Wednesday, September 9, 2015

बनारसी मन-के

एक समय था, जब कस्बे से कोई शहर जाता, खासकर लंबी दूरी पर, तो इसकी खबर सब को हो जाती और लोगों की फरमाइश आने लगती कि उनके लिए शहर से क्या‍ लाना है, और यह न सिर्फ सम्मान देने का ढंग होता, बल्कि लगभग अनिवार्य औपचारिकता भी होती कि पूछा जाए- आपके लिए क्या‍ लाना हैॽ (न कि आपके लिए कुछ लाना हैॽ) इसी क्रम में मेरे बनारस जाने की खबर सुन कर हमारे एक रिश्तेदार ने कह दिया कि उन्हें हल्दी की माला चाहिए। काम एकदम आसान था, विश्वनाथ गली जाना ही है, किसी पहली दुकान से माला खरीद लूंगा और हल्दी की माला..., कीमत क्या होगी, दो-पांच रुपए। बनारस पहुंचकर विश्वनाथ गली का पहला ही दिन था, सोचा काम निबटा लूं, दुकानदार से पूछा- माला, हल्दी कीॽ दुकानदार ने सपाट जवाब दिया, नहीं। मैंने ध्यान नहीं दिया, एकाध जगह और पूछा, माला नहीं मिली तो घूमते-फिरते आगे निकल गया, सोचा फिर किसी दिन।

यही सब अगले दिनों में बार-बार हुआ, किसी दुकानदार से दुबारा भी टकराया, उसने जरा चिढ़कर कहा, बताया तो, नहीं है, अब मेरा ध्यान गया कि दुकानदारों का जवाब सामान्य नहीं होता, वे अजीब नजरों से घूरते हुए जवाब देते हैं, कभी चिढ़े से, मैं ठीक समझ न सका, कि क्या हो रहा है। मैं गली से गुजरता, तो माला दुकान वाले मुझे जिस नजर से घूरते उससे लगता, सब को खबर है कि मैं हल्दी माला वाला वही ‘अजूबा’ ग्राहक हूं। समझ में आया कि जो दुकानदार नजरअंदाज कर गुजरते को आवाज देकर बुलाते हैं उनसे नजर मिलने पर भी आमंत्रण नहीं मिलता, यूं ही राह चलते पूछ लेने के बजाय मैं खबरदार सा गुजरता। आसान लगने वाली वह फरमाइशी माला, अब मुसीबत गले पड़ने सी लगने लगी तो यह मेरे लिए खरीद से ज्यादा खोज की चीज बन गई।

ढुंढिराज गणेश से ज्ञानवापी की ओर आगे बढ़ने पर दाहिने हाथ अविमुक्‍तेश्‍वर महादेव वाले नक्‍काशीदार मंदिर के सामने दुकान है, जिसके लिए मैं आश्वस्त था कि वहां अब तक नहीं पूछा है, उस दिन पूरी सावधानी से मैंने बुजुर्ग दुकानदार से संभलकर बात छेड़ी, माला चाहिए, फिर कुछ पल चुप रहा, उसने मेरी ओर ध्यान से देखा और पूछा, हल्दी की, पहले तो लगा कि मन वांछित मिल गया फिर मैं सहम सा गया, उसे कैसे पता, उसने बात पूरी की, तुम्हीं हल्दी की माला के ग्राहक हो, मैं सन्न... पूरी गली में शायद बात फैली थी कि कोई हल्दी की माला खोज रहा है। मैं दुकान के पाटे पर गुंजाइश बना कर बैठ ही गया।

दुकानदार ने पूछा, तुम्हें क्यों चाहिएॽ क्या करोगे इसकाॽ मैं आश्वस्त कि अब सही ठिकाना मिल गया, यह अपना माल खपाएगा ही, मैंने तन कर जवाब दिया, कितने की होगीॽ लेकिन उसने फिर अपनी बात दुहराई, उसकी गंभीरता से मैं जरा ढीला पड़ा और बताया कि मैं बाहर से आया हूं, किसी ने कहा कि बनारस जा रहे हो तो वहां से हल्दी की माला ले आना, वहीं सही चीज मिलेगी। मैंने यह बता कर दुकानदार का विश्वास जीता और उकसाने की कोशिश की- विश्वनाथ गली की कितनी ही दुकानें, लेकिन यह कहीं नहीं मिल रही। जानना चाहा कि माजरा क्या है, मामूली सी हल्दी माला की खरीद और यह झमेला।

