Tuesday, October 5, 2021

गणेश

‘ओम्’ और ‘सिद्धम्’ भारतीय परम्परा में शुभारंभ का प्रतीक है, बीज मंत्र है और यही मंत्र आगे चलकर ‘श्री गणेशाय नमः’ बना। किसी कार्य के आरंभ के लिए ‘श्री गणेश करना’ पर्यायवाची ही बन गया। अब प्रचलित ‘श्री गणेशाय नमः’ में ‘ओम’और ‘सिद्धम्’ के तत्व विद्यमान हैं। यद्यपि कहीं-कहीं अभी भी ‘ओम नमः सिद्धम्’ का मंत्र अपभ्रंश रूप में ‘ओड़ा मासी ढम’कहा जाता है। 

हमारी परम्परा के पांच प्रमुख सम्प्रदायों में से एक ‘गाणपत्य सम्प्रदाय’ है। गणेश से संबंधित परम्परा की प्राचीनता के प्रमाण वैदिक साहित्य से मिलना प्रारंभ होता है, जहां उनका ‘वक्रतुण्ड’ नाम उनके गजानन, गजकर्ण होने का तथा ‘दन्ती’ नाम उनके एकदन्त होने का स्पष्ट संकेत देता है। इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर उन्हें वक्रतुण्ड और दन्ती के साथ-साथ कराट और हस्तिमुख नाम से भी पुकारा गया है, इससे स्पष्ट होता है कि वैदिक काल से ही गणेश का गजानन अर्थात् हाथी के सिर वाला रूप प्रचलित था और इसके साथ इस आशय के उद्धरण भी मिलते हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि गणेश के भिन्न-भिन्न रूपों की उपासना तथा गणेश उपासकों के भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय प्राचीन काल से विद्यमान हैं।

गणेश का नाम स्मरण वैसे तो प्रत्येक अवसर पर किया जाना चाहिए, किन्तु विद्यारंभ, विवाह, नगर अथवा नवनिर्मित भवन में प्रवेश, यात्रादि, संग्राम पर जाते हुए अथवा किसी भी प्रकार की विपत्ति के समय गणेश के द्वादश नाम के स्मरण की विशेष महत्ता बताई गई है। ये बारह नाम इस प्रकार हैं- सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशन, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन। वस्तुतः गणेश के ये बारह नाम, उनकी विशेषताओं के भी द्योतक हैं।

भारतीय कला में गणेश प्रतिमाओं का प्रारंभिक रूप और उपासना में ‘यक्ष’ और ‘नाग’ परम्पराओं का समावेश माना गया है। गणेश के रूप-आकार में ठिंगना कद, छोटी टांगें, बड़ा पेट तथा हाथी का मुॅंह और मस्तक विशेष रूप से दिखाई पड़ती हैं। यह लक्षण यक्ष प्रतिमाओं के अत्यंत निकट है, चूॅंकि सभी यक्षों के मुख अनिवार्यतः मानव के नहीं होते, बल्कि पशुओं जैसे गोमुख, अश्वमुख आदि भी होते हैं। भारतीय कला के मर्मज्ञ-चिंतक आनंद कुमारस्वामी ने गणेश प्रतिमा का मूल अमरावती स्तूप से मिले एक उष्णीश पर अंकित गज-मुख यक्ष में दिखलाया है। प्रख्यात प्रतिमाशास्त्री जे.एन. बैनर्जी ने गणेश का विद्या से संबंध उनके वैदिक ब्रह्मणस्पति या बृहस्पति के नाम-साम्य के कारण प्रतिष्ठित होने की संभावना व्यक्त की है। 

गणेश के प्रतिमाशास्त्रीय लक्षणों में उन्हें गजमुख के साथ अन्य प्रतिमा भेदों में हेरम्ब रूप में पंचमुखी दिखाये जाने का उल्लेख शास्त्रों में प्राप्त होता है इसी प्रकार गणेश की सामान्य द्विनेत्र वाली प्रतिमाओं के अतिरिक्त, उनके त्रिनेत्र रूप वाली प्रतिमाओं का विधान भी शास्त्रों में उपलब्ध है। गणेश की प्रतिमाएं सामान्यतः चतुर्भुजी प्राप्त होती हैं, किन्तु द्विभुजी, षट्भुजी, अष्टभुजी, दशभुजी और अष्टादशभुजी गणेश प्रतिमाओं के उदाहरण भारतीय कला के साथ-साथ आंचलिक कलाकृतियों में उपलब्ध हुए हैं। उनकी भुजाओं में दंत, परशु, पद्म और मोदक दिखाए जाने का विधान है साथ ही पाश, अंकुश, मुद्गर के अतिरिक्त उन्हें मूली लिए भी दिखाये जाने का विधान और उदाहरण है। मंगलकारी रूप में उनके हाथ वरद और अभय मुद्रा में प्रदर्शित होते हैं। वाहन के रूप में मूषक दिखाया जाता है, जो धर्म का प्रतीक है। उन्हें अधिकतर करण्ड मुकुटधारी दिखाया गया है। गणेश की प्रतिमाएं आसन, स्थानक, नृत्य मुद्रा में, मातृकाओं के साथ अथवा युगल रूप में शक्ति वैनायिकी के साथ प्राप्त होती हैं।
मल्हार के पंचमुखी हेरम्ब गणेश

