अत्यंत सम्पन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर ही विकसित होना संभव है।

    कहावत है कि ‘पूत के पांव पालने में दिखाई पड़ते हैं’ और इतिहास की झलकियां इस अंचल की विशिष्टताओं की साक्षी हैं। इस सांस्कृतिक विरासत के रूप-आकार में हमारा समष्टि उद्यम तो कारक बना ही, प्राकृतिक स्थितियों का महत्व भी कम नहीं है। छत्तीसगढ़ की पहाड़ियों और वन-कान्तार में जैव विविधता, खनिज-सम्पदा, नदी-नाले, वह सभी कुछ है, जो सभ्यता-शिशु को अपनी गोद में दुलार-संवार कर पाल-पोसकर सक्षम बना सकता है। इस भूभाग के उपजाऊ मैदान से छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ ‘धान का कटोरा’ कहकर किया जाना, अंचल को कमतर आंकना होगा। प्रकृति ने इस अंचल को विशिष्टता प्रदान की है और उसका सम्मान कर अंचल ने जो प्रतिमान रचे-गढ़े हैं, वही पृष्ठभूमि इस सम्पन्न धरती पुत्रों की संतुष्टि और शालीनता में अभिव्यक्त होती है। सभ्यता विकास के विभिन्न चरणों के लिए इस धरती की उपयुक्तता सहज देखी जा सकती है, जहां इतिहास में ऋषभतीर्थ-गुंजी विकसित हुआ उसी से जुड़ा आधुनिक औद्योगिक तीर्थ कोरबा भी बुलंदियों पर है। चित्रकला, मूर्तिकला, भाषा-लिपि के विभिन्न अप्रतिम, सर्वोच्च, सर्वप्रथम और विशिष्ट चमत्कार यहां घटित हुए हैं जिनमें कुछ अल्पज्ञात हैं, कुछ अचर्चित तो कुछ विस्मृत। इन्हीं का विवरण किसी (भूभाग) के निवासियों के साथ उनकी संस्कृति में प्रस्फुटित हो जीवन की सतरंगी छटा बिखेरता है और अपनी पहचान स्थापित करता है।

    गौरव गाथा के क्रम में वर्तमान परिस्थितियों की प्रासंगिकता भी उतनी ही आवश्यक होती है और यह समय प्राकृतिक आपदाओं का, संसाधनों के निर्मम दोहन को उत्पादन घोषित करने वालों और क्षेत्रीय हितों को स्वहितों से घालमेल कर आगे बढ़ने वालों का है। ऐसी परिस्थिति में इस भूमि पर गर्व करने वालों की शालीनता और संतुष्टि में सक्षम और सजग रहने का समावेश अपरिहार्य हो गया है। पंचतंत्र की नीति शिक्षा है- ‘‘अपनी शक्ति को प्रकट न करने से शक्तिशाली मनुष्य भी अपमान सहन करता है, काठ के भीतर सोई आग को लोग आसानी से लांघ जाते हैं किन्तु धधकती ज्वाला को नहीं।’’ और दिनकर की पंक्ति है-
    छीनता हो स्वत्व तेरा और तू, त्याग, तप से काम ले, यह पाप है,
    है उचित विच्छिन्न का देना उसे, बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है।

    गढ़ों का तिलस्म
    छत्तीसगढ़ के नामकरण का आधार तो निस्संदेह रतनपुर राज्य मुख्यालय के अंतर्गत विभक्त प्रशासनिक इकाईयां हैं। देवार गीतों में भी मंडला राज के बावनगढ़, सम्बलपुर राज के अट्ठारहगढ़ और रतनपुर राज के छत्तीसगढ़ गिनाये जाते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ भौतिक स्वरूप वाली परिखा (खाई) और प्राकार (दीवार) युक्त संरचनाओं का अस्तित्व भी इस अंचल में हैं।

    मृत्तिका या धूलि दुर्ग नाम से अभिज्ञात इन गढ़ों में व्यवस्थित वैज्ञानिक उत्खनन अब तक नहीं हुआ है, इसलिए इनका तिलस्म कायम है लेकिन यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि ऐसे गढ़ लगभग 2700 साल तक पुराने और इतिहासपूर्व युग को ऐतिहासिक काल से संबद्ध करने वाली कड़ी साबित हो सकते हैं। विभिन्न आकार प्रकार की इन विशिष्ट संरचनाओं को महाजनपद काल का माना जाता है। मिट्टी के इन गढ़ों की संख्या व वितरण इनके सामरिक प्रयोजन को संदिग्ध बनाता है। जांजगीर जिले में ही ऐसे गढ़ों की संख्या छत्तीस से अधिक है। दो गढ़ों की आपसी दूरी कहीं-कहीं तो सिर्फ तीन किलोमीटर है, जैसे मल्हार और कोनारगढ़। ऐसे उदाहरण पामगढ़-शिवरीनारायण के बीच और जांजगीर-केरा के बीच बहुतायत में है। मिट्टी के इन गढ़ों की विशालता और उसके निर्माण में लगे मानव श्रम का अनुमान चकित कर देने वाला है। मल्हार जैसे कुछ गढ़ों से मिलने वाले प्राचीन अवशेष की विपुलता और विविधता भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। अंचल के ऐसे सभी गढ़ों की प्राचीनता अगर अनुरूप हो तो इनके व्यवस्थित अध्ययन से इतिहास का रोमांचक पृष्ठ खुल सकता है और अपने अनूठेपन के साथ-साथ इतिहास को सार्थक तथ्य उपलब्ध करा सकता है।

    छत्तीसगढ़ी का पहला नमूना
    छत्तीसगढ़ी का पहला नमूना अभिलेख पत्थर पर उत्कीर्ण व सुरक्षित है। यह शिलाखंड दंतेवाड़ा में स्थापित है। लेख में शासक दिकपाल देव का उल्लेख है और तिथि सम्वत् 1760 यानि सन् 1702 है। लेख वस्तुतः साथ लगे संस्कृत शिलालेख का अनुवाद है, लेख का अन्य संबंधित विषय स्वयं स्पष्ट है -

    दंतावला देवी जयति।। देववाणी मह प्रशस्ति लिषाए पाथर है महाराजा दिकपालदेव के कलियुग मह संस्कृत के बचवैआ थोरही हैं ते पांइ दूसर पाथर मह भाषा लिखे है। ..... ते दिकपालदेव विआह कीन्हे वरदी के चंदेल राव रतनराजा के कन्या अजवकुमरि महारानी विषैं अठारहें वर्ष रक्षपाल देव नाम जुवराज पुत्र भए। तव हल्ला ते नवरंगपुरगढ़ टोरि फांरि सकल वंद करि जगन्नाथ वस्तर पठै कै फेरि नवरंगपुर दे कै ओडिया राजा थापेरवजि। पुनि सकल पुरवासि लोग समेत दंतावला के कुटुम जात्रा करे सम्वत् सत्रह सै साठि 1760 चैत्र सुदि 14 आरंभ वैशाष वदि 3 ते संपूर्न भै जात्रा कतेकौ हजार भैसा वोकरा मारे ते कर रकत प्रवाह वह पांच दिन संषिनी नदी लाल कुसुम वर्न भए। ई अर्थ मैथिल भगवान मिश्र राजगुरू पंडित भाषा औ संस्कृत दोउ पाथर मह लिषाए। अस राजा श्री दिकपाल देव देव समान कलि युग न होहै आन राजा।

    सामाजिक समरसता
    जाति चरित्र का सूक्ष्म अध्ययन करने की परम्परा का प्रमाण बिलासा केंवटिन के देवार गीत में मिलता है किन्तु सामाजिक समरसता और जाति सद्भाव-सम्मान की अनूठी परम्परा इस अंचल मेें रही है। बिलासा केंवटिन, राजिम तेलिन, बहादुर कलारिन, किरवई की धोबनिन, गंगा ग्वालिन और मुरहा राउत, परऊ बैगा, बैगा-बैगिन जैसे लोक चरित्रों की प्रतिष्ठा तथा उनके प्रति सम्मान प्रकट कर गौरव बोध होना अंचल की सामाजिक समरसता का द्योतक है। लोक गाथा गायक देवार जाति के इतिहास के अनाम नायकों के शौर्य, महानता और उदारता की गाथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाकर हाशिये के इतिहास की चारण-गाथा को सुरक्षित रखा है।

    गांव के दो समान नाम वाले जाति, वर्ग, धर्म भेद से परे ‘सहिनांव’ मितान बन जाते हैं और ननिहाल आये बच्चों के लिए पूरा गांव मामा-मामी और नाना-नानी बन जाने की सौहार्द्रपूर्ण परम्परा की सम्पन्नता भी इस अंचल में है। खल्लारी में देवपाल नामक मोची ने छः सौ साल पहले मंदिर निर्माण कराया और उसे इस काम में राजा के साथ ब्राह्मण और कायस्थ जातियों का समर्थन और सहयोग मिला था।

