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Friday, January 28, 2022

ताला की विलक्षण प्रतिमा

छत्तीसगढ़ राज्य गठन के अवसर पर मध्यप्रदेश शासन, उच्च शिक्षा विभाग एवं मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी का समवेत उपक्रम, द्विमासिक ‘रचना‘ के अंक-27, नवंबर-दिसंबर 2000 में मुखपृष्ठ पर ताला, अमेरीकांपा, बिलासपुर की प्रसिद्ध प्राचीन प्रतिमा ‘रूद्र शिव‘ का चित्र प्रकाशित हुआ था। अंक के अतिथि संपादक डॉ. राजेन्द्र मिश्र थे। इस अंक के विभिन्न महत्वपूर्ण लेखों में एक लेख ‘ताला की विलक्षण प्रतिमा‘ मुखपृष्ठ के चित्र से संबंधित यानि ताला की इस प्रतिमा पर भी था। इसमें किसी एक मूर्ति पर एकाग्र पुस्तक ‘रिडिल ऑफ इण्डियन आइकनोग्राफी‘ का उल्लेख है, यहां प्रस्तुत लेख डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम ने लिखा है साथ ही उक्त पुस्तक के संपादक के रूप में इस प्रतिमा का परिचय भी उन्होंने पुस्तक में दिया है, जो यहां अंत में प्रस्तुत है। चित्र में दोनों प्रकाशन दृष्टवय हैं। 


सभ्यता के विकास के साथ ही मानव में कलात्मक प्रवृत्तियों का विकास भी स्पष्टतः दृष्टिगत होता है। गायन, वादन, नृत्य, संगीत के साथ-साथ अभिनय, चित्रकला और मूर्तिकला को कलात्मक प्रवृत्तियों के रूप में स्वीकृत किया जाता है। कालान्तर में कला के अन्तर्गत अनेक विषयों को सम्मिलित कर दिया गया और साहित्य में सामान्यतः 64 कलाओं का उल्लेख होने लगा। वात्स्यायन के कामसूत्र में 66 कलाओं का विवरण मिलता है। इसके अन्तर्गत ललित अथवा शिल्प कला के साथ ही दैनिक जीवन, पारम्परिक व्यवसाय आदि से सम्बन्धित विषयों को भी समाहित किया गया है।

कला के विभिन्न रूपों में मूर्तिकला का एक विशिष्ट स्थान रहा है। शिल्प शास्त्रीय परम्परा में मूर्तियों अथवा प्रतिमाओं का उल्लेख मिलता है। सामान्यतः प्रतिमा और मूर्ति में कोई विशेष अन्तर नहीं माना जाता। ‘प्रतिमा‘ शब्द का अर्थ, ‘प्रतिरूप‘ होता है, अर्थात किसी आकृति की प्रतिकृति को प्रतिमा कहा जा सकता है, किन्तु शास्त्रीय परम्परा में प्रतिमा को ‘अर्चा‘ से जोड़ दिया गया है। इस प्रकार प्रतिमा को किसी धार्मिक अथवा दार्शनिक सम्प्रदाय से सम्बन्धित होना आवश्यक माना जाने लगा। मूर्ति के लिए इस प्रकार की बाध्यता नहीं रही। इसीलिए प्रतिमा निर्माण में निश्चित नियमों तथा लक्षणों का पालन आवश्यक होता है, जबकि मूर्ति निर्माण में शिल्पी को अधिक स्वतंत्रता होती है।

भारतीय शिल्प में मूर्ति तथा प्रतिमा निर्माण की दीर्घकालीन परम्परा रही है। कला इतिहास के विद्वानों ने इन प्रतिमाओं की उनके लक्षणों एवं शैलियों के आधार विवेचनाएँ प्रस्तुत की हैं किन्तु कभी-कभी ऐसी विलक्षण प्रतिमाएँ प्राप्त हो जाती हैं, जो पुरातत्ववेत्ताओं और कला-इतिहासज्ञों के लिए समस्या बन जाती हैं, ऐसी ही एक प्रतिमा लगभग ग्यारह वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के बिलासपुर जिले में प्राप्त हुई है।

बिलासपुर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर, मनियारी नदी के तट पर, अमेरी काँपा नामक ग्राम के निकट ‘ताला‘ नामक स्थल पर दो प्राचीन भग्न मंदिर स्थित हैं, जो देवरानी-जेठानी मंदिर के नाम से प्रख्यात हैं। रायपुर-बिलासपुर मार्ग पर भोजपुरी नामक ग्राम से इसकी दूरी लगभग छह किलोमीटर है। जेठानी मंदिर अत्यन्त ध्वस्त अवस्था में है, जबकि देवरानी मंदिर अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। देवरानी और जेठानी मंदिर अपनी विशिष्ट कला के कारण देश-विदेश के कला प्रेमियों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं, मध्यप्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग ने यहाँ समय-समय पर मलबा सफाई तथा संरक्षण का कार्य कराया है। इसी क्रम में भारतीय में प्रशासनिक सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी डॉ. के.के. चक्रवर्ती के मार्गदर्शन में इस स्थल की मलबा सफाई का कार्य, उस समय बिलासपुर में पदस्थ पुरातत्व विभाग के अधिकारी द्वय सर्वश्री जी.एल. रायकवार तथा राहुल सिंह द्वारा कराया गया, जिससे 17 जनवरी 1988 को एक विलक्षण प्रतिमा यहाँ से प्रकाश में आई।

यह विशाल प्रतिमा लगभग 9 फीट ऊँची तथा 5 टन वजनी तथा शिल्प की दृष्टि से अद्भुत है। इसमें शिल्पी ने प्रतिमा के शारीरिक-विन्यास में विभिन्न पशु-पक्षियों का संयोजन किया है। प्रतिमा के शीर्ष भाग में पगड़ीनुमा सर्प-युग्म का अंकन मिलता है। नासिका और आँखों की भौंह का निर्माण उतरते हुए छिपकली सदृश्य प्राणी से किया गया है। मूछों के अंकन में मत्स्य-युग्म प्रयुक्त है, जबकि ठुड्डी का निर्माण कर्क (केकड़ा) से किया गया है। कानों को मयूर-आकृतियाँ सदृश्य चित्रित किया गया है। सिर के दोनों पार्श्वों में फणयुक्त सर्प का चित्रण है। कंधों को मकर-मुख सदृश्य बनाया गया है, जिससे दोनों भुजाएँ निकलती हुई दिखाई देती हैं। शरीर के विभिन्न आंगों में सात-मानव-मुखों का चित्रण मिलता है। वक्ष-स्थल के दोनों ओर दो छोटे मुखों को अंकित किया गया है। उदर का निर्माण एक बड़े मुख द्वारा किया गया है। यह तीनों मुख मूछों से युक्त हैं। जंघाओं में सामने की ओर अंजलिबद्ध दो मुख तथा दोनों पार्श्वों में दो अन्य मुख अंकित हैं। दो सिंह-मुख घुटनों में प्रदर्शित किए गए हैं। उर्ध्वाकर लिंग के निर्माण के लिए मुँह निकाले कच्छप (कछुए) का प्रयोग है। घण्टा की आकृति के अण्डकोष कछुवे के पिछले पैरों से बने हैं। सर्पाे का प्रयोग उदर-पट्ट तथा कटिसूत्र के लिए किया गया है। हाथों के नाखून सर्प-मुख जैसे हैं। बायें पैर के पास भी एक सर्प का अंकन मिलता है।