छत्तीसगढ़ का क्षेत्र विपुल पुरातात्विक प्राप्तियों से सम्पन्न क्षेत्र है। इस अंचल से इतिहास के मौर्य, शुंग-सातवाहन, कुषाण, गुप्त-वाकाटक युगों के समकालीन तथा क्षेत्रीय राजवंशों में राजर्षितुल्य कुल, शरभपुरीय, नल, पाण्डु-सोम, नाग, कलचुरि आदि के विविध पुरावशेष प्राप्त हुए हैं, जिनमें बिलासपुर के मल्हार, रतनपुर, ताला, खरौद, रायगढ़ के पुजारीपाली (सरिया), सरगुजा के डीपाडीह, महेशपुर, बेलसर, कलचा-भदवाही, रायपुर के राजिम, सिरपुुर, आरंग, दुर्ग-राजनांदगांव के भोरमदेव, बिरखा घटियारी, देव बलौदा, नगपुरा, बस्तर के बारसूर, दंतेवाड़ा, भैरमगढ़ जैसे प्रमुख स्थान हैं।

छत्तीसगढ़ क्षेत्र में शैव परिवार के देवताओं में शिव के विभिन्न रूपों के साथ भैरव, कार्तिकेय, गौरी-पार्वती और नंदी के साथ गणेश की प्रतिमाएं भी प्राप्त होती हैं। इस अंचल से गणेश की स्वतंत्र प्रतिमाएॅं भी बड़ी संख्या में प्राप्त हुई हैं। इसके साथ ही गणेश की प्रतिमाएं प्रवेश द्वार पर तथा सिरदल के मध्य अंकित किये जाने की परंपरा रही है, जिसके फलस्वरूप सिरदल को गणेश पट्टी तथा मुख्य द्वार को गणेश-द्वार के नाम से अभिहित किया गया है। छत्तीसगढ़ अंचल से प्राप्त गणेश प्रतिमाओं का काल लगभग छठवीं सदी ईस्वी से तेरहवीं सदी ईस्वी तक है।

गणेश की आरंभिक प्रतिमाओं में ताला के देवरानी मंदिर के सोपान क्रम के उत्तर में स्थित विशाल आकार की गणेश प्रतिमा विशेष उल्लेखनीय है। यह प्रतिमा परवर्ती संरचना के कारण ढंकी हुई थी, जिसे मलबा-सफाई के दौरान प्राप्त किया गया। प्रतिमा अपने मूल प्राप्ति स्थान पर साफ किये गए निम्नतलीय स्थल पर अब भी विद्यमान और दर्शनीय है। अंचल के प्रसिद्ध पुरातात्विक स्थल मल्हार से गणेश की विभिन्न काल और प्रकार की प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं, जिसमें पातालेश्वर मंदिर परिसर में रखी पंचमुखी हेरम्ब गणेश का विशाल प्रतिमा खंड, अपने कला-सौंदर्य और विशिष्ट प्रतिमा लक्षण के कारण उल्लेखनीय है। पातालेश्वर मंदिर के प्रवेश द्वार में एक अन्य विशिष्ट विग्रह शक्ति सहित गणेश विद्यमान है। रतनपुर की गढ़ी में भी एक विशाल किन्तु खंडित प्रतिमा के भाग अवशिष्ट हैं।

बारसूर के मामा-भांचा मंदिर के सामने स्थापित गणेश की प्राचीन प्रतिमा आकार की दृष्टि से संभवतः प्रदेश की विशालतम प्रतिमा है। आकार की विशालता के साथ-साथ प्रतिमा का कलात्मक सौंदर्य और दक्षिण भारतीय अलंकरण परम्परा का प्रभाव भी विशेष उल्लेखनीय है। सरगुजा क्षेत्र से भी गणेश की विभिन्न प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं, इनमें डीपाडीह से प्राप्त नृत्य-गणेश की प्रतिमा अत्यंत आकर्षक है। प्रतिमा को उत्कीर्ण करने में कलाकार को गति, लय, लास्य और संतुलन के साथ हस्त और पादमुद्रा के प्रदर्शन में जो सफलता प्राप्त हुई है वह सुदीर्घ परम्परा और उसके कौशल की सीमा स्पष्ट कर सकने में सक्षम है। इसी स्थान से प्राप्त एक अन्य गणेश प्रतिमा का शुण्ड दक्षिणावर्त प्रदर्शित किया गया है, जो तांत्रिक परम्पराओं के प्रभाव का अनुमान कराता है।