    धूमिल भित्तिचित्रों से मुखरित सदियों पुरानी चित्रकला
    रामगढ़, सरगुजा की ख्याति नाट्यशाला और सुतनुका के लिये है किन्तु यहां एक और अनजाना सा दुर्लभ प्रमाण ऐतिहासिक चित्रकला का भी है, जो अजंता और बाघ की विश्वप्रसिद्ध भित्तिचित्रों से भी अधिक पुरानी है। चित्रों की रेखाएं ओर रंग धूमिल हो जाने से उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिली, जिसकी वे हकदार है, किन्तु उनका अस्तित्व आज भी विद्यमान है। छत्तीसगढ़ में कैप्टन टी. ब्लाश ने सन् 1904 में इन चित्रों का अवलोकन कर, इन्हें ‘‘दो हजार साल से भी अधिक पुरानी और संभवतः’’ भारत को प्राचीनतम भित्तिचित्र के प्रमाण माना। प्राचीनता के प्रमाण स्वरूप इनमें चैत्य गवाक्ष आकृतियां, दो पहियों वाली तीन या चार घोड़ों द्वारा खींची जाने वाली गाड़ी और प्राचीन रूपाकार मानव चित्रित हैं। ये चित्र सफेद पृष्ठभूमि पर सिंदूरी जैसे रंग से बनाए गए हैं और मानव, हाथी और वृक्ष के लिए समान रंग प्रयोग में लाया गया है, जबकि रेखांकन काले रंग से किया गया हैं। आंख के स्थान सफेद छोड़े गए हैं जबकि बाल काले रंग से बने हैं और कहीं कहीं बाल को बांई ओर जूड़ा बंधा दिखाया गया है। वस्त्राभरण सफेद रंग के लाल रेखांकन से प्रदर्शित है। विभिन्न दृश्यों से अर्द्धवृत्त में लाल रेखाओं से विभक्त किया गया है। सबसे निचले भाग में पीले और लाल रंग से चित्रित अस्पष्ट दृश्य हैं। रामगढ़ की इस पहाड़ी में पाली में उत्कीर्ण है- सुतनुका व रूपदक्ष की गाथा। विश्व में भारतीय कला को प्रतिष्ठा दिलाने वाले कला मर्मज्ञ आनंद कुमारस्वामी ने इन चित्रों की कलात्मकता और प्राचीनता को स्वीकृति देते हुए इन्हें प्रतिष्ठित किया है।

    जैन, बौद्ध, शैव और वैष्णव धर्मों की भूमि
    लगभग दो हजार साल पहले बूढ़ीखार (मल्हार) में दान स्वरूप निर्मित कराई गई विष्णु की प्रतिमा को भारतीय मूर्तिकला में विष्णु की प्राचीनतम प्रतिमा का गौरव प्राप्त है। चतुर्भुजी विष्णु की मानवाकार प्रतिमा दण्ड, चक्र सहित है। बौद्ध तथा जैन प्रतिमा भी मल्हार तथा सिरपुर से बड़ी संख्या में मिली हैं।

    शैव प्रतिमा का आंचलिक अनूठापन भी निर्विवाद है, चाहे ताला के ‘रूद्र शिव’ की पहचान और नामकरण का मामला विवादग्रस्त हो। पशु-पक्षियों से शारीरिक अंगों का रूपांकन और पूरे शरीर पर मानव मुख अंकित हैं। आठ फुट ऊंची यह प्रतिमा पांच टन से भी अधिक भारी है। इस प्रतिमा की विशिष्टता का साम्य मांढल (महाराष्ट्र) की शिव-प्रतिमाओं, चीन के गुहा शिल्प, नेपाल के तांत्रिक चित्रों और सेल्टिक पेंटिंग्स में तलाशने का प्रयास किया गया, किन्तु इस प्रतिमा के शिल्पशास्त्रीय और धार्मिक परम्परा का रहस्य इसके अनूठेपन को बढ़ाता है। शैव प्रतिमा निर्माण का स्थल सरदा (दुर्ग) भी कम विस्मयकारी नहीं है जहां उमा-महेश और अर्द्धनारीश्वर जैसी प्रतिमाओं में पाशर््िवक-विपर्यय हुआ है। यानि शास्त्रीय विधान में शिव के बाएं और इसी तरह बांया अर्द्धांग नारी का होता है किन्तु यहां इसे उलट कर व्यतिक्रम करते हुए मानों कोई समांतर शास्त्र की रचना हुई थी।

    सुदीर्घ राजनैतिक स्थिरता का दुर्लभ इतिहास
    रतनपुर, आज भी इस अंचल में राज और राजा के लिए सदैव न सिर्फ याद किया गया है, बल्कि राजशक्ति का पर्याय बन गया है क्यों न हो, कलचुरि, हैहय या चेदि वंश के नाम से ज्ञात संबद्ध कालखण्ड किसी एक राजवंश का संभवतः सर्वाधिक दीर्घ अवधि का राज्यकाल रहा है। पुराण-महाकाव्यों का महानायक सहस्रबाहु कार्त्तवीर्यार्जुन हुआ। इतिहास में हैहयवंशी महिष्मती में रहे, इसके बाद उनकी राजधानी त्रिपुरी (जबलपुर-भेड़ाघाट के निकट वर्तमान तेवर ग्राम) बनी। त्रिपुरी के कलचुरियों का प्रभाव कोसल अर्थात वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र में भी रहा और संभवतः इस वंश के राजपुत्र दक्षिण कोसल के सामंत नियुक्त होते रहे। लगभग दसवीं सदी में इस वंश की एक शाखा ने दक्षिण कोसल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर, अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। इनकी राजधानी तुम्माण (कटघोरा के निकट वर्तमान तुमान ग्राम) बनी। तुमान के राजधानी बनने में निश्चय ही इस स्थान की भौगोलिक स्थिति प्रमुख कारण थी। तुमान-खोल के पूरे क्षेत्र में प्रवेश और निकास का एक-एक मार्ग है बाकी पूरा भू-भाग दुुर्गम पहाड़ी से घिरा हुआ है। 

    तुमान में आज भी प्राचीन मंदिर और सतखण्डा क्षेत्र में पुरावशेष उपलब्ध होते हैं। राजधानी समय के साथ परिवर्तित होकर रतनपुर आ गई, लेकिन कलचुरियों की यह शाखा रतनपुर के कलचुरियों के नाम से प्रसिद्ध होकर लगभग साढ़े सात सौ साल अखण्ड राज्य करती रही। बीच-बीच में त्रिपुरी कलचुरियों, चक्रकोट के नागवंशियों, बाणवंशियों, क्षेत्रीय मूल के स्थानीय राजाओं और अंततः मुगलों से संघर्ष और मनमुटाव हुआ, किन्तु यह राजवंश पीढ़ी पर पीढ़ी दान, स्थापत्य-निर्माण आदि की कीर्ति-पताका फहराते रतनपुर राजधानी से सन् 1740 तक राज्य करता रहा। इतनी सुदीर्घ अवधि तक अविच्छिन्न राज्य का इतिहास में यह अत्यंत दुर्लभ उदाहरण है। 

    नागपुर के भोंसला-मराठों के आगमन के पश्चात् भी उन्नीसवीं सदी तक इस वंश की शाखा सहित इसका प्रभाव बना रहा। रतनपुर के कलचुरियों की इस गौरव गाथा के प्रमाण रतनपुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ में पचासों अभिलेखों, हजारों-हजार सिक्कों और मूर्तियों, बहुसंख्यक मंदिर हैं जिसका कोई भी अंश प्रत्यक्ष पाकर उस गरिमामय सुदीर्घ कालखण्ड की झलक अभिभूत कर देने के लिए पर्याप्त साबित होती है।

    छत्तीसगढ़ का ‘पाणिनी’-हीरालाल
    आज हम जिस छत्तीसगढ़ी के लिए भाषा या बोली तथा उसके नियमित-वैज्ञानिक व्याकरण के विवाद में उलझ जाते हैं तब शायद यह तथ्य नजरअंदाज होता है या हम भूल जाते हैं कि पूरी एक सदी से भी अधिक पहले एक व्यक्ति ऐसा भी हुआ, जिसने तर्क-वितर्क या विवाद पैदा करने अथवा कोई नारा गढ़ने के बजाय अपनी प्रतिभा को पूरी लगन और समर्पण से छत्तीसगढ़ का व्याकरण तैयार करते हुए, मानों न सिर्फ छत्तीसगढ़ी का, बल्कि पूरे इस अंचल की जबान का गौरवशाली इतिहास रचा। यह मनीषी था- धमतरी के एंग्लो-वर्नाकुलर स्कूल का हेड मास्टर- हीरालाल काव्योपाध्याय।

    छत्तीसगढ़ी व्याकरण का यह इतिहास एक अन्य ऐतिहासिक तथ्य से जुड़ा हुआ है। लगभग सौ साल पहले जार्ज ए. ग्रियर्सन द्वारा कराया गया भारत का भाषा सर्वेक्षण पूरी दुनिया में किसी भी क्षेत्र में हुए सर्वेक्षणों में भाषा सर्वेक्षण का विशालतम पैमाना था। इस पूरे सर्वेक्षण के दौरान एकमात्र छत्तीसगढ़ी का वैज्ञानिक व्यवस्थित व्याकरण प्राप्त हुआ था और इसका गौरव-मंडन स्वयं ग्रियर्सन ने किया। यह व्याकरण प्राप्त होने पर ग्रियर्सन इतने रोमांचित और उत्साहित हुए कि उन्होंने हीरालाल काव्योपाध्याय के ससम्मान नामोल्लेख सहित इसे सन् 1890 में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल, शोध-पत्रिका के खंड-49, भाग-1 में अनूदित और सम्पादित कर प्रकाशित कराया। छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी व्याकरण की यह परम्परा आगे सतत् विकसित होती रही। सन् 1921 में पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय ने रायबहादुर हीरालाल के निर्देशन में इस व्याकरण को विस्तृत रूप से पुस्तकाकार प्रकाशित कराया। इसी परम्परा में बिलासपुर के डॉ. शंकर शेष और रायपुर के डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा का कार्य भी स्मरणीय हैं।

    धरती में गढ़ा इतिहास का अनमोल खजाना
    धरती में गड़ा धन और खजाने की खोज की चर्चा भी रोमांचकारी होती है। किन्तु पुराने सिक्कों में दर्ज इतिहास का रोमांच भी कम नहीं होता, तभी तो प्रसन्नमात्र के ताम्बे के सिक्के के सामने इसी शासक के सोने के सिक्कों की कीमत दो कौड़ी जैसी हो जाती हैै।