इस प्रकार की प्रतिमा देश के किसी भाग से नहीं मिली है और न ही शिल्प-शास्त्रों में इसका उल्लेख मिलता है। प्रतिमा के लक्षणों के आधार पर इस सम्बन्ध में निम्नलिखित अनुमान व्यक्त किया जा सकता है:

1. यह प्रतिमा शैव परम्परा से संबंधित प्रतीत होती है। विभिन्न पशु-पक्षियों का चित्रण इसके पशुपति रूप का परिचायक कहा जा सकता है, शिव प्रतिमा के लक्षणों, यथा डमरू, त्रिशूल, नंदी आदि का यद्यपि इसमें अभाव है फिर भी सर्पों की उपस्थिति एवं उर्ध्वाकार लिंग, इसे शैव-परम्परा से सम्बद्ध करता है। 
2. यह प्रतिमा देवरानी मंदिर के प्रवेश-द्वार के निकट से प्राप्त हुई है तथा आकार-प्रकार में द्वारपाल सदृश्य दिखाई पड़ती है, अतः इसके द्वारपाल परम्परा से सम्बन्धित होने का अनुमान किया जा सकता है,
3. विशालकाय शरीर, सिर पर पगड़ी तथा उन्नत उदर के आधार पर यह यक्ष मूर्तियों के सदृश्य दिखाई पड़ती है।

कला-इतिहासकारों ने इस प्रतिमा के विभिन्न पक्षों का अध्ययन करते हुए इसे लकुलीश, रूद्र-शिव, द्वादशमुख-शिव, यक्ष रूप में शिव आदि से समीकृत करने का प्रयास किया है। कुछ विद्वान इसमें तांत्रिक प्रभाव देखते हैं तथा कुछ इसमें अभिचारिक परम्परा का समावेश होने की सम्भावना व्यक्त करते हैं, इस प्रतिमा को लगभग छठवीं शताब्दी ई. के मध्य का माना जाता है। कलाशैली की दृष्टि से इस प्रतिमा की तुलना नागपुर के निकट मांडल से प्राप्त शिव प्रतिमाओं से की जा सकती है, मांडल से चतुर्मुखी, अष्टमुखी एवं द्वादशमुखी शिव प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं किन्तु ताला की प्रतिमा शिल्पांकन एवं प्रतीक की दृष्टि से अद्भुत एवं मौलिक कही जा सकती है। ऐसा प्रतीत होता है कि विभिन्न प्राणियों यथा-जलचर (मछली, मकर आदि), थलचर (सिंह, छिपकली आदि), उभयचर (कछुवा, केकड़ा, सर्प आदि) तथा नभचर (मयूर) का अंकन समस्त चराचर जगत का परिचारक कहा जा सकता है। इसी आधार पर इस प्रतिमा को शिव के ‘विश्व-रूप‘ से अभिज्ञानित करने का प्रयास भी किया गया है।

इस प्रतिमा में अंकित विभिन्न पशु-पक्षियों का अंकन किस उद्देश्य से किया गया है? वर्तमान में निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। इसमें अंकित विभिन्न प्रतीकों का अर्थ निकालने के लिए इतिहासकार एवं पुरातत्ववेत्ता प्रयत्नशील हैं। प्रसिद्ध कला-समालोचक एवं हार्वर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय कला इतिहास के प्रोफेसर डॉ. प्रमोद चन्द्र, जो इस मूर्ति की खोज के समय ताला में उपस्थित थे, ने विचार व्यक्त किया है कि यह प्रतिमा कला-इतिहासकारों के लिए कम से कम एक शताब्दी तक समस्या बनी रहेगी। भारतीय कला के देश-विदेश के अध्येता इस प्रतिमा के रहस्य की खोज में लगे हुए हैं। इन पंक्तियों के लेखक के सम्पादन में एक पुस्तक ‘रिडिल ऑफ इण्डियन आइकनोग्राफी‘ का प्रकाशन हुआ है, जिसमें विश्व के पन्द्रह अध्येताओं ने अपने विचार व्यक्त किए हैं। किसी एक मूर्ति पर केन्द्रित एकाग्र प्रकाशन पहली बार किया गया है। यद्यपि इस अध्ययन से इस मूर्ति के अभिज्ञान की दिशा में नए आयाम मिले हैं तथापि अन्तिम निष्कर्ष अभी तक नहीं निकल पाया है।

प्रतिमा के अभिज्ञान तथा प्रतीकों के संबंध में भले ही मतभेद हों किन्तु इस तथ्य में कोई सन्देह नहीं है कि शिल्पी ने मूर्ति के संयोजन में अपनी मौलिक कल्पना का अद्भुत परिचय दिया है और साथ ही भारतीय परम्परा के विभिन्न आयामों को समेकित रूप में प्रदर्शित करने का अनोखा प्रयास भी किया है। 

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The image under discussion is 2.70 metre in height and approximately five tonnes in weight. This two-armed image standing in samapāda posture is massively built with emphasis on muscular strength. It has unusual iconographic features depicting various animals alongwith human and lion heads components. The description of the image is interesting enough. A turban made of a pair of snakes. The serpent is probably a favourite depiction of the artist. Therefore, the waist band and finger nails are also designed like snake. Apart from these, a pair of serpent-hood figures on either side of the head above the shoulders. A snake is also shown entwining the left leg. Among other animals, peacock is depicted ornamenting ears. Eyebrows and nose are made of a descending lizard. Eyelash are either in the pattern of an open mouth of a frog or the mouth of a roaring lion. Two figures of fish form moustaches of the image alongwith the upper lip, while the lower lip and the chin are shaped like a crab. Both the shoulders have depiction of makara (crocodile). Seven human heads as body are engraved in various parts of the body. Of these a pair of small heads may be seen on either side of the chest. A bigger face forms the abdomen. These three faces have moustaches. Each thigh consists of a pair of heads of which two smiling faces are carved on the front side in añjali-baddha posture, while the other two are carved on sides. Heads of lion are depicted on each knee. The ūrdhvamedhra (penis-erectus) is made of head and neck of a tortoise. Two bell-like testicles are designed as forelimbs of the same animal. The legs of the icon are formed in the shape of elephant's legs.