छत्तीसगढ़ अंचल के जिन अन्य स्थानों से गणेश की प्रतिमाएं ज्ञात हैं, उनमें से कुछ प्रमुख स्थानों के नाम इस प्रकार हैं- जांजगीर, पाली, खरौद-शिवरीनारायण, सरगांव, गोढ़ी-किरारी, देवगढ़, बेलसर, पुजारीपाली, सिरपुर, राजिम, पलारी, तुमान, भोरमदेव, देव बलौदा, गंडई, घटियारी, कांकेर, दन्तेवाड़ा, भैरमगढ़ आदि। इसके अतिरिक्त बिलासपुर, रायगढ़, खैरागढ़, रायपुर आदि संग्रहालयों और तुमान, मल्हार आदि स्थानों के स्थल संग्रह में भी गणेश प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं।

गणेश की पूजा परम्परा के प्रमाण न केवल भारत, बल्कि अन्य देशों यथा जावा, सुमात्र, अफगानिस्तान, बाली, बर्मा, थाईलैण्ड, कम्बोडिया आदि देशों में भी प्राप्त होती है। गणेश की लोकप्रियता में जहां एक और उनके गण अधिपति, बुद्धि के देवता, विघ्न विनाशक, नृत्य-प्रवीण और तांत्रिक शक्तियों के इष्ट के रूप में मान्यता है वहीं दूसरी ओर पुराणों में कार्तिकेय के साथ उनके बालसुलभ विवाद तथा इस प्रकार के अन्य कई मनोरंजक प्रसंग भी प्राप्त होते हैं, जिनका अंकन प्राचीन मूर्तिकला के साथ ऐतिहासिक चित्रों में भी किया गया है।

इस अंचल के शिलालेखों में भी गणेश की वंदना की गई है, इनमें वाहर के कोसगईं शिलालेख में अत्यंत साहित्यिक ढंग से उनकी क्रीड़ा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वे लंबोदर आपकी रक्षा करें, जो बालक होने पर भी अपनी मति का अनुसरण करते हैं। इसी प्रकार ब्रह्मदेव के रायपुर शिलालेख में गणेश की वन्दना इन शब्दों में की गई है-वे गणेश आपकी रक्षा करें, जो विघ्न रूपी अंधकार दूर करने के लिए एक ही सूर्य हैं, विघ्नरूपी अटवी को जलाने वाले अग्नि हैं, विघ्नरूपी सांपों के कुल को नष्ट करने वाले गरूड़ हैं, विघ्नरूपी हाथियों के लिए सिंह हैं, विघ्नरूपी ऊंचे पर्वतों को फोड़ डालने के लिए वज्र हैं, विघ्नों के समुद्र को सोखने के लिए बड़वाग्नि सदृश हैं और विघ्नरूपी मेघों को उड़ा देने के लिए प्रचण्ड वायु हैं।

इस प्रकार की ऐतिहासिक, साहित्यिक रचनाओं और प्रतिमा के रूप में उत्कीर्णित गणेश के विभिन्न रूपों में, छत्तीसगढ़ अंचल की महान सांस्कृतिक और कलात्मक धरोहर की स्पष्ट और सम्पन्न परम्परा के दर्शन होते हैं।

यह आलेख मूलतः बिलासपुर आकाशवाणी के लिए तैयार किया गया था, ‘छत्तीसगढ़ के पुरातत्व में उत्कीर्णित गणेश प्रतिमाएं‘ शीर्षक वार्ता का प्रसारण 26.08.1998 को हुआ था। 2019 में प्रकाशित डॉ. कामताप्रसाद वर्मा जी की पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ का पुरातत्व एवं प्रतिमाएं तथा अन्य स्रोतों से मिली गणेश प्रतिमा-स्थलों की जानकारियां यहां जोड़ी गई है।
कहा जाता है कि के.ए. अंसारी ने संकल्प किया कि
शंकर नगर-अनुपम नगर, रायपुर में न बिकने वाले प्लाट का
जल्दी सौदा हो जाए तो गणेश मंदिर बनवाएंगे।
संकल्प के बाद उनकी मनोकामना शीघ्र पूरी हुई और
उन्होंने 1985 में इस गणेश मंदिर का निर्माण कराया।

