Saturday, November 6, 2021

समरस बस्तर

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद अशांत बस्तर को समरस करते, वहां स्वाभाविक विकास और शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन में सांस्कृतिक दृष्टि से संभावना पर नये सिरे से विचार होने लगे। छत्तीसगढ़ शासन के तत्कालीन प्रमुख सचिव डा. के.के. चक्रवर्ती और संचालक श्री प्रदीप पंत के मार्गदर्शन और निर्देश पर श्री जी.एल. रायकवार और मेरे द्वारा इससे संबंधित एक नोट बीसेक साल पहले तैयार किया गया था। इस पर कोई विचार हुआ, उपयोगी हुआ, कार्यवाही हुई अथवा नहीं, हमें पता नहीं लगा। शासन में आपको अधिकतर, कर्तव्य-भाव से, निष्काम से आगे अनासक्त रहते, कार्य संपादन करना होता है, मगर मानवीय स्वभाव, इस कच्चे नोट की प्रति मैंने अपने पास रख ली थी। इसे प्रासंगिक मानते यहां प्रस्तुत है-

बस्तर, सांस्कृतिक संरक्षण-उन्नयन

पृष्ठभूमि
छत्तीसगढ़ के दक्षिण में स्थित बस्तर प्राकृतिक दृश्यों, नैसर्गिक संपदा तथा जनजातीय पंरपराओं की दृष्टि से एक जीवित रंगमंच है। बस्तर जिले की भौगोलिक संरचना का इसमें विशेष योगदान है। बस्तर जिले की जीवन रेखा, जल प्रवाह में इंद्रावती तथा उसकी सहायक नदियां शबरी, नारंगी, शंखिनी-डंकनी आदि नदियां महत्वपूर्ण हैं। इंद्रावती, बस्तर तथा महाराष्ट्र राज्य की सीमा बनाती हुई भोपालपट्टनम तहसील मुख्यालय के भद्रकाली ग्राम के निकट गोदावरी में मिलती है। बस्तर जिले के मध्य से प्रभावित इंद्रावती नदी तथा उसके तटवर्ती प्रदेश के प्रागैतिहासिक काल के पाषाण उपकरण अनेक स्थलों से ज्ञात हुए हैं। पौराणिक काल के सूत्र का परिचय वाल्मीकी रामायण में है, जिसमें राम के वनवास अवधि में कुछ काल तक दण्डकारण्य में विचरण एवं निवास का उल्लेख है। महाभारत में कर्ण तथा सहदेव के दिग्विजय के अंतर्गत कौसल का उल्लेख मिलता है। ऐतिहासिक काल में पांचवी शती के गुप्तवंशीय राजा समुद्रगुप्त के दक्षिणापथ विजय में कोसल तथा महाकांतार का उल्लेख है। दक्षिण कोसल तथा महाकांतार की समानता वर्तमान छत्तीसगढ़ के मैदानी भू-भाग तथा बस्तर क्षेत्र का गोदावरी पर्यंत भू-भाग से है।

ऐतिहासिक काल के प्रमुख राजवंशों में नल, चालुक्य, राष्ट्रकूट, चोल तथा नाग विशेष उल्लेखनीय हैं। बस्तर जिले में ऐतिहासिक काल में अंतिम राजवंश, काकतीयों (चालुक्य) का आधिपत्य रहा है। नागपुर के भोंसले शासकों के काल में बस्तर भी ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत सम्मिलित हो गया तथा यह स्थिति स्वतंत्रता प्राप्त होने तक, सन 1947 तक बनी रही। बस्तर के काकतीय (चालुक्य) राजवंश के अंतिम शासक प्रवीरचन्द्र भंजदेव थे, जिनका निधन वर्ष 1966 में हुआ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ देशी रियासतों के संविलियन के पश्चात, बस्तर देश का अंग बन गया। बस्तर का भू-भाग 1956 तक मध्य प्रांत और बरार में सम्मिलित रहा तथा छत्तीसगढ़ के अन्य हिस्सों की तरह 1 नवंबर 1956 से 31 अक्टूबर 2000 तक मध्यप्रदेश में शामिल रहा। 1 नवंबर 2000 से छत्तीसगढ़ राज्य गठन के साथ बस्तर, छत्तीसगढ़ राज्य का भू-भाग है। भारत के सबसे बड़े तीन जिलों में लद्दाख, कच्छ तथा बस्तर हैं, परन्तु लद्दाख तथा कच्छ जनसंख्या की दृष्टि से न्यून रहे हैं। मध्यप्रदेश में बस्तर क्षेत्रफल में सबसे बड़ा जिला है। इसका क्षेत्रफल केरल राज्य से बड़ा है। प्रशासनिक दृष्टि से बस्तर जिले के वृहत् क्षेत्र को कांकेर, बस्तर, तथा दंतेवाड़ा जिले में विभाजित किया गया है।

