Tuesday, June 23, 2020

पवन ऐसा डोलै


सन 2018 में छपी पुस्तक ‘पवन ऐसा डोलै...‘ 1953 में जन्मे राकेश तिवारी का संस्मरण है, जिसमें हिसाब-किताब उनके बीस बरस की उम्र से आरंभ होता है। पड़ाव दर पड़ाव आगे बढ़ते 2010 तक पहुंचता है। यों किस्सा, लेकिन तिथिवार है तो कह लें इतिहास, यानि किस्सानुमा इतिहास या इतिहासनुमा किस्सा। वे कहते हैं- ‘‘एक जिन्दगी में पैंतीस बरस कम नहीं होते।‘‘ फिर ‘‘डगर, कु-डगर, बे-डगर डोलने-भटकने ... क्या पाने चले, किस दिशा में, क्या पाये, कहाँ पहुँचेंगे, क्या चाहा, नियति कहाँ ले आयी, अब किधर ले जाएगी? हर्ष-राग-विषाद के एक गुम्फन से निकलते दूजे में उलझ जाते।‘‘ और आगे यह भी कि ‘‘मासूम उमर भटकते-सॅंभलते फिसल गई। रुपहली रातों में प्रणय और रोमांच के धागे बुनने, बिखरने, सरझने के किस्से साझा करने के दिन उड़ते गये।‘‘ उस हिन्दुस्तानी संस्कृति में सराबोर, मानते हैं कि जिसका हिसाब चित्रगुप्त महराज के पास भी नहीं मिलेगा।

पुरातत्ववेत्ता, पुरातत्वविद जैसे भारी पद-पहचानधारी का काम पुराविद से भी चल जाता है। पुराविद से करीबी देशज शब्द बैठेगा पुरानिक, और कुछ आत्मीय सांचे में ढले तो ‘पुरनिया‘ (पुस्तक में यह शब्द सयानी समझ वाले पुराने-बुजुर्गों के लिए आया है)। तो इस कहानी का लेखक-पात्र, ‘पुरनिया‘ एक स्तर पर अपने सहेजे पैंतीसेक बरस के तरतीबवार लेखे की कहानी कहता है। दूसरे स्तर पर बात क्रमशः सर्वेक्षण से आरंभ होती है, उसका विवरण तैयार किया जाता है, प्रस्ताव बनता है, खुदाई-विश्लेषण और फिर व्याख्या के साथ ज्ञात इतिहास में ‘नयी‘ बात जोड़ते हुए ‘इति‘। यहां एक और स्तर मानव सभ्यता के विकास का है, गुफावासी आदिमानव, खेती-बस्तियां और इन पैंतीस सालों में ही बदल गई दुनिया, मानों सभ्यता के हजारों साल का गुटका संस्करण, पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन में सिमट जाए। चुनांचे, इन तीनों स्तरों का ऐसा सधा और संतुलित गुम्फन कि कहीं उलझन नहीं होती। अध्याय और खंड का विभाजन सहज संयोजक बनकर प्रसंग-अंशों को आपस में जोड़ता चलता हैं। खुली निगाह से देखे, खुले मन से सुने को, पूरी तसल्ली से गुन पाता है वही इसे सहेजते, ऐसा दस्तावेज तैयार कर सकता है। यह पुस्तक बेयर ग्रिल्स के थ्रिल्स वाली, पुरनिया की आत्मकथा, सह यात्रा प्रतिवेदन, सह उत्खनन डायरी, सह उत्खनन प्रतिवेदन, और मौज की झूला-चकरी वाला आनंद भी। चित्रित शैलाश्रयों से बाहर आ कर, सभ्यता भी व्यतिक्रमित आगे बढ़ती है।

पुरातत्व वालों को पीठ पीछे और मौका देखकर सामने भी गड़े मुरदे उखाड़ने वाले, कबर खोदने वाले कहा जाता है और उन्हें भूत, जादू-टोना, रहस्य, गुफा, बीजक-खजाना, उत्खनन और कार्बन डेटिंग वाला जाना-माना जाता है। यह पुरनिया लेखक स्वयं को भू-सुंघवा कहता है। यों देखें तो सर्वेयर-एक्सप्लोरर, पुरातत्व के हों, भूगोल, भू-विज्ञान के या नक्शा बनाने वाले सर्वे के भू-सुंघवा ही होते हैं, सूंघते हैं, नाप-जोख कर, गंध पा कर ताड़ लेते हैं और ताड़े हुए तिल को फिर ताड़ बनाने में जुट जाते हैं। लेखक यहां घोड़ा, लोहा, मेगालिथ और आर्य, इन चार ‘आर्य प्रश्नों‘ के इर्दगिर्द घूमता है। साथ चलती है लोरिक चंदा, नल दमयंती, भरथरी और आल्हा उदल गाथाएं, आधुनिक गाथा चंद्रकांता का तो इलाका यह है ही। लोरिकायन मॉरिसस में भी मिल जाती है। फिर गाथाएं जतन से पिरो दी गई हैं, लोकगीत से बेगम अख्तर, कबीर और भिखारी ठाकुर से ग्रियर्सन तक। दंतकथा, लोककथा, पुराण कथाओं के साथ प्राचीन शिलालेख भी।

पूर्वाचार्यों राहुल सांकृत्यायन (वोल्गा से गंगा) और डा. भगवतशरण उपाध्याय (सवेरा-संघर्ष-गर्जन और पुरातत्व का रोमांस) को स्मरण-नमन करते हुए, पुराविदों के आत्मकथात्मक गद्य में ब्रजमोहन व्यास का ‘मेरा कच्चा चिठ्ठा‘, केके मोहम्मद का ‘मैं एक भारतीय‘ का अपना महत्व है। इसी तरह शरद कोकास की लंबी कविता ‘पुरातत्ववेत्ता‘ भी उल्लेखनीय है, लेकिन यह ‘पवन ...‘, निराली बयार है। यह उन पुस्तकों में से है, जिसे पढ़ कर, कुछ कहे बिना मन मचलता रहे, लगे कि कोई सुख चोरी-चोरी पा लिया है, जिसे न बांट पाए तो पाप के भागी। बांट कर पुण्य चाहे न मिले, बांटनवार रंगेगा ही। पुस्तक के बहुतेरे अंश ऐसे हैं, जिन्हें उद्धृत कर ही उसका रस संभव है, बानगी लेते चलें-

वनवासी 
पात्र है गुदरी, उसका हुलिया- ''लम्बी दाढ़ी, झुके बदन, गहरे काले वर्ण और मझोले कद-काठी वाले गुदरी की आवाज में शहद और आग्रह में गहराई, कोठरी छोटी लेकिन दिल बहुतै बड़ा। फटाफट बिछौना बिछाते, तो उनके बाँहों की मछलियाँ फिसलते दिखतीं।'' गुदरी खिस्सा सुनाता है- ''एक ठे कोल इहाँ बाघे से लड़ल रहल।'' और कोल के साहस का बखान इस छोटे से वाक्य में हो जाता है- ''जउने धरती-पानी-बतास पै बघवा पला रहा, ओही पर कोलवौ।'' नामकरण के साथ तथ्य और इतिहास आता है कि- ''एक समय एक बलवान अहीर यहीं टाँगी से एक ठे बाघ मरलस, एही से एके कहल गइल ‘अहिर मरवा‘। ओकरे बाद एक ठे बाघ कइयौ अहिरन के भख लेहलस तो ‘बघ मरवा‘ नाम चला।'' साथ ही परंपरा मजेदार ढंग से बताई गई है- ''कोलिन हारी, तो कोल के साथ गयी, कोल हारा तो कोलिन के गाँव चला।''

वनवासी सभ्यता के प्रति लेखक के भाव देखिए- ‘‘कैसा उल्टा खेल चल रहा है, एक असंतुष्ट, असभ्य व्यवस्था परम संतुष्ट वनवासियों को सभ्य बनाने चली है।‘‘ उनकी जीवन-शैली की खासियत रेखांकित हुआ है- ‘‘बनवासी टपते रह गये। रहे होंगे कभी जंगल-पहाड़ के बेताज बादशाह, उन पर उनका नाम तो लिखा नहीं था। उन्हें तो पता ही कब रहा कि जमीन किसी के नाम लिखी जाती है। जान भी जाते तो क्या करते, खेती-किसानी से ज्यादा वे जंगल-पहाड़ में मस्त विचरने में ही आनंद पाते।‘‘ मगर इसके साथ एक पात्र कह जाता है- ‘‘सामंती और बरतानवी दौर ने इन स्वतंत्र वनवासियों को पैंट-कमीज वालों के सामने जो ये झुकना सिखाया, वह आज के भारत में ज्यादा दिन चलै वाला नहीं।‘‘

लोक-वार्ता
भाषा-अभिव्यक्ति में लोकवार्ता और उसमें लेखक समाए-समोए हैं। जल कुंड की गहराई का नाप है- ‘‘सात माचा की डोरी, ओ सात बरातिन पगहा, ओ थाह नाहीं बा।‘‘ वहीं बनारसी बलम मिर्जापुर क्या गए, कचौड़ी गली सूनी कर गए, लेकिन शिकायत यह कि मिर्जापुर गुलजार किए हैं- ''कचौड़ी गली सून कइला, हो बलमू ऽऽऽ ओ ऽऽ, मिरजापुर गुलजार कइला ऽऽ, हो बलमू ऽऽऽ'' और प्रयोग कि ''बुलेट मोटर साइकिल’ से बढ़कर ‘रॉयल इन फील्ड‘ भला दूसरी कोई सवारी क्या होगी।'' वहीं ‘चउवन गली और बावन बज़ार‘ जैसे शीर्षक में ग्राम नाम व्युत्पत्ति का रोचक हवाला है।