बस्तर- इस दौरान फरसपाल गांव के पास, लगभग 2100 फुट की दुर्गम उंचाई पर स्थित, छिंदक नागवंशकालीन ढोलकल गणेश की महत्वपूर्ण प्रतिमा प्रकाश में आई और लगातार चर्चा में रही। इसके अलावा बारसूर स्थल संग्रह में, सिंघईगुड़ी में, छिंदगांव में, दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा के मंडप में काले पत्थर की विशाल प्रतिमा। बड़े डोंगर- कोंडागांव से 50 किलोमीटर दंतेश्वरी मंदिर के पास बालाजी मंदिर के गर्भगृह और प्रांगण में तीन प्रतिमाएं। कांकेर के शीतला मंदिर में एक तथा बालाजी मंदिर में दो प्रतिमाएं।

सरगुजा- डीपाडीह, सामत सरना मुख्य मंदिर मंडप में, तथा अन्य दो, चामुंडा मंदिर, स्थल संग्रह में। महेशपुर और देवटिकरा में, कोरिया सोनहत में।

अन्य- फिंगेश्वर, धमधा। किरारी गोढ़ी, बिल्हा। सिद्धेश्वर मंदिर, पलारी। खपरी तथा कपिलेश्वर मंदिर बालोद । कर्णेश्वर मंदिर, सिहावा, सिहावा से 15 कि.मी. गढ़ डोंगरी पर रखी प्रतिमा। धमतरी से 15 किलोमीटर देवपुर और डोंगा पथरा के बीच तालाब के पास रखी प्रतिमा। भोरमदेव मंदिर में, शिव मंदिर, घटियारी। राजनांदगांव संग्रहालय में, कटंगी और खैरागढ़ संग्रहालय में। धमतरी जिले के दुधावा बांध के डुबान में देवखुट, शिव मंदिर के सामने रखी प्रतिमा। देव बलौदा शिव मंदिर के मंडप में गर्भगृह के दोनों ओर दो प्रतिमाएं। गुरुर तालाब के किनारे चतुर्भुजी प्रतिमा। राजिम, राजीव लोचन मंदिर के वाह्य द्वार पर तथा रामचंद्र मंदिर के मंडप में अष्टभुजी प्रतिमा। सिरपुर, सुरंग टीला के पांच में से एक मंदिर में स्थापित तथा लक्ष्मण मंदिर परिसर में खुदाई से प्राप्त।

पत्रकार साथियों का आभार कि पर्व-त्यौहारों पर पूछते-
 छत्तीसगढ़ में क्या परंपरा रही है,
उनके जवाब की तैयारी में
इस बहाने पढ़ना-लिखना हो जाता था।


Monday, October 4, 2021

अभिलेख सूची

छत्तीसगढ़ के प्राचीन अभिलेखों- शिलालेख, ताम्रपत्र आदि की यह सूची, समय-समय पर अद्यतन की जा रही है।

