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Wednesday, May 25, 2011

अस्मिता की राजनीति

गौरवशाली वैभव जब छीजने लगता है और मुट्ठी की रेत की तरह उसे रोक पाने का प्रयास सफल नहीं होता तब इतिहास-संस्कृति के अभिलेखन का आग्रह भी तीव्र होने लगता है और इसी तरह का भाव संभावित गौरवशाली भविष्य के लिए भी होता है। माना यह जाता है और देखा भी गया है कि ऐसे अवसरों पर तैयार किया गया सांस्कृतिक-इतिहास तटस्थ नहीं होता लेकिन मात्र इसी आधार पर किसी ऐसे काम के महत्व को कमतर नहीं आंका जा सकता।
प्रोफेसर हीरालाल शुक्‍ल की पुस्‍तक क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति
पृथक छत्तीसगढ़ राज्य पर हो रहे फुटकर लेखन के साथ, इस विषय पर पहली स्वतंत्र पुस्तक प्रोफेसर हीरालाल शुक्ल की 'क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति' पिछले दिनों आई है। पृथक छत्तीसगढ़ की गतिविधियों में प्रो. शुक्ल की सक्रिय भागीदारी रही है। बघेलखण्डी प्रो. शुक्ल फिलहाल भोपाल निवासी हैं, किन्तु उनकी सर्वाधिक सक्रिय अवस्था छत्तीसगढ़, विशेषकर बस्तर में गुजरी है, इसलिए वे मन से छत्तीसगढ़िया ही हैं, यह न सिर्फ पुस्तक में बारम्बार झलकता है, बल्कि इस लेखन के पीछे भी उनका छत्तीसगढ़िया मन ही प्रेरक जान पड़ता है।

लेखक स्वयं के शोध-अध्ययन का क्षेत्र मूलतः भाषाविज्ञान के मार्फत सामाजिक मानवशास्त्र रहा है, तो उन्होंने छत्तीसगढ़ की क्षेत्रीय अस्मिता को भी मुख्‍यतः इसी दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया है। कुल 161 पृष्ठों की पुस्तक में 108 पृष्ठ, मौखिक इतिहास और क्षेत्रीय अस्मिता के हैं बाकी 35 पृष्ठों में छत्तीसगढ़ की अस्मिता और क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति का विवेचन है। शेष पृष्ठों में उपसंहार- 'अलविदा मध्यप्रदेश' और परिशिष्ट- 'गोंडवाना के संघर्ष की आत्मकथा' है। पूरी पुस्तक, लेखक की छत्तीसगढ़ में गहरी पैठ और गंभीर अध्ययन का प्रमाण है।

पुस्तक की तैयारी संभवतः जल्दबाजी में की गयी है, इसलिए जानकारियों से ठसाठस इस पुस्तक का स्वरूप पाठ्‌य पुस्तक, वैचारिक निबंध और शोध-लेख में गड्ड-मड्‌ड होता रहता है। विशेषकर आरंभिक अध्यायों में शोध की गहराई है, किन्तु सहायक सन्दर्भ ग्रन्थों की सूची अथवा स्पष्ट पाद टिप्पणियों का अभाव है। 'छवि छत्तीसगढ़', 'आदिवासी इतिहास के दस खंड', 'छत्तीसगढ़: आत्ममंथन का दौर' और 'कोसलानंद' महाकाव्य की चर्चा अधूरी जान पड़ती है, संभवतः लेखक ने पाठक को इन सभी से सुपरिचित मान लिया है, लेकिन आम पाठक इससे भ्रमित हो सकता है। यही भ्रम और जल्दबाजी प्रकाशक के साथ भी रही होगी, क्योंकि पुस्तक की भूमिका के अनुसार इसमें चार अध्याय हैं, विषय सूची के अनुसार पांच अध्याय और पृष्ठों पर मुद्रित अध्याय शीर्षकों के आधार पर मात्र तीन अध्याय हैं। इसके बावजूद भी लेखक की सूझ और समझ, अंचल के प्रति उसकी नीयत और निष्ठा संदेह से परे है।

छत्तीसगढ़ के गरमा-गरम मुद्दे के साथ लेखक ने भाषाविज्ञानी होने के नाते हाल के वर्षों में पूरी दुनिया में प्रचलित 'जनसामान्य का इतिहास' अथवा 'हाशिये का इतिहास' (उपाश्रयी, सब-आल्टर्न) की कड़ी जोड़ते हुए कहा है- ''इतिहासकार 'संरचना' और 'संप्रेषण' की तकनीकों से इतिहास की गहराई के साथ पहचानें। मौखिक इतिहास की यही संकल्पना है और इसी सांचे के आधार पर असाक्षर समाज का इतिहास भविष्य में प्रस्तुत हो सकेगा।'' लेकिन मौखिक इतिहास खंड में लेखक ने बस्तर की हल्बी-भतरी की कुछ पहेलियों की सूची देते हुए ढाई सौ पहेलियों का संकलन प्रकाशित कराया है, उपयुक्त होता यदि अंचल की सभी बोलियों और क्षेत्रों की चार-पांच पहेलियों के उदाहरण से लेखक ने विषय स्पष्ट किया होता।

