Wednesday, November 3, 2021

सतनाम

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के पश्चात, एक सप्ताह विभिन्न स्थलों का सर्वेक्षण राजमहंत श्री जगतूराम सोनवानी, रायपुर और राजमहंत श्री रामसनेही सोनवानी जी, बिलासपुर के मार्गदर्शन में संस्कृति विभाग के अधिकारी डा. के.पी. वर्मा द्वारा किया गया था। यहां प्रस्तुत जानकारी मुख्यतः डा. वर्मा के नोट का अंश है, साथ ही इस संबंध में डा. जे.आर. सोनी जी तथा डा. अनिल भतपहरी जी से प्राप्त सुझाव को भी सम्मिलित किया गया है।

सोनी जी ने गुरु घासीदास के 7 सिद्धांतों तथा 42 उपदेशों (राधाकृष्ण प्रकाशन की पुस्तक ‘गुरु घासीदास‘) में प्रमुख संदेश- 1. मदिरा-पान का त्याग 2. मांस का त्याग 3. मानव-मानव एक समान 4. मूर्ति-पूजा बन्द करो 5. गायों को हल में मत जोतो 6. दोपहर में हल मत चलाओ 7. निरन्तर सतनाम का ध्यान करो, बताया है। इसी पुस्तक में उल्लेख है कि राजमहंत किशनलाल कुर्रे ने उनकी अमृतवाणियों की संख्या 82 मानी है तथा बाबाजी-गुरु घासीदास द्वारा भूमिहीनों को भूमि का मालिक बनाने के लिए प्रयास की ओर ध्यान आकृष्ट कराया तथा भतपहरी जी ने सतनाम रावटी दर्शन यात्रा के 22 से 25 दिसंबर 2018 तक, तीन दिवसीय शोध अध्ययन अभियान की जानकारी उपलब्ध कराई है, जिसमें 1-चिरईपदर, 2-दंतेवाड़ा, 3-कांकेर, 4-पानाबरस, 5-डोंगगरगढ़, 6-भंवरदाह, 7-भोरमदंव, 8-रतनपुर तथा 9-दल्हापहाड़ की यात्रा की गई थी। इन रावटी स्थलों में धर्मोपदेशना और सतनाम-पान (दीक्षा) भी हुआ करते थे। उक्त स्थलों पर दर्शनार्थी वर्षों से आते-जाते हैं। अब जो कुछ वीरान थे, वहां भी जाने लगे हैं। यहां प्रदर्शित नक्शा भी भतपहरी जी ने उपलब्ध कराया है।

वर्मा जी से प्राप्त नोट का अंश- 
छत्तीसगढ़ में बाबा गुरु घासीदास की रावटी (पड़ाव) से संबंधित कई स्थल हैं लेकिन राजगुरु या महंतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर महत्वपूर्ण स्थल/रावटी संबंधी की जानकारी इस प्रकार है-

छाता पहाड़- रायपुर जिले के सतनामी सम्प्रदाय के महंत स्वर्गीय श्री जगतूराम सोनवानी के अनुसार बाबा घासीदास ने सोनाखान जमींदारी के अंतर्गत छाता पहाड़ नामक स्थल पर तपस्या की थी। यह स्थल गिरौदपुरी से लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर महराजी ग्राम से 2 किलोमीटर अंदर जंगल में स्थित है। छाता पहाड़ में एक विशाल चट्टान है जिसके उपर बाबाजी ने तपस्या किया था तथा उसके पास घने जंगलों के मध्य पहाड़ी झरना स्थित है। इसके बाद नवागांव होते हुए छेरकापुर में रुके थे जहां पर मंदिर निर्मित है तथा यहां से अमेरा होते हुए तेलासी तथा भण्डार गये।

भण्डारपुरी उनकी कर्मभूमि रही तथा यहां पर उनके बड़े लड़के अमरदास जी का पलंग अभी भी रखा है जिसकी पूजा होती है। भण्डारपुरी से पांच किलोमीटर की दूरी पर तेलासी बाड़ा है। यहां पर भी उनके बड़े लड़के अमरदास निवास करते थे। एक किवदंती के अनुसार एक बार बाबा घासीदास जी घूमते हुए तेलासी पहुंचे तथा उनके बड़े लड़के से ग्राम के बाहर तालाब के मेड़ में मुलाकात हुई। बाबा जी ने लड़के को पहचानने से मना कर दिया बाद में ग्रामीणों के समझाने पर वे माने। यहां पर बाबा घासीदास जी का परिवार निवास करता था बाद में उनके बड़े लड़के अमरदास जी दुर्ग जिले में तपस्या करते हुए शिवनाथ नदी के दायें तट पर चेटुआ घाट में समाधि लीन हो गये।

चिरई पदर- यह स्थल वर्तमान दंतेवाड़ा जिले के अंर्तगत है जहां पर बाबा जी ने घूमकर तपस्या करते हुए गये थे तथा वहां की जनता को उपदेश दिये तथा प्रभावित किया।

पानाबरस- यह स्थल कांकेर जिले के अंतर्गत आता है यहां पर भी बाबा जी घूमते हुए गए थे तथा पड़ाव डाला था। वहां रूककर उन्होंने जनता को तथा साधु संतों को उपदेश दिया तथा अपने विचारों से प्रभावित किया। 

डोंगरगढ़- कांकेर तरफ से लौटते हुए बाबा जी ने डोंगरगढ़ में भी रावटी लगाई थी तथा इस क्षेत्र की जनता भी इनके प्रभाव में आई और बाबा जी के सत्कर्मों एवं विचारों से प्रभावित हुए। 

भंवर दहरा- डोंगरगढ़ से घूमते हुए राजनांदगांव जिले के गंडई पंडरिया नामक स्थल से लगभग 10 किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ी के उपर घने जंगलों के मध्य बाबा जी गये तथा जहां पर आज भी ऊंची-ऊंची चट्टाने हैं तथा पानी का झरना है। यहां की चट्टानों में मधुमख्खियां भी हैं तथा जंगली जानवरों का आज भी आतंक है। यहां से भी बाबा जी ने इस क्षेत्र की जनता को उपदेशों के द्वारा काफी प्रभावित किया।

रतनपुर- इस स्थल का निरीक्षण मेरे (डा. के.पी. वर्मा) द्वारा बिलासपुर जिले के महंत ग्राम सेंदरी के श्री रामसनेही गुरुजी के साथ दिनांक 23.12.01 को किया गया था। रतनपुर बस्ती के पहले दुलहरा तालाब की मेड़ पर बाबा जी ने रावटी लगायी थी जहां पर प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा में मेला भरता है इस क्षेत्र की जनता को भी बाबा जी ने अपने उपदेशों से काफी प्रभावित किया था।

दलहा पहाड़- रतनपुर से घूमते हुए बाबा घासीदास जी ने बलौदा होते हुए 16 किलोमीटर की दूरी पर दलहा पहाड़ नामक स्थल पर भी रावटी लगाई थी जो बम्हनी नामक ग्राम से 7 किलोमीटर अंदर है। यहां पर पहाड़ी में एक कुंड है तथा वर्तमान में एक धर्मशाला भी है। यहां पर भी साधु संत तथा दर्शनार्थी आते थे। महंत रामसनेही से प्राप्त जानकारी के अनुसार यहां के कुंड के पानी को अमृत बनाकर मलेरिया बुखार से पीड़ित लोगों को दिया करते थे जिससे वे ठीक हो जाते थे। यहां पर जगदेवा जी स्वामी का 19 वर्ष पूर्व का बना हुआ तपस्या स्थल है।

