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Friday, September 25, 2026

रजत छत्तीसगढ़

2025-26, छत्तीसगढ़ राज्य गठन का रजत जयंती वर्ष। सरकार के लिए जश्न का मौका। जोर-शोर से तैयारियां शुरू हुईं। कुछ आपसी लोग, जो सरकार से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े हैं, मुझसे संपर्क कर बताया कि इन वर्षों की (सरकारी) सांस्कृतिक यात्रा पर मुझे लिख कर देना है। लिखने का उत्साह न होने के बावजूद कर्तव्य निर्वाह और आपसी संबंधों के माध्यम से आई बात रखने के लिए एक नोट तैयार किया और इस शर्त के साथ भेज दिया कि उपयोगी हो तो इसे बिना नाम के या किसी अन्य के नाम से भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह किसी काम का हुआ हो, संभव है छपा हो। 

इस बीच पत्रकार श्री अमित चौहान ने इस विषय पर बात करना चाहा, मेरी उदासीनता पर उनका उत्साह भारी पड़ा, छत्तीसगढ़ी में हुई एक घंटे से भी अधिक की बातचीत उन्होंने रिकॉर्ड कर ली, जिसका एक अंश ‘स्वदेश‘ में छपा है, जो यहां दे रहा हूं। इसी क्रम में वह नोट भी याद आया, संयोगवश मिल गया, अब लगा वह भी प्रस्तुत किया जा सकता है। सो, पहले वह नोट, उसके बाद स्वदेश में प्रकाशित साक्षात्कार- 

छत्तीसगढ़ राज्य में संस्कृति विभाग के अंतर्गत संचालनालय बना, वह प्रशासकीय आसानी और स्थापना व्यय नियंत्रित करने वाला था। इस संचालनालय में संस्कृति, राजभाषा, पुरातत्व, संग्रहालय, अभिलेखागार, गजेटियर, पर्यटन सभी एक साथ थे। बंटवारे में एक खास बात यह थी कि मध्यप्रदेश के दौरान संस्कृति के लगभग सारे काम सीधे संस्कृति विभाग के बजाय विभिन्न परिषद और अकादमियों के माध्यम से होता था, यथा- साहित्य परिषद, कला परिषद, आदिवासी लोक कला परिषद, कालिदास अकादमी, चक्रधर कत्थक केंद्र, उर्दू अकादमी आदि। बंटवारे में तय हुआ कि विभाग का निर्धारित हिस्सा छत्तीसगढ़ में जाएगा, जैसा कि हुआ भी। मगर परिषद, अकादमियों आदि के लिए तय हुआ कि जो जहां स्थापित है, वहीं रहेगा। छत्तीसगढ़ के हिस्से में तब सिर्फ एक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजन पीठ था, जो पहले अध्यक्ष डॉ. प्रमोद वर्मा के बाद से बंद-सा पड़ा था, वही एक छत्तीसगढ़ के हिस्से में आया।

संस्कृति-पुरातत्व की गतिविधियां आरंभ हुई साथ ही विभागीय नीति तैयार करने पर भी काम शुरू हुआ। संस्कृति नीति 2001 घोषित की गई जिसके अंतर्गत विभागीय गतिविधियों को नया आयाम दिये जाने का प्रयास आरंभ हुआ। स्पष्ट किया गया कि राज्य की कोई विशेष या औपचारिक नीति के स्थान पर परम्पराओं एवं मान्यताओं का समावेश एवं उनका पोषण एवं संवर्धन करना है, इसलिए संस्कृति नीति में सांस्कृतिक उद्‌देश्यों की परिकल्पना पर ज्यादा जोर दिया गया। नीति, जिसे संकल्प भी कहा गया, में कहा गया कि राज्य अभिलेखीय एवं गैर अभिलेखीय परंपराओं के आधार पर संस्कृति को परिभाषित करेगा। राज्य समुदायों के अंतर्पारस्परिक संबंधो को बनाये रखने एवं उनके मध्य समन्वय स्थापित करने का प्रयास करेगा, इसे अतिरिक्त सीमावर्ती पडोसी राज्यों के, छत्तीसगढ़ राज्य के साथ सांस्कृतिक संबंधों की नये परिपेक्ष्य में व्याख्या की जायेगी। राज्य की बोलियों को प्रोत्साहन देने हेतु वाचिक परंपराओं और साहित्य का अभिलेखन, विश्व की दूसरी बोलियों, समुदायों के मध्य संबंधों को प्रोत्साहित किया जायेगा। संस्कृति के ज्ञान का संचयन एवं उसका उपयोग समग्र रूप से एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखे जाने पर जोर दिया गया। 

विभागीय नीति-संकल्प के साथ विभाग ने अपने क्रियाकलाप में शामिल किया- साहित्य एवं कला का विकास, सांस्कृतिक परम्परा का संरक्षण, ललित कला तथा संगीत शिक्षा को प्रोत्साहन, पुराने अभिलेखों का संरक्षण, संवर्धन, ऐतिहासिक महत्व के स्मारकों का संरक्षण तथा संग्रहालयों का विकास, शासकीय कार्य में हिन्दी भाषा का प्रयोग तथा उसके विकास संबंधी कार्य, शैक्षणिक संस्थाओं में हिन्दी भाषा का प्रयोग तथा उसके विकास संबंधी कार्य, जिला/राज्य गजेटियर का उत्पादन और पुनर्मुद्रण, सिनेमा अधिनियम के तहत नये सिनेमागृहों को लायसेंस, अर्थाभावग्रस्त कलाकारों/साहित्यकारों को पेंशन व आर्थिक सहायता, अशासकीय सांस्कृतिक संस्थाओं को प्रोत्साहन व आर्थिक सहायता, चयनित कलाकारों/साहित्यकारों/विद्वानों को सम्मानित करने का कार्य, कला, संस्कृति एवं ऐतिहासिक विषयों के दुर्लभ एवं प्रामाणिक ग्रंथों, दस्तावेजों, स्मृति चिन्हों का संग्रह, प्रकाशन, प्रदर्शन तथा संबंधित व्याख्यान, संगोष्ठियों आदि का आयोजन और इनके साथ छत्तीसगढ़ राज्य की संस्कृति का समग्र विकास । 

पुरातत्व के क्षेत्र में स्मारकों का संरक्षण एवं पर्यटन को बढ़ावा देने को इस नई नीति का विशिष्ट अंग माना गया। समुदायों के जैव सांस्कृतिक तत्व तथा उनके मध्य परिवेशीय अंतःसंबंध को एक नया आयाम देते हुये यह प्रयास, संस्कृति को संपूर्ण रूप से एक तत्व मानकर, उसका संवर्धन एवं परिवर्धन, शोध संगोष्ठी एवं विभिन्न उत्सवों के माध्यम से संस्कृति के निरंतर प्रवाह को बनाये रखना ही नयी संस्कृति नीति का सार कहा गया। नीति के इस आरंभिक स्वरूप और गतिविधियों में आगे परिवर्धन होता रहा। 

राजकाज की शुरुआत का दौर था। संस्कृति और सांस्कृतिक आयोजन प्रकटतः अतएव प्राथमिकता के होते हैं, तब पूरे संचालनालय का अमला इन्हीं कामों में लग जाता था, जो कमोबेश स्थिति लंबे समय तक बनी रही। पर्यटन अलग हुआ और स्वतंत्र मंडल गठित हो कर काम करने लगा। गजेटियर के लिए प्रशासनिक अधिकारी अध्यक्ष बनाए गए, मगर स्वतंत्र रूप से गजेटियर के काम खास प्रगति नहीं हुई। इसका एक कारण, नये-नये जिलों का बनना था, दूसरी तरफ छोटे जिला इकाइयों के लिए आंकड़े तो पृथक हो सकते थे, इतिहास-भूगोल जैसे खंडों में जानकारी बांटना व्यावहारिक नहीं होता। इंटरनेट और सूचना तंत्र का विकास भी एक कारण बना। यह भी चर्चा रही कि अब ‘मानव विकास प्रतिवेदन‘ पर्याप्त होगा, पृथक-पृथक जिला गजेटियर अप्रासंगिक होंगे। 

सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही। मध्यप्रदेश के दौरान संभागीय उत्सव और समय-समय पर प्रसंगों के आयोजन हुआ करते थे। छत्तीसगढ़ में रामगढ़-सरगुजा, चक्रधर-रायगढ़ और मल्हार महोत्सव प्रमुख थे। राज्य गठन के बाद विभिन्न मेलों, पर्व के अवसर पर उत्सव महोत्सव होने लगे, जिनमें सबसे प्रमुख राजिम मेला महोत्सव, कुंभ कल्प जैसे बदलते नामों के साथ आयोजित होता रहा। अब विभागीय सूची के अनुसार इन सांस्कृतिक उत्सव, महोत्सव, मेला-मड़ई की संख्या 89 हो गई है। इस क्रम में सर्वाधिक उल्लेखनीय राज्य स्थापना दिवस पर राज्योत्सव का आयोजन है। प्रतिवर्ष राज्योत्सव के आयोजन का स्वरूप व्यापार मेला जैसा भी होता है। राज्योत्सव में विभिन्न विभागों के पवेलियन, फन-फूड तो होता ही है। बड़े फिल्मी अभिनेताओं, गायक-संगीतकारों की प्रस्तुतियों का आकर्षण होता है। इसके साथ इस अवसर पर दिए जाने राज्य सम्मान, जिनकी संख्या आरंभिक वर्षों में दर्जन भर भी नहीं थी, अब तीन दर्जन है। 

अब संस्कृति विभाग के अंतर्गत ही पूरे दर्जन भर सम्मान हैं, जिनमें साहित्य/आंचलिक साहित्य के क्षेत्र में पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान, कला/शिल्प कला के क्षेत्र में चक्रधर सम्मान सम्मान, लोक कला के क्षेत्र में दाऊ मंदराजी सम्मान, हिन्दी/छत्तीसगढ़ी सिनेमा में रचनात्मक लेखन, अभिनय, पटकथा निर्माण तथा हिन्दी/छत्तीसगढ़ी सिनेमा में सर्वश्रेष्ठ फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में क्रमशःराज्य और राष्ट्रीय स्तर के किशोर साहू सम्मान/अलंकरण, प्रदर्शनकारी छत्तीसगढ़ी लोक कला के क्षेत्र में देवदास बंजारे स्मृति पुरस्कार, देश के बाहर उल्लेखनीय कार्य के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ अप्रवासी भारतीय सम्मान, साहित्य/आंचलिक साहित्य के क्षेत्र में लाला जगदलपुरी पुरस्कार, लोक शैली पंथी नृत्य प्रदर्शनकारी कला के क्षेत्र में देवदास बंजारे पंथी नृत्य पुरस्कार, छत्तीसगढ़ी/हिन्दी/ अन्य भाषा नाटक, रूपंकर कलाएँ, रंगकर्म के क्षेत्र हबीब तनवीर सम्मान, छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के क्षेत्र में खुमान साव सम्मान सम्मान राशि रू. 1.00 लाख तथा छत्तीसगढ़ी लोकगीत के क्षेत्र में लक्ष्मण मस्तुरिया सम्मान दिया जा रहा है। 

जैसाकि प्रत्येक सम्मान के साथ होता है, घोषणा के बाद प्रतिक्रियाएं आती हैं, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि इन सम्मानों के कारण राज्य की प्रतिभाओं का सम्मान, प्रेरक और उत्साहवर्धक हुआ। उल्लेखनीय कि यह आयोजन नवंबर पहले सप्ताह में होता है और यही चुनावी सालों में आचार-संहिता का समय, इसलिए उन वर्षों में स्थगित होता है तथा किन्हीं अन्य वर्षों में उपचुनाव वाले क्षेत्रों के कारण प्रभावित होता है। राज्य निर्माण के बाद राष्ट्रीय पुरस्कार-सम्मान की दृष्टि से खासी उपलब्धियां छत्तीसगढ़ के हिस्से आईं। जिनमें पद्म पुरस्कार, संगीत नाटक अकादेमी तथा अन्य पुरस्कारों में भी राज्य की प्रतिभाओं का नाम दर्ज हुआ। 

राज्य में साहित्य, संगीत, नृत्य, रंगमंच, चित्रकला. मूर्तिकला, सिनेमा और आदिवासी एवं लोककलाओं की शासन की नीतियों के अनुरूप सम्मान, विस्तार, प्रोत्साहन और संरक्षण करने के उ‌द्देश्य से श्छत्तीसगढ़ संस्कृति परिषद् गठित है, जिसके अंतर्गत साहित्य अकादमी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजनपीठ, श्रीकांत वर्मा पीठ, गुरु घासीदास शोध पीठ, कला अकादमी (चक्रधर कत्थक केन्द्र रायगढ़), आदिवासी एवं लोक कला अकादमी (नाचा केन्द्र राजनांदगांव), छत्तीसगढ़ फिल्म विकास निगम, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, छत्तीसगढ़ सिंधी अकादमी, इकाइयां हैं। 

राज्य के बाहर आयोजित होने वाले समारोहों में कलाकारों की नियमित भागीदारी होने लगी वहीं देश की प्रतिष्ठित संस्थाओं, मंडलियों के आयोजनों के साथ-साथ संगीत नाटक अकादेमी और दक्षिण-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के विभिन्न आयोजन राज्य में होने लगे। ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत‘ के अंतर्गत गुजरात राज्य से सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली और उत्तरप्रदेश के संस्कृति विभाग के साथ सांस्कृतिक समझौता ज्ञापन हस्ताक्षर हुए। राजधानी दिल्ली के आयोजनों में समय-समय पर और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में छत्तीसगढ़ राज्य दिवस का प्रतिष्ठापूर्ण आयोजन होने लगा, जिसमें छत्तीसगढ़ के दिल्लीवासी प्रतिष्ठित नागरिक, उच्चाधिकारी, विद्यार्थी और श्रमिक भी एकत्र होते हैं। केंद्र शासन के गीत नाटक प्रभाग तथा अन्य विभागों की योजनाओं के लाभ की स्थिति भी बेहतर हुई। इसके अतिरिक्त पावस प्रसंग, सफर मुक्ताकाश, शिल्प और कला प्रशिक्षण शिविर ‘आकार‘ जैसे विभागीय आयोजन और आइटीसी संगीत रिसर्च अकादमी के सहयोग से आयोजित सांगीतिक कार्यक्रम, ‘शतरूपा‘, ‘जाणता राजा‘ जैसे विभिन्न सफल और स्मरणीय हैं। ‘आजादी का अमृत महोत्सव’, ‘आदि परब‘, ‘जनजातीय गौरव दिवस‘, कुंभ मेलों में सांस्कृतिक भागीदारी जैसे उल्लेखनीय आयोजन हुए। सन 2006 गुरु घासीदास जी की 250 वीं वर्षगांठ के अवसर पर 18 से 31 दिसंबर तक पूरे राज्य में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए साथ ही परिचयात्मक पुस्तिका प्रकाशित की गई थी। 

अन्य विभागों जैसे जन-संपर्क विभाग द्वारा आयोजित साहित्य महोत्सव, प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस पर झांकी और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से राज्य कला-परंपरा के लिए नये अवसर बने। खेल-कूद युवक कल्याण विभाग तथा आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा भी सांस्कृतिक आयोजन, प्रतियोगिताएं कराई जाने लगीं। कला-मंडलियों, कलाकारों, संस्थाओं आदि को वित्तीय सहायता और अनुदान दिया जा रहा है। 