आदिवासी बहुल बस्तर जिले के विकास के लिए केन्द्रीय शासन द्वारा प्रवर्तित तथा राज्य शासन के द्वारा अनेक योजनाओं का क्रियान्वयन किया गया, जिनके अंतर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात, सड़क, वनोपज तथा कृषि पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है। इसमें एनएमडीसी-नेशनल माइनिंग डेवलपमेंट कारपोरेशन तथा विशाखापटनम-बैलाडीला रेल मार्ग विशेष उल्लेखनीय है। बस्तर जिले के लिये स्वीकृत योजनाओं में बोधधाट परियोजना विशेष रूप से चर्चित रहा है, यह योजन के प्रारंभिक चरण के क्रियान्वयन के बाद रुक गई है। इसी प्रकार के इंचमपल्ली बांध परियोजना भी विचाराधीन है।

बस्तर में नक्सलवाद
बस्तर जिले की भौगोलिक सीमा महाराष्ट्र, आंध्र तथा उड़ीसा से संलग्न है। सघन वन के कारण यहां कृषि का क्षेत्र सीमित है। साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य तथा संचार, परिवहन एवं प्रशासनिक व्यवस्था की दृष्टि से दुर्गम रहा है। वन आधारित कृषि संस्कृति होने के कारण कठिन जीवन स्थितियां रही हैं। दुर्गम क्षेत्र के कारण यहां भाषा, धर्म, परंपरा, जीवन-यापन के तौर तरीके आदि सदियों से अप्रभावित रहा है। परंपरागत रीति-रिवाज, जातीय संगठन, ग्राम प्रशासन आदि लगभग वैसा ही बना रहा, जैसा सदियों से चला आया है।

बस्तर में नक्सलवाद घटनाहीन ढंग से पिछली सदी के सातवें दशक में हुआ और तीन दशकों में इस समस्या ने विकराल रूप ले लिया। नक्सलवाद पनपने के मूल कारणों में प्रमुख बिंदु हैं- 1. शोषण 2. स्थानीय नेतृत्व और सबल संगठन 3. पड़ोसी सीमा राज्यों की समाजशास्त्रीय स्थितियां 4. औद्योगीकरण के दुष्प्रभाव 5. गैर पारंपरिक शासकीय नीतियां 6. समसामयिक राजनैतिक उदासीनता।

इन बिंदुओं पर विचार करते हुए सांस्कृतिक गतिविधियों और अनाक्रामक हस्तक्षेप से इस समस्या को नियंत्रित किया जाना संभव हो सकता है। यह कार्य दीर्घकालीन, जनजातीय समुदाय की परंपरा, आस्था, जीवन-शैली और पारस्थितिकी के अनुरूप होगा। इस दृष्टि से ऐसे रचनात्मक कार्यों का भी समावेश करना होगा, जो लोकधारा से जुड़े और लक्ष्य की पूर्ति में परोक्षतः सहायक होंगे। अतः शासकीय कार्यक्रमों के अंतर्गत स्थानीय निवासियों के सहयोग से निम्नलिखित कार्य आरंभ करने पर विचार किया जा सकता है-