इसके बाद बाबा जी यहां से तपस्या करते हुए बलोदा से 11 किलोमीटर दूरी पर खोंड़ पचरी नामक ग्राम भी गये थे जिनके साथ साधु संत भी थे यहां पर एक विशाल तालाब 22 एकड़ क्षेत्रफल में निर्मित है, जिसकी मेड़ पर बाबा जी ने तपस्या किया था तथा रावटी लगाई थी। यहां पर भी दर्शक तथा बीमार लोग आते थे। उनको भी बाबा जी ने उपदेशों एवं अपने विचारों से अवगत कराया तथा सत्कर्मों एवं अच्छे विचारों के द्वारा जनता को प्रभावित किया। तत्पश्चात बाबा घासीदास जी पामगढ़ तथा गिधौरी होते हुए गिरौदपुरी चले गये। यह उनकी अंतिम रावटी थी। खोंड पचरी में चैत्र-कृष्ण पक्ष में सप्तमी, अष्टमी एवं नवमी को मेला मरता है।

इस प्रकार उपर्युक्त विवरण से यह जानकारी प्राप्त होती है कि आज से ढाई सौ वर्ष पूर्व में आवागमन के साधनों की कमी तथा बीहड़ जंगलों के होते हुए भी बाबा जी ने संपूर्ण छत्तीसगढ़ में तत्कालीन मानव समाज के दूषित आचरण में उनके मन को मानव समाज में निहित विषमताओं के कारणों को जानने हेतु उद्वेलित किया। मानव का आपस में जाति भेद, ऊंच नीच का भेद, छुआ-छूत आदि के कारण मानव द्वारा मानव पर हृदय विदारक अत्याचार का दृश्य देखा था। सतनाम धर्म साधना से आई शक्तियों ने उन्हें एकांत चिंतन की ओर तथा एकांत चिंतन ने उन्हें समाधि की ओर अग्रेषित किया। समाधि साधना से उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा उन्होंने अपने आध्यात्मिक शक्ति साधना से अनेकों सिद्धियां प्राप्त की।

बाबा घासीदास ने अपनी सिद्धि से सही धर्म तथा जाति की स्थापना, मानव के विभिन्न दुखों का आध्यात्मिक ज्ञान से इलाज, मानव में सामाजिक चेतना एवं राष्ट्रीय चेतना का विकास, लोगों को कर्मशील, परिश्रमी बनाना तथा नारियों को विकास की धारा में जोड़ना, दलितों में स्वाभिमान जागृत करना, नशा सेवन, मांस भक्षण आदि को दूर करना, जीवों के कष्टों को अहसास करने की क्षमता मनुष्यों में पैदा करना, जीव हत्या को रोकना, बलि प्रथा का अंत करना, पशुओं पर अत्याचार बंद कराना आदि उद्देश्यपूर्ण हुए तथा एक महान संत के रूप में उभरकर जनता के सामने प्रकट हुए।

सतनाम धर्म-संस्कृति के प्रणेता गुरु घासीदास जी से संबंधित विभिन्न स्तरीय शोध-प्रकाशन हुए हैं। डा. सोनी तथा डा. भतपहरी के अलावा मंगत रवीन्द्र जी, रामशरण टंडन जी जैसे परिचितों से इस संबंध में चर्चा होती रही है। अब तक बाबाजी और सतनाम धर्म-संस्कृति से संबंधित गंभीर, तथ्यात्मक जानकारियों, साहित्य आदि की सूची, संभव है कि तैयार की गई हो, किंतु सहज उपलब्ध नहीं होती। पुराने कामों में श्री नम्मूराम मनहर, संत मंगल, पंडित सखाराम बघेल, पं. मनोहरदास नृसिंह, श्री नकुल ढीढी, श्री समयदास अविनाशी, डा. हीरालाल शुक्ल आदि की चर्चा, उल्लेख देखने को मिलता है। एक पुस्तक संस्कृति विभाग के सहयोग से राधाकृष्ण प्रकाशन द्वारा, तपश्चर्या एवं आत्म-चिंतन ‘गुरु धासीदास‘ शीर्षक से प्रकाशित हुई है। ऐसे सभी महत्वपूर्ण प्रकाशित संदर्भों की सूची संक्षिप्त परिचय सहित प्रकाश में आने, इंटरनेट पर उपलब्ध करा दिए जाने से छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक इतिहास के इस पक्ष में रुचि लेने वालों, अध्येताओं, शोधार्थियों और सर्व समाज के लिए आवश्यक और उपयोगी होगा।

Tuesday, November 2, 2021

जांजगीर का विष्णु मंदिर

बीसेक साल पहले मेरे द्वारा तैयार किया गया लेख

जांजगीर के विष्णु मंदिर की पृष्ठभूमि में आस-पास से प्राप्त विभिन्न पुरातात्विक सामग्री इस नगर के इतिहास को आदिम युग अथवा कम से कम मध्य पाषाणयुग से सम्बद्ध करती है। आदिम युगीन चित्रित शैलाश्रय, सिंघनपुर और कबरा पहाड़ जैसे स्थानों से ज्ञात हैं। चांपा के निकट हसदेव नदी के तट से मध्य पाषाणयुगीन औजार प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार ऐतिहासिक युग की आहत मुद्राएं ठठारी से प्राप्त हुई हैं। प्राचीन यात्रा पथ पर स्थित जांजगीर, वाराणसी को रामेश्वरम् से सम्बद्ध करता था। एक अन्य प्राचीन मार्ग सोनहत, मातिन, पाली, बलौदा, जांजगीर और शिवरीनारायण से गुजरने की जानकारी भी मिलती है। जांजगीर की प्राचीनता के स्पष्ट प्रमाण यहां के मंदिर हैं।

लगभग सवा सौ वर्ष पूर्व, पुरातत्वीय सर्वेक्षणकर्ता अधिकारी जे.डी. बेगलर के अनुसार यह स्थान निश्चय ही प्राचीन है और पुराने समय में यहां अनेक मंदिर रहे होंगे। इस तरह बेगलर ने वर्तमान मंदिरों के अलावा अन्य मंदिरों के अस्तित्व और मंदिरों की संभावना भी व्यक्त की है। पुराने शासकीय प्रतिवेदनों में उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह भी रोचक है कि यहां मंदिर के रख-रखाव और अनुरक्षण के लिए सन् 1907 में रु. 4068/, 1909 में रु. 702/, 1910 में रु. 1120/, 1916 में रु. 29/, 1917 में रु. 9/, 1918 में रु. 7/, 1920 में रु. 420/, इस प्रकार राशि व्यय हुई।

अभिलिखित प्रमाणों में ‘जाजल्लपुर’ नगर, रतनपुर राज्य के हैेहयवंशी राजा जाजल्लदेव प्रथम (ईस्वी सन् 1090-1120) ने बसाया था। जांजगीर नाम इसी जाजल्लपुर का अपभ्रंश माना जाता है, इसके साथ ही जांजगीर, दन्तकथाओं की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और रोचक है। एक दन्तकथा का उल्लेख बेगलर ने भी किया है, जिसके अनुसार- शिवरीनारायण और जांजगीर के मंदिर निर्माण में प्रतियोगिता थी, क्योंकि भगवान नारायण ने घोषणा की थी कि जो मंदिर पहले पूर्ण होगा, वे उसी में प्रविष्ट होंगे। शिवरीनारायण का मंदिर पहले पूरा हुआ और नारायण ने उसमें प्रवेश किया, फलस्वरूप जांजगीर के मंदिर को उसी स्थिति में अधूरा छोड़ दिया गया।

