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Wednesday, September 7, 2022

छत्तीसगढ़ी अभिव्यक्ति - 2004

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के पश्चात, शासकीय दायित्व निर्वाह करते हुए विभिन्न आयोजन में सहभागी बनने और आयोजनों के लिए प्रतिवेदन तैयार करने का अवसर मिलता रहा। आयोजनों का प्रतिवेदन, जो प्रेस विज्ञप्ति, इस आयोजन और विभागीय गतिविधियों के प्रतिवेदन के लिए उपयुक्त हो तैयार करना होता था। ऐसे ही एक महत्वपूर्ण आयोजन का प्रतिवेदन विभागीय सहयोगियों की मदद से मेरे द्वारा तैयार किया गया था, उपयोगी संदर्भ मानते हुए यहां प्रस्तुत- 

छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति विभाग द्वारा राज्य की संस्कृति, परंपरा, भाषा-साहित्य तथा लोक-जीवन के विविध आयामों को उजागर करने के लिए ‘छत्तीसगढ़ी अभिव्यक्ति-2004’ राज्य स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन 23 एवं 24 मार्च को रायपुर में किया गया। यह संगोष्ठी छत्तीसगढ़ी भाषा-व्यंजकता, छत्तीसगढ़ के खेल, बाल-गीत, व्यंजन एवं छत्तीसगढ़ की संत परंपरा पर केन्द्रित थी। आयोजन में राज्य के सभी जिलों से संस्कृति और भाषा के विशेषज्ञों, अध्येताओं को आमंत्रित किया गया।

23 मार्च, मंगलवार को उद्घाटन सत्र में कार्यक्रम का परिचय देते हुए संचालक, संस्कृति, श्री प्रदीप पंत ने बताया कि यह संगोष्ठी छत्तीसगढ़ी भाषा-व्यंजकता, छत्तीसगढ़ के खेल, बाल-गीत, व्यंजन एवं छत्तीसगढ़ की संत परंपरा पर केन्द्रित है। इस संगोष्ठी के माध्यम से राज्य की समृद्ध परंपरा का संवर्धन करने की दिशा में एक प्रयास किया जा रहा है तथा प्रत्येक जिले में ‘छत्तीसगढ़ी अभिव्यक्ति’ संगोष्ठियां जिला प्रशासन के माध्यम से विभाग द्वारा सम्पन्न की जा रही है। संगोष्ठी में श्री श्यामलाल चतुर्वेदी, श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी, डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा ने अपने विचार रखे।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि, डॉ. इंदिरा मिश्र, अपर मुख्य सचिव, संस्कृति ने अपने उद्बोधन में छत्तीसगढ़ी की भाषायी समृद्धि और अभिव्यक्ति सामर्थ्य पर प्रकाश डालते हुए एक पत्रिका का प्रकाशन करने की योजना बतायी, जिसका स्वरूप छत्तीसगढ़ी के विद्वानों से परामर्श कर निर्धारित किया जाएगा।

शुभारंभ सत्र के पश्चात् ‘छत्तीसगढ़ी भाषा-व्यंजकता’ सत्र की अध्यक्षता डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा ने की और आधार लेख डॉ. बिहारीलाल साहू ने पढ़ा। आधार लेख में डॉ. साहू ने कहा कि छत्तीसगढ़ी, छत्तीसगढ़ की जनभाषा है। यह हिन्दी भाषा समुच्चय की सशक्त सदस्या है। इसकी उत्पत्ति अर्धमागधी अपभ्रंश से मानी गयी है तथा यह पूर्वी हिन्दी की पुरोगामी भाषा है। इसकी संरचना में एक ओर शौरसेनी अपभ्रंश के भाषिक तत्वों का समावेश है तो दूसरी ओर इसमें मागधी वर्ग की हिन्दी और अहिन्दी भाषा-रूपों का समाहार है। यद्यपि छत्तीसगढ़ी, छत्तीसगढ़ अंचल की जनभाषा है तथापि यहॉं विविध भाषा-बोलियों का संगम समाहार देखा जा सकता है। यहॉ आर्य भाषा परिवार की छत्तीसगढ़ी के साथ आग्नेय अथवा निषाद वर्ग की कोरकू, खरिया, खैरवारी, गदबा, शबर आदि बोलियॉं तथा द्राविड़ वर्ग की कुड़ुख, गोंड़ी, दोरली और परजी आदि भाषा रूप पारिवारिक एवं जातीय परिसर में प्रचलित हैं। इधर मंगोल अथवा किरात भाषा परिवार की बोली तिब्बती शरणार्थियों के साथ सरगुजांचल के मैनपाट में आ पहुची है। वस्तुतः छत्तीसगढ़ का भाषिक परिदृश्य वैविध्यपूर्ण है किंतु छत्तीसगढ़ी उसकी ‘लिंग्वा फ्रेंका’ है, जन प्रचलन की सर्वाधिक समर्थ भाषा है। 

उन्होंने आगे कहा कि छत्तीसगढ़ी लोकभाषा है और लोकाभिव्यंजता उसकी मूल प्रकृति है। छत्तीसगढ़ी भाषा का लोक जीवन के पालने में लालन-पालन हुआ है, उसका वाचिक परम्परा में उन्मेष हुआ है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ी भाषा का वाचिक या मौखिक साहित्य जितना समृद्व और अभिव्यंजक है उतना उसका अभिजात्य या शिष्ट साहित्य नहीं। छत्तीसगढ़ में प्रचलित लोकोक्ति, मुहावरे और पहेलियां इस धारा की प्रयुक्त भाषा को अधिक प्रांजल बना देती है। छत्तीसगढ़ी भाषा की अभिव्यंजकता, वाचिक साहित्य के तथ्य और शिल्प दोनों पर दिखलायी देती है। उन्होंने ददरिया, देवार गीत, लोक सुभाषितों, पहेलियों, मुहावरों के उदाहरण भी दिए। 

सत्राध्यक्ष डा. शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा- अभिधा तथा लक्षणा अपने अर्थ का बोध कराने के बाद जब विरत हो जाती है, तब जिस शब्द शक्ति द्वारा व्यंग्यार्थ ज्ञात होता है, उसे व्यंजना शक्ति अथवा व्यापार कहते हैं। व्यंग्यार्थ के लिए ध्वन्यार्थ, सूच्यार्थ, आक्षेपार्थ, प्रतीयमानार्थ आदि शब्द भी प्रयुक्त होते हैं। अभिधा शब्द का साक्षात सांकेतिक अर्थ बतलाती है, और लक्षणा मुख्यार्थ के असिद्ध होने पर रूढ़ि के कारण अथवा किसी प्रयोजन की सिद्धि के लिए मुख्यार्थ से संबंधित किसी अन्य अर्थ को लक्षित कराती है, किन्तु जब अभिधा और लक्षणा अभीष्ट अर्थ को स्पष्ट करने में असमर्थ रहती है, तो व्यंजना शक्ति का सहारा लेना पड़ता है। अभिधा और लक्षणा का संबंध केवल शब्द से होता है, किन्तु व्यंजना शब्द पर ही नहीं, वरन अर्थ पर भी आधारित रहती है। व्यंजना शक्ति के दो प्रधान भेद हैं- 1. शाब्दी व्यंजना तथा 2. आर्थी व्यंजना। शब्द पर आधारित व्यंजना अभिधामूला तथा लक्षणामूला होती है। जैसे- ‘आमा ल टोरे रे खाहौं कहिके। दगा म डारे बइहा आहौं कहिके।।‘ 

उन्होंने छत्तीसगढ़ी के पारम्परिक काव्य और गद्य में व्यंजकता को सोदाहरण स्पष्ट किया और बताया कि छत्तीसगढ़ लोकोक्ति या कहावतें या छत्तीसगढ़ी मुहावरों में व्यंजना शक्ति निहित है। छत्तीसगढ़ी भाषा में हाना, तुक और विशेष ध्वनि-ध्वन्यात्मकता के साथ चमत्कार पैदा करते हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा में मुहावरों के प्रयोग से सहज ही चमत्कार आ जाता है। 