1. ग्राम के समीप की रिक्त भूमियों में वनोपज वाले पौधों का रोपण।
2. ग्राम में स्थित आस्थामूलक पेड़, वनस्पतियों, सरना आदि तथा पंडुम जैसी परंपरा के सकारात्मक पक्षों का संवर्द्धन एवं विकास।
3. ग्राम में स्थापित जनजातीय आस्था के केन्द्र देवगुड़ी, मातागुड़ी आदि का जीर्णाेद्धार एवं संवर्द्धन।
4. ग्राम में स्थित जलस्रोतों, तालाब, तरई, मुडा का पार (मेड़) मरम्मत एवं गहरीकरण।
5. जलस्रोतों के आसपास स्वच्छतामूलक निर्माण एवं संवर्द्धन।
6. अंदरूनी वन क्षेत्रों में स्थित अवशेषों का संवर्द्धन।
7. ग्रामों में आयोजित होने वाले मेला, मड़ई, तीज-त्यौहार के आयोजन को प्रोत्साहन।
8. पारंपरिक नृत्य, गीत, उत्सव के अवसरों पर सामूहिक प्रोत्साहन।
9. ग्रामीण क्षेत्रों में आयोजित साप्ताहिक अथवा विशेष अवसरों पर आयोजित होने वाले मेला, मड़ई, हाट-बाजार कर (टैक्स) पुनरीक्षण।
10. ग्रामीण क्षेत्रों में शाला भवन की स्थापना, अधूरे शाला-भवनों को पूर्ण करना तथा आवश्यकतानुसार मरम्मत, रख-रखाव।
11. आदिवासी क्षेत्रों में प्राथमिक स्तर के विद्यालयों में स्थानीय युवकों की नियुक्ति।
12. पुरातत्वीय धरोहर, पर्यटन स्थल, प्राकृतिक स्थलों, जैसे- चित्रकोट, कुटुमसर, बारसूर आदि के व्यवस्थापन में स्थानीय सहभागिता। ग्रामीण मेला, मड़ई एवं स्थानीय खेलों, स्थानीय नृत्य, संगीत, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रचलित नाट (नाट्य), रामलीला मंडली आदि को उनके मंचन तथा कार्यक्रम का आयोजन एवं प्रोत्साहन।
13. स्थानीय परंपराओं के अनुकूल ग्रामीण संस्था के पदाधिकारी जो सामाजिक एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करते थे उसी प्रकार की प्रशासनिक व्यवस्था को पुनर्जीवित करना।
14. बस्तर जिले की स्थानीय बोलियों में शिक्षात्मक सचित्र बाल साहित्य का मुद्रण एवं वितरण।
15. जनजातीय सामुदायिक इतिहास से संबंधित मौखिक साहित्य का संकलन कर सचित्र प्रकाशन।
16. जनजातीय मौखिक परंपराओं का संकलन कर उनमें वर्णित लोक देवता, ग्राम देवता, व्यक्ति आदि की मान्यताओं को पुनर्स्थापित करना।
17. ग्रामीण प्रतिभाओं के उच्च शिक्षा तथा व्यवसाय के लिए आकर्षक सुविधायुक्त अनुदान सहयोग।
18. शिक्षित तथा बेरोजगार ग्रामीण युवकों को योग्यतानुसार जीविकोपार्जन के कार्य में व्यवस्थापन।
19. शिल्पियों एवं कारीगरों को उनके पारंपरिक उद्योग व्यवसाय के लिये कच्चे सामग्री के क्रय में छूट तथा उत्पादन के विपणन में विशेष सहयोग।
20. प्रशासनिक स्तर पर अधिकारों का विकेन्द्रीकरण।
21. लोकभाषा में राष्ट्रीय चरित्र को उजागर करने वाले राष्ट्रीय गौरव के परिचायक महापुरूषों तथा शहीदों संबंधी साहित्य स्थानीय भाषा में तैयार कर उपलब्ध कराना।
22. पुरातत्वीय महत्व के स्थल-स्मारक के संरक्षण एवं अनुरक्षण पर त्वरित ध्यान देते हुए ऐसे स्थलों का सचित्र विवरणत्मक इतिहास, महत्व आदि को लोकभाषा में प्रकाशन। 
23. जनजातीय परंपराओं पर आधारित एवं शिल्पकला में रूपायित प्रतिमाओं के धार्मिक, अनुष्ठानिक एवं विचारधारा को मान्यता प्रदान करना।
24. शिल्पकर्मियों, शासकीय सेवकों, विद्यार्थियों तथा विभिन्न विधाओं में उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रोत्साहन।
25. ग्रामीण क्षेत्रों में विस्तृत सर्वेक्षण कर जनजातीय परंपराओं, ज्ञान-विज्ञान, सामुदायिक इतिहास, चिकित्सकीय ज्ञान आदि का प्रलेखन तथा प्रकाशन।

