Saturday, October 31, 2026

इसराज के जादूगर

विमर्श : रविंद्र कुमार बैस 

इसराज के जादूगर 
ठा. सुखसागर सिंह 

इसराज के सिद्धहस्त कलाकार ठाकुर सुखसागर सिंह अपने इलाके में डोंड़की वाले बड़का बाबू के नाम से जाने जाते थे। अपने जमाने में इसराज की जीवंत स्वर लहरियों से वे महफिल लूट लिया करते थे। आज जबकि इसराज के फनकार नदारद से हो गए हैं, तो बड़का बाबू की याद अनायास ही हो आती है।
 
ठा. सुखसागर सिंह
1903 - 13 अगस्त 1981

जांजगीर-चांपा जिले के अंतर्गत ग्राम मुलमुला में सन 1903 में पिता पुरुषोत्तम सिंह और माता माना बाई के घर अवतरित हुए इसराज के जादूगर ठा. सुखसागर सिंह डोंड़की वाले बड़का बाबू के नाम से भी जाने जाते थे। 

ठाकुर सुखसागर सिंह मात्र चौथी कक्षा पास व्यक्ति थे। उनकी इसराज और उनका लिबास उनकी खास पहचान हुआ करती थी। कमर के नीचे पटका (छोटा गमछा), छह.हाथ के सफेद चादर और कंधे में खादी के झोला लटकाए बड़का बाबू के पास बीड़ी-माचिस हमेशा रहा करती थी। मरते दम तक किसी भी मौसम में उन्होंने जूता-चप्पल और कमीज-बनियान नहीं पहना। उनके फक्कड़ जीवन में संगीत और इसराज ही उनकी असली दौलत थी। उसमें हमेशा उसी की साधना में लीन रहा करते थे। वे नंदेलीवाले बाजा मास्टर पं. पचकौड़, मुलमुला वाले तबला वादक ठा. भानसिंह, नरियर वाले हारमोनियम वादक विश्वेश्वर सिंह, कोसा के सितार वादक हजारी सिंह, पोंड़ी-रांछा और सिउड़ के गम्मत के सूत्रधार धरम कौशिक और गोलन सिंह के समकालीन थे। ठा. छेदीलाल बैरिस्टर के सहयोग से 1939 में त्रिपुरी के अखिल भारतीय कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में शामिल होकर उन्होंने स्वागत गान में संगीत देकर क्षेत्र के सांस्कृतिक प्रतिभा को गौरव और सम्मान दिलाया था। 

बचपन से ही सुखसागर सिंह को इसराज वाद्य से बड़ा लगाव था। कठिन साधना ने उन्हें इसराज वादन में पारंगत बनाया। कला साधक और संगीतज्ञ लखनदास के वे निष्ठावान शिष्य थे। वे अंचल के एकमात्र शख्सियत थे, जिन्हें इस विद्या का विशेष ज्ञान था। उन्होंने पराशर संगीतालय कलकत्ता से प्रशिक्षण लिया था। उनकी संगीत शिक्षा पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर के सानिध्य में हुई। इसराज पर हाथ अब विरले ही चलते हैं, यह संगत के लिए रचा गया दुर्लभ वाद्ययंत्र है, जो अब लुप्तप्राय सी है। राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ ठाकुर के इस प्रिय वाद्ययंत्र को बढ़ावा देने वाला कोई नहीं दिखता। शायद संगत का साज होने के कारण उसकी उपेक्षा की जाती रही है। ठा. सुखसागरसिंह का इसराज वादन कार्यक्रम रायगढ़ के प्रख्यात संगीतज्ञ और कला संरक्षक राजा चक्रधर सिंह के दरबार के अलावा डोंगरगढ़ से रायगढ़ के बीच संपूर्ण छत्तीसगढ़ के नामी संगीत समारोहों में होते रहे। 

सुखसागर सिंह कहा करते थे- इसराज से मानव स्वर के समकक्ष स्वर निकाले जा सकते हैं। एक बार की बात है, रियाज के लिए गोरेबाबू के घर में संगीत महफिल चल रही थी कि ठा. परमानंद अक्षर ‘ठ’ नहीं बोल पा रहे थे। वजह थी दांतों का ना होना, उस वक्त के बाद से महफिलों में सुखसागर सिंह ही इसराज से ‘ठ’ अक्षर को हूबहू उच्चारित किया करते थे। कई बार तो वे गायक पर भी भारी पड़ने लगते थे। उनका मानना था कि इसराज भारतीय भावनाओं और विचारों की अभिव्यक्ति देने में सबसे उपयुक्त है। 