जांजगीर क्षेत्र में प्रचलित दंतकथाओं में, इस प्रतियोगिता में पाली के मंदिर को भी सम्मिलित बताया जाता है। किंवदती में कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण छमासी रात में हो रहा था, यानि तब रात छः महीने की हुई थी। शिवरीनारायण और पाली के मंदिर भी इसी रात में बनाए जा रहे थे, किन्तु इस मंदिर पर शिखर की तैयारी हो रही थी, तभी पक्षियों ने चहचहाना आरंभ कर दिया और यह अधूरा रह गया। इस दंतकथा के कथाकार, पार्श्व में स्थित शिव मंदिर को इस मंदिर का शिखर बताते हैं। छमासी रात में मंदिर निर्माण की कथा छत्तीसगढ़ में बहुप्रचलित और अंचल के अन्य मंदिरों के साथ भी सम्बद्ध है।

दो अन्य रोचक दंतकथाएं भी जांजगीर में प्रचलित है। ये दोनों कथाएं महाबली भीम से संबंधित हैं। एक कथा के अनुसार मंदिर से लगे तालाब को भीम ने पांच बार फावड़ा चला कर खोदा था, इसीलिए तालाब का नाम भीमा तालाब हुआ। दूसरी कथा में महाभारत युद्ध में भीम ने कौरव सेना के जिन हाथियों को पूंछ पकड़ कर, घुमाकर फेंका था, उनमें से चार यहां आकर गिरे और भीम उस पर सवार हुए।

इस मंदिर के निर्माण से संबंधित एक अन्य किंवदंती में भीम को इस मंदिर का शिल्पी कहा जाता है। कथा संक्षेप में इस प्रकार है- एक बार विश्वकर्मा और भीम के बीच एक रात में मंदिर बनाने की होड़ हुई। मंदिर बनने आरंभ हुए। भीम द्वारा इस मंदिर का निर्माण करते हुए छेनी-हथौड़ी नीचे गिर जाती थी तब भीम का हाथी गिरे उपकरण लाकर पुनः भीम को दे देता था। यही क्रम चलता रहा, किन्तु एक बार भीम की छेनी छिटक कर निकटस्थ तालाब में चली गई, जब तक हाथी तालाब से छेनी निकाल कर ला पाता, तब तक सबेरा हो गया। भीम ने गुस्से में आकर हाथी के दो टुकड़े कर दिए और मंदिर अधूरा रहा। लगभग पचास वर्ष पुरानी स्मृति वाले कुछ लोग, विश्वासपूर्वक यह अनहोनी भी बयान करते हैं कि मंदिर के पास पुराने पीपल वृक्ष पर, जो अब नहीं रहा, पुराने समय के औजार अटके रह गए थे।

वैसे परंपरा में भीमा को पानी का देवता माना जाता है और इस मंदिर को भीमा मंदिर कहा जाता है साथ ही शिखर रहित होने के कारण नकटा मंदिर भी कहा जाता है। इस प्रकार विष्णु मंदिर के निर्माण, भीमा या रानी तालाब और महाबली भीम से सम्बद्ध, चाव से सुनी-सुनाई जाने वाली विभिन्न किंवदंतियों को जन्म देने वाला यह मंदिर, जांजगीर के भीमा तालाब के पश्चिमोत्तर तट पर अपना कला-वैभव समेटे खड़ा है।

स्थापत्य की दृष्टि से मंदिर के चतुर्दिक विशाल जगती या चबूतरा 33.3 मीटर लंबा, 22.3 मीटर चौड़ा और 2.75 मीटर ऊंचा है, जिसके पूर्वी हिस्से का कुछ भाग पुनर्निर्मित किया गया है। इस भाग में विभिन्न स्फुट प्रतिमाओं के साथ राम कथा के दृश्य फलक भी जड़े गए हैं, जिनमें एक फलक पर धनुर्धारी राम, सीता और लक्ष्मण को रावण तथा मृग सहित अंकित किया गया है। दूसरे फलक पर रावण का भिक्षाटन तथा सीताहरण दिखाया गया है। तीसरा अंकन, राम द्वारा एक बाण से सात ताल वृक्षों को भेदने का है। एक अन्य फलक पर सेतुबंध हेतु पाषाण-खंड ढोते वानर अंकित हैं। एक फलक पर सहस्रबाहु कार्त्तवीर्यार्जुन और रावण के युद्ध का दृश्य है। जगती के मूल अवशिष्ट भाग में विष्णु व अन्य देव प्रतिमाओं के साथ पौराणिक कथानकों से संबंधित मानवाकार प्रतिमाएं हैं, जिनमें विशेष उल्लेखनीय प्रतिमा पश्चिम भाग पर कृष्ण-कथा से संबंधित है। कृष्ण-जन्म के पश्चात् वसुदेव द्वारा बालकृष्ण को यमुना पार करा कर नन्द के घर छोड़ने का प्रसंग दर्शाते हुए वसुदेव, कृष्ण को दोनों हाथों से सिर के ऊपर उठाए, गतिमान दिखाए गए हैं। जगती की योजना और अलंकरण विधान, शास्त्रीय प्रतिमानों के अनुरूप है। जगती का यह स्वरूप भारतीय स्थापत्य कला का अत्यंत उन्नत और विशिष्ट उदाहरण है।


क्षैतिज धरातल पर भू-योजना में पूर्वाभिमुख मंदिर का मूल विमान-गर्भगृह, कपिली-अन्तराल और सोपान क्रम सहित प्रवेश द्वार सुरक्षित है। गर्भगृह का भीतरी भाग वर्गाकार है, जिसकी प्रत्येक भुजा 3.9 मीटर तथा बाहरी माप 7.7 मीटर वर्ग है। गर्भगृह से संलग्न आयताकार अन्तराल का माप 2.15X1.76 मीटर है। 1.2 मीटर चौड़े प्रवेश द्वार के पार्श्व अर्द्धस्तंभों, सिरदल के ऊपर की अनगढ़ शिला और जगती के अनुपात के आधार पर यह अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि मंदिर की मूल योजना में मण्डप का भी स्थान था। जगती के ऊपर पहुंचने के लिए सीढ़ियां, अनुरक्षण कार्यों का परिणाम है। सीढ़ी के ऊपर दाहिनी ओर रखी प्रतिमाएं भीम और उसके हाथी की बतलाई जाती हैं।

मंदिर के उर्ध्वाधर रेखा अर्थात उत्सेध में सादी सपाट खरशिला के ऊपर अलंकृत व स्तरित पीठ है, जिसमें क्रमशः एकान्तर क्रम में त्रिभुजाकार आकृतियां, हीरक आकृतियां, वृत्त अलंकरण और तत्पश्चात् नुकीली सूचिका है। इसके ऊपर गतिमान हाथियों की पट्टी, गजथर और घुड़सवारों की पंक्ति, अश्व-नरथर है। इसके ऊपर वेदिबंध के हिस्से में कीर्तिमुख आकृतियों की ग्रासपट्टी और हंस पंक्ति है, इसी भाग पर प्रक्षेपों में विष्णु के चौबीस रूप- केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, ऋषिकेश, पद्मनाभ, दामोदर, संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, पुरुषोत्तम, अधोक्षज, नरसिंह, अच्युत, जनार्दन, उपेन्द्र, हरि और कृष्ण आलों में निर्मित हैं। इसके ऊपर अलंकृत थरों के पश्चात् दो तल वाली जंघा का भाग है। जंघा के ऊपर शिखर-मूल अवशिष्ट है।