धीरे-धीरे बात आगे बढ़ी। ठेठ बनारसी (वैसे बनारसी के साथ ठेठ, विशेषण के दुहराव जैसा है) तमीज वाला शास्त्रीय ज्ञान। आपको दिलचस्पी दिखाने की देर है, गुण-ग्राहक पाकर बनारसी अपना काम छोड़कर..., किताब, मिठाई और बनारसी साड़ी दुकानदारों की तो बात ही नहीं, लस्सी वाला दही जमाने की सावधानियों और तरीके, पान दुकान वाला, कत्था-चूना तैयार करने और मगही पत्ते को पकाने-सहेजने की विधि तो रिक्शे वाला काशी के नये-पुराने भूगोल और ठौर-ठिकानों की सूचना, गूगल वाली सपाट नहीं, बल्कि अपने खास इन-पुट सहित वाली जानकारियों से लबालब कर सकता है। सहज शास्त्र धारित-आभूषित लोक, लोक विराजित शास्त्र।

यूनिवर्सिटी गेट से लंका चौमुहानी की ओर बढ़ते हुए बायीं ओर गली के दोनों ओर हिस्‍से वाली लस्सी की दुकान। अब बराय नाम 'मालवीय कुंज' की गली में दोनों ओर चौकोर स्तंभों में से दाहिने वाले पर मटमैली सी संगमरमर पट्टिका लगी होती थी, जिस पर आद्याक्षर-हस्ताक्षर वाले तीन अक्षर म.मो.मा. खुदे थे, किसी बैठे ठाले ने इन अक्षरों को मदन मोहन मालवीय बताते मेरे लिए कई रहस्य खोले। इसी के आगे एक खास दुकान होती थी, टिकठी-गोटेदार चुनरी सजी। पहले-पहल ध्यान जाने पर कभी वहां ठिठका था। अंतिम संस्कार की सजी दुकान, बस एक मुरदे की कमी। ‘मौत और ग्राहक का कोई भरोसा नहीं, कब आ जाए’, लेकिन यहां तो ग्राहक आएगा किसी मौत के साथ, मौत का ही भरोसा। मेरे मन में ‘किं आश्चर्यम्’। ठलुए दुकानदार ने मेरी निगाहें पढ़ लीं और फिर दुकान-सरंजाम, संस्कार, मुमुक्षु भवन, जीवन-मरण का सफर कहां-कहां से यहां तक, हरिश्चन्द्र-मणिकर्णिका, वरुणा से अस्सी के बीच की काशी का महात्‍म्‍य और उसका अविस्मरणीय पाठ पढ़ाया, अब उसका यही याद/असर रहा कि बनारस ‘इन्टेलेक्चुअल्स’ की हो न हो, शास्त्रियों की नगरी है।... अटके-भटके-बहके बिना कैसा बनारस ...

बहरहाल, यह दुकानदार पूरे माला-शास्त्री निकले। कितने तरह की माला, किस काम की, कैसे बनती है, ग्राहक कैसे-कैसे, फिर आए हल्दी की माला पर, बताया कि वह इस तरह दुकानों में नहीं मिल जाती, जिसे जरूरत होती है, साधना करनी हो वह खुद या उसका अपना कोई खास ही इसे बनाता है। इसका भारी विधि-विधान है, सौराष्‍ट्र... हरिद्रा झील... बगलामुखी... अष्‍टक-पूर्ण-स्थिर... फिर कहा कि इसका उपयोग शत्रु-विनाश के लिए भी होता है और यदि बनाने में चूक हुई तो खुद के जान पर बन आती है।

मैं सन्न... फिर उसने आगे कहा कि एक बड़े राजनेता के लिए मारण मंत्र का प्रयोग किया गया था, पीताम्‍बरा पीठ, दतिया में और उसके लिए हल्दी की माला बनारस से बन कर गई थी। मैं इस तिलस्म में डूबता-उतराता रहा, वापस आ कर उन रिश्तेदार से दुकानदार वाला सवाल दुहराया, उन्होंने जवाब दिया कि वे पीताम्बरा देवी के भक्त हैं, माला देवी के लिए चाहिए थी, नहीं मिली..., कोई बात नहीं...।

