Thursday, May 21, 2026

जन-नागर गीता

हरिवंशराय बच्चन की ‘भगवद्गीता‘, काव्यमय भावानुवाद मूल संस्कृत श्लोकों सहित, के 2013 संस्करण में उल्लेख है कि इस पुस्तक का पहला संस्करण ‘नागर गीता‘ नाम से 1966 में प्रकाशित हुआ था। इसके भी पहले 1958 में ‘जन गीता‘ प्रकाशित हुई थी। अप्रैल 1966 में ‘सम्बोधन‘ शीर्षक, भूमिका इस 2013 संस्करण में भी है, जिसमें बच्चन ने लिखा है कि इसे देखकर उनके एक अन्य अनुवाद ‘जन गीता‘ की याद आना स्वाभाविक है। वह अवधी में था, यह खड़ी बाली में है। ‘जन गीता‘ में वे अपने को ‘प्रतिध्वनिकार‘ और यहां ‘नागर गीता‘ में ‘रूपांतरकार‘ कहते हैं। उसके आमुख को ‘मंगलाचरण‘ कहा था, इसे ‘सम्बोधन‘। इस सम्बोधन का यह अंश उल्लेखनीय है- ‘मुझ साधारण का ‘स्व‘ ऐसा नहीं हो सकता कि किसी भी ‘पर‘ से मेल न खाए। फिर भी आपके स्वागत, उपेक्षा दोनों के लिए ये तैयार है; यानी, दोनों के प्रति उदासीन।‘ इससे लगता है कि कृतिकार गीतामय है, उसने कर्म किया है, कर्मफल के प्रति तटस्थ-अनासक्त है, निरपेक्ष है। 

जन गीता के ‘मंगलाचरण‘ पर नई दिल्ली, 12-5-58 दर्शित है। यह वस्तुतः काष्ठमौनी स्वामीजी महाराज के प्रति विनय है। पुस्तक में यह भी बताया गया है कि ‘जन गीता का सर्वप्रथम सस्वर संपूर्ण पाठ श्री स्वामी जी महाराज के समक्ष अठारह मई उन्नीस सौ अट्ठावन को किया गया।‘ अन्यत्र जानकारी मिलती है कि काष्ठमौनी स्वामीजी महाराज, राधा बाबा - चक्रधर मिश्र (1913-1992) हैं, स्वाधीनता संग्राम में जेल भी गए। 1936 में संन्यास ले लिया और 1956 की शरद पूर्णिमा पर काष्ठमौन व्रत लिया। 

यहां गीता के अपनी पसंद के कुछ श्लोक चुने गए हैं। अपनी पसंद के साथ इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि आमतौर पर लोगों की जुबान पर आने वाले पद शामिल हों। आरंभ में अध्याय/श्लोक संख्या, मूल संस्कृत श्लोक, बच्चन जी की उक्त कृतियों में किया गया खड़ी बोली अनुवाद और फिर अवधी अनुवाद है- 

1/1 - धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय।। 
# संजय से धृतराष्ट्र ने कहा, धर्मक्षेत्र में, कुरुक्षेत्र में, समरेच्छा से हुए इकट्ठे, मेरे और पांडुपुत्रों ने जो कुछ किया, बताओ, संजय। 
# धर्मखेत, कुरुखेत, कहावा, जहँ कौरव-पांडव-दलु आवा; काह करहिं तहँ दोउ समुदाई? संजय, मोहिं कहहु समुझाई। 

1/47 - एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत्। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः। 
# ऐसा कहकर, धनुष-बाण तज, रण-स्यंदन के पृष्ठ भाग में शोक-विकल अर्जुन जा बैठे। 
# अरजुन कहि अस कृष्न सन, सोक-बिकल, धुनि माथ, सर-धनु तजि, रथ-पृष्ठ महुँ बैठेउ, कुरु-कुल-नाथ। 

2/22-23 - वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।। नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।। 
# जीर्ण वसन तज कर जैसे नए वस्त्र धारण करता है, जीर्ण देह तज कर वैसे ही देही नव तन धारण करता। शस्त्र नहीं छेदन कर सकते इस देही का, पावक इसको जला न सकता, पानी इसको भिगा न सकता, मारुत इसको सुखा न सकता। 
# नर, परिहरि जिमि जून पट, पहिर्राह नव परिधान, जीव धरइ तिमि नवल तन, त्यागि सरीर पुरान। जीव न पावक जारि सक, भेइ सकइ र्नाह नीर, सोखि न सकइ समीर तेहि, छेदि सकइ र्नाह तीर । 