मंदिर का प्रवेश द्वार अत्यंत अलंकृत व भव्य है। शास्त्रीय प्रतिमानों के अनुरूप, विकसित और उन्नत प्रवेशद्वार, पांच शाखाओं में विभक्त है, जिसमें तीन भीतरी शाखाओं मेें दोनों पार्श्वों पर नदी देवी- गंगा, यमुना और वैष्णव द्वारपालों की मानवाकार प्रतिमाएं हैं। ऊपरी भाग में स्तंभ शाखा पर कोष्ठकों में देव प्रतिमाएं हैं। अन्य शाखाओं पर नागबंध और लता-वल्लरी अलंकरण है। सिरदल पर मध्य में विष्णु तथा पार्श्वों में ब्रह्मा तथा शिव हैं साथ ही नवग्रहों का अंकन भी किया गया है। देहरी पर उदुम्बर भाग में मानव व नाग-पुरूष उपासकों तथा गज और वृषभ का अंकन है। द्वार पार्श्व के दोहरे अर्द्धस्तंभ पट्टियों में विभक्त हैं, जिन पर साधक, उपासक, नर्तक और वादक-वृंद दिखाए गए हैं।

मंदिर का महत्व और आकर्षण, जंघा भाग पर उत्कीर्ण विष्णु के अवतार, शैव, सूर्य, देवियां, अष्ट दिक्पाल व विशिष्ट मुद्राओं में योगी, अप्सराएं तथा व्याल प्रतिमाएं हैं। विष्णु के अवतारों में नृसिंह का अंकन मंदिर की दक्षिणी भित्ति पर है, अष्टभुजी प्रतिमा के हाथों में चक्र, खड्ग, वज्र, पाश व शंख है। नृसिंह गोद में हिरण्यकश्यप को लिए, दोनों हाथों के नाखून से उसका वध कर रहे हैं। दक्षिणी भित्ति पर ही वराह अवतार की प्रतिमा है, चतुर्भुजी वराह के दाहिने ऊपरी हाथ में चक्र्र, निचले हाथ में गदा है। बायां ऊपरी हाथ विशिष्ट मुद्रा में तथा निचले हाथ में शंख है। प्रतिमा के दोनों पार्श्वों में परिचारिकाओं का अंकन है तथा गदा के पास भूमि पर नाग पुरुष अंकित है, जिसके सिर पर सर्पफण-छत्र है। वामन अथवा त्रिविक्रम अवतार का अंकन पश्चिमी भित्ति पर है, चतुर्भुजी प्रतिमा की भाव-भंगिमा रौद्र है। दाहिनी ऊपरी भुजा उठी हुई है और निचला हाथ ज्ञानमुद्रा में है। बाएं ऊपरी हाथ में शंख है, निचला हाथ खंडित है। पैर, जो संभवतः ऊपर उठा रहा होगा, अब भग्न हो चुका है।

मंदिर की अन्य उल्लेखनीय प्रतिमाओं में चतुर्भुजी गणेश की नृत्य मुद्रा है। प्रतिमा का दायां पैर, बायीं ओर मुड़ा है और बायां पैर मुड़कर आसन पर स्थित है। बाएं पैर के पास, वाहन मूषक दिखाया गया है। मोदक पात्र सहित प्रतिमा में शुण्ड, बायीं ओर मुड़कर मोदक को स्पर्श कर रहा है। शूर्पकर्ण, गजवदन प्रतिमा लम्बोदर है और यज्ञोपवीत, कंकण व पैंजनी धारण किए है। महत्वपूर्ण माने जाने वाले स्थान, मंदिर के पृष्ठ भाग के प्रक्षेप अर्थात् मध्य रथ में सूर्य का अंकन हुआ है। उपानह और कवचधारी सूर्य, प्रतिमा शास्त्र के निर्देशों के अनुरूप समपाद स्थानक मुद्रा में है और प्रतिमा के पादपीठ पर सप्ताश्व अंकित हैं।

मंदिर स्थापत्य की पारम्परिक प्रतिमाओं में जंघा के दोनों तलों पर अष्ट दिक्पालों की प्रतिमाएं हैं। अष्ट दिक्पालों में प्रथम, इन्द्र पूर्व दिशा का अधिपति है, जिसे यहां पूर्वी भित्ति के दक्षिणी छोर पर अंकित किया गया है। दक्षिण-पूर्व अथवा आग्नेय कोण का अधिपति, अग्नि दक्षिणी भित्ति के पूर्वी छोर पर दिखाया गया है। इस क्रम में आगे मृत्यु के देवता और दक्षिण दिशा के स्वामी यम, दक्षिणी भित्ति के पश्चिमी छोर पर विराजमान हैं। राक्षसों जैसे क्रूर स्वरूप और राक्षसेन्द्र नाम से ज्ञात, नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) कोण के स्वामी निऋति, पश्चिमी भित्ति के दक्षिणी छोर पर स्थापित हैं। विश्व को जलयुक्त रखने वाला, पश्चिमी दिशाधिपति वरुण, मंदिर के पश्चिमी भित्ति के उत्तरी छोर पर हैं। उत्तर-पश्चिम अर्थात् वायव्य दिशा के पालनहार, मन तुल्य देव वायु की प्रतिमा उत्तरी भित्ति के पश्चिमी छोर पर अंकित है। उत्तर दिशा के अधिपति धनद कुबेर का अंकन उत्तरी भित्ति के पूर्वी छोर पर है और उत्तर-पूर्व कोण, ईशान के ईश पूर्वी भित्ति के उत्तरी छोर पर अंकित हैं।

मंदिर की अन्य महत्वपूर्ण प्रतिमाओं में वैष्णवी, माहेश्वरी, सरस्वती और अम्बिका देवियां हैं। जंघा के उत्तरी तलछंद में आभूषणों से अलंकृत वैष्णवी के दाहिने ऊपरी हाथ में शंख, निचले हाथ में श्रीफल अथवा पुष्प, बायें ऊपरी हाथ में चक्र, निचले हाथ में गदा है। दक्षिणी तलछंद के एक अन्य अंकन में वैष्णवी को अष्टभुजी प्रदर्शित किया गया है, मानवमुखी गरुड़ पर आसीन देवी शंख व चक्र आयुध युक्त हैं। उत्तरी जंघा में अंकित माहेश्वरी की प्रतिमा, पारम्परिक अलंकरण और आयुध सहित अंकित है, दाहिनी ओर नन्दी मुंह ऊपर उठाए प्रदर्शित है। पश्चिमी भाग में चतुर्भुजी वीणापाणी सरस्वती का अंकन है। इसी दिशा में अम्बिका दाहिने हाथ के अंगूठे और तर्जनी से आम्रगुच्छ पकड़े हैं तथा बायीं ओर बालक लिए हुए हैं। प्रतिमा के शीर्ष भाग पर भी आम्रकोरक का अलंकरण है।

मंदिर में व्यालों और विभिन्न रोचक मुद्राओं में योगियों की प्रतिमाओं के अतिरिक्त विभिन्न देवांगनाएं और नायिकाएं हैं, इनमें मृदंग बजाती ‘मृदंगवादिनी’, पुरुष से आलिंगनबद्ध ‘मोहिनी’, खड्गधारी नृत्यांगना ‘मंजुघोषा’, झांझर पहनती ‘हंसावली’, चामरधारिणी ‘चामरा’, आंखों में अंजन देती, अलसयुक्त ‘लीलावती’, बांसुरी बजाती ‘बंसीवादिनी’, दर्पण लेकर बिंदी लगाती ‘विधिचिता’, केश हाथ में लिए ‘केशगुम्फिणी’, कमलनाल लिए ‘माननी’ और वीणा लिए ‘वीणावादिनी’ की बारम्बार पुनरावृत्ति हुई है। इनमें से विशेष उल्लेखनीय एक देवांगना, दक्षिणी जंघा के निचले छंद में स्थित ‘हंसावली’ है। वह अपना दाहिना पैर ऊपर उठाकर, दोनों हाथों से नूपुर बांध रही है। उसके दाहिने पैर के पास लघुकाय मृदंग वादक है। यह त्रिशीर्ष मुकुट, कानों में चक्र कुण्डल, कन्धे पर स्कन्ध माल, गले में ग्रैवेयक, उपग्रीवा, हिक्कासूत्र, स्तनसूत्र धारण किए हैं। भुजा में भुजबंध व कटकवलय है। मुक्तादाम, पादवलय व पादजालक भी स्पष्ट है। इस मूर्ति के तालमान में समानुपातिकता, अंग भंगिमा तथा सौन्दर्य, किसी भी दृष्टि से खजुराहो की ऐसी प्रतिमाओं से कम नहीं है।