सर्वे के दौरान प्राप्त सूचनाओं का आकर्षण और उनकी टोह लेने की चाहत की अभिव्यक्ति, 'दिल बहक गया' और टटोल आने' की बात, कुछ इस तरह- ''कउवा खोह से लौटानी में ‘गोछरा जंगल‘ में अटक गये कोटारों और नील-गायों को भागते देखकर। वहीं एक गयार के बताने पर दिल बहक गया दक्खिनी कगार की ‘कनछ तर‘ की बड़की मान तक टटोल आने को।'' मच्छरों की खून चूसने की क्रिया को काटना कहना लेखक को नहीं भाया है, वह लिखता है- ‘‘रात भर मच्छरों ने जी भर कर चोभा।‘‘ इसी तरह सजग-सूक्ष्म अवलोकन को समृद्ध भाषा के इस्तेमाल से पेश करने की बानगी- ‘‘पगुराते फेंचकुर फेंकते गाय-गोरू- ऊँट‘‘ और वहीं अगली पंक्तियों में ‘‘पगुराते ऊँटों के हिलते थूथन से झरते झाग।‘‘ और फिर से अनुप्रास सहित ‘‘हारे हुए हैरान कुत्तों की लाल-लाल लार चुआती जीभें बित्ता भर लटक गईं।‘‘ पुस्तक में सहयोगी-मित्रों और विशेषज्ञ-विद्वानों के नाम हैं, लेकिन जहां नाम आवश्यक नहीं, वहां किस अंदाज से बात कही गई है, देखिए- ‘‘किसका नाम लें और किसका छोड़ें- लाल, पाल, वर्मा, गोपाल, देव, जोशी, सिंह, मिश्रा, सिद्दीकी, श्रीवास्तव, बाजपेयी, त्रिपाठी, चतुर्वेदी, मिश्रा, पंत नामांतधारी एक से एक श्रीमंत।‘‘ और नाम से बचते-बचाते- ''तारणहार बनकर अवतरित हुए हमारे नये कैबिनेट मन्त्री जी।'' फिर मंत्री जी के प्रवास को जीवंत किया है, इस तरह- ‘‘और हवा में समायी वी.वी.आई.पी. विजिट की सरसराहट।‘‘

शब्द-सृष्टि
कुछ शब्दों पर चर्चा करते चलें- चारों ओर के लिए शब्द चलता है इर्द-गिर्द या कम प्रचलित है गिर्दागिर्द, लेकिन लेखक ने सहज-सार्थक शब्द गढ़ा है- 'चौगिर्द'। एक शब्द आया है डमरू बाघ, लेखक ने इसका अर्थ ‘बच्चों वाली बाघिन‘ बताया है, किन्तु छत्तीसगढ़ में डमरू या डमरुआ ‘बाघ के बच्चे‘ के लिए प्रयुक्त होता है। यहां एक पुरातात्विक स्थल का नाम डमरू है और यह मात्र संयोग नहीं होगा कि इस गांव के एक तालाब का नाम बघबुड़ा है। एक अभिव्यक्ति है- ‘अपनी कल्पना की ढीली लटाई‘, पतंग के साथ धागा लपेटने की चकरी के लिए के लिए शब्द चलता है, चरखी, घिरनी या परेता। पुस्तक में आया शब्द ‘लटाई‘ इसी का पर्यायवाची है, यहां प्रयोग भी कम मजेदार नहीं कि लटाई से कल्पना का धागा ढील दिया गया है। एक अंश है- ‘‘कुल बीझन अजवैं ना सरझ जाई। फीर, कल्हियाँ बदे का बची? ‘‘ अब इसे मिला कर देखें कृष्ण बलदेव वैद की कुकी और उसके एक प्रसंग से- ‘‘कभी कभी कुकी ऐसा आभास देती दिखाई देती है कि वे मेरी सारी साहित्यिक, मानसिक, सांसारिक आध्यात्मिक गुत्थियों को सुलझा सकती है लेकिन सुलझाती नहीं क्योंकि सोचती है अगर उसने यह कठिन काम कर दिया तो मैं क्या करूँगा।‘‘ अब पता नहीं कि इन दोनों लेखकों ने एक-दूसरे के इन अंशों को देखा या नहीं, मेरे देखने में आया, तो साथ रख दिया है।

एक बारीकी कि ‘‘फूल की थाली में पलाश के पत्ते पर खटाई‘‘। फूल यानि, फूल कांस, कांसे की थाली, जिसका प्रयोग भोजन के लिए प्रतिष्ठित है। (इसी तरह एक अन्य फूल, 'फूल पीतर' यानि पीतल, मुख्यतः अवध अंचल में प्रचलित है।) मिश्र-धातु कांसा, मिश्रण अनुपात के फर्क से ‘मस्केल‘ और ‘नेर‘ भी होता है, जो अन्य बर्तन या घंटी आदि बनाने के काम आता है। फूल कांस में सफेदी और चमक अधिक होती है। कांसे की थाली या बर्तन में दही-मही (मठा) की खटाई तो परोसी जाती है, लेकिन आम, इमली या नीबू की खटाई, कसाने-कसैली पड़ने लगती है, इसलिए फूल की थाली पर सीधे चटनी परोसने के बजाय पलाश का पत्ता इस्तेमाल होता है। इसी तरह 'विजयशाल' कहा गया है, बड़े ढोल जैसे वाद्य को। यह एक नया शब्द मिला। इसे समझने के लिए तुक्का लगाया कि यह बीजासार या बीजाशाल का सुधरा रूप हो। बीजा (छत्तीसगढ़ी एक उच्चारण बिजरा भी) मुख्यतः शाल वनों के बीच ही होता है, शायद इसलिए उसका नाम जोड़ा बना कर ‘बीजा-शाल‘ आता है। आगे, ढोल समूह के वाद्य, यानि ऐसे तालवाद्य, जिन्हें लकड़ी को खोखला कर बनाया जाता है, उनमें कटहल, आम, खम्हार-सिवना (कुरुसमरा), कदम्ब, भिर्रा, गोइंजा (गूंजा?) काठ भी प्रयुक्त होता है। कुछ लोगों की पसंद सिरीस है, किन्तु सबसे उपयुक्त लकड़ी यही यानि बीजा मानी जाती है। धान के भीतर डेढ़-दो महीना डाल देने पर उसकी गरमी से लकड़ी पक जाती है, फिर खोखला करते हुए इसमें दरार नहीं आता। इससे बने ढोल, तबला आदि की ध्वनि मधुर ठनकदार होती है। उसकी आवाज, रात के साथ गहराती, और-और ‘तान‘ होती जाती है।

पुस्तक में आए शब्द और उनकी इस तरह प्रवाहमयी, उन्मुक्त भाषा-अभिव्यक्ति तभी संभव हो सकती है, जब उसमें मन रचा-बसा हो, लिखने वाले को पाठकों की परवाह तो हो, लेकिन दबाव न हो। वही ऐसा ‘स्वान्तःसुखाय‘ रच पाता है जो हमखयाल ‘बहुजन रुचाय‘ हो सकता है। कला-साहित्य का कोई भी रूप हो, उसका अपना और सच्चा सुख तो सृजन-रियाज में ही निहित होता है, प्रदर्शन-आश्रित रचनाकार की संतुष्टि दूसरों, यानि श्रोता-दर्शक-पाठक (और आयोजक-प्रकाशक-वितरक) के पास गिरवी हो जाती है। यह पुस्तक, आत्मनिष्ठ साधक, खुद-मुख्तार रचना-सुखी, ‘सच्चे साहित्यकार‘ की कृति है। पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के शब्दों में- ‘‘सच्चे साहित्यकारों के लिए जो बात सबसे अधिक मुख्य है वह है उनका अंतःसुख। उसी अंतःसुख के कारण वे साहित्य के क्षेत्र में यश और अपयश की चिंता न कर लिखते ही जाते हैं।’‘ संक्षेप में, अभिव्यक्ति के गरिष्ठ-बेमेल छौंक के छद्म को सहज उजागर करने वाली, निरस्त कर सकने वाली सुपाच्य ‘कोदो-कुटकी‘ भाषाभिव्यक्ति परोसी गई है इस लेखन में।

पुरनिया निगाह
ऐसी बातें, पुरनिया जिनसे लगातार दो-चार होते रहते हैं, लेखक अपने पेशे पर टिप्पणियों का स्वयं आनंद लेता है- ''हाँ तो गीबड़ों सुनो! क्या कहते हो तुम सब, उहै- क्या कहते हैं तोहरे सब आर्कोलॉजिस्ट बनने चला है। इहै ककरा-पथरा, नरिया-खपरा बीनने चला है। ई कुल कै के जिनगी में कुच्छौ नहीं कर सकत्या। भला माई-बाबू तोके एही बदे पढ़ै भेजले रहलैं। सब झूठ है, फ्राड है। वेस्टर्न कंट्रीज के देखा-देखी इंडोलोजी पढ़ाता है। का करब्या जन ई कुल पढ़-लिखि कै। बहुत बन जाब्या तो मास्टर। औ, मास्टरै बन के का कै लेब्या, मास्टर होए दो जून खाए, लड़िकन के ननियौरे छोड़े जाय।‘‘ पात्र श्रीवास्तव जी से कहलाया गया है- ‘‘भारत में आर्किओलॉजी आयी है अंग्रेजों के साथ, इसलिए उन्होंने यह टर्मिनोलॉजी अंग्रेजी में ईजाद की, जिसे सारी दुनिया में समझा जाता है। वैसे पुरातत्व वाला यही सब ‘जॉरगन‘ बोल कर तो एक्सपर्ट कहलाता है ना, जो अगर सोझै भाषा में बोलब्या तो तोके के भाव देई बबुआ!‘‘ फिर ‘‘पुरान-धुरान गुनने की मेरी चाकरी‘‘ मानते हुए लेखक बताता है कि- ‘‘एम.ए. करके नौकरी की तलाश पूरी होने तक हमारे साथ खाक फाँकने का तजुर्बा हासिल करने के इरादे से आए थे।‘‘ या शोधार्थी के लिए- ‘‘एक अरसे से जवानी खपा रहे‘‘ लेकिन इसके साथ- ‘‘पोथी पढ़ै से जितना नहीं सीखा जाय सकत है ऊ से कहूँ ज्यादा ज्ञान मिलत है घूमै-सुनै ते।‘‘ और फिर ‘‘एक ने मन की बात खुलकर बतायी- ‘गुरु जी। दरजा में बैठ के पढे में कउनौ मजा नहिनी। न कुच्छो देखाय, ना समझै में अमाय। खेते, बने-पहाड़े में घूम-घूम के अइसने पढ़ावल जाय, जैसे आप लोग पढ़ावत हवै, तब ना आयी समझ में।‘‘

सर्वेक्षण में अवलोकन खुली निगाह से होता रहे तो इतिहास का क्रम अपने-आप उजागर होते चलता है, जैसे आदिम शैलाश्रय-गुफाओं की चित्रकला को देखते-देखते लेखक मानों स्वयं उस दौर में पहुंच जाता है- ‘‘नृत्य मूलतः अंतर्मन के आनंद से उद्भूत हुआ। श्यामल मेघों का घिराव देख मयूरो का थिरकना, हरियाले वन-प्रांतर में उल्लसित मृग-छौनों की किल्लोलें, मृगया से छके सिंह-शावकों की मस्त कलाबाजियाँ, विशिष्ट अवसरों पर चिड़ियों की चहकन-फुदकन की तरह किन्हीं अवसरों पर अंदर से उपजे उमंग के ज्वार ने आदिम मानव के अंग-अंग में चपलता भरकर उन्हें बाँहें और पैर फैलाकर, गरदन, कमर और सिर लचका कर नाचने के लिए उद्यत किया होगा। आखेट खेलने चले, तो सफल मृगया की कामना से नाचे, कबीले भर की भूख मिटाने लायक बडा पशु गिरा लिया, तो सफलता की उमंग में नाचे, अलाव पर अहेर भुनने लगा, तो सुस्वाद माँस की लालसा में नाचे। पवन, वर्षा, वन, नदी, गाछ, सूरज और चाँद जो भी पारलौकिक लगता या जिससे हित सधता या जिससे भय खाते, उन सबकी उपासना में नाचते। कमर, कंधे और बाँह में बाँह डाल कर नाचते।‘‘

