Sunday, June 26, 2016

अस्सी जिज्ञासा

जिज्ञासा, मौलिक हो तो निदान के लिए किसी और की सिर्फ मदद ही ली जा सकती है, क्योंकि समाधान तो तभी होता है, जब जवाब खुद के मन में आए। इसीलिए प्रश्नों के उत्तर तो दूसरा कोई दे सकता है, लेकिन जिज्ञासा शांत नहीं कर पाता। संस्कृत का किम् या हिन्दी ‘ककारषष्ठी’ यानि कौन, कब, कहां, क्या, कैसे, किस इन सभी प्रश्नों का उत्तर मिल जाने पर भी जानना बाकी रहे, वही जिज्ञासा है। फिर भी प्रश्नोत्तरी होती है, कभी स्वाभाविक, लेकिन अक्सर गढ़ी हुई। नचिकेता, यक्ष-प्रश्न, मिलिन्द पन्ह, विक्रम-वेताल, जेन गुरु-शिष्य वार्तालाप से हिन्द स्वराज तक। सवाल का जवाब न हो फिर भी उसका चिंतन-सुख समाधान से कम नहीं। गुड़ गूंगे का और जुगाली चुइंगम सी। यह हुआ विषय प्रवेश, अब प्रसंग...

पिछले दिनों बनारस-प्रवास का एक सबेरा अस्सी घाट पर बीतना था, बीता। गंगाजी और काशी। प्रकृति और संस्कृति का प्रच्छन्न, सभ्यता-प्रपंच के लिए अब भी सघन है, सब कुछ अपने में समोया, आत्मसात किया हुआ। मन-प्राण सहज, स्व-भाव में हो तो यहां माहौल में घुल कर, सराबोर होते देर नहीं लगती। अनादि-अनंत संपूर्ण। समग्र ऐसा कि कुछ जुड़े, कुछ घटे, फर्क नहीं, उतना का उतना। बदली से सूर्योदय नहीं दिख रहा, बस हो रहा है, रोज की तरह, रोज से अलग, सुबहे-बनारस का अनूठा रंग। कहा जाता है, अवध-नवाब के सूबेदार मीर रुस्तम अली बनारस आए और अलस्सुबह जो महसूस किया वह लौट कर नवाब सादात खां को बयां किया। अब की नवाब साहब बनारस आए, सुबह हुई और बस, नवाब साहब फिदा-फिदा। उन्हीं की ख्वाहिश से शामे-अवध के साथ सुबहे-बनारस जुड़ गया। इस बीच शबे-मालवा छूटा रह जाता है, लेकिन इस भोर में महाकाल का अहर्निश है, सब समाहित, घनीभूत लेकिन तरल, प्रवहमान। और यहां घाट पर नित्य सूर्योदय-पूर्व से आरंभ। संगीत, योग, आरती-हवन।

मंच के बगल में मेज पर कुछ पुस्तकें लेकर युवक बैठा है। मैं किताबें अलट-पलट रहा हूं। ग्राहक हूं या दर्शक, वह निरपेक्ष। संगीत सम्पन्न हुआ और योग आरंभ। अनुलोम-विलोम और भस्त्रिका के बीच वह युवक मेरे सवालों का जवाब भी दे रहा है। कुछ किताबें छांट लेता हूं, वह प्राणायाम अभ्यास करते बिल बनाता है। व्यवधान, मेरे-उसके न लेन में, न देन में। सहज जीवन-व्यापार। और खरीदी किताबों के साथ में ‘बुढ़वा मंगल 2016, वाराणसी का अप्रतिम जलोत्सव’ स्मारिका मिल जाती है, 'कम्प्लीमेंट्री'।