मंदिर अपने स्थापत्य, अलंकरण, प्रतिमाओं और समग्र प्रभाव में, भुलाने को बाध्य कर देता है कि यह अधूरा है। इस कला-समृद्ध संरचना और काल के मूक साक्षी को देखकर, दर्शक सम्मोहित हो जाता है, सदियों का इतिहास और सहस्राब्दियों की परम्परा का मूर्तमान रूप है यह मंदिर। यह न केवल जांजगीर नगर अथवा जिले का, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ और भारतीय कला-स्थापत्य इतिहास का गौरव-विषय है।

परिशिष्ट- जांजगीर के प्राचीन स्मारकों और उनके रख-रखाव की जानकारी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के रिपोर्ट्स में मिलती है, वह इस प्रकार है-
Archaeological Survey of India - Annual Report 1905-6 (Conservation (general) - temples in Central Provinces) page 7-8 Visnu temple, Janjgir (with Lakshman temple, Sirpur)

Archaeological Survey of India - Annual Report 1924-5 (Section-I Conservation - Central Provinces) page 33-34 Visnu temple, Janjgir (with Sirpur and Kharod)

Progress Report Archaeological Survey Western India
1905 - Janjgir, special repaires to old Hindu temple(Progress Report 1903-4,para -79) in progress amount Rs. 100/-
1906 - special repaires to old temple Rs. 3970/-

From 1903 report - with the extra charge, added in 1901, of Central India and Hydrabad, and the proposed further addition of Rajputana and the Central Provinces, the work of which I have already begen,

From Annual Report Archaeological Survey Eastern Circle for 1905-6 the central provinces, to which most of the tributary states of Orissa and Chota Nagpur now belong, had just been aided.

Annual Report of the Archaeological Survey Eastern Circle
1907 - Janjgir - repaires to the old Hindu temples - Rs. 4068
1908 - X
1909 - restoration of two Hindu temples at Janjgir - Rs. 702
1910 - Janjgir - restoring the two Hindu temples - Rs. 1120 works - Big temple cleaning of rank vegetation cement concrete on flat roof fixing teak door lifting and fixing large stone in position cleaning site and levelling compound providing outlet for roof rain water works - small temple wire fencing and fixing wooden gate marrum ramping and levelling compound fixing window to aperture concrete in founds uprooting roots and cutting branches of pipal tree.
1911, 1912, 1913, 1914, 1915 - X
1916 - Janjgir - the large Vaishnava temple Rs. 29
1917 - Janjgir - annual repairs - the large Vaishnava temple Rs. 9
1918 - Janjgir - annual repairs - the large Vaishnava temple Rs. 7
1919 - Janjgir - X
1920 - Janjgir - certain repairs to the Vaishnava temple Rs. 420
1921 - Janjgir - X

Monday, November 1, 2021

जांजगीर-चांपा का पुरातत्व

बीसेक वर्ष पहले मेरे द्वारा तैयार किया गया लेख

जिला जांजगीर-चांपा, पुरातात्विक दृष्टि से विशिष्ट और अत्यंत महत्वपूर्ण भू-भाग है। यहां सर्वाधिक उल्लेखनीय अवशेष ‘गढ़’ हैं, इन गढ़ों की चर्चा के पूर्व दो बिन्दुओं पर स्पष्टीकरण आवश्यक है। पहला, गढ़ का शाब्दिक अर्थ- किला, दुर्ग, कोट, घेरा या गड्ढा, जिसके अनुरूप परिखा-खाई और वप्र-प्राकार युक्त भौतिक आकार स्वरूप वाले गढ़ हैं। पुष्ट जानकारी है कि ऐसे गढ़ों की संख्या छत्तीसगढ़ अंचल के इस जिले के सीमित भू-भाग में ही 36 पूरी हो जाती है-

(1) बछौद (2) कोटगढ़ (3) कोटमी (सुनार) (4) कोनार (5) कोसा (6) जेवरा (7) पामगढ़ (8) डोंगा कोहरौद (9) कोड़ाभाठ (10) कोसला (11) खरौद (12) हथनेवरा (13) पिसौद (14) धुरकोट (जांजगीर) (15) अंवरीद (16) भैंसदा (17) सिऊंढ़ (18) टुरी (19) नवागढ़ (20) खपराडीह (21) केरा (22) बाराद्वार (23) सरहर (24) लखुर्री (25) कोटेतरा (26) कांसीगढ़ (27) ओड़ेकेरा (28) अड़भार (29) पोता (30) सिंघरा (31) डभरा (32) धुरकोट (33) बघौत (34) कोटमी (35) सपोस (36) तरौद (अकलतरा)।

इसके अतिरिक्त संलग्न क्षेत्र में बिलासपुर जिले का मल्हार और विजयपुरगढ़, खरसिया के निकट तेलीकोट, सारंगढ़ के निकट उलखर और भेड़वन (तथा कोसीर?), दुर्ग जिले का मारो तथा रायपुर जिले के गढ़ सिवनी, छातागढ़, लीलर आदि स्थान भी गढ़ ग्राम है। इसके साथ ही जांजगीर-चांपा जिले के सर्वेक्षण तथा स्थानीय सूचनाओं द्वारा गढ़ ग्रामों के पहचान की प्रबल संभावना है।

चर्चा का दूसरा बिन्दु या दूसरे प्रकार के गढ़, वस्तुतः केन्द्र का अर्थ प्रकट करते हैं, जो इस अंचल में प्रचलित लगभग 15 वीं सदी ईस्वी के भू-राजस्व व्यवस्थापन से संबंधित है। इस प्रचलन का प्रथम लिखित प्रमाण 15 वीं सदी ईस्वी के अंत में आता है तथा सोलहवीं सदी ईस्वी के मध्य में कलचुरि शासक कल्याणसाय की जमाबन्दी पुस्तक में सर्वप्रथम इन छत्तीस गढ़ों (वस्तुतः 48 प्रशासनिक इकाईयों) या राजस्व व्यवस्थापन केन्द्रों का नाम पृथक-पृथक उल्लेखित है। इसी क्रम में प्राचीन केन्द्रीय सत्ता के उपक्रम, जो भीतरी और दुर्गम भौगोलिक भागों में स्थित जमीन्दारियों के रूप में स्थापित हुए, इनके मुख्यालय की गढ़ नाम से जाने गए।

इस प्रकार यहां गढ़ों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है- प्रथम भौतिक स्वरूप वाले प्राचीन गढ़ एवं दूसरे मध्ययुग के बाद कलचुरि काल में राजस्व केन्द्रों के रूप में विकसित गढ़। इनमें खरौद, कोटगढ़ जैसे कुछ उदाहरण हैं, जो दोनों वर्गों में सम्मिलित हो सकते हैं, अर्थात् इन प्राचीन भौतिक स्वरूप वाले गढ़ों में ही कलचुरि और बाद में मराठा प्रशासनिक व्यवस्था में भी केन्द्र के रूप में इस्तेमाल किया गया है, यही कारण है कि कोटगढ़ जैसे गढ़ में प्राचीन अवशेषों के साथ-साथ कलचुरि अभिलेख व प्रतिमाएं तथा मराठाकालीन स्थापत्य के अवशेष भी विद्यमान है।