• सुतनुका देवदासी का रामगढ़ (सरगुजा) जोगीमारा गुहालेख
• रामगढ़ (सरगुजा) सीताबेंगरा गुहालेख
• किरारी काष्ठ स्तंभलेख
• आरंग ब्राह्मी शिलालेख
• कुमारवरदत्तश्री का ऋषभतीर्थ गुंजी भित्तिलेख
• मल्हार से प्राप्त 'राधिकस' शिलालेख- बिलासपुर संग्रहालय
• बूढ़ीखार, मल्हार विष्णु प्रतिमालेख
• छातागढ़ का प्रथम शिलालेख- रायपुर संग्रहालय
• छातागढ़ का द्वितीय शिलालेख- रायपुर संग्रहालय
• आतुरगांव, कांकेर का शिलालेख
• मल्हार का 'सक अमचस' शिलालेख
• सेमरसल का खंडित शिलालेख
• मदकूदीप का प्रथम शिलालेख
• मदकूदीप का द्वितीय शिलालेख
• तरेंगा का शिलालेख
• पाण्डुका का शिलालेख
• राजर्षितुल्य कुल के भीमसेन द्वितीय का आरंग ताम्रलेख, गुप्त संवत 182?
• मेकल पाण्डुवंश के उदीर्ण्णवैर (शूरबल) का बम्हनी ताम्रलेख राज्यवर्ष 2
• सामंत इन्द्रराज का मलगा ताम्रपत्र राज्यवर्ष 1 या 11
• मल्हार का मेकल पाण्डुवंश का अधूरा ताम्रलेख
• शूरबल का मल्हार का ताम्रलेख राज्यवर्ष 8
• नरेन्द्र का पिपरदुला ताम्रलेख राज्यवर्ष 3
• नरेन्द्र का कुरूद ताम्रलेख राज्यवर्ष 24
• नरेन्द्र का रवांन (मल्हार) का अधूरा ताम्रलेख
• जयराज का अमगुड़ा ताम्रलेख राज्यवर्ष 3
• जयराज का मल्हार ताम्रलेख राज्यवर्ष 5
• जयराज का आरंग ताम्रलेख राज्यवर्ष 5
• जयराज का मल्हार ताम्रलेख राज्यवर्ष 9
• सुदेवराज का नहना ताम्रलेख राज्यवर्ष 2
• सुदेवराज का धमतरी ताम्रलेख राज्यवर्ष 3
• सुदेवराज का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 7
• सुदेवराज का आरंग ताम्रलेख राज्यवर्ष 7
• सुदेवराज का कौआताल ताम्रलेख राज्यवर्ष 7
• सुदेवराज का रायपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 10
• सुदेवराज का सारंगढ़ (चुल्लाण्डरक ग्रामदान) ताम्रलेख
• सुदेवराज का पोखरा ताम्रलेख (मध्य पृष्ठ)
• प्रवरराज का ठकुरदिया ताम्रलेख राज्यवर्ष 3
• प्रवरराज का मल्हार ताम्रलेख राज्यवर्ष 3
• रक्सा (पोखरा) ताम्रलेख
• अमरार्यकुल के व्याघ्रराज का मल्हार ताम्रलेख राज्यवर्ष 4
• कोसल पाण्डुवंश के ईशानदेव का लक्ष्मणेश्वर मंदिर, खरौद शिलालेख
• तीवरदेव का बोंडा ताम्रलेख राज्यवर्ष 5
• तीवरदेव का राजिम ताम्रलेख राज्यवर्ष 7
• तीवरदेव का बलौदा ताम्रलेख राज्यवर्ष 9
• तीवरदेव का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष
• तीवरदेव का (तिरुवनंतपुरम) ताम्रलेख राज्यवर्ष
• नन्नराज का अड़भार (अधूरा)ताम्रलेख
• भवदेव रणकेसरी का आरंग या भांदक में प्राप्त शिलालेख
• वासटा का लक्ष्मण मंदिर (सिरपुर) से प्राप्त शिलालेख
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का बरदुला ताम्रलेख राज्यवर्ष 9
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का बोंडा ताम्रलेख राज्यवर्ष 22
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का मल्लार ताम्रलेख फाल्गुन वर्ष- 57
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का लोधिया ताम्रलेख राज्यवर्ष 57
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का मल्लार ताम्रलेख
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 25
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 37
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 38
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 46
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 48
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख राज्यवर्ष 55
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख तिथिरहित कतम्बपदूल्लक ग्रामदान लेख
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख तिथिरहित कोशम्ब्रक ग्रामदान लेख
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख तिथिरहित चोरपद्रक ग्रामदान लेख
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख
• महाशिवगुप्त बालार्जुन का सिरपुर ताम्रलेख
• मल्हार के रघुनंदन प्रसाद पाण्डेय और गुलाब सिंह ताम्रलेख
• सिरपुर गंधेश्वर मंदिर से प्राप्त जोर्ज्जराक शिलालेख व अन्य शिलालेख
• सेनकपाट, सिरपुर शिलालेख
• सिरपुर सुरंग टीले से प्राप्त शिलालेख
• बुद्धघोष का सिरपुर के निकट प्राप्त शिलालेख
• मल्हार का तिथिरहित कैलासपुर ग्रामदान ताम्रलेख
• तिथिरहित शुष्क सिरिल्लिका ग्रामदान ताम्रलेख,
• तिथिरहित पातिकारसीमक ग्रामदान का अधूरा ताम्रलेख
• मल्हार का बासिन डिपरा शिलालेख
• सिरपुर गंधेश्वर मंदिर के शिलालेख

• भवदत्तवर्मन का रिठापुर ताम्रपत्र, राज्यवर्ष-11
• स्कंदवर्मन? का पोड़ागढ़ शिलालेख, राज्यवर्ष-12
• अर्थपति भट्टारक का केसरीबेड़ा ताम्रपत्र, राज्यवर्ष-7
• विलासतुंग का राजिम शिलालेख

• बड़े डोंगर (बस्तर) का उभपार्श्वीय शिलालेख
• मोहला (दुर्ग) का वाकाटक अधूरा ताम्रलेख
• शिवदुर्ग का दुर्ग में प्राप्त शिलालेख
• मदकूदीप से प्राप्त दो शिलालेख