इस सत्र में डॉ. विनय कुमार पाठक, डॉ. चितरंजन कर, डॉ. मन्नूलाल यदु, डॉ. व्यास नारायण दुबे ने भी अपने महत्वपूर्ण आलेख पढ़े और सत्र की चर्चा में डॉ. नलिनी श्रीवास्तव, डॉ. के.के. झा, श्री अनिरूद्ध नीरव, डॉ. रामनारायण शुक्ल की सहभागिता उल्लेखनीय रही। अपराह्न सत्र ‘छत्तीसगढ़ के खेल, बाल-गीत एवं व्यंजन’ पर केन्द्रित था। इस सत्र की अध्यक्षता श्री श्यामलाल चतुर्वेदी ने की और छत्तीसगढ़ के खेल, बाल-गीत पर आधार लेख श्री प्रताप ठाकुर का था। श्री ठाकुर ने अपने आलेख में कहा है कि छत्तीसगढ़ के खेलों में भी एक तरह का विभाजन है कुछ खेल पुरूष एवं बालक ही खेलते हैं तो कुछ खेलों पर बालिकाओं एवं महिलाओं का एकाधिकार है, परन्तु अधिकांश खेल ऐसे हैं जिन्हे बालक-बालिकाएं मिलजुलकर खेल सकते हैं। अधिकांश खेल वैसे तो नियमबद्ध हैं, परन्तु खेलों में संख्या की कोई बाध्यता नहीं है। कबड्डी एवं खो-खो में संख्या निर्धारित है, ये खेल ग्रामीण अंचल से उठकर राज्य एवं राष्ट्र की सीमा पार कर चुके हैं, इन खेलों को एशियाई खेलों मे शामिल किया गया है, गांवों में कबड्डी अभी भी डुडुआ के ग्रामीण नाम से खेला जाता है, अंतर केवल यह होता है कि एक तरफ का खिलाड़ी जब दूसरी ओर जाता है वह कबड्डी-कबड्डी के स्थान पर ‘‘चल डुडुआ डू-डू-डू-डू’’ कहता है। 

श्री ठाकुर के आलेख में छत्तीसगढ़ के गांवों में खेले जाने वाले खेल- डुडुआ या कबड्डी, खो-खो, चौपड़ या पासा, पचीसा, नौगोंटी-चालगोंटी या भटकौला, छेरी बाघ (शतरंज, चौपड़ की तरह का एक खेल), गिल्ली-डंडा, डंडा-पचरंगा-झाड़ बेंदरा, गेंड़ी, छुआ-छुऔव्वल भुर्री, चर्रा-चर्रा, टीप-रेस, चोर सिपाही, टामरस-धम्मक धुम्मक, सत्तुल, बिस-अमृत, नदी पहाड़, बांटी (बदाबुदी), भौंरा, कुढ़ील या आकुल-चाकुल या चिखौव्वल, नरियर फेंकऊला (हरेली पर्व के समय), सांट लुकऊला या घोड़ा बदाय छाई, पीछे देखो मार खाई, धंसऊला या गड़उला (बरसात के आसपास), खीला ठोंकउला, धम्मक-धुम्मक या धामर-धूसर, पतंग उड़ाना, खिस्सुल, चिमटुल, चेथुल, डंडा को लाउल (खरतोल), हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की- झुल्ला झूल-कदम के फूल, चूड़ी जीत-गोबर जीत, फुगड़ी-कदम्मा, पंचवा, घरगुंदिया, जतुलिया, ठेंकुलिया-धानी मुंदी, पुतरी बिहाव (अक्ती के समय), चकर बिल्लस, रस्सी कूद आदि के साथ खेल-बाल गीतों का परिचय दिया। 

छत्तीसगढ़ के व्यंजन पर आधारित लेख में डॉ. रत्नावली सिंह ने बताया कि अनेक प्रकार के उत्कृष्ट प्रजाति के धान छत्तीसगढ़ के ‘धान के कटोरा’ नाम को सार्थक करते हैं, यद्यपि गेहूं, दालें और तिलहनों का भी उत्पादन होता है, तथापि मुख्य उपज धान है। लोगों का मुख्य भोजन चावल है, यद्यपि चावल की अपेक्षा सस्ता होने के कारण आजकल गेहूं भी यहां के निवासियों के भोजन का हिस्सा बन गया है। सामान्य तथा दोनों समय भात, मिले तो दाल और कई प्रकार के शाक यहां के लोगों का मुख्य भोजन है। पहले रात के समय बचे भात में पानी डालकर, सबेरे बासी खाने का रिवाज था। खमनीकरण के कारण बासी में ऐसे तत्वों का समावेश होता था, जिससे लोग बहुत काम कर सकते थे पर अब बासी का स्थान धीरे-धीरे चाय ने ले लिया है। सबेरे नाश्ते में धुसका एवं अंगाकर खाया जाता है। धुसका, चांवल के आटे से बनता है, जिसे घी एवं चटनी, आचार के साथ खाते हैं। अंगाकर बहुत ही कम बनता है क्योंकि इसे बनाने के लिये कंडे की आग की आवश्यकता होती है। गांव में भी चूल्हे का प्रयोग तो होता है, पर जिस ‘गोरसी’ (मिट्टी से बना आग रखने का पात्र) में परंपरागत अंगाकर बनता था, वह अब बहुत कम देखने में आता है। 

छत्तीसगढ़ के अधिकांश त्यौहार कृषि आधारित होते हैं। सावन की अमावस्या, हरेली से त्यौहारों का सिलसिला शुरू होता है। फिर तो राखी-भोजली, तीजा-पोरा, पितर-नेवरात जैसे पर्व आते हैं। गॉंव की रक्षा और खुशहाली के लिये बैगा हूंम धूप देते हैं, गाय कोठा में नीम की डाल खोंचते हैं। घरों में बरा चौंसेला बनता है जिसे परिवार एवं कमिया तथा कृषि सहायकों को प्रेम से खिलाया जाता है। श्रीमती डॉ. सिंह ने छत्तीसगढ़ के व्यंजनों- चीला (सादा चीला, नूनहा चीला तथा गुरहा चीला), बबरा, बिनसा, चौंसेला, फरा, अइरसा, देहरौरी, खुरमी, पपची, कुसली, ठेठरी, करी, बूंदी, सोंहारी, बरा, भजिया, तसमई आदि पकवानों और उनसे सम्बद्ध पर्व, त्यौहारों पर प्रकाश डाला। 
छत्तीसगढ़ के व्यंजनों पर चर्चा में श्री रसिक बिहारी अवधिया व डॉ. निरूपमा शर्मा की मुख्य सहभागिता रही और खेल एवं बाल-गीत में श्री नंदकिशोर तिवारी, डॉ. निरुपमा शर्मा, श्रीमती शान्ति यदु, श्री बद्रीसिंह कटहरिया, श्रीमती मृणालिका ओझा, डॉ. अनसूया अग्रवाल, श्रीमती शकुन्तला तरार, श्री चंद्रशेखर चकोर, श्री रामकुमार वर्मा, डॉ. राजेन्द्र सोनी आदि सहभागी रहे। सत्र के पश्चात छत्तीसगढ़ी व्यंजन परोसा गया, साथ ही छत्तीसगढ़ के खेल और बाल-गीतों पर आधारित लोक-पारम्परिक शैली के सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति हुई। 

