Monday, December 19, 2022

पदुम-नलिन

सत्यं कटु न हो मगर प्रियं होने से अच्छा है कि वह सुंदरं हो और ऐसा तब होता है, जब सत्यं, सहजं हो। इसी सत्यं सहजं के दर्शन होते हैं 75 वर्षीय डॉ. नलिनी श्रीवास्तव में। 2007 में प्रकाशित, 8 खंडों और लगभग 5000 पृष्ठों वाले, ‘पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ग्रन्थावली‘ का संपादन आपने किया है। बख्शी जी के बड़े सुपुत्र महेंद्र कुमार बख्शी जी की ज्येष्ठ पुत्री नलिनी जी ने 1986 में अपने दादाजी पर पी-एच डी की, विषय था, ‘हिन्दी निबंध की परम्परा में बख्शी जी के योगदान का अनुशीलन‘।


बताती हैं किस तरह बख्शी जी की रचनाओं को एकत्र किया, तब जीवनसाथी, श्रीवास्तव जी (वही जैसा गायक का नाम था, यानि किशोर कुमार श्रीवास्तव जी) का सहयोग होता था। ‘यात्री‘ जैसी उनकी कुछ पुस्तकें बस देखने को मिलीं तो दिन-रात लग कर स्वयं कापी पेन नकल बनाई। अब भी सृजन-सक्रिय, सजग-स्मृति संपन्न हैं। फिटनेस की तारीफ को सहजता से स्वीकार करते कहती हैं, लिखती-पढ़ती रहती हूं, स्वास्थ्य ठीक रहा है, न शुगर न बीपी, सिरदर्द भी नहीं हुआ। 

बख्शी सृजनपीठ के अध्यक्ष ललित कुमार जी के आमंत्रण पर अरविंद मिश्र जी, आशीष सिंह जी और राकेश तिवारी जी के साथ भिलाई गया। पूर्व अध्यक्षों में मध्यप्रदेश के दौरान गठित इस पीठ के पहले अध्यक्ष प्रमोद वर्मा जी, छत्तीसगढ़ गठन के बाद सतीश जायसवाल जी, बबन मिश्र जी, डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र के कार्यकाल के साथ, पीठ के गठन के और इसके महत्वपूर्ण कारक कनक तिवारी जी की स्मृतियां ताजी होती रहीं। लंबे समय बाद सुअवसर बना नलिनी जी से प्रत्यक्ष मुलाकात का। फोन पर चर्चा जरूर होती रही। एक प्रसंग- बख्शी जी की एक रचना ‘कला का विन्यास‘ टटोल रहा था। ग्रन्थावली में न पा कर उन्हें फोन किया। पहले लगा कि उनका जवाब अनमना सा है- ‘देख लीजिए, निबंध वाले खंड में होगा‘ साथ ही पूरे भरोसे से यह भी कहा कि इस शीर्षक से तो उनका कोई निबंध नहीं है। 

मैंने निबंध का पहला पेज उन्हें वाट्सएप किया, फिर पहला पैरा पढ़ कर सुनाया कि शैली तो उन्हीं की है, वे सहमत हुईं, फिर कहा कि देख कर बताउंगी। मुझे बिलकुल अनुमान न था कि इस बात ने उन्हें कितना बेचैन कर दिया है। देर शाम हुई बात के जवाब में अगली सुबह ही फोन आ गया कि खंड 1, पेज 223 देखिए। फिर बताया कि मुझसे बात होने के बाद रात भर उन्हें नींद नहीं आई। सोचती रहीं कि यह रचना क्योंकर छूट गई होगी। ग्रन्थावली के संस्करण में इसे जोड़ना होगा, आदि। 

सहज सरल मास्टर जी यानि बख्शी जी के व्यक्तित्व की उदारता और सहजता, साहित्यिक जिम्मेदारी और आग्रह की परंपरा को नलिनी जी से मुलाकात कर जीवंत महसूस किया जा सकता है। प्रातः और नित्य स्मरणीय मास्टर जी को नलिनी जी के माध्यम से नमन।