संक्षेप में कार्ययोजना को निम्नानुसार निर्धारित किया जा सकता है-
  • देवगुड़ी, मातागुड़ी, सरना आदि पारंपरिक आस्थामूलक स्थलों का संवर्द्धन।
  • पारंपरिक जलस्त्रोतों के स्थल तालाब, मुडा, तरई, झिरिया आदि का रखारखाव एवं संवर्द्धन।
  • लोककला, लोकशिल्प, लोकनृत्य एवं संगीत के विशेष आयोजन एवं प्रोत्साहन।
  • हल्बी, गोंड़ी, भतरी आदि लोकभाषाओं में महाकाव्यों के चयनित अंश, महापुरूषों, लोकनायकों के जीवन गाथाओं पर आधारित सचित्र साहित्य का प्रकाशन।
  • स्थानीय मेला-मड़ई, उत्सवों के आयोजन में सहयोग तथा राष्ट्रीय विकास से संबंधित प्रदर्शनियों का आयोजन।
  • पुरातत्वीय और आस्थामूलक स्मारक-स्थलों का सर्वेक्षण, आवश्यकतानुसार स्थानीय सहभागिता सुनिश्चित करते हुए चिन्हांकन, प्रकाशन एवं विकास।
  • पारंपरिक ज्ञान-विज्ञान एवं कला को मान्यता प्रदान करने के लिए सहयोग एवं संरक्षण।

Friday, November 5, 2021

पृथ्वीदेव, सतीमदेव और सिंघण

यहां छत्तीसगढ़ के इतिहास और पुरासंपदा, अभिलेख और सिक्कों से संबंधित दो सूचनात्मक नोट प्रस्तुत हैं, जो स्वयं स्पष्ट हैं-

Times of India (daily newspaper) - New Delhi 4.11.79
11th Century Copper Plates Unearthed
(By our correspondent)

Raipur, Nov. 4. Little did the villagers know that the two copper plate with inscriptions (one of them in a strange script) unearthed by them in a field near Bhatapara a few months ago and sold for a pittance were a veritable fountainhead of historic information. The ancient documents related to the reign of Prithvi Dev I of the Kalachuri dynasty of Ratanpur in Bilaspur District in Chhatisgarh region.

The plates were luckily retrieved by Dr. Vishnu Singh Thakur, an authority on the history and archaeology of Chhatisgarh region, from an equally ignorant trader painstaking efforts and patience finally led to the deciphering of the inscription.

Written in the Purva Nagari script and in Sanskrit the inscriptions reveal the story of the donation of sahyonala village to Rishikesh, a Brahman of the Gautam gotra, on Uttarayan sankranti on Posh shukla, a sunday in the Chedi Samvat 834 (1082A.D.).

The plates the first important document on the subject, have helped in determining the period of Prithvi Dev's reign. The also mention the victory of Maharaj Kokkal over the Malav king. This strengthens the belief that upto the reign of Maharaja Kokkal the Tripuri and Kalchuri dynasties were keeping together.

The presence of the Maharani, the Prime minister and other important officials of the kingdom at the donation ceremony is also mentioned.

After surveng the area Dr. Thakur feels that the Sahyanola village mentioned in the plate is the present day Suhela village, situated 5 k.m. from Bhatapara in Raipur District, where ruins of the structures built in the Kalachuri period have been dug up.

Indian Coins Society - NEWSLETTER
No.-13, March 1992
Chief Editor - Chandrashekhar Gupta

A Padma-Tanka Hoard from Sondhra - M.P.
by - Chandrashekhar Gupta

Some years ago, a hoard of gold coins was discovered from the embankment of a tank at the village Sondhra in Raipur district of Madhya Pradesh. Thirty-one coins were acquired under the provision of the Indian Treasure Trove Act by the Archaeological Department, Government of Madhya Pradesh. The coins are deposited in the MahantGhasidas Smarak Sangrahalaya, Raipur.

