Wednesday, May 13, 2026

गुरुदेव काश्यप

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता पर ‘छत्तीसगढ़‘ सांध्य दैनिक के सुनील कुमार से मुलाकात में बातें निकलीं तृप्ति सोनी की किताब ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता, चार पीढ़ियों की स्याही की विरासत‘ की और पहुंची, गुरुदेव काश्यप तक। मैं उनसे और उनके पत्रकार-संपादक होने से परिचित रहा हूं, मगर उनकी कविताई से बहुत कम। सुनील कुमार जी ने उनकी किताब ‘धूप का एक दिन‘ (1972) पढ़ने को दे दी। यह जानकारी न होने से अपनी चिढ़ का बदला खुद से लेने के लिए आते ही काम में लगा, पूरे संग्रह की वर्ड फाइल तैयार कर ली और ललित कुमार के ‘कविता कोश‘ में भेज दिया। 

गुरुदेव काश्यप जी के साथ रायगढ़ के उन दिनों से ले कर अब तक को याद करता रहा जब सर्व माननीय किशोरी मोहन त्रिपाठी, बारेन दा, अनुपम दासगुुप्ता, प्रभात त्रिपाठी, देवेंद्र प्रताप सिंह, हरिहर सिंह, अतुल श्रीवास्तव, हरकिशोर दास, रवि मिश्रा, विनोद पांडेय, रमेश शर्मा, स्वराज करुण, शिव राजपूत, राजू और हेमचंद्र पांडेय, बिहारीलाल साहू, डॉ. बल्देव, बसंत राघव, अशोक अग्रवाल, अनिल रतेरिया, प्रमोद ब्रह्मभट्ट, गोपाल पटेल, राकेश शर्मा, अजय अटापट्टू, चंडीप्रसाद गुप्ता, अंबिका वर्मा, राजेश डेनियल, अबरार हुसैन ..., बहरहाल वापस गुरुदेव काश्यप की कविता। उनकी कविताएं पढ़ते हुए तात्कालिक पाठकीय प्रतिक्रिया बनी- 

वे रविशंकर विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र के संभवतः पहले बैच के विद्यार्थी थे छुईखदान वाले राघवेंद्र त्रिपाठी, सरोज बाजपेयी भी संभवतः इसी बैच में थे। उन्होंने भाषा की भी पढ़ाई की। यायावरी- गुरुदेव काश्यप की कविताओं में झलकती है मगर उनके संग्रह ‘धूप का एक दिन‘ की लगभग सारा लेखन अखबार-समाचार के बीच पनपी रचना की तरह है, जिसमें शहर का माहौल-पर्यावरण, देश की दशा और संविधान तथा वैश्विक परिस्थितियां, अमरीका हावी है। देखा जा सकता है कि समाचार-सूचना के संवेदनशील प्रस्तोता को उस माध्यम की सीमा बेचैन करती है, तथ्यों के साथ विचार और भावनाओं के बिंब-प्रतिबिंब के लिए वहां जगह नहीं होती, वह समाचार-गद्य में लिखी जा चुकी होती है लेकिन ऐसे शुष्क, असम्बद्ध-से घटना और परिस्थिति के समाचारों के पीछे मानवीय रिश्ता तो महसूस होता ही है। इसलिए ऐसे गद्य-अभिलेखन समाचारों के अंदर सहज कविता प्रवाहित होती रहती है, संवेदनशील मन उसे महसूस करता सुन लेता है और भाषा-कलम पर अधिकार हो तो अभिव्यक्त कर पाता है, ऐसी ही है इस पुस्तक की कविताएं, जिसकी पहली कविता का शीर्षक है ‘भूमिका: हम ऋग्वेदपदी‘, जिससे समझा जा सकता है कि यह कवि समष्टि से एकाकार हो कर रचना कर रहा है। उनकी कुछ कविताएं- 


भूमिका: हम ऋग्वेदपदी 

आहुति दो पितरों, देवताओं को। 
हे पवित्राप्रद अग्नियो, 
स्तवन करो 

हम ऋग्वेदपदी सौ हेमन्तों को लांघते 
बांहों में समेट आत्मजों को 
ऋषि-आयु भोगेंगे। 

वरणीय पृथिवी का आलिंगन करें 
स्वागत करें 
अंतरिक्ष से उभरते सूर्य का 
यह सोमधारी 
प्रजाओं के लिये 
अमृत किरणें उछालता आया है। 

आयुष्मान् बंधु, 
दाब दो किसी पत्थर के नीचे 
अपनी अकारथ मृत्यु को 

धूप का एक दिन 

धूप है-सीपी है 
सूरज एक मोती है 
कानों के रिंग में बड़ा भला लगता है 
(क्या करें, कीमती है) 

धूप है-लहरें हैं 
दिन एक समुन्दर है 
नारियल की छांव में 
नाव बने लेटे हैं 
(पाल है, मछलियां हैं, लंगर है) 

धूप है-चुम्बन है 
फेनदार किरने हैं 
लथपथ हैं ओंठ 
पैर डगमग हैं 
(शाम के कंधे हैं, शिथिल-शिथिल झरने हैं) 

सुबह की बौछार 

सुबह-सुबह 
मुक्तक-सा बरस गया पानी। 

भीग गए अधजागे फूल-पत्र 
भीग गए छत-छज्जे, गलियारे 
बिजली की कुमकुम, 
तांबे के तार, नरम अंधियारे 