स्मारिका में 'अज्ञ-विज्ञ संवादः' है, जिसे ‘बुढ़वा मंगल पर आम आदमी से बातचीत’ कहा गया है। कुछ अलग तरह की प्रश्नोत्तरी, उलटबासी। इसमें विज्ञ प्रश्नकर्ता है, अज्ञ जवाब दे रहा है। विज्ञ, हर सवाल के जवाब में तात्कालिक-कामचलाऊ निष्कर्ष निकालता है और अज्ञ उसे खारिज-सा करता आगे बढ़ता है। आखिर बुढ़वा मंगल की रस सराबोर, इतिहास-निरपेक्ष लंबी सांस्कृतिक परंपरा को शब्दों से मूर्त कर किसी विज्ञ (अरसिक प्रश्नकर्ता) को समझाना कैसे संभव हो। वार्तालाप में अज्ञ, बुढ़वा मंगल में क्या-क्या होता था गिनाते हुए यह भी कहता है, 'जाने क्या-क्या होता था।' फिर विज्ञ पूछता है 'इसके अलावा भी कुछ होता था?', अज्ञ जवाब देता है- 'अरे भाई, असली चीज तो वही 'कुछ' है।' आखिरी सवाल के बाद अज्ञ को इतनी बातें बताने के लिए विज्ञ धन्यवाद देता है, इस पर अज्ञ जवाब देता है- 'अरे हम क्या बतायेंगे, आप पत्रकार, पूछकार से ज्यादा जानते हैं क्या?, खैर चलते हैं' ...। चलन यही हो गया है, स्थानीय जानकार सूचक-अज्ञ है और चार लोगों से पूछ, इकट्ठा कर सजाई सूचना को परोस देने वाला विज्ञ-विशेषज्ञ। एक सूचना अपनी तरफ से जोड़ते चलें, बनारसियों को शायद खबर न हो कि रीवांराज-बघेलखंड में भी बुढ़वा मंगल का उत्साह कम नहीं होता।

अस्सी पर औचक मिली इस स्मारिका को तीर्थ का दैवीय-प्रसाद मान, जिज्ञासा ले कर लौटा हूं। विषय-क्रम में इस ‘अज्ञ-विज्ञ संवादः’ के साथ किसी का नाम नहीं दिया गया है। जिज्ञासा हुई, यह संवाद किसने रचा है, किसका कमाल है, ऐसी योजनाबद्ध बनारसी बारीकी और सूझ का छोटा-सा, लेकिन चकित कर देने वाला नमूना, बतर्ज होली प्रसंग पर भारतेन्दु रचित 'संडभंडयोः संवादः'। संपादक-मंडल से संपर्क का प्रयास किया, जवाब गोल-मोल मिला। अनुमान हुआ कि यह भंगिमा डा. भानुशंकर मेहता जैसी है, लेकिन वे तो अब रहे नहीं, किसी ने सुझाया राजेश्वर आचार्य हो सकते हैं या कोई और शायद अजय मिश्र या धर्मशील चतुर्वेदी या...। मनो-व्यापार इसी तरह भटकता चलता है, चल रहा है। अमूर्त दैवीय जिज्ञासा, जिसमें ठीक-ठीक यह भी पता न हो कि जानना क्या है- इस संवाद का रचयिता? बुढ़वा मंगल? या अस्सी घाट पर काशी-भोर की बदराई धुंधलकी स्मृति से झरते रस और उसमें डूबते-उतराते अहम् को? चुइंगम-जुगाली, गूंगे का गुड़। यथावत कायम जिज्ञासा। दुहरा कर पढ़ता हूं आंवला चबाए जैसा, और चिंतन-सुख, बार-बार पानी की घूंट की तरह, फिर समाधान की परवाह किसे।

लौटकर आया तो किसी ने पूछा, कैसा है मोदी जी का बनारस?, क्या जवाब दूं, इस नजर से देखना तो रह गया, ऐसे सवाल के जवाब के लिए अगली बार चक्कर लगा तो भी बात शायद ही बन पाए।

सूझ, नासमझी की उपज है और सूझ जाए तो अपनी नासमझी पर हंसी आती है, लेकिन ज्यों ही माना कि सूझ गया, बस और कुछ समझने की गुजाइश खत्म... ... ... यह जिज्ञासा, मेरी समझी नासमझी का लेखा।