ठा. सुखसागर सिंह रमता जोगी बहता पानी की तरह साधुओं के सानिध्य में अमरकंटक को प्रस्थान कर गए। वहाँ स्थित रंगमहल के पुजारी बलराज दास, जो वहाँ के महंत भी थे, उनके यहाँ संगीत सभा चल रही थी कि सुबह पाँच बजे इसराज पर उंगलियाँ रखे-रखे ही उनकी तबीयत अचानक बिगड़ी और हृदयाघात से 13 अगस्त 1981 को उनका देहांत हो गया। इस अंचल के महान संगीतज्ञ और इसराज के जादूगर ठा. सुखसागर सिंह के सांगीतिक योगदान को कभी भूला नहीं जाएगा, कभी भुलाया नहीं जाएगा। 


0 हरिभूमि समाचार पत्र के ‘चौपाल‘ में 21 दिसंबर 2006 में प्रकाशित लेख अकलतरा के श्री रविन्द्र कुमार सिंह द्वारा तैयार किया गया है। आंचलिक गौरव के प्रति निरंतर सजग रहते हैं और प्रेरक व्यक्तित्व-प्रसंगों के अभिलेखन का उनका प्रयास प्रशंसनीय रहा है। 
0 इस लेख में 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन का उल्लेख है, जिसकी जानकारी इस लिंक पर देख सकते हैं।

Saturday, October 17, 2026

नंदेली के बाजा मास्टर

सुरता : रविन्द्र कुमार सिंह
बाजा मास्टर पं. पचकौड़ प्रसाद 
काम ही बन गया नाम

कांग्रेस के त्रिपुरी अधिवेशन में संगीत निर्देशन देकर अंचल का नाम रोशन करने वाले पं. पचकौड़ प्रसाद पांडेय एक सिद्धहस्त वादक और गायक थे। सच कहें तो संगीत ही उनका जीवन था। इसीलिए लोग उन्हें बाजा मास्टर कहकर बुलाते थे। 

जब काम ही किसी की पहचान बन जाए, तो इससे काम के प्रति उस व्यक्ति के समर्पण का पता चलता है। संगीत के लिए समर्पित ऐसे ही व्यक्ति थे- पं. पंचकौड़ प्रसाद पांडेय, जिन्हें लोग बाजा मास्टर के नाम से जानते थे। वे क्षेत्र के नामवर गायक और तबला वादक थे। बिलासपुर जिले में स्थित नंदेली एक छोटा-सा गाँव है। नंदेली के पास ही ग्राम कोसा और ऐतिहासिक नगरी मल्हार स्थित है।

बाजा मास्टर
पंडित पचकौड़ प्रसाद पांडेय
18.4.1893(1894?) - 15.5.1975

पचकौड़ प्रसाद पांडेय को संगीत की शुरुआती तालीम घर में ही मिली। बाजा मास्टर ने किसी घराने या गुरु से विधिवत संगीत शिक्षा नहीं ली, लेकिन वे जौनपुर के पं. रामवली (?) के साथ कुछ दिन जरूर रहे। उन्होंने संगीत-साधना और रियाज़ के लिए हारमोनियम को अपना साथी बनाया। वे हारमोनियम के सिद्धहस्त वादक थे। नंदेली जैसे छोटे-से गाँव में संगीत के लिए उन्हें क्या माहौल मिलता, लेकिन उन्होंने अपनी एकाकी साधना के जरिए इस गाँव को ही नहीं, पूरे अंचल को गौरवान्वित किया। संगीत की कठिन साधना से निखरकर पं. पचकौड़ प्रसाद पांडेय देखते-ही-देखते बाजा मास्टर बन गए। इस (नाम) की एक वजह यह भी थी कि बिलासपुर के बैरिस्टर छेदीलाल के पिता का नाम भी पचकौड़ सिंह था। इस कारण उनका नाम लेने में लोग संकोच महसूस करते थे। कहते हैं, बैरिस्टर साहब ने अपनी सूझ-बूझ से क्षेत्रीय जनमानस का ध्यान रखते हुए यह सम्मानजनक संबोधन उन्हें दिया।