प्रसंगवश यह उल्लेख भी आवश्यक है कि अंचल के कई ग्रामों में दशहरा पर्व पर मिट्टी के स्तंभ बनाकर उसके ऊपर पहुंचने की प्रतियोगिता और गढ़ विजय का प्रचलन है। खरौद में शबरी मंदिर के निकट ऐसा स्तंभ है तथा सारंगढ़ में यह आयोजन धूमधाम से होता आया है। गढ़ों की पहचान में इस परम्परा के गढ़ों से भ्रम की स्थिति बनती हैं।

जांजगीर-चांपा जिले के संदर्भ में भी भौतिक स्वरूप वाले गढ़ विशेष उल्लेखनीय है। इन गढ़ों की प्राचीनता महाजनपद काल में उत्तर कोसल से भिन्न कोसल (दक्षिण कोसल या महाकोसल जनपद) से सम्बद्ध की जा सकती है। रतनपुर के हैहय (कलचुरि या चेदि) राजाओं की परम्परागत सूची कलियुग संवत् 3958 अर्थात् ईसवी पूर्व 857 से आरंभ होती है। पुराण कथाओं में यादवों द्वारा विजित देशों में नर्मदा-मेकल, शुक्तिमती और ऋक्षवत् के साथ मृत्तिकावती का नामोल्लेख है, जिसका तात्पर्य संभवतः मृद्दुर्ग का सघन क्षेत्र, वर्तमान छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिला अंचल से है।

प्राचीन साहित्य जातक कथाओं, रामायण, कौटिल्य अर्थशास्त्र आदि ग्रन्थों में नगर के चारों और परिखा और वप्र बनाय जाने का उल्लेख मिलता है पुरातत्वीय अवशेषों में तक्षशिला में ईसा पूर्व की सदियों में नगर के चतुर्दिक बनाई गई मिट्टी की दीवार मिली है, जिसे स्थानीय लोग धूलकोट कहते हैं। इसी प्रकार अन्य प्राचीन नगरों में मुख्यतः मथुरा और शिशुपालगढ़ में नगर रक्षा के प्राकृतिक साधन के रूप में नदी, जल, पर्वत, प्रस्तर समूह, मरूभूमि तथा अरण्य एवं कृत्रिम साधनों में परिखा, प्राकार और रोपित अरण्य का उल्लेख है। शुक्र नीति के शिल्पकारों की सूची में दुर्गकारिणः नाम आया है। जातक कथाओं में परिखायुक्त मृद्दुर्गों का उल्लेख है, जिनमें जल परिखा या उदक अथवा तोयपूर्ण परिखा, पंक परिखा और रिक्त परिखा, ये तीन प्रकार बताये गये हैं। अर्थशास्त्र मंे घड़ियालयुक्त ग्राहवती परिखा का उल्लेख है। इन उल्लेखों से अनुमान होता है कि ईसवी पूर्व की तीसरी-चौथी सदी में मृद्दुर्गों की व्यवास्थित अवधारणा का पर्याप्त विकास हो चुका था।

जिले व संलग्न क्षेत्रों में मृद्दुर्गों से संबंधित ज्ञात पुरावशेष भी इन गढ़ों की प्राचीनता प्रमाणित करते हैं। कोटगढ़-महमंदपुर तथा आसपास के अन्य गढ़ ग्रामों बछौद, मल्हार आदि से मौर्यकालीन आहत सिक्के प्राप्त होने की जानकारी मिलती है और कोटमी (सक्ती) में किसी साधु द्वारा अपने कमंडल में बिच्छू डालकर चांदी के चौकोर सिक्के निकालने की कथा बताई जाती है, इस तारतम्य में बिच्छू का चांदी के सिक्के में परिवर्तित होना तथा प्राचीन गड़े धन-सिक्कों का बिच्छू के रूप में परिवर्तित हो जाने की प्रचलित मान्यता का अध्ययन रोचक और महत्वपूर्ण हो सकता है। बछौद और कोटगढ़ में बड़े आकार की ईंटें प्राप्त होती है। कोटगढ़ तथा अन्य गढ़ क्षेत्रों से भी नवपाषणयुगीन उपकरण प्राप्त होते हैं।

सागर विश्वविद्यालय के सर्वेक्षणों में खरौद तथा मल्हार से महाजनपद युगीन प्रमाण विशिष्ट मृद्भांड प्राप्त हुए हैं। कोटमी सुनार की खाई और तालाबों में अब भी मगर विद्यमान हैं। अड़भार तथा बाराद्वार क्रमशः अष्टद्वार और द्वादशद्वार के अपभ्रंश माने जा सकते हैं। स्थान नामों की दृष्टि से धुरकोट, कोटमी, कोटगढ़ कोटेतरा जैसे नाम तथा ‘उद्’ अन्त वाले ग्राम नाम, जहां उद् का तात्पर्य ‘जल’ से है, ऐसे कई ग्रामों से मिट्टी के गढ़ की जानकारी मिलती है, इसी प्रकार ग्राम नामों में गढ़ या कोट शब्द महत्वपूर्ण है, संक्षेप में भाषाशास्त्र की दृष्टि से स्थान नामों के अध्ययन के माध्यम से भी इन गढ़ों संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सकती है। अन्य संकेतों में रहौद और सिऊंढ़ जैसे गढ़ क्षेत्रों में 4-5 मीटर तक मोटे जमाव हैं। कोनार में अट्टालक (बुर्ज) व्यवस्था के अवशेष व मान्यता है। गढ़ों की वर्तमान स्थिति में इन्हें प्राकार युक्त और प्राकार रहित, वर्गाकार, वृत्ताकार, अण्डाकार, षटकोणीय, अष्टकोणीय आकार-प्रकार और स्वरूप के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

इन गढ़ों में से चूंकि किसी स्थल का वैज्ञानिक पुरातत्वीय उत्खनन नहीं हुआ है अतएव इनकी पृष्ठभूमि तथा व्याख्या के लिए अनुमान का सहारा लेना आवश्यक हो जाता है। यह तार्किक अनुमान किया जा सकता है कि तत्कालीन स्थितियों में छत्तीसगढ़ का यह समतल मैदानी भू-भाग घनी जनसंख्या वाला क्षेत्र रहा होगा। गढ़ों की संख्या, उनका आपस में सामीप्य तथा गढ़ों का विशाल आकार देखते हुए भी यह अनुमान पुष्ट होता है कि गढ़ निर्माण के कार्य हेतु भी बड़ी तादाद में मानव श्रम प्रयुक्त हुआ होगा। इन गढ़ों की सघन निकटता को देखते हुए प्रत्येक गढ़ के साथ किसी शासक या गढ़ों के सामरिक प्रयोजन मात्र का अनुमान उपयुक्त नहीं होता है बल्कि इन्हें छोटे-छोटे नगर राज्य मानना उचित हो सकता है। संभवतः मैदानी भू-भाग में बसने वाली तत्कालीन आबादी को प्राकृतिक एवं राजनैतिक-सामरिक आपदाओं में ‘गढ़’ सुरक्षा प्रदान करने वाली संरचनाएं रही होंगी। इस प्रकार जिले में गढ़ों के पुरातात्विक उत्खननों से भविष्य में आने वाले परिणामों के पूर्व भी इस अंचल के गढ़ शोध अध्ययन संभावनायुक्त, देश के पुरातत्वीय मानचित्र में विशिष्ट स्थान के अधिकारी हैं।

