विमर्श : रविंद्र कुमार बैस
इसराज के जादूगर
ठा. सुखसागर सिंह
इसराज के सिद्धहस्त कलाकार ठाकुर सुखसागर सिंह अपने इलाके में डोंड़की वाले बड़का बाबू के नाम से जाने जाते थे। अपने जमाने में इसराज की जीवंत स्वर लहरियों से वे महफिल लूट लिया करते थे। आज जबकि इसराज के फनकार नदारद से हो गए हैं, तो बड़का बाबू की याद अनायास ही हो आती है।
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| ठा. सुखसागर सिंह 1903 - 13 अगस्त 1981 |
जांजगीर-चांपा जिले के अंतर्गत ग्राम मुलमुला में सन 1903 में पिता पुरुषोत्तम सिंह और माता माना बाई के घर अवतरित हुए इसराज के जादूगर ठा. सुखसागर सिंह डोंड़की वाले बड़का बाबू के नाम से भी जाने जाते थे।
ठाकुर सुखसागर सिंह मात्र चौथी कक्षा पास व्यक्ति थे। उनकी इसराज और उनका लिबास उनकी खास पहचान हुआ करती थी। कमर के नीचे पटका (छोटा गमछा), छह.हाथ के सफेद चादर और कंधे में खादी के झोला लटकाए बड़का बाबू के पास बीड़ी-माचिस हमेशा रहा करती थी। मरते दम तक किसी भी मौसम में उन्होंने जूता-चप्पल और कमीज-बनियान नहीं पहना। उनके फक्कड़ जीवन में संगीत और इसराज ही उनकी असली दौलत थी। उसमें हमेशा उसी की साधना में लीन रहा करते थे। वे नंदेलीवाले बाजा मास्टर पं. पचकौड़, मुलमुला वाले तबला वादक ठा. भानसिंह, नरियर वाले हारमोनियम वादक विश्वेश्वर सिंह, कोसा के सितार वादक हजारी सिंह, पोंड़ी-रांछा और सिउड़ के गम्मत के सूत्रधार धरम कौशिक और गोलन सिंह के समकालीन थे। ठा. छेदीलाल बैरिस्टर के सहयोग से 1939 में त्रिपुरी के अखिल भारतीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में शामिल होकर उन्होंने स्वागत गान में संगीत देकर क्षेत्र के सांस्कृतिक प्रतिभा को गौरव और सम्मान दिलाया था।
बचपन से ही सुखसागर सिंह को इसराज वाद्य से बड़ा लगाव था। कठिन साधना ने उन्हें इसराज वादन में पारंगत बनाया। कला साधक और संगीतज्ञ लखनदास के वे निष्ठावान शिष्य थे। वे अंचल के एकमात्र शख्सियत थे, जिन्हें इस विद्या का विशेष ज्ञान था। उन्होंने पराशर संगीतालय कलकत्ता से प्रशिक्षण लिया था। उनकी संगीत शिक्षा पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर के सानिध्य में हुई। इसराज पर हाथ अब विरले ही चलते हैं, यह संगत के लिए रचा गया दुर्लभ वाद्ययंत्र है, जो अब लुप्तप्राय सी है। राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ ठाकुर के इस प्रिय वाद्ययंत्र को बढ़ावा देने वाला कोई नहीं दिखता। शायद संगत का साज होने के कारण उसकी उपेक्षा की जाती रही है। ठा. सुखसागरसिंह का इसराज वादन कार्यक्रम रायगढ़ के प्रख्यात संगीतज्ञ और कला संरक्षक राजा चक्रधर सिंह के दरबार के अलावा डोंगरगढ़ से रायगढ़ के बीच संपूर्ण छत्तीसगढ़ के नामी संगीत समारोहों में होते रहे।
सुखसागर सिंह कहा करते थे- इसराज से मानव स्वर के समकक्ष स्वर निकाले जा सकते हैं। एक बार की बात है, रियाज के लिए गोरेबाबू के घर में संगीत महफिल चल रही थी कि ठा. परमानंद अक्षर ‘ठ’ नहीं बोल पा रहे थे। वजह थी दांतों का ना होना, उस वक्त के बाद से महफिलों में सुखसागर सिंह ही इसराज से ‘ठ’ अक्षर को हूबहू उच्चारित किया करते थे। कई बार तो वे गायक पर भी भारी पड़ने लगते थे। उनका मानना था कि इसराज भारतीय भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति देने में सबसे उपयुक्त है।
ठा. सुखसागर सिंह रमता जोगी बहता पानी की तरह साधुओं के सानिध्य में अमरकंटक को प्रस्थान कर गए। वहाँ स्थित रंगमहल के पुजारी बलराज दास, जो वहाँ के महंत भी थे, उनके यहाँ संगीत सभा चल रही थी कि सुबह पाँच बजे इसराज पर उंगलियाँ रखे-रखे ही उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी और हृदयाघात से 13 अगस्त 1981 को उनका देहांत हो गया।
इस अंचल के महान संगीतज्ञ और इसराज के जादूगर ठा. सुखसागर सिंह के सांगीतिक योगदान को कभी भूला नहीं जाएगा, कभी भुलाया नहीं जाएगा।
0 हरिभूमि समाचार पत्र के ‘चौपाल‘ में 21 दिसंबर 2006 में प्रकाशित लेख अकलतरा के श्री रविन्द्र कुमार सिंह द्वारा तैयार किया गया है। आंचलिक गौरव के प्रति निरंतर सजग रहते हैं और प्रेरक व्यक्तित्व-प्रसंगों के अभिलेखन का उनका प्रयास प्रशंसनीय रहा है।
0 इस लेख में 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन का उल्लेख है, जिसकी जानकारी इस लिंक पर देख सकते हैं।