प्रसंगवश- धमनी, चकरभाठा निवासी पं. अजय शर्मा का ताला से घनिष्ठ लगाव रहा है, उनमें काव्य प्रतिभा तो है ही, लोकमन के भावों को सहज अभिव्यक्त करने का कौशल भी है, उनकी काव्य पुस्तिका ‘गाथा बगरे नता‘ में एक तरह से इस प्रतिमा से अपना नाता रेखांकित किया है-

रूद्र शिव सिंगार
(तालागांव)

भोलेबाबा, भोलेबाबा, तोर लीला अपरमपार।
तालागांव म खड़े, जीव जंतु के करे सिंगार।।

रूद्र रूप के बाना म, तय महा बिकराल।
भक्त रक्षा करथस, बारो मास आठो काल।।

उँगरी म पहिरे, नाग लोक के कतको सांप।
दरसन भर म, तनधारी के, भसम होथे पाप।।

नाक भऊँ छिपकिल्ली, पूँछी तिलक लगाये हस।
बिखहर राज के बांधे पागा, अद्भुत रूप बनाये हस।।

दुनो कान म, होके मस्त, नाचय मन मजूर।
हमरो सुन ले बबा, कर दे जमो दुःख दूर।।

खांध म बईठे मंगरा, मच्छरी के मेंछा अईठे।
जऊन रूप म भजथे तोला, दिखथस तेला तईसे।।

हिरदय म मनखे, पेट हवय महाकाल।
जेती देखबे तोर रूप, हवय बिकराल।।

थोथना म केकरा ओरमे, झपकी मारथे बेंगवा।
कऊँवा, गरूड़, कम्मर ओरमे, माड़ी गरजथे बघवा।।

कुकरी अड़वा के बट बट ले आंखी लक-लक लउकथे।
पहिली कोन आईस, घट घट वासी पूछत हे।।

नारी महिमा हवय अपार तोर गोदी म पाथे दुलार।
तंय ओला अइसे संवारे, उही बने हे श्रृष्टि अधार।।

अवतारी कच्छप ल लिंग रूप बइठारे।
आदि अनादि के संघरा पूजा बने जोग बइठारे।।

तालागांव के रूद्रशिव, तंय अद्भुत रूप धरे।
जल, थल नभचर के सिंगारी, विश्व रूप तय धरे।।

Saturday, September 25, 2021

छत्तीसगढ़ का पुरातत्व - 1986

मध्यप्रदेश की स्थापना के तीन दशक अवसर पर 1 नवंबर 1986 को प्रकाशित इस पत्रक का आलेख डा. लक्ष्मीशंकर निगम का है। ऐसे अवसरों पर आयोजन के साथ इस तरह की प्रकाशित सामग्री स्थायी महत्व की, अतएव सदैव प्रासंगिक होती हैं, किंतु सहज उपलब्ध नहीं होती, इस दृष्टि से यहां प्रस्तुत की जा रही है। यह भी उल्लेखनीय है कि उस दौर में पुरातत्व-संग्रहालय की गतिविधियों पर विशेषज्ञों, रुचि रखने वालों की निगरानी, टीका-टिप्पणी और सक्रिय निःशर्त अपेक्षारहित सहयोग विभागीय अधिकारियों को मिलता था। डॉ. विष्णुसिंह ठाकुर, डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम जैसे पुराविद, इतिहासकार डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र तथा छत्तीसगढ़ के इतिहास, साहित्य, संस्कृति के जानकार हरि ठाकुर जैसी विभूतियां विभागीय कार्यालय-संग्रहालय के नियमित संपर्क में रहते, विभागीय अधिकारियों के मान-सम्मान के पात्र होते थे।

छत्तीसगढ़ का पुरातत्व

मध्यप्रदेश के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में स्थित रायपुर, बिलासपुर और बस्तर संभाग का क्षेत्र छत्तीसगढ़ के नाम से प्रख्यात है। इस भू-भाग का अधिकांश हिस्सा (पूर्व बस्तर रियासत को छोड़कर) तथा पश्चिमी उड़ीसा का क्षेत्र दक्षिण कोसल के नाम से प्रसिद्ध था। भारतीय इतिहास, संस्कृति एव पुरातत्व के क्षेत्र में दक्षिण कोसल का स्थान महत्वपूर्ण रहा है। इस अंचल के पुरातत्व के विषय में उस समय से जानकारी मिलती है, जब मानव-सभ्यता का पर्याप्त विकास नहीं हुआ था तथा मनुष्य पशुओं की भांति जंगलों, पर्वतों और नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में जीवन व्यतीत करता था। अन्य प्राणियों से बुद्धि में श्रेष्ठ होने के कारण मानव ने पत्थरों को नुकीला बनाकर उसे उपकरण (हथियार) के रूप में प्रयुक्त करना प्रारम्भ किया, जिससे भोजन सरलतापूर्वक प्राप्त कर सके। पाषाण के प्रयोग के कारण, यह युग पाषाण-काल के नाम से सम्बोधित किया जाता है। विकास की अवस्था के आधार पर इसे तीन भागों में विभाजित किया जाता है- (१) पूर्व-पाषाण काल, (२) मध्य-पाषाण काल एवं (३) उत्तर-पाषाण काल। पूर्व-पाषाण युग के उपकरण महानदी घाटी तथा रायगढ़ जिले के सिंघनपुर से प्राप्त हुए हैं। मध्य-पाषाण युग की सामग्री रायगढ़ जिले से ही कबरा पहाड के निकट से तथा उत्तर पाषाण काल के औजार महानदी घाटी बिलासपुर जिले के धनपुर, सिंघनपुर आदि स्थलों से मिले हैं। हाल के वर्षों में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण एवं मध्यप्रदेश संग्रहालय विभाग द्वारा बस्तर जिले के अनेक प्रागैतिहासिक स्थलों की खोज की गई है। पाषाण काल के पश्चात् नव-पाषाण काल आता है। इससे सम्बन्धित अवशेष दुर्ग जिले के अर्जुनी तथा नांदगांव, रायगढ़ जिले के टेरम तथा बस्तर जिले में मिलते हैं। इस काल में मानव, सभ्यता की दृष्टि से विकसित हो चुका था तथा उससे कृषि-कर्म, पशुपालन, गृह निर्माण तथा बर्तनों का निर्माण करना सीख लिया था।

पाषाण युग के पश्चात् ताम्र और लोह युग आता है। इस काल की सामग्री का छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अभाव है किन्तु निकटवर्ती बालाघाट जिले के गुंगेरिया नामक स्थान में ताम्बे के औजारों का एक बड़ा संग्रह सन १८७० में प्राप्त हुआ था। लौह-युग में शव को गाड़ने के लिये बड़े बड़े शिलाखण्डों का प्रयोग किया जाता था, अतएव इन्हें महापाषाण स्मारक के नाम से सम्बोधित किया जाता है। दुर्ग जिले के कन्हीभण्डार, चिरचोली. मजगहान एवं सोरर से इस काल के पाषाण घेरों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसी जिले के कबराहाट नामक स्थल से पाषाण घेरे के साथ लोहे के औजार एवं मृण्मयभाण्ड (मिट्टी के बर्तन) मिले हैं। दुर्ग जिले के धनोरा नामक स्थल में ५०० महापाषाणीय स्मारक स्थित हैं: इस स्थान में सन् १९५६-५७ में मध्यप्रदेश शासन द्वारा उत्खनन शासन कराया गया था।

प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य, जब पर्वत की कन्दराओं में निवास करता था, तब उसने कन्दराओं में अनेक चित्र बनाए थे जो उसके कलाप्रिय होने के प्रमाण हैं। इस प्रकार के चित्र रायगढ जिले के सिंघनपुर, कबरा पहाड़, ओंगना, बसनाझर, करमागढ़ लेखामाडा, राजनांदगांव जिले के चितवा डोंगरी तथा बस्तर जिले के गुपनसार आदि स्थलों में प्राप्त हुए हैं।

