Thursday, June 11, 2026

कुबेर

आवेदन-पत्र में खाने बने होते हैं- पहला नाम, दूसरा नाम और तीसरा-अंतिम नाम। उपनाम, तखल्लुस या साहित्यिक नाम के बाद जोड़ा जाता है और कई बारवही व्यक्ति का पर्याय बन जाता है। यह बात ‘कुबेर‘ के संदर्भ में है, जिन्हें पहले-पहल कुबेर सिंह साहू के नाम से जानता था और उनकी कुछ रचनाओं से परिचित और प्रभावित था। फोन पर संपर्क बना। अब उनकी कुछ किताबों के साथ उन्हें करीब से देख रहा हूं। इन किताबों पर उनका नाम सिर्फ कुबेर है। भोड़िया और ढोढ़िया, कुबेर के परिचय के साथ क्रमशः उनके ग्राम और पोस्ट का नाम आता है। मिलते-जुलते लेकिन कुछ अलग से इन नामों पर बरबस ध्यान जाता है। आगे बढ़ने से पहले क्यों न कुछ देर इन पर ठहर लें। 

ग्राम-भोड़िया, पोस्ट-ढोढ़िया। जाने क्यों गांवों के ऐसे अजीब नाम प्रचलन में आए होंगे। वैसे अजीब तो वही लगता है, जिससे अपनापा या कम से कम थोड़ा बहुत परिचय न हो। तो आइए, कुबेर के पहले इनसे थोड़ी भेंट-घांट, जान-पहचान का उद्यम करें। भोड़िया, शब्द को तोड़ें तो पहला हिस्सा होगा भोड़, बस इतना करते ही वह छेद, ‘पीप होल‘, दरार बन जाएगी, जहां से भोड़िया का अर्थ खुलते देखा जा सकता है। याद करें छत्तीसगढ़ी का शब्द, भोंड़ा या भोंड़ू, यादि छिद्र। यही ‘भ‘, जो भोंकने-भोंगने यानी छेद करने में है, वह भुलका से भोंगरा हो जाता है। यहां तक पहुंचकर मुझे ‘ताला‘ उत्खनन के दिनों की याद आती है। हम बिल्हा ब्लाक के धौंराभांठा गांव हो कर गुजरते थे और नाम सुनते थे ‘भुलकहा‘। अनुमान किया कि तुर्री नाम वाले गांवों, तुरतुरा या तुरतुरिया की तरह यहां भी जल-सोते का प्रवाह होगा और मौके पर ऐसा ही पाया। इस छोटे से विराम में भटक कर ठहर सकते हैं कि भोड़िया, किसी जल-सोते से जुड़ा नाम होगा। यों भी ग्राम-नाम अधिकतर भू-संरचना, भौगोलिक विशिष्टता, जल, जीव-जंतु और वनस्पति से जुड़ कर बनते हैं। 

अब ढोंढ़िया। इस नाम के के साथ सबसे पहले ध्यान जाता है ढोंढ़, ढोंड़ या दोंद पर, जिसका आशय मोटा पाइप है। छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में पानी के प्राकृतिक सोते के लिए ढ़ोंढ़ी या झोड़ी शब्द प्रचलन में है, जिसे बांध कर छोटे कुएं का रूप दे दिया जाता है और ओवर-फ्लो पानी रिस कर बाहर बहता रहता है। इसी के पास का शब्द है डोंढ़िया या ढोंढ़िया, ‘पानी वाला सांप‘- ‘डुण्डुभ‘। डोंढ़िया है तो सांप, मगर सीध-साधा, शरीफ, बेचारा-सा। काटे नहीं, काट लिया तो जहरीला नहीं, मेरे बचपन के बड़े साथी कहते थे, ‘डोंढ़िया के चाबे, एक फूंक गांजा बरोबर‘। इसके साथ जिस दूसरे का नाम लिया जाता है, वह है पिटपिटी, नाम से ही पिटा-पिटाया सा। 

बरास्ते कुबेर वापस आते हुए, भोड़िया-ढोंढ़िया ग्रामवासियों के समक्ष सादर आग्रह- अपने ग्राम नाम के पीछे आपलोगों की कोई मान्यता हो, बड़े-बुजुर्गों से कुछ सुना हो, आप लोगों ने कुछ सोचा हो तो अवगत कराइएगा, अन्यथा विनम्र प्रस्ताव कि अपने ग्राम नाम और पता-पोस्ट के नाम भोड़िया-ढोंढ़िया के लिए सुझाए उक्त अर्थ को मान्य करने पर विचार कीजिएगा, मेरे लिए आप सब की पहचान पानीदार इलाके के निवासी वाली है। 