पुल की वह रेलिंग भी भीग गई 
भीग गई नहर, मुरम भीग गई 
खिड़की का कासनी परदा कुछ सिमट गया 
सन्नाटा चौक के पास कहीं ठिठक गया। 

सुगबुग दरवाजे की 
कड़ी-कड़ी जगती है 
टिक कर दीवारों से 
धूप खड़ी होती है 
धुले-धुले गागर में 
सूर्य समा जाता है 
ईंधन के बोझ लिए 
दिवस चला आता है 

रात का अनबोला आंगन में सोया है 
पास का गजरा भी दबे-दबे रोया है 
दुखा गया जी को यह ऐसा अभिमानी है 
सुबह-सुबह मुक्तक-सा बरसा जो पानी है। 

दिन 

नंगे पांव फुटपाथ पर दौड़ता 
मूंगफली के छिलके बटोरता 
आहिस्ता कुछ सोच कर 
पार्क के चकेदार दरवाजे पर झूलता 
म्यूजियम की मुंडेर से झाँकता 
सिनेमा घर के सामने 
कागज के रंगीन टुकड़े बटोरता 
कभी किसी रंगीन बोर्ड को खुरचता 
फव्वारे पर 
पानी के छींटे बिखेरता 

दोपहर- 
किसी बबूल की टहनी से 
धूप की उलझी हुई पतंग को निकालता 
फेरी वालों के पीछे भागता 
रेल की पाँतों को पार करता 
नदी की रेत को रौंदता 
किसी हरवाहे की पगड़ी उछालता 
कभी दो बूढ़े बैलों को पुचकारता 

शाम- 
किसी खोमचे के नजदीक 
उदास मुंह लिये 
खाली जेबें टटोलता 
सूरज डूबे 
इसी गली की मोड़ पर 
हर रोज घेर कर 
मुझे आखरी सलाम करता 

बस यूं ही हाथ पीछे बाँधे 
अकेले किसी कोने में 
दुबक कर बैठ जाता 
उदास मन, खिन्न: 
सोचता हूं- 
किस विधवा का बेटा है 
आवारा-आवारा सा 
नाबालिग दिन। 

शाम 

जी चाहता है- 
बादलों की ऐंठी हुई पगड़ी में 
सूरज का एक दूध-मोंगरा 
खोंप दूं। 

धरती के भरे-भरे गालों से 
छाछ सी धूप छितर जाती है 
घूंघट में छांव नई ब्याही-सी 
आंगन के बाहर जो 
नजर नहीं आती है। 

पिंजड़े में सुग्गे सी 
शाम फुदक जाती है 
नई-नई बछिया सी 
हवा बिदक जाती है। 

रात की मचिया पर 
चांद बैठ जाता है 
बूंद-बूंद अमरस-सी 
चांदनी टपक गई 
कांस की कटोरी-सा 
पोखर भर जाता है 
भरे-भरे महुए से 
तारे टपका किए 
पगडंडी बैठी है 
खाली डलिया लिए। 

पुस्तक के फ्लैप पर परिचय, जो संभवतः स्वयं उन्होंने लिखा है, इस प्रकार है- 

जीवन को प्रथम तिथि पंक्ति, रायगढ़ दिनांक 15 अगस्त 1935। एक निम्न मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के सारे अभिशापों को वर्षों तक झेलने की विवशता। वह त्रासदायी परिवेश जो शैशव में हो रीढ़ की हड्डियों को प्रौढ़ बना जाता है। शिक्षा- एम. ए., मानव शास्त्र और भाषा विज्ञान में डिप्लोमा। व्यवसाय- पत्रकारिता। विगत 20 वर्षों में अनेक क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एव सम्पादन। पिछले कुछ वर्षों में दैनिक ‘महाकोशल‘ रायपुर के संपादक। अभिरुचि क्रमांक 1- यायावरीः डोनापाल से डीफू तक। ‘भटक चुके आगे और भटकेगे।‘ क्र. 2- असफल प्रकाशनों के लिए सफल योजनायें तैयार कर उन्हें क्षेत्रीय प्रतिभाओं के बीच खपाना। सन 1958 से 1966 के बीच अनेक पुस्तकों का प्रकाशन, संपादन। सहयोगी काव्य संग्रह नये स्वर-3, छत्तीसगढ़ का प्रथम कहानी संग्रह, ‘मीठे कनेर का दरख्त‘, काव्य संग्रह ‘नैवेद्य‘, ब्लादीमीर नाबोकोव के चर्चित उपन्यास ‘लोलिता‘ का अनुवाद और हिन्दी मे वियतनाम संबंधी प्रथम काव्य संग्रह ‘आहत सूर्य देश में‘। उपलब्धि- मित्रों का स्नेह, नवागतुकों की श्रद्धा और यह अटूट विश्वास कि समूचे भविष्य पर अधिकार हमारा है। मध्यप्रदेश में नई कविता का सूत्रपात करने वाले प्रथम सहयोगी काव्य संकलन नये स्वर-1 (1956) के सहयोगी कवि। प्रचार प्रसार के मंच पर उपस्थित होने से सदैव भयभीत। 22 वर्षों के रचना-काल में अंततः यह प्रथम व्यक्तिगत काव्य संग्रह ‘धूप का एक दिन‘। आगामी अभिशप्त उत्कल।

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