पुरातत्व के क्षेत्र में अनुरक्षण, संरक्षण यानि प्राचीन स्थल-स्मारकों की मरम्मत और रख-रखाव, सर्वेक्षण और संग्रहालय संबंधी कार्य होते हैं, किंतु इनमें उत्खनन को पुरातत्व का पर्याय जैसा मान लिया जाता है। छत्तीसगढ़ में राज्य निर्माण के पहले पुरातात्विक खुदाई का काम सिरपुर, धनोरा, मल्हार, ताला, डीपाडीह, कलचा-भदवाही, गढ़धनोरा, भोंगापाल, करकाभाट जैसे स्थानों पर हुआ था। राज्य निर्माण के बाद इस दिशा में उल्लेखनीय महत्व के काम हुए, जिनमेे सिरपुर, सिसदेवरी, सिरकट्टी, अमलीडीह, पचराही, महेशपुर, मल्हार, मदकूदीप, तुरतुरिया, तरीघाट, राजिम, डमरू, देवरी, जमरांव, और रीवांगढ़ शामिल हैं। इन कामों के फलस्वरूप विभिन्न स्मारक और पुरावशेष प्रकाश में आए, जिनसे राज्य के प्राचीन इतिहास के गौरवशाली स्वर्णिम पृष्ठ उजागर हुए। विभिन्न तहसीलों का ग्रामवार सर्वेक्षण तथा नदी-घाटी संस्कृति, गढ़, गुरु घासीदास की रावटियां जैसे थीमेटिक सर्वेक्षण कराए गए। 

पुरातत्व की विभागीय शोध पत्रिका ‘कोसल‘ और संस्कृति, कला, साहित्य, परंपरा पर केंद्रित पत्रिका ‘बिहनिया‘ का निर्णय राज्य गठन के बाद आरंभ में ही ले लिया गया था। इन दोनों पत्रिकाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रकाशन हुए। साथ ही समय-समय पर विभागीय संगोष्ठी, प्रदर्शनी, आयोजनों, पुरातत्वीय स्थलों, संग्रहालय आदि से संबंधित प्रकाशन उपयोगी साबित हुए हैं। स्तरीय साहित्य और इतर लेखन को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय सहायता का भी प्रावधान किया गया। छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास का सबसे विश्वसनीय स्रोत अभिलेख पर केंद्रित पुस्तक ’उत्कीर्ण लेख’ का पुनर्प्रकाशन किया गया था। 

रायपुर, बिलासपुर और जगदलपुर के विभागीय पुरातत्वीय संग्रहालयों के अलावा जिलों में पुरातत्व संघ के अधीन संग्रहालयों को विभागीय सहयोग से विकसित किया गया है साथ ही विभिन्न पुरातात्विक केंद्रों पर स्थल संग्रहालय भी स्थापित किए गए हैं। महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक व्यंजन और खान-पान का केंद्र ‘गढ़ कलेवा‘ बहुत लोकप्रिय हुआ है। संग्रहालय से संबद्ध ग्रंथागार शहीद स्मारक भवन में संचालित है, जो प्रतियोगी परीक्षार्थियों, शोधार्थियों, प्रबुद्ध और सामान्य पाठकों सभी के लिए उपयोगी है। बहुआयामी संस्कृति संस्थान की रूपरेखा बनी, विवेकानंद प्रबुद्ध संस्थान के निर्णय हुआ, इनके वांछित स्वरूप को आकार देने का प्रयास किया जा रहा है। स्वामी विवेकानंद के तरुण आयु में रायपुर प्रवास के बूढ़ापारा स्थित भवन को स्मारक विकसित किये जाने की योजना पर काम हो रहा है। 

एक महत्वाकांक्षी केंद्र ‘पुरखौती मुक्तांगन‘ विकसित हुआ। यह खुला संग्रहालय, राज्य की संस्कृति, परंपरा, पुरातत्व, पर्यावरण और जीव-सृष्टि की सन्निधि में विकास की कल्पना को साकार करने का केंद्र बनाने की योजना को मूर्त करने का उद्यम है। इसके महामहिम राष्ट्रपति महोदय द्वारा पुरखौती मुक्तांगन के प्रथम चरण का लोकार्पण किया गया, लोकार्पण समारोह में महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने निर्माणाधीन इस योजना की सराहना की। लगभग 200 एकड़ परिक्षेत्र में फैला निरंतर विकासशील पुरखौती मुक्तांगन को ऐसे शैक्षणिक केन्द्र के रूप में विकसित करने का प्रयास है जिसमें राज्य की जनजातीय संस्कृति, कलाशिल्प, प्राकृतिक संरचना और भौगोलिक परिदृश्य, पर्यावरण और जैव विविधता को प्रदर्शित किया जाए। यहां भव्य प्रवेश द्वार, पर्यटन सूचना केन्द्र, पाथ-वे, माड़ियापथ, बैगा चौक, देवगुड़ी, छत्तीसगढ़ हाट, आभूषण पार्क, छत्तीस खम्भा चौक, जलपृष्ठीय रंगमंच, मनोरंजक उद्यानगृह, सरगुजा और बस्तर प्रखंड, राम वनगमन पथ, स्वतंत्रता सेनानियों की मूर्तियों का निर्माण, मुखौटे आदि हैं, जो जनरुचि का केंद्र बना हुआ है। 

विभाग द्वारा अभिनव योजनाओं के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी पारंपरिक व्यंजनों के आस्वादन का अवसर सुलभ कराने का केंद्र ‘गढ़-कलेवा‘, छत्तीसगढ़ के पारंपरिक ज्ञान पद्धति से निर्मित उत्पादों के विक्रय हेतु विभिन्न संस्थाओं द्वारा अपने विक्रय पटल, छत्तीसगढ़ी पारंपरिक उत्पादों को देखने तथा स्मृतिचिन्ह के रूप में क्रय की सुविधा, गुजरात टूरिज्म बोर्ड, छत्तीसगढ़ पर्यटन मण्डल तथा दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र की छत्तीसगढ़ ईकाई के कार्यालय वाला ‘गढ़-हटरी‘ है। विभाग द्वारा राज्य के कलाकारों के महत्व को ध्यान देने के उद्देश्य से कलाकारों के पंजीयन हेतु वेबसाईट का निर्माण किया गया है. जिसके अंतर्गत चिन्हारी के माध्यम से ऑनलाईन पंजीयन की सुविधा दी जा रही है, जिससे राज्य के हर वर्ग के कलाकारों को विभाग से सीधे सम्पर्क करने का अवसर मिला है और विभाग के पंजीकृत कलाकारों को विभागीय कार्यक्रमों से लाभान्वित किया जा रहा है। अब तक कुल 13525 कलाकारों का ऑनलाईन पंजीयन प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार अनुदान पोर्टल विकसित किया गया है, जिसमें राज्य की अशासकीय पंजीकृत संस्थाएं जो कला विशेष में उच्चस्तरीय प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन हेतु विशिष्ट स्तर के संगीत समारोह, नाट्य समारोह, कला प्रदर्शनियां, साहित्य समारोह, शिविर अथवा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि के आयोजन करते हैं, उन्हें आर्थिक सहायता दिये जाने का प्रावधान है। 

राज्य के संस्कृति के विविध आयामों पर प्रलेखन हेतु सांस्कृतिक प्रलेखन के क्षेत्र में प्रतिष्ठित संस्था सहपीडिया के साथ अनुबंध किया गया है। इसके अंतर्गत 100 विषय वस्तुओं पर प्रलेखन माड्यूल तैयार कर बेबसाईट पर अपलोड किये जाने का कार्य किया जा रहा है। अब तक लगभग 60 माड्यूल तैयार कर लिये गये है। इस कार्य से सूचना क्रांति के वर्तमान युग में राज्य के समृद्ध संस्कृति पर यथेष्ठ सामग्री वेबसाईट के माध्यम से समूचे दुनिया के लोगों को सुलभता से उपलब्ध करायी जा रही है। 