24 मार्च, बुधवार को छत्तीसगढ़ की संत परंपरा पर केन्द्रित सत्र की अध्यक्षता श्री स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी ने की और आधार लेख डॉ. सत्यभामा आडिल ने पढ़ा। डॉ. आडिल ने कहा कि छत्तीसगढ़ की जनपदीय संस्कृति में ‘संत-भावना’, मानवता और लोक-कल्याण के उच्च सोपानों को स्पर्श करती है। छत्तीसगढ़ का भौगोलिक परिसीमन अपनी सांस्कृृतिक और धार्मिक विरासत के लिए, अलग पहचान बनाता है। एक ओर यहां ‘कबीर पंथ’ की धर्मदासी शाखा की ‘पीठ’ है, तो ‘सतनाम पंथ’ का उद्गम स्थल भी है। इसी माटी में रामभक्त ‘रामनामी पंथ’ का वृहद् समाज है। छत्तीसगढ़ की समूची संस्कृति मानों इन्हीं तीनों पंथों की सद्वाणी से जीवन्त बनी हुई है। यह संतों की धरती है। छत्तीसगढ़ में प्रवर्तित व स्थापित कबीरपंथ का योगदान छत्तीसगढ़ी साहित्य के संदर्भ में इसलिए भी अतिशय महत्वपूर्ण हो जाता है, कि इसी के माध्यम से हम छत्तीसगढ़ी साहित्य का प्रथम लिपिबद्ध स्वरूप प्राप्त करते हैं। उन्होंने विभिन्न पंथों- कबीर पंथ (कबिरहा), सतनाम पंथ (सतनामी), फकीरा पंथ (फकिरहा) बनजारा पंथ (बनजरहा), बैरागी पंथ, निर्गुनिया, भजनहा, रामनामी (रामनमिहा) का विवरण भी दिया। 

सत्र में सहभागी वक्ताओं श्री देवीप्रसाद वर्मा, डॉ. रमेन्द्र मिश्र, श्री परदेशीराम वर्मा, श्री विमल पाठक, श्री जागेश्वर प्रसाद, डॉ. बलदेव, डॉ. केशरीलाल वर्मा, डॉ. गंगाप्रसाद डडसेना, डॉ. रामकुमार बेहार, श्री हरिहर वैष्णव ने पौराणिक ऋषियों के उल्लेख और ऐतिहासिक सन्दर्भों के साथ महाप्रभु वल्लभाचार्य, दूधाधारी महाराज बलभद्रदास, संत सेनानी यति यतनलाल, महंत लक्ष्मीनारायण दास, गहिरा गुरू, तपस्वी संत रूक्खड़नाथ, संत प्रियादास, स्वामी आत्मानंद की चर्चा की। 

सत्रों में राज्य के विभिन्न जिलों से 200 से अधिक प्रतिभागी उपस्थित हुए, जिसमंे उल्लेखनीय हैं- डॉ. सुरेन्द्र दुबे, डॉ. कुंजबिहारी शर्मा, गिरीश पंकज, सुशील यदु, बसंत दीवान, सतीश जायसवाल, शरद वर्मा, डॉ. सोनउराम निर्मलकर, डॉ. इलीना सेन, रूपेश तिवारी, वीरेन्द्र बहादुर सिंह, डॉ. पीसीलाल यादव, काविश हैदरी, युक्ता राजश्री झा, डॉ. शिखा बेहेरा, संज्ञा टण्डन, उमा महरोत्रा, डॉ. देवेशदत्त मिश्र, खुमान साव, डॉ. पंचराम सोनी, डॉ. सुधीर शर्मा, नारायण सिंह चन्द्राकर, डॉ. शैल शर्मा, सुखनवर हुसैन, मुकुंद कौशल, अशोक सिंघई, विनोद मिश्र, डॉ. महादेव प्रसाद पाण्डेय, आलोक देव, मृगेन्द्र सिंह, कमलाकांत शुक्ला, महेश निर्मलकर, श्याम कश्यप, सुशील भोले, डॉ. सुरेश कुमार शर्मा, शीतल शर्मा, लाल रामकुमार सिंह, मंगत रवीन्द्र, सनत तिवारी, डॉ. नरेश वर्मा, दलेश्वर साहू, लक्ष्मण पाल, डॉ. ऋषिराज पाण्डेय, डॉ, रेनु सक्सेना, महेश वर्मा, नीलू मेघ, अंबर शुक्ल, सुरेन्द्र मिश्र, नरेन्द्र यादव, महावीर अग्रवाल, जमुना प्रसाद कसार, आत्माराम कोशा, डॉ. प्रभंजन शास्त्री आदि।

संगोष्ठी के लिए प्राप्त लेखों की सूची निम्नानुसार है -

0 डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा, बिलासपुर - छत्तीसगढ़ी भाषा में व्यंजना
0 डॉ. बिहारीलाल साहू, रायगढ़ - छत्तीसगढ़ी भाषा की लोकाभिव्यंजकत 
0 डॉ. विनयकुमार पाठक, बिलासपुर - छत्तीसगढ़ी भाषा की व्यंजकता
0 डॉ. चितरंजन कर, रायपुर - छत्तीसगढ़ी भाषा-व्यंजकता
0 श्री चंद्रशेखर चकोर, कांदुल, रायपुर - छत्तीसगढ़ के पारंपरिक खेल
0 श्री प्रताप ठाकुर, बिलासपुर - छत्तीसगढ़ के खेल एवं बाल-गीत
0 श्री रामकुमार वर्मा, भिलाई - मनोरंजन और अभिव्यक्ति का प्रतीक छत्तीसगढ़ी ग्रामीण व                                                   बाल खेल
0 श्रीमती शान्ति यदु, रायपुर - छत्तीसगढ़ के खेल-बाल गीत
0 श्रीमती मृणालिका ओझा, रायपुर - सामाजिक जीवन के सांस्कृतिक झरोखे ‘बाल खेल’
0 डॉ. अनसूया अग्रवाल, महासमुन्द - छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक दर्शनः खेलगीत ‘फुगड़ी’
0 श्रीमती शकुन्तला तरार, रायपुर - लोक खेलों का संवर्धन आवश्यक
0 श्रीमती निरूपमा शर्मा, रायपुर - छत्तीसगढ़ के व्यंजन
0 डॉ. रत्नावली सिंह, बिलासपुर - छत्तीसगढ़ के पकवान
0 श्री रसिक बिहारी अवधिया, रायपुर - छत्तीसगढ़ के पारंपरिक व्यंजन
0 डॉ. सत्यभामा आड़िल, रायपुर - छत्तीसगढ़ की संत परंपरा
0 डॉ. देवीप्रसाद वर्मा, रायपुर - छत्तीसगढ़ की संत परंपरा
0 आचार्य रमेन्द्र नाथ मिश्र, रायपुर - छत्तीसगढ़ की संत परंपरा
0 श्री परदेशीराम वर्मा, भिलाई - छत्तीसगढ़ की संत परंपरा
0 डॉ. रामकुमार बेहार, रायपुर - संत परम्परा- स्वामी बलभद्र दास के विशेष संदर्भ में
0 डॉ. विमल कुमार पाठक, भिलाई - संत परम्परा- गुरू घासीदास का योगदान

इस अवसर पर पुस्तिका ‘छत्तीसगढ़ी अभिव्यक्ति - 2004’ का प्रकाशन भी किया गया।

Saturday, August 22, 2015

राजा फोकलवा


'राजा फोकलवा', नाटक के केन्द्रीय पात्र फोकलवा के राजा बन जाने की कहानी है। पूरे नाटकीय पेंचो-खम के साथ इस लोक कथा का प्रवाह महाकाव्यीय परिणिति तक पहुंचता है। फोकलवा अलमस्त, बेलाग और फक्कड़ है, दीन बेबस-सी लेकिन ममतामयी, स्वाभिमानी मां का इकलौता सहारा। इस चरित्र में राजसी लक्षण आरंभ से हैं, नेतृत्व, चुनौतियों का सामना करने का साहस, अपने निर्णय के क्रियान्वयन की इच्छा-शक्ति और उसके बालहठ में राजहठ की आहट भी। उसमें कुटिल चतुराई है तो बालमन की नादानी और निर्भीकता के साथ खुद को धार में झोंक देने का दुस्साहसी आत्मविश्वास भी। आम इंसानी कमी-खूबियों वाले इस चरित्र में विसंगत ट्रिगर होने वाला व्यवहार, कहानी में नाटक के रंग भरता है और यह चरित्र आत्मीय न बन पाने के बावजूद दर्शक की सहानुभूति नहीं खोता।