आर्यों के आगमन के साथ ही भारतीय इतिहास में वैदिक युग प्रारम्भ होता है। इस काल की सामग्री का छत्तीसगढ़ क्षेत्र में अभाव है। रामायण, महाभारत तथा पौराणिक कथानकों से संबंधित अनेक स्थलों के विवरण यहां मिलते हैं। लगभग छठवीं शताब्दी ई.पू. में उत्तर भारत सोलह महाजनपदों में विभाजित था। इस काल के विवरण इस क्षेत्र में उपलब्ध नहीं हैं किन्तु तारापुर और आरंग से प्राप्त आहत मुद्राओं (punch marked coins) से स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में नन्द-मौर्य काल के पूर्व, एक पृथक सत्ता स्थापित थी।

मौर्यकालीन पुरातात्विक सामग्रियों में सरगुजा जिले के रामगढ़ की पहाड़ियों में स्थित सीताबेंगा और जोगीमारा नामक गुफाएं अत्यन्त महत्वपूर्ण कही जा सकती है। यहां अशोककालीन ब्राह्मी लिपि में सुतनुका नामक देवदासी तथा उसके कलाकार प्रेमी देवदत्त का उल्लेख है। यहीं भारत की प्राचीनतम् नाट्य शाला भी स्थित है जो पर्वत को खोदकर बनाई गई है। मौर्य-काल की मुद्राए बिलासपुर जिले के अकलतरा /अकलसरा और ठठारी से प्राप्त हुए हैं।

मौर्यों के पश्चात् छत्तीसगढ़ का क्षेत्र संभवतः सातवाहनों के अधिकार क्षेत्र में आ गया था। शिवश्री आपिलक नामक सातवाहन राजा की ताम्र मुदाएं यहां प्राप्त हुई हैं। इसके अतिरिक्त सातवाहन मुद्राओं की अनुकृति में अनेक ताम्बे के सिक्के भी मिलते हैं। सातवाहनकालीन सामग्रियों में बिलासपुर जिले के किरारी नामक स्थान से प्राप्त काष्ठस्तंभ लेख तथा सक्ती के निकट गंुजी (ऋषभ तीर्थ) स्थित कुमारवरदत्त का शिलालेख महत्वपूर्ण माना जा सकता है। चीनी यात्री युवान-च्वांग ने भी यहां के सातवाहन राजा तथा उसके राज्य में रहने वाले भिक्षु नागार्जुन का उल्लेख किया है। बिलासपुर जिले के बुढ़ीखार से एक लेखांकित प्रतिमा मिली है। यह प्रतिमा भारत की प्राचीनतम वैष्णव प्रतिमा स्वीकृत की जाती है। सातवाहन काल में भारत का व्यापार रोम से अत्यन्त विकसित था। संभवतः इसीलिए छत्तीसगढ़ क्षेत्र से अनेक रोमन स्वर्ण मुद्राएं भी प्राप्त हुई हैं।

सातवाहनों के पश्चात भारतीय राजनीति में शक कुषाण आदि विदेशी जातियों का वर्चस्व स्थापित हो गया। छत्तीसगढ़ में इनके अधिकार संबंधी विवरण उपलब्ध नहीं है, फिर भी इनके ताम्बे के सिक्कों की प्राप्ति यहां हुई है। बिलासपुर जिले के पेन्डरवा नामक स्थान से कुषाण सिक्कों के साथ यौधेयगण का एक ताम्बे का सिक्का मिला है।

इसके पश्चात भारतीय इतिहास में स्वर्ण-युग के नाम से विख्यात गुप्त-काल आता है। समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति से ज्ञात होता है कि उसने दक्षिण कोसल के राजा महेन्द्र तथा महाकान्तार (बस्तर) के राजा व्याघ्रराज को पराजित किया तत्पश्चात् उनका राज्य वापस कर दिया। इस प्रकार उनका प्रभाव इस क्षेत्र में स्थापित हो गया। गुप्तकाल की नौ स्वर्ण मुद्राएं दुर्ग जिले के बानबरद नामक स्थल से मिली हैं। इसमें काच, चन्द्रगुप्त द्वितीय तथा कुमार गुप्त प्रथम की मुद्राएं हैं। कुमारगुप्त प्रथम का चांदी का एक सिक्का आरंग से मिला है। गुप्तों के समकालीन वाकाटक नरेश नरेन्द्रसेन का एक अधूरा ताम्रपत्र भी दुर्ग से प्राप्त हुआ है।

गुप्त तथा गुप्तोत्तर काल में इस क्षेत्र में गुप्त वाकाटक वंशों का प्रभाव रहा किन्तु यहां की सत्ता स्थानीय राजवंशों द्वारा संचालित होती थी। यहां नल, राज्यर्षितुल्यकुल, शरभपुरीय, पाण्डुवंशीय शासकों का राज्य रहा। नलवंश का प्रमुत्व मुख्यतः बस्तर क्षेत्र में था इसका संघर्ष वाकाटक राजाओं से था। इस वंश के कुल चार अभिलेख मिले हैं। बस्तर जिले के एडेन्गा एवं दुर्ग जिले के कुलिया नामक स्थानों से प्राप्त उभारदार (repousse) मुद्राओं से इस वंश के पांच राजाओं यथा- वराहराज, भवदत्तवर्मन, अर्थपति, नन्दनराज एवं स्तंभ के विषय में जानकारी मिलती है। इसके अतिरिक्त राजिम से प्राप्त एक ताम्रपत्र में इनकी परवर्ती शाखा के विषय में जानकारी मिलती है।

राज्यर्षितुल्यकुल के राजा भीमसेन द्वितीय का आरंग से प्राप्त एकमात्र ताम्रपत्र ज्ञात है।

शरभपुरीय नाम, इस वंश के संस्थापक शरभ तथा उसकी राजधानी शरभपुर के आधार पर दिया गया है। शरभपुर का अभिज्ञान अभी तक नहीं हो सका किन्तु अधिकांश विद्वानों का मत है कि यह रायपुर-बिलासपुर क्षेत्र में स्थित रहा होगा। शरभ का उत्तराधिकारी नरेन्द्र हुआ। इसके पश्चात् प्रसन्न नामक राजा का उल्लेख परवर्ती अभिलेखों में मिलता है। इसमें स्वर्ण, रजत एवं ताम्बे की उभारदार मुद्राएं प्राप्त हुई हैं जिससे इसका पूरा नाम प्रसन्नमात्र ज्ञात होता है। प्रसन्नमात्र के सिक्कों के सदृश्य महेन्द्रादित्य और क्रमादित्य की भी स्वर्ण मुद्राएं मिलती हैं। इसके प्रचलनकर्ता स्थानीय शासक थे अथवा गुप्त सम्राट, इस विषय में विद्वानों में मतभेद है। शरभपुरीय शासकों की द्वितीय राजधानी कालान्तर में श्रीपुर (वर्तमान सिरपुर, जिला-रायपुर) हो गई। बाद में यह पूर्ण राजधानी में परिवर्तित हो गई। शरभपुरीय स्मारकों का निश्चित अभिज्ञान नहीं हो सका है। किन्तु बिलासपुर जिले के ताला में स्थित देवरानी एवं जेठानी मंदिर इस काल के प्रतीत होते हैं। मध्यप्रदेश पुरातत्व एवं संग्रहालय संचालनालय द्वारा इस स्थान के सफाई तया संरक्षण का कार्य विगत वर्षों कराया गया है, जिससे अनेक महत्वपूर्ण पुरातात्विक सामग्रियां मिली हैं।