2/47 - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।। 
# कर्मों पर अधिकार तुझे है, कभी न फल पर; तू न कर्मफल अनुरागी बन, और न कर्मों से विरक्त हो। 
# करमहि पर बस तोर बसाऊ, फल पर तोहि अधिकार न काऊ; छोरु कर्म-फल-मोह, सुकर्मा, छोरु न कर्म, न छोरु स्वधर्मा। 

4/7-8 - यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।। 
# भारत, जब-जब ग्लानि धर्म की औ‘ अधर्म का अभ्युत्थान हुआ करता है, कगार तब-तब मैं अपने को सृजता। साधुजनों के परित्राण के औ‘ असाधुओं के विनाश के और धर्म संस्थापन के हित युग-युग, भारत, मैं अवतार लिया करता हूँ। 
# जब जब धर्म रसातल जाई, रहइ अधर्म धरा पर छाई, तब - तब, मोर नियम, कपिकेतू, देह धरउँ जग मंगल हेतू। करउँ कुकर्मिन्ह कर संघारा, करउँ सुकर्मिन्ह कर उद्धारा; नीति मोरि जुग जुग चलि आई, थापउँ धर्म, अधर्म हटाई।

9/22 - अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्। 
# जो अनन्य-मन हो मेरा चिन्तन करते, मुझको भजते हैं, नित्ययुक्त उन भक्तजनों का योगक्षेम वहन करता मैं 
# जे अनन्य मन सुमिरहिं मोहीं, जे मोहि सन छन दूरि न होही, जे नित निज चित मोसन बाँधे, तिल्हकर जोग-छेम मम काँधे। 

10/35 - बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्। मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।। 
# बृहत्साम सामों में, गायत्री छन्दों में, मार्गशीर्ष मासों में, ऋतुओं में वसन्त मैं।। 
# बृहत्साम मोहि, मंत्रन्ह माहीं, गायत्री मोहि, छंदन्ह माहीं। माघ समुझु मोहि मासन्ह माझा; समुझु रितुन्ह महुँ मोहि रितुराजा; 

15/1 - ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्यं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।। 
# कहा कृष्ण ने, ‘ऊर्ध्व मूल औ‘ अधः डाल का जो अव्यय अश्वत्थ, वेद के पत्तों वाला, कहा गया है, जो उसको जानता वही वेदों का ज्ञाता। 
# अच्छय बिरिछ जाइ एक भाषा, जो उर्ध्वग-जरि, निम्नग-साखा; जामहुँ बेद लगहिं जिमि पाता; जो जानइ तेहि, सो बड़ ग्याता। 

18/66 - सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।। 
# सब धर्मों का परित्याग कर, मेरी एक शरण में आ तू, शोक न कर, मैं तुझे, परंतप, सब पापों से मुक्त करूँगा। 
# कुंति-सुवन सब धर्म बिहाई, गहु मम एक सरन, सिरु नाई; मैं तोहि, सब अघ-ओघ नसाई, देहउ मुकुति परम सुखदाई। 

18/78 - यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्भुवा नीतिर्मतिर्मम।। 
# जहाँ कृष्ण योगेश्वर, पार्थ धनुर्धर, नरवर, वहाँ विजय है, श्री, विभूति है, अडिग नीति है, मेरा मत है। 
# जहँ कृष्न जोगेस्वर, जहाँ धनु साजि अरजुन राजहीं, तहँ रहइ श्री, बैभव, बिजय, ध्रुव नीति, मम संमति सही। 

गीता-भाव के लिए उक्त दोनों के अतिरिक्त,
गीता-पठन में अद्वैत आश्रम वाली ‘सरल गीता‘,
स्वामी अपूर्वानन्द की रामकृष्ण मठ वाली और
गीता प्रेस वाला संक्षिप्त संस्करण,
के साथ शुरूआत आसान होता है।

टीप- 
‘जन गीता‘ की प्रति हमारे स्कूल के पुस्तकालय से मिली। पुस्तक के साथ सहेजे कार्ड में दर्ज है कि 1963 से 1968 के बीच इस पुस्तक को कक्षा 7 से कक्षा 11 तक के 12 विद्यार्थियों ने जारी कराया था।

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