- तुलसीदास
# संसकिरत है कूप जल, भाखा बहता नीर
- कबीर
# देसिल बयना सब जन मिट्ठा
- विद्यापतिे
# निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
- भारतेन्दु
इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसी बातें अपनी, देसी भाखा के पक्षधरों की हैं, मगर क्या संस्कृत के विरोध में हैं? कुबेरनाथ राय अपने निबंध ‘भाषा बहता नीर‘ में मानों इस सवाल का जवाब देते, स्पष्ट करते हैं- ‘संस्कृत भाषा कूप जल‘ का संबंध भाषा, साहित्य से है ही नहीं। यह वाक्यांश पुरोहित तंत्र के खिलाफ ढेलेबाजी भर है जिसका प्रतीक थी संस्कृत भाषा।‘ यही बात तुलसी के कथन पर भी लागू है, वही तुलसी मानस के सातो कांडों का आरंभ संस्कृत मंगलाचरण से होता है औैर सातवें-अंतिम उत्तरकांड का समापन ‘भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम्‘ जैसी बात सहित दो संस्कृत श्लोकों से होता है। मगर वहीं ‘मांग के खाइबो, मसीत में साइबो‘ कहते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि उनकी उपरोक्त बात संस्कृत का आड़ ले कर भ्रमित करने वालों के खिलाफ कही गई है न कि संस्कृत के लिए।
निरुक्त और पाणिनी के हवाले से बताया जाता है कि ‘भाषा‘ शब्द, वैदिक भाषा के विपरीत प्रचलित लोकभाषा का द्योतक है। अथर्ववेद के प्रसिद्ध पृथिवी सूक्त का अंश, जहां भाषा की विविधता में भेद-भाव नहीं है- जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्। सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती।। यानी ‘विविध भाषाएँ बोलने वाले और विविध धर्मों (संस्कृति, आचार-विचार) को मानने वाले लोगों को, एक घर (परिवार) की तरह, जो पृथ्वी धारण करती है (पोषण करती है), वह स्थिर और सहनशील गाय की तरह, हमें धन की हज़ारों धाराएँ (समृद्धि) प्रदान करे।‘
परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणी में परा तो परे ही है, पश्यन्ती, वह जिसे ‘देखा‘ गया, ज्यों वैदिक ऋचाएं (श्रुति), अपरिवर्तनीय- सत्य, अहिंसा, तप, त्याग, दया, संतोष आदि जैसे मानवीय मूल्य, ‘सच बोलो, सच तोलो‘ जैसी, ज्यों गांधी के ‘हिंद स्वराज‘ में निहित भाव। इसके बाद मध्यमा, जहां विचार शब्दों में ढलने लगें (स्मृति), देश-काल-पात्र के साथ बदलने वाली, कब, कहां, कैसे के विचार वाली, ज्यों गांधी की आत्मकथा और फिर वैखरी, मुख से बोली और कान से सुनी जा सकने वाली सार्थक ध्वनि-शब्द (न्याय), ज्यों, गांधी के पत्र-भाषण आदि, जिसके लिए वे कहते कि उनमें विसंगति हो तो बाद में कही गई बात को मानें।
राजशेखर की काव्यमीमांसा का उद्धरण- ‘पुत्रात्पराजयो द्वितीयं पुत्रजन्म‘ सरस्वती अपने पुत्र काव्य पुरुष को गोद में लेकर कहती हैं- यद्यपि मैं संपूर्ण वांग्मय की जननी हूं, फिर भी तुमने संस्कृत में छन्दोमयी वाणी के प्रयोग द्वारा मुझे परास्त कर दिया है ... अपने पुत्र से परास्त होना द्यितीय पुत्र की उपलब्धि के समान आनंदकारक होता है। यहीं आगे आया है- ‘शब्दार्थौ ते शरीरं, संस्कृतं मुखं, प्राकृतं बाहू ...‘ शब्द और अर्थ तेरे शरीर है। संस्कृत-भाषा मुख है। प्राकृत भाषाएँ तेरी भुजाएँ है। अपभ्रंश भाषा जंघा है। पिशाच-भाषा चरण है और मिश्र-भाषाएँ वक्ष स्थल है। ... रस तेरी आत्मा है। छन्द तेरे रोम है। प्रश्नोत्तर, पहेली, समस्या आदि तेरे वाग्विनोद हैं और अनुप्रास, उपमा आदि तुझे अलंकृत करते हैं।