शरभपुरियों के पश्चात छत्तीसगढ़ क्षेत्र पाण्डुवंशीय अथवा सोमवशीय शासकों के आधीन आया। यह काल छत्तीसगढ़ के इतिहास का स्वर्ण-काल माना जा सकता है। इस वंश की राजधानी सिरपुर में स्थित थी। महाशिवगुप्त बालार्जुन इस वंश का यशस्वी राजा था। पाण्डु-काल के अनेक अभिलेख, स्मारक एंव मंदिर इस क्षेत्र में मिलते हैं। सिरपुर का ईटों द्वारा निर्मित लक्ष्मण मंदिर इस काल की अनुपम कृति है। इसके अतिरिक्त गंधेश्वर मंदिर का निर्माण भी इसी काल में हुआ था। सिरपुर में उत्खनन कायं १९५३-५४ में सागर विश्व विद्यालय तथा १९५४-५५ एवं ५५-५६ में मध्यप्रदेश शासन द्वारा कराया गया, जिससे पंचायतन शैली का शिवमंदिर एवं दो बौद्ध बिहार और सैकड़ों मूर्तियां एवं पुरातात्विक सामाग्री प्राप्त हुई है। सिरपुर से प्राप्त धातु प्रतिमाएं न केवल छत्तीसगढ़ वरन् सम्पूर्ण भारत की महत्वपूर्ण कलाकृति के रुप, स्वीकृत हैं। सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर की शैली के ईटों के मंदिर की परम्परा लगभग ३०० वर्षों तक चलती रही। खरौद, पुजारीपाली, धोबनी, पलारी आदि स्थलों में प्राप्त मंदिरों से इसकी पुष्टि होती है।

छत्तीसगढ़ में पाण्डुवंशियों के पश्चात रतनपुर कलचुरियों, कवर्धा तथा चक्रकोट के नाग तथा कांकेर के सोमवंशियों का शासन रहा। इसमें कलचुरी प्रमुख सत्ता थी। कलचुरियों की प्रारंभिक राजधानी बिलासपुर जिले के तुम्माण में थी कालान्तर में यह रत्नपुर (वर्तमान रतनपुर) में स्थानांतरित हो गई। इस वंश के अनेक अभिलेख, मुद्राएं तथा स्मारक छत्तीसगढ़ में मिलते हैं। कलचुरी अभिलेखों का सम्पादन डा. व्ही. व्ही. मिराशी द्वारा किया गया है। इस वंश के जाजल्लदेव प्रथम की स्वर्ण एवं ताम्र; रत्नदेव द्वितीय की स्वर्ण, रजत और ताम्र तथा प्रतापमल्ल की सिर्फ ताम्बे की मुद्राएं ज्ञात हैं। कलचुरी तथा समकालीन राजवंशों से संबंधित मंदिर एवं प्रतिमाएं रायपुर जिले के राजिम, नारायणपुर, आरंग, सिहावा, खल्लारी; बिलासपुर जिले के तुम्माण, रतनपुर, मल्लार, सलखन, शिवरीनारायण; जांजगीर, कोटगढ़, सरगांव, अडभार; दुर्ग जिले देवबलौदा एवं सोरर; राजनांदगांव जिले के भोरमदेव, घटियारी, गंडई और बस्तर जिले के नारायणपाल बारसूर एव भैरमगढ़ में स्थित हैं। इन स्थानों में शैव, वैष्णव. शाक्त तथा जैन धर्म से सम्बंधित कलात्मक देवालय एवं प्रतिमाएं उपलब्ध हैं। कलचुरियों के पश्चात् छत्तीसगढ़ क्षेत्र मराठों तथा कालान्तर में ब्रिटिश शासन के अधिकार में आ गया।

छतीसगढ़ की पुरातत्व सम्पदा का एक बड़ा संग्रह रायपुर के महन्त घासीदास स्मारक संग्रहालय में संरक्षित है। विगत वर्षों में मध्यप्रदेश शासन द्वारा बिलासपुर में एक संग्रहालय की स्थापना की गई है। यहां की पुरातात्विक सम्पदा के संरक्षण के लिए शासन सतत प्रयत्नशील है अनेक स्मारकों को राज्य शासन द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका है तथा यह क्रम अभी भी जारी है।

पुरातत्व एवं संग्रहालय, मध्यप्रदेश, रायपुर द्वारा प्रकाशित तथा शि. बे. औ सह. संस्था द्वारा मुद्रित। आलेख- डा. लक्ष्मीशंकर निगम।

Friday, September 17, 2021

सिरपुर उत्सव-1985

4 मई 1985 को बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर, महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, रायपुर में सिरपुर उत्सव का आयोजन हुआ था। इसका एक हासिल‘Source Materials on Sirpur‘ संकलन था। यह कार्य तत्कालीन मध्यप्रदेश के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के रायपुर पदस्थ प्रतिनिधि, संग्रहाध्यक्ष सलीमुद्दीन जी के माध्यम से लक्ष्मीशंकर निगम जी द्वारा तैयार किया गया था।

इसमें सिरपुर के पुरातत्व से संबंधित महत्वपूर्ण प्रकाशित अंश एकत्र किए गए हैं, इसलिए यह एक स्थायी महत्व का संदर्भ-संकलन है। संसाधनों की सीमा के अनुरूप 280 पेज की सामग्री की छायाप्रति के इस संग्रह की सीमित प्रतियां ही तैयार कराई गई थीं। श्री निगम की गंभीर शोध-दृष्टि, छत्तीसगढ़ के पुरातत्व, कला-संस्कृति के प्रति स्वयं के उत्तरदायित्व और उद्यम का यह एक उदाहरण है।

इस संकलन के लिए श्री निगम द्वारा लिखा आमुख उल्लेखनीय, अतएव यहां शब्दशः प्रस्तुत है। आमुख में आशा व्यक्त की गई है कि यह संकलन दक्षिण कोसल की कला संस्कृति, और खास कर सिरपुर में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी होगा। इस संकलन के प्रविष्टियों की सूची शोधार्थियों, अध्येताओं और सिरपुर में गंभीर रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी होगी, प्रस्तुत है।

SOURCE MATERIAL ON SIRPUR

PREFACE

Sirpur is a one of the most important site of ancient Dakshina Kosala (roughly covering the area of present Chhattisgarh) region. It was capital of Dakshina Kosala during the period of Sarabhapuriya and Somavansis dynasties (5th-7th Cent. A.D.) and was known as Sripur evidentiy proved by the inscriptions. During the rule of Somavamsis King Mahasivagupta Balarjuna, it became a famous centre of Art and Culture. Mahasivagupta, himself was follower of Saivism but all other religious sects such as Vaisnavism, Saktism, Buddhism and Jainism flourished during his reign and an atmosphere of religious harmony and coordination was created. Thus this period may be considered as a "Golden Age" in the history of Chhattisgarh. The famous Lakshman temple was constructed by the mother queen Vasata, who was thedaughter of King Suryavarma of Magadha, during the rule of Mahasivagupta. Lakshman temple is one of the finest example of ancient brick temple architecture and having the influence of Gupta art. Renouned art critic and scholar Dr. A.K. Coomarswamy says, "No sharp line of division can be drawn between late Gupta Art and that of early seventh century. The brick temple of Lakshman at Sirpur, Raipur District, however, One of the most beautiful in all India, may perhaps be assigned to the reign of the Harsh." (Indian and Indonesian Art, P.93). Another important art treasure of Sirpur is its Bronzes", which are best example of the workmanship ofKosalan Art. These bronzes have been exhibited in various national and international festivals and exhibitions as the representative art of India.