पुरातत्व
बातों-बातों में प्राचीन स्थापत्य का सहज विवरण आता है- ‘‘नीचे पड़े द्वार-स्तंभ पर अंकित यू जो ऊपर से नीचे तक लपटे नाग बने आंय ना, एहिका कहत हैं नाग-शाखा, इसके अगल-बगल ऊपर से नीचे तक फूलों से सज्जित पुष्प या फुल्ल शाखा, आदमी-औरत के जोड़े वाली मिथुन-शाखा, किंकिणिका-शाखा और पत्तों से ढॅंके घड़े वाली घट-पल्लव शाखा। शाखाओं के नीचे एक बगल मकर पर सवार गंगा जी और दुसरे बगल कछुआ पर सवार जमुना जी, उनके बगल शिव जी के द्वारपाल गण।‘‘ और फिर मंदिर स्थापत्य की चर्चा- ‘‘याकु भिट्टी वाली छ्वाट क्यार जगती-पीठ पर बने एहि मंदिर केरी तलछंद योजना मां चतुरस्र (चौकोर) द्विअंग गर्भगृह और याकु छ्वाट कपिली अथवा अंतराल क्यार प्राविधान आय। औ ऊर्द्धवच्छंद योजना मां सबसे नीचे आय खुर, कुंभ, कलश और कपोत मोल्डिंग वाला बेदीबंध। ओहिके ऊपर बीचो-बीच रथिका से सज्जित तनुक उभरा भवा जंघा भाग। रथिका क्यार स्तंभ सजे आंय घट-पल्लव, कीर्तिमुख, किंकड़िका-घंटी, औ, खल्व औ पत्र-शाखा नामक अभिप्राय सेने। बगल मां नीचे द्याखी, नान्हे-नान्हे शिवलिंग। नीचे-ऊपर जालक-पैटर्न से सजा पट्ट औ ओहिके ऊपर तुला-दंड। फिर, अंतरपत्र के ऊपर शिखर, मानो एक के ऊपर एक शहतीर जस खमसे मोल्ड, एहिका कहा जात है पीढ़ा शिखर, ढाकी साहब नया नाम दिहिन है- फाँसना शिखर।‘‘ और अवसर पा कर जुड़ता है- ‘‘चारों कोनों से अंदर की ओर मुड़ते शिखर वाले (रेखा शिखर) क्रमशः ऊपर की ओर छोटे होते हुए पीढ़ों वाले शिखर (फाँसणा शिखर) और हाथी की पीठ की तरह गोल गजपृष्ठ शिखर वाले (वलभी शिखर)।‘‘

मूर्तियों की चर्चा करते हुए प्रतिमाशास्त्रीय लक्षणों का उल्लेख आता है और ‘‘भाँति-भाँति के केश-विन्यास अलकावलि, भ्रमरक, हनी काम्ब, चूड़ा-पाश, लम्बकेश, वलिभृतवलयक, त्रिशिख आदि आदि।‘‘ विभिन्न आकार-प्रकार विशिष्टता वाले मृदभांड-पॉटरीज- ‘‘एन.बी.पी., ब्लैक-एंड-रेड वेयर, ब्लैक-स्लिप्ड वेयर, पेंटेड ब्लैक-स्लिप्ड‘‘ और मनके-गुरिया- ‘‘एगेट, कारनेलियन, क्वार्ट्ज, चालसीडोनी, क्रिस्टल, जैसपर वगैरह। फिर, हर ढेरी में एक-एक किस्म की गुरियों को सजाया- लॉन्ग बैरेल (लम्बे बेलनाकार), सर्कुलर (गोल), व्हील-शेप्ड (पहिये के आकार के), बाई-कोन (दोनों सिरों पर कोणाकार), तिकोन, हेक्सागोनल (षड्कोणीय), चैकोर, पोलिश्ड, अन-पॉलिश्ड, फिनिश्ड-अनफिनिश्ड (पूर्ण-अपूर्ण), ट्यूब्यूलर (नलीदार), काली-सफेद-भूरी-लाल लहरिया वाले, लाल, सफेद, नीले, भूरे, बहुरंगी। देखते-परखते आँखें जुड़ा जातीं।‘‘

पुरातत्व जैसे क्षेत्र में नई खोज के तकनीकी पक्ष, खबरों के ख्याल से, सामान्य पाठक के लिए किसी रुचि के नहीं माने जाते। सामान्यतः मीडिया ऐसे समाचारों में चौंकाने वाली कोई बात- चमत्कार, दुर्लभ, प्राचीनतम, पहली बार जैसे विशेषण के लिए व्यग्र होता है। ऐसे एक मामले की चर्चा यहां भी है- ‘‘ईस्वी सन और ईसा पूर्व की गफलत से बचाने के लिए हमने अपने प्रेस नोट में 1200 ईसा पूर्व जगह आज से 3200 बरस के आस-पास का लोहा मिलने का जिक्र किया, लेकिन कुछ एक सुधी संपादकों ने उसे संशोधित करके 3200 ईसा पूर्व कर दिया। कहाँ तो हम 1200 ईसा पूर्व बताने में ही झिझक रहे थे और कहाँ 3200 ईसा पूर्व? ऐसे में चरिहूँ लंग से हंगामा बरपने को कौन बरज पाता।‘‘

बदलता जमाना
इतिहास में विचरते को परिवर्तन जिस तरह दिखता है, उसके नमूने- ‘‘उस जमाने तक के आदमी आज यहाँ, कल वहाँ डेरा डालते, फंदा गोफना तीर-कमान से चिरई-अहेर मारते, फल-फूल बटोरते, भूँजते-खाते, नदी-नाला, खोह-कंदरा में घूमते परम स्वतंत्र रहे। इन्हें ‘हंटर-गैदरर स्टेज‘ की सभ्यता के आखिरी पायदान पर चल रहे परम निर्द्वंद्व होमोसेपियन (आधुनिक मानव) माना जाता है। फिर अनाज उपजाने और जानवर पालने की जानकारी पाने के बाद सालो-साल बीज बोने, उगाने, फसल रखाने-काटने-दंवाने, सिरज-संभाल कर रखने, गाय-गोरू चराने और गोठ बना कर रखने के गोरखधंधे में ऐसा उलझे कि अपनी सारी आजादी गँवा कर एक जगह खूंटा गाड़ कर गाँव बसा कर रहने लगे। इस तरह उनकी महीन तकनीकी कारीगरी और ज्ञान की बढ़ोतरी ने जहाँ उन्हें आगे बढ़ाया, वहीं उनके पैरों में बेड़ियाँ भी डाल दीं।‘‘ यह बता कर पात्र अभय के माध्यम से मजेदार निष्कर्ष निकालते हैं- ‘‘मतलब आदमी ने पौधों और पशुओं को पालतू बनाया और उसी प्रक्रिया में स्वयं भी पशुओं और पौधों का पालतू बन गया।‘‘ परिवर्तन को आंकने के लिए हाय तौबा के बजाय सपाटबयानी है कि- ‘‘पवन ऐसी डोलती रेलगाड़ी ने मुनरी, चुटकी, चुनरी, कड़ा और कपड़ा सब दाँव पर लगवा दिया।‘‘ और एक नमूना- ‘‘मसीही स्कूल, अस्पताल, गिरजाघरों का फैलाव- ‘मसीहं शरणं गच्छामि‘ के मंत्रोच्चार के साथ।‘‘

विनम्र दायित्व
लेखक अपनी विनम्रता के साथ, दायित्व और उसकी गरिमा में संतुलन बनाए रखता है, इस तरह ‘‘लोग-बाग बड़का मेटलर्जिस्ट मान कर भासन झारने का बुलउवा भेजने लगे। किसको-किसको बताते- हम चन्द्रगुप्त मौर्य वाला इतिहास-पुराण, पुरवा-पाथर पढ़ने वाले बहल्ला विद्यार्थी रहे, मेटलरजी से हमारा सूँघने भर का भी वास्ता नहीं रहा। लेकिन लाज बचाने के लिए मॅंगनी वाले परिधान पहिर-ओढ़ कर, साथियों की मदद से तैयार प्रेजेंटेशन दिखाने निकल पड़े।‘‘ लेखक अपनी पद-गरिमा के प्रति सजग है- ‘‘तब कितनी फजीहत होगी, अपनी तो खैर बिसात ही क्या, ओहदे की ज्यादा होगी।‘‘ (इस पुस्तक के लेखक श्री राकेश तिवारी, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक यानि सर्वोच्च पद पर आसीन रहे हैं।) लेखक की जिम्मेदार संतुलित वैज्ञानिक दृष्टि प्रकट होती है- ‘‘किसी नई प्रविधि के ईजाद होने का इंतजार करना पड़ेगा, तब तक के लिए नपे-तुले तुक्के पर तुक्के ही चलेंगे।‘ और ''यह बताना भी कितना जरूरी है कि रिसर्च और न्याय के मसलों में सिक्के के दोनों पहलू ठीक से देख लिए जाएं।'' संरक्षण-विरूपण पर तटस्थ टिप्पणी का असर महसूस कर सकते हैं- ‘‘एक दृश्यांकन में... दूसरी ओर एक मगरमच्छ को घेर कर मारने का दृश्य। चित्रों के ऊपर कोलतार से लिखे चिरुई गाँव के रहने वाले ‘रामधनी‘ का नाम।‘‘ और मानों निचोड़ आता है- ‘‘इस मामले में एक बात ध्यान से सुनने और गॅंठिया लेने वाली भी है कि दर्शन-दिग्दर्शन की भावना के साथ यह सब किया जाय। अपनी धरती माँ, पुण्य पावन वन-प्रपात और सांस्कृतिक पहलुओं को बाजार का बिकाऊ माल समझ कर कतई नहीं। उनकी साफ-सफाई, रख-रखाव और अपनी जीविका-अर्जन में समुचित सन्तुलन बना रहना चाहिए वरना सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी के सारे अण्डे एक ही बार में पा लेने का नतीजा तो सब केहू जनतै होब्या!‘‘ पुस्तक पर अंत की ओर आगे बढ़ते, साथ छूटने की धड़कन होने लगती है, तब आखिरी वाक्य आता है- ‘‘जिन्दगी रही तो फिर मिलेंगे।‘‘ इससे राहत होती है कि फिर मिलने, ऐसा कुछ और पढ़ने का रास्ता खुला हुआ है।