हल्दी माला की इस खोज का हासिलॽ यों तो आनंद पहेली सुलझ जाने का ही होता है, लेकिन कभी बात की बात पहेली बन जाए और वह भी कई परतों वाली, तो उसे जस के तस सहेजे रखना भी मन का मनका सी जमा-पूंजी है। एक फरमाइश किसी ने की थी, हेमाद्रि 'चतुर्वर्ग चिंतामणि' के व्रत खंड की। और इसकी खोज में चौक स्थित चौखम्बा प्रकाशन की दुकान पर गया, वहां मेरी अबोधता का सम्मान कुल्हड़ वाली चाय और पान से किया गया था, बावजूद इसके कि मैंने वहां से कुछ भी खरीद-फरोख्त नहीं की थी, यह किस्सा फिर कभी।

शीर्षक ‘बनारसी मन-के’ शब्द, छत्तीसगढ़ी मन में आए तो आशय ध्वनित होगा- ‘बनारस के लोगों का’।

Saturday, August 22, 2015

राजा फोकलवा


'राजा फोकलवा', नाटक के केन्द्रीय पात्र फोकलवा के राजा बन जाने की कहानी है। पूरे नाटकीय पेंचो-खम के साथ इस लोक कथा का प्रवाह महाकाव्यीय परिणिति तक पहुंचता है। फोकलवा अलमस्त, बेलाग और फक्कड़ है, दीन बेबस-सी लेकिन ममतामयी, स्वाभिमानी मां का इकलौता सहारा। इस चरित्र में राजसी लक्षण आरंभ से हैं, नेतृत्व, चुनौतियों का सामना करने का साहस, अपने निर्णय के क्रियान्वयन की इच्छा-शक्ति और उसके बालहठ में राजहठ की आहट भी। उसमें कुटिल चतुराई है तो बालमन की नादानी और निर्भीकता के साथ खुद को धार में झोंक देने का दुस्साहसी आत्मविश्वास भी। आम इंसानी कमी-खूबियों वाले इस चरित्र में विसंगत ट्रिगर होने वाला व्यवहार, कहानी में नाटक के रंग भरता है और यह चरित्र आत्मीय न बन पाने के बावजूद दर्शक की सहानुभूति नहीं खोता।

एक दिव्य सुंदर साड़ी और आभूषण- 'तोड़ा' जोड़े के प्रपंच में बार-बार नाटकीय मोड़ बांधे रखता है, दर्शक जैसे ही राग-विभोर होता है, 'सीन' में डूबता है, लय बदल जाती है। मधुरता कैसी और कितनी भी हो, देर तक बने रहने पर एकरसता बन जाती है। कहा जा सकता है कि कहानी में 'हू मूव्ड' वाले 'चीज' का ध्यान रखना, नाटककार के लिए भी अच्छा होता है। नाटक में अप्रत्याशित मोड़, बार-बार चमत्कृत करता है, रिमोट से चैनल-बदल के इस दौर की शायद एक आवश्यकता यह भी है, लेकिन पिछले प्रिय के छूट जाने पर नया बेहतर पाने की चाह दर्शक में जगाना और इस चाहत को पूरा कर पाना, नाटककार के लिए चुनौती होती है और यहां इसे बखूबी निभा लिया गया है।

अभिनेता की सब से बड़ी सफलता है, यदि लगे कि नाटक का चरित्र, उसे देख कर गढ़ा गया है, नायक हेमंत का 'अभिनय' इतना ही स्वाभाविक होता है, कि लगता है, वह इस पात्र से अलग कुछ हो ही नहीं सकता। यवनिका पात पर लगभग प्रत्येक दर्शक प्रशंसा भाव सहित फोकलवा को मंच-परे, उसकी वास्तविकता में देखना, देखे पर विश्वास-अविश्वास के द्वंद्व से उबरना चाहता है। इस चरित्र में नाचा के जोक्कड़ की छाप तो है ही, लेकिन यह हंसाने वाला विदूषक-मात्र नहीं, जिम्मेदार व्यंगकार जैसा भी है। छत्तीसगढ़ी की पहली और उस पूरे दौर की सबसे लोकप्रिय वीडियो फिल्म राकेश तिवारी की ही 'लेड़गा ममा' के नायक की झलक भी इस फोकलवा में है। पारंपरिक लोक-नाट्‌य के कलाकारों की सहजता, प्रत्युत्पन्न-मति और प्रतिभा, नाटक में सहज प्रवाहित है। वैसे भी आरंभिक मंचनों में इस नाटक की व्यवस्थित और पूरी लिखित कोई स्क्रिप्ट नहीं थी, शायद अब भी नहीं है, इससे नाटक की अनगढ़ता कभी इसकी कमजोरी लगती है तो कभी मजबूती और इसी से यह संभव होता है कि लगभग एक घंटे के इस नाटक की अवधि घटाई-बढ़ाई जा कर आसानी से आधी-दूनी हो जाती है।