Thursday, December 15, 2022

पुरानी खड़ी बोली

हरि ठाकुर जी ने छत्तीसगढ़ की गौरव-गाथा को कण-कण समेटा, उसका एक नमूना यह लेख, जिसकी हस्तलिखित प्रति आशीष सिंह जी ने उपलब्ध कराई, उनका आभार। लेख के प्रकाशन की जानकारी नहीं मिली है। यहां प्रस्तुत-


दक्षिण कोसल में सोलहवीं शताब्दी की खड़ी बोली का नमूना 

कितने आश्चर्य की बात है कि पन्द्रहवीं शताब्दी की खड़ी बोली के गद्य का नमूना हमें उस क्षेत्र प्राप्त हुआ है जहां अब पूर्णरूप से उडिया भाषा बोली जाती है। छत्तीसगढ़ से लगा हुआ उड़ीसा प्रदेश का एक जिला है सुन्दरगढ़। इस जिले के बड़गाँव थाने के अन्तर्गत बरपाली नामक गाँव में एक ताम्रपत्र प्राप्त हुआ है जिसकी भाषा प्रारंभिक खड़ी बोली है। सम्पूर्ण लेख नागरी लिपि तथा गद्य में है। वह ताम्रपत्र लेख ‘एन्सियेंट इंडियन हिस्टारिकल ट्रैडिशन्स‘ नामक शोध पत्रिका में श्री के.एस. बेहरा ने प्रकाशित किया है। 

अठारहवीं शताब्दी तक यह क्षेत्र कोसल या दक्षिण कोसल कहलाता था। इस दक्षिण कोसल की भौगोलिक सीमा का वर्णन करते हुए श्री एस.सी. बेहरा ने अपने शोध निबंध में लिखा है- रायपुर, बिलासपुर, सम्बलपुर, सुन्दरगढ़, बोलांगीर, कालाहांडी, बौद-फूलबनी और कोरापुट- ये क्षेत्र दक्षिण कोसल में थे। रायपुर और बिलासपुर छत्तीसगढ़ में हैं ही। शेष जिले उड़ीसा में हैं। उक्त निबंध के लेखक ने रायगढ़, सरगुजा, दुर्ग और राजनांदगाँव जिलो को भूलवश छोड़ दिया है। वस्तुतः ये जिले प्राचीन दक्षिण कोसल में ही थे। बस्तर का कुछ हिस्सा दक्षिण कोसल में था। शेष दण्डकारण्य कहलाता था।

सन् १७५० में छत्तीसगढ़ पर मराठों का अधिकार हो गया। लगभग उसी समय यह सम्पूर्ण क्षेत्र छत्तीसगढ़ कहलाने लगा। उस समय भी उड़ीसा के उपर्युक्त जिले छत्तीसगढ़ के तत्कालीन राजा बिम्बाजी के अधीन थे और छत्तीसगढ़ के ही परगना माने जाते थे। सन् १९०५ में बंग-भंग के समय छत्तीसगढ़ के ये उड़ियाभाषी जिले उड़ीसा में मिला दिए गये। इस प्रकार यदि देखा जाये तो इस ताम्रपत्र को दक्षिण कोसल या छत्तीसगढ़ का माना जा सकता है। किन्तु, तथ्य यह है कि वर्तमान में बरपाली उड़ीसा में है। 

इस ताम्रपत्र के प्रदाता थे हम्मीर देव जो सुन्दरगढ़ राज्य के शासक थे। वे परमार शेखर राजवंशके प्रारंभिक राजा थे। यह ताम्रपत्र लेख वस्तुतः एक दानपत्र है। यह दानपत्र राजा हमीरदेव ने अपने स्वर्गीय पिता के आदेश का पालन करने हेतु राजगुरु श्री नारायण बीसी को प्रदान किया था। दानपत्र में राजगुरु को बरपाली गांव दान में देने का उल्लेख है। दान पत्र पर विक्रम तिथि अंकित है तदनुसार २४ जनवरी १५४४ ई. की तारीख पड़ती है। उस दिन सूर्य ग्रहण पड़ा था। 