    मल्हार, बालपुर जैसे स्थानों में प्राचीन सिक्कों का ऐसा भूमिगत भंडार भरा है कि मल्हार में ‘संफरिया नांगर’ (जोड़ी में हल) चलाने का रिवाज नहीं है, हल चलाते हुए कभी भी, कुछ भी मिल सकने की उम्मीद जो बनी रहती है, और किंवदन्ती यह भी है कि कोटगढ़ के राजा के आह्वान पर मल्हार में सोने की बरसात हुई थी। बालपुर के लिये कहा जाता है कि वहां भू-गर्भ में पूरी दुनिया को ढाई दिन खिला सकने जितनी सम्पदा गड़ी हुई है। कोटमी-धुरकोट का साधु प्रसिद्ध है जो चिमटे से बिच्छू कमण्डल में डालकर चांदी के सिक्के बना देता था और रमल विचार कर यहां-वहां खुदाई की खबरें मिलती रहती हैं।

    छत्तीसगढ़ व सीमावर्ती क्षेत्र से मिलने वाले ठप्पांकित या उभारकर सिक्के, एक तरह से अंचल की पहचान हैं क्योंकि एसे सिक्के सिर्फ इस अंचल से उपलब्ध हुए हैं, जो पूरी दुनिया के मुद्राशास्त्रीय इतिहास में अनूठे हैं। ये उभारदार सिक्के लगभग छठी सदी ई. के हैं। इन सिक्कों की प्राप्ति रायपुर जिला में खैरताल, पितईवंद, रीवां, महासमुुंद, सिरपुर से, बस्तर के एड़ेंगा से, दुर्ग के कुलिया से, रायगढ़ के साल्हेपाली से बिलासपुर के मल्हार, ताला, नन्दौर और तलवा से हुई है। संलग्न राज्य सीमाओं पर उड़ीसा के बहरमपुर, नहना, मारागुड़ा, मदनपुर-रामपुर, महाराष्ट्र के भण्डारा, बिहार के शाहाबाद व अन्य फुटकर स्थानों से मिलने के साथ-साथ उत्तरप्रदेश व पश्चिम बंगाल के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। इन सिक्कों में 215-महेन्द्रादित्य, 127-प्रसन्नमात्र, 4-क्रमादित्य, 29-वराहराज, 3-भवदत्त, 1-नंदनराज, 1-स्तंभ तथा 4 सिक्के संभवतः कुषाण तथा गुप्त शासकों से संबंधित हैं। इनमें संख्या की दृष्टि से बिलासपुर जिले के बाराद्वार के निकट तलवा से प्राप्त 81 स्वर्ण सिक्के से भी अधिक की प्राप्ति, ऐसे सिक्कों की विशालतम निधि है और मल्हार के ताम्बे का तथा ताला के चांदी का सिक्का अपने प्रकार के अकेले उदाहरण हैं।

    अंचल से प्राप्त होने वाले सिक्कों के कुछ अन्य प्रमुख स्थान रायपुर में तारापुर, आरंग, खैरताल, दलाल सिवनी, रायगढ़ में बार और पाराडीह, दुर्ग में सिरसा, खैरागढ़ और रायगढ़ रियासतों में तथा बिलासपुर के अकलतरा, केरा, बछौद, चकरबेड़ा, केन्दा, पेण्डरवा, झझपुरी, भगोद, धनपुर आदि हैं। इनमें बिलासपुर जिले के सोनसरी से प्राप्त 600 सोने के सिक्के विशेष उल्लेखनीय हैं। छत्तीसगढ़ की इस विशिष्ट मुद्रा निर्माण तकनीक के ठप्पांकित सिक्के अन्यत्र दुर्लभ, मौलिक और असमान्तर कृतियां हैं। 

    अक्षरों की कहानी, लिपि का रहस्य
    छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास में अक्षरों की अपनी कहानी है। उत्कीर्ण लिपियों का अपना रहस्य है, जो पूरी दुनिया को आकर्षित कर अंचल को गौरवशाली प्रतिष्ठा देता है। रामगढ़, गुंजी, किरारी और सीमावर्ती विक्रमखोल इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। 

    प्राचीनतम रंगशाला, रामगढ़, जिला-सरगुजा के नाट्यमण्डप होने से दो राय हो सकती है, किन्तु सुतनुका देवदासी और देवदीन मूर्तिकार का अभिलिखित प्रणय-प्रसंग दो हजार से भी अधिक साल की प्राचीनता सहित आरंभिक उत्कीर्ण राग लेख है, संक्षिप्त किन्तु सम्प्रेषण-समर्थ -

    सतुनुका। देवदाशिय। सुतनुका नाम देवदाशी।
    तं कामयिथ बालुणसुएये देवदीन नाम लूपदखे।

    लगभग दो हजार साल पहले इस अंचल में लकड़ी पर लिपि उत्कीर्ण करने का भी प्रयोग हुआ, जो पूरी दुनिया में अपनी तरह का अनूठा नमूना है। किरारी (चन्द्रपुर) से प्राप्त अभिलिखित काष्ठ स्तंभलेख का अब अंश ही सुरक्षित बच सका है, किन्तु हीराबंध तालाब से निकले इस लकड़ी के खंभे का महत्व समझकर स्थानीय ग्रामवासी पंडित लक्ष्मीधर उपाध्याय ने इसकी नकल उतार ली थी और उसे जांचकर तत्कालीन पुरालिपि विशेषज्ञों ने प्रामाणिक मानकर उसी के आधार पर लेख का अध्ययन किया, जिसमें तत्कालीन राज पदाधिकारियों का उल्लेख है।

    सक्ती के निकट दमऊदहरा अथवा गंुजी लगभग दो हजार साल पहले ऋषभतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध था। दक्षिण कोसल के इस तीर्थ का नामोल्लेख महाभारत में भी हुआ है। यहां राजा, अमात्य, दण्डनायक और बलाधिकृत ने दो बार एक-एक हजार गायों का दान किया। अन्य अमात्य और दण्डनायक ने भी एक हजार गौओं का दान दिया। यह अभिलिखित प्रमाण भी अपनी प्राचीनता के कारण दुर्लभ जानकारी और क्षेत्र की सम्पन्न परम्परा को द्योतक हैै।

    आंचलिक सीमा से संलग्न विक्रमखोल का चट्टान लेख हड़प्पाकालीन संकेतों और ब्राह्मी लिपि के बीच की कड़ी माने जाने के कारण अत्यधिक महत्वपूर्ण और अनूठा प्रमाण है। 

    मल्हार की कालधारा में पुरावशेषों की विविधता
    सभ्यताओं के बनते-बिगड़ते इतिहास और वैभवशाली विशाल अट्टालिकाओें-प्रासादों का खंडहर में तब्दील होना मानों स्वाभाविक नियति-चक्र है, किन्तु हड़प्पायुगीन सभ्यता के नगर हों या मजमूली नक्शों में अंकित वीरान गांव, यह जिज्ञासा अवश्य जगाते हैं, कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि समय के साथ मिट्टी को परतों में दबकर कोई स्थान इतिहास का पन्ना बनकर रह गया। विस्मयकारी यह भी है कि कोई सात-आठ किलोमीटर की परिधि कालक्रम और अवशेषों की विविधता से इतनी सम्पन्न हो, जैसा मल्हार। विशाल और विख्यात कोई भी पुरातात्विक स्थल विविधता की दृष्टि से मल्हार के सीमित किन्तु सघन क्षेत्र के सामने बौना लगने लगता है।

    मल्हार और निकटवर्ती ग्रामों जैतपुर, बूढ़ीखार, नेवारी, बेटरी, जुनवानी आदि से अब तक प्रकाश में आये पुरावशेषों को देखकर लगता है कि धरती का यह छोटा सा हिस्सा सदैव प्रबल आकर्षण का केन्द्र रहा और सभ्यता-संस्कृति के सभी कर्ताओं को अपने अंक में पाला-पोसा है। मल्हार में प्राचीनता के प्रमाणस्वरूप सागर विश्वविद्यालय द्वारा कराये गये उत्खनन से लगभग अट्ठाइस सौ साल पुरानी बसाहट के चिन्ह प्राप्त हुए हैं। महामाया खोदा गया तो पातालेश्वर मंदिर निकट आया और भीमा-कीचक टीला खुदा तो देउर मंदिर निकल आया। किसानों को तो विशेषकर भसर्री क्षेत्र में कुआं खोदते हुए पुराना रेडीमेड पक्का कुआं मिल जाता है, तो कहीं नींव खोदते हुए पत्थर की बनी बनाई प्राचीन नींव। हल चलाते हुए धातु, पत्थर, मिट्टी, इंट का कोई पुरावशेष मिल जाता है तो बरसात में पानी के कटाव से सिक्के निकल आते हैं। यानि पूरा सिलसिला है पत्थर, तांबे, मिट्टी पर उकेरे-उभरे हजारों शब्दों का भण्डार- शिलालेख, ताम्रपत्र, मूर्तिलेख, राजमुद्रा और मुद्रांक, इसके आगे पत्थर और मिट्टी पर गढ़ी गई मूर्तियां हैं। मंदिर और स्थापत्य के अनेकानेक नमूने हैं। 

    पत्थर और मिट्टी की गुरिया, मनके, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, सोने, चांदी, तांबा, सीसा और पोटीन के सिक्कों का तो अकूत भंडार है यहां। यह भी कम आश्यर्चजनक नहीं कि काल की दृष्टि से इन सामग्रियों का क्रम अनवरत है। मल्हार के जिक्र में वहां से शंख के जीवाश्म की प्राप्ति इस स्थल की पहेली को अधिक अबूझ बना देती है तो भूगर्भ में विद्यमान संभावनाएं इस समृद्धि का अनुमान लगाने में भी मानव-मस्तिष्क को अचंभित कर जड़ कर देती हैं।