यों ही सा-
बनारस निवासी एक परिचित मुझसे पूछ रहे हैं कि मेरा शहर बनारस से कितनी दूर है। समझ नहीं पाया कि वह मुझसे क्यों पूछ रहे हैं, क्योंकि ठीक यही सवाल उनसे मेरा भी हो सकता है, या मेरा सीधा जवाब, जो उन्हें आहत कर सकता है, कि बनारस से मेरा शहर उतनी ही दूर है, जितना मेरे शहर से बनारस। मजे की बात, यह जानते हुए कि हम बस फोन पर बात कर रहे हैं, करते रहेंगे, हम दोनों को कहीं आना-जाना नहीं है। फिर भी सोचता हूं कि बनारसी बंधु इस तरह सवाल क्यों कर रहे हैं, शायद यह सोचते कि तथ्य-आंकड़े ही सब कुछ नहीं होते, या ऐसा भी नहीं कि गूगल का भरोसा कर कभी कोई रास्ता न भटका हो। यह भी याद आता है कि मैंने कभी उस इलाके में किसी स्थान की दूरी पूछी थी, तो बताया गया था- बत्तीस रुपिया टिकट, मानों दूरी की इकाई रुपिया हो। तो शायद बंधु पूछ रहे हैं कि रास्ता कैसा है। ट्रेन सुविधाजनक होगा या बस। सड़क की हालत कैसी है और लूटमार वाली खबरें आती रहती हैं, वह क्या है। कितना समय लगेगा और टिकट कितना। या फिर बनारस को वे अपना 'शून्य मील का पत्थर', जो लोक निर्माण विभाग के विश्राम गृह के सामने लगा होता है, क्योंकि दूरियों का विस्तार-संकोच, सड़कों की रचना, यहीं से शुरू होती है। इसी पर 'तीर्थ नहीं है केवल यात्रा...।' मानों सृष्टि का आरंभ बनारस से, प्रत्येक जीव का विश्राम गृह।

Monday, June 20, 2016

देश, पात्र और काल


देश- अकलतरा, छत्तीसगढ़, अक्षांश- 22.0244638 उत्तर, देशांतर- 82.42381219999993 पूर्व, जो पात्र- राहुल कुमार सिंह (जैसा कहने का चलन है, इस नाचीज बन्दे) का गृहग्राम है और काल- सन 2016 का जून माह, इन दिनों।

'अकलतराहुल', अकलतरा और राहुल की संधि-सा, लेकिन यहां 'अकल-त-राहुल', आशय 'राहुल की समझ' है और गढ़ा इसलिए गया कि विशिष्ट शब्द होने के कारण गूगल खोज में आसानी से मिल जाए।

देश-पात्र-काल, जातक की जन्म-कुंडली, कभी कहानी, कभी इतिहास, लेकिन इरादा कि यह सब गड्ड-मड्ड करते अकलतरावासी राहुल का पढ़ा-देखा-सुना, समझा-बूझा महीने-महीने यहां आता रहे। वैसे कुल-जमा मन में तो बस सुमिरन है, लेकिन...

माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माहिं।
मनवा तो चहुं दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहीं।।

o वर्णमाला का ''आरंभ - अ'' से और लगभग ''समापन - स'' से।
मेरी मां के नाम का आद्याक्षर 'अ' और पिता का 'स'।
मेरे आत्मीेय अशोक, अनूप, अनुज, आशुतोष, अनुभव, अपूर्व, अनंत, अनुपम, अभिषेक, अनिल, अमित, अजीत, आनंद, अंबुज, अखिलेश, असीम, आगत, अमितेश, आलोक, अरविंद आदि और सम्माननीय अधिकतर महिलाओं के आद्याक्षर 'स या श'।
आकस्मिक या संयोग मात्र।
इनमें जो शामिल नहीं वे आत्मीय अधिकतर में नहीं या इस संयोग के अपवाद हैं।

o खुद चाहे भटकते रहें और अपनी राह न सूझती हो, न खोज पाएं, लेकिन कई बार लगता है कि ऐसी बातों से किसी को राह मिल सकती है। इस 'चिंतन-संधान' से जग वंचित न रह जाए (स्माइली)। 'सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई।'

किसी की बराबरी का प्रयास न किया कभी, न अपने बराबर माना किसी को। यह किसी को विनम्रता लगती है, किसी को अभिमान। लेकिन चाहता हूं ऐसा सहज निभता चले।