The archeological wealth of Sirpur, thus attracted the attention of State Government and an excavation was conducted in the years 1953, 54 and 55 under the supervision of (late) Dr. M.G. Dikshit. By these excavations, one Saiva temple, two Buddhist monasteries and large number of archeoloical materials, are came into light.

After a quite long period, this place has again attracted the attention of people when the Directorate of Archaeology and Museum, Madhya Pradesh, has decided to celebrate "SIRPUR UTSAV" at M.G.M. Museum, Raipur on Buddha Jayanti, 4th May, 1985. It has been observed that materials on Sirpur are quite a 1arge but scattered, therefore it is not easily available to the young scholars and person interested in the subject. Therefore it is decided to collect all published material at one place and work should be completed before the Sirpur Utsav. Certainly it was a quite tedious task. We have tried our best to include all published references in present volune, "SOURCE MATERIALS ON SIRUR" but due to shortage of time and certain limitations, we have no option to leave some original source materials. We could not include materials even on Polity, Society, and Religion etc. Actually these aspects may be studied through the original sources. So far the inscriptions are concerned, we have included, only those inscriptions which are found at Sirpur itself. Thus, we are aware with incompleteness of this volume and feel regret for the same. Even then we are hopeful that this volume will be useful for the persons who are interested on the Art and Culture of Dakshina Kosala in general and on Sirpur in particular.

At the last we express our thanks to Mr. S.P. Bajpai, I.A.S. Director, Archaeolog y and Museum, Madhya Pradesh, for sanctioning the grant for Utsav. We also acknowledge our thanks to Mr. Ranbir Singh, I.A.S., Collector, Raipur who has taken keen interest in this volume.

(L.S. Nigam)
Buddha Jayanti,
4th May, 1985.

CONTENTS

(A) GENERAL / SURVEY REPORTS:
(1) A.S.I.R., Vol. VII By J.D. Beglar
(2) A.S.I.R., Vol. XVII By A.Cunnigham
(3) Antiquarian Remains in Central Province and Berar by H,Cousens
(4) Progress Report, A.S.I. W.C.103-04 By H. Cousens
(5) Ancient Brick Temples in the Central Provinces By-A.H. Longhust in A.R; A.S.I. 1909-10
(6) Mukhalingam Temple, Sirpur and Rajim Temples By-Douglas Barratt Moreshwar G. Dikshit
(7) Raiur District Gazetteer, Ed. R. Verma
(8) रायपुर रश्मि, गोकुल प्रसाद
(9) खण्डहरों का वैभव, मुनि कांतिसागर
(10) मध्यप्रदेश के कला मण्डप, जगदीशचन्द्र चतुर्वेदी

(B) EXCAVATION AND EXPLORATION:
(1) Indian Archaeology, 1953-54, A Review
(2) Indian Archaeology 1954-55 A Review
(3) Indian Archaeology, 1955-6 A Review
(4) "Excavation at Sirpur by S.L. Katare in I.H.Q, Vol. XXXV
(5) Indian Archaeology, 1960-61, A Review
(6) "Three centuries of Sirpur Revealation by excavation" by A.P. Singhal in Prachya- Pratibha,Vol. V, No. I.
(7) ‘‘सिरपुर की खुदाई: बौद्ध संस्कृति की झलक‘‘, मोरेश्वर गं. दीक्षित, प्रगति, जनवरी-फरवरी 1956
(8) ‘‘सिरपुर में उपलब्ध प्राचीन अवशेष‘‘, मोरेश्वर गं. दीक्षित, शुक्ल अभिनंदन ग्रंथ
(9) मध्यप्रदेश के पुरातत्व का संदर्भ ग्रंथ, राजकुमार शर्मा

(C) EPIGRAPHY AND NUMISATIC:
(1) "Sirpur stone Inscription of the time of Mahasivagupta" by Hiralal in E.I, Vol. XI
(2) "Senakapat Inscription of the time of Sivagupta Balarjuna" by M,G. Dikshitt D.C.Sircar in E.I. Vol. XXXI
(3) "Sirpur Inscription of the time of Balarjuna", by M.G.Dikshit in E.L, Vol. XXXI.
(4) "Sirpur Plates of Mahasudevaraja year:7 by S.L.Katare, in E.I.Vol. XXXI
(5) Sirpur Gandhesvara Temple Inscription by S.L,Katare in I.H.Q., Vol. XXXIII
(6) "Sirpur Inscription of Acharya Buddhaghosha" by B,C.Jain in E.I., Vol. XXXVIII
(7) Other Inscriptions from Sirpur by L.S.N.
(8) "Coins from Sirpur" by L.S.N.

(D) ART AND ARCHITECTURE:
(1) "Some Buddhist Bronzes from Sirpur, Madhya Pradesby M,G.Dikshit in Prince of Walse duseum Bulletin, No.5
(2) Indian Architecture (Buddhist Hindu) by percy Brown.
(3) Lakshman Temple at Sirpur by Kishna Deva in J.M.P.I.P. Vol, IL.
(4)The Art of Gupta India, Empire Province by Jonna Gottfried Williams.
(5) म.घा.स्मा.संग्रहालय, रायपुर, पुरातत्व उपविभाग में संग्रहित वस्तुओं का सूचीपत्र, भाग-3, धातु प्रतिमाएं, ले. बालचन्द्र जैन
(6) ‘‘शिव नटराज की विलक्षण कृति‘‘ एस.एस.यादव, प्राच्य प्रतिभा, अंक-11

(E) MISCELLANEOUS:
(1) 5000 Years_Art from India Villa Hugel Essen.
(2) Catalouge, 2500th Buddha Jayanti Celebration, 1956 Exhibition on Buddhist art.
(3) In the image of man, Festival of India, Great Britain. 1982.
(4) Historical Geography of Madhya Pradesh by P.K. Bhattacharya.
(5) दक्षिण कोसल का ऐतिहासिक भूगोल, लक्ष्मीशंकर निगम

कहना आवश्यक नहीं, फिर भी कहना है कि इस पूरे संकलन का प्रकाशन कर, सार्वजनिक किये जाने की आवश्यकता, उपयोगिता समय के साथ बढ़ गई है।