सिंगल विंडो डेश बोर्ड साफ्टवेयर का निर्माण छत्तीसगढ़ में फिल्म निर्माण करने वाले निर्माता/निर्देशकों को अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने हेतु किया गया है। इस साफ्टवेयर के माध्यम से छत्तीसगढ़ के समस्त विभाग से जिला दण्डाधिकारी के द्वारा अनापत्ति प्रमाणपत्र प्राप्तकर निर्माता / निर्देशक को फिल्म निर्माण हेतु अनापत्ति प्रमाणपत्र प्रदान करना है। अब तक छत्तीसगढ़ में 12 हिन्दी फिल्मों की शूटिंग की गई है। 

विभाग द्वारा संस्कृति का संरक्षण संवर्धन हेतु विभागीय लक्ष्यों में लोक कलाकारों की सूची तैयार करना, जिसमें चिन्हारी पोर्टल के माध्यम से ऑनलाईन पंजीयन की सुविधा विभागीय वेबसाईट पर उपलब्ध है। जिससे लोक कलाकारों का ऑनलाईन पंजीयन किया जाता है। 5029 कलाकार / संस्था तथा 6208 रामायण मंडलियों का पंजीयन किया गया है। वर्तमान कलासाधकों, अर्थाभावग्रस्त साहित्यकारों / कलाकारों को मासिक वित्तीय सहायता / मासिक पेंशन, ईलाज हेतु कलाकार कल्याण कोष, कलाकार / संस्था / जिला कलेक्टर को आयोजनों के लिए आर्थिक अनुदान की व्यवस्था की गई है। लोककलाओं को सोशल मिडिया के माध्यम से लोकप्रिय बनाने का प्रयास विभाग द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम में 03 दिवस तथा यूट्यूब में 07 दिवस के अंदर अपलोड किया जा रहा है। उपलब्ध लिखित साहित्य सामग्री का संकलन उपलब्ध पांडुलिपियों एवं दस्तावेजों का संकलन कार्य किए जाने का निर्णय लिया गया है। साथ ही यह भी तय किया गया है कि छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध नाटक जैसे चंदैनी गोंदा, लोरिक चंदा इत्यादि के मंचन हेतु मुक्ताकाशी मंच महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर में प्रत्येक माह एक अर्थात वर्ष में 12 प्रसिद्ध नाटकों का मंचन किया जायेगा। 

अब तक की नियमित गतिविधियां और नवाचार उल्लेखनीय है, मगर कई ऐसे पक्ष हैं जिनका उल्लेख इस प्रसंग के अनुकूल नहीं है। संक्षेप में हमारा ध्यान इस ओर भी उतना ही होना आवश्यक है कि अब तक क्या नहीं हो पाया है और क्या करना आवश्यक है। 

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स्वदेश 

राहुल कुमार सिंह से विशेष बातचीत...

जुन्ना सामग्री संग नवा दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड के घलो डिजिटलीकरन होय 

चक्रधर, मल्हार, भोरमदेव, सिरपुर महोत्सव सहित राज्योत्सव प्रदेश के पहचान बनिस 

स्वदेश समाचार रायपुर 

छत्तीसगढ़ राज्य अपन गठन के 25वां वर्ष म प्रवेश कर चुके हे। संस्कृति, लोककला, पुरातत्व अउ ऐतिहासिक धरोहर प्रदेश के पहचान के महत्वपूर्ण आधार ये। इही विषय म 500 से ज्यादा अइसने अध्ययन म शामिल राहुल कुमार सिंह, पुरा-संस्कृतिधर्मी धरोहर वार्ताकार एवं प्रमुख, परोहर परियोजना, बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर ले अमित चौहान के बातचीत के प्रमुख संपादित अंश प्रस्तुत हे.... 

सवाल- 25 बछर म संस्कृति अउ पुरातत्व के क्षेत्र म का-का प्रमुख बड़े उपलब्धि आपमन के ध्यान म आथे? 
जवाब- राज्य गठन के बाद संस्कृति के क्षेत्र म सीधा काम करे के मौका मिलिस। डॉ. कल्याण कुमार चक्रवर्ती, डॉ. इंदिरा मिश्रा अउ श्री प्रदीप पंत जइसने अधिकारी मन के योगदान प्रमुख हे। राज्योत्सव, चक्रधर महोत्सव, रामगढ़ महोत्सव, मल्हार, भोरमदेव, तातापानी, चित्रकोट अउ सिरपुर जइसने आयोजन अऊ परंपरा प्रदेश के सांस्कृतिक पहचान के हिस्सा बनिस ये बड़े उपलब्धि ये। 

सवाल- प्रमुख पुरातात्विक धरोहर अउ सामग्री मन के संरक्षण अउ विकास बर आगू का प्रयास करे जा सकत हे? जवाब- नवा उत्खनन ला लेके उत्साह बने हावय, फेर ओकर ले घलो जादा जरूरी पहिली ले सामने आ चुके धरोहर मन के रखरखाव हवय। मल्हार, ताला, सिरपुर, भोरमदेव सहित प्रदेश के दूसर पुराना स्थल मन के मूल स्वरूप ला सुरक्षित रखे के जरूरत हवय। भोरमदेव जइसन कई ठन मंदिर के आसपास बढ़त व्यावसायिक गतिविधि मन ला नियंत्रित करना जरूरी हवय। जुन्ना अउ पुरातात्विक स्थल म अनावश्यक बदलाव के बजाय संरक्षण अउ मरम्मत ला प्राथमिकता मिलना चाहिए। 

सवाल- जम्मो पुरातात्विक धरोहर मन के जानकारी के डिजिटल रिकॉर्ड कइसे तियार करे जा सकत है? 
जवाब- संग्रहालय मन म नियमित संग्रहाध्यक्ष अउ क्यूरेटर के जरूरत हे। महंत घासीदास संग्रहालय के जुन्ना रिकार्ड अउ ओकर रखरखाव ला दुरुस्त करे जाय। जम्मो के डिजिटललाइज़ेशन होना ही चाहिए। जुन्ना सामग्री के संग वर्तमान के दस्तावेज, फोटो, रिकॉर्ड अउ ऐतिहासिक सामग्री घलो डिजिटल रूप म सुरक्षित होना चाहिए, ताकि भविष्य म ओला आंसानी ले देखे अउ उपयोग करे जा सके। 

सवाल- पुरातत्व ले जुड़े लेख, शोध, दस्तावेज के संग्रह अउ प्रकाशन बर अउ का जरूरी प्रयास के जरूरत हे? जवाब- राजपत्र अउ विभागीय वार्षिक प्रतिवेदन मन ला ऑनलाइन उपलब्ध कराए के जरूरत हे। शासन-प्रशासन द्वारा प्रकाशित सामग्री ला व्यवस्थित रूप ले डिजिटल प्लेटफॉर्म म रखे जाना चाहिए। हर प्रकाशन के संग उचित वर्गीकरण अउ मेटाडेटा होना चाहिए, ताकि शोधकर्ता अउ आम लोगन मन ला सामग्री आसानी ले मिल सके। केवल कुछ सामग्री उपलब्ध होना पर्याप्त नइ हे, बल्कि कम से कम जरूरी सामग्री घलो व्यवस्थित रूप ले उपलब्ध होना चाहिए। 

सवाल- अवोइया 25 बछर म आपमन छत्तीसगढ़ के संस्कृति अउपुरातत्व धरोहर आदि ला कइसन रूप म देखना चाहत हव? 
जवाब- सच कहों तो मैं आने वाला 25 नइ बल्कि 250 अउ कहों त 2500 साल तक येकर विस्तार अउ संरक्षण ल देखना चाहत हंव। आने वाला समय म डिजिटलीकरन प्रमुख जरूरत है। सामग्री ला मेटाडेटा के संग वर्गीकृत करके छत्तीसगढ़ सरकार के आर्काइव पोर्टल पर उपलब्ध कराए जा सकत हें। एखर ले प्रदेश के सांस्कृतिक, पुरातात्विक अउ ऐतिहासिक सामग्री भविष्य बर सुरक्षित रह सकही, अउ शोधकर्ता मन के संग आम जनता ला घलो आसानी ले उपलब्ध हो सकही। 