पचपन पार करने के बाद 35-40 वाला तो गबरू जवान लगता है, तो कभी लगता है कि सठिया तो नहीं रहे हें, लेकिन देना-पावना का हिसाब लगाने की उम्र तो हो ही गई है और अब अपने बारे में कई धारणाएं पक्की होने लगती हैं, अब वह मान लेने में हर्ज नहीं, संकोच नहीं होता, जिससे पहले मन ही मन लुका-छिपी होती रहती थी। और सोच की पारदर्शिता जब स्व से सार्वजनिक होने लगे तो थोड़ा सेंसर जरूरी हो जाता है, लेकिन उसमें अपनी दृष्टि, महसूसियत और अभिव्यक्ति के स्तर पर ताजगी हो, हां! वह सप्रयास क्रांति वाली न हो।

याददाश्तत बहुत अच्छी हो तो संस्मरण लिखना कितना मुश्किल होगा। रचना-रस और शायद सार्थकता भी तभी, जब यह 'क्या‍ भूला, क्या याद किया' के असमंजस सहित हो।

o नारायण दत्त, (पूरा नाम- होलेनर्सीपुर योगनरसिम्हम् नारायण दत्त), पठन-पाठन में मुझे प्रभावित करने वाले, विचार-व्यवहार और तालमेल वालों में पहला नाम है, नवनीत हिन्दी डाइजेस्‍ट के संपादक और उनके कुछ लेखों के माध्यम से परिचित हूं। फिर लेखक-साहित्यकारों में हिन्दी को खास ढंग से समृद्ध करने वाले कुबेरनाथ राय, हजारी प्रसाद द्विवेदी, मनोहर श्याम जोशी, विद्यानिवास मिश्र, शिवप्रसाद मिश्र रुद्र काशिकेय, रेणु, कृष्ण बलदेव वैद, निर्मल वर्मा ... ... ... बौद्ध पढ़ना हो तो भदंत आनंद कौसल्यायन और जैन के लिए नाथूराम प्रेमी...

o इस महीने नारायणपुर-नवागढ़ मार्ग पर गांव संबलपुर (जिला बेमेतरा, छत्तीेसगढ़) से गुजरते हुए श्रीमती कदमबाई बंजारे से मुलाकात हुई, उन्होंने बताया कि पिछले बारह वर्षों से रहंस का ग्यारह दिवसीय आयोजन, चैत्र नवरात्रि में यहां कराती हैं। समाज की सहमति-असहमति के बीच पूरे गांव से सहयोग ले कर। मूर्तिकार खम्हइया, ग्वालपुर आदि से आते हैं और व्यास महराज तोताकांपा के श्री मिलू, दर्रा के श्री बैदनाथ, और भी कई हैं। रहंस के बाद गणेश मूर्ति ठंडा कर दी जाती है, बाकी अपने-आप घुरती है, अभी बची हैं इसलिए यहां, चौक के पास कुंदरा छा लिया है, घर के काम निपटा कर यहां आ जाती हैं।

o विशेषज्ञ, किसी वस्तु/विषय को देखते ही निष्कर्ष पर पहुंच जाता है, यों कहें कि गणित की कोई पहेली हो औैर गणितज्ञ को उसे- जबकि, तो, इसलिए, माना कि... जैसे चरणवार बढ़ते-सुलझाते और उसे अभिव्यक्त करने के बजाय सीधे हल पर पहुंच जाए, विशेषज्ञ के लिए आसान होता है, लेकिन यह औरों के लिए पहेली में चमत्कार जैसा हो जाता है।

अनाड़ी, कदम-दर-कदम ठिठकते-भटकते, असमंजस सहित आगे बढ़ता है, सभी सीखे तौर-तरीकों को आजमाते और उसके बरत सकने की खुद की काबिलियत को जांचते, एक से दूसरे उपाय पर जाते, कांट-छांट, यानि पूरी चीर-फाड़, विश्लेषण सामने प्रकट रखते।

अनाड़ी-नौसिखुआ के हाथों पड़कर कोई वस्तु/विषय बेहतर खुल सकता है। अनाड़ी के हल में अन्य का प्रवेश-निकास आसानी से हो सकता है, विशेषज्ञ का हल कवचयुक्त, व्याख्या-आश्रित होता है।