हमीरदेव का ताम्रपत्र लेख

(१) 
‘‘ सोस्ती श्री माहाराजा धीराज माहाराज
श्रीश्री हंमीर देव के राजगुरु श्री
नारायण वीसीई को परनाम पूर्व
सो पीता स्यामी का हुक्म था
के एक गांव कुसोदक दे देना सो
बमौजी व हुकुम पीता जी के
वो अपने घुसी में मौजे बरपाली

(२)
गांव आसीन्त करके सुर्ज्य ग्रहन
में कुसोदक कर दिआ पुत्र पौत्र
भादीक भोग किया करो जावत
चन्द्र दीवाकर रहेगे तावत भोग
करोगे वौ गार्गवंस वीन्द होगा
औवर जो कोहि होय सो जगह
को ग्राश्चन्ही करेगा तारीफ १५
पुस समत १६०० साल सही ‘‘

भाषा की दृष्टि से दान-पत्र का यह लेख ऐतिहासिक महत्व रखता है। उड़िया भाषी क्षेत्र में इस दान पत्र का प्राप्त होना इस बात का संकेत करता है कि सोलहवीं शताब्दी में इस क्षेत्र की भाषा वही थी जो इस दानपत्र में है। कम से कम राज-काज की भाषा तो यह निश्चित रूप से ही थी, यह ताम्रपत्र लेख से स्वयं प्रमाणित है। निश्चय ही इस भाषा को उस समय की जनता समझ सकती थी। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि सुन्दगढ़ राज्य छतीसगढ़ की सीमा से सटा हुआ है। छत्तीसगढ़ के राजाओं के कामकाज की भाषा भी लगभग यही थी।

इस लेख की दूसरी विशेषता है कि वह शुद्ध गद्य में है और खड़ी बोली में है। इसकी भाषा पर हमें ब्रज या अवधी का कोई प्रभाव दिखाई नहीं पड़ता। खड़ी बोली के व्याकरण के अनुसार इस प्रकार की भाषा का इस क्षेत्र में प्राप्त यह प्रथम और दुर्लभ लेख है।

लेख में हिज्जे की अनेक त्रुटियां हैं। ये त्रुटियां ताम्रपत्र पर लेख को उत्कीर्ण करने वाले की भी हो सकती हैं। स्वस्ति को सास्ति, महाराजा का माहाराजा, वीसी को बीसीई, पूर्वक को पुर्व पिता को पीता, स्वामी को स्यामी, एक को येक, कुशोदक को कुसोदक, खुशी को घुसी, गांव को गाव, आसीमांत को आसीन्त, सूर्य को सुर्ज्य, दिशा को दिआ, पौत्रादिक को पौत्रादीक, यावच्चंद्र को जावतचन्द्र, दिवाकर को दीवाकर, व या औ को वौ, वृन्द को वीन्द और को अवर, कोई को कोहि, ‘ग्रहण नहीं‘ को ग्राश्चन्हीं, तारीख को तारीक, पूस को पुस, संवत् को समत लिखा गया है। ये त्राुटियाँ दान-पत्र को लिपिबद्ध करने वाले की भी हो सकती हैं।

लेख की अन्य विशेषता है- संस्कृत तथा अरबी-फारसी के शब्दों का एक साथ प्रयोग। संस्कृत के शब्द स्वस्ति, कुशोदक, आसीमान्त, यावच्चन्द्र दिवाकर आदि प्रयोग इस बात का घोतक है कि दान पत्र लिखने वाला संस्कृत का पंडित था। साथ ही वह उर्दू के शब्दों से भी परिचित था जैसे बमौजी, हुकुम, खुशी, मौजा, तारीख, साल आदि। उर्दू शब्दों के प्रयोग से यह भी सिद्ध होता है कि इस क्षेत्र की राज-काज की भाषा पर उर्दू का प्रभाव पड़ चुका था।

लेख में १५ पंक्तियां हैं। ताम्रपत्र के प्रथम पृष्ठ पर ७ पंक्तियां हैं। द्वितीय पृष्ठ पर ८ पंक्तियां हैं। खड़ी बोली के गद्य के विकास का अध्ययन करने वालों के लिए यह लेख पर्याप्त रुचिपूर्ण हो सकता है।