प्रसंगवश-पुस्तक पढ़ते हुए मन में हिन्दी भाषा-साहित्य और उसकी रवानी, बार-बार आती रही। पुस्तक के खंडों के शीर्षक ऐसे हैं, जिसे पढ़ते ही मुझ से देसी-गंवार का मन ललचा जाए। वैसे हिंदी के साथ कभी गॅंवारी बोली का विशेषण इतिहास-दर्ज है ही। यहां है, पूर्वी हिन्दी, अवधी, बैसवारी, भोजपुरी और उस पर बनारसी ठाट के साथ दृष्टि, अभिव्यक्ति और भाषा का संतुलित-समन्वय। पीछे मुड़कर परंपरा टोह लें तो इंशा अल्लाह खाँ और लखनवी सरशार जैसी यही ठाट-मौज भारतेन्दु और गुलेरी में दिखती है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है- ''उन्नीसवीं शताब्दी के हिंदी लेखकों में एक विचित्र प्रकार की जिंदादिली थी'', (वे स्वयं अपने लेखन, खासकर निबंधों में सहज परिहास की आत्मीयता से लालित्य-पुट का अवसर बनाते रहे।) ‘हिन्दी का लोकवृत्त‘ पुस्तक के अनुवादक नीलाभ ने लिखा है- 1920-40 के बीच के काल में ... पत्रिकाएं भी भाषा और साहित्य को दिशा देने में जुटी हुई थीं। वैसी जीवन्तता फिर आगे के दशकों में देखने को नहीं आयी। बाद में हिन्दी साहित्य पर शुद्धता आग्रही अनुशासन-दंड के बहाने आंचलिक भाषा के विशिष्ट और तद्भव शब्दों से परहेज बरतते, छायावादी घनीभूत छाया का असर कि, परिनिष्ठ किताबी भाषा-शैली चल पड़ी और यही लिखने-पढ़ने की आदत बन गई। पिछले दिनों आई डॉ ओम निश्चल की आकर्षक शीर्षक वाली पुस्तक ‘भाषा की खादी‘, जिसमें सोंधी हिंदी-हिंदुस्तानी के बेधड़क देशज रूप को अब फिर सार्थक रेखांकित किया गया है।

भवानी प्रसाद मिश्र ने कवियों के लिए कहा है कि ‘‘लगभग सभी, कुछ बँधे-बँधाये ढंग से कुछ बँधी-बँधाई बातें कहते रहते थे। उन दिनों, उसे ‘छायावाद‘ कहा जाता था।‘‘ यह कमोबेश उस दौर के गद्य की भाषा-अभिव्यक्ति पर भी लागू होती है, जिसमें देसी ढब समानान्तर बना तो रहा, मगर हाशिये पर, बस हाजिर बतौर। रेणु और बिज्जी जैसे कुछेक इससे अलग दिखते रहे। ढर्रे वाली साहित्य-दृष्टि में भाषा, पाठ्यक्रम वाली और वृहत्तर लोक की अभिव्यक्ति दूरबीन से देखते, चलती गाड़ी की खिड़की से झांकते, ‘अहा! ग्राम्य जीवन भी क्या है‘ वाली हो गई। केदारनाथ सिंह के शब्दों में ‘यह एक आधुनिक का/ आदिम प्रवास था/ अपने ही घर में‘ की हालत हो गई। इस व्यथा को रेखांकित करने और उबरने जैसे प्रयास का उदाहरण विद्यानिवास मिश्र का ‘हिन्दी की शब्द-सम्पदा‘ है।

प्रसंगानुकूल, परीक्षण-प्रमाण है कि लगभग 20 साल बेहद लोकप्रिय रही ‘आधुनिक भावबोध, कला संचेतना और नवीनता का प्रतिनिधि मासिक‘ कही जाने वाली ‘ज्ञानोदय‘ जैसी पत्रिका का सन 1970 में अवसान हुआ, तब उसके संपादक लक्ष्मीचन्द्र जैन ने महसूस किया था कि ‘भारतीय जीवन एक नये दशक में, एक नये युग में, प्रवेश कर रहा है। इसके बाद का समय ‘नवनीत‘ और ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान‘ जैसी पत्रिकाओं और उनके समर्थ संपादकों नारायण दत्त और मनोहर श्याम जोशी का रहा, जो न केवल युगानुकूल सामग्री चयन के लिए सजग और प्रयासरत रहते थे, भाषा और अभिव्यक्ति के स्तर पर साहित्य को समृद्ध कर सकने वाली जानी-अनजानी लेखनी के प्रति भी उत्सुक रहते थे।

इसी क्रम में ‘धर्मयुग‘ वाले धर्मवीर भारती यहां सीधे प्रासंगिक हैं। रचना से अन्यथा किसी परिचय, संपर्क के बिना 'गांव-गंवई के लेखक', विवेकी राय छपते रहे, और उन्होंने यथाअवसर स्पष्ट किया कि ''भारती जी व्यक्ति नहीं, रचना को देखते हैं और 'धर्मयुग' नए-नए लेखकों को प्रकाश में लाने का बेजोड़ ऐतिहासिक कार्य कर रहा है।'' इसी तरह 40 साल पहले, जब इन राकेश तिवारी का लेख, अपनी तरह के मौजी-किस्सागो अमृतलाल नागर के माध्यम से भारती जी के पास पहुंचा, ‘खोहों में खोया अतीत‘ शीर्षक से ‘धर्मयुग‘ में छपा और उन्होंने नागर जी से जानना चाहा- ‘यह लड़का है कौन? उससे और लेख लिखाने हैं।‘

और एक बात, भाषा-परंपरा ग्रंथ रामचरितमानस की। तुलसीदास कृत रामचरितमानस, मूल रामकथा वाल्मीकि रामायण की भाषा-टीका है किन्तु आमजन में रामायण का पर्याय यही है। धार्मिक ग्रंथ के रूप में प्रतिष्ठित इस ग्रंथ का पाठ-पारायण अध्यात्म लक्षित होता है, लेकिन याद किया जाता है, उद्धृत होता है- प्रकृति, प्रवृत्ति, जीवन-मूल्य और सुभाषित के लिए। रामकथा, राम-रावण की युद्ध कथा है, लेकिन रामचरितमानस, तुलसी के शास्त्र और लोक-मन की मैत्री का भी दस्तावेज है, जिसमें भाव विष्णु, भाषा के उस गरुड़ पर गतिमान हैं, (कुबेरनाथ राय को आत्मसात करते हुए) ‘रथन्तर‘ और ‘वृहत्‘ यानि मार्गी और देशी, जिसके डैने हैं।

मानस-आस्था है कि पारायण के साथ राम शब्द उचार लेने से ही सारा काम बन जाता है, पाप धुल जाते हैं, मुक्ति मिल जाती है, ‘हरि नाम‘, ‘कलिजुग केवल हरि गुन गाहा‘ और ‘एक अधार राम गुन गाना‘ को मिलाते, सरल बनाते हुए ‘कलियुग केवल नाम अधारा‘ चल निकला। फिर भी मानस पाठ-पारायण, सुमिरन के साथ कहीं बसा रह जाता है, चिंतन-मनन में आ जाता है, खासकर तब, जब मिलता-जुलता शब्द-प्रसंग आ जाए। मानस की भाषा में तत्सम-तद्भव का और दृष्टि में लोक-शास्त्र का जैसा सहज समन्वय है, उसके चलते यह भाषा-साहित्य की पाठ्य पुस्तक की तरह चाहे न पढ़ा गया हो, प्रभाव वैसा ही छोड़ता है। विद्वानों ने कहा है कि तुलसी की भारतव्यापी सफलता का रहस्य उनकी भाषा में है। उनकी भाषा में जो ‘तद्भवता‘ है वह अपने पीछे ‘तत्सम‘ भाषिक संस्कृति का बल ले कर खड़ी है। सो, अपने भाषा संस्कारों और स्मृतियों को सहेज रखने की परवाह हो तो मानस पढ़ते रहना चाहिए। ‘इसलिए‘ रामचरितमानस के अभ्यास को लाभकारी मानते, हिंदी-प्रेमियों के लिए मनमौजी स्वच्छंद भाषाई प्रयोग वाली पुस्तकों के क्रम में यह ‘पवन ...‘ स्मृति डोलती रहेगी।

मुझ जैसे थोड़ा पढ़ने-लिखने वाले, अलेखकों के लिए लिखना वैसा ही मेहनत का काम है जैसे कसरत, जो करने की सोचें तो आलस हो, मन न करे, लेकिन करें तो आनंद भी आए। ऐसा आनंद इस पुस्तक के लिए महीने भर बना रहा। अक्सर 'साहित्य', सिद्धहस्तों के लिखे को ही माना जाता है, बोनाफाइड साहित्य-प्रेमी उसे पढ़ते हैं, आह-वाह करने के हकदार वही होते हैं। समीक्षक, उसकी समीक्षा करते हैं। वैसे तो यह टिप्पणी, समीक्षा के खाने में ही जाएगी, लेकिन है शुद्ध पाठकीय आनंद की अभिव्यक्ति के लिए। साहित्य-समाज में भी एक जनजातीय समुदाय है, मुख्य धारा उनके प्रति तटस्थ है और वे भी मुख्य धारा के प्रति उदासीन। यह पुस्तक ऐसे व्यक्ति की रचना है जो साहित्यकार होने के दबाव से मुक्त, बेपरवाह इसलिए उदासीन (न लिखने की व्य‍ग्रता, न छपाने की जल्दी) है, तो 'समीक्षा' की मर्यादा से मुक्त रहते, बस पाठक हो कर इसे लिख लेने के साथ, स्वयं को इस पुस्तक का सबसे उपयुक्त पाठक होने का दावा भी पेश है, इस नीयत से कि काश! मुझे कोई गलत साबित कर दे।

कैफियत, पहली कि पुस्तक के इतने उद्धरण यहां आ गए हैं, कोई चाहे तो बिना पुस्तक पढ़े, इसके बारे में साधिकार सविस्तार बता सकता है। दूसरी, जो पुस्तक न पढ़ पाएंगे, एकदम वंचित न रह जाएं, कम से कम इतना तो पढ़ रखें। तीसरी, जो न पढ़ पाएं हों, पूरी पुस्तक पढ़ने को मचल जाएं और चौथी, जिन्होंने पुस्तक पढ़ी है, उसका आनंद लिया है, उन्हें कुछ अलग, अतिरिक्त भी रस मिले।