इसी अवसर पर तत्कालीन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (पुरातत्व), श्री एस. एस. यादव द्वारा सिरपुर पर छोटी सी मार्गदर्शिका तैयार की गई थी, जिसका प्रकाशन जिला पुरातत्व संघ, रायपुर द्वारा किया गया था। पुस्तिका में श्री रणबीर सिंह, कलेक्टर एवं डिस्टिृक्ट मजिस्ट्रेट का संदेश दिनांक 23.4.1985 तथा दिनांक 17.4.1985 को रायपुर प्रवास पर आए डॉ. प्रमोदचन्द्र, बिकफोर्ड प्रोफेसर आफ इंडियन आर्ट, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी एवं पुरातात्विक सलाहकार, संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश शासन का संदेश है।

इस मार्गदर्शिका के परिशिष्ट-3 में आई सूची उपयोगी है, इस प्रकार है-

संदर्भ - ग्रंथ सूची
१. कटारे - एक्सकेवेशन एट सिरपुर, ई. हि. क्वा. १९५९.
२. कनिंघम ए. - आकिलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया वाल्यूम-७, देहली-१९६९
३. गुप्त, परमेश्वरी लाल - भारतीय वास्तुकला, वाराणसी, १९७७
४. जैन, बालचन्द्र - उत्कीर्ण लेख, रायपुर, १९६२
५. जैन, बालचन्द्र - धातु प्रतिमाएं, रायपुर, १९६०
६. जैन, बालचन्द्र - पाषाण प्रतिमाएं, रायपुर, १९६०
७. ठाकुर, डॉ. विष्णु सिंह - राजिम, भोपाल, १९७२
८. दीक्षित, एम. जी.- मुखलिंगम.
९. ब्राऊन परसी - इन्डियन आर्किटेक्चर, भाग-१, बम्बई, १९७६
१०. मिश्र डॉ. रमानाथ- भारतीय मूर्तिकला, देहली, १९७७
११. मुनि कान्तिसागर- खण्डहरों का वैभव.
१२. शर्मा, डॉ. राजकुमार- म.प्र. के पुरातत्व का संदर्भ ग्रन्थ, भोपाल, १९७४
१३. शुक्ल अभिनन्दन ग्रन्थ - म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन
१४. शुक्ल, द्विजेन्द्रनाथ - भारतीय स्थापत्य.
१५. हीरालाल रायबहादुर - इन्सक्रिप्सन्स इन दि सेन्ट्रल प्रोविन्सेस एण्ड बरार, नागपुर, १९५२
१६. ई.आ.रि., १९५३, १९५४-५५, १९५५-५६ .
१७. प्रगति, म.प्र. शासन - १९५६.
१८. प्राच्य प्रतिभा, वाल्यूम-५, १९७७
१९. म.प्र. पुरातत्व अंक - १३ जून, १९७०.
२०. म.प्र. संदेश, पुरातत्व विशेषांक - २३ जून, १९७०.
२१. रायपुर रश्मि, रायपुर डिस्ट्रिक्ट गजेटियर - १९२५

Friday, August 27, 2021

देवबलौदा - लक्ष्मीशंकर

देवबलौदा का कलचुरि कालीन शिव मंदिर
लक्ष्मीशंकर निगम

रायपुर और भिलाई के मध्य स्थित एक छोटा सा रेल्वे स्टेशन है, ‘चरौदा देवबलौदा‘। चरौदा रेल्वे का विस्तृत यार्ड है, किन्तु देवबलौदा निकटस्थ स्थित एक ग्राम का नाम है। देव बलौदा का छत्तीसगढ़ के कला एवं स्थापत्य में महत्वपूर्ण स्थान है। यहां एक छोटा, किन्तु अत्यंत कलात्मक कलचुरि कालीन शिव मन्दिर स्थित है। रायपुर-भिलाई मार्ग पर, चरौदा से २-३ किलोमीटर पहले दक्षिण की ओर रेल्वे मार्शलिंग यार्ड हेतु मार्ग है। इसी मार्ग से लगभग ३ किलोमीटर जाने पर देव बलौदा पहुंचा जा सकता है।

देव बलौदा के इस प्राचीन मन्दिर के निर्माण से सम्बंधित अनेक किवदन्तियां प्रचलित हैं। इस कथा के अनुसार देव बलौदा और आरंग का मन्दिर एक ही स्थपति (Architect) द्वारा निर्मित किया गया था। जब दोनों मन्दिरों का निर्माण पूर्ण हो गया तब एक मन्दिर के शिखर पर स्थपति चढ़ गया तथा दूसरे मन्दिर के शीर्ष-भाग में स्थपति की बहन। वस्तुतः एक औपचारिक अनुष्ठान की प्रक्रिया के अन्तर्गत मन्दिरों की शीर्ष भाग में निःवस्त्र होकर पहुंचना था। मन्दिरों की ऊंचाई के कारण दोनों ने एक दूसरे को निःवस्त्र देखा और शर्म एवं पश्चाताप के कारण दोनों मन्दिरों के शिखर से कूद पड़े तथा पाषण में परिवर्तित हो गये। इनमें से आरंग का मन्दिर जैन मन्दिर है तथा भाण्ड देवल के नाम से प्रसिद्ध है, दूसरा मन्दिर देव बलौदा का शिव मदिर है। दोनों मंदिर भिन्न-भिन्न धार्मिक सम्प्रदायों से सम्बंधित है, अतः एक स्थपति द्वारा निर्माण किये जाने का उल्लेख उपयुक्त प्रतीत नही होता।

उपरोक्त किवदन्ती के कथानक में थोड़ी सी विभिन्नता भी मिलती है। एक जनश्रुति के अनुसार इस क्षेत्र में वनसूकर उत्पात मचाया करते थे, यहां रहने वाले उक्त शिल्पी के मन में यह भावना उत्पन्न हुई कि इसे ‘शिव क्षेत्र‘ में परिवर्तित करना चाहिए। इस प्रकार वह शिव मंदिर के निर्माण में समर्पित हो गया, अन्ततः उसका लक्ष्य पूरा हुआ। निर्माण कार्य के समय, उसकी एक मात्र बहन उसकी सेवा में संलग्न रही। एक दिन उक्त स्थपति ने मंदिर के शिखर में कलश चढ़ाने का मुहूर्त निकाला। उसके मन में यह भाव उत्पन्न हुए कि ईश्वर और उनके बीच पावनता में वस्त्र क्यों बाधक बनें। अतः वह निःवस्त्र होकर मंदिर के शिखर में स्वर्ण कलश सहित पहुंचा। इसी समय स्थपति की बहन, भाई के लिए भोजन लेकर पहुंची। तेज सूर्य रश्मियों के मध्य स्वर्ण कलश स्वयं सूर्य जैसा प्रकाशित हो रहा था उसके निकट कलश चढ़ाने को तत्पर शिल्पी खड़ा था। अचानक बहन को देख कर, अपनी निःवस्त्रता पर उसे ग्लानि हुई और मंदिर के निकट तालाब में वह कूद गया। एक मात्र भाई को मृत्यु का दुःख उसकी बहन सहन न कर पाई और वह भी तालाब में कूद पड़ी और दोनों पाषाण में परिवर्तित हो गए। एक अन्य जनश्रुति भी इस मंदिर के सम्बन्ध में प्रचलित है, जिसके अनुसार इस मंदिर का निर्माण एक ही रात्रि में किए जाने का उल्लेख है।