    ईंटों पर रचा तकनीक का काव्य
    भारतीय स्थापत्य कला के इतिहास में राजिम, ताला और जांजगीर के पाषाण-निर्मित मंदिरों का अपना-अपना विशिष्ट स्थान है। राजिम में राजीव लोचन मंदिर का शिखर शैलीगत आरंभिक स्थिति का प्रमाण है तो ताला के जिठानी और देवरानी मंदिर की निर्माण योजना अत्यंत विशिष्ट संरचना है। आरंभिक काल के इस उदाहरणों के पश्चात लगभग 12 वीं सदी का जांजगीर का भीमा मंदिर या विष्णु मंदिर स्थापत्य विकास का चरमोत्कर्ष है जहां जंघा के साथ-साथ जगती पर भी आदमकद प्रतिमाएं जड़ी हैं। लेकिन इस अंचल ने तारकानुकृति मंदिरों की योजना को ईंट माध्यम का प्रयोग कर साकार किया है तथा स्थापत्य इतिहास में जो प्रतिमान रचे हैं उनका कोई साम्य नहीं मिलता।

    खरौद का शबरी और इन्दल देउल, सिरपुर का लक्ष्मण और राम मंदिर, पलारी का सिद्धेश्वर मंदिर, धोबनी का चितावरी मंदिर, पुजारीपाली के केंवटिन और गोपाल मंदिर, यह पूरी श्रृंखला ईंटों पर बारीक नक्काशी और साफ जुड़ाई अनूठी है। अष्टकोणीय भू-योजना का अड़भार मंदिर और ताराकार ईंटों के उल्लिखित मंदिरों सहित भोरमदेव का भग्न मंदिर और शिवरीनारायण के केशवनारायण मंदिर की कोणिक रचना-पद्धति को कोसली नामकरण सहित शास्त्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।

    इन मंदिरों की निर्माण प्रक्रिया के लिए अनुमान है कि बिना पकी उकेरी गई ईंटों को पतली छनी गीली मिट्टी को जुड़ाई के लिए इस्तेमाल कर पूरी संरचना तैयार कर ली जाती थी और इसके बाद पूरी रचना भट्ठी लगाकर उसे पकाया जाता था। यह अनूठी स्थापत्य योजना व अभिकल्प और प्रयोग हमारी वैचारिक तकनीकी सम्पन्नता का प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए सक्षम उदाहरण है।

    देश में राजस्व व्यवस्थापन की छत्तीसगढ़ी गुरूआत
    देश के इतिहास में राजस्व भू-व्यवस्थापन के साथ सदैव अकबर और उनके नवरत्नों में से एक राजा- टोडरमल को याद किया जाता है, किन्तु हम स्वयं भी अक्सर अपने क्षेत्रीय गौरव कलचुरि शासक कल्याण साय की जमाबंदी को भूल जाते हैं। कल्याण साय (सन् 1550) के जमाबंदी की पृष्ठभूमि निश्चय ही अकबर से पहले की है।

    इस जमाबंदी में दर्ज ऐतिहासिक राजस्व व अन्य राजकीय सूचनाओं का महत्व अंग्र्रेज अधिकारियों ने पहचाना। सन् 1861-68 के दौरान (पहला) सेटिलमेंट करते हुए मि. चीजम ने इसी जमाबंदी को अपने कार्य का आधार बनाया और फिर सन् 1909-10 में बिलासपुर जिला गजेटियर तैयार करने के सिलसिले में मि. नेल्सन द्वारा इसकी खोज की गई, यह मूल अभिलेख न मिल पाने के फलस्वरूप ढेरों जानकारियां जो मि. चीजम ने उद्धृत की थीं, ज्यों की त्यों इस्तेमाल कर गजेटियर पूरा किया जा सका। कल्याण साय की जमाबंदी तत्कालीन, अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण जानकारियों का दस्तावेज है, जिसके अनुसार रतनपुर राज के गढ़ों यानि सिर्फ खालसा क्षेत्र से साढ़े छह लाख रूपये का राजस्व वसूल होता था, तब के रूपये का मूल्य अनुमान कर तत्कालीन सम्पन्नता समझी जा सकती है। कल्याण साय की सेना में बंदूकधारियों (मैचलाक) सहित 14,200 सैनिक थे और 116 हाथियों की फौज अलग थी। 

    कल्याण साय की जमाबंदी से तत्कालीन इतिहास की जो तस्वीर उभरती है, उससे इस क्षेत्र के नामकरण के पीछे छत्तीस प्रशासनिक इकाईयां गढ़ ही आधार बनीं, इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता। इस दृष्टि से यह अभिलेख और भी प्रासंगिक हो जाता है। तत्कालीन गढ़ चौरासी गांवों का परम्परागत समूह होता था और इसके प्रभारी दीवान कहलाते थे। आगे विभाजन बियालिस, चौबीसा, बरहों में होता था और इन समूहों में ग्रामों की संख्या सदैव नियमित होना आवश्यक नहीं था लेकिन अंतिम इकाई गांव ही होती थी। जमाबंदी में अड़तालिस गढ़ नामों को अलग-अलग संख्या में समूह-वर्गीकरण कर इस संख्या को छत्तीस बनाया गया है, जिसमें वर्तमान जमींदारियां भी शामिल है। इन्हीं गढ़ों की व्यवस्था तीन परगनों में बदल गई। इन परगनों बिलासपुर (रतनपुर), मुंगेली (नवागढ़) व शिवरीनारायण (खरौद) के अंतर्गत ग्रामों की संख्या क्रमशः 241, 482 व 145 थी। कलचुरियों के सुदीर्घ और निर्विघ्न राज्य का प्रमुख आधार संभवतः उनका यहां व्यवस्थित और सुसंगठित राजस्व-व्यवस्थापन था, जो छत्तीसगढ़ के नामकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण और इतिहास में प्राचीनता की दृष्टि से अनूठा हैै।

    आंकस ग्राम देवताओं की भूमि
    आधी रात के बाद गांव की गली में टपा-टप घोड़े की टाप सुनाई पड़ती है। सात हाथ का झक्क सफेद घोड़ा और सवार भी सफेद धोती-कुरता पहने, सफेद ही पागा बांधे चला जा रहा है। इसे किसी ने आज तक सामने से नहीं देखा और देखा तो बचा नहीं। बड़े बुजुर्ग बताते हैं देव है, गांव का मालिक देवता, ठाकुर देव, बड़ा देव। गांव की निगरानी में निकलता है। सीवाने के देवता अंधियारी पाठ को ताकीद करने। 

    ठाकुरदेव सहित अन्य सभी देवता आज भी उतने की जागृत हैं, जितनी हमारी मौलिक सांस्कृतिक चेतना। छत्तीसगढ़ में ग्राम देवताओं का मण्डल व्यापक और सुरक्षित है। ग्राम देवताओं की पूजा-उपासना पद्धति व संबंधित भाषा विशिष्टता में यहां की वर्तमान समेकित संस्कृति के मूल घटकों-उपादानों की पहचान हो सकती है। ठाकुरदेव और बड़ादेव जैसा ही महत्वपूर्ण देवता बूढ़ादेव है। बूढ़ादेव के साथ बढ़ावन की मान्यता होती है, जो पत्थर की गोल गोटियां हैं। वार्षिक उत्सव बार के अवसर पर बढ़ावन की पूजा होती है। पर्यावरण-सजग कोल समुदाय के वन्य ग्रामों में ग्राम से संलग्न वन खंड, अधिकतर शाल वृक्ष समूह में ‘सरना’ स्थापित-मान्य होता है। इसे अत्यंत पवित्र और जागृत क्षेत्र माना जाता है। ग्राम व क्षेत्र की मनोरंजन-गोष्ठियां और सामान्य बैठक से लेकर पंचायत-फैसले, देव-साक्ष्य में सरना में होते हैं, साथ ही सरना राहगीरों को रात्रि विश्राम के लिए शरण भी देता है।

    उजाड़ वीराना, टीलों में डीह, डिहवार या डिहारिन दाई की मान्यता होती है। मातृ शक्तियों के रूप माताचौंरा या महामाया सामान्य रूप से लगभग प्रत्येक गांव में विद्यमान हैं। मातृकाओं में सतबहिनिया और अक्कइसो बहिनी भी पूजी जाती हैं। कुछ क्षेत्रों में सतबहिनियां का नाम जयलाला, बिलासिनी, कनकुद केवदी, जसोदा, कजियाम, वासूली और चण्डी मिलता है, जबकि छत्तीसगढ़ अंचल में सतबहिनिया को चेचक या सात माता, बूढ़ी मां, मटारा, लोहाझार, कथरिया, सिंदुरिया, कोदइया और आलस के नाम से भी पूजा जाता है। अन्य प्रचलित देवियां- कमलई, समलई, महलई, खमदेई, कोसगई, केन्दई, विशेसरी, सत्ती, चण्डी, मावली, कालिका, कंकालिन, परेतिन दाई, रात माई, आदि हैं, जो ग्राम के मध्य, थाना-गुड़ी या सीवाने पर हो सकती हैं।

    ग्राम देवताओं के पुजारी बैगा, गुनिया, देवार, सिरहा आदि नाम से जाने जाते हैं, इनमें ठाकुर देव और बाहुकों जराही-बराही के साथ परउ बैगा की मान्यता होती है कुछ क्षेत्रों में बैगा के सहायक होमदेवा भी होते हैं, जो केवल होम दे सकते हैं। देव-आह्वान का अधिकार मात्र बैगा का होता है। परऊ बैगा जैसी ही प्रतिष्ठा दइगन गुरू, राउतराय, बिरतियाबावा, लाल साहब, संवरादेव, सौंराइनदाई की है जबकि गोंड जनजाति में परगनिहा और कुमर्रा देव प्रचलित हैं। अन्य बैगा देवता, सुनहर, बिसाल, बोधी, राजाराम, तिजऊ, लतेल, ठंडा आदि हैं। इसी प्रकार की प्रतिष्ठा मुनिबाबा, पांडेदेव, धुरूआदेव की भी होती है।