• त्रिपुरी कलचुरियों का महेशपुर शिलालेख
• डीपाडीह शिलालेख

• पृथ्वीदेव प्रथम का रायपुर ताम्रलेख कलचुरि संवत 821
• पृथ्वीदेव प्रथम का अमोदा ताम्रलेख कलचुरि संवत 831
• जाजल्लदेव प्रथम का रतनपुर शिलालेख कलचुरि संवत 866
• जाजल्लदेव प्रथम के पाली मंदिर के लघु लेख
• रत्नदेव द्वितीय का शिवरीनारायण ताम्रलेख कलचुरि संवत 880
• रत्नदेव द्वितीय का सरखों ताम्रलेख कलचुरि संवत 880
• रत्नदेव द्वितीय कालीन अकलतरा शिलालेख
• रत्नदेव द्वितीय का पारागांव ताम्रलेख कलचुरि संवत 885
• पृथ्वीदेव द्वितीय कालीन कोटगढ़ शिलालेख
• पृथ्वीदेव द्वितीय का दहकोनी ताम्रलेख कलचुरि संवत 890
• रत्नदेव द्वितीय कालीन कुगदा शिलालेख कलचुरि संवत् 893
• रत्नदेव द्वितीय का पासिद ताम्रलेख कलचुरि संवत 893
• पृथ्वीदेव द्वितीय का बिलाईगढ़ में प्राप्त ताम्रलेख कलचुरि) संवत् 896
• राजिम शिलालेख कलचुरि संवत 896
• पारागांव ताम्रपत्र कलचुरि संवत 897
• शिवरीनारायण मूर्तिलेख कलचुरि संवत् 898
• कोनी शिलालेख कलचुरि संवत 900
• अमोदा ताम्रलेख कलचुरि संवत 900?
• पृथ्वीदेव द्वितीय का घोटिया में प्राप्त ताम्रलेख कलचुरि संवत 1000? (900)
• गोपालदेव का पुजारीपाली शिलालेख
• पृथ्वीदेव द्वितीय का अमोदा में प्राप्त ताम्रलेख कलचुरि संवत् 905
• पृथ्वीदेव द्वितीय कालीन रतनपुर शिलालेख कलचुरि संवत 910
• पृथ्वीदेव द्वितीय कालीन रतनपुर शिलालेख कलचुरि संवत 915
• जाजल्लदेव द्वितीय का समडील शिलालेख क.सं. 913
• जाजल्लदेव द्वितीय का अमोदा ताम्रलेख कलचुरि संवत् 91(9)
• जाजल्लदेव द्वितीय कालीन मल्हार शिलालेख कलचुरि संवत 919
• अमरकंटक मूर्तिलेख कलचुरि संवत 922
• रत्नदेव तृतीय का खरौद शिलालेख कलचुरि संवत 933
• पासिद ताम्रलेख कलचुरि संवत 934
• प्रतापमल्ल का पेंडराबंध ताम्रलेख कलचुरि संवत 965
• प्रतापमल्ल का कोनारी ताम्रलेख कलचुरि संवत 968
• प्रतापमल्ल का बिलाईगढ़ ताम्रलेख कलचुरि संवत् 969
• वाहर के महामाया मंदिर, रतनपुर शिलालेख संवत 1552
• वाहर का कोसगई प्रथम शिलालेख
• वाहर का कोसगई द्वितीय शिलालेख विक्रम संवत 1570
• ब्रह्मदेव का रायपुर शिलालेख विक्रम संवत् 1458
• हरि ब्रह्मदेव का खल्लारी शिलालेख विक्रम संवत 1470
• भानुदेव का कांकेर शिलालेख शक संवत 1242
• अमरसिंह देव का आरंग ताम्रपत्र संवत 1792

• लखनी देवी मंदिर, रतनपुर शिलालेख
• लहंगाभाठा जबलपुर संग्रहालय शिलालेख

• मलुगिदेव का कोटेरा ताम्रलेख शक संवत 1106
• भोजदेव का कोटेरा ताम्रलेख शक संवत 1126 का ताम्रलेख
• भोरमदेव से प्राप्त सं. 1407 का सती शिलालेख
• देवकूट मंदिर शिलालेख

• बाघराज का तिथिरहित गुरुर स्तंभलेख
• कर्णराज का सिहावा लेख शक संवत 1114 (ईस्वी 1191-92)
• पम्पराज के दो ताम्रपत्र लेख कलचुरि संवत 965 और 966 (ईस्वी 1213 और 1214)
• भानुदेव का कांकेर शिलालेख शक संवत 1242 (ईस्वी 1320)


• रतनपुर कर्णार्जुनी मंदिर शिलालेख सं.1927
• शिवरीनारायण सिंदुरगिरी मंदिर शिलालेख

रत्नपुर भोंसलाकालीन उत्कीर्ण लेख
• रतनपुर कर्णार्जुनी मंदिर शिलालेख संवत 1927
• शिवरीनारायण सिंदुरगिरी मंदिर शिलालेख
• सरगुजा अंचल के अन्य उत्कीर्ण लेख
• महेशपुर से प्राप्त त्रिपुरी कलचुरियों का शिलालेख
• डीपाडीह शिलालेख