गीत-संगीत, नाटक का प्रबल पक्ष है। पारंपरिक धुनों और गीतों का बेहतरीन इस्तेमाल हुआ है। परम्परानुकूल गणेश-वंदना के साथ करमा, ददरिया, बिहाव-भड़ौनी, राउत, देवार गीतों का प्रसंगानुकूल संयोजन, एक ओर दृश्य-स्थापन में सहायक होता है, नाटक को गति देता है, वहीं छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा की झलक भी दे देता है। 'फोकलवा के फो फो' शीर्षक गीत मन में बस जाने वाला है और नाटक पूरा होने के बाद भी कानों में गूंजता रहता है। यह सब इसीलिए संभव हुआ है कि लोककथा पर आधारित इस नाटक का लेखन, गीत, संगीत, गायन, निर्देशन एक ही व्यक्ति का है।

नाटक की भाषा की बात करें तो इस छत्तीसगढ़ी नाटक का प्रदर्शन दिल्ली में कुछ विदेशी दर्शकों के सामने हुआ, कलकत्ता के पास धुर बंगला दर्शकों ने भी इसे देखा और अन्य भाषा-भाषियों ने भी, लेकिन नाटक पूरा होने के बाद की प्रतिक्रिया ने हर बार तय किया कि इस नाटक की छत्तीसगढ़ी, अन्य को भी सहज ग्राह्य है। इस नाटक के किसी प्रदर्शन में मेरे साथ एक दर्शक, छत्तीसगढ़ी-अपरिचित, ठेठ हिन्दीभाषी थे, उन्होंने इस नाटक का पूरा आनंद उठाया। दो-तीन महीने बाद छत्तीसगढ़ी के सुगम-सुबोध होने की बात पर वे असहमत हुए तो मैंने राजा फोकलवा का जिक्र किया, उन्होंने याद करते हुए मानों खुद से सवाल किया- अच्छा, वह नाटक छत्तीसगढ़ी में था। इस संदर्भ में स्वाभाविक ही नया थियेटर और हबीब तनवीर याद आते हैं। नाचा शैली के उनके कई छत्तीसगढ़ी नाटकों ने भाषाई हर सीमा लांघते हुए देश-विदेश में धूम मचाई थी। यह भी उल्लेखनीय है कि इस नाटक के शुरुआती दौर में अपने रायपुर प्रवास के दौरान हबीब जी ने एक विशेष आयोजन में इसे देख कर, निर्देशक राकेश और नायक हेमंत की पीठ थपथपाई, आंखों में प्रशंसा-भाव की चमक थी लेकिन लगा कि उनके मन में है- काश, यह मैं खेलता।

यह कृति तिवारी जी की बहुमुखी प्रतिभा का सक्षम प्रतिनिधि है। इसकी कहानी मैंने पहले-पहल उन्हीं से सुनी थी और जब उन्होंने बताया कि वे इसे नाटक रूप देने वाले हैं, उनकी प्रतिभा का कायल होने के बावजूद, तब यह मुझे असंभव लगा था, लेकिन नाटक की पहली प्रस्तुति देखने के बाद मेरे लिए तय करना मुश्किल हो गया कि वे बेहतर नाटककार हैं या किस्सागो। संगीतकार, गीतकार, गायक या निर्देशक। इसके बाद मैंने इसकी दसियों प्रस्तुतियां देखी हैं, हर बार उतनी ही जिज्ञासा और रोमांच के साथ। राजा फोकलवा की सौवीं प्रस्तुति होने वाली है, इस मौके पर अब बस इतना कि इसकी शतकीय प्रस्तुति को तो देखना ही चाहूंगा और शायद आगे भी सौ बार देखना मेरे लिए अधिक न होगा।

टीप- 'राजा फोकलवा' नाटक का 100 वां मंचन, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर, रायपुर में आज 22 अगस्‍त 2015 को. इस अवसर पर प्रकाशित स्‍मारिका में मेरा लेख.