Thursday, March 17, 2016

सोनाखान, सोनचिरइया और सुनहला छत्तीसगढ़

'अमीर धरती के गरीब लोग' जुमला वाले छत्तीसगढ़ का सोनाखान, अब तक मिथक-सा माना जा रहा, सचमुच सोने की खान साबित हुआ है। पिछले दिनों सोनाखान के बाघमड़ा (या बाघमारा) क्षेत्र की सफल ई-नीलामी से छत्तीसगढ़, गोल्ड कंपोजिट लाइसेंस की नीलामी करने वाला पहला राज्य बन गया है। बलौदाबाजार जिले के सोने की खान, बाघमड़ा क्षेत्र 608 हेक्टेयर में फैला है और आंकलन है कि यहां लगभग 2700 किलो स्वर्ण भंडार है। इस क्षेत्र का एक्सप्लोरेशन 1981 में आरंभ किया गया था और मध्य भारत के इस महत्वपूर्ण और पुराने पूर्वेक्षित क्षेत्र के साथ, अधिकृत जानकारी के अनुसार, रोचक यह भी कि इस क्षेत्र में प्राचीन खनन के चिह्न पाए गए हैं। इसके अलावा मुख्यतः कांकेर, महासमुंद और राजनांदगांव जिला भी स्वर्ण संभावनायुक्त है।
बाघमड़ा (या बाघमारा) गांव के पास की पहाड़ी की वह छोटी गुफा,
जिसे स्‍थानीय लोग बाघ बिला यानि बाघ का बिल या निवास कहते है,
माना जाता है कि इसी के आधार पर गांव का नाम बाघमड़ा पड़ा है.
चित्र सौजन्‍य- डॉ. के पी वर्मा
इस सिलसिले में छत्तीसगढ़ के कुछ महत्वपूर्ण स्वर्ण-संदर्भों को याद करें। मल्हार में ढाई दिन तक हुई सोने की बरसात से ले कर बालपुर में पूरी दुनिया के ढाई दिन के राशन खर्च के बराबर सोना भू-गर्भ में होने की कहानियां हैं। दुर्ग जिले में एक गांव सोनचिरइया है तो सोन, सोनसरी, सोनादुला, सोनाडीह, सोनसिल्ली, सोनभट्ठा, सोनतरई, सोनबरसा जैसे एक या एकाधिक और करीब एक-एक दर्जन सोनपुर और सोनपुरी नाम वाले गांव राज्य में हैं। कुछ अन्य नाम सोनसरार, सोनक्यारी हैं, जिनसे स्वर्ण-कणों की उपलब्धता वाली पट्‌टी का अर्थ ध्वनित होता है और दुर्गुकोंदल का गांव सोनझरियापारा भी है, जिसका स्पष्ट आशय सोनझरा समुदाय की बसाहट का है।