मेरे द्वारा तैयार यह सूची पूर्व में इस ब्लाग के पेज के रूप में थी, अब पोस्ट के रूप में प्रस्तुत की गई है। पोस्ट पर आई टिप्पणियों को भी यथावत रखा जा रहा है।

1. शकुन्तला शर्मा June 10, 2013 at 6:26 PM छत्तीसगढ की पावन धरा इतनी समृध्द है, ऐसा तो मैने कभी सोचा भी नहीं था, मुझे लगता है कि जिस तरह राहुल जी की गति बढ रही है, यह लिस्ट भी बढेगी। जितने भी शिलालेख, भित्तिलेख, गुहालेख, स्तम्भलेख, प्रतिमालेख एवम् ताम्रपत्रलेख उपलब्ध हैं, इन सबको शीघ्रातिशीघ्र, पढने की उत्कट इच्छा हो रही है। राहुल जी की साधना स्तुत्य है।
2. RAM SUMER July 16, 2013 at 6:18 PM Mati m mil jaahi re mati ke chola kaakhar karaun main gumaan. ... Sir! Ye abhilekh likhne-likhaane vaale raaje -mahaaraaje yaa unke vansh ke log smy ke pravaah me kahaan kho gaye sir.....! Aur chhattisgarh fir se matiyaet hone jaa rahaa hai power plant ke baadh me.... Jim kisaano ko kayi sau saal tk unke kheton ko pani ke liye trsna padaa.... ab apne purkhon ki thaati ko kaudiyon ke daam bechkr kin dhoolkno me gum ho jayenge. pta nhi ?
3. Unknown January 8, 2019 at 9:22 PM Excellent knowledge sir...
4. mspotapani April 25, 2020 at 8:27 PM दुर्लभ संकलन एवं शोध के लिए सादर-सादर नमन सरजी।
5. Anonymous July 1, 2020 at 2:49 PM सर इसमें धमधा के महामाया मंदिर का शिलालेख और दानी तालाब का ताम्रपत्र भी जोड़ सकते हैं।
6. Unknown July 8, 2021 at 11:10 PM Sbhi shilalekh k bare m detail jankari upload kre....

Sunday, October 3, 2021

महामाया मंदिर शिलालेख

रतनपुर, जिला- बिलासपुर के मां महामाया मंदिर के प्रवेश द्वार के सामने दोनों स्तंभों पर शिलालेख हैं। जन-सामान्य की जिज्ञासा-पूर्ति के लिए इनकी जानकारी मंदिर परिसर में लगाई जाए, इसके लिए समय-समय पर पं. राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल जी, ठाकुर बलराम सिंह जी, मधुकर गोरख जी और सुनील सोन्थलिया जी से चर्चा होती रही, यह अब तैयार कर पाया। यहां प्रस्तुत जानकारी मुख्यतः, पद्मभूषण महामहोपाध्याय वासुदेव विष्णु मिराशी के पाठ के आधार पर है। इन शिलालेखों की लिपि नागरी और भाषा संस्कृत है।

प्रथम शिला
1. श्री मद्रत्नपुरं पुरंदरपुरं देवैर्नरैर्दुर्लभं तत्रास्ति क्षितिपालनैकनृपतिः श्री
2. वाहरेंद्रः स्वयम्। तत्तत्रैव गजेंद्रषष्टि गुडितमेकं सहस्त्रं हयानाम् संग्रामे रि-
3. पुमर्दनं नरीविषमं वह्नेश्च तेजाजोधिकम् ।।1।। श्रीमान्वाहररायस्य सर्वकार्ये-
4. षु सेवकः। तत्ऱास्ति(?) नाम्ना गोविदों रत्नपुर प्रजाधिपः ।।2।। सर्वजीवदयापालः सा
5. मिती राजभारकः। कार्याकार्यसमर्थोयं गोविंदो नाम विश्रुतः।।3।।

अनुवाद
1. पुरंदरों की नगरी रत्नपुर, देवताओं और मनुष्यों के लिए भी दुर्गम है। पृथ्वी की रक्षा में अप्रतिम राजा वाहरेन्द्र वहां स्वयं निवास करते हैं। इसी स्थान पर 1000 अश्व के साथ 60 गज भी हैं, जो अग्नि से भी अधिक तेजस्वी और युद्ध में शत्रुओं के विनाशक हैं।
2. यहां गोविन्द नामक रत्नपुर के नगरपति हैं, जो राजा वाहर के प्रत्येक कार्यों में सेवक हैं।
3. अपनी सहृदयता के लिए ज्ञात गोविन्द सभी जीवों के रक्षक हें तथा अपने स्वामी के राज्य के सभी दायित्वों के भारसाधक हैं और जो निष्पादन या निरूद्ध के क्षमतावान हैं।

Translation
Verse 1- The famous Ratnapura the city of Purandara, inaccessible for gods and men. There resides Vahrendra himself, a unique king in respect of protection of the earth. At the same place there are a thousand horses together with sixty elephants, more lustrous than fire and destructive of foes in battle.
Verse 2- There is named Govind, the Mayor of Ratnapur and the servant of the king Vahara in all affairs.
Verse 3- Govinda is well known as a kind, who protects all creatures, who bears the burden of the kingdom of his lord, has power to do or to desist from doing.

