Wednesday, May 18, 2022

CONFLICTORIUM

आज 18 मई को अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर सुबह-सुबह याद कर रहा हूं 24 फरवरी 2021 को, जिस दिन दो युवतियों ने कन्फ्लिक्टोरियम प्रतिनिधि के रूप में अपना परिचय दिया था। तब उनकी बातचीत का आशय, अगर मैं ठीक समझ सका तो यह था कि रायपुर, छत्तीसगढ़ में ऐसे संग्रहालय की क्या संभावना है? और इसके बारे में मैं उन्हें क्या बता सकता हूं। यानि उन्हें क्या जानना चाहिए यह भी मुझे बताना है। मुझे यह मनोरंजक पहेली जैसा लगा था।

मैंने बताया कि यह तो खल्लारी के देवपाल वाले मंदिर जैसे उदाहरणों वाला छत्तीसगढ़ है। मगर कन्फ्लिक्ट ही ठहराना हो तो वह कहां नहीं, लेकिन अक्सर बिना समझे, जल्दबाजी कर उसमें दखल देना, उसे हवा देने जैसा होता है। इसलिए मैं मानता हूं कि संग्रहालय के बजाय आचरण और व्यवहार हो, वह भी समन्वय का। वैचारिक भिन्नता तो स्वाभाविक है, रहेगी, आवश्यकता उसके प्रति उदारता की हो सकती है, ... आदि कारणों से मैं कन्फ्लिक्टोरियम जैसा कोई संग्रहालय, छत्तीसगढ़ के लिए निरर्थक मानता हूं।

मुझे तब लगा था कि ऐसे संग्रहालय का निर्णय तो किसी स्तर पर हो चुका होगा, बाद में अपनी बात पर खुद विचार करते हुए लगा था कि उसे मेरी असहमति, कन्फ्लिक्ट मान कर यहां कन्फ्लिक्टोरियम की सख्त आवश्यकता, उनके प्रतिवेदन में होगी, इसलिए समझ नहीं पाया था कि मैं इसके लिए स्वयं को सहमत मानूं या असहमत? बहरहाल, यह बात याद रह गई और पिछले दिनों आपसी चर्चा में आई, मगर आई-गई हो गई। आज फिर याद आने पर लगा कि पहले इसकी तलाश कर लेनी चाहिए।

अटकते-भटकते बैरन बाजार के जनता कालोनी में पहुंचा, वहां बोर्ड दिख गया।
तीर की दिशा में ठिठकते आगे बढ़ा, क्योंकि यह घरों के पिछवाड़े वाली गली थी, एक रहवासी गृहणी ने बताया कि सामने जाइए, बड़ा पीपल का पेड़ है, वही म्यूजियम का प्रवेश है, ऐसा लगा कि उनसे म्यूजियम का पता पहली बार किसी ने पूछा है और पता बताने के अलावा इससे उनका कोई ताल्लुक नहीं है। बताए पते पर दरवाजा बंद और उस पर बोर्ड मिला, कुछ आशा बंधी।

एक युवती पीपल के पेड़ पर जल अर्पित कर रही थी, उससे पता पूछा, उसने कहा कि प्रवेश पीछे गली से है। मैंने कहा कि गली से ही लौट कर आ रहा हूं। संयोग कि वही संग्रहालय की प्रभारी थी, इसलिए उसके बताए रास्ते, यानि घरों के पिछवाड़े वाली गली में वापस लौटा, इस बार आगे बढ़ने पर झांकता सा संकेत मिला।

अब मैं आधे बंद दरवाजे के सामने था, झिझकते हुए प्रवेश किया।
मेरा यहां तक पहुंचना उन्हें कुछ अजीब सा लग रहा था, इसलिए मैंने अनपा परिचय देना जरूरी समझा कि मुझे आकस्मिक दर्शक न मान लें। मैं इसकी पृष्ठभूमि से परिचित हूं और स्वयं संग्रहालय विज्ञान का विद्यार्थी हूं साथ ही संग्रहालय से संबंधित कामों से भी जुड़ा रहा हूं। संग्रहालय प्रभारी स्वागत की मुद्रा में तो थीं ही, अब आश्वस्त भी हो गईं। काउंटर पर देखा कि यह 14 अप्रैल 2022 से खुला है।

अंदर जाने के लिए उन्होंने मुझे हैलमेट दिया, मैंने पूछा कि किसी खतरे की आशंका है, सावधानी बरतनी है? उन्होंने आश्वस्त करते हुए टोपी पर लगे बल्व को जला दिया और बताया कि इस बंद दरवाजे के अंदर अंधेरा है, इससे आपको मदद मिलेगी। सुरंगनुमा अंधेरा संकरा गलियारा, थोड़ा उबड़-खाबड़ भी। अलग सा महसूस करते इसे पार कर आगे बढ़ते जिस कक्ष में ठहरा वहां संविधान की प्रति और अंबेडकर जी के चित्र लगे थे। अंबेडकर-संविधान ने द्वंद्व-CONFLICT को रेखांकित कर उसे मिटाने की राह बनाई? इसलिए? मुझे लगा कि इसके साथ संविधान निर्मात्री सभा के छत्तीसगढ़ के सदस्यों का भी नामोल्लेख, परिचय होता! काउंटर पर के चित्र में ‘रायपुर का अपना CONFLICTORIUM‘ लिखा है, मगर इसमें रायपुर या छत्तीसगढ़ का अपना कुछ नहीं दिखा, तो यह ‘अपना‘ बेगाना-सा लगा। अपनी इस बात से प्रभारी को अवगत कराया।
कुछ और प्रादर्श थे, प्रभारी ने उन सबसे परिचित कराया। मैं फिर पूरा समय ले कर आने की बात कहते, दर्शक पंजी पर अपना नाम दर्ज कर वापस निकल आया। इस संग्रहालय दिवस पर, इस संग्रहालय तक पहुंचने वाला मैं शायद अकेला दर्शक रहा।

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