सवाल- नवा पीढ़ी ल अपन धरोहर ले जोड़े बर का कदम उठाए के जरूरत हे? 
जवाब- लोककला म बदलाव अउ प्रयोग के गुंजाइश होना चाहिए। कलाकार जब नवा प्रयोग करथें अउ जनता ओला स्वीकार करथे, त लोककला के नवा स्वरूप विकसित हो सकथे। लोककला ला केवल जुन्ना स्वरूप मा स्थिर रखे के बजाय प्रतिभाशाली कलाकार मन के प्रयोग अउ जनस्वीकृति ला घलो महत्व मिलना चाहिए। येकर से नवा लइका मन अपन मन के जुड़त जाही।

Thursday, June 18, 2026

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़ के अंतर्गत स्थापित, माधवराव सप्रे राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोध पीठ द्वारा (2011? में) ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता‘, हमारे पुरोधा: खण्ड-2 का प्रकाशन किया गया था। पुस्तिका के संपादक परितोष चक्रवर्ती, अध्यक्ष, माधवराव सप्रे राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोध पीठ हैं। इसके पहले खंड की जानकारी पुस्तिका के निम्नलिखित ‘प्रस्तावना‘ में है, जो यथावत यहां प्रस्तुत है। इसके पश्चात इस खंड की परिचयात्मक जानकारी दी जा रही है।

प्रस्तावना

छत्तीसगढ़ की पावन धरा आदिकाल से ही आध्यात्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण रही है। इस धरा पर जन्में और पुष्पित पल्लवित हुए सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन पूरे भारत वर्ष के लिए प्रेरणा के स्रोत बने और इसी से मार्गदर्शन प्राप्त कर देश के अन्य भागों में सामाजिक उन्नयन और सांस्कृतिक समुच्चयन के कार्य हुए। आधुनिक भारत के नवजागरण में भी छत्तीसगढ़ की रचनात्मक ऊर्जा एवं अस्मिता की महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ की पहचान सदा से ही अनोखी और निराली रही। अनादिकाल से छत्तीसगढ़ रचनात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण एक ऐसे भूभाग के रूप में आलोकित रहा जिसका प्रकाश यत्र-तत्र सर्वत्र फैलता रहा।

छत्तीसगढ़ की इसी रचनात्मक ऊर्जा और सामाजिक उन्नयन का परिचय यहां की पत्रकारिता में भी देखने को मिलता है, जिसका अस्तित्व इसके प्रारब्ध से ही निराला रहा। छत्तीसगढ़ के पहले समाचार पत्र के रूप में ख्यात और सर्वज्ञात ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ सन् 1900 में पेंड्रा रोड से पं. माधवराव सप्रे द्वारा अपने दो अन्य मित्रों पं. रामराव चिंचोलकर और पं. वामनराव लाखे के सहयोग से निकाला गया। इस पत्र का नाम छत्तीसगढ़ मित्र होना ही इस राज्य की रचनात्मक मेधा और अस्मिता का परिचायक है। उसके बाट कबीर पंथी (रायपुर, 1913), कान्यकुब्ज नायक (रायपुर, 1919), विकास (बिलासपुर, 1925), ‘उत्थान‘ और ‘आलोक‘ (1925), ‘सरगुजा संदेश‘, ‘कांग्रेस पत्रिका‘ और ‘सचेत‘ (1937), अग्रदूत (1942), महाकौशल (1935) पत्रकारिता की अनवरत् श्रृंखला को रेखांकित करते दीप स्तंभ है। 

समाचार पत्रों की इस यात्रा के दौरान इस धरा पर कलम के अनेक योद्धा पैदा हुए जिन्होंने अपनी धारदार लेखनी के जरिये समाज में नई चेतना और ऊर्जा का संचार किया। वे ऐसे महामना थे जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ और निजी विकास को परे रखकर देशहित और समाज हित के प्रति अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

विश्वविद्यालय द्वारा विगत वर्ष पत्रकारिता के ऐसे पुरोधाओं का स्मरण करते हुए पहला मोनोग्राफ ‘हमारे पुरोधा‘ खण्ड-1 निकाला था, जिसमें पं. माधवराव सप्रे, पं. रविशंकर शुक्ल, बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, कुलदीप सहाय, यदुनंदन प्रसाद श्रीवास्तव, केशव प्रसाद वर्मा, गजानन माधव मुक्तिबोध, पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी, चंदूलाल चंद्राकर, मायाराम सुरजन और हरि ठाकुर का समावेश था। ऐसे ही कुछ और पुरोधाओं पर केन्द्रित दूसरा खण्ड अब सादर समर्पित है। हमारा प्रयास है कि और अधिक जानकारी एकत्रित कर हम ऐसे ही पुरोधाओं पर कुछ और खण्ड प्रकाशित करें। हमने यथासंभव अधिक से अधिक जानकारी एकत्रित करने का प्रयास किया है, फिर भी किसी महत्वपूर्ण जानकारी अथवा ऐसे कुछ महानुभावों का उल्लेख अवश्य छूट गया होगा, जिसका समावेश होना चाहिये था। इसके लिए सभी पुरोधाओं का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर उनके प्रति हम क्षमा याचना अर्पित करते हैं।

यह मोनोग्राफ हमारी विनम्र श्रद्धांजलि हैं, रचनात्मकता के उन वीरों के नाम जिनके आशीर्वाद से आज छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता नई ऊंचाईयों को छू रही है और नवगठित राज्य की विकासयात्रा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।
सच्चिदानंद जोशी
कुलपति

हमारे पुरोधा: खण्ड-2 में 12 पुरोधाओं की संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है-
नाम - जन्म/मुख्य कर्मभूमि, जन्म-निधन तिथि

# बारीन्द्रनाथ बैनर्जी - /रायगढ़, 19.11.1916-20.09.2006 
# पं. रामाश्रय उपाध्याय ‘वक्रतुण्ड‘ - बिहार/रायपुर, 02.08.1917-05.02.2005
# पं. शिवनारायण द्विवेदी - उत्तरप्रदेश/रायपुर, 20.07.1920-20.01.1999
# मधुकर खेर - रायपुर, 21.02.1928-31.03.1996
# केशवलाल मेहता - /कोरबा, 01.02.1929-05.02.2009
# कुमार साहू - मध्यप्रदेश/रायपुर, 22.10.2029-22.05.2008
# श्रीकांत वर्मा - बिलासपुर/दिल्ली, 18.12.1931-1986(25 मई)
# डी.पी. चौबे - बिलासपुर, 05.02.1935-19.06.1988 
# रम्मू श्रीवास्तव - लोहारा, कवर्धा/रायपुर, 19.12.1936-09.02.2006
# किरीट दोशी - /जगदलपुर, 29.11.1939-17.11.2009
# बसंत अवस्थी - रायपुर, 05.08.1940-11.07.2008
# सत्येन्द्र गुमास्ता - महासमुंद/रायपुर, 05.12.1940-13.06.1997

टीप -
0 पुस्तिका में प्रकाशन वर्ष अंकित नहीं है, यहां कोष्ठक में दर्शाया गया वर्ष 2011, अंतिम पृष्ठ पर छपे छत्तीसगढ़ संवाद के विज्ञापन February 2011 के आधार पर है।
0 पुस्तिका संपादक परितोष चक्रवर्ती स्वयं बिलासपुर से करीब से जुड़े रहे, मगर पुस्तिका में श्रीकांत वर्मा के निधन का वर्ष दिया गया है, तारीख नहीं। यहां कोष्ठक में दी गई तारीख अन्य स्रोत से ली गई है।
0 स्वयं पत्रकार रहे, परितोष जी की पहचान वामपंथी रुझान के साहित्यकार की रही। स्वाभिमानी परितोष कुछ समय भिलाई इस्पात संयंत्र में जनसंपर्क अधिकारी रहे, बाद में लंबे समय तक बिलासपुर एसइसीएल में जनसंपर्क विभाग प्रमुख का दायित्व निर्वाह किया। इस विश्वविद्यालय में उस दौर में इनकी नियुक्ति, विचारधारा के स्तर पर मेल नहीं खाती थी, चर्चा का विषय थी।
0 इस श्रृंखला का खण्ड-1 उपलब्ध नहीं हुआ है। प्राप्त होने पर वहां शामिल पत्रकार पुरोधाओं की इसी प्रकार संक्षिप्त जानकारी जोड़ी जाएगी।