उपर्युक्त लेख में की पंक्ति क्रमांक १२ में बीन्द शब्द आया है। इस शब्द का अर्थ स्पष्ट नहीं है। संभवतः यह वृन्द के अर्थ में आया हो। वस्तुतः यहाँ पर ‘‘गोत्र‘‘ शब्द होना चाहिए था। इस लेख को आज की भाषा में इस प्रकार लिखा जायेगा-

‘‘स्वस्ति श्री महाराजा धिराज महाराज श्री श्री हम्मीर देव के राजगुरु श्री नारायण वीसी को प्रणाम पूर्वक सो पिता स्वामी का हुक्म था कि एक गांव कुशोदक दे देना सो बमौजी (स्वेच्छा से) व हुक्म पिताजी के व अपनी खुशी से मौजा बरपाली गाँव आसीमांत सूर्यग्रहण में कुशोदक कर दिया (कि) पुत्र पौत्रादिक भोग किया करो यावच्चन्द्र दिवाकर रहेंगे तब तक भोग करोगे और गर्ग वंश गोत्र में रहेगा और जो कोई भी हो इस जगह (गाँव) को अधिग्रहण नहीं करेगा तारीख १५ पूस संवत् १६०० साल सही।‘‘

सोलहवीं शताब्दी के पूर्व की खड़ी बोली के कुछ नमूने उपलब्ध हैं जैसे पृथ्वीराज, मेवाड़ के राजा रावल समर सिंह, महात्मा गोरखनाथ, तथा स्वामी विट्ठलनाथ जी को पत्र। किन्तु इन पत्रों की भाषा को खड़ी बोली का गद्य कहना न्यायोचित नहीं कहा सकता। खड़ी बोली का उत्कृष्ट प्रारंभिक उदाहरण अमीर खुसरो का है किन्तु उसकी भाषा पर भी ब्रज भाषा का गहरा प्रभाव है। दूसरी बात, उनकी रचनाएं पद्य में हैं।

प्रस्तुत ताम्रपत्र लेख की खड़ी बोली के गद्य के समकक्ष स्वामी विट्ठल नाथ जी का यह गद्यांश रखा जा सकता है-

‘‘स्वामी तुम्हैं तो सतगुरु अम्हे तो लिष सबद एक पूछिवा दया करि कहिबा, मन न करिबा रोस। पराधीन उपरांति बन्धन नाहीं, सो आधीन उपरांति मुकुति नाई। यह भी १६००वीं शताब्दी का गद्य है। अब इसी के समकक्ष समकालीन दक्षिण कोसल के ताम्रपत्र लेख के लेख को गद्य की भाषा से तुलना कीजिए-
 
‘‘ सो पीता स्वामी का हुक्म था के येक गाँव कुसोदक दे देना सो बमौजी व हुकुम पीताजी के वो अपने घुसी में मौजे बरपाली गाँव आसीन्त करके सुर्ज्य ग्रहन में कुसोदक कर दिआ।‘‘

यदि इस गद्य को लिपिबद्ध करने वाले ने हिज्जे के प्रति सावधानी रखी होती तो यह अपने समय के उत्कृष्ट गद्य का उदाहरण होता फिर भी मेरे विचार से इन दोनों उदाहरणों में से यह दूसरा उदाहरण खड़ी बोली का अधिक शुद्ध रूप है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि खड़ी बोली के गद्य का यह नमूना हमें अहिंदी क्षेत्र से प्राप्त हुआ है जो इस बात का भी प्रमाण है कि अहिन्दी क्षेत्र में भी सोलहवीं शताब्दी में हिन्दी प्रचलित थी और राजकाज की भाषा थी।
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Saturday, December 10, 2022