इस पुस्तक का नाम पता चला तब एक शीर्षक याद आया था ‘मनपवन की नौका‘। कुबेरनाथ राय की ‘निषाद बांसुरी‘ इसके पहले आ चुकी थी। ‘मन पवन की नौका‘ पर सवार उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया के दिक्-काल यात्रा की। इस ‘पवन ...‘ का लेखक, डगमग डोंगी में सशरीर, स्वहस्त चप्पू लेकर सफर कर चुका है। चंचल मन को यह भी याद आता है कि कभी ‘खैरा पीपर कबहुं न डोले‘, सुना तो सोचता था कि पीपर कैसे डोलेगा भैयाजी, अरे! डोलेगा तो पत्ता न डोलेगा, छत्तीसगढ़ी गीत के बोल हैं ‘पीपर पाना डोलत नइए, का हो गे टुरी ल बोलत नइए‘, लड़की का मन इतना कठुआ गया है। राम वनगमन प्रसंग में दशरथ का मन भी पीपर पात सरिस डोला था। पीपल के पत्ते का आकार और डंठल ऐसा होता है कि जब हवा न चल रही हो, अन्य सभी पेड़ के पत्ते थिर हों, तब भी डोलते-मचलते रहते हैं। इसीलिए पीपल को ‘चल-वृक्ष‘, ‘चल-दल‘ अथवा ‘चल-पत्र‘ कहा गया है। शास्त्र-वचनों की व्याख्या में मानव मन को कामना-कर्मरूपी वायु से प्रेरित, पीपल के पत्ते की तरह नित्य चंचल स्वभाव वाला भी कहा गया है। मेरे चलायमान मन को विराम देने के लिए सोचता हूं, कभी लेखक रूबरू हुए तो पूछूंगा कि महराज! पवन तो डोलाता है, खुद थोड़े डोलता है, आपने पवन को ‘ऐसा‘ कैसे डोला दिया।

Sunday, May 24, 2020

त्रिमूर्ति से त्रिपुरी-1939

बिलासा केंवटिन वाले बिलासपुर से अनाम शबरी वाले शिवरीनारायण के रास्ते में है, त्रिमूर्ति तिराहा या शायद चौराहा। पहले यह मस्ताना चौक के नाम से जाना जाता था। यह नाम क्यों रहा होगा, खुद सोचें, बता कर आपके मन की गुदगुदी कम नहीं करना चाहता। इतना जान लें कि मान-शान में मुकाबला हजरतगंज और लोकनाथ से। कितनी दूर और कितना समय लगेगा? सवाल पूछने वालों से यही कहा जा सकता है कि फिर तो आप न ही जाएं वहां। हिसाब-किताब से मुक्त जाएं, तभी आप उस त्रिमूर्ति तक पहुंच पाएंगे। फिर भी क्लू दिया जा सकता है, रिस्दा के बाद लीलागर नदी का पुल, कुटीघाट, मंगल मवेशी बजार का भांठा, शरणार्थी कैम्प और अब प्लांटेशन वाला, फिर दाहिनी ओर कोनार का गढ़ दिखने लगेगा और बाईं ओर दूर वाली चिमनी, बनाहिल पावर प्लांट की और पास वाली रेमंड, लाफार्ज, निरमा वालों का न्यूवोको, नाम बदलता रहा इस सीमेंट फैक्ट्री का। बस, अब तब है त्रिमूर्ति।

यह कहानी इसी त्रिमूर्ति के आसपास गढ़ी-बुनी गई है, रचयिता है समय, लोग और यह भू-खंड। वैसे भी दस्तावेजों के आधार पर तैयार इतिहास अधिकतर प्रयोजनमूलक होता है, जबकि सच्चा सांस्कृतिक इतिहास लोक स्मृतियों में ही जीवन्त रहता है, जो समूह-अस्मिता को गढ़ता है। तू कहता कागज की लेखी ..., लेकिन यह तो ठीक-ठीक आंखन देखी भी नहीं, कानन सुनी और कुछ मन में गुनी हुई है।

नरियरा-बनाहिल-झलमला, आरसमेटा-कोनार-कोसा, सोनसरी-रिस्दा-डोंडकी, मुड़पार-मलार, भैंसो-नंदेली-व्यासनगर और मुलमुला, जिस गांव में यह त्रिमूर्ति है। आसपास वीरान गांव मस्तुरीडीह, गोंदाडीह, रोझनडीह, तावनडीह, बोहारडीह और इन सब के बीच आबाद है यह गांव मुलमुला। इस इलाके पर कभी रीझ गई थीं अमृता प्रीतम और इनमें से कुछ गांवों का उल्लेख उनकी कहानी ‘लटिया की छोकरी‘, ‘गांजे की कली‘ में आता है। माना जाता है कि जिस अंदाज की छत्तीसगढ़ी इस आसपास बोली जाती है, वैसी मिठास और सौंदर्य और कहीं नहीं। यह खास तौर पर उल्लेखनीय इसलिए कि ऐसा इन गांवों के लोगों को कहते कभी नहीं सुना, मगर ऐसा ज्यादातर वे मानते हैं, जो इस क्षेत्र से दूर-दराज हैं, अड़ोसी-पड़ोसी कहते ही हैं, जिनमें एक अकलतरा निवासी मैं स्वयं भी हूं।

मुलमुला के चतुर्दिक वीरान/आबाद, राजस्व अभिलेखों और लोक प्रचलन के ग्राम(-नाम) हैं, जिनमें पूर्व दिशा के तावनडीह नाम के साथ अब कोई आबादी नहीं है, स्मृति में भी इसका अस्तित्व लगभग लुप्त है। पश्चिम का कुटीघाट-नंदियाखंड, वस्तुतः गांव नहीं, बल्कि लीलागर नदी के बायें तट पर स्थित मंदिर और घाट के कारण प्रचलित नाम हैं। उत्तर का गोंदाडीह, कभी वीरान, अब सीमेंट कारखाना स्थापित हो जाने के बाद फिर से आबाद, स्मृतियों में, जबान पर और अभिलेखों में भी पुनर्जीवित हो गया है। दक्षिण का मस्तूरीडीह, जो अब वीरान गांव है, मुलमुला के साथ संलग्न, विशेष महत्व का है। बताया जाता है कि इस गांव की आबादी पहले यहीं बसती थी, खेती-पानी और यातायात सहूलियत के कारण वर्तमान स्थिति की ओर खिसक आई। प्रसंगवश, कुछ दूरी पर पूर्व में रोझिनडीह, दक्षिण-पूर्व में बोहारडीह (हाड़ादहरा) और गोंदाडीह से लगा घघराबोड़ है, इन गांवों, ग्राम-नामों के साथ भी रोचक बातें पता चलती हैं।

अब कुछ बातें त्रिमूर्ति की। तय किया गया कि इस मार्ग संगम पर आसपास की विभूतियों की मूर्ति लगेगी। सबसे पहले तीन निर्विवाद नाम आ गए, लेकिन पूरा अंचल प्रतिभाओं की खान है, इसलिए तय करने में देर होने लगी, किसी ने सुझाया कि दो-तीन मंजिला बना दिया जाए, जिससे हर जाति, वर्ग, दल के महापुरुष एकोमोडेट किए जा सकें। इस तरह तीन का तेरह होने लगा। बहरहाल, हल निकला समय के साथ। इन कुछ गांवों लिए कहा जाता है- नार-फांस नरियरा बसै, फंकट बसै कोनार, काट-कूट कोसा बसै, देवता बसै मलार। आज के कवि अधिकतर बिना तुक की कविताएं रचते हैं, बेतुकी? वे अपने शब्दों पर संदेह करते दिखते हैं और अपनी कविता पर खुद ही भरोसा नहीं कर पाते। सहज विश्वासी लोकमन पर पद्य में कही गई बात का भरोसा जल्दी बैठता है और यदि उसमें तुकबंदी भी हो, जो आमतौर पर बिठाई ही गई होती है तो फिर कहने क्या। इस तरह की पद्य-पंक्ति मानो पत्थर की लकीर। इन गांवों के लिए कही गई ये बातें, परिहास-उपहास का आधार बनती हैं तो इन्हीं से महिमामंडन भी किया जाता है। लोकमन अपनी सुविधा से शब्द और पंक्ति जोड़-घटा, बदल लेता है और व्याख्या भी प्रसंगानुकूल कर लेता है।

इन गांवों में से नरियरा, रिस्दा, कोनार और मुलमुला के क्रमशः ‘भैरो, भोला, भुसउ, भान, ते कर मरम न जानय आन‘ अर्थात् इन चार महानुभावों के मर्म को अन्य कोई नहीं जान सकता। कुछ लोग आन के बजाय भगवान जोड़ते हैं, यानि भगवान ही इनका मर्म जान सकता है ’मरम जानय भगवान‘ या वह भी इनका मर्म नहीं जान सकता ‘न जानय भगवान‘। कभी इरादा होता है, चार खंडों का ग्रंथ बना डालूं, लेकिन वह इन महापुरुषों की महिमा का अनुमान लगाने को भी पर्याप्त न होगा, सोच कर रुक जाता हूं। फिलहाल इनमें से भानसिंह जी का एक प्रसंग, ‘मामूली-सा‘। उन्होंने अपनी संतानों का जैसा विवाह संबंध संभव किया था, वह पूरे विश्व में ज्ञात एकमात्र उदाहरण है। उन्होंने अपनी छह संतानों का ऐसा रिश्ता तय किया कि पिता-पुत्र उनके समधी बने। छह विवाह की तीन पिता-पुत्र समधी जोड़ियां। भानसिंह की पुत्री गुलापी देवी और पुत्र जीतसिंह, जिनका विवाह क्रमशः सिंउढ के चिंता सिंह के पुत्र बोधन सिंह (पत्नी गुलापी देवी) से तथा चिंता सिंह के पुत्र गोलन सिंह की पुत्री कुमारी देवी (पति जीत सिंह) से हुआ। इसी तरह भानसिंह के पुत्र रूप सिंह और पुत्र धीर सिंह, जिनका विवाह क्रमशः हरप्रसाद सिंह की पुत्री कनकलता (पति रूपसिंह) से और हरप्रसाद सिंह के पुत्र केशव कुमार सिंह की पुत्री रंजना देवी (पति धीर सिंह) से हुआ। पुनः भानसिंह की पुत्री शकुंतला देवी और पुत्री करुणा देवी, जिनका विवाह क्रमशः कौशल सिंह के पुत्र हरिहर सिंह (पत्नी शकुंतला देवी) से तथा कौशल सिंह के पुत्र विशेसर सिंह के पुत्र बृजराज शरण सिंह (पत्नी करुणा देवी) से हुआ। इस तरह भान सिंह के समधी बने सिंउढ़ ग्राम के पिता-पुत्र चिंता सिंह और गोलन सिंह, अकलतरा के पिता-पुत्र हरप्रसाद सिंह और केशव कुमार सिंह तथा नरियरा के कौशल सिंह और विशेसर सिंह।