A preliminary study of these coins was made by Dr. Vishnu Singh Thakur, historian and archaeologist at Durg Post-Graduate Collage. According to the details published by Thakur, the total weight of hoard was 116gms. He has classified these coins in two groups: The first group consisted of a single coin with the legend Satimdeo. The second group consisted remaining thirty coins with a shankh (counch), charka, a four petalled design with an embossed full blown lotus in the centre, legend Sitaram in devnagari and a mint mark on each of the coins. 'These coins', says he, 'were used as offering to pujaris. Thakur also expressed the possibility of a close alliance between the king Satimdeo and a Kalachuri King as gold coins were given as token only in the Kalachuri period. However, Thakur dates this king around 1650 A.D.

Illustrations of these groups of coins were published along with the news in a local newspaper. Following observations are made on the basis of the available details the Second group of coins.

A close look at the published photograph of the coin makes it clear that the coin is of the famous gold Padma-Tanka variety issued by the Yadav king Simghana. Beside the legend Si(m)Ghana it has three punches mark at the II, VI and IX O' clock position, with an eight petalled lotus with a central boss in the centre. The other symbols are Dravidian symbolised letter shri, counched shell and again a legend. (This device as met on other coins is described by scholars as repetition of shri and volute).

It is thus clear in this preliminary note that the legend on the coin is not sitaram but Simghana and the period of the coins is not seventeenth century but thirteenth century i.e. A.D. 1210-1246.

This is not the first time that the Padma-Tanka are found from Madhya Pradesh After getting access to this hoard through the good offices of the commissioner of Archaeology, Madhya Pradesh Government, a detailed study of the same will be published.

Thursday, November 4, 2021

टांगीनाथ सामत राजा और पछिमहादेव

यह किस्सा थोड़े फेर-बदल के साथ इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी 2019 में विचार/पुरातत्व के अंतर्गत ‘डीपाडीह के टांगीनाथ और अतीत की कड़ियां‘ शीर्षक से छपा था। 

डीपाडीह की बात, उसकी पृष्ठभूमि के साथ करने में आसानी होगी। सरगुजा का यह पूरा अंचल अपने आप में पुरातात्त्विक और सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत समृद्ध क्षेत्र है। लेकिन इसकी विशेष प्रसिद्धि रामगढ़ की प्राचीन रंगशाला के लिए थी। यहां के अन्य पुरातात्त्विक स्थलों में डीपाडीह और महेशपुर दो ऐसे स्थल थे, जिनकी चर्चा फुटकर उल्लेख के रूप में जरूर होती थी। डीपाडीह के साथ एक तो टांगीनाथ का जिक्र आता था और दूसरी बात होती थी सामत राजा या सम्मत राजा से जुड़ी हुई।

इनमें पालवंशी प्रभाव का प्राचीन स्थल टांगीनाथ, छोटा नागपुर के महुवाडांड और नेतरहाट जाने वाले रास्ते में है। टांगीनाथ, यों नाम से लगता है कि यह परशुराम से संबंधित होगा, लेकिन उस टांगीनाथ और डीपाडीह को देखा तो पाया कि यहां जो सबसे ज्यादा प्रकट और विशाल मूर्ति है, वह परशुधर शिव, एकदम अलग प्रतिमाशास्त्रीय प्रतिमान, जो यों शिव का लोकप्रिय विग्रह नहीं है। शिल्पशास्त्रीय ग्रंथों में जरूर जिक्र आता है, यहां परशु लिए हैं, जो स्थानीय भाषा में टांगी या फरसा कहा जाता है। उस परशुधर शिव की मूर्ति को देखकर स्थानीय लोगों में यह धारणा बनी कि ये टांगीनाथ हैं, टांगी लिए हुए देव हैं, उसके साथ कहानी जुड़ी है, जिसमें एक सामत राजा हुआ करते थे और उनका टांगीनाथ से युद्ध हुआ। टांगीनाथ ने उनके पैर काट दिए। जिस विशाल प्रतिमा की यहां चर्चा है, उसका पैर टूटा हुआ है और वह पैर परशु पर टिका है, तो ऐसा लगता है कि उस परशु से उनका पैर काट दिया गया है।