एक दिव्य सुंदर साड़ी और आभूषण- 'तोड़ा' जोड़े के प्रपंच में बार-बार नाटकीय मोड़ बांधे रखता है, दर्शक जैसे ही राग-विभोर होता है, 'सीन' में डूबता है, लय बदल जाती है। मधुरता कैसी और कितनी भी हो, देर तक बने रहने पर एकरसता बन जाती है। कहा जा सकता है कि कहानी में 'हू मूव्ड' वाले 'चीज' का ध्यान रखना, नाटककार के लिए भी अच्छा होता है। नाटक में अप्रत्याशित मोड़, बार-बार चमत्कृत करता है, रिमोट से चैनल-बदल के इस दौर की शायद एक आवश्यकता यह भी है, लेकिन पिछले प्रिय के छूट जाने पर नया बेहतर पाने की चाह दर्शक में जगाना और इस चाहत को पूरा कर पाना, नाटककार के लिए चुनौती होती है और यहां इसे बखूबी निभा लिया गया है।

अभिनेता की सब से बड़ी सफलता है, यदि लगे कि नाटक का चरित्र, उसे देख कर गढ़ा गया है, नायक हेमंत का 'अभिनय' इतना ही स्वाभाविक होता है, कि लगता है, वह इस पात्र से अलग कुछ हो ही नहीं सकता। यवनिका पात पर लगभग प्रत्येक दर्शक प्रशंसा भाव सहित फोकलवा को मंच-परे, उसकी वास्तविकता में देखना, देखे पर विश्वास-अविश्वास के द्वंद्व से उबरना चाहता है। इस चरित्र में नाचा के जोक्कड़ की छाप तो है ही, लेकिन यह हंसाने वाला विदूषक-मात्र नहीं, जिम्मेदार व्यंगकार जैसा भी है। छत्तीसगढ़ी की पहली और उस पूरे दौर की सबसे लोकप्रिय वीडियो फिल्म राकेश तिवारी की ही 'लेड़गा ममा' के नायक की झलक भी इस फोकलवा में है। पारंपरिक लोक-नाट्‌य के कलाकारों की सहजता, प्रत्युत्पन्न-मति और प्रतिभा, नाटक में सहज प्रवाहित है। वैसे भी आरंभिक मंचनों में इस नाटक की व्यवस्थित और पूरी लिखित कोई स्क्रिप्ट नहीं थी, शायद अब भी नहीं है, इससे नाटक की अनगढ़ता कभी इसकी कमजोरी लगती है तो कभी मजबूती और इसी से यह संभव होता है कि लगभग एक घंटे के इस नाटक की अवधि घटाई-बढ़ाई जा कर आसानी से आधी-दूनी हो जाती है।

गीत-संगीत, नाटक का प्रबल पक्ष है। पारंपरिक धुनों और गीतों का बेहतरीन इस्तेमाल हुआ है। परम्परानुकूल गणेश-वंदना के साथ करमा, ददरिया, बिहाव-भड़ौनी, राउत, देवार गीतों का प्रसंगानुकूल संयोजन, एक ओर दृश्य-स्थापन में सहायक होता है, नाटक को गति देता है, वहीं छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा की झलक भी दे देता है। 'फोकलवा के फो फो' शीर्षक गीत मन में बस जाने वाला है और नाटक पूरा होने के बाद भी कानों में गूंजता रहता है। यह सब इसीलिए संभव हुआ है कि लोककथा पर आधारित इस नाटक का लेखन, गीत, संगीत, गायन, निर्देशन एक ही व्यक्ति का है।

नाटक की भाषा की बात करें तो इस छत्तीसगढ़ी नाटक का प्रदर्शन दिल्ली में कुछ विदेशी दर्शकों के सामने हुआ, कलकत्ता के पास धुर बंगला दर्शकों ने भी इसे देखा और अन्य भाषा-भाषियों ने भी, लेकिन नाटक पूरा होने के बाद की प्रतिक्रिया ने हर बार तय किया कि इस नाटक की छत्तीसगढ़ी, अन्य को भी सहज ग्राह्य है। इस नाटक के किसी प्रदर्शन में मेरे साथ एक दर्शक, छत्तीसगढ़ी-अपरिचित, ठेठ हिन्दीभाषी थे, उन्होंने इस नाटक का पूरा आनंद उठाया। दो-तीन महीने बाद छत्तीसगढ़ी के सुगम-सुबोध होने की बात पर वे असहमत हुए तो मैंने राजा फोकलवा का जिक्र किया, उन्होंने याद करते हुए मानों खुद से सवाल किया- अच्छा, वह नाटक छत्तीसगढ़ी में था। इस संदर्भ में स्वाभाविक ही नया थियेटर और हबीब तनवीर याद आते हैं। नाचा शैली के उनके कई छत्तीसगढ़ी नाटकों ने भाषाई हर सीमा लांघते हुए देश-विदेश में धूम मचाई थी। यह भी उल्लेखनीय है कि इस नाटक के शुरुआती दौर में अपने रायपुर प्रवास के दौरान हबीब जी ने एक विशेष आयोजन में इसे देख कर, निर्देशक राकेश और नायक हेमंत की पीठ थपथपाई, आंखों में प्रशंसा-भाव की चमक थी लेकिन लगा कि उनके मन में है- काश, यह मैं खेलता।

यह कृति तिवारी जी की बहुमुखी प्रतिभा का सक्षम प्रतिनिधि है। इसकी कहानी मैंने पहले-पहल उन्हीं से सुनी थी और जब उन्होंने बताया कि वे इसे नाटक रूप देने वाले हैं, उनकी प्रतिभा का कायल होने के बावजूद, तब यह मुझे असंभव लगा था, लेकिन नाटक की पहली प्रस्तुति देखने के बाद मेरे लिए तय करना मुश्किल हो गया कि वे बेहतर नाटककार हैं या किस्सागो। संगीतकार, गीतकार, गायक या निर्देशक। इसके बाद मैंने इसकी दसियों प्रस्तुतियां देखी हैं, हर बार उतनी ही जिज्ञासा और रोमांच के साथ। राजा फोकलवा की सौवीं प्रस्तुति होने वाली है, इस मौके पर अब बस इतना कि इसकी शतकीय प्रस्तुति को तो देखना ही चाहूंगा और शायद आगे भी सौ बार देखना मेरे लिए अधिक न होगा।

टीप- 'राजा फोकलवा' नाटक का 100 वां मंचन, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर, रायपुर में आज 22 अगस्‍त 2015 को. इस अवसर पर प्रकाशित स्‍मारिका में मेरा लेख.

Monday, April 9, 2012

छत्तीसगढ़ी

बोली और भाषा में क्या फर्क है, लगभग वही जो लोक और शास्त्र में है। या कहें ज्‍यों कला का सहज-जात स्‍वरूप और मंचीय प्रस्‍तुतियां/आयोजन में या परम्‍परा-अनुकरण से सीख लिये और स्‍कूली कक्षाओं में सिखाए गए का फर्क। और यह उतना अनिश्चित भी माना जाता है, जितना नदी और नाला का अंतर। भाषा, मंदिर में पूजित विग्रह-मूर्ति का संग्रहालय में सज्जित और सम्मानित कर दिये जाने जैसा है, जबकि बोली ग्राम और लोक-देवताओं की तरह, जो कई बार अनगढ़, अनाकार, अनामित, मगर पूजित, श्रद्धा केंद्र होते हैं। श्रद्धालु अपनी गति-मति से अपना रिश्ता बनाए रखता है।

भाषा के लिए लिपि और व्याकरण अनिवार्य मान लिया जाता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वह पृथक लिपि हो और व्याकरण के बिना तो सार्थक अभिव्यक्ति, बोली हो या भाषा, संभव ही नहीं। हां! भाषा के लिए बोली की तुलना में मानकीकरण, शब्द भंडार और साहित्य अधिक जरूरी है। भाषा की आवश्‍यकता शास्‍त्र-रचना के लिए होती है। अभिव्‍यक्ति तो बोली से हो जाती है, साहित्‍य भी रच जाता है। वास्तव में बोली मनमौजी और कुछ हद तक व्‍यक्तिनिष्‍ठ होने से अधिक व्यापक होती है, वह संकुचित, मर्यादित और निर्धारित सीमा का पालन करते हुए भाषा के अनुशासन में बंधती है। बोली-भाषा की अपनी इस मोटी-झोंटी समझ में यह मजेदार लगता है कि अवधी, ब्रज 'भाषा' हैं और हिन्दी की पूर्वज, खड़ी 'बोली'। बोली, अधिक लोचदार भी होती है, शायद यह खड़ी-ठेठनुमा कम लोच वाली बोली, अपने खड़ेपन के कारण आसानी से भाषा बन गई।