Saturday, November 1, 2014

रेरा चिरइ


रेरा चिरइ, रम चूं... चूं... चूं
मोर नरवा तीर बसेरा
रोवत होही गदेला, रम चूं... चूं... चूं
रम चूं... चूं... चूं

सब झन खाइन कांदली
मैं पर गेंव रे फांदली, रम चूं... चूं... चूं
मोला सिकारी उड़ान दे
मोर मुंह के चारा ल जान दे, रम चूं... चूं... चूं

मोर रद्‌दा ल जोहत होही
भुख-पियासे म रोवत होही, रम चूं... चूं... चूं
नई उघरे उंकर रे आंखी
नई जामे हे डेना अउ पांखी, रम चूं... चूं... चूं

बछरू ल गाय पियात हे
ओला देख के सुरता आत हे, रम चूं... चूं... चूं
सुरुज बुड़े बर जात हे
लइकोरहिन लइका खेलात हे, रम चूं... चूं... चूं

सिकारी कहिस रे चिरइया
तंय मोर भूख मिटइया, रम चूं... चूं... चूं
लइका संग हंड़िया उपास हे
तोर काया ले सबके आस हे, रम चूं... चूं... चूं

गरीबी महा दुखदाई
मै काला बतावंव चिराई, रम चूं... चूं... चूं
मैं तोला बेंचे बर जाहूं
बलदा म चाउंर बिसाहूं, रम चूं... चूं... चूं

तोर दुखड़ा ल लइका ल बताहूं
मैं होत बिहाने आहूं, रम चूं... चूं... चूं
फेर मोला बेंच के खा ले
तंय भूख के आगी बुझा ले, रम चूं... चूं... चूं

अंधियार म रेरा भटक गे
गर म कांटा खबस गे, रम चूं... चूं... चूं
भुंइया म गिरे गदेला
रोवत हे माटी के ढेला, रम चूं... चूं... चूं

खोजत सिकारी ह आइस
मरे देख पछताइस, रम चूं... चूं... चूं
गदेला ल छू छू देखय
रेरा ल देख के रोवय, रम चूं... चूं... चूं

नई मारे के खाइस किरिया
मै निच्चट पांपी कोढ़िया, रम चूं... चूं... चूं
अब नांगर बइला बिसाहुं
मै धान कोदो ल जगाहूं, रम चूं... चूं... चूं

अब चहकय रेरा के डेरा
उठावै नांगर के बेरा, रम चूं... चूं... चूं
लइका संग खेलय गदेला
अब नइये कउनो झमेला, रम चूं... चूं... चूं

श्री सनत तिवारी
कैफियत- खरौद के बड़े पुजेरी कहे जाने वाले पं. कपिलनाथ मिश्र का अनूठा काव्यात्‍मक पक्षीकोश ''खुसरा चिरई के ब्याह'' है। छत्तीसगढ़ में पक्षियों पर अन्य रचनाएं भी हैं, इन्हीं में एक लोरीनुमा यह गीत ''रेरा चिरइ'' है। रेरा या सुहेरा छत्तीसगढ़ में बया को कहा जाता है। इस पारंपरिक गीत के कुछ ही शब्द और टूटी-फूटी पंक्तियां मिलती थीं। कभी बातों में बिलासपुर के श्री सनत तिवारी जी ने ''रेरा अउ सिकारी के गोठ'' कविता, पूरे लय और मार्मिकता सहित गा कर सुना दी। मैं चकित रह गया, फिर पंक्तियों को दुहरा कर ध्यान दिया तो संदेह हुआ कि क्या पारंपरिक, पुराना स्वरूप ऐसा ही था। वन-पर्यावरण के प्रति सदैव सजग सनत जी ने सहजता से स्वीकार किया कि गीत कुछ-कुछ ही ध्यान में था, क्योंकि बचपन में दादी-नानी से ''रम चूं... चूं... चूं, रम चूं... चूं... चूं'' बार-बार सुनते नींद आ जाती थी, बाद में अपनी ओर से शब्द और पंक्तियां जोड़ कर यह गीत बनाया है, अब इसे छत्तीसगढ़ी का पारंपरिक गीत कहें या सनत जी की मौलिक रचना, बहरहाल मुझे अत्यंत प्रिय है और सनत जी से सस्वर सुनने का अवसर मिले फिर तो वाह, इसके क्या कहने, एकदम रम चूं... चूं... चूं ... ... ...