पीथमपुर - सतीश जायसवाल

लीलागर-महानदी-हसदेव तट के मेलों में पीथमपुर की खास पहचान है। होली-धूल पंचमी पर भरने वाला यह मेला मौसम और भूगोल की संधि पर होता है। यह मेला छोटी-मोटी फौजदारी से ले कर कभी हत्या तक की घटनाओं के लिए बदनाम रहा हैं। यह भी देखा गया है कि इस दौरान आंधी-तूफान से एक बार मेला उजड़ कर फिर जमता है। यहां कलेश्वरनाथ मंदिर के पुजारी साहू जाति के हैं। इस अंचल में कनकी के जांता महादेव मंदिर के पुजारी यादव होते हैं और राजिम के राजीव लोचन मंदिर के पुजारी क्षत्रिय हैं।

पीथमपुर पर अश्विनी केशरवानी जी ने कलम चलाई है और यहां सतीश जायसवाल जी की लेखनी का प्रवाह है। सतीश जी कविता-कहानी वाले साहित्य में रमे रहते हैं, लंबे समय तक पत्रकारिता भी की है, अवसर अनुकूल अपनी भूमिका निर्धारित कर लेते हैं। कथा और कथेतर के भेद को जोड़ते-मिटाते अपनी धारणा को साहित्यिक रंग देते, खतरनाक प्रयोग करना उन्हें आनंदित करता है, जो उनके पात्रों के लिए हमेशा सहज नहीं होता। ऐसे ही कुछ विवादित प्रयोग मुक्तिबोध का ‘विपात्र‘ और हबीब तनवीर का नाटक ‘हिरमा की अमर कहानी‘ है। इस शैली में उनके कुछ संतुलित प्रयोग भी हैं, जैसे ‘मछलियों की नींद का समय‘। कहानी के नायक डॉ. शंकर शेष हैं और एक पात्र सतीश (कहानी के लेखक स्वयं) भी।

मेरी दृष्टि में उनका महत्वपूर्ण काम यात्रा-संस्मरण और छत्तीसगढ़ की संस्कृति, कला, इतिहास और परंपरा के विशिष्ट आयाम को बेहद सजग और संवेदनशील देखना-समझना और संजीदगी से अभिव्यक्त-दर्ज करना है। भाट चितेरे, नरसिंहनाथ, बालपुर, जयरामनगर और जनजाति, बस्तर, महानदी जैसे विषयों से जुड़े उनके लेख छत्तीसगढ़ की अस्मिता और गौरव के ऐसे दस्तावेज हैं, जो अन्यथा दुर्लभ हैं। बातचीत के दौरान हां-हूं करते वे अपनी इस खासियत के प्रति रूखे की हद तक उदासीन रहते हैं। आभार कि ऐसी टिप्पणी की छूट, इतना अधिकार उन्होंने मुझे दे रखा है या कहें मैंने ले रखा है।

नवभारत, बिलासपुर में 14-3-93, पृष्ठ -7 पर प्रकाशित रपट, यहां प्रस्तुत-

पीथमपुर मेला: भीड़ कम और धार्मिकता ज्यादा 
मान्यता: रोगियों की पीड़ा का हरण
कलेश्वरनाथ की कृपा

(पीथमपुर से सतीश जायसवाल की रपट)


बिलासपुर. महानदी के तट पर भरने वाले शिवरीनारायण के मेले में घटित घटना का जो असर हसदो तट पर भरने वाले पीथमपुर मेले में पड़ना आशंकित था, वैसा ही हुआ। धूलि- पंचमी के दिन, शिव-बारात के उठने के समय, पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष शिव बारात के प्रमुख बाराती नागा-साधुओं की संख्या अधिक थी, लेकिन इस बारात को देखने के लिये दूर-दूर से आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या कम थी और शिव-बारात की व्यवस्था के लिये नियुक्त किये जाने वाले नियमित पुलिस बल के मुकाबले विशेष सशस्त्र बल के सिपाहियों की संख्या अधिक थी, जो किसी भी आशंकित स्थिति के लिये पूरी तरह तैयार थे, लेकिन सौभाग्य से कोई भी अप्रिय स्थिति निर्मित नहीं हुई।