अंचल के तत्कालीन संगीतज्ञों में पं. भूषण कवि, झंडे खाँ, गुदई महाराज, रामलखनदास (सन्यासी बाबा), अयोध्या और नील सरकार के शिष्यों से उनकी समीपता रही। बाजा मास्टर के दो परम मित्र थे- ठा. भान सिंह, तबला वादक (मुलमुला), और सुखसागर सिंह। इनकी तिकड़ी ने उस जमाने में बहुत प्रतिष्ठा पाई। बाजा मास्टर को सूर, कबीर, तुलसी और जयदेव-कृत गीत-गोविंद के सैकड़ों पद कंठस्थ थे, जिनको वे गाते-बजाते थे। ध्रुपद और धमार पर उनका एकाधिकार था। वे पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर शैली के वादक-गायक थे। 

ठा. छेदीलाल बैरिस्टर जब विलायत से लौटे तो अंचल के इस संगीत-तिकड़ी को सन 1939 के ऐतिहासिक त्रिपुरी के अधिवेशन में लेकर गए, जहाँ संगीत समिति के अध्यक्ष बाजा मास्टर मनोनीत किए गए। उनके निर्देशन में त्रिपुरी में “मन मुदित आज महान”, “वंदे मातरम्” और “विजयी विश्व तिरंगा प्यारा” का स्वागत-गान ठा. विश्वेश्वर सिंह (नरियरा वाले) और हारमोनियम मास्टर पं. राधेश्याम मिश्र ने गाया। इस सम्मेलन में महात्मा गांधी और सुभाषचंद्र बोस जैसे नेताओं ने उनकी संगीत-रचना का आनंद उठाया।

उन दिनों शास्त्रीय संगीत गायन-वादन सिर्फ मनोरंजन का साधन ही नहीं, बल्कि जनचेतना के सशक्त माध्यम भी थे। पराधीन काल में फिरंगियों के खिलाफ लोगों में चेतना जगाने के लिए इस माध्यम का खूब उपयोग हुआ। बाजा मास्टर बड़े मनमौजी किस्म के व्यक्ति थे। निमंत्रण मिलने पर गाने-बजाने के प्रति अभिरुचि जगाने यहाँ-वहाँ आयोजन में पहुँच जाते थे। उनका नाम सुनते ही लोग दौड़ पड़ते। इसके एवज में वे कोई पैसा नहीं लेते थे, इसलिए वे झोपड़ी से लेकर महलों तक सम्मानित हुए। बिलाईगढ़ के जमींदार हरदयाल सिंह तो उनके दीवाने ही थे। बाद में बाजा मास्टर संगीत शिक्षा भी देने लगे थे। वे शिक्षार्थियों के आवास और भोजन की व्यवस्था स्वयं करते थे। आतिथ्य-सत्कार में वे अद्वितीय थे। कोई भी मेहमान बिना भोजन किए उनके घर से नहीं जाता था, जबकि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। सेवा-सत्कार में उनकी धर्मपत्नी स्व. राधाबाई का सहयोग बराबर मिला करता था।

जयदेव-कृत गीत-गोविंद के पदों को इन्होंने राग, तालबद्ध कर स्वर-लिपि तैयार की थी। बैरिस्टर साहब के संपर्क में आने के उपरांत बाजा मास्टर राजनीतिक रूप से भी सक्रिय हुए। व्यक्तिगत सत्याग्रह में भाग लेने के कारण इन्हें बंदी भी बनाया गया। लेकिन उनका पहला और आखिरी प्यार संगीत ही था। आजीवन संगीत में डूबे रहने वाले बाजा मास्टर का देहावसान 5 मई 1975 में हुआ। यह दुखद तथ्य है कि उनके और संगीत के प्रति उनके योगदान को नए राज्य में पूरी तरह से बिसरा दिया गया है। 


0 हरिभूमि समाचार पत्र के ‘चौपाल‘ में 29 मार्च 2007 में प्रकाशित लेख अकलतरा के श्री रविन्द्र कुमार सिंह द्वारा तैयार किया गया है। आंचलिक गौरव के प्रति निरंतर सजग रहते हैं और प्रेरक व्यक्तित्व-प्रसंगों के अभिलेखन का उनका प्रयास प्रशंसनीय रहा है।

0 इस लेख में 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन का उल्लेख है, जिसकी जानकारी इस लिंक पर देख सकते हैं।