Sunday, September 22, 2024

निधीश की तमन्ना

फिल्मी गीत ‘जिंदगी इम्तिहान लेती है‘ में दोस्ती, दिल्लगी, प्रीत, बेबसी, आशिकी, मयकशी भी इम्तिहान लेती है। गीत से बाहर निकल आएं तो कुछ किताबें भी इम्तिहान लेती है, उनमें से एक यह निधीश त्यागी की ‘तमन्ना तुम अब कहां हो‘ है। मगर क्या यह इम्तिहान देना जरूरी है?, शायद नहीं, मगर मुझ छत्तीसगढ़िया के लिए हां, क्योंकि इस लेखक के छत्तीसगढ़ से रिश्ते के बारे में बताया गया है। किताब में रायपुर, बस्तर-जगदलपुर, विनोद कुमार शुक्ल(ा)? आते ही हैं, देशबन्धु अखबार (पत्रकारों की नर्सरी) में नौकरी का भी जिक्र है। और फिर लेखक ब्लॉग वाले दिनों के वर्चुअल परिचितों में हैं।

दौ सौ से कम पेज की पुस्तक में सौ से अधिक और अधिकतर वाक्य की तरह लंबे शीर्षकों के साथ बात कही गई है। एक शीर्षक में ‘एक लाइन में दिल तोड़ने वाली 69 कहानियां' हैं, सो अलग। कहीं डायरी जैसी अनौचारिक, मनमौजी, सहजता तो कहीं चिंतन। कवितानुमा गद्य, दार्शनिक उलटबांसियां। दो और कभी-कभी दो से भी अधिक वाक्य, जिन का वैध संबंध लिखने वाले के मन में तो होता होगा लेकिन पाठक को वह अवैध की तरह लगता है।

खबरों के अंश, जो छपने-छापने के लिए गैरजरूरी मान लिए जाते हैं, उनमें कहानियां उग आती हैं, यहां कई ऐसे प्रसंग हैं। ‘एक गुमशुदा दोस्त का पता मिलने पर‘ गद्य गीत है। ‘नैय्यरा नूर ...‘ के लिए कहने का ढंग उपयुक्त बन पड़ा है। ‘उसने दिल को ...‘ और ‘फिर फंस जाओ...‘ भेद में सौहार्द उभारने का प्रयास है। ‘उसने समंदर में ...‘ सुंदर निभा है।

‘खुशी को जिस... ‘ में ‘उसने‘ का प्रयोग देखिए- ‘उसने कहा उसे लौटना है। उसने पूछा कहां? उसने कहा-अब उसे पता है रास्ता खु़द के पास जाने का। उसने कहा...‘। ‘दिक्कत प्यर की...‘ का उसने देखिए- ‘उसने कहा-वह दूर जा रहा है। उसने कहा-ख़्याल रखना। उसने कहा-तुम भी। उसने कहा-ख़बर भेजते रहना अपनी। उसने कहा-वह जल्द लौटेगा। उसने कई लंबे ख़त लिखे। पर ख़राब नेट कनेक्शन की वजह से वे जा नहीं सके। उसका मोबाइल गुम गया और उसे उसका नंबर ही याद नहीं रहा।‘

‘शीशे की असलियत...‘ का एक दिलचस्प अंश- ‘उसे जैसे यक़ीन था कि अगर आप ज्यादा शिद्दत से दिलचस्प बातों को ढूंढ़ते हैं, तो वे आपको नहीं मिलती। नहीं मिलतीं इसलिए कि वे भी आपको ढूंढ़ रही होती हैं आपके पते पर, और आप उनके पते पर उन्हें ढूंढ़ रहे होते हैं। ‘लड़की देखते ही...‘ किसी बड़ी कहानी का बढ़िया प्लॉट, जल्दबाजी में मटियामेट हुआ है। वेब मैगजीन हीट की एम्मा, खबर-खुलासे के साथ संभावित कुछ अलग तरह के अंदेशों-खतरों के साथ दो शीर्षकों में आती है। ‘घरघराते हुए एयरकंडीशनर...‘ और ‘हाशिए से आता है...‘, असंबद्ध किस्म के वाक्यों का गुच्छा है, जिसमें छत्तीसगढ़- जशपुर, गरियाबंद आदि के साथ आता है।

कुल मिलाकर लगता है लेखक को जो अगला काम करने की तमन्ना है उसके लिए यहां कलम मांज रहा है।

Monday, February 26, 2024

पीएससी - दावे, आपत्तियां और निराकरण

छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की प्रारंभिक परीक्षा वर्ष 2023, पिछले 11 फरवरी को आयोजित हुई थी, 16 फरवरी को मॉडल आंसर जारी हुए और 27 फरवरी तक दावा-आपत्तियां मंगाई गई हैं। और अब खबर आई है कि आयोग मार्च के प्रथम सप्ताह में संशोधित मॉडल आंसर जारी करेगा, जिसके आधार पर परिणाम घोषित किए जाएंगे।

भ्रष्टाचार के आरोपों और जांच से जूझ रहे छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग की इस परीक्षा पर खबरें आईं, उनमें उल्लेखनीय कि ‘पहली आपत्ति (सत्तारूढ़) भाजपा नेताओं की तरफ से आई और खबरों के अनुसार इसके बाद मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस भी मुखर हो गई है। अभ्यर्थी और कोचिंग संस्थान, जो सीधे प्रभावित होने वाले पक्ष हैं, भी खोज-बीन में जुटे होंगे। लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में अनियमितता, पक्षपात, भूल-गलती, विलंब, अदालती और जांच की कार्यवाही जैसी की खबरें लगातार आती रहती हैं। छत्तीसगढ़ के साथ अन्य राज्यों की स्थिति भी कमोबेश एक जैसी है। 

फिलहाल जांच वाले विषय को छोड़ कर परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों, मॉडल आंसर और उन पर दावा-आपत्ति की समस्या को समझने का प्रयास करें। यह स्थिति अधिकतर प्रारंभिक परीक्षा, जिसमें बहुविकल्पीय वस्तुनिष्ठ प्रश्न होते हैं, के साथ होती है। इसमें मानवीय कारकों के चलते होने वाली त्रुटि दूर करने के लिए उत्तर पुस्तिकाएं ओएमआर शीट के रूप कर दी गईं। एक समस्या ऐच्छिक विषय और स्केलिंग को ले कर भी होती थी, जिसके कारण अब ऐच्छिक के बजाय, सभी अभ्यर्थियों के लिए एक जैसा प्रश्नपत्र होने लगा है। यह माना जा रहा है कि इससे विज्ञान, अभियांत्रिकी और तकनीकी विषय के अभ्यर्थियों को लाभ मिलता है, कला-मानविकी के अभ्यर्थी पिछड़ जाते हैं। अंतिम चयन के आंकड़े देखने पर स्थिति कुछ ऐसी ही दिखाई पड़ती है। 