इस अंचल की प्रसिद्धि लीला-नाटक और संगीत के लिए भी रही है। नरियरा में गउद वाले रासधारी दादू सिंह, रायगढ़ घराने के कत्थक गुरू कार्तिकराम का डेरा रहता था। अब ऐतिहासिक 52 वां कांग्रेस अधिवेशन, सन 1939 (10 से 12 मार्च) का प्रसंग, जिसमें गांधीजी समर्थित पट्टाभि सीतारमैय्या को हरा कर सुभाषचंद्र बोस दूसरी बार अध्यक्ष चुने गए थे। इस अधिवेशन के लिए स्थान चयन में छत्तीसगढ़ की भी दावेदारी थी, किंतु अंततः त्रिपुरी (जबलपुर) का चयन किया गया, किन्तु कर्ता-धर्ता महाकोशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के सभापति और सेनापति, जीओसी यानि जनरल आफिसर कमांडिंग, छत्तीसगढ़ के ठाकुर छेदीलाल यानि अकलतरा वाले बैरिस्टर साहब थे।

इस अधिवेशन के लिए याद किया गया कि 1926 में कांग्रेस के 41वें गोहाटी अधिवेशन में हाथियों की शोभायात्रा निकाली गई थी, लेकिन यह हाथी बहुल असम में हुआ था। बैरिस्टर साहब ने इस बावनवें अधिवेशन को भव्य और यादगार बनाने के लिए 52 हाथियों की शोभायात्रा का कठिन संकल्प ले लिया, जिसकी पूर्ति के लिए शोभायात्रा उपसमिति के प्रभारी बैरिस्टर साहब के छोटे भाई कुंवर भुवन भास्कर सिंह ने जी-तोड़ प्रयास कर, इसे संभव बनाया। शोभायात्रा के लिए 25 हाथी महाराजा सरगुजा ने स्वयं के खर्च पर भेजे थे। इसके अतिरिक्त रीवां महाराज और उनके माध्यम से विभिन्न रजवाड़ों और जमींदारियों से हाथी आए थे। इसमें बघेलखंड कांग्रेस कमेटी का योगदान भी उल्लेखनीय था। प्रसंगवश, सुश्री डॉ. कुन्तल गोयल ने मध्यप्रदेश सन्देश में ‘इतिहास के पृष्ठों को समेटे सरगुजा की वनश्री‘ शीर्षक से प्रकाशित लेख में बताया है- ‘स्वाधीनता संग्राम के अंतिम दिनों में महाराजा रामानुजशरण सिंह देव ने अपनी सेना से 100 हाथी महात्मा गांधी के आयोजन को सफल बनाने के लिए रांची भिजवाए थे।‘ संभवतः यह जानकारी 1940 के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन से संबंधित है, इससे लगता है कि कांग्रेस अधिवेशनों में हाथियों की शोभायात्रा का चलन हो गया था। 

इस शोभायात्रा में सबसे आगे, पहले हाथी पर गांधी जी और अध्यक्ष सुभाषचंद्र बोस की तस्वीर ले कर कुंवर भुवन भास्कर सिंह के जुड़वा कुंवर भुवन भूषण सिंह उर्फ नक्की बाबू बैठे थे। नंदेली के पचकौड़ प्रसाद (इन हारमोनियम वादक को बाजा मास्टर नाम दिया था बैरिस्टर साहब ने, क्योंकि उनके पिता का नाम भी यही ‘पचकौड़‘ था।) संगीत उपसमिति के प्रमुख थे, जिनके नेतृत्व में वंदेमातरम गीत और पं. लोचन प्रसाद पांडेय द्वारा रचित स्वागत गान जैसी सांगीतिक प्रस्तुतियां हुई थीं। चर्चा होती है कि इस दल में भिखारी ठाकुर भी थे, लेकिन बोलबाला इस अंचल के संगीतकारों तबला वादक भान सिंह, इसराज वादक सुखसागर सिंह, वायलिन-सितार वादक हजारी सिंह का था।
हाथियों वाली शोभायात्रा

पं. लोचन प्रसाद पांडेय ने स्वागत गान की रचना तथा त्रिपुरी कांग्रेस के संस्मरण को अपनी आत्मकथा में कुछ इस तरह दर्ज किया है-

एक दिन प्रातः मैं ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर (बार एट-ला) से मिलने उनके बिलासपुर स्थित निवास पर गया। उन दिनों वे प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष थे। उन्होंने सस्नेह मेरा स्वागत करते हुए छत्तीसगढ़ी में कहा- ‘महराज मैं आज चिट्ठी भेजवैया रहें।‘ त्रिपुरी कांग्रेस अधिवेशन के लिए एक स्वागतगान की आवश्यकता थी। उन्होंने कहा- ‘इस कार्य को आपके अतिरिक्त और कौन अच्छी तरह कर सकता है।‘ थोड़ी देर मौन रह कर मैंने उत्तर दिया- ‘बैरिस्टर साहब, मैं तो अब हिन्दी पद्य रचना बन्द कर दिये हेंव‘ इस पर उन्होंने कहा कि - मैं अपने प्रांत की ओर से आपसे इस कार्य का भार ग्रहण करने का अनुरोध करता हूं। मैंने प्रत्युत्तर में कहा कि चूँकि यह आदेश प्रांतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष का है अतः मैं इसका पालन करूंगा; लेकिन मुझे भय है कि कहीं मेरी कविता उच्च कोटि की न बन सके।‘ इस पर वे हँस पड़े और मैंने उनसे विदा ली।

घर लौट कर मैंने बैरिस्टर साहब की इच्छानुसार हिन्दी में कुछ पंक्तियां लिखीं पर वे मुझे उच्चकोटि की प्रतीत नहीं हुई। उचित समय पर मैंने इन पंक्तियों को बैरिस्टर साहब के पास उनका अभिमत जानने के लिए भेज दिया।... ... ...त्रिपुरी में मेरी भेंट श्री छेदीलाल जी, शुक्ल जी, महंत जी, मिश्र जी सेठ गोविंद दास तथा अन्य कांग्रेस जनों से हुई। ये सभी महानुभाव अधिवेशन के प्रबंध एवं स्वागत कार्यों में जुटे हुए थे। महंत जी ने मुझे बताया कि स्वागत समिति ने कांग्रेस के खुले अधिवेशन में गाए जाने के लिए मेरा स्वागत गान स्वीकृत कर लिया है। यह खबर सुन मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर का भी मैं आभारी था क्योंकि उन्होंने ही तो स्वागत गान लिखने के लिए मुझे आदेशित किया था।... ... ...महात्मा जी उस समय तक नहीं पधारे थे। अध्यक्ष गंभीर रूप से अस्वस्थ्य होने के कारण कलकत्ते में रोग-शैय्या पर पड़े थे। अध्यक्ष के स्वागत तथा जुलूस के लिए 56 से अधिक हाथी पहुंच चुके थे।... ... ...जब हम रौशनियों से जगमगाती दुकानों और पुस्तक विक्रेताओं के स्टालों का निरीक्षण कर रहे थे तभी यह शोर उठा कि एक हाथी अनियंत्रित हो गया है तथा दुकानों को तोड़ रहा है। हम लोग असमंजस में पड़ गये। लेकिन तुरंत ही खबर आई कि हाथी नियंत्रण में आ गया है तथा किसी प्रकार घबड़ाने की जरुरत नहीं है । इस सूचना से हमें राहत मिली।... ... ...ऐसा ज्ञात हुआ था कि त्रिपुरी कांग्रेस के प्रथम दिन के सभी कार्यक्रमों को न केवल अभिलिखित किया गया था बल्कि उनका चलचित्र भी उतारा गया था।

त्रिपुरी कांग्रेस के खुले अधिवेशन (1939) में गाया गया स्वागत गान

त्रिपुरी आज मुदित महान
महाकोशल चेदि मेकल हुए गौरववान
राष्ट्रपति भारत हृदय मणि विश्वबंधु प्रधान
सत्य समता अहिंसा के दिव्य दूत महान
यहां पधारे साथ लेकर भारत-भू भगवान
बुद्ध-ईसा-कृष्ण के तप-योग-बल बलवान
पुण्य आश्रम शर्मदा शुभ नर्मदा वरदान
युद्ध ज्वाला से लहे संसार अपना त्राण
पधारो भारत के यश चंद
तव सुभाष की सुधा लाभ कर कटे जाति दुख द्वन्द
वसुधा-हो वसु-पूर्ण प्रेम मय, मानवता स्वच्छंद
दुर्गावती-वीरता-केतन त्रिपुरी-शौर्य-अमन्द
रेवा जल से चरण पखारे ले सेवा आनंद

गान

त्रिपुरी करत स्वागत गान
जयति भारत विश्व हित रत जयति हिन्दुस्तान
अंग, बंग, कलिंग स्वागत शौर्य शक्ति निधान
सिन्धु-गुर्जर द्रविड़ उत्कल कला-कौशलवान
हस्तिना, काशी, अयोध्या, द्वारका गुण खान
समुद्र स्वागत पंचनद-भू कामरूप महान
हृदय सिंहासन बिछे हैं कर रहे आह्वान
नर्मदा तट महाकोशल बने गौरव-वान
वीर नन्द-आर्य ललना शक्ति केतन प्रधान
भूमि यह दुर्गावती की धन्य आज महान
कलचुरी हैहय महीपों का सुराज विधान
लखे नव ऋषि राज का नव-युग ‘स्वराज‘ विहान

पं. लोचनप्रसाद जी ने इंडियन हिस्टारिकल रिकार्ड कमीशन के कलकत्ता अधिवेशन 1938 के संस्मरण में ‘त्रिपुरी‘ से संबंधित एक अनूठा अविश्वसनीय प्रसंग का उल्लेख किया है कि हिस्ट्री कांग्रेस अधिवेशन के प्रतिनिधियों के लिए आयोजित स्टीमर विहार में ‘जगत विख्यात जादूगर पी.सी. सरकार हमारे मनोरंजनार्थ स्टीमर पर उपस्थित थे। उन्हांेने जादू के अद्भुत और आश्चर्यजनक खेलों का प्रदर्शन किया। हममें से कोई भी व्यक्ति ब्लैक बोर्ड पर अपनी इच्छा से कुछ भी लिखता था और श्री सरकार जो कि न केवल ब्लैकबोर्ड की ओर पीठ किये हुए थे बल्कि अपनी आंखों पर पट्टी भी बांधे हुए थे, उसे पढ़ते और उसका अर्थ बताते थे। यह हमारे लिए विस्मयकारी था। मैंने ब्लैकबोर्ड पर 300 ईसापूर्व की ब्राह्मी लिपि में ‘त्रिपुरी‘ लिखा। श्री सरकार से तुरंत उत्तर आया- “पिछले वर्ष के कांग्रेस अधिवेशन का स्थल, जिसके जुलूस में 56 हाथी थे“ वहां उपस्थित सभी विद्वान श्री सरकार की योग शक्ति पर चकित हो गये। (यहां तिथि के उल्लेख में चूक दिखती है, क्योंकि त्रिपुरी कांग्रेस का वर्ष 1939, इस अधिवेशन के साल 1938 के बाद का है!)
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आगे कुछ बातें सीधे मुलमुला की माटी यानि आदरणीय भाई साहब रमाकांत सिंह जी उर्फ बाबू साहब वल्द जीत सिंह वल्द भान सिंह की ओर से, नाममात्र को कतर-ब्योंत कर, उनकी अनुमति से प्रस्तुत-