    बाबा देवताओं में सिद्ध या सीतबावा, बरम, भैरो, मुड़िया, अघोरी, कलुआबावा आदि हैं। पाट या पाठ देव अधिकतर वृक्ष देवता हैं, जिनमें कुर्रु, बासिन, डूंगर, कोटरा, सिंहासन, भंवर, अंधियारी, अंजोरी, बघर्रा, डोंगा, बइहार, नगनच्चा आदि पाठ हैं। कुकुरदेव को बंजारों का देवता और बंजारी देवी को वन देवी माना गया है। ग्राम के प्रभारी प्रतीक दाऊ साहब और रियासत जमीदारियों की दन्तेश्वरी, सरंगढ़िन, कुदरगढ़िन, चांगदेवी आदि हैं। मार्ग सूचना या यात्रा संकल्प के देव ओंगनापाठ, चिथरीदाई, चिरकुटी, ढेलादेव आदि हैं। अन्य कुछ देवताओं में हरदेलाल, घोड़ाधार, सांढ-सांढ़िन, साहड़ादेव, नागदेव, चिरकुटी, खूंटदेव, मेंड़ोदेव, खरकखाम्ह, अखराडांड, गौरइया, धूमनाथ, चितावारी, ठेंगहादेव से डॉक्टरदेव तक विस्तृत सूची है। छत्तीसगढ़ के लोक संसार का इन देवताओं के प्रति आत्मीय साहचर्य तब प्रकट होता है, जब देवताओं से कथित भयभीत होकर उन्हें सम्मान देने वाला जनमानस वर्षा के लिए देवता को गोबर या मिट्टी लीप-पोत कर या धूप में बाहर निकालकर सजा भी देता है। छत्तीसगढ़ की जनजातीय और मौलिक संस्कृति की सच्ची पहचान के लिए ग्राम देवताओं के विस्तृत और गहन सर्वेक्षण शोध आवश्यक है, क्यांेकि इसी बिन्दु को पहचान कर हम सृष्टि में अपनी सहोदरा प्रकृति और अंग्रेजों से स्वयं तक की सांस्कृतिक अनेकता में एकता के सूत्र पा सकते हैं।

    पर्यावरणीय चेतना के बीज
    कहा जाता है कि सभ्यता का आरंभ उस दिन हुआ होगा, जिस दिन पहला पेड़ कटा और पर्यावरण का संकट तब पैदा हुआ, जब आरे का इस्तेमाल शुरू हुआ। तात्पर्य यह कि पर्यावरण का असंतुलन, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से नहीं बल्कि दोहन के कारण होता है। इस दृष्टि से मिथकीय दन्तकथाओं का हमारा सार्थक और सम्पन्न संसार है। कृष्ण-मोरध्वज का प्रसंग और आरे की कथा भूमि में आरे का प्रयोग निषिद्ध मानकर, इस अंचल ने अपनी पर्यावरणीय चेतना और दूरदर्शिता का परिचय दिया।

    कथा संक्षेप में यह है कि राजा मोरध्वज द्वारा कृष्ण को दिये गए वचन के पालन में, उसने अपना आधा शरीर आरे से चिराकर दान देना चाहा, इसके लिए आरे को एक ओर रानी कुमुद देवी ने और दूसरी ओर पुत्र ताम्रध्वज ने संभालकर आरा चलाना शुरू किया। कृष्ण ने देखा कि राजा मोरध्वज की बांयी आंख से आंसू बह रहा है। इस पर कृष्ण ने दान ग्रहण करने से मनाही की, किन्तु राजा ने इसका कारण बताया कि बांये अंग को इस बात का दुख हो रहा है कि केवल दायां अंक ही समर्पित हो पा रहा है, बांये अंग का कोई उपयोग नहीं हो रहा है। मोरध्वज को हैहय-कलचुरि राजाओं का पूर्वज माना जाता है और यह भी कहा जाता है कि रतनपुर कलचुरि शासकों की नाक के ऊपर से कपाल के पिछलेे भाग तक आरे से चिरा जैसा चिन्ह हुआ करता था। 

    स्थान नाम आरंग की व्युत्पति को भी आरे और इस कथा से संबद्ध किया जाता है और परम्परा में अब तक बस्तर के प्रसिद्ध दशहरे के लिए रथ के निर्माण में केवल बसूले का प्रयोग किया जाता है। मि. चीजम ने उल्लेख किया है कि इस अंचल में आरे का प्रचलन मराठा शासक बिंबाजी भोंसले के काल से हुआ और तब तक की पुरानी इमारतों में लकड़ी की धरन, बसूले से चौपहल कर इस्तेमाल हुई है। अंचल में आरे के प्रयोग को निकट अतीत में भी अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था और आरा चलाने वाले ‘अरकंसहा’ को महत्व देने के बाद भी उनके पेशे को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा गया है।

    परम्परा का इतिहास और इतिहास की परम्परा
    कहा जाता है कि कहानी से बड़ा सच और इतिहास से बड़ा झूठ कुछ नहीं होता। कहावत है, तो सच्चाई भी होगी और सच न हो तो कोई ईमानदार दृष्टिकोण तो जरूर होगा। इस सिलसिले में जब विदेशी आलोचना करते हैं कि हमें इतिहास-बोध नहीं हैं, हम इतिहास के बदले पुराण और किस्से-कहानी सुनाने लगते हैं, तो इस विसंगति की ओर ध्यान जरूर जाता है कि यह आलोचना उन्हीं की ओर से आ सकती है, जिनका न कोई इतिहास है न कोई पुराण। अपनी अविच्छिन्न परम्परा से हम सनातन हैं और इतना सुदीर्घ इतिहास अगर निरन्तर विकाशील है तो वह परम्परा में ही बदल सकता है, वस्तुतः इतिहास और परम्परा किसी तथ्य अथवा घटना के दो लगभग विपरीत किन्तु दोनों सार्थक दृष्टिकोण हैं, परम्परा से जुड़ा व्यक्ति विषयगत हो जाता है तो बाहरी इसे प्रति अपनी नामसझी से इसे कपोल-कल्पना साबित करने में जुट जाता है।

    दरअसल पारम्परिक मान्यताएं ही सांस्कृतिक सूत्र के झीने ताने-बाने हैं जो समष्टि सोच की मजबूत पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। छत्तीसगढ़ में घुग्घुस राजा, दामा धुरुआ, लोहार रानी, कुम्हार राजा, भोंसला राज केवल कल्पना नहीं सार्थक शब्द हैं। छमासी रात का मंदिर, सतजुगी मंदिर, रतनपुर राज का मंदिर, काल निर्धारण की हमारी निजी शैली है। नये मिट्टी के ठीकरों से पण्डवन चुकिया की अलग पहचान के लिये सदैव पुराविद होना आवश्यक नहीं होता। बरात का पत्थर में तब्दील हो जाना और बरतिया भांठा के अपने अर्थ हैं। देवरहा, जोगीडीपा, पुतरा-पुतरी, खइया और गंगार में गहरे संकेत हैं। माची पखना, झांपी पखना और छंकना पथरा में भिन्नता है। जिठानी-देवरानी, ममा-भांचा, भीमा-कीचक सिर्फ रिश्ते और नाम नहीं इसके आगे के भेद का पता देते हैं। 

    सोने की बरसात, डीह, डोंगा, कुकुरदेव और नायक बंजारा, मंदिर का कलश चढ़ने के पहले सूर्योदय या भाई-बहन का साथ-साथ मंदिर न जाना, गुड़ी, ठाकुरदेव, महामाया या माताचौंरा, छः आगर छः कोरी तलाब, अड़बंधा तलाब और सतखंडा तलाब या महल, अड़भार (अष्टद्वार) और बारादुआर (द्वादशद्वार) ऐसे न जाने कितने शब्द है, जिससे हम अपनी संस्कृति से अपनी आत्मीय समझ के साथ संबद्ध हैं। यह कहा जा सकता है कि जिसे ये शब्द आत्मीय लगें वही दरअसल छत्तीसगढ़िया है और जिसे भदेस या बेगाने लगे वह अपनी पहचान स्वयं तय करे।

    छत्तीसगढ़ इसी प्रकार के शब्द और परम्परा-मान्यताओं से सम्पन्न है, जिसके माध्यम से लोक समझ का संसार स्पंदित रहता है। एक दृष्टिकोण यदि किसी ऐतिहासिक स्थल या सामग्री को खंडित, भग्न या खंडहर मान लेता है तो इस अंचल की जन-चेतना में जीवन शैली बनकर अंगीकार हो गया है। शुष्क इतिहास को जीवन परम्परा बनाकर युगों-युगों की सांस्कृतिक उपलब्धियों की संघटित धारणा से सम्पन्न और शास्त्रीय प्रतिमानों में मौलिक संवेदना से प्रवहमान गति संचार हमारी विशिष्टता है।

    खरौद के मंदिर में अद्वितीय गंगा-यमुना
    भारतीय संस्कृति में मंदिर, मात्र धार्मिक श्रद्धा के केन्द्र नहीं बल्कि सुदीर्घ और सम्पन्न अवधारणा का मूर्तन हैं, इसलिए प्रतिमा रहित, अधूरे छूटे या भग्न खण्डहर भी आकर्षण के केन्द्र और दर्शनीय होते हैं, बल्कि शायद पूजित मंदिरों की गहमा-गहमी के माहौल में जो चीजें छूटती हैं, वे खण्डहरों के गहरे सन्नाटे में उपलब्ध हो जाती हैं।

    मंदिर स्थापत्य के स्पष्ट उदाहरण लगभग चौथी सदी से मिलने लगते हैं। आंरभिक मंदिरों में एक कक्ष ईश्वर के लिए होता है, जो प्रवेश द्वार से स्तंभ आश्रित खुले मंडप से संलग्न होता है। इन मंदिरों का ऊपरी भाग यानि छत सपाट है। शिखर का विकास उत्तरोत्तर हुआ है। मंदिर स्थापत्य में विकास के साथ उसकी रचना और अवधारणाएं दोनों, परिवर्धित होकर संश्लिष्ट होती गई और सबसे महत्वपूर्ण भाग बना गर्भगृह का प्रवेश द्वार, जिसमें से गुजर कर व्यक्ति, भक्त समूह से पृथक होकर, गर्भगृह में एकाकी प्रवेश करता है और मानों पुनर्जन्म प्राप्त कर लौटता है, इस बिन्दु पर भक्त और भगवान के बीच का अन्तर नाममात्र रह जाता है।