फिलहाल यहां मामला छत्तीसगढ़ी का है और मैं चाहता हूं कि यह, भाषा के रूप में तो प्रतिष्ठित हो लेकिन उसका बोलीपन खो न जाए। पिछले दिनों खबर छपी- लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया गया है कि छत्तीसगढ़ी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव-अनुरोध छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से प्राप्त हुआ है। इसी तरह अंगिका, बंजारा, बजिका/बज्जिका, भोजपुरी, भोटी, भोटिया, बुंदेलखंडी, धात्की, अंग्रेजी, गढ़वाली (पहाड़ी), गोंडी, गुज्जर/गुज्जरी, हो, कच्चाची, कामतापुरी, कारबी, खासी, कोदवा (कूर्ग), कोक बराक, कुमांउनी (पहाड़ी), कुरक, कुरमाली, लेपचा, लिम्‍बू, मिजो (लुशाई), मगही, मुंडारी, नागपुरी, निकोबारी, पहाड़ी (हिमाचली), पाली, राजस्थानी, संबलपुरी/कोसली, शौरसेनी (प्राकृत), सिरैकी, तेंयिदी और तुलु भाषा के लिए भी प्रस्ताव मिले हैं। स्पष्ट किया गया है कि आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए कोई मानदंड नहीं बताए गए हैं और इन्हें अनुसूची में शामिल करने की कोई समय सीमा निश्चित नहीं है। इस तारतम्‍य में छत्तीसगढ़ी बोलते-लिखते-पढ़ते-सुनते-देखते रहा, उनमें से कुछ उल्लेखनीय को एक साथ यहां इकट्‌ठा कर देना जरूरी लगा।

डा. बलदेव प्रसाद मिश्र ने 'छत्‍तीसगढ़ परिचय' में लिखा है- सरगुजा जिले के कोरवा और बस्‍तर जिले के हलबा के साथ कवर्धा के किसी बैगा और सारंगगढ़ के किसी कोलता को बैठा दीजिए फिर इन चारों की बोली-बानी, रहन-सहन, रीति-नीति पर विचार करते हुए छत्‍तीसगढ़ीयता का स्‍वरूप अपने मन में अंकित करने का प्रयत्‍न कीजिये। देखिये आपको कैसा मजा आयेगा!

दंतेश्‍वरी मंदिर, दंतेवाड़ा, बस्‍तर वाला 23 पंक्तियों का शिलालेख छत्तीसगढ़ी का पहला अभिलिखित नमूना माना जाता है। शासक दिकपालदेव के इस लेख में संवत 1760 की तिथि चैत्र सुदी 14 से वैशाष वदि 3 अंकित है, गणना कर इसकी अंगरेजी तिथि समानता 31 मार्च, मंगलवार और 4 अप्रैल, शनिवार सन्‌ 1702 निकाली गई है। लेख की भाषा को विद्वान अध्‍येताओं द्वारा हिन्‍दी कहीं ब्रज और भोजपुरी प्रभाव युक्‍त, छत्‍तीसगढ़ी मिश्रित हिन्‍दी तो कहीं बस्‍तरी भी कहा गया है। यह मानना स्‍वाभाविक लगता है कि छत्‍तीसगढ़ में भी ब्रज का प्रभाव कृष्‍णकथा (भागवत और लीला-रहंस) से और अवधी का प्रभाव रामकथा (नवधा, रामसत्‍ता) परम्‍परा से आया है और लिखी जाने वाली छत्‍तीसगढ़ी अपने पुराने रूप में अधिक आसानी से पूर्वी हिन्‍दी समूह के साथ निर्धारित की जा सकती है।

यह भी उल्‍लेख रोचक होगा कि लेख वस्तुतः साथ लगे संस्कृत शिलालेख का अनुवाद है, इस तरह अनुवाद वाले उदाहरण भी कम हैं और लेख में कहा गया है कि कलियुग में संस्‍कृत बांचने वाले कम होंगे इसलिए यह 'भाषा' में लिखा है। लेख का अन्य संबंधित विषय स्वयं स्पष्ट है -
शिलालेख का फोटो और उसी का छापा 
दंतावला देवी जयति॥ देववाणी मह प्रशस्ति लिषाए पाथर है महाराजा दिकपालदेव के कलियुग मह संस्कृत के बचवैआ थोरही हैं ते पांइ दूसर पाथर मह भाषा लिखे है। ... ... ... ते दिकपालदेव विआह कीन्हे वरदी के चंदेल राव रतनराजा के कन्या अजवकुमरि महारानी विषैं अठारहें वर्ष रक्षपाल देव नाम जुवराज पुत्र भए। तव हल्ला ते नवरंगपुरगढ़ टोरि फांरि सकल वंद करि जगन्नाथ वस्तर पठै कै फेरि नवरंगपुर दे कै ओडिया राजा थापेरवजि। पुनि सकल पुरवासि लोग समेत दंतावला के कुटुम जात्रा करे सम्वत्‌ सत्रह सै साठि 1760 चैत्र सुदि 14 आरंभ वैशाष वदि 3 ते संपूर्न भै जात्रा कतेकौ हजार भैसा वोकरा मारे ते कर रकत प्रवाह वह पांच दिन संषिनी नदी लाल कुसुम वर्न भए। ई अर्थ मैथिल भगवान मिश्र राजगुरू पंडित भाषा औ संस्कृत दोउ पाथर मह लिषाए। अस राजा श्री दिकपालदेव देव समान कलि युग न होहै आन राजा।

रायपुर के कलचुरि शासक अमरसिंघदेव का कार्तिक सुदि 7 सं. 1792 (सन 1735) का आरंग ताम्रपत्रलेख का सम्‍मुख और पृष्‍ठ भाग, जिससे छत्‍तीसगढ़ की तत्‍कालीन दफ्तरी भाषा का अनुमान होता है।
यह ध्‍यान में रखते हुए कि लिखने और आम बोल-चाल की भाषा में फर्क स्‍वाभाविक है, संदर्भवश मात्र उल्‍लेखनीय है कि पुरानी छत्‍तीसगढ़ी के नमूनों में कार्तिक सुदी 5 सं. 1745 (सन 1688) का कलचुरि राजा राजसिंहदेव के पिता राजा तख्‍तसिंह द्वारा अपने चचेरे भाई रायपुर के राजा श्री मेरसिंह को लिखे पत्र (जिसकी नकल पं. लोचनप्रसाद पांडेय ने कलचुरि वंशज बड़गांव, रायपुर के श्री रतनगोपालसिंहदेव के माध्‍यम से प्राप्‍त की थी) और संबलपुर के दो ताम्रपत्रों (दोनों में 80 वर्ष का अंतर और जिसमें पुराना सन 1690 का बताया जाता है) का जिक्र होता है।

उज्‍ज्‍वल पक्ष है कि छत्‍तीसगढ़ी का व्‍यवस्थित और वैज्ञानिक व्‍याकरण सन 1885 में तैयार हो चुका था। जार्ज ग्रियर्सन ने भाषाशास्‍त्रीय सर्वेक्षण में इसी व्‍याकरण को अपनाते हुए इसके रचयिता हीरालाल काव्‍योपाध्‍याय के उपयुक्‍त नामोल्‍लेख सहित इसे सन 1890 में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल की शोध पत्रिका में अनूदित और सम्‍पादित कर प्रकाशित कराया। पं. लोचन प्रसाद पाण्‍डेय द्वारा, रायबहादुर हीरालाल के निर्देशन में तैयार किए गए इस व्‍याकरण को, सेन्‍ट्रल प्राविन्‍सेस एंड बरार शासन के आदेश से सन 1921 में पुस्‍तकाकार प्रकाशित कराया गया।