मोर गुरु गटारन

हर युग में छला जाता है शिष्य यदि गुरु द्रोण हो। द्वापर में छला गया एकलव्य और कलियुग में सुखसागर। गुरु रामलखन दास जी वैष्णव, बनारस घराना। कण्ठे महाराज के परम और प्रिय शिष्य। वैष्णव जी का शायद प्रेम, झुकाव ज्यादा भान सिंह की ओर। सुखसागर ददा विनोदी स्वभाव संग स्मरण-कुशाग्र थे। वैष्णव जी के कलादान, ज्ञान के अंतिम वर्षों में मुलमुला में भान सिंह को एक शाम कुंआ के पाट पर बैठ तबला वादन की एक अतिरिक्त कला का गुप्त ज्ञान दे रहे थे। गुरु-शिष्य डूब गए थे, गोधूलि बेला में लय-सुर-ताल में।

ढाबों की पंक्तियां, जामुन, बिही, केला, सीताफल और बंधवा तालाब के पार पर अटी पड़ी गटारन झाड़ियां। जैसे-तैसे रात बीती, सुबह रियाज में भिड़ गये। भानसिंह गुनगुनाते हुए तबले पर चलाने लगे उंगलियां। अचानक इसराज पर वही लय-सुर-ताल झंकृत हो उठे। इधर भान सिंह की उंगलियां तबले पर नाचे, उधर इसराज के तार डोल उठे बोल पर बोल।

रामलखन दास जी मगन थे अपनी सिखाई विद्या पर, किन्तु अचानक बिजली सी कौंधी, माथा सन्न सन्न कर गया। अरे सुखसागर! ए धुन ल तैं कहाँ पाये रे? तो ला कोन सिखोइस?, तोर गुरु कोन? सुखसागर ददा बोले- मोर गुरु गटारन। ‘मोर गुरु गटारन‘, बन गई पहेली। वैष्णव जी बोले मैं समझा नहीं, जरा खुलकर बताओ तो। ये धुन, ये ताल मुलमुला में आखिर तुम्हें किसने सिखाया। सुखसागर ददा ने कहा, गुरुदेव आप भान भैया को ये ताल सिखला रहे थे। हां तो, तब मैं गटारन झाड़ी के नीचे दिशा-मैदान में बैठा था। क्या बोले, अरे भाई मैं दिशा फड़ाका में बैठा था। वैष्णव जी बोले मैं तो बहुत देर तक समझाता रहा ये ताल। तो क्या हुआ, मैं भी आखिरी तक सुनता रहा। मैं भूल गया कि मैं नित्य कर्म के लिए बैठा हूँ। धुन और ताल में इतना खो गया कि सब भूल गया। मुझे याद रहे तो बस वो ताल और धुन संग बोल। बोधि वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई। और मुझे गटारन के नीचे आपके गुप्त ज्ञान की। अनायास सुखसागर ददा का विनोदी चंचल मन बोल उठा, मोर गुरु गटारन। ये कोई किस्सा नही जीवन के जीवंत पल साक्ष्य सहित। उनके हाथों लिखी पांडुलिपि, सुखसागर ददा के छोटे सुपुत्र भूलन सिंह के पास सुरक्षित है।

एक और संस्मरण। भैया क्रान्तिकुमार सिंह की जुबानी। बनारस घराने की सुप्रसिद्ध नर्तकी विद्याधरी, इसने जीवन पर्यन्त पूज्य कण्ठे महाराज की आराधना की। कण्ठे महाराज की मीरा थी विद्याधरी। घुंघरू बंधे तो बस कण्ठे महाराज के तबले की थाप पर और खुल गये तो फिर कभी बंधे ही नहीं। मोह, मौन और संकल्प भंग होता है। कण्ठे महाराज के शिष्य रहे श्री रामलखन दास वैष्णव जी। रामलखन दास जी के शिष्य रहे मुलमुला परिवार में भानसिंह ’तबला‘ और सुखसागर सिंह ’इसराज‘।

बनारस घराना ने बरसों कूटा और मांजा दोनों भाइयों को। रामलखन दास जी जब आश्वस्त हो गए, तब इन्होंने अपने शिष्यों से कहा बबुआ अब गंगा स्नान करेंगे। एक सुघर दिन गंगा स्नान कर गुरु कण्ठे जी को प्रणाम किया। एक संजोग इंतजार में बैठा था। विद्याधरी अपने घुंघरू उतार गुरु कण्ठे जी के पास बैठी थी। गुरु शिष्य का मिलन और वार्ता रहा होगा अलौकिक। रामलखन दास जी ने कण्ठे महाराज से मिलवाया, ये रहे मेरे शिष्य भान सिंह और सुखसागर सिंह। वैष्णव जी अपनी साधना, अपने गुरु को दिखाना चाहते थे। हठी बैरागी वैष्णव अपने शिष्यों को अँखिया चुका था, चूकना मत ये अवसर, आज नहीं तो कभी नहीं। रामलखन दास जी के मन रही होगी गांठ। विद्याधरी नाचे उसके शिष्यों की ताल और थाप पर। कारण भी ईश्वरीय महिमा ही कहें, विद्याधरी ने जब से होश सम्हाला था तो थिरकी थी गुरु कण्ठे जी की थाप पर, घुंघरू खुले तो उसकी थाप पर।

रामलखन दास जी का आदेश और उबलता खून दौड़ पड़ा। वैष्णव जी का आदेश हुआ, घुँघरु बंधे तो गुरु दक्षिणा पूरी हुई समझो, अन्यथा मेरी गंगा समाधि, मेरा हठ या भाग्य मानो। शुरू करो आठ गुना से, फिर करो सोलह गुना। सोलह गुना पर थोड़ा दौड़ाओ और बत्तीस गुना पर नचाओ। ताल और थाप का ऐसा संगम हुआ कि विद्याधरी के हाथ पड़े हर थाप पर, जांघ पर। पैरों में न जाने कब घुंघरू बंधे। कौन जाने कब पैरों ने थिरकना शुरू किया और कब किसके ताल-लय पर, कौन थिरका, थमा। उस संस्मरण की गूंज आज भी थिरकती है कानों में। कण्ठे महाराज को गुरु दक्षिणा मिली वैष्णव जी से। और वैष्णव जी भर पाए गुरु दक्षिणा मुलमुला से। रामलखन दास जी बोले कण्ठे महाराज जी से महाराज जी! ये ससुर हमको मलमल का धोती आउ कुर्ता दिए थे। फिन भुछि दक्षिना नहीं दिए थे न, आज मन गदगदा गया, मिल गया सब्बे कुछउ।


Wednesday, May 20, 2020

अमृत नदी


‘तीरे तीरे नर्मदा‘ में सौन्दर्य है और अमृत भी। यानि अमृतलाल वेगड़ की शब्द-कृतियां, ‘सौन्दर्य की नदी नर्मदा‘, ‘अमृतस्य नर्मदा‘ और ‘तीरे-तीरे नर्मदा‘, और साथ में भूयसी भी। ऋतचक्र, सृष्टि और जीवन के वृहत्तर से सूक्ष्मतर में सतत है, शायद यही मानव में परिक्रमा-वृत्ति बन कर विद्यमान है। लेखक की नर्मदा परिक्रमा, जल-रेखा के समानांतर प्रवाहित निष्ठा और समर्पण की जीवन-धारा ही है। परिक्रमा का यह विवरण ऐसा स्वाभाविक, इतना सहज कि लगे, विषय नदी-परिक्रमा जैसा हो तो बस लिख लेना पर्याप्त है। आस्था भी संक्रामक होती है, इतनी आस्था से लिखा गया कि आप लाख ‘तटस्थ‘ रहना चाहें, डुबकी लग ही जाती है। नर्मदा, पास बुलाती है, अपनी ओर खींचने लगती है। यों भी छत्तीसगढ़ी में ‘तीर‘ शब्द निकट के अलावा, तीरना बन कर खींचना अर्थ भी देता है।

कैसी उलटबांसी कि नर्मदा उल्टी बहती है, उसकी तो वैसी चाल, जैसी ढाल। वह ‘उल्टी‘ बहती ही शायद इसलिए, कि नदियों के बहने का भी उल्टा-सीधा तय किया जाने लगा। परिक्रमा, रेखा को वृत्त-मंडल बना देती है, जितनी भी दूरी नाप लें, भौतिक विस्थापन शून्य रहेगा। नर्मदा परकम्मा, परिक्रमा है, उसमें खंड परिक्रमा है और जिलहरी परिक्रमा यानि समुद्र संगम को लांघे बिना दुहरी परिक्रमा भी। पुस्तक में ‘नर्मदा‘ नाम को रह जाती है, उद्दीपक, अन्यथा बस नदी और जीवन प्रवाह। यों तो धर्मशालाएं हैं और निरंतर सदावर्त भी, लेकिन एक ऐसे संन्यासी का उल्लेख है, जिसे कुछ न मिले ‘‘तो माँ का दूध।‘‘ यानि नर्मदा का पानी। नदी-तट की ऐसी यात्रा पराक्रम से कम नहीं, लेकिन परकम्मावासी की आस्था-दृष्टि सफर की अड़चनों को जिस तरह देखती है, उसका एक नमूना- ‘‘मैंने ढिबरी और मोमबत्ती के काकभगौड़े खड़े करके जाड़े को भगा दिया था!‘‘ लेकिन इनमें शायद सबसे सुंदर वह जिसमें किसी ने परकम्मा अमरकंटक से उठाई, बछिया साथ लेकर। गाय बनी और रेवा-सागर संगम पर बछिया को जन्म दिया। गाय का नाम नर्मदा, बछिया रेवा। बताता है- ‘‘सच तो यह है कि परकम्मावासी तो गाय है। मैं तो उसके साथ-साथ चल रहा हूँ। मालिक वो है, मैं उसका नौकर हूँ। हाँ उसकी ओर से संकल्प मैंने किया था।‘‘