    यह प्रसंग छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में खरौद के तीन मंदिरों- इंदल देउल, लक्ष्मणेश्वर और सौंराई मंदिर से जुड़ा हुआ है। मंदिरों के प्रवेश द्वार पर गज-लक्ष्मी, ब्रह्मा-विष्णु-महेश, गणेश, सप्तमातृका नवग्रह, द्वादश-आदित्य आदि का अंकन धरन की क्षैतिज शिला यानि सरदल पर हुआ करता है तथा दोनों उर्द्ध बाजुओं अर्थात् द्वारशाखा पर नदी देवी गंगा-यमुना सहित द्वारपाल, ऊपर विभिन्न शाखाओं, यथा- रूपशाखा, मिथुनशाखा, पत्रशाखा आदि, विभाजन होता है। फर्श पर उदुम्बर-शिला में कल्पवृक्ष या लक्ष्मी अंकित होती हैं। इन अंकनों का अभिप्राय यह है कि भक्त कल्पवृक्ष से ऊपर उठकर, प्रतिहारियों द्वारा अशुभ शक्तियों के निवारण से गर्भगृह प्रवेश की इच्छा करता है वैसे ही गंगा-यमुना (अर्थात पवित्र संगम-जल) उसका अभिषेक करती हैं और ग्रह, नक्षत्र, देव-राशि उसके पक्ष में हो जाते हैं। 

    मंदिरों के प्रवेश द्वार पर नदी-देवियों का अंकन गुप्त काल से आरंभ हो गया था किन्तु इस शास्त्रीय परम्पराओं में जो आंचलिक प्रयोग खरौद में हुआ है, वह पूरी भारतीय कला में दुर्लभ है। सौंराई मंदिर की द्वारशाखा के निचले लगभग तिहाई भाग मंे गंगा-यमुना हैं तो लक्ष्मणेश्वर में परम्परागत अगल-बगल के बजाय, आधे ऊपरी द्वार शाखा में नदी देवियां और निचले आधे भाग में द्वारपाल हैं और सर्वाधिक विलक्षण और दुर्लभतम उदाहरण इंदल देउल में है, जहां पूरी द्वारशाखा की लम्बाई-चौड़ाई गंगा और यमुना की मानवाकार प्रतिमाओं से पूरित है, यह भारतीय स्थापत्य का अपनी तरह का एकमात्र उदाहरण है।

    ताला के मंदिर
    मंदिर वास्तु की संरचना भारतीय मनीषा का ठोस और जीवन्त प्रतीक हैं। भारतीय मंदिर वास्तु का नियमित इतिहास गुप्तों के स्वर्ण युग के आरंभ होता है, उदयगिरी (विदिशा) और सांची के मंदिर के बाद क्रमिक विकास का उत्स उत्तर भारत के खजुराहो, उड़ीसा के भुवनेश्वर और दक्षिण भारत के मदुरै जैसे कला केन्द्रों में परिलक्षित होता है। हालांकि छत्तीसगढ़ क्षेत्र में आरंभिक मंदिरों का स्वरूप प्राप्त नहीं हुआ है, किन्तु प्रसिद्ध पुरातात्विक केन्द्र ताला के प्रकाश में आने के बाद स्थापत्य के क्रमिक विकास की अनहोनी और शास्त्रीय सीमा के अन्तर्गत ऐसा व्यतिक्रम उद्घाटित हुआ कि यह पूरे विश्व के प्राच्य-विद्या विशारदों को अंचभे में डाल दिया।

    शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम के निकट मनियारी बसंती संगम पर छठी सदी ई. के दो स्मारक टीले जिठानी-देवरानी, सिद्ध-बाबा और देउर नाम से जाना गया, यह अमेरीकांपा ग्राम सीमा में तालाखार में स्थित है। इस स्थल का पहला ज्ञात उल्लेख 1873-74 में मि. बेगलर ने किया। छठें दशक में पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने इन खण्डहरों को निजी-नोट््स में दर्ज किया। सातवें दशक में डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने इनकी जानकारी सार्वजनिक की। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर 1980 में अमरीकी शोधार्थी डोनाल्ड स्टेडनर ने ताला के देवरानी मंदिर का छायाचित्रों और रेखाचित्र सहित प्रकाशित कराया और इसके पश्चात प्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग की उपलब्धियां हुई।

    ताला के जेठानी मंदिर का स्थापत्य नासिक, भाजा, कार्ले के चैत्य वास्तु की झलक युक्त है। विलक्षण दक्षिणामुख इस मंदिर में पूर्व व पश्चिम से भी प्रवेश की व्यवस्था है। मंदिर में विशाल आकार के पाषाण स्थापत्य खंडों पर विविध आकृति भाव व अलंकरणयुक्त गुणों का अंकन अनूठा है। देवरानी मंदिर पूर्वाभिमुख गर्भगृह अंतराल और मुखमंडप वाली संरचना है। प्रवेश द्वार की बारीक और सूक्ष्य नक्काशी जाली का काम अत्याकर्षक है तथा द्वारशाखा पार्श्वों में कीर्तिमुखों के रौद्र भाव के लिये कोमल पुष्प-पत्रों का अभिकल्प प्रयुक्त हुआ है। रूद्र शिव की प्रतिमा आकार के साथ, विभिन्न मानवमुखों युक्त तथा जीव-जंतुओं को मुख व अंगों में प्रदर्शित किया गया है।

    ताला से प्राप्त छठी सदी ई. के शरभपुरीय शासक प्रसन्नमात्र का सिक्का निश्चित तौर पर ज्ञात इस शासक का एकमात्र रजत सिक्का है। ताला प्रतिमाशास्त्र में भी गहन शोध अध्ययन की आवश्यकता है, तभी भारतीय वास्तु व कला इतिहास के इस विशिष्ट अध्याय से देश व अंचल के इतिहास का गौरव प्रतिपादन हो सकेगा।

    सूर्य पुत्र रेवन्त के मंदिर की मिसाल, बेमिसाल 
    प्रकृति-पूजा की परम्परा, हमारे देश में आदिकाल से रही है और उसमें सूर्य की प्रखरता ने पूरे विश्व की धार्मिक भावना को चकाचौंध कर उभारा है। वेदों में सूर्य का स्थान इंद्र और वरूण के साथ तीन प्रमुख देवताओं में है।

    मंदिर स्थापत्य में सूर्य के अत्यंत प्रसिद्ध मंदिर अल्प संख्या में किन्तु विभिन्न क्षेत्रों में विद्यमान हैं। उड़ीसा का कोणार्क सूर्य मंदिर, राजस्थान के बरमान और ओसियां के मंदिर, गुजरात में प्रभासपाटन के निकट तथा मोढेरा का मंदिर, कश्मीर का मार्तण्ड मंदिर और दक्षिण भारत के त्रिकूट मंदिर सूर्य के प्रसिद्ध मंदिर हैं। बिहार में देव का मंदिर भी विख्यात है तथा वहां सूर्य-षष्ठी पर सूर्य की पूजा लोक जनजीवन में रचा बसा है। मध्यप्रदेश में मंदिरों की नगरी खजुराहो में चित्रगुप्त मंदिर, वस्तुतः सूर्य मंदिर ही है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र में भी सरगुजा जिले के डीपाडीह और रायपुर जिले के नारायणपुर में सूर्य-आदित्य के मंदिर विद्यमान हैं तथा बिलासपुर जिले के मल्हार से प्राप्त एक आकर की विविध सूर्य प्रतिमाएं, वहां द्वादश आदित्य मंदिर की प्रबल संभावना प्रकट करती है।

    इस परिप्रेक्ष्य में अकलतरा के शिलालेख में एक अत्यंत दुर्लभ उल्लेख प्राप्त होता है, जो पूरे भारतीय स्थापत्य में बेमिसाल है वह है रेवन्त का मंदिर। रेवन्त के एकमात्र मंदिर के निर्माण का विवरण इस शिलालेख में मिलता है, जिसमें रेवन्त को सप्ताश्र्व (सूर्य) का पुत्र कहा गया है। मंदिर निर्माता के रूप में कलचुरि शासकों के सामंत हरिगण के पुत्र वल्लभराज का नाम मिलता है। वल्लभराज निश्चय ही कलचुरि राज्य का अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्ति था, क्योंकि कलचुरि शासकों के अन्य अभिलेखों में उसका नाम आया है साथ ही उसके द्वारा वल्लभसागर तालाब तथा अन्य सार्वजनिक, धार्मिक कार्य कराये जाने की जानकारी मिलती है। रेवन्त को शिल्प में अधिकतर शिकार यात्रा पर दिखाया जाता है। रेवन्त, बड़वारपी संज्ञा, जो विश्वकर्मा की पुत्री और सूर्य की सर्वप्रधान पत्नी थी, के गर्भ से उत्पन्न गुहों का अधिपति माना जाता है। पुराणों के अनुसार राजा लोग तोरण प्रान्त में प्रतिमा या घर में सूर्य पूजा की विधि के अनुसार रेवन्त की पूजा करते हैं। शिलालेख में उल्लिखित इस रेवन्त मंदिर का मूल स्थान संभवतः कोटगढ़ अथवा महमंदपुर में रहा होगा। मंदिर के प्रवेश द्वार, शिखर व अन्य स्थापत्य खंडों के साथ कोटगढ़ के द्वार पर देव-कोष्ठ में स्थापित सूर्य की प्रतिमा एकमात्र ज्ञात रेवन्त मंदिर का मुख्य अवशेष है।

    छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग
    सोमवंश का शासक, महाशिवगुप्त बालार्जुन का लगभग तेरह सौ साल पुराना इतिहास छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग माना जाता रहा और इस मान्यता पर मुहर लगी, जब सिरपुर से इस शासक के 27 ताम्रपत्रों (9 सेट) की निधि एक साथ मिली। किसी एक ही शासक के इतने प्राचीन ताम्रलेख इस तादाद में अब तक कहीं नहीं प्राप्त हुए हैं (विश्वसनीय जानकारी के अनुसार इस निधि में ताम्रपत्रों की संख्या इससे भी अधिक थी), यह प्राप्ति केवल संख्या की दृष्टि से ही उल्लेखनीय नहीं हैं, बल्कि यह तत्कालीन छत्तीसगढ़ के स्चर्ण युग की गौरव-गाथा का अमूल्य अभिलेख है। महाशिवगुप्त बालार्जुन, सोमवंश में उत्पन्न हुआ और वंशानुगत वैष्णव धर्म से भिन्न शैव धर्म के सोम सम्प्रदाय का अनुयायी बनकर, अपने पूर्वजों के विपरीत स्वयं को परम भागवत के बदले परम माहेश्वर कहलाने लगा, किन्तु उसके राजस्व काल में माता वासटा द्वारा बनवाया गया विष्णु मंदिर, जो अब सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर के नाम से जाना जाता है और बौद्ध आचार्यों को उसके द्वारा दिये गए दान से, उसकी धार्मिक सहिष्णुता का परिचय मिलता है।

    वासटा के सिरपुर शिलालेख की प्रशस्ति, अतिशयोक्तिपूर्ण होगी, किन्तु इस महान शासक के सद्गुणों, क्षमता और शक्ति का साफ अनुमान जरूर होता है। इस शिलालेख के अनुसार ‘धर्मावतार दिखाई पड़ने वाले महाशिवगुप्तराज ने पृथ्वी को जीत लिया। यह भीष्म पितामह से भी महान होगा, पराक्रम से आचार्य द्रोण को जीतेगा, तब रण में सामना करने के लिए कौन इसके लिये समान बल वाला कर्ण बनेगा। इस प्रकार बालार्जुन को अस्त्र विद्या में सभी को जीतने वाला और कुशल मानकर शत्रुओं ने अपने जीवन की इच्छा छोड़ दी, सम्पत्ति की इच्छा तो वे पहले ही छोड़ चुके थे। कृष्ण भी इस बालार्जुन के समान नहीं थे और न ही भावी कल्कि ही इसके समान हो सकेंगे।’

    महाशिवगुप्त बालार्जुन की सिरपुर ताम्रपत्र निधि के अलावा बरदुला, बोंडा, लोधिया से एक-एक तथा मल्हार से तीन ताम्रलेख, सेनकपाट और मल्हार शिलालेख के साथ-साथ सिरपुर से विभिन्न शिलालेख प्राप्त होते हैं। मल्हार (वस्तुतः जुनवानी) से प्राप्त अब तक ज्ञात उसके अंतिम 57 वें राज्यवर्ष के ताम्रलेख में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सूचनाओं सहित, अत्यंत रोचक विवरण आता है, जिसमें भूमिदान, हाथ के माप के पैमाने से दिया गया है तथा यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि हाथ का मान 24 अंगुल के बराबर होगा। संभवतः तब भी यह किस्सा प्रचलन में रहा होगा, जिसमें राजधानी सीमा में राजा द्वारा ब्राह्मण को एक खाट के बराबर भूमिदान की चर्चा होती है, किन्तु बाद में दान प्राप्तकर्ता ने खाट की रस्सी खोलकर पूरे राजमहल को घेर लिया था।

    सिरपुर ताम्रपत्र निधि से मिलने वाली ऐतिहासिक जानकारी के साथ ही तत्कालीन राजधानी श्रीपुर में राज परिवार के सदस्यों द्वारा दिये गये दान का जिक्र है और यहां शैव सम्प्रदाय की अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा का पता चलता है और विभिन्न शैव-आचार्यों की गुरू-शिष्य परम्परा के नाम यथा अघोरशिव, दीर्घाचार्य, व्यापशिवाचार्य मिलते हैं जबकि जुनवानी ताम्रलेख में सोम सिद्धांत के आचार्यों भीमसोम, तेजसोम, रूद्रसोम और सोमशर्मा जैसे नाम मिलते हैं। निःसंदेह महाशिवगुप्त बालार्जुन इन्हीं शैव-सोम सम्प्रदाय के आचार्यों से दीक्षित होकर परम माहेश्वर की उपाधि का धारक बना था।

    टीप
    प्राचीन इतिहास, पुरातत्व और परंपराओं को एकजुट कर अंचल को समझने के प्रयास में छत्तीसगढ़ के विभिन्न पक्षों पर मेरा यह नोट किश्तों में, कभी समग्र रूप से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में छपा, जिसमें से उल्लेखनीय दैनिक भास्कर, बिलासपुर में 9 से 29 मई 1998 के बीच 20 किश्तों में छपा, इसे कुल 36 किश्त छपना था, लेकिन अटक गया। पुनः मध्यप्रदेश शासन, उच्च शिक्षा विभाग एवं मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी के समवेत उपक्रम की द्विमासिक पत्रिका ‘रचना‘ के छत्तीसगढ़ राज्य गठन के विशेष अंक, नवंबर-दिसंबर 2000 में मुख्य लेख के रूप में प्रकाशित हुआ। 

    पत्रिका 'बहुमत' अंक 24, मार्च 2014 में यह विशेष रूप से प्रकाशित हुआ, जिसमें कहा गया है कि- ‘वे सांस्कृतिक भूमण्डलीकरण के इस दौर में भी अपने आसपास के जनजीवन को ही रचना और विचार के केन्द्र में रखते हैं। ऐसे समय में जब आधुनिकतावाद और उत्तरआधुनिकतावाद जैसे जुमले साहित्यिक विमर्श के केन्द्र में आते जा रहे हैं जिनसे साहित्य का आम पाठक अपने आपको सम्पृक्त नहीं कर पा रहा, राहुल सिंह उस दुनिया और समाज को अपनी अभिव्यक्ति का हिस्सा बनाते हैं जो आम तौर पर किसी भी साहित्यिक बातचीत में हाशिए पर ही खड़ा दीखता है।‘

    Sunday, October 10, 2021

    सरग चो लछमी

    सरग चो लछमी भुई ने ईली

    भाग१ फिरेदे हामचो तुमचो, सुना बे गोहार२।

    इन्द्रावती नंदी के दखा, तपसी आदिवासी चो गंगा,
    येबे नी आय कोई चिन्ता येचो आसे भारी मया।
    शंखनी डंकिनी खोलाप नारंगी, माई इन्द्रावती चो संगी,
    चितरकोट तीरथगढ़ के बलूं, बस्तर चो सिंगार।।
    भाग फिरेदे हामचो तुमचो, सुना बे गोहार।।

    धान पाकेदे कुंवार-कातिक, गहूं पाकेदे चईत३
    डांडा-कांदा रोपते-रोपा४ दुई चो होयदे बीस।
    टेंडा५ टेंडा खूब सकत ने६ पम्प लगावा तुमी,
    चुवां-मुंडा७ काय पूरेदे बांधुक होयदे नंदी।।
    भाग फिरेदे हामचो तुमचो, सुना बे गोहार।।

    सूखा-सूखी८ चो डर नी आय कितरो तपेदे बेर९
    बादरी१० ठगेदे केबे-जेबे, नीं बसूं ओगाय११।
    बेड़ा ने बोहरावां?१२ गंगा, पसना१३ होयदे जमना,
    सरग१४ चो लछमी भुई१५ ने ईली सतहोली१६ येबे सपना।।

    भाग फिरेदे हामचो तुमचो, सुना के गोहार।/div>

    १भाग्य २पुकार ३चैत्र ४बोना ५हाथ से पानी सींचने का लकड़ी से बना यंत्र ६परिश्रम ७कुंआ और तालाब ८अनावृष्टि ९सूर्य १०मेघ ११चुपचाप १२प्रवाहित करना १३पसीना १४स्वर्ग १५धरती १६सत्य होना।

    गिरधारीलाल रायकवार ‘मनहर‘
    द्वारा- गोवर्धनलाल रायकवार पोस्टमैन,
    पो.आ. जगदलपुर

    संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के उपसंचालक पद से अवकाश-प्राप्त रायकवार जी, जगदलपुर निवासी हैं। शिक्षक रहे हैं। पुरातत्व और संस्कृति के अलावा विभिन्न क्षेत्रों में उनकी समझ जितनी गहन गंभीर है, व्यवहार उतना ही सहज। भाषा के जानकार हैं ही। हलबी में नाटक भी लिखा है ‘सीता बिहा नाट‘, कहते हैं- रामकथा का सबसे अधिक नाटकीय संभावना वाला प्रसंग सीता स्वयंबर ही है। ‘मनहर‘ उपनाम, उन्होंने बाद में प्रचलन में नहीं रखा, जैसा इस कविता में उनके नाम के साथ है। मुझे लगता है कि यह बस्तर संभाग गीत का मान पाने योग्य है (वैसे कई बार ऐसा लगता है कि ठेठ बस्तर में कांकेर छूटा रहता है)। यह कविता मध्यप्रदेश शासन, पंचायत विभाग की पत्रिका ‘समाज सेवा‘ के लोक संस्कृति अंक, जनवरी 1974 में प्रकाशित हुई थी। इस कविता के साथ अपने लिए कौतुक प्रयास, हलबी को टटोलते, हिंदी अनुवाद का प्रयास मेरा है।

    स्वर्ग की लक्ष्मी भूमि पर आई

    हमारा तुम्हारा भाग्य बदलेगा, सुनो मेरी पुकार।

    इंद्रावती नदी को देखो, तपस्वी आदिवासियों की (यह) गंगा (है)। अब (हमें) कोई चिंता नहीं, इसका (हम पर) असीम स्नेह (है)। शंखनी डंकिनी खोलाप नारंगी (नदियां) मां इंद्रावती की संगी हैं। चित्रकोट और तीरथगढ़ को कहें बस्तर का श्रृंगार। हमारा तुम्हारा ...