छत्‍तीसगढ़ राज्‍य गठन के बाद न्यायालय श्रीमान न्यायाधिपति उच्च न्यायालय, जिला बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के विविध क्रिमिनल याचिका क्र. 2708/2001 में याचिकाकर्ता श्रीमति हरित बाई, जौजे श्री मेमलाल, उम्र लगभग 30 वर्ष, साकिन ग्राम कुर्रू, थाना अभनपुर तह/जिला रायपुर (छ.ग.) विरुद्ध छत्तीसगढ़ शासन, द्वारा - थाना अभनपुर, तहसील व जिला रायपुर (छ.ग.) अपराध क्रमांक- 210/2001 में आवेदन पत्र अन्तर्गत धारा 438 दण्ड प्रक्रिया संहिता - 1973 अग्रिम जमानत बाबत, निम्नानुसार आदेश हुआ-
दिनांक 8.1.2002
आवेदिका कोति ले श्री के.के. दीक्षित अधिवक्ता,
शासन कोति ले श्री रणबीर सिंह, शास. अधिवक्ता
बहस सुने गइस। केस डायरी ला पढ़े गेइस
आवेदिका के वकील हर बताइस के ओखर तीन ठन नान-नान लइका हावय। मामला ला देखे अऊ सुने से ऐसन लागत हावय के आवेदिका ला दू महिना बर जमानत मा छोड़ना ठीक रही।
ऐही पायके आदेश दे जात है के कहुँ आवेदिका ला पुलिस हर गिरफ्तार करथे तो 10000/- के अपन मुचलका अऊ ओतके के जमानतदार पुलिस अधिकारी लंग देहे ले आवेदिका ला दू महीना बर जमानत मे छोड़ देहे जाय।
आवेदिका हर ओतका दिन मा अपन स्थाई जमानत के आवेदन दे अऊ ओखर आवेदन खारिज होए ले फेर इहे दोबारा आवेदन दे सकथे।
एखर नकल ला देये जाये तुरन्त

यहां एक अन्य शासकीय दस्तावेज, संयोगवश यह भी अभनपुर तहसील के कुर्रू से ही संबंधित है। इस अभिलेख में कानूनी भाषा और अनुवाद की सीमा के बावजूद बढि़या छत्‍तीसगढ़ी इस्‍तेमाल हुई है। यह तारीख 10/12/2007 बिक्रीनामा है, जिसे ''बीकरी-नामा'' लिखा गया है। इसी अभिलेख से-
बेचैया के नावः- 1/ चिन्ताराम उम्मर 65 बछर वल्द होलदास जात सतनामी रहवैया गांव जेवरा डाकघर- जेवरा थाना बेमेतरा अउ तहसील बेमेतरा जिला- दुरूग (छ.ग.)

परचा के नं -पी-202328

लेवाल के नावः- 1/ फेरूलाल उम्मर 65 बछर वल्द भकला जात -सतनामी रहवैया गांव पचेड़ा डाकघर - कुर्रू अउ तहसील - अभनपुर जिला- रायपुर (छ.ग.)।

बीकरी होये भुईंया के सरकारी बाजारू दाम बरोबर चुकाय गे हाबय। पाछु कहु बाजारू दाम कोनो कारन कम होही ते लेवाल ह ओला देनदार रईही बीकरी नामा मा सब्बो बात ल सुरता करके ईमान धरम से लिखवाये हावन लबारी निकले मा मै लेवाल देनदार रईही। बीकरी होय भुईंया हा शासन द्वारा भु दान म दे गे भुईंया नो हय। छ0ग0भू0रा0सं0 मा बनाये कानुन के धारा 165/6 अउ 165/7 के उलंघन नई होवत हे। सिलिंग कानुन के उलंघन नई होवत हे। बीकरी करे गे भुईंया हा- सीलींग अउ सरकारी पट्‌टा दार भुईंया नो है , बीकरी करे भुईंया मा कोनो जात के एकोठन रूख नईये। निमगा खेती किसानी के भुईंया आय। बीकरी करेगे भुमि मा तईहा जमाना से ले के आज तक खेती किसानी ही करे जावत हे। बीकरी शुदा भुईंया हा आज के पहीली कखरो मेर रहन या गहन नहीं रखे गेहे।

छत्तीसगढ़ी की वैधानिक स्थिति की चर्चा के पहले उसके मरम-धरम में रंगे-पंगे बद्रीसिंह कटरिया जी जैसे कुछ सुहृद-बुजुर्गों से सुनी बातें याद आती हैं-

ससुर खाना खाने बैठे, पानी-पीढ़ा जरूरी। बहू पहेली बुझाते अनुमति चाहती है-
‘बाप पूत के एके नांव, नाती के नांव अवरू।
ए किस्सा ल जान ले ह, तओ उठाह कंवरू।।
ससुर उसी तरह जवाब देते हैं-
जेकर पिए महिंगल होय, अउ चलावै घानी।
ए किस्सा ल जान ले ह, त ओ जाह पानी।
आशय कि खाना परोसते बहू देखती है कि पानी नहीं है, कहती है बाप और पूत का नाम एक (महुआ) मगर पोते का और कुछ (डोरी/टोरी- महुआ का फल), यह बूझ लें, तब कौर उठावें। ससुर जवाब में पहेली का हल उसी तरह बताते हुए पानी ले कर आने की अनुमति देते हैं कि जिसके पीने से व्यक्ति हाथी की तरह मतवाला हो जाता है (महुआ) और उसके लिए घानी चलती है (महुआ का फल-डोरी), यह बूझते पानी ले आओ।

बरसात, पनिहारिन और पानी पर बुझौवल है, जो कामुक नायक-नायिका के बीच हुए संवाद की तरह जान पड़ता है-
जात रहें तोर बर, भेंट डारें तो ला (छेंक ले हे मो ला)।
जाए दे तैं मो ला, ले आहंव तो ला।
बात कुछ इस तरह कि तुम्हारे लिए (पानी लेने के लिए) जा रही थी, रास्ते में तुम मिल गए, (बरसात ने) रास्ता रोक लिया, मुझे जाने दो गे, तो तुम्हें ले आऊंगी।

एक सवाल-जवाब इस तरह होता है-
‘दोसी अस न दासी, तैं का बर लगे फांसी।
नाचा ए न पेखन, तैं का ल आए देखन।
जिव जाही मोर, फेर मांस खाही तोर।‘
शिकारी ने बगुला फंसाने के लिए फिटका (फंदा) लगाया है और उसमें बतौर चारा, घुंइ को बांध रखा है। बगुला घुंइ को खाने के लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है, उसके मन में कुछ संदेह भी है, घुंइ से पूछता है कि तुम न दोषी हो न दासी, फिर इस तरह क्यों बंधी-फंसी हो। घुंइ जवाब देती है, यहां नाचा हो रहा है न पेखन (प्रेक्षण, कोई प्रदर्शन), फिर तुम क्या देखने चले आए और आगाह करती है, तुम मुझे खाना चाहते हो तो मेरी जान जाएगी, मगर (शिकारी) तुम्हारा मांस खाएगा।

शिकारी के जाल और पक्षियों का एक मार्मिक प्रसंग यह भी-
तीतुर फंसे, घाघर फंसे, तूं का बर फंस बटेर।
मया पिरित के फांस म आंखी ल दिएं लड़ेर।
शिकारी ने चिड़िया फंसाने के लिए जाल बिछाया। वापस आ कर देखता है कि उसमें तीतर, घाघर जैसी सामान्य आकार की चिड़िया फंस गईं हैं, मगर छोटे आकार का बटेर भी है, जो आसानी से जाल के छेद से बाहर निकल सकता था तो बटेर से पूछता है, तीतर-घाघर फंसे, लेकिन तुम कैसे फंस गए हो। साथ-साथ चरने वाले बटेर का जवाब कि तुम्हारे बिछाए जाल में नहीं, मैं तो साथी चिड़ियों के प्रेम-प्रीत में (कैसे साथ छोड़ दूं) आंखें बंद कर पड़ गया हूं।