पीथमपुर के पुराने मेले की याद रखने वालों का कहना है कि जिस समय शिव जी का बारात लेकर नागा साधू चलते है, उस समय एक लाख लोगों तक की भीड़ जुड़ जाया करती थी, लेकिन इस वर्ष यह भीड़ २५ से ३० हजार के बीच सिमट कर रह गई। लोगों ने बताया कि शाम होने के साथ-साथ भीड़ यहां जिस हिसाब से बढ़ती है, उस हिसाब से दिया-बत्ती के बाद भी वह भीड़ ४० हजार लोगों को पार नहीं कर पायेगी। बताया गया कि शिवजी की बारात के साथ चलने वाले नागा साधुओं की संख्या पिछले वर्ष १४-१५ से अधिक नहीं थी, लेकिन इस वर्ष ३५-३६ से अधिक साधू शिवजी की बारात के साथ नजर आये। इस वर्ष ये साधू दक्षिण में केरल से लेकर, जूनागढ़ (गुजरात) गोरखपुर तथा वाराणसी (उ.प्र.) अमरकंटक (म.प्र.) और हिमाचल प्रदेश आदि के अखाड़ों से आये। एक शताब्दि से भी अधिक पुराना होने जा रहा यह पारम्परिक मेला, भीड़ के अतिरिक्त भी अपने बिखराव की तरफ दिखाई दे रहा है। शिवजी की बारात के आगे-आगे चलने वाले पटे बाज, तलवार के हुनर दिखाने वाले, रंगे-चंगे नंदी, झांकी के साथ चलने वाले हनुमान, शिव-पार्वती आदि अब नहीं दिखते, लेकिन कुछ नई धार्मिक परम्पराएं स्थापित होती भी दिखाई दीं। चांपा के करीब तपसी बाबा आश्रम से लगभग दो-अढ़ाई सौ कांवड़ियों ने यहां शिवजी को जल अर्पित किया। नई मनोकामना लेकर अथवा पुरानी मनौतियां पूर्ण होने पर, जमीन पर लेटते हुये पीथमपुर पहुंच कर भगवान कलेश्वर नाथ (शिवजी) को नारियल चढ़ाने वाले आस्थावादी भी बढ़ रहे हैं। चांपा से पीथमपुर तक, लगभग ८ किलोमीटर की दूरी, जमीन पर लेटकर नापती हुई पहुंची एक महिला श्याम बाई ने बताया कि उसके पांच वर्षीय नाती को गंभीर खूनी पेचिश थी और उसकी जान बचाने के लिये बिलासपुर के सरकारी अस्पताल में २ बोतल खून मांगा गया। दो बोतल खून के लिये श्याम बाई के पास न तो पैसे थे, न परिचय, लेकिन पता नहीं कहां से एक अपरिचित युवक आया, जिसे श्याम बाई नहीं जानती कि वह मनुष्य था या देवता, दो बोतल खून दे गया। उसके नाती की जान बच गई। श्याम बाई ने तभी मनौती मांगी थी कि जमीन पर लेटते हुये पीथमपुर आयेगी तथा भगवान कलेश्वर नाथ को नारियल चढ़ायेगी।

पुरानी मान्यता है कि भगवान कलेश्वर नाथ की कृपा से पेटदर्द के रोगियों की पीड़ा का हरण होता है इसलिये पेट दर्द से छुटकारा पाने की आस लिये आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ रही है। इन आस्था वादियों में चांपा के एक पत्रकार भी भगवान कलेश्वरनाथ के दर्शन के लिये पहुंचे। पीथमपुर का धार्मिक महत्व अब होली या धूलि पंचमी के दो दिनों में केन्द्रित न होकर, शिवरात्रि से शुरू होने लगा है। लोगों बताया कि पिछले वर्षों के मुकाबले इस वर्ष पीथमपुर में महाशिवरात्रि पर सर्वाधिक चढ़ाये गये। दरअसल, पीथमपुर का कुल महत्व उसके धार्मिक तथा व्यावसायिक पक्षों में बंटा हुआ है। भगवान कलेश्वर नाथ की अर्चना-पूजा महाशिवरात्रि पर्व से प्रारंभ हो जाती है और वस्तुतः पीथमपुर मेले की धार्मिक शुरूआत महाशिवरात्रि पर्व से ही प्रारंभ होती है, जबकि पारम्परिक मेले की व्यावसायिक शुरूआत होली के दिन से होती है, जब दूर-दूर से यहां पहुंची दुकानों में लेन-देन प्रारंभ होता है।

