दहाई साल बीतने को आया, यादें अब भी ताजा हैं। रघु राय और जतिन दास का रायपुर प्रवास। वे समय ले कर आए थे। अपने शिष्य नागपुर वाले शेखर सोनी के आग्रह पर उन्हें रामनामियों से फिर से मिलने जाना था। यात्रा में शिवरीनारायण और सिरपुर भी शामिल हुआ तो मैं भी जुड़ गया। गाड़ी रुकती तो उनका कैमरा ठहर जाता, चलती गाड़ी में शीशे के भीतर से भी बार-बार क्लिक करते रहते। शायद प्रभाव और संभावना का अनुमान लगाते। पूरी यात्रा में शास्त्रीय भजन और सूफी गीत बजते रहे, वे ताली पर ताल देते साथ गाते गुनगुनाते रहे। जतिन दास के साथ उनकी जोड़ी के क्या कहने। जतिन दा को छेड़ते, उनकी बातों का जवाब देते, जिनमें हर बार ऐसा गुदगुदी होती कि उसके भीतर का चुटीलापन अखरे नहीं था।
शिवरीनारायण पहुंचने के पहले महानदी के पुल पर गाड़ी रुकवाई। अंधेरा घिरने को, अप्रैल का महीना मगर बिजली चमक रही थी, बूंदाबांदी हो रही थी। फोटोग्राफी के लिए एमदम प्रतिकूल और तभी उनका कैमरा निकला, फोटो लेते रहे। शिवरीनारायण रेस्ट हाउस पहुंचने पर बत्ती गुल मिली। जैसा आमतौर पर सरकारी रेस्ट हाउस में होता है, चौकीदार का ठिकाना नहीं। किसी तरह कमरा खुला, मगर खाने का कोई इंतजाम नहीं। जतिन दा, बेहिचक, बिना समय गंवाए, शेखर जी को लेकर खरीदी करने निकले। जैसे तैसे पकाने खाने की व्यवस्था बनी। तब पता चला कि जतिन दा आले दरजे के बावर्ची हैं। रघु जी बरसती अंधेरी रात में कैमरा लेकर बाहर घूमते रहे। बिजली चमकती, नदी रोशन होती और उनका कैमरा क्लिक होता। न जाने कितनी तस्वीरें उन्होंने ली होंगी।
फोटोग्राफी के बारे में शायद ही कोई बात करते, अक्सर शांत, चेहरे पर मुलायम सी मुस्कान, एक इंच से भी कम। मुस्कान, जो आंखों में और तनाव रहित चेहरे के कारण उभरती थी। साथ समय बिताते समझ में आता कि वे ऐसे नामचीन हैं, जो अपनी गरिमा और मर्यादा बनाए, सामने वाले को सहज रख सकते हैं। पत्रिकाओं में उनके लिए फोटो एडिटर पद का सृजन और समाचारों के लिए फोटोग्राफी पर बात करने पर उन्होंने अपने कैरियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि अखबार के लिए फोटोग्राफी करते हुए, किसी बैठक की तस्वीर लेनी होती थी। यों यह सबसे आसान और फटाफट वाला काम होता था, लेकिन वे वे बैठक में हो रही बातचीत, मुद्दों, नरम-गरम को ध्यान से सुनते और कोशिश करते कि ऐसा क्षण क्लिक हो, जो बैठक की चर्चा की खबर से अधिक प्रभावी अभिव्यक्त हो।
शिवरीनारायण, सिरपुर के मंदिरों के लिए उन्होंने कैमरा छुआ भी नहीं, बस देखते सराहते रहे। जतिन दा की कला-पारखी दृष्टि, जो स्मारक के काल-भेद को कला-शैली के आधार पर आसानी से बूझते गए, मगर रघु जी शांत भाव से मानों बस रस पीते रहे। हां, किसी तरह की हलचल हो, जीवन हो, गाय या कुत्ता बैठा हो, पूंछ हिला रहा हो, तब कैमरे पर उनकी उंगलियां तुरंत थिरकने लगती थीं। मुझे समझ में आया कि ऐसा कोई स्थिर दृश्य, जो कभी भी क्लिक किया जा सकता है, उन्हें दिलचस्पी नहीं होती थी, जहां गति हो स्पंदन हो या किसी स्थिर दृश्य पर क्षणिक कौंध हो, वे वही क्लिक करना चाहते हैं। ऐसा अनूठा, जिसे पकड़ना मुश्किल हो, भूतो न भविष्यति हो। जब यह बात मैंने उनसे साझा की, उनकी मुस्कान ने मुझे बता दिया कि वे मेरी कोई कैंडिड तस्वीर जरूर लेंगे और ऐसा हुआ भी।
मैंने उनसे सत्यजित रे की चौंकी हुई फोटो, मदर टेरेसा, कलकत्ता पूजा, इंदिरा गांधी आदि की याद दिलाई, इस पर बस हां-हूं करते रहे। उनके लौटने के बाद मेरे पास एक लिफाफा आया, जिसमें उनकी प्रयाग कुंभ वाली किताब और शिवरीनारायण के केशवनारायण मंदिर के सामने जतिन दा के साथ बैठे हुए मेरी, उनकी ली हुई, हस्ताक्षरित तस्वीर थी।
जाते जाते उन्होंने दिल्ली आने पर अपने फार्म हाउस पर रुक कर साथ समय बिताने का प्रस्ताव दिया था। कुछ ऐसे प्रस्ताव होते हैं, जिनका प्रबल आकर्षण होता है, मगर कहीं उसे बने रहने देना अधिक समझदारी होती है, मैंने इस प्रस्ताव पर वही समझदारी दिखाई और अब उनका यह प्रस्ताव (उनके न रहने पर पहला विश्व फोटोग्राफी दिवस) मेरे लिए अमर हो गया।
यहां आई तस्वीरें रघु राय, शेखर सोनी और रूपेश यादव द्वारा ली हुई



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