छत्तीसगढ़ के सोनझरा, अपने सूत्र बालाघाट और उड़ीसा से जोड़ते हैं। एक दंतकथा प्रचलित है, जिसमें कहा जाता है कि पार्वती के मुकुट का सोना, इन सोनझरों के कारण नदी में गिर गया था, फलस्वरूप इनकी नियति उसी सोने को खोजते जीवन-यापन की है। जोशुआ प्रोजेक्ट ने छत्तीसगढ़ निवासियों को कुल 465 जाति-वर्ग में बांटा है। इसी स्रोत में देश की कुल सोनझरा जनसंख्या 17000 में से सर्वाधिक उड़ीसा में 14000, महाराष्ट्र। में 1500, मध्यप्रदेश में 400 और छत्तीसगढ़ में 700 बताई गई है।
सुनहली महानदी 
चित्र सौजन्‍य- श्री अमर मुलवानी
मुख्यतः रायगढ़ और जशपुर के रहवासी इन सोनझरों का काम रेत से तेल निकालने सा असंभव नहीं तो नदी-नालों और उसके आसपास की रेतीली मिट्‌टी को धो-धो कर सोने के कण निकाल लेने वाला श्रमसाध्य जरूर है। इन्हें महानदी के किनारे खास कर मांद संगम चन्दरपुर और महानदी की सहायक ईब और मैनी, सोनझरी जैसी जलधाराओं के किनारे अपने काम में तल्लीन देखा जा सकता है। बस्तर की कोटरी, शबरी और इन्द्रावती नदी में बाढ़ का पानी उतरने के बाद झिलमिल सुनहरी रेत देख कर इनकी आंखों में चमक आ जाती है। इन्हें शहरी और कस्बाई सराफा इलाकों की नाली में भी अपने काम में जुटे देखा जा सकता है।
सोनझरा महिला के कठौते में सोने के चमकते कण
चित्र सौजन्‍य- श्री जे आर भगत
सोना झारने यानि धोने के लिए सोनझरा छिछला, अवतल अलग-अलग आकार का कठौता इस्तेमाल करते हैं। इनका पारंपरिक तरीका है कि जलधाराओं के आसपास की तीन कठौता मिट्‌टी ले कर स्वर्ण-कण मिलने की संभावना तलाश करते हैं, इस क्रम में सुनहरी-पट्‌टी मिलते ही सोना झारते, रास्ते में आने वाली मुश्किलों को नजरअंदाज करते, आगे बढ़ने लगते हैं। ऐसी मिट्‌टी को पानी से धोते-धोते मिट्‌टी घुल कर बहती जाती है और यह प्रक्रिया दुहराते हुए अंत में सोने के चमकीले कण अलग हो जाते हैं।

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मिथक-कथाएं, अक्सर बेहतर हकीकत बयां करती हैं, कभी सच बोलने के लिए मददगार बनती हैं, सच के पहलुओं को खोलने में सहायक तो सदैव होती हैं। वैदिक-पौराणिक एक कथा है राजा पृथु वाली और दूसरी, मयूरध्वज की। पृथु को प्रथम अभिषिक्त राजा कहा गया है, यह भी उल्लेख मिलता है कि इसका अभिषेक दंडकारण्य में हुआ था। यह पारम्परिक लोकगाथाओं से भी प्रमाण-पुष्ट हो कर सच बन जाता है, जब देवार गायक गीत गाते हैं- ''रइया के सिरजे रइया रतनपुर। राजा बेनू के सिरजे मलार।'' यानि राजा (आदि राजा- पृथु?) ने रतनपुर राज्य की स्थापना की, लेकिन मल्हार उससे भी पुराना उसके पूर्वज राजा वेन द्वारा सिरजा गया है।

पृथु की कथा से पता लगता है कि उसने भूमि को कन्या मानकर उसका पोषण (दोहन) किया, इसी से हमारे ग्रह का नाम पृथ्वी हुआ। वह भूमि को समतल करने वाला पहला व्यक्ति था, उसने कृषि, अन्नादि उपजाने की शुरूआत करा कर संस्कृति और सभ्यता के नये युग का सूत्रपात किया। इसी दौर में जंगल कटवाये गए। कहा जाता है कि सभ्यता का आरंभ उस दिन हुआ, जिस दिन पहला पेड़ कटा (छत्तीसगढ़ी में बसाहट की शुरुआत के लिए 'भरुहा काटना' मुहावरा है, बनारस के बनकटी महाबीरजी और गोरखपुर में बनकटा ग्राम नाम जैसे कई उदाहरण हैं।) और यह भी कहा जाता है कि पर्यावरण का संकट आरे के इस्तेमाल के साथ शुरू हुआ।

बहरहाल, एक कथा में गाय रूप धारण की हुई पृथ्वी की प्रार्थना मान कर, उसके शिकार के बजाय पृथु ने उसका दोहन किया, (मानों मुर्गी के बजाय अंडों से काम चलाने को राजी हुआ)। भागवत की कथा में पृथु ने पृथ्वी के गर्भ में छिपी हुई सकल औषधि, धान्य, रस, रत्न सहित स्वर्णादि धातु प्राप्त करने की कला का बोध कराया। राजकाज के रूपक की सर्वकालिक संभावना वाली इस कथा पर जगदीशचन्द्र माथुर ने 'पहला राजा' नाटक रचा है।