इस परीक्षा के कुछ सवाल, जिन पर आपत्तियों की चर्चा है, क्षेत्रफल की दृष्टि से छोटा जिला, जिले में लिंगानुपात, बस्तर की लोक संस्कृति में विवाह मंडप में प्रयुक्त होने वाली लकड़ी, छत्तीसगढ़ राज्य कितने राज्यों की सीमा को छूता है? इन प्रश्नों पर ध्यान दें तो स्पष्ट होता है कि आपत्तियों का मुख्य कारण काल-सन का उल्लेख न होना है, अर्थात छत्तीसगढ़ में पिछले वर्षों में नये जिले बने हैं, इसके बाद आंकड़ों का बदल जाना स्वाभाविक है, इसी तरह राज्यों की सीमा में बिहार-झारखंड या आंध्र से तेलंगाना भाग का राज्य बनना, उत्तर में मतभेद का कारण बनेगा। बस्तर के प्रश्न में लोक-संस्कृति बनाम जनजातीय संस्कृति के अलावा, विभिन्न जनजातियों की भिन्न परंपराएं, भौगोलिक क्षेत्र (बस्तर का विस्तृत क्षेत्र, जो अब सात जिलों में से एक है।) उत्तर में मतभेद की स्थिति का कारण बनता है। हिंदी और अंग्रेजी के प्रश्नों में अंतर, भाषाई भूल के अलावा प्रकाशित, सार्वजनिक उपलब्ध स्रोत अथवा प्रश्नपत्र में छपाई की भूल, प्रूफ केी गलतियां भी समस्या का कारण बनती है। 

ऐसे प्रश्न, जिनके मॉडल आंसर पर आपत्तियां होती हैं, सामान्यतः सामाजिक विज्ञान-मानविकी के होते हैं, परंपरा-मान्यता से संबंधित होते हैं। ऐसा इसलिए कि प्राकृतिक विज्ञान के प्रश्नों जैसी वस्तुनिष्ठता सामाजिक विज्ञान के प्रश्नों में संभव नहीं होती। विज्ञान में कारण होते हैं तो कला में कारक। और विज्ञान में भी आवश्यक होने पर नियत मान के साथ एनटीपी जोड़ा जाता है, यानि वह मान सामान्य ताप-दाब पर होगा, अन्यथा बदल जाएगा। कालगत आंकड़ों में जनगणना दशक, योजनाएं पंचवर्षीय और अनेक सर्वेक्षण-प्रतिवेदन वार्षिक होते हैं। इस मसले के कुछ अन्य पक्षों को सीधे उदाहरणों में देख कर समझने का प्रयास करें। छत्तीसगढ़ की काशी, कई स्थानों को कहा जाता है। मूरतध्वज की नगरी आरंग भी है, खरौद भी। खरौद, खरदूषण की नगरी है तो बड़े डोंगर में भी खरदूषण की जनश्रुति है। सोरर की बहादुर कलारिन, लोक विश्वास में बड़े डोंगर में भी है। ऐसी स्थिति में ‘कहा जाता है, माना जाता है ...‘ वाले प्रश्न वस्तुनिष्ठ कैसे होंगे! 

प्रश्नपत्र तैयार करने वालों, माडरेटर्स और अभ्यर्थी, इन सभी की समस्या जो अंततः आयोग की समस्या बन जाती है, यह कि किन स्रोतों को प्रामाणिक आधार माना जाए। शासन की वेबसाइट अपडेट नहीं होती, दो शासन की ही दो भिन्न साइट पर तथ्य और आंकड़े भिन्न होते हैं (पूर्व में वन विभाग से संबंधित एक प्रश्न में ऐसी स्थिति बनी थी।) इसके साथ पुनः उदाहरणों सहित बात करें तो 1920 में गांधीजी के छत्तीसगढ़ प्रवास का उल्लेख विभिन्न स्थानों पर है, मगर तिथियां अलग-अलग मिलती हैं, और खास बात यह कि किसी प्राथमिक-प्रामाणिक स्रोत से पुष्टि नहीं हो पाती कि गांधी 1920 में छत्तीसगढ़ आए थे। इसी तरह वीर नारायण सिंह की फांसी के स्थान में मतभेद है और डाक तार विभाग द्वारा जारी डाक टिकट में उन्हें तोप के सामने बांधा दिखाया गया है साथ ही उनके एक वंशज ने कुछ और ही कहानी दर्ज कराई है। पहली छत्तीसगढ़ी प्रकाशित रचना ‘छत्तीसगढ़ी दानलीला‘ के प्रकाशन की तिथि विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्य-इतिहासकारों ने अलग-अलग बताई है। ऐसे ढेरों उदाहरण और भी हैं। 

सामान्य अध्ययन और सामान्य ज्ञान के फर्क का ध्यान भी आवश्यक होता है। सामान्य अध्ययन, ऐसी आधारभूत जानकारियां हैं, जो सामान्यतः अध्ययन से, पुस्तक आदि माध्यम से पढ़ाई प्राप्त होती हैं और जिन जानकारियों की अपेक्षा किसी सामान्य जागरूक नागरिक से की जाती है, जबकि सामान्य ज्ञान आवश्यक नहीं कि पुस्तकों में आया हो, जहां समझ-बूझ की अपेक्षा होती है, और यह संस्कृति-परंपरा की दृष्टि से कई बार वैविध्यपूर्ण छत्तीसगढ़ में मतभेद का कारण बनती है, एक उदाहरण हरियाली अमावस्या का है, जो मैदानी छत्तीसगढ़ में हरेली, सरगुजा में हरियरी और बस्तर में अमुस तिहार नाम से प्रचलित है। कुरुद- धमतरी क्षेत्र के पंडकी नृत्य से अन्य छत्तीसगढ़ लगभग अनजान है, वह सुआ नृत्य-गीत को जरूर जानता है। बस्तर का दशहरा, दंतेश्वरी देवी का पर्व है, रायपुर के आसपास रावण की विशाल स्थायी मूर्तियां हैं, जिनकी पूजा भी होती है, सरगुजा में गंगा दशहरा का प्रचलन है तो सारंगढ़ के आसपास दशहरा के आयोजन का प्रमुख हिस्सा मिट्टी की मीनारनुमा स्तंभ पर चढ़कर गढ़ जीतना होता है। राम-रावण और रावण-वध वाला दशहरा तो है ही। इसी तरह भाषाई फर्क में शिवनाथ के उत्तर और दक्षिण यानि मोटे तौर पर बिलासपुर और रायपुर, दोनों की छत्तीसगढ़ी का फर्क क्रमशः- अमरूद जाम-बिही है, मेढ़क बेंगचा-मेचका है, तालाब तलाव-तरिया है और कुछु काहीं हो जाता है।

इस समस्या का सीधा और आसान हल दिखाई नहीं देता, मगर कुछ हद तक इसे कम किया जा सकता है, जैसे- मानविकी के प्रश्नों में एकमात्र सही विकल्प के बजाय निकटतम विकल्प को सही माना जाए। मान्यता है, कहा जाता है आदि जैसे प्रश्न न पूछे जाएं। आंकड़ों वाले प्रश्नों के कारण यह स्पष्ट हो कि सही उत्तरों के लिए निर्धारित तिथि क्या होगी। दावा-आपत्ति में गाइड बुक की जानकारियों के बजाय पाठ्य-पुस्तकों और अधिक प्रामाणिक ग्रंथों में आई जानकारी को सही माना जाए, मगर प्रश्न अनावश्यक चुनौतीपूर्ण न हों, क्योंकि अभ्यर्थी, विद्यार्थी होता है, शोधार्थी नहीं, और परीक्षा सामान्य ज्ञान की ली जानी है। एक ही प्रामाणिकता के दो स्रोतों में जानकारी में अंतर हो तो, परीक्षा के लिए निर्धारित माह-वर्ष के ठीक पहले अर्थात अंत में आई, अद्यतन जानकारी को प्रामाणिक माना जाए। यानि ऐसे आंकड़े या जानकारियां, जब तक विशिष्ट महत्व के न हों, करेंट अफेयर की तरह, अद्यतन स्थिति के ही प्रश्न होने चाहिए। इस तरह अन्य बिंदु निर्धारित कर वह परीक्षा की अधिसूचना के साथ प्रश्न-पत्र पर भी स्पष्ट अंकित हो।