अगले चरण में लगभग दो हजार साल पहले लकड़ी पर लिपि उत्कीर्ण करने का प्रयोग भी इसी जिले में घटित हुआ है, जो पूरी दुनिया में अपनी तरह का अनूठा नमूना है। किरारी (चन्द्रपुर) से प्राप्त अभिलिखित काष्ठ स्तंभ लेख का सुरक्षित अंश, अब रायपुर संग्रहालय में प्रदर्शित है। हीराबंध (अब लगभग पट चुके तालाब) से निकले इस लकड़ी के खंभे पर खुदे अक्षरों को महत्वपूर्ण समझकर स्थानीय पंडित लक्ष्मीधर उपाध्याय ने इसकी यथादृष्टि नकल उतार ली थी और तत्कालीन पुरालिपि विशेषज्ञों ने जांचकर इसे प्रामाणिक पाकर, उसी के आधार पर लेख का अध्ययन किया जिसमें तत्कालीन राज पदाधिकारियों के पदों का उल्लेख कुछ इस प्रकार है - ’नगररक्षी वीरपालित और चिरगोहक, सेनापति वामदेव ... भटकेशव वीथिदकामिक...प्रतिहार खिपत्ति, गणक नाग हेअसि, गृहपतिक धरिक, भाण्डागारिक असाधिय... हस्त्यारोह, अश्वारोह, देवस्थानक, पादमूलिक रथिक सिसार खाखिमल आदि।

इसी प्रकार सक्ती के निकट दमऊदहरा अथवा गुंजी, लगभग दो हजार साल पहले ऋषभतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध था। दक्षिण कोसल के इस तीर्थ का उल्लेख महाभारत में भी हुआ है। यहां राजा कुमारवरदत्तश्री, अमात्य गोडछ के नाती अमात्य मातृजनपालित और वासिष्ठी के बेटे अमात्य, दण्डनायक और बलाधिकृत बोधदत्त ने दो बार एक-एक हजार गायों का दान किया। यह अभिलिखित प्रमाण भी अपनी प्राचीनता के कारण दुर्लभ जानकारी और क्षेत्र की सम्पन्नता का द्योतक है तथा यह स्थान आज भी जिले के महत्वपूर्ण धार्मिक तथा प्राकृतिक सौन्दर्ययुक्त प्राचीन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।

जिले का ग्राम अमोदा प्राचीन अभिलेखों की प्राप्ति का महत्वपूर्ण स्थान है, इस ग्राम से सन 1924 एक घर की नींव खोदते हुए रतनपुर कलचुरि शासकों के तीन ताम्रपत्र सेट प्राप्त हुए थे, जो पृथ्वीदेव प्रथम, पृथ्वीदेव द्वितीय और जाजल्लदेव द्वितीय के काल अर्थात् ग्यारहवीं-बारहवी सदी ईस्वी के हैं। पृथ्वीदेव प्रथम के ताम्रपत्र में तुम्माण में वंकेश्वर मंदिर की चतुष्टिका निर्माण व ग्राम दान का उल्लेख है। पृथ्वीदेव द्वितीय के अभिलेख में वंकेश्वर ग्राम दान का उल्लेख है तथा जाजल्लदेव द्वितीय के ताम्रपत्र में राजा पर पड़ी विपत्ति व उससे छुटकारा पाने पर ग्राम दान किए जाने का विवरण आया है।

इसी प्रकार कोटगढ़ (अकलतरा) से प्राप्त शिलालेख भी विशेष उल्लेखनीय है, जिनमें पृथ्वीदेव द्वितीय के शासन काल में उसके मंत्री वल्लभराज के धार्मिक व अन्य कार्य, दान आदि का विवरण मिलता है, जिसके अनुसार उसने वल्लभसागर नामक तालाब खुदवाया तथा शिव एवं रेवन्त के मंदिरों का निर्माण कराया इससे अनुमान होता है कि तत्कालीन कलचुरि राज में वल्लभराज महत्वपूर्ण और लोकप्रिय मंत्री रहा होगा।

जिले के महत्वपूर्ण स्थापत्य उदाहरणों में सर्वप्रमुख जांजगीर का विष्णु मंदिर है, जिसे स्थानीय जन भीमा मंदिर या नकटा मंदिर के नाम से पुकारते हैं। दन्तकथाओं में कहा जाता है कि छोटा मंदिर (वस्तुतः शिव मंदिर) बड़े मंदिर का शिखर है, यह शिखर मंदिर के ऊपर रखा जाता, तभी निर्धारित अवधि रात पूरी हो गई, चिड़िया चहचहाने लगी, पौ फटने लगी और मंदिर अधूरा रहा गया। जांजगीर नगर, रत्नपुर शाखा के कलचुरि शासक जाजल्लदेव प्रथम द्वारा बसाया गया माना जाता है और संभवतः इन मंदिरों का निर्माण भी इसी काल में अर्थात 11-12 वीं सदी ईस्वी में निर्मित हुआ होगा।

शिखर रहित विष्णु मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से पूर्ण विकसित एवं तत्कालीन कला का प्रतिनिधि उदाहरण है। मानवाकार प्रतिमाओं युक्त विशाल जगती (चबूतरे) पर मंदिर निर्मित है। चबूतरे पर देव प्रतिमाओं के साथ-साथ कृष्ण कथा एवं रामकथा के कुछ महत्वपूर्ण प्रसंगों का अत्यंत रोचक अंकन है। जगती का अलंकरण व पूरे आकार की प्रतिमाओं की दृष्टि से यह मंदिर संभवतः भारतीय स्थापत्य कला का एकमात्र उदाहरण है। पूर्वाभिमुख मंदिर की बाहरी दीवार पर विष्णु, अवतार, रूप, वैष्णव कथाओं के अंकन के साथ-साथ ब्रह्मा, सूर्य, शिव, देवियां, अष्ट दिक्पाल, मिथुन, अप्सरा व व्याल प्रतिमाओं के अतिरिक्त विभिन्न मुद्राओं में वैष्णव योगियों का महत्वपूर्ण प्रतिमाएं हैं। प्रवेश द्वार पर त्रिमूर्ति-ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ त्रैलोक्यभ्रमण (गरुड़ासीन) विष्णु, नदी देवियां, द्वारपाल तथा पार्श्व अर्द्धस्तंभों पर कुबेर अंकित हैं।

अन्य मंदिर (छोटा मंदिर) शिव का है, जिसका मूल स्वरूप नवीनीकरण संरक्षण से प्रभावित है किन्तु प्रवेश द्वार यथावत सुरक्षित है। यहां सिरदल के मध्य में नंदी सहित चतुर्भुजी शिव का कलात्मक अंकन हैं द्वार शाखाओं में उभय पार्श्वों पर नदी देवियों और द्वारपाल की प्रतिमाएं रूपायित हैं। बाहरी दीवार पर अपेक्षाकृत कम संख्या में किन्तु शास्त्रीय व कलात्मक सूर्य, हरिहर-हिरण्यगर्भ, शिव-नटराज, गणेश, सरस्वती आदि प्रतिमाएं है। एक अन्य महत्वपूर्ण प्राचीन मंदिर की जानकारी पिछली सदी के भारतीय पुरातत्वीय सर्वेक्षण के प्रतिवेदन से प्राप्त होती है, जिसके अनुसार यह विशाल मंडपयुक्त अंलकृत मंदिर शिव को समर्पित था, किन्तु वर्तमान में इस मंदिर का अस्तित्व विद्यमान नहीं है।