रहीम ने ‘खेटकौतुकम्‘ का पहला श्लोक संस्कृत में रचा है, इसके बाद के पदों के लिए, दूसरे पद में कहते हैं है- ‘फारसीयपदमिश्रतग्रन्थाः खलु पण्डितैः कृताः पूर्वैः। सम्प्राप्य तत्पदपथं करवाणि खेटकौतुकं पद्यैः।।‘ यानी पूर्वाचार्यों ने फारसी शब्दों से मिला हुआ संस्कृत पद्मों में विविध प्रकार के ग्रन्थों का निर्माण किया है। मैं (खानखाना नब्बाब) भी उन्हीं के चरणपथ का अवलम्बन करके उसी तरह फारसी से मिले हुए संस्कृत श्लोकों में ‘खेटकौतुक‘ नामक ग्रन्थ की रचना करता हूँ। दक्षिण भारतीय परंपरा में इसे मणिप्रवाल शैली (मोती और मूंगा) कहा जाता है। रहीम के ऐसे भाषा-कौतुक का एक उदाहरण है- ‘एकस्मिन् दिवसावसानसमये मैं था गया बाग में, काचित् तत्र कुरङ्गबालनयना गुल तोड़ती थी खड़ी। तां दृष्ट्वा नवयौवनां शशिमुखीं मैं मोह में जा पड़ा, तत्सीदामि सदैव मोहजलधौ हा दिल गुजारे शुकर।।
हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं- 'सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। ... सहज मनुष्य ही सहज भाषा बोल सकता है।' और सुमित्रानन्दन पन्त बताते हैं- 'भाषा संसार का नादमय चित्र है, ध्वनिमय-स्वरूप है। यह विश्व के हृत्तन्त्री की झंकार है, जिसके स्वर में वह अभिव्यक्ति पाता है। विश्व की सभ्यता के विकास तथा ह्रास के साथ वाणी का भी युगपद् विकास तथा ह्रास होता है। भिन्न-भिन्न भाषाओं की विशेषताएँ, भिन्न भिन्न जातियों तथा देशों की सभ्यता की विशेषताएँ है। संस्कृत की देव-वीणा में जो आध्यात्मिका-संगीत की परिपूर्णता है यह संसार की अन्य शब्द-तन्त्रियों में नही, और पाश्चात्य साहित्य के विशदयन्त्रालय में जो विज्ञान के कल-पुर्जों की विचित्रता, बारीकी तथा सजधज है, वह हमारे भारती-भवन में नहीं।'
भाषा-बहुलता के संदर्भ में हिंदी के कुछ साहित्यकार, जिनकी बेहतर पकड़ अन्य भाषाओं पर रही है- भारतेन्दु, गुलेरी, प्रेमचंद, हजारी प्रसाद द्विवेदी, राहुल सांकृत्यायन, बच्चन, अज्ञेय, कृष्ण बलदेव वैद, कुबेरनाथ राय जैसे अनेक नाम हैं, बल्कि हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण लेखकों में शायद ही ऐसा कोई हो, जो दूसरी किसी एक या एकाधिक भाषा में निष्णात न हो। इस दौर के वागीश शुक्ल, गणित के प्राध्यापक रहे और जिनका संस्कृत, फारसी और अंग्रेजी पर अधिकार है। इस सिलसिले में रेणु, विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय या वासुदेव शरण अग्रवाल जैसे देशज लोकभाषाओं पर बल देने वाले भी हैं। हमारे एक गुरु हार्वर्डवासी, बनारसी-भोजपुरी प्रेमी भारतेन्दु खानदान के डॉ. प्रमोदचंद्र कहते थे कि अभिव्यक्ति में स्वाभाविक लोच और रस अधिक आ जाता है, अगर पहली जबान देशज हो। यों भी बोली-भाषा का लोक-शास्त्र, वृहत्साम-रथन्तर है।
बस्तर के अभिलेखों की चर्चा। रायबहादुर हीरालाल की टिप्पणी है कि ‘इन्द्रावती नदी के उत्तरी भाग से प्राप्त समस्त अभिलेख देवनागरी लिपि में हैं तथा दक्षिणी भाग में इसी समय के अभिलेख तेलुगु लिपि में हैं।‘ उनकी यह टिप्पणी विशेष संदर्भ में है, इसके अलावा बस्तर के अभिलेखों में उड़िया है और ‘भाषा‘ भी। दंतेवाड़ा शिलालेख अगल-बगल दो पत्थरों पर है, जिसमें कहा गया है- ‘देववाणी मह प्रशस्ति लिषाए पाथर है महाराजा दिकपालदेव के कलियुग मह संस्कृत के बचवैआ थोरहो हैं तै पांइ दूसर पाथर मह भाषा लिषे है।‘ पुनः अंत में कहा गया है कि- ‘ई अर्थ मैथिल भगवानमिश्र राजगुरु पंडित भाषा औ संस्कृत दोउ पाथर मह लिषाए।‘ यहां संस्कृत ‘देववाणी‘ है औैर पूर्वी किस्म की हिंदी ‘भाषा‘। यही भाषा ‘भाखा‘ है। इन्हीं दिक्पालदेव के पुत्र राजपालदेव का ताम्रपत्रलेख दो भाषाओं और दो लिपियों में है। हिन्दी भाषी राजा की प्रतिज्ञा उड़िया भाषा में और उड़िया भाषी ब्राम्हणों की प्रतिज्ञा हिन्दी भाषा में लिखी गई है ताकि उभय पक्ष समझौते की शर्तें पढ़-समझ सके। इन अभिलेखों का काल अठारहवीं सदी है।