छत्‍तीसगढ़ विधान सभा में शुक्रवार, 30 मार्च, 2001 को अशासकीय संकल्‍प सर्व सम्‍मति से स्‍वीकृत हुआ- ''यह सदन केन्‍द्र सरकार से अनुरोध करता है कि संविधान के अनुच्‍छेद 347 के तहत छत्‍तीसगढ़ी बोली को छत्‍तीसगढ़ राज्‍य की सरकारी भाषा के रूप में शासकीय मान्‍यता दी जाए।'' तथा पुनः शुक्रवार, 13 जुलाई, 2007 को अशासकीय संकल्‍प सर्व सम्‍मति से स्‍वीकृत हुआ- ''यह सदन केन्‍द्र सरकार से अनुरोध करता है कि छत्‍तीसगढ़ प्रदेश में बोली जाने वाली छत्‍तीसगढ़ी भाषा को संविधान के अनुच्‍छेद 347 के तहत राज्‍य की सरकारी भाषा के रूप में मान्‍यता दी जाय।''

छत्‍तीसगढ़ राजभाषा अधिनियम, 1957 (क्रमांक 5 सन् 1958), (मूलतः मध्‍यप्रदेश राजभाषा अधिनियम, जो अनुकूलन के फलस्‍वरूप इस तरह कहा गया है) में ''राज्‍य के राजकीय प्रयोजनों के लिए राजभाषा'' में लेख है कि ''एतद्पश्‍चात् उपबंधित के अधीन रहते हुए हिन्‍दी, उन प्रयोजनों के अतिरिक्‍त, जो कि संविधान द्वारा विशेष रूप से अपवर्जित कर दिये गये हैं, समस्‍त प्रयोजनों के लिए तथा ऐसे विषयों के संबंध में, के अतिरिक्‍त जैसे कि राज्‍य-शासन द्वारा समय-समय पर अधिसूचना द्वारा उल्लिखित किये जाएं, राज्‍य की राजभाषा होगी।''
इसी राजपत्र में यह भी उल्‍लेख है कि ''मध्‍यप्रदेश आफिशियल लैंगवेजेज एक्‍ट, 1950 (मध्‍यप्रदेश की राजभाषाओं का अधिनियम, 1950) (क्रमांक 24, सन् 1950 तथा मध्‍यभारत शासकीय भाषा विधान, संवत् 2007 (क्रमांक 67, सन् 1950) निरस्‍त हो जाएंगे।''

छत्तीसगढ़ विधानसभा में 28 नवंबर 2007 को छत्तीसगढ़ी राजभाषा विधेयक पारित हुआ, इसके पश्‍चात शुक्रवार, 11 जुलाई 2008 के छत्‍तीसगढ़ राजपत्र में छत्‍तीसगढ़ राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 2007 को और संशोधित करने हेतु अधिनियम आया कि ''छत्‍तीसगढ़ राज्‍य के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्‍त की जाने वाली भाषा के रूप में हिन्‍दी के अतिरिक्‍त छत्‍तीसगढ़ी को अंगीकार करने के लिए उपबंध करना समीचीन है.'' और इसके द्वारा मूल अधिनियम में शब्‍द ''हिन्‍दी'' के पश्‍चात् ''और छत्‍तीसगढ़ी'' अंतःस्‍थापित किया गया। इसमें यह भी स्‍पष्‍ट किया गया है कि- ''छत्‍तीसगढ़ी'' से अभिप्रेत है, देवनागरी लिपि में छत्‍तीसगढ़ी।'' सन 2013 में 11 जुलाई को ही शासन ने अधिसूचना जारी कर प्रतिवर्ष 28 नवंबर को ‘‘छत्तीसगढ़ी राजभाषा दिवस‘‘ घोषित किया है।

तीन-एक साल पहले प्रकाशित पुस्‍तक, जिसमें ''दंतेवाड़ा के छत्‍तीसगढ़ी शिलालेख'' बताते हुए कोई अन्‍य चित्र, 1703 (शिलालेख का काल?, जो वस्‍तुतः सन 1702 है) अंक सहित छपा है।

नन्‍दकिशोर शुक्‍ल जी, पिछले चार-पांच साल में अपने निजी संसाधनों और संगठन क्षमता के बूते, लगातार सक्रिय रहते 'मिशन छत्‍तीसगढ़ी' के पर्याय बन गए हैं, कुछ गंभीर असहमतियों के बावजूद उनके ईमानदार जज्‍बे और जुनून का मैं प्रशंसक हूं।

दक्षिण भारत के मेरे एक परिचित ने मुझे अपने परिवार जन से छत्‍तीसगढ़ी में बात करते सुना तो यह कहकर चौंका दिया कि लगभग साल भर यहां रहते हुए उनका छत्तीसगढ़ी से परिचय मोबाइल के रिकार्डेड संदेश और रेल्वे प्लेटफार्म की उद्‌घोषणा के माध्यम से हुआ जितना ही है तब लगा कि अस्मिता को जगाए-बनाए रखने के लिए गोहार और हांक लगाने का काम, अवसरवादी स्तुति-बधाई गाने वालों, माइक पा कर छत्तीसगढ़ी की धारा प्रवाहित करने वालों और उसे छौंक की तरह, टेस्ट मेकर की तरह इस्तेमाल करने वालों से संभव नहीं है। विनोद कुमार शुक्‍ल जी की कहावत सी पंक्ति में- ''छत्‍तीसगढ़ी में वह झूठ बोल रहा है। लबारी बोलत है।'' तसल्ली इस बात की है कि छत्तीसगढ़ की अस्मिता के असली झण्डाबरदार ज्यादातर ओझल-से जरूर है लेकिन अब भी बहुमत में हैं। छत्‍तीसगढ़ी के साथ छत्तीसगढ़ की अस्मिता उन्हीं से सम्मानित होकर कायम है और रहेगी।

पुनश्‍चः
लगता है अखबार (16 अप्रैल 2012) की नजर इस पोस्‍ट पर पड़ी है।

इसका मुख्‍य अंश मेरी सहमति से, 19 अप्रैल 2012 को जनसत्‍ता, नई दिल्‍ली के संपादकीय पृष्‍ठ पर ब्‍लाग के उल्‍लेख सहित प्रकाशित हुआ है।

Tuesday, April 12, 2011

बस्‍तर में रामकथा

सन 1998 में रामकथा के तीन ग्रंथों का प्रकाशन मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क विभाग से हुआ। क्रम से नाम लें तो हलबी रामकथा, माड़िया रामकथा और मुरिया रामकथा। ग्रंथों के सम्पादक प्रोफेसर हीरालाल शुक्ल हैं तथा हलबी रामायण में उनके नाम के साथ संग्राहक और अनुवादक भी उल्लिखित है। ग्रंथ में छपा है मूल्य : आदिवासियों में निर्मूल्य वितरण। वैसे तो सेंटीमीटर और ग्राम में माप-तौल भी हो सकती है, लेकिन किसी ग्रंथ का ऐसा तथ्‍य-आग्रही मूल्य-महत्व बताना वाजिब नहीं, सो भारी-भरकम इन ग्रंथों का आकार कल्याण के विशेषांक जैसा और पृष्ठ संख्‍या क्रमशः 688, 454 और 644 है।
प्रथम खण्ड माड़िया रामकथा (कोयामाटते रामना पाटा-वेसोड़) लिंगो ना वेहले पाटा (गोंडी रामकथा मंजूषा) के लिए कहा गया है कि यह ''रामकथा'' बस्तर की माड़िया-जनजातियों की वाचिक परम्परा की पुनर्रचना है। यह भी बताया गया है कि बस्तर की माड़िया जनजाति दो वर्गों में विभाजित है- अबुझमाड़ की अबुझमाड़िया, तथा दक्षिण बस्तर की दंडामी माड़िया।