इस वर्ष मेले की जगह भी बदली गई है। एक सीध वाली लम्बाई में भरने वाला मेला अब चौड़ाई में फैला है और दुकानों की कतारें नदी तट की ओर उतरी है। जिन दुकानदारों ने पहले की तरह, लम्बी सीध से अपना शामियाना लगाया, उनकी दुकानदारी कमजोर रही। पहुंच की दृष्टि से पीथमपुर, जांजगीर, चांपा तथा सारागांव से लगभग बराबर-बराबर दूरी पर है। लगभग ८ किलोमीटर, लेकिन चांपा और सारागांव की तरफ से यहां आने वालों का रास्ता नदी की तरफ से है इसलिये इस वर्ष नदी तट की तरफ वाले दुकानदारों को अधिक ग्राहकों का लाभ मिला।

स्थानीय लोगों ने शिकायत की कि मध्यप्रदेश राज्य परिवहन निगम पीथमपुर मेला को फायदे का सौदा नहीं मानता। एक दिन में, न्यूनतम १० हजार से लेकर अधिकतम १ लाख तक यहां पहुंचने वाले दर्शनार्थियों के लिये या तो तांगों का सहारा है अथवा निजी टैक्सियां। गांवों के लोग गाड़ा-गाड़ी से आ जाते है और बकाया के लिये यहां पैदल ही जाना है ... पुलिस सुरक्षा व्यवस्था के साथ साथ दीगर प्रशासनिक व्यवस्था भी इस वर्ष पहले के मुकाबले बेहतर है। एक प्रशासनिक आदेश के जरिये, मेला-अवधि के दौरान, मध्य भारत पेपर मिल को हसदो नदी में जल प्रवाहि करने पर पाबंदी लगा दी गई। हसदो नदी उस तट पर स्थित, मिल द्वारा रसायनिक द्रव युक्त प्रदूषित पानी के नदी में प्रवाहित किये जाने से यहां जल प्रदूषण की शिकायतें आसपास के गावों से की जाने लगी है। अपने सार्वजनिक कल्याण कार्यक्रम के तहत पेपर मिल ने अपनी ओर से मेले में पेयजल के लिये ‘प्याऊ‘ लगाया है। विभिन्न शालेय तथा विश्वविद्यालयीन परीक्षाओं को ध्यान में रखकर लाउडस्पीकरों के उपयोग पर लगे प्रतिबंध का असर मेले में देखने मिला। लाउडस्पीकर पर बजने वाले फिल्मी गीतों के अभाव में मेला सूना- सूना लगा।

एक जनश्रुति के अनुसार, यहां के स्वयंभू शिव की मूल प्रतिमा जिस तेली हीरा साय के घर घूरे के नीचे से मिली थी, उस परिवार के लोगों को शिव बारात प्रस्थान से पूर्व पूजा का प्रथम अधिकार प्राप्त है तथा उस परिवार के पुरुष सदस्य शिवजी की पालकी उठाकर चलना अपना गौरव मानते हैं। इस परिवार की महिलाएं आज भी यही मानती और बतलाती है कि शिवजी का मूल स्थान उनका घर है, इसलिये उनके घर को शिव गद्दी होने का महत्व है। पत्रकारों के एक दल ने पीथमपुर और आसपास, से मेले में आयी हुई तेली युवतियों की भूरी-हरी आंखों चमत्कारिक सौदर्य को देखा और तथ्यों की पुष्टि की। इस पत्रकार दल ने राष्ट्रीय सेवा योजना की चांपा इकाई के समक्ष प्रस्ताव रखा है कि इस नृतत्व शास्त्रीय विशिष्टता का प्रारंभिक अध्ययन करें। अनुमान किया जा रहा है कि आगामी वर्षों में, यह विशिष्टता, पीथमपुर के मेले में आने वाले दर्शनार्थियों के लिये आकर्षण का मुख्य केन्द्र होगी। 
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