एक रोचक बात आई कि सम्मत राजा क्या है? वास्तव में कोई सामंत राजा था? कोई अर्द्धसंप्रभु राजनैतिक शक्ति यहां हुआ करती थी और जिसका यह केन्द्र था? यहां चाव से सुनी-सुनाई जाने वाली कहानियों में एक पात्र पछिमहादेव भी है। संयोग कि जिस प्रकार पालवंशी राजाओं के नाम में अंत में पाल जुड़ा होता था, उसी तरह यहां से पश्चिम में स्थित त्रिपुरी के कई कलचुरि राजाओं के नाम के अंत में देव रहा है। कहानी में पछिमहादेव के बैल का रूप धर लेने की बात भी कही गई है, तब ध्यान जाता है कि यह ‘पच्छिम-महादेव‘ तो नहीं! अब स्थल उत्खनन से उजागर हुआ कि यह एक विस्तृत पुरातात्विक-धार्मिक स्थल है और यह केन्द्र किसी सबल राजनैतिक प्रभुत्व के अधीन रहा होगा।

स्थल के राजनैतिक इतिहास को देखने में मुश्किल होती है जब कोई अभिलेख न मिले या पुराने साहित्य में कोई स्पष्ट उल्लेख/संदर्भ न आए। इसी तरह दूसरे स्रोत- कोई ताम्रपत्र, कोई शिलालेख, जिससे स्थल की प्राचीनता को जोड़कर समझ सकें, ऐसा कुछ खास प्रमाण यहां नहीं मिला है। शिव इस स्थल के प्रमुख देवता हैं, लेकिन यहां देवी मंदिर भी मिले हैं। एक बहुत महत्वपूर्ण मंदिर देवी चामुण्डा का मिला है। स्थानीय लोगों में ‘बोरजो टीला‘ नाम से ज्ञात स्थल की खुदाई से उद्घाटित स्मारक और मूर्तियों से अनुमान हुआ कि वह सूर्य का मंदिर है, यहां द्वादश आदित्यों की मूर्तियां रही होंगी।

आरंभिक संरचना उरांव टोली का शिव मंदिर, आठवीं सदी ईसवी का है। यहां से आगे लगभग तेरहवीं शताब्दी तक लगातार स्थापत्य गतिविधियों के प्रमाण यहां दिखाई पड़ते हैं। इससे स्पष्ट रूप से समझ में आता है कि यह एक धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक सक्रियता का केन्द्र रहा होगा। इस स्थल के चारों ओर पहाड़ियां हैं, बीच में सपाट मैदान है और सरगुजा की महत्वपूर्ण नदी, कन्हर यहां से गुजरती है। कन्हर नदी के बहाव की दिशा में उसके दाहिने तट पर यह स्थल स्थित है। यहां से एक किलोमीटर भी कम दूरी पर ऊपर बायीं ओर, सूर्या नाम की छोटी नदी, कन्हर में मिलती है। वहां से आधे-पौन किलोमीटर नीचे उतरते हैं तो गलफुल्ला नाम की दूसरी नदी दाहिनी ओर मिलती है। इस तरह भौगोलिक दृष्टि से यहां तीन नदियों का संगम है और यही स्थल के चयन के पीछे मुख्य कारण रहा होगा।
चइला पहाड़ पर उत्कीर्ण लेख
‘ॐ नमः विस्वकर्मायः।।‘
यहां का चइला पहाड़ उल्लेखनीय है, जहां से इन मंदिरों के निर्माण हेतु पत्थर लाए गए हैं, मंदिरों से बमुश्किल तीन किलोमीटर दूर है। चइला, छीलन को कहा जाता है, ऐसा स्थान जहां पाषाणखंड को छील कर कलाकृतियों का रूप-आकार दिया गया है। अब भी मौके पर आठवीं-नवीं सदी की लिपि में खुदे अक्षर और बड़ी तादाद में छीलन, अधबने उकेरे खंड बिखरे हुए हैं। प्रसंगवश, सरगुजा के एक अन्य महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल महेशपुर में भोजासागर-रनसागर जोड़ा तालाब के पास 'टांकीनारा' पत्थर खदान (टांका-टांकी शब्द सामान्यतः जोड़ने के अर्थ में प्रयुक्त होता है, लेकिन पत्थर को तोड़ने के लिए छेनी से चिह्न बनाने को, टांकी मारना कहा जाता है) भी इसी प्रकार का स्थान है।