अबुझमाड़िया तथा दंडामी माड़िया यद्यपि जातीय नाम से समान हैं, किन्तु इनकी बोलियां आपस में दुर्बोध हैं। अबुझमाड़िया मुरिया के बहुत अधिक निकट है। कोई भी मुरिया अबुझमाड़िया को आसानी से समझ सकता है, किन्तु किसी दंडामी माड़िया के लिए अबुझमाड़िया एक अबूझ पहेली है।

प्रो. हीरालाल शुक्ल
संपादक ने स्पष्ट किया है कि- ''रामकथा की पुनर्रचना के लिए सबसे पहले मैंने इनके मौखिक साहित्य में व्याप्त रामकथा के संदर्भों का संकलन किया था और तदुपरांत टूटी हुई कड़ियों का तुलसीदास के रामचरितमानस के प्रसंग में ढालने का प्रयास किया।''

ग्रंथ की भूमिका में यह उपयोगी और रोचक स्पष्टीकरण है कि गोंडी की सभी बोलियों में लोकगीत के लिए पाटा शब्द समान रूप से प्रचलित है। लोककथाओं के यहां तीन रूप मिलते हैं-
(क) सामान्य कथा के लिए अबुझमाड़िया में पिटो, दंडामी माड़िया में वेसोड़, तथा दोर्ली में शास्त्रम शब्द प्रचलित है। 
(ख) पौराणिक और धार्मिक कथाओं के लिए दंडामी माड़िया तथा दोर्ली में पुरवान शब्द प्रचलित है, जो पुराण का ही अपभ्रंश प्रतीत होता है।
(ग) दंडामी माड़िया में वेसोड़ किसी कथा का वाचक है, जबकि दोर्ली में यह गीतकथा का उपलक्षक है। दंडामी माड़िया में गीतकथा के लिए पाटा-वेसोड़ शब्द प्रचलित है।

द्वितीय खण्ड मुरिया-रामचरितमानस लिंगोना वेहले पाटा (गोंडी रामकथा मंजूषा) में संपादक के अनुसार वे लगभग तीन दशकों तक मुरिया समाज में रामचरितमानस के गोंडी प्रारूप पर घोटुल के युवक-युवतियों के साथ बैठकर 'पाटा' बनाते रहे। उन्हीं के शब्दों में ''मैं इन युवक-युवतियों को मुरिया गोंडी में रामचरितमानस का अर्थ समझाता और अपने आशु कवित्व के कारण ये शीघ्र पाटा पारने लगते। दो दशक के बाद समूचे रामचरितमानस का इसीलिए (सन 1977 में) मुरिया में अनुवाद संभव हो सका।'' इसके साथ मुरिया रामकथा के 36 लोक-गायकों और 4 गायिकाओं की सूची दी गई है।

हलबी रामकथा की भूमिका में संपादक का कथन है- ''1962 से 1992 के मध्य तीन दशकों तक मेरे द्वारा सम्पादित प्रेरित या लिखित अब तक दर्जनों ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें रामकथा, गुंसाई-तुलसीदास तथा हलबी-रामचरित मानस (अक्षरशः सम्पूर्ण अनुवाद) उल्लेखनीय है। प्रस्तुत ''हलबी-रामकथा-मंजूषा'' में अब तक अप्रकाशित शेष रचनाओं का संग्रह है।

हलबी रामकथा के संपादकीय का अंश है-
''रामचरितमानस'' भारतीय-साहित्यचो अनुपम गंगा आय। एचो अमरुतचो सुआदके सियान-सजन, माई-पीला पातो एसत। एचो थाहा पाउक नी होय। एचो खोलने, गड़ेयाने डुबकी मारुन गियानचो रतन पाउन-पाउन कितरोय लोग सवकार होते एसत।

ए बड़े हरिकचो गोठ आय कि हलबी 'रामचरित' असन मौंकाने मुर होयसे, जे मौंकाने आमचो देश आजादी चो '50वीं बरिसगांठ' मनाएसे। 'रामचरितमानस' चो लिखलो 500 बरख पूरली।

मके बिसवास आसे कि ए किताबचो अदिक चलन होयदे। बस्तरचो बनवासी-रयतचो सांस्कृतिक भूक बुतातो उवाटने ए पोथी खिंडिक बले साहा होली जाले, आजादीचो 50वीं बरिसगांठ चो भाइग होली समझा।

पश्‍च-लेखः

ऊपर का लगभग पूरा हिस्सा इन ग्रंथों से लिया गया है। अब कुछ अपनी बात। वैसे तो थोड़ा कान खुला रखने वाले हिंदीभाषी के लिए समझना मुश्किल नहीं, फिर भी हलबी वाले पहले पैरा का अनुवाद इस तरह होगा-

रामचरितमानस भारतीय साहित्य की अनुपम गंगा है। इसके अमृत का स्वाद बड़े-बुजुर्ग, अबाल-वृद्ध पाते रहते हैं। इसकी थाह पाई नहीं जाती। इसकी गहराई में उतर कर, डुबकी मार के (लगाकर), ज्ञान का रत्न पा-पाकर कितने ही लोग साहूकार (सम्पन्न) होते रहते हैं।

भाषाई दृष्टि से अर्द्ध-मागधी या पूर्वी हिंदी की एक जबान (यहां तकनीकी-पारिभाषिक प्रयोजन न होने के कारण भाषा, बोली, उपभाषा के बजाय 'जबान' से काम चलाने का प्रयास है) छत्तीसगढ़ी है। छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी के साथ उत्तरी भाग में सरगुजिया और दक्षिण में हलबी स्वरूप, व्यापक और लगभग संपूर्ण संपर्क माध्यम है। पेवर छत्तीसगढ़ी (ठेठ-खांटी छत्तीसगढ़ी में शुद्ध के लिए शायद अंगरेजी 'प्योर' का अपभ्रंश पेवर शब्द प्रचलित है) या मध्य मैदानी छत्तीसगढ़ की जबान में भोजपुरी-मगही स्वाद लिए सरगुजिया (सादों या सादरी सहित) और मराठी महक व उड़िया छौंक वाली हलबी की भाषाशास्त्रीय विविधता रोचक है ही, इनकी वाचिक परम्परा के रस से थोड़ा परिचित होते ही, अरसिक भी इनमें ऊभ-चूभ होने लगता है। अपनी कहूं तो पहली जबान छत्तीसगढ़ी के बाद दोनों मौसियों सरगुजिया और हलबी से परिचित होने पर मुझे मातृभूमि पर सकारण गर्व होने लगा और भारतमाता के समग्र सांस्कृतिक रूप का कुछ अनुमान हो पाया।

त्वरित संदर्भ के लिए यह कि बस्तर अंचल पौराणिक-ऐतिहासिक दण्डकारण्य और महाकान्तार के नाम से जाना जाता था। पूर्व रियासत बस्तर का मुख्‍यालय आज की तरह ही जगदलपुर रहा, वैसे पुरातात्विक प्रमाणयुक्त बस्तर नाम का एक छोटा गांव भी जगदलपुर के पास ही है। रियासत के बाद बस्तर जिला, फिर संभाग बना। फिर उत्तरी बस्तर कांकेर जिला बना और दक्षिणी हिस्सा दंतेवाड़ा। सन 2007 से बीजापुर और नारायणपुर जिलों के गठन के बाद, अब 18 जिलों और 4 संभाग वाले छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर संभाग में 6, सरगुजा में 4, बिलासपुर में 3 तथा बस्तर संभाग में 5 जिले हैं।

कुछेक विद्वान रावण की लंका को बस्तर में ही मानते हैं। बस्तर के भाषाई-सांस्कृतिक सेतु स्वरूप इस ग्रंथ की तैयारी और प्रकाशन के दौरान न सिर्फ इसकी खोज-खबर रही, बल्कि एकाध अवसर पर मैंने सेतुबंध की गिलहरी-सा उत्साह भी महसूस किया था, वह आज रामनवमी पर याद कर रोमांचित हूं।

श्री हरिहर वैष्‍णव द्वारा ई-मेल से बस्‍तर में रामकथा पर प्राप्‍त महत्‍वपूर्ण सूचना (टिप्‍पणी के रूप में प्रकाशित) तथा दो छायाचित्र नीचे लगाए गए हैं -