लेखक, चित्रकार हैं और उनके कोलाज रेखाचित्रों के साथ इस मुखर चितेरे की यह शब्द-कृति पुस्तक बनी। परिचय में कहा भी गया है कि ‘‘अमृतलाल के शब्दचित्र और रेखाचित्र बहुत घनिष्ठ सजातीय हैं। स्वाभाविक ही इस चितेरे के मन में बार-बार उभरते बिंब, शब्दों में, कहीं कविता की तरह भी ढलते जाते हैं। वे कहते हैं- ‘‘सरसों के पीले खेत देखकर मुझे बार-बार बसोहली शैली के चित्र याद आ जाते।‘‘ या ‘‘अमूर्त शिल्पों की विशाल कला-वीथी है यहाँ।‘‘ और ‘‘सुन्दर घाट इस तट से और भी सुंदर लग रहे थे। मानो किसी बड़े तैलचित्र की तरह अंकित हों।‘‘ जोशीपुर से होशंगाबाद होते बान्दराभान पहुंच कर ‘‘बान्दराभान में सूर्योदय‘‘ का गंभीर काव्यात्मक चित्रण यह कहते हुए किया है कि पत्रकार होता तो रिपोर्टिंग कुछ इस तरह करता, फिर मजे-मजे में सम्पादक, अखबार की खबर लेते, खुद पर हंसने का मौका भी बना लेते हैं।

पुस्तक में सोन का उद्गम अमरकंटक कहा गया है, यह मान्यता है, लेकिन तथ्य नहीं। यहां लेखक न सिर्फ मान्यताओं के साथ है, बल्कि तथ्य का उल्लेख भी नहीं करता। इसी तरह बात आती है- ‘‘गरीबा ने कहा कि वह धामन साँप था जो बहुत जहरीला होता है।‘‘ धामन जहरीला कतई नहीं, बल्कि वह तो बेहद घरु किस्म का प्यारा, दुलारा मित्र-सर्प है। छत्तीसगढ़ी कहावत है- ‘कहां जाबे रे धमना, किन्दर बूल के एही अंगना‘। धामन, किसान के घरों में धान की कोठी में रहता है, कहीं जाता नहीं, घूम-फिर कर वहीं बना रहता है, मनुष्य को देखकर तेजी से भागता है और चूहों को आहार बना कर किसान की नुकसानी कम करता है। उजियारा और अंधियारा पाख की चर्चा करते लेखक ‘‘अँधियारा पाख व्यर्थ बदनाम है‘‘ कहता है, वहां लगता है कि उसने मानस की पंक्ति ‘सम प्रकास तम पाख दुहुँ ...‘ को आत्मसात किया है। इसके अलावा चांद के लिए कुछ और बेहतरीन बयान हैं, जैसे- ‘‘चाँद सर्जक नहीं, अनुवादक है। वह धूप का चाँदनी में अनुवाद करता है।‘‘ या ‘‘राहु एक चंचल बिलौटा है और पूनम का चाँद खीर का कटोरा।‘‘

यात्रा के बहुतेरे स्फुट प्रसंग हैं, यहां उनमें कुछ का उल्लेख। बैगा रोते हुए भूखे बच्चे को चुप नहीं कराता, खाना नहीं है, देने को तैयार भी नहीं, कहता है ‘‘उसे भूखा रहना सीखना होगा। उसे भूखा रहने की आदत डालनी होगी।‘‘ यहां बैगा का कथन दीन-हीन बेचारगी का नहीं है, बल्कि बच्चे को भूखा रखना वैसा ही है जैसा व्रत-उपवास। जनजातीय समुदाय में ऐसी कई परंपराएं हैं, जो प्रकृति और जीवन की विषम परिस्थितियों को बरदाश्त करने के अभ्यास की तरह होती हैं। वैसे आधुनिक शिशु-पोषण विज्ञानी भी अब सलाह देते हैं कि छोटे बच्चों को निश्चित समय पर आहार देने से उन्हें भूख का वैसा अहसास नहीं हो पाता, इसलिए थोड़ी अनियमितता, कुछ समय के लिए भूखा रखना जरुरी है। नवजात की सिंकाई की जाती है, उसे मालिश कर थकाया जाता है, यह किसी न किसी रूप में हर जगह प्रचलित है। कुसमी-सरगुजा अंचल के कुछ जनजातीय समुदाय में मानव-नवजात को अधपका माना जाता है और उसे ‘पकाने‘ के लिए धूप मिट्टी में खुले बदन छोड़ दिया जाता है। यह रूढ़ नासमझी नहीं, वस्तुतः सिंकाई, मालिश-एक्यूप्रेशर और मृदा-स्नान का आदिम-वैज्ञानिक तरीका है। एक अन्य जनजातीय परंपरा का उल्लेख आया है, जिसमें कहा गया है कि- ‘‘कन्यादान लड़की का पिता करता है, दाता वह है। दाता की शोभा इसी में है कि वह खुद जाकर दान करे, किसी को माँगने के लिए उसके घर न आना पड़े। इसीलिए वह बेटी की बारात लेकर लड़के वालों के घर जाता था। यह ब्रह्मर्षि विवाह है। जिसमें लड़का बारात लेकर लड़की के घर जाता है, यह राजर्षि विवाह है। लेकिन अब इसी का रिवाज है।‘‘

कलम का जादू है या जलधारा का, लेखक के ललित गद्य और कविता में अंतर नहीं रह जाता, लेकिन वे स्वयं अपने लेखन और कविताई की मौज लेते हैं। अपने तईं कविता करते हुए लिखते हैं- ‘‘बादल उड़ती नदी है, नदी बहता बादल है।‘‘ और बताते हैं कि नोटबुक में लिखी पंक्तियाँ, उनके कवि मित्र द्वारा इसे कविता न मानते हुए रद्द कर दी गई। यहां मुझ जैसा पाठक तो उनके कवि मित्र को ही रद्द कर देना चाहेगा। ऐसी ही एक सुरमयी पंक्ति है- ‘‘अगर चट्टानें न हों, तो नदी से गाते ही न बने।‘‘ या नर्मदा के साथ उसकी सहायक नदियों से अपना नाता जोड़ते हुए कहना कि ‘‘मौसी का प्रेम माँ के प्रेम से कम नहीं होता‘‘, (प्रसंगवश राही मासूम रजा ने कहा था- ‘मैं तीन माओं का बेटा हूँ। नफीसा बेगम, अलीगढ़ युनिवर्सिटी और गंगा।‘ इसी तरह ‘दर दर गंगे‘ पुस्तक का पात्र अयाज़ इससे भी एक कदम आगे की बात कहता है- ‘‘गंगा मैया, तेरे आगे मां भी मौसी लगती है।‘‘) न ही नर्मदा-महिमा गाते उनका मन भरता, ढाई-एक सौ पेज के यात्रा-संस्मरण को कहते हैं ‘‘चिड़ी का चोंच भर पानी‘‘ और नर्मदा की सहायक बुढ़नेर, बंजर, शक्कर नदियों की परिक्रमा कर उसका भी लेखा यहां जोड़ लेते हैं।

लेखक, नदी के साथ उसकी संस्कृति का दर्शन, सहज कराता चलता है- ‘‘पर्वत की देवी हैं- पार्वती, हिमालय की बेटी। मैदान की देवी हैं सीता जो राजा जनक को हल चलाते समय खेत में मिली थीं। और समुद्र की देवी हैं लक्ष्मी जो समुद्र मन्थन में से निकली थीं। मजे की बात यह है कि तीनों के ही भाई नहीं हैं। इनमें से किसी के भी माता-पिता ने बेटे के लिए मनौती मानने की आवश्यकता नहीं समझी।‘‘ नर्मदा महिमा-मंडन में संस्कृति-संगम का भाव आता है, इस तरह- ‘‘कहते हैं गंगा सप्तमी के दिन गंगा नर्मदा में स्नान करने आती है।‘‘ और इसी तरह के कहन को याद करते हैं- ‘‘नर्मदा की नहायी छोरी है, संस्कार अच्छे कैसे नहीं होंगे!‘‘ पुस्तक में यह भी अच्छी तरह रेखांकित हुआ है कि नदियां, यहां नर्मदा, भाषा-संस्कृति की टूट को, भेद को जोड़ती है। ‘‘मेहंदी ते बाबू मालवे नेनो रंग गयो गुजरात रे!‘‘ यानि मेंहदी तो मालवे में लगायी, पर उसका रंग गुजरात जा पहुँचा। लेखक, स्वयं के उदाहरण सहित अन्य निवासियों के प्रदेश अदला-बदली का भी उल्लेख करते हैं। छत्तीसगढ़ का उल्लेख आता है और सहयात्री बने हैं- रायपुरवासी (अब बैकुण्ठवासी) आचार्य सरयूकान्त झा। आचार्य झा नर्मदा यात्रा और इस यात्रा संस्मरण में ऐसे रमे कि छत्तीसगढ़ी अनुवाद ‘सुन्दरता के नदी नरबदा‘ और ‘अमृत के नरबदा‘ उनके जीवन की अंतिम इच्छा बन गई थी (अंतिम मुलाकात में जैसा उन्होंने मुझसे कहा था), जो अब प्रकाशित भी हो गई है।

पुस्तक के अंतिम पृष्ठों पर श्रीमती कान्ता वेगड़ का ‘मेरे पति‘ है, जिसे पढ़ते हुए लगता है कि यह भी अमृतलाल जी ने ही लिखा है, यहां वाक्य है- ‘‘उनके साथ रहते-रहते मैं भी उनके रंग में कितना रंग गयी हूँ ...‘‘, इसलिए ऐसा लगना स्वाभाविक ही है, साथ ही पुस्तक के अंत में प्रकाशित चित्र, दम्पती कितने एकरूप हो गए हैं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।
गति-स्थिति का दर्शन है यह पूरा यात्रा-वृत्तांत। लेखक महसूस करता है कि ‘‘अमरकंटक से चलते समय उसमें प्रस्थान का जैसा उत्साह था, यहाँ मंजिल पर पहुँचने का वैसा ही संतोष है।‘‘ मगर नदी-यात्रा के प्रति लेखक का ‘अतृप्त‘ मन भी कुछ इस तरह है- ‘‘एक जीवने रे लाखो उपाधि, केम जीवे जीवनार रे! जीवन एक है और परेशानियाँ लाख-लाख, जीने वाला जीये तो कैसे जीये! और शायद इसीलिए वे कहते है- ‘‘अगर पचास या सौ साल बाद किसी को एक दम्पती नर्मदा परिक्रमा करता दिखाई दे ... तो समझ लीजिएगा कि वे हमीं हैं- कान्ता और मैं।‘‘ हर नर्मदे!