विश्व कथा-साहित्य में उनकी दिलचस्पी है। उनकी किताब ‘ढाई आखर प्रेम के‘ अंगरेजी की ग्यारह कहानियों का अनुवाद-उल्था है, जिसमें आस्कर वाइल्ड और ओ. हेनरी जैसे ख्यातनाम हैं, तो कम चर्चित कोलिन होवार्ड भी शामिल हैं, मगर न जाने क्यों, बिना परिचय के, जबकि अन्य सभी छह कहानीकारों के साथ उनका परिचय भी है। इनमें भारतीय अंगरेजी कहानीकार- खुशवंत सिंह, आर.के. नारायण, रस्किन बांड हैं, जिन्हें होना ही चाहिए फिर यहां भी आम पाठक के लिए एक कम जाना नाम- ‘चमन नहल‘, जिनकी कहानी शामिल है। वे अपने चेखव की कहानियों के छत्तीसगढ़ी अनुवाद संग्रह ‘चेखव की दुनिया‘ के कारण अधिक जाने गए हैं। मगर उनका अन्य अवदान भी उल्लेखनीय और महत्वपूर्ण है। 

कुबेर ने छत्तीसगढ़ी में अनुवाद के अलावा, मौलिक कहानी लेखन किया है, छत्तीसगढ़ी लोक कथाओं का संग्रह, निबंध, आलेख और संस्मरण भी किया है। हिंदी में उनकी कविताओं, कहानी, व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित हैं। उनकी संपादित पुस्तक संगीतकार खुमान साव पर केंद्रित- ‘स्मृतियों के सुवासित पुष्प‘ है। खुमान साव की स्मृतियों को इस तरह संजोना छत्तीसगढ़ की लोक-संस्कृति और संगीत के लिए आवश्यक और महत्वपूर्ण कार्य है। इसी तरह पं सुंदरलाल शर्मा कृत ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ की टीका उनके द्वारा की गई है। 

खुमान साव, रामचंद्र देशमुख वाले ‘चंदैनी गोंदा‘ के आधार-स्तंभों में से एक थे। देशमुख जी के न रहने पर इस नाम को उन्होंने पूरी गरिमा के साथ जीवन्त रखा। कला-संगीत में अनुशासन और मर्यादा का निर्वाह करते उसे छत्तीसगढ़ की सबसे लोकप्रिय कला-मंडली में से एक बनाए रखा। इसी तरह, पं सुंदरलाल शर्मा कृत ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ के कई संस्करण और अनुवाद-टीकाएं प्रकाशित हैं फिर भी इस कृति की टीका-संभावना बनी हुई है। इस बात का ध्यान रखते ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ की टीका की गई है। टीका में यथास्थान अलंकार का उल्लेख किया गया है किंतु पदों के अनुवाद या हिंदी अर्थ को भावार्थ कहे जाने का आग्रह-औचित्य, संभवतः यही है कि इसे हिंदी अनुवाद के बजाय टीका कहा गया है। यहां इस बिंदु की ओर ध्यानाकर्षण आवश्यक है, बेहतर होता इस कृति पर अब तक हुए प्रमुख कामों का उल्लेख कर दिया जाता। इसी तरह एक अन्य बिंदु का उल्लेख कि प्राक्कथन में इस खंडकाव्य का रचना काल 1907 ई. बताया गया है। जबकि टीका के अंत में स्पष्ट किया गया है कि द्वितीय संस्करण में 21 जून 1907 का हवाला है। इससे स्पष्ट है कि द्वितीय संस्करण इस तिथि के बाद छपा और प्रथम संस्करण इसके पहले। यह असावधानी अखरने वाली है। 

उनके छत्तीसगढ़ी संग्रहों ‘कहा नहीं‘ और ‘भोलापुर के कहानी‘ की कहानियों में लोक-छत्तीसगढ़ की वही सुवास प्रस्फुटित है, जो लेखक के मन में रची-बसी है। इनसे गुजरते हुए उनके अन्य दो संग्रह ‘छत्तीसगढ़ी-कथाकंथली‘ और ‘सुरति अउ सुरता‘ के प्रति मेरी उत्कंठा और बढ़ गई है। उनकी कृतियों से जान पड़ता है कि वे भाषा और भाव में समरस होने वाले, उसे समरस कर देने के उद्यम वाले रचनाकार हैं। उन्हें अपने पठन-पाठन के दौरान रचनाओं से बने मनोभावों को कभी अपनी भाषा तो कभी अपनी भाषा को इतर भाषा में ले जाने का प्रयास होता है। ऐसा अक्सर तब होता है, जब पाठक भाषा की सघनता को तरल करते भाव के रूप में आत्मसात कर पाता है। इस तरह मेरी दृष्टि में कुबेर के रचनाकार में भाव-भाषा के द्वंद्व का समाहार है। 

अंत में उल्लेख कि ‘स्मृतियों के सुवासित पुष्प‘ और पं सुंदरलाल शर्मा कृत ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला की टीका उनके द्वारा की गई टीका, इन दोनों पुस्तकों में उन्होंने मुझे भी शामिल करने योग्य माना, एतदर्थ उनके प्रति इस प्रकार अपना आभार भी व्यक्त कर रहा हूं।

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