    कुंआर-कार्तिक महीने में धान की फसल पकती है और गेहूं चैत में पकता है। केद-मूल रोपते चलो यह दो (रुपये) का, बीस का हो जाएगा। टेंडा में खूब परिश्रम है, तुम पंप लगाओ। कुएं तालाब कितना पूरे पडेंगे, नदी में बांध बनाना होगा। हमारा तुम्हारा ...

    सूखे (अकाल) का डर नहीं है, दिन (सूर्य) कितना भी तपे, जब तब बादल ठग (साथ न) दे, (फिर भी) खाली (चुपचाप) नहीं बैठेंगे। खेतों में गंगा बहाएंगे, इसमें हमारा पसीना यमुना होगी। स्वर्ग की लक्ष्मी भूमि पर आई, सपना अब सच हुआ। हमारा तुम्हारा ...

    Saturday, October 9, 2021

    सुराजी

    आजादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर हरि ठाकुर स्मारक संस्थान से ‘हमर सुराजी‘ का प्रकाशन पिछले दिनों हुआ है। इसमें छत्तीसगढ़ के नौ स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों- गैंद सिंह, वीर नारायण सिंह, हनुमान सिंह, गुण्डा धूर पं. सुंदरलाल शर्मा, ठाकुर प्यारेलाल सिंह, डा. खूबचंद बघेल, क्रांति कुमार भारतीय और परसराम सोनी का जीवन-वृत्तांत है। पुस्तक में हरि ठाकुर जी के लेखों का अंगरेजी भावानुवाद अशोक तिवारी जी द्वारा किया गया है और आशीष सिंह ने उनका छत्तीसगढ़ी नाट्य रूपांतरण किया है। भाई आशीष से इस पुस्तक की पाण्डुलिपि देखने का अवसर मुझे मिला तब इस पर मेरी प्रतिक्रिया को उन्होंने लिख कर देने का कहा, वह अब इस पुस्तक में शामिल है, इस तरह-

    पहला भी, अनूठा भी

    पराधीन सपनेहु सुख नाहीं, करि विचार देखहु मन माहीं।।

    गोस्वामी तुलसीदास की ये पंक्तियां मानों अग्निमंत्र हैं। पं. माधवराव सप्रे ने ‘जीवन-संग्राम में विजय-प्राप्ति के उपाय‘ में स्वावलंबन शीर्षक में बात आरंभ करने के लिए इन्हीं पंक्तियों को आधार बनाया है। सन 1908 में परिस्थितिवश उन्होंने सरकार से क्षमा मांगी और पश्चातापग्रस्त रहे। किंतु इससे उबरने के लिए उन्होंने श्रीसमर्थरामदासस्वामी कृत मराठी ‘दासबोध‘ का हिन्दी अनुवाद किया। दासबोध के कुछ शीर्षक ध्यान देने योग्य हैं- राजनैतिक दांवपेंच, अभागी के लक्षण, भाग्यवान के लक्षण, राजनीति का व्यवहार आदि। सप्रे जी ने भूमिका में लिखा कि ‘इसमें ऐसी अनेक बातें बताई गई हैं जो आत्मा, व्यक्ति, समाज और देश के हित की दृष्टि से विचार करने तथा कार्य में परिणत करने योग्य हैं।‘ यह आसानी से देखा जा सकता है कि रामकथा हो या दासबोध, संतवाणी हो या राजनय संहिता, हमारी परंपरा में ऐसी रचनाओं, उनकी टीका-व्याख्या का उद्देश्य सदैव सुराज रहा है।

    ऐसा ही एक प्रसंग सन 1934 का है, जब क्रांतिकुमार भारतीय ने बेमेतरा में गणेशोत्सव के अवसर पर रामायण के भरत मिलाप प्रसंग को सही मायने में सुराज, संदर्भ लिया था। उन्होंने कहा कि मातृभूमि की सेवा और स्वाधीनता के लिए हरसंभव प्रयास करना चाहिए। इस मौके पर उन्होंने सिविल नाफरमानी, सेना के लिए किए जाने वाले गौ-वध, स्वदेशी, छुआ-छूत और नशा-मुक्ति की बातें भी कहीं। उल्लेखनीय है कि अप्रैल 1934 में ’नेशनल वीक’ के दौरान नागपुर में क्रांतिकुमार भारतीय के प्रवचन-भाषणों को राजद्रोह प्रकृति का मान कर उन्हें चालान किया गया। उनका लिखित बयान दाखिल कराया गया, जिसमें उन्होंने (चतुराईपूर्वक) कहा था कि वे रामायण प्रवचन करते रहेंगे, लेकिन भविष्य में शासन विरोधी अथवा राजद्रोह के भाषण नहीं करेंगे।

    बैरिस्टर साहब, ठाकुर छेदीलाल ने अकलतरा में सन 1919 में रामलीला मंडली की स्थापना की, 1924 से 1929 तक व्यवधान रहा इसके बाद 1933 तक अकलतरा रामलीला की पूरे इलाके में धूम होती थी। अकलतरा के रंगमंच में पारम्परिकता से अधिक व्यापक लोक सम्पर्क तथा अंग्रेजी हुकूमत के विरूद्ध अभिव्यक्ति उद्देश्य था। इसका एक दस्तावेजी प्रमाण, लाल साहब डा. इन्द्रजीत सिंह की निजी डायरी से मिलता है कि सन 1931 में 23 से 26 अप्रैल यानि वैशाख शुक्ल पंचमी से अष्टमी तक क्रमशः लंकादहन, शक्तीलीला, वधलीला और राजगद्दी नाटकों का यहां मंचन हुआ। कहना न होगा कि इन सभी नाटकों का चयन संवाद और प्रस्तुति शैली सोद्देश्य सुराजी होती थी।

    छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने सुराज में स्व-राज और सु-राज, दोनों को लगभग समान आवश्यक माना। हमारे ये पुरखे, एक ओर ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती देते रहे वहीं सुशासन के प्रति भी सजग रहे। ब्रिटिश हुकूमत, राज्य-व्यवस्था का ढोंग करते हुए हमें गुलाम बनाए रखना चाहती थी, उसकी मानसिकता उपनिवेशवादी थी और प्राथमिक उद्देश्य भारत जैसे ‘सोने की चिड़िया‘ को गुलाम बनाए रखते शोषण, दोहन करते रहना। इसके लिए बर्बरता और क्रूरता का सहारा लेने में उन्हें तनिक भी देर न लगती थी।

    हमारे पुरखे स्व-राजियों ने हमारी परंपरा के सु-राज के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया। इस भावना की मुखर अभिव्यक्ति गांधी में हुई। हमारी स्वाधीनता के रास्ते में रोड़े पैदा करने वाले तत्वों- धर्म, जाति-वर्ग, भाषा, प्रांत के भेद और सामाजिक कुरीतियों, अंधविश्वास को दूर करने के लिए सदैव उद्यत रहे। अंग्रेजी हुकूमत द्वारा देशी रियासतों को दिए जा रहे महत्व के बावजूद, राष्ट्रवादी विचार और नेता प्रभावी होते गए। नेहरू, टैगोर, बोस, जिन्ना, अंबेडकर, राजगोपालाचारी जेसे नेताओं से मतभेदों के बावजूद समावेशी गांधी ने साध्य और साधन की पवित्रता और तात्कालिक स्व-राज के साथ सु-राज के वृहत्तर और दूरगामी लक्ष्य को कभी ओझल होने नहीं दिया। यही कारण था कि उन्होंने देश की आजादी के जश्न में स्वयं के शामिल होने को जरूरी नहीं समझा और उस मौके पर हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक हिंसा को रोकने में लगे रहे।

    ‘हमर सुराजी‘ शीर्षक इस पुस्तक में स्वाधीनता संग्राम के नौ सेनानियों के जीवन-पक्ष अनूठे स्वरूप में उद्घाटित हो रहे हैं। काल की दृष्टि से इनमें 1857 के बहुत पहले, पिछड़े समझे जाने वाले परलकोट-बस्तर क्षेत्र के गैंदसिंह हैं, जिन्होंने जनजातीय दमन और अत्याचार के विरोध का बिगुल फूंका था। दूसरी तरफ डॉ. खूबचंद बघेल, जिन्होंने आजादी के बाद भी स्वाधीनता को सुराज में बदलने के लिए कोई कसर न रखी। ये सभी सेनानी वास्तव में छत्तीसगढ़ी अस्मिता के नवरत्न हैं।

    छत्तीसगढ़ की गौरव-गाथा के प्रखर स्वर हरि ठाकुर की कलम ने इन पुरखों और उनके जीवन-संग्राम को अमर बनाया है, जिनका संकलन इस पुस्तक में प्रकाशित किया जा रहा है। किन्तु खास बात यह है कि इन सेनानियों के जीवन-वृत्तांत को मूल के साथ सुगम और प्रवाहमयी अंग्रेजी में भी प्रस्तुत किया जा रहा है और हमारे इन अस्मिता पुरुषों के जीवन-पक्षों को जीवंत-प्रभावी बनाने के लिए नाट्य रूपांतर भी किया गया है। इस दृष्टि से यह प्रकाशन आपने आप में न सिर्फ अनूठा, बल्कि संभवतः पहला भी है। निसंदेह, इस विशिष्ट स्वरूप से इसकी उपयोगिता और इसका महत्व बहुगुणित है।

    हमारे इन सुराजियों का स्मरण और उनकी इस गांधी-अभिव्यक्ति की सार्थक प्रासंगिकता, उनकी प्रेरणा में है कि स्व-राज का लक्ष्य पा लेने के साथ सु-राज के लिए हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है। यही सुराज, जो दीर्धकालीन, बल्कि सतत प्रक्रिया है, वास्तविक रामराज्य है। इसके लिए हमें सजग और सक्रिय रखने की कड़ी में यह दस्तावेज, एक प्रकाश-स्तंभ, हमारा पथ-प्रदर्शक हो सकता है।