आठवीं से तेरहवीं सदी तक, समाजार्थिक दृष्टि से या राजनैतिक दृष्टि से भी देखें तो यहां लगातार निर्माण का क्रम विद्यमान है। यहां छोटे-बडे, अलग-अलग देवी-देवताओं के मंदिर हैं और ढेरों अवशेष, इससे निष्कर्ष निकालने में कोई कठिनाई नहीं कि यहां धार्मिक सामंजस्य रहा है। यहां प्रभावी राजनैतिक शक्ति ने सभी को उदार स्वीकृति दी थी। सभी धर्म-सम्प्रदाय के मानने वालों के साथ उनकी सहमति थी कि वे वहां निर्माण करा सकें। डीपाडीह में रोचक एकाश्मीय लघु मंदिर भी है, जो संभवतः मंदिर निर्माण कराने की मान्यता-पूर्ति के लिए हैं।

माना जा सकता है कि इस पूरे दौर में डीपाडीह धार्मिक आस्था का केन्द्र बन गया था। स्वाभाविक ही, जो धार्मिक आस्था का केन्द्र होता है वहां ऐसी सामाजिक और आर्थिक गतिविधियां सक्रिय हो जाती हैं। डीपाडीह के लिए ऐसी मान्यताएं रही होंगी कि उस पुण्य क्षेत्र में मंदिरों का निर्माण कराया जाय और अपनी क्षमता, अपने सामर्थ्य के अनुसार मनौती पूरी होने पर, ऐसे छोटे मंदिर उस क्षेत्र में बनवाते रहे होंगे। स्पष्ट होता है कि हर आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक मान्यता के व्यक्ति के लिए यह ऐसा स्थल था, जो हर वर्ग-समुदाय की प्रबल आस्था का केन्द्र रहा और आज भी है।

इस स्थल के उत्खनन से उजागर तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकलता है कि सोमवंशी, जिन्होंने लगभग सातवीं-आठवीं सदी में सिरपुर जैसा महत्वपूर्ण केन्द्र विकसित किया और इस काल के मंदिरों में सोमवंशियों की एक विशिष्ट शैली की छाप है। इस शैली की दो-तीन उल्लेखनीय लक्षण- तारकानुकृति (स्टेलेट या स्टार शेप्ड प्लान) भूयोजना और स्थापत्य में ईंटों का प्रयोग है, जो डीपाडीह के उरांव टोली, शिव मंदिर जैसे स्थापत्य के अलावा अन्य मंदिरों में भी है। यहां छत्तीसगढ़ के मध्य-मैदानी आरंभिक राजवंश सोम-पांडु काल के कला-प्रमाण है लेकिन परवर्ती काल में 11 वीं सदी ईस्वी के रतनपुर कलचुरियों का राजनैतिक और कला-प्रभाव क्षेत्र व्यापक होने के बावजूद यहां लगभग अनुपस्थित है। यहां की कला त्रिपुरी, जबलपुर के कलचुरि, जो रतनपुर कलचुरियों के पूर्वज हैं, से मेल खाती है। नक्शे में देखें तो त्रिपुरी, जबलपुर से शहडोल होते हुए डीपाडीह तक सीधी क्षैतिज रेखा खींची जा सकती है।

प्राचीन स्थलों से विशेषकर खुदाई से प्राप्त होने वाले अवशेषों की दशा देखकर अक्सर किसी दुर्घटना, आपदा की धारणा बना ली जाती है। इस दृष्टि से डीपाडीह में उजागर हुए पुरावशेषों, कलाकृतियों, संरचनाओं को समझने का प्रयास करें तो बहुत सारी अनकही कहानी साफ तौर पर समझी जा सकती है, जिसे यों समझ पाना शायद ही संभव हो।