इस छत्‍तीसगढ़ी पद्य को पहली बार हिन्‍दी में अनुवाद का प्रयास किया है-

बया चिड़िया कहती है, नाले के पास मेरा बसेरा है, (वहां मेरा) चूजा रो रहा होगा.

सब ने चारा चुगा, (लेकिन) मैं फंदे में पड़ (फंस) गई, शिकारी मुझे उड़ जाने दो, मेरे मुंह के चारा को (ले) जाने दो.

(चूजा) मेरा रास्ता (जोह) देख रहा होगा, भूख-प्यास से रो रहा होगा, (अभी) उसकी आंखें नहीं खुली हैं, पंख-डैने नहीं (उगे) जमे हैं.

बछ्ड़े को गाय (दूध) पिला रही है, उसे देख कर मुझे (अपने बच्चों की) याद आ रही है, सूर्य डूबने जा रहा है, जच्चा बच्चे को बहला रही है.

शिकारी चिड़िया से कहता है, तुम मेरी भूख मिटाने वाली हो, मेरा लड़का हांडी सहित (बिना निवाले के) उपवास है, तुम्हारी काया से (पेट भरने की) सबकी आस है.

गरीबी महा दुखदाई है, मैं किसे बताऊं चिड़िया, मैं तुम्हें बेचने जाऊंगा, बदले में चावल खरीदूंगा.

(‍चिड़िया मोहलत मांगते हुए कहती है) मैं तुम्हारा कष्ट अपने चूजे को बताऊंगी, मैं सुबह होते ही आ जाऊंगी, फिर मुझे बेच कर (चावल) खा लेना, तुम (अपने) भूख की आग बुझा लेना.

(मोहलत पा कर अपने बसेरे के लिए वापस लौटते हुए) अंधेरे में चिड़िया भटक गई, (उसके) गले में कांटा चुभ गया, (उधर) चूजा जमीन पर गिर गया, (वहां अगर कोई रोने को है, तो बस) मिट्टी का धेला रो रहा है.

(चिड़िया के वापस न लौटने पर) शिकारी खोजते हुए आया, (चिड़िया को) मरा देख कर पछताया, चूजे को छू छू कर देखता है, ‍चिड़िया को देख कर रोता है.

(शि‍कारी) शिकार न करने की कसम खाता है, (सोचता है) मैं घोर पापी, आलसी हूं, अब हल-बैल खरीदूंगा, मैं धान-कोदो उपजाऊंगा.

अब बया के घोंसले में चहक (रौनक) है, (शिकारी के) हल उठाने का समय है, चूजा (शि‍कारी के) बच्चे के साथ खेल रहा है, अब कोई झमेला नहीं है.

प्रसंगवश, छत्तीसगढ़ी में शिकारी और चिडि़या के अन्य कई मार्मिक प्रसंग सुनाए जाते हैं, जैसे- ''तीतुर फंसे घाघर फंसे, तैं का बर (या तूं कइसे) फंस बटेर, मया पिरित के फांस म आंखी ल देहें लड़ेर।'' आशय कि शिकारी ने जाल फैलाया, जाल के छेद इतने बड़े थे कि उसमें तीतर और घाघर फंसे, लेकिन छोटी चिडि़या बटेर को भी फंसी देख कर शिकारी पूछता है कि तुम कैसे फंस गई। बटेर जवाब देती है- तुम्हारे जाल में नहीं, बल्कि (जिनके साथ दाना चुग रही थी, उनका साथ निभाने) ममता-प्रीति के फंदे में फंसी आंखें बंद कर पड़ी हूं। 

छत्तीसगढ़ी लोक मन का  'मा निषाद प्रतिष्ठां...' कम मार्मिक नहीं। और ध्यातव्य, 'नैषधीयचरित' में नल द्वारा पकड़ लिये जाने पर हंस कहता है- 
मदेकपुत्रा जननी जरातुरा नवप्रसूतिर्वरटा तपस्विनी। गतिस्तयोरेष जनस्तमर्दयन्नहो विधे त्वां करुणा रुणद्धि नो॥ 
(मैं अपनी माँ की एकमात्र संतान हूँ। मेरी माँ वृद्धावस्था से आकुल है। मेरी हंसिनी ने अभी-अभी चूजे जन्मे हैं। इन दोनों का मैं ही अकेला सहारा हूँ। हे विधाता, ऐसे मुझको मारते हुए क्या तुम्हें करुणा रोक नहीं रही?)