द्वितीय शिला
1. ओम्। श्रीविश्वकर्मणे नमः।। हृदयं च दयाधर्म्मः।। कोकासवंशदीपकः।। शिल्पशास्त्रेषु
2. विख्यातः।। छीतकुः सूत्रधारिणाम्।।1।। देवगुरूप्रसादेन।। पंचविद्यामहोदधिः।। रेखना
3. रायणो वापि।। गुणवान्सत्यवाक्तथा।।2।। काष्ठपाषाणके चैव।। कनकेपि च ली
4. लया।। यंत्रविद्या महाविद्या।। छीतकोः सूत्रधारिणः।।3।। वंकत्रीवंकवादनं(?)।।
5. वल्लीपत्रादिकैः नरै?।। त्रिताल सप्ततालं च।। छीतकु सूत्रधारिणः।।4।। विद्
6. पतिश्च गभीरः।। हृदयं केशवे वसेत्। मन्मथः सुतः कर्ता च।। छीतकुः सूत्रधारकः
7. ।।5।। उपांगरूपवादी च।। काम सारगृहे सदा।। शास्त्रजपी त्रिभक्तश्च।। मांडनो
8. लघुबांधवः।।6।। ब्रह्मभक्तः सर्वगुणः।। ज्योति शास्त्रसमन्वितः।। विश्वकर्म्म
9. प्रमादेन।। मांडने हि मिलिष्यते।।7।। दित्यनो रूपकारश्च? विद्यासर्वगुणे
10. षु च।। भ्रातृभक्तः सुशीलश्च।। लेखदासः प्रषस्यते।।8।। शुभमस्तु सर्वदा।
11. श्री संवत् 1552 समये।।

अनुवाद
ओम! श्री विश्वकर्मा को नमस्कार!
1. सूत्रधारों में कोकास कुलदीपक छीतकु शिल्पशास्त्र के लिए ज्ञात है तथा जिनका हृदय दया से परिपूर्ण है।
2. देवताओं और गुरूओं के प्रसाद से वह पंचविद्याओं का सागर, रेखाशास्त्र का ज्ञाता, गुणवान और सत्यवादी है।
3. काष्ठ, पाषाण और सुवर्ण शिल्प भी सूत्रधार छीतकु के लिए कार्य-सुगम है। विज्ञानों में विज्ञान, यांत्रिकी विद्या का वह धारक है।
4. सूत्रधार छीतकु वंक और त्रिवंक, लता पत्रादि तथा त्रिताल-सप्तताल का भी ज्ञाता है।
5. मन्मथ का सुपुत्र सूत्रधार छीतकु विज्ञानों का आदर्श ज्ञाता है, जिसका चित्त केशव में रमता है।
6. त्रयी के प्रति समर्पित उसका छोटा भाई मांडन शास्त्रों का अध्येता है।
7. ब्राह्मणों के प्रति जिसके मन में भक्ति-भाव है। ज्योतिर्विद्या के साथ विश्वकर्मा की कृपा से मांडन सर्वगुण सम्पन्न है।
8. अपने भाई के प्रति समर्पित व सुशील, उत्कीर्णक रूपकर्मी दित्यन विज्ञान व गुणों के लिए प्रशंसित है।
सदा शुभ हो
श्री संवत् 1552

Translation
Om! Adoration to the illustrious Vishvakarman!
Verse 1- Among sutradharas chhitaku, the light of kokasa family, is well-known for shilpashastras the virture of ompassion in heart.
Verse 2- By the favour of gods and preceptors, is the ocean of five sciences, Narayan is respect of draftmanship-meritorious and truthful.
Verse 3- The Sutradhara chhitaku can work on wood and stone and also on gold with ease. He possesses the great science, the science of machinery.
Verse 4- The Sutradhara chhitaku knows vanka and trivanka creepers and leaves. Also the tri-tala and sapta-tala.
Verse 5- The Sutradhara Chhitaku, the able son of Manmatha, is a perfect master of sciences has fixed his heart on Keshawa.
Verse 6- His younger brother is Mandana, devoted to three and a reader of scriptures.
Verse 7- He is devoted to Brahmanas. All merits together with the knowledge of astronomy will be found in Mandana by the fever of Vishvakarman.
Verse 8- The writer is Dityana, the sculptor, well conducted and devoted to his brother, and is praised for sciences and all merits.
May there be always bliss!
in the memorable year 1552.