अब थोड़ी मौज - सठियाए सालों पुरानी हमारी पढ़ाई शुरू होती थी ककहरा और गिनती से। गिनती की किताब में पहाड़ा भी आ जाता और फिर यह कहलाता भाषा और गणित। भाषा में इमला होता यानी शुद्ध लेखन, और पाठ-वाचन। गणित में जोड़-घटाव गुणा-भाग के साथ मनगणित और यांत्रिक गणित भी होता, जिसके लिए सूत्र रटाया जाता, ‘सहि अरु का को तोड़कर, भाग-गुणा कर मीत, ता पीछे धन-ऋण करै, यही भिन्न की रीत‘। तीसरी कक्षा में जिले का भूगोल होता, चौथी में प्रदेश का और पांचवीं में देश का। भूगोल, सामाजिकध्यान यानी सामाजिक अध्ययन का एक हिस्सा होता, इतिहास और राजनीति के साथ। मुझे याद नहीं आता कि प्राथमिक कक्षाओं में अर्थशास्त्र होता था या नहीं और होता था तो किस रूप में।
आगे चल कर ‘नेकोसेकोसेकापरहे, बैनीआहपीनाला और यमाताराजभानसलगा, जैसे सूत्र सबको याद होते। सोचता रहा हूं, तुलसी भी किसी ऐसे ही दौर से गुजरे होंगे कि कहा- ‘अंक अगुन आखर सगुन समुझिअ उभय प्रकार‘। अंक- तथ्य, वस्तुगत और आखर विषयगत!
हमारे एक परिचित कभी बंबई गए, पकी उम्र में पहली बार। बंबई पहुंचकर उनकी एक ही धुन थी, थाणे का पुलिस स्टेशन देखना है। फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में ‘इ है बंबई नगरिया ...‘ गीत, कहीं ऐसी कोई बात नहीं, फिर यह कैसी धुन। बात पता लगी कि उन्होंने सुन रखा था कि मराठी में पुलिस थाना को पोलिस ठाणे कहा जाता है, वे देखना चाहते थे कि यह ठाणे के पुलिस थाने में किस तरह लिखा हुआ होगा और मन ही मन ‘ठाणे पुलिस ठाणे‘ सोच कर, मुख-सुख उचार कर आनंद लिया करते रहे। इसी तरह रायपुर से लगे बरौदा गांव, के बैंक आफ बड़ौदा की शाखा को अंग्रेजी में क्या लिखते हैं- Bank of Baroda, Branch- Baroda!
संयोग कि मुझे सिखाने-पढ़ाने वाले ऐसे गुरूजी मिले, जो छकाते भी थे। जिस पर कभी ध्यान नहीं गया था, ऐसी बात किसी ने कही कि जिस शब्द की परिभाषा हो, उसमें वह शब्द या उसका समानार्थी शब्द नहीं आना चाहिए, मैंने अपने गुरूजी से ‘शेयर‘ किया, इस पर उन्होंने सवाल किया कि क्या यह बात परिभाषा के परिभाषा जैसी मानी जा सकती है और नहीं तो परिभाषा की परिभाषा क्या होगी? फिर यह भी कि समानार्थी शब्द तो शब्दकोश में होते हैं, जिनमें शब्दों के अर्थ दिए होते हैं, फिर उसे अर्थकोश क्यों नहीं कहते!, सो ज्ञानमण्डल, बनारस का ‘बृहत् हिन्दी कोश‘ खोल लिया। सबसे पहले ध्यान गया, वाह बनारसी ... न शब्द न अर्थ, बस कोश। मगर ऐसा सिर्फ यहां नहीं, वामन शिवराम आप्टे का ‘संस्कृत-हिन्दी कोश‘ है और फादर कामिल बुल्के का नाम 'अँगरेजी हिन्दी कोश‘ मिला, हम ही हैं जो शब्दकोश अर्थककोश के चक्कर में पड़े हैं। बहरहाल, ‘बृहत् हिन्दी कोश‘ में भाषा शब्द पर पहुंचा तो पाया- ‘भावप्रकाशका साधन; किसी विशेष देश या जन-समाजमें प्रचलित शब्दावली और उसे बरतनेका ढंग, बोली; प्रादेशिक भाषा या बोली; हिंदी व्यक्ति विशेषके लिखने-बोलनेका ढंग; परिभाषा; शैली; सरस्वती; अर्जीदावा; एक रागिनी।‘ अब लगता है कि गुरुओं ने रट-घोंट लेने के साथ-साथ जुगाली करते रहने पर जोर दिया, तो जैसी गुरु-दीक्षा, शिरोधार्य।
मुग्ध करने वाला ज्ञानवर्धक आलेख
ReplyDeleteशब्दकोश, अर्थकोश, कोश...
ReplyDeleteवाला मामला बड़ा रोचक लगा और इसी तरह इतिहास और क्षेत्रीय विस्तार के अनुसार राय बहादुर हीरालाल की टिप्पणी गंभीर अर्थों को समेटे हुए है.