सामत सरना मंदिर के मंडप के बाहिरी भाग में नन्दी की प्रतिमा है, वह अपनी मूल स्थिति से थोड़ा टेढ़ा, खिसका हुआ है, जो साल के बड़े पेड़ की जड़ों के कारण है। अंदर मंडप में दोनों तरफ आदमकद मूर्तियां हैं। जिसमें विष्णु, महिषासुरमर्दिनी, कार्तिकेय की बहुत सुंदर मूर्तियां साथ ही वराह अवतार की मूर्ति है। ये सभी मूर्तियां खुदाई के दौरान मुंह के बल पड़ी हुई मिलीं थीं, जिससे उनके मूल स्थान को समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई, इन मूर्तियों की साफ-सफाई और उपचार कर ठीक उसी जगह पर उनकी चौकी-पादपीठ, जो मूल स्थान पर सुरक्षित थी, पर खड़ा कर दिया। इसी तरह मंदिर के मुख्य प्रवेशद्वार के सामने दोनों द्वारशाखा और सिरदल, मुंह के बल पड़े मिले। एक ही पाषाणखंड वाले सिरदल पर गजलक्ष्मी के बगल का हिस्सा गहरा उकेरा हुआ है जिसकी वजह से वह हिस्सा टूटा और सिरदल के दो टुकड़े हो गये थे। उसे जोड़ने के लिए पत्थर में छेदकर सरिया और रसायनिक उपचार की मदद से दोनों हिस्सों को जोड़ा गया और इसके बाद उसे फिर वापस मूलरूप में खड़ा कर दिया गया।

डीपाडीह के लिए अनुमान किया जा सकता है कि 13वीं-14वीं सदी ईसवी के बाद स्थल की मान्यता वैसी नहीं रह सकी, जितनी 500 सालों में यानि 8वीं से 13वीं सदी ईसवी तक। धीरे-धीरे स्थल उपेक्षित होता गया, रखरखाव अभाव हुआ और संरचनाएं जर्जर होकर गिर गईं। डीपाडीह के लिए पूरे भरोसे से कहा जा सकता है कि वहां न कोई तोड़फोड़ हुई न भूकंप आया था।

डीपाडीह में पुरानी बावड़ियां हैं, एक छोटा सा रानी पोखर है, उसी तरह सामत-सरना मंदिर के पिछवाड़े एक बावली है। उस बावली को साफ करने की चर्चा बार-बार काम करने वालों और गांव वालों के बीच होती थी, काम शुरू हुआ तो आसपास के गांवों से लोग आने लगे तो पता लगा कि उस बावली में बहुत सारा धन गड़े होने की बात कही जाती है। बात का रस लेते हुए हमलोगों ने पूछा कि क्या मान्यता है, खजाना कितना नीचे है? किसी ने कहा एक पोरिस, पुरुष प्रमाण गहराई में, किसी ने कुछ और। पुरातत्वीय दृष्टि से जांच के लिए एक कोने पर ‘पिट’ लिया कि किसी तरह के पुरावशेष की क्या संभावना हो सकती है? वहां प्राकृतिक भराव वाली मिट्टी ही निकली, लोगों को भी इससे तसल्ली हो गई।

किसी अल्पज्ञात, नए-नवेले से पुरातात्विक स्थल पर बात करना, तब चुनौती जैसा होता है, जब आप विशेषज्ञ की भूमिका निर्वाह करने बैठे हों। डीपाडीह पर बात करते हुए मुझे यह महसूस हुआ था। यह स्थिति कुछ अन्य स्रोत-सामग्री का उदारता से इस्तेमाल करने की छूट मिलती है और स्थापना में पूर्व संदर्भों का दबाव नहीं रहता, उपलब्ध तथ्य-कारक और जानकारियों-प्रमाणों के आधार पर जिस अधिकतम स्तर तक तार्किक संभावना-स्थापना चाहें, प्रस्तुत की जा सकती है यहां ऐसा ही प्रयोग-प्रयास है , क्योंकि सरगुजा के इस अंचल का लिखित-अभिलिखित प्रमाण नहीं मिलता जिस आधार पर इससे अधिक कुछ तय किया जा सके। शिल्प-स्थापत्य परम्परा का सातत्य भी अधिक मदद नहीं करता। डीपाडीह किसी दिशा से प्रवेश करें, पहुंच कर हर बार लगता है, ये कहां आ गए हम! यहां भौगोलिक-ऐतिहासिक दृष्टि से पाल वंश और शिल्प परम्परा-साम्यता की दृष्टि से शरभ-सोमवंशी और त्रिपुरी कलचुरियों की साफ-साफ छाप जरूर पहचानी जा सकती है।