स्थापत्य एव कला की दृष्टि से यह मन्दिर उत्तरी भारत के अन्य मंदिरों के सदृश्य है। भू-विन्यास (Ground Plan) के अंतर्गत मण्डप, अन्तराल एव गर्भगृह निर्मित है। गर्भगृह (जहां देव प्रतिमा अथवा शिवलिग स्थित रहता है), का बाह्य भाग वर्गाकार है तथा प्रत्येक ओर १३ फीट है। मण्डप, स्तभों पर आधारित है तथा खुला हुआ है, इसकी लम्बाई २२ फीट १ इन्च है। गर्भगृह और मण्डप के मध्य भाग को अन्तराल कहा जाता है, यह ३ फीट ५ इंच चौड़ा है। इस प्रकार मंदिर ३९ फीट लम्बा और २९ फीट चार इंच चौड़ा है। मंदिर का शिखर ध्वस्त हो चुका है, १८८१-८२ में यहां आये भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक अलेक्जेंडर कनिंघम ने इसकी ऊंचाई लगमग ४० फीट उल्लिखित की है। पुराने गजेटियर के एक चित्र में मंदिर का शिखर दिखाई पड़ता है। मंदिरों में सामान्यतः एक ही प्रवेश द्वार होता है जो पूर्व दिशा की ओर स्थित रहता है। सूर्य की प्रथम किरणें मदिर प्रवेश करें, यही इसका प्रमुख उद्देश्य होता है। यहां पूर्व दिशा में प्रवेश तो है ही, साथ ही एक अन्य प्रवेश द्वारमण्डप के उत्तर दिशा में निर्मित किया गया है जो संलग्न तालाब की ओर खुलता है। यह तालाब ६० फीट लम्बा तथा ५२ फीट चौड़ा है, जिसके चारों ओर पाषाण के सोपान बने हुए हैं।

मण्डप, भूमि सतह से ४,१/२ फीट ऊंचा है, जबकि मण्डप से अन्तराल होते हुए गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए चार सीढियां नीचे उतरना पड़ता है, इस आधार पर कनिंघम महोदय ने मत व्यक्त किया है कि मन्दिर का निर्माण दो चरणों में किया गया है। अपने मत के समर्थन में उन्होंने गर्भगृह तथा मण्डप को वाह्य भित्तियों में अंकित कला वैष्णव और शैव देवी-देवताओं की प्रतिमाएं उत्कीर्ण की गई हैं। विष्णु के विभिन्न अवतारों में से नृसिंह, वाराह, वामन तथा कृष्ण का अंकन मिलता है। शिव का विविध रुपों में अंकन के साथ ही गणेश तया महिषासुर मर्दिनी का चित्रण भी मिलता है। इन प्रतिमाओं के अंकन में कलात्मकता के साथ प्रतिमा लक्षणों का प्रयोग सम्यक रुप से किया गया है। गर्भगृह को दक्षिणी दीवार में अंकित एक प्रतिमा का उल्लेख कनिंघम ने अष्टभुजी देवी के रुप में किया है। इस प्रतिमा को कनिंघम के मत का अनुकरण करते सभी विद्वानों ने अप्टभुजी देवी माना है। वस्तुतः यह देवी प्रतिमा नहीं बल्कि यहां शिव के गजासुर-वध का चित्रण किया गया है, जिसमें शिव को ऊपरी दो हाथों से हाथी को सिर के ऊपर उठाए हुए प्रदर्शित किया गया है।

मंदिर की बाह्य दीवारों में तत्कालीन जन-जीवन को प्रतिबिम्बित करने वाले अनेक दृश्यों का अंकन परिलक्षित होता है। शिकार से सम्बन्धित अनेक दृश्यों को उत्कीर्ण किया गया है। सूकर तथा हिरण पर कुत्तों द्वारा आक्रमण करने का चित्रण अत्यंत स्वाभाविक ढंग से किया गया है। नृत्य, और मिथुन मूर्तियां अत्यन्त सुन्दर उत्कीर्ण की गई हैं। एक स्थान पर राजकीय शोभा-यात्रा का चित्रांकन है, जिसमें राजा छत्र सहित प्रदर्शित है।

मंदिर के मण्डप में स्थित स्तंभ, अत्यन्त कलात्मक तथा चमकदार हैं। इसमें विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का चित्रण किया गया है। स्तंभों के कीर्तिमुखों को विशेष महत्व का कहा जा सकता है। विभिन्न स्तंभों में अंकित कीर्तिमुख, शिल्पी के प्रखर कल्पना-शक्ति तथा कला कौशल से परिचित कराती है। कीर्तिमुखों के चित्रण में किसी भी आकृति की पुनरावृत्ति परिलक्षित नहीं होती। गर्भगृह का द्वार पारम्परिक कला से युक्त है। इसके ऊपरी भाग के मध्य में गणेश के अंकन से ज्ञात होता है कि यह मंदिर शिव को समर्पित किया गया था।

मंदिर के सामने शिव मंदिरों की परम्परा के अनुसार नन्दी की एक प्रतिमा मिलती है, इसके अतिरिक्त कई लेखविहीन सती स्तंभ मिलते हैं, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व को प्रदर्शित करते हैं।

देवबलौदा की स्थिति छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण नगर रायपुर और औद्योगिक तीर्थ भिलाई के मध्य है, फिर भी सामान्यजनों को स्थापत्य के इस उत्कृष्ट उदाहरण के विषय में पर्याप्त जानकारी नहीं है। रायपुर-भिलाई के बीच तेजी से विकसित होते आवागमन एवं व्यापारिक सम्बन्ध के बीच यदि कुछ समय मनोरंजन एवं पर्यटन के लिए निकाला जावे तो उसमें इस मंदिर के भ्रमण को सम्मिलित किया जाना सर्वथा उपयुक्त कहा जा सकता है। रायपुर-भिलाई पर्यटन योजना बनाकर, उसमे नंदनवन, देवबलौदा, मैत्रीबाग और भिलाई इस्पात संयंत्र को सम्मिलित किया जा सकता है। वर्तमान में देव बलौदा का परिचय देते हुए एक बोर्ड जी.ई. रोड में लगाया जाना चाहिये, जिससे इसके विषय में लोगों को पर्याप्त जानकारी मिल सके।

मंदिर से लगे तालाब को विकसित एवं सुन्दर बनाने हेतु प्रयास के साथ ही, बैठने की व्यवस्था सहित एक छोटा सा उद्यान निर्मित किया जावे, तो यह स्थान एक ओर प्राचीन गौरव और वैभव को प्राप्त करेगा वहीं दूसरी ओर पर्यटकों को पर्याप्त रूप से आकर्षित भी करेगा।


यह लेख भिलाई की संस्था ‘समता‘ की स्मारिका, सन 1986 में प्रकाशित हुआ था।