जिले में प्राचीन स्थापत्य का विशेष महत्वपूर्ण केन्द्र खरौद है। यह छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र है। खरौद के ईंट निर्मित ताराकृति मंदिर विशेष उल्लेखनीय हैं। इनमें शबरी मंदिर चबूतरे पर निर्मित है, गर्भगृह का प्रवेश द्वार आकर्षक है, जिसमें नाग युग्म अलंकरण अभिकल्प का संतुलन देखते ही बनता है। प्रवेश द्वार के बीचों बीच ललाट-बिंब पर गरुड़ की आकृति उत्कीर्ण है, जिसमें मंदिर मूलतः वैष्णव होना संभावित है। प्रवेश द्वार पर दो नारी आकृतियों की पहचान नदी देवी गंगा-यमुना के रूप में की जा सकती है। मंदिर का मंडप पुनर्सरचित है, किन्तु अर्द्धस्तंभों पर शिवगण, द्वारपाल, सिंहवाहिनी दुर्गा तथा मकरवाहिनी गंगा की पहचान की जा सकती है। शेष तीन प्रतिमाएं, जिनमें दो पुरुष व एक नारी प्रतिमा है, की पहचान राम, लक्ष्मण व सीता के रूप में की जाती है, किन्तु इन प्रतिमाओं मे वक्ष पर कवच तथा पैर उपानहयुक्त (जूतों से ढके) दिखाई पड़ते हैं, जिससे इन प्रतिमाओं का सौर परिवार से संबद्ध किया जाना अधिक न्याय संगत है। मंदिर के बाहर एक अन्य महत्वपूण्र अर्द्धनारीश्वर प्रतिमा है, जिसे शास्त्रीय प्रतिमानों के अनुरूप अलंकृत तथा व्याघ्रचर्मधारी प्रदर्शित किया गया है।

इन्दल देउल मंदिर की योजना भी ताराकृति है, यह मंदिर ईंटों से निर्मित है, किन्तु बाह्य भित्ति के आलों में गणेश, नृसिंह आदि आकृतियां प्रदर्शित हैं। मंदिर का विशेष उल्लेखनीय अंग प्रवेश द्वार पर स्थापित गंगा-यमुना की प्रतिमाएं है, मानवाकार इन नदी देवी प्रमिाओं की भंगिमा, अलंकरण तो कलात्मक, सुरूचिपूर्ण व संतुलित है ही, इनका आकार भी द्वारशाखा के बराबर पूर्ण है, यह भारतीय मंदिर वास्तु का विशिष्ट लक्षण है। नदी देवी प्रतिमाओं के पार्श्व से बाहर की आरे प्रदर्शित भित्ति के चिह्न, गर्भगृह के समक्ष मंडप जैसे किसी अंग का अनुमान कराते हैं। खरौद का लक्ष्मणेश्वर मंदिर संरक्षण-सर्वधन कार्यों से अत्यधिक प्रभावित है, किन्तु गर्भगृह में स्थापित मूल अष्टकोणीय शिवलिंग के अवशिष्ट है। यहां प्रवेश द्वार को शाखाएं दो भागों में विभक्त हैं, जिसमें निचले भाग पर द्वारपाल व उपरी आधे भाग पर गंगा-यमुना को उनके वाहनों क्रमशः मकर व कच्छप पर स्थित दिखया गया है। मंदिर के मंडप में राम कथानक युक्त स्तंभ तथा दो प्राचीन शिलालेख भी जड़े है। धार्मिक दृष्टि से इस मंदिर की सर्वाधिक मान्यता है। खरौद के मंदिरों का काल ईस्वी सातवी-आठवीं सदी निर्धारित किया जा सकता है।

अड़भार, जिले का एक महत्वपूर्ण प्राचीन स्थल है, जहां ईस्वी सातवीं-आठवीं सदी के शिव मंदिर के अवशेष तथा अन्य पुरातशेश प्रकाश में आये हैं। अड़भार का मंदिर अष्टकोणीय ताराकृति योजना वाला मंदिर था, जिसमें प्रवेश हेतु दो द्वार अब भी मूलतः विद्यमान हैं। इसमें बाह्य अलंकृत द्वार पर नाग-गरूड़, कार्तिकेय व उमा-महेश का अंकन है। मंदिर परिसर में अत्यंत आकर्षक अष्टभुजी देवी महिषमर्दिनी तथा देगन गुरू के नाम से ज्ञात जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा है। मंदिर के सामने नंदी मंडप है, जिसमें अष्टकोणीय नृत्त शिव की प्रतिमा है, जो तत्कालीन कला प्रतिमानों में प्रतिनिधि प्रतिमा मानी जा सकती है।

शिवरीनारायण, खरौद से संलग्न महानदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध केन्द्र है, जहां शबरीनारायण, केशवनारायण और चन्द्रचूड़ मंदिर प्राचीनता की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय हैं। इनमें केशवनारायण ईंट-पाषाण मिश्रित ताराकृति संरचना है, जिसके प्रवेश द्वार पर विष्णु के चौबीस रूपों का अंकन अत्यधिक सफाई से किया गया है, अन्य परम्परागत स्थापत्य लक्षणों के साथ गर्भगृह में दशावतार विष्णु की मानवाकार प्रतिमा है। शबरीनारायण या मुख्य मंदिर के प्रवेश द्वार के पार्श्व में शंख पुरूष व चक्र पुरूष की आदमकद मूर्तियां है, द्वारशाखा पर बारीक उकेरन और शैलीगत लक्षण की भिन्नता दर्शनीय है साथ ही मंडप में रखी परवर्तीकालीन गरूड़ासीन लक्ष्मी-नारायण प्रतिमा भी उल्लेखनीय है। चंद्रचूड़ मंदिर में अत्यंत महत्वपूर्ण सूचना युक्त कलचुरि कालीन शिलालेख जड़ा है।

यह जिला प्राचीन सिक्कों की प्राप्ति की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस क्रम में सर्वप्रथम ठठारी से प्राप्त चांदी के आहत सिक्के हैं, जिनका काल तीसरी-चौथी सदी ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है, कुछ अन्य स्थानों से इस प्रकार के सिक्के प्राप्त होने की अपुष्ट सूचना प्राप्त होती है। बालपुर से प्राप्त एक सिक्का अपिलक (सालिलुक) का माना जाता है, जिसका काल ईस्वी की आंरभिक सदी है। यह सिक्का आन्ध्र शासकों के सिक्कों के समरूप है, बालपुर से ही स्थानीय शासकों के कुछ अन्य तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनमें गज तथा देवी अथवा नाग का अंकन है। इसके साथ ही रोम, कुषाण शासकों आदि सिक्के भी जिले के संलग्न क्षेत्र व अंचल से प्राप्त हुए हैं। लगभग पांचवीं-छठीं सदी ईस्वी के शासकों प्रसन्नमात्र और महेन्द्रादित्य के 81 सिक्के बाराद्वार के निकट ग्राम तलवा से प्राप्त हुए हैं, ये सभी स्वर्ण सिक्के ठप्पांकित प्रकार के हैं और इस प्रकार के सिक्कों की यह सर्वाधिक संख्या निधि है। तीन चांदी और एक तांबे का चीनी सिक्का भी बालपुर से प्राप्त हुआ है। रतनपुर के कलचुरि शासकों का भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह केरा से प्राप्त हुआ था।

इस प्रकार संक्षेप में कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ अंचल के जांजगीर-चांपा जिले के मैदानी भू-भाग ने इतिहास में सभ्यता के प्रत्येक चरण में मानव को आकर्षित किया है और नैसार्गिक सम्पदा से परिपूर्ण इस जिले का वैविध्य सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक व कलात्मक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है, वर्तमान में अवशिष्ट हमारे अतीत के ये धरोहर हमें आत्म गौरव का बोध कराते हुए उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर रहने की प्रेरणा देते हैं।