आरंभिक अध्यायों में भाषाविज्ञान के सिद्धान्तों के परिप्रेक्ष्य में मौखिक इतिहास के पक्षधर लेखक बाद के अध्यायों में तथ्यों पर जोर देते हुए लिखते हैं- 'ज्ञान का क्षेत्र संशोधन आमंत्रित करता है और परिशुद्ध तथ्यों की परख चाहता है।' और फिर लिखित इतिहास के स्रोत और पुस्तकों-जानकारियों की विशद्‌ चर्चा, लेखक के निजी विचारों के चौखट में की गई है। संभवतः लेखक के निजी सर्वेक्षण के अभाव में छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण भू-भाग सरगुजा छूट गया है, इसलिए जन नेताओं की सूची में गहिरा गुरू और राजमोहिनी देवी जैसे नामों का कोई हवाला पुस्तक में नहीं है। गंभीर विश्लेषक लेखक द्वारा बिना तथ्यों के सुतनुका देवदासी और घोटुलों को रति-संस्कृति के विकास का माध्यम निश्चित कर देना, शोभाजनक नहीं है।

उपसंहार में 'अलविदा मध्यप्रदेश', राजेन्द्र माथुर के उद्धरणों से अत्यंत महत्वपूर्ण और रोचक है। परिशिष्ट 'गोंडवाना के संघर्ष की आत्मकथा' में भी बस्तर का दबदबा और सरगुजा का अभाव है। हीरासिंह मरकाम के उल्लेख में तथ्यों का अभाव खटकता है। इसी संदर्भ में उल्लेखनीय है कि मुसलमान इतिहासकारों द्वारा किये गये नामकरण 'गोंडवाना' पर लगभग 70 वर्ष पहले आंचलिक प्रथम मानवशास्त्री डॉ. इंद्रजीत सिंह ने विश्वसनीय और अधिकृत सर्वेक्षण-अध्ययन विस्तार से किया था, जो सन्‌ 1944 में 'द गोंडवाना एण्ड द गोंड्‌स' शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ, वस्तुतः पूरे छत्तीसगढ़ के भौगोलिक परिवेश में जनजातीय सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को प्रकाशित करने का यही प्रथम गंभीर तथ्यात्मक प्रयास था, जो बाद में गोंडवाना और फिर छत्तीसगढ़ की अस्मिता तलाश के वर्तमान छटपटाहट की पृष्ठभूमि बना।

राजनीति पर लिखी गई यह पुस्तक, गनीमत है कि दलगत राजनीति से बिल्कुल प्रभावित नहीं है। वैचारिक राजनीति की दृष्टि से न सिर्फ पुस्तक का आवरण, बल्कि पूरी पुस्तक का तेवर भी लाल है। 'विरोध', 'विपर्यास', 'विद्रोह', और 'संघर्ष' पर पूरे विस्तार से विचार किया गया है, किन्तु प्रतीकात्मक विरोध के माध्यम से संस्कृति की सोपानिक संरचना को समझने का प्रबल आग्रही लेखक, 'मितानी' प्रथा में समरसता और समन्वय को भी माध्यम बनाने को मजबूर हुआ है। पुस्तक को दलगत राजनीति से बचाये रख सकने में लेखक की सफलता प्रशंसनीय इसलिए भी है, क्योंकि राजधानी- भोपाल के सत्ता के गलियारों में वे 'दाऊ के सर' (मंत्री डॉ. चरणदास महंत के शोध-निदेशक होने के नाते) के रूप में ख्‍यात हैं और उनकी विद्वता की गहराई से अनभिज्ञ जनसामान्य भी उन्हें, इसी परिचय से जान पाता है।

अनामिका प्रकाशन की छपाई अच्छी है, किंतु पुस्तक का मूल्य 250/- रखा गया है, जिससे लगता है कि पुस्तक का लक्ष्य-वर्ग आम पढ़ा-लिखा छत्तीसगढ़िया नहीं, बल्कि शासकीय विभाग, पुस्तकालय और पुस्तक को सजावट-उपकरण मानने वाला धनाढ्‌य है, कहीं पुस्तक वहीं तक न सिमट कर रह जाय। बहरहाल इन सबके बावजूद पृथक छत्तीसगढ़ पर तथ्यों और जानकारियों से लबालब यह पहली पुस्तक स्वागतेय है।

छत्‍तीसगढ़ राज्‍य गठन के पहले, इस पुस्‍तक के प्रकाशन के तुरंत बाद मेरे द्वारा तैयार की गई यह पुस्तक चर्चा, दैनिक भास्कर, रायपुर में 14 जुलाई 1998 को और इसी आसपास समाचार पत्र नवभारत में भी प्रकाशित हुई। छत्‍तीसगढ़ राज्‍य गठन का दशक बीत गया और लगा कि पुस्‍तक न पढ़ पाए हों, उनके लिए भी पठनीय हो सकता है, अतएव यहां।