मयूरध्वज की कथा जैमिनी अश्वमेध के अलावा अन्य ग्रंथों में भी थोड़े फेरबदल से आई है। कथा की राजधानी का नाम साम्य, छत्तीसगढ़ यानि प्राचीन दक्षिण कोसल की राजधानी रत्नपुर से है और अश्वमेध के कृष्णार्जुन के युद्ध प्रसंग की स्मृति भी वर्तमान रतनपुर के कन्हारजुनी नामक तालाब के साथ जुड़ती है। कथा में राजा द्वारा आरे से चीर कर आधा अंग दान देने का प्रसंग है। रेखांकन कि पृथु और मयूरध्वज की इन दोनों कथाओं का ताल्लुक छत्तीसगढ़ से है।

मयूरध्वज की कथा का असर यहां डेढ़ सौ साल पुराने इतिहास में देखा जा सकता है। पहले बंदोबस्त अधिकारी मि. चीजम ने दर्ज किया है कि अंचल में लगभग निषिद्ध आरे का प्रचलन मराठा शासक बिम्बाजी भोंसले के काल से हुआ और तब तक की पुरानी इमारतों में लकड़ी की धरन, बसूले से चौपहल कर इस्तेमाल हुई है। परम्परा में अब तक बस्तर के प्रसिद्ध दशहरे के लिए रथ निर्माण में केवल बसूले का प्रयोग किया जाता है। अंचल में आरे का प्रयोग और आरा चलाने वाले पेशेवर को, लकड़ी का सामान्य काम करने वाले को बढ़ई से अलग कर, 'अंरकसहा' नाम दिया गया है और निकट अतीत तक आवश्यकता के कारण, उनकी पूछ-परख तो थी, लेकिन समाज में उनका स्थान सम्मानजनक नहीं था।

कपोल-कल्पना लगने वाली कथा में संभवतः यह दृष्टि है कि आरे का निषेध वन-पर्यावरण की रक्षा का सर्वप्रमुख कारण होता है। टंगिया और बसूले से दैनंदिन आवश्ययकता-पूर्ति हो जाती है, लेकिन आरा वनों के असंतुलित दोहन और अक्सर अंधाधुंध कटाई का साधन बनने लगता है। यह कथा छत्तीसगढ़ में पर्यावरण चेतना के बीज के रूप में भी देखी जा सकती है।

सोनझरा की परंपरा और पृथु, मयूरध्वज की कथाभूमि छत्तीसगढ़, स्वर्ण नीलामी वाला पहला राज्य है। पहल करने में श्रेय होता है तो लीक तय करने का अनकहा दायित्व भी। इन कथा-परंपराओं के बीच सुनहरे सच की पतली सी लीक है- सस्टेनेबल डेवलपमेंट (संवहनीय सह्‌य या संपोषणीय विकास) की, जिसकी अवधारणा और सजगता यहां प्राचीन काल से सतत रही है। हमने परंपरा में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को आवश्यक माना है लेकिन इसके साथ ''समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥'' भूमि पर पैर रखते हुए, पाद-स्पर्श के लिए क्षमा मांगते हैं। अब सोने की खान नीलामी के बाद उत्पादन का दौर शुरू होने के साथ याद रखना होगा कि संसाधन-दोहन का नियमन-संतुलन आवश्यक है, क्योंकि मौन और सहनशील परिवेश ही इस लाभ और विकास का पहला-सच्चा हकदार है, लाभांश के बंटवारे में उसका समावेश कर उसका सम्मान बनाए रखना होगा और यही इस नीलामी की सच्ची सफलता होगी।

पुछल्‍ला- सोनाखान के साथ वीर नारायणसिंह, बार-नवापारा, तुरतुरिया, गुरु घासीदास और गिरौदपुरी, महानदी-शिवनाथ और जोंक की त्रिवेणी को तो जोड़ना ही चाहता था, विनोद कुमार शुक्‍ल के 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' की सोना छानती बूढ़ी अम्‍मां भी याद आ रही है और छत्‍तीसगढ़ की पड़ोसी सुवर्णरेखा नदी भी। लेकिन इन सब को जोड़ कर बात कहने की कोशिश में अलग कहानी बनने लगी, इसलिए फिलहाल बस यहीं तक।