Tuesday, November 1, 2022

छत्तीसगढ़ के बाइस बछर

छत्तीसगढ़ के राज्य बनना, प्रशासनिक अउ राजनैतिक घटना आय, मगर संस्कृति के हिसाब से छत्तीसगढ़ के अपन पहिचान बहुत पुराना आय। हमर आज के छत्तीसगढ़ के कई रूप, कई आकार अउ नक्शा रहे हे। घटत-बढ़त बदलत रहे हे। दक्षिण कोसल, चेदि देश के साथ जुड़े रहे हे ते इलाका आज के बस्तर आय, याने दक्षिणी छत्तीसगढ़। ए इलाका दंडकारण्य आय, महाकान्तार कहे गए हे। राम भगवान के बनवास होए या राजा नल के किस्सा, ए इलाका के नाम आत रहे हे।

इतिहास म समुद्रगुप्त दक्षिणापथ अभियान म निकलथे, त सब ले पहिली राज्य कोसल के राजा महेन्द्र ल जीतथे, फेर महाकान्तार के व्याघ्रराज ल। फेर आगू तेलंगाना, आंध्र होत धुर दक्षिण निकल जाथे। महाभारत म भी ऋषभतीर्थ के नाम आथे, जे आज के गुंजी-दमउदहरा आय। उत्तरी सरगुजा अंचल, एक तरफ बघेलखंड से जुड़े रहे हे साथ ही मिर्जापुर इलाका से। जशपुर, रामनुजगंज अउ उदयपुर याने धरमजयगढ़ झारखंड-छोटा नागपुर से जुड़े रहे हे। इतिहास अउ भूगोल के साथ छत्तीसगढ़ के इतिहास अउ संस्कृति के संदर्भ म भी एकर ध्यान रखना जरूरी होथे।

छत्तीसगढ़ नाम, बीच के मैदानी हिस्सा, धान के कटोरा अउ कलचुरि-मराठा काल के पहिचान आय, जे ल छत्तीसगढ़ ‘गढ़‘ माने छत्तीसगढ़ किला मान लिए जाथे, जबकि बहुत साफ चर्चा मिलथे कि शिवनाथ नदी के उत्तर म अठारह अउ दक्षिण म अठारह, जे ल मोटा-माटी कहे जा सकथे, बिलासपुर राज अउ रायपुर राज। पुराना छत्तीसगढ़ म देशी रियासत के अलावा अइ दू जिला रहे हे।

राज्य से बाहिर के लोग मन बर, छत्तीसगढ़ माने बस्तर या भिलाई रहे हे। धान के कटोरा, मैदानी छत्तीसगढ़ के प्रमुखता हमेशा से रहे हे, मगर ए कारण से सरगुजा के पहिचान, लग रहे हे। छत्तीसगढ़ के बात करत हुए अक्सर सब कुछ मैदानी छत्तीसगढ़ म सिमट जाथे, बस्तर-सरगुजा पिछड़ जाथे, अउ विकास प्राधिकरण बनाए के जरूरत समझ म आथे।

छत्तीसगढ़ राज्य बनिस त यहां संस्कृति, पुरातत्व, अभिलेखागार, राजभाषा के साथ पर्यटन ल भी जोड़ के संचालनालय बनाए गइस। मध्यप्रदेश म संस्कृति के लगभग सब काम, परिषद, अकादमी अउ पीठ के माध्यम से होत रहिस। ओ कर से भी पहिली के स्थिति सुरता कर लेना चाहिए कि रायपुर म देश के सब ले पुराना संग्रहालय मन म से एक है। सीपी बरार-मध्यप्रदेश म पुरातत्व के काम पहिली, सामान्य प्रशासन, फेर शिक्षा अउ कुछ समय बर लोक निर्माण विभाग म रहे हे। संग्रहालय के मुख्य काम रायपुर से होत रहिस अउ सिरपुर खुदाई के दौरान यहां विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी के भी कार्यालय रहिस।


राज्य के बंटवारा म तय होइस कि जे परिषद, अकादमी, पीठ के जिहां मुख्यालय हे, ते ओ राज्य के बांहटा म, उहें रइही। त छत्तीसगढ़ के बांहटा म सिर्फ बख्शी सृजन पीठ आइस। अउ संस्कृति के कुछ अधिकारी कर्मचारी, जे मन बाद म वापस मध्यप्रदेश चले गइन। फेर बात आइस नीति के, त देश भर के कला-संस्कृति के विशेषज्ञ आमंत्रित होइन अउ उन सबके राय के निचोड़ आइस, ते आधार म तय होइस, कहे गइस- ‘राज्य की कोई विशेष या औपचारिक नीति के स्थान पर परंपराओं एवं मान्यताओं का समावेश एवं उनका पोषण संवर्धन करना है।‘ ए ल नीति के बजाय संकल्प भी कहे गइस।

संस्कृति बर ए क्षेत्र के लोग मन ही असली अगुवा होथे, सरकार ल ओ मन के अनुसार चलना होथे। छत्तीसगढ़ म धीरे-धीरे संस्कृति के मुख्य काम मंचीय आयोजन हो गे। बेहिसाब कार्यक्रम, कलाकार मन के मानदेय म देरी अउ कटौती। भाषा म जादा ध्यान छत्तीसगढ़ी अउ, ओ कर संविधान के आठवीं अनुसूची म शामिल कराना रहिस। हलबी, गोंड़ी, भतरी, कुडुख, सरगुजिहा, सादरी, पंडो बर कम ध्यान दिए गइस। राजभाषा, बोलचाल की भाषा, सरकारी कामकाज की भाषा, पढ़ाई की भाषा, मानक भाषा बर विद्वान मन सोचत-लिखत-पढ़त हावयं। हकीकत आय कि छत्तीसगढ़ी मंच-माइक अउ भाषण म बाढ़त जात हे, फेर आपसी बोलचाल, खोर-गली, घर-घर म नंदावत जात हे। 

संस्कृति के संरक्षण अउ प्रोत्साहन बर राज्य म पं. सुंदरलाल शर्मा, चक्रधर, दाउ मंदराजी, के साथ कला-संस्कृति के क्षेत्र म सम्मान-पुरस्कार बर विभूति मन के नाम जुड़त जात हे, देवदास बंजारे, किशोर साहू, लक्ष्मण मस्तुरिया, हबीब तनवीर, खुमान साव। जे ल सम्मान मिलथे, ते निर्णायक मंडल म आ जाथे, मगर अइसे भी होथे कि जे निर्णायक मंडल म हे, तेही बाद म पुरस्कार पा जाथे, सम्मान-पुरस्कार संग विवादित होना तो स्वाभाविक आय, मगर ए कर स्थापना म क्षेत्र के बजाय विभूति मन के नाम आधार होथे, तओ एक क्षेत्र के व्यक्ति कई क्षेत्र म पुरस्कार बर पात्र हो जाथे, एके व्यक्ति ल दू बार सम्मान मिल जाथे, तओ लगथे कि हमर राज्य म प्रतिभा के कमी हे का? अउ कहूं नइ रहिन, नइ मिलिन? किशोर साहू के नाम म दू ठन सम्मान हे, जे म के एक दस लाख रुपिया वाला आय, जबकि राज्य सम्मान मन 2-2 लाख रुपिया के आयं, अउ पं लखनलाल शर्मा के नाम से दिए जाने वाला पुरस्कार के पात्रता पुलिस विभाग तक सीमित हे, नागरिक सम्मान नो हय, अउ राशि भी मात्र पचीस हजार रुपिया हे।

छत्तीसगढ़ म पारंपरिक तिहार, खान-पान, पारंपरिक खेलकूद उपर ध्यान दिए जात हे, तीजा-पोरा, हरेली, नवाखाई हमर पहिचान आय। हमर राज्य म माटी तिहार, पंडुम हे त सरना, गंगा दशहरा भी हे। कहूं के दशहरा देवी पूजा आय त कहूं गढ़ जीतना, अउ कहूं रावण के मूर्ति अउ पूजा भी होथे। हमन ल अपन राज्य के ए बारामिंझरा, रिगी-चिंगी विविधता के आनंद लेत रहना हे, अइ हमर असली पहिचान आय, थाती ए, धरोहर आय।

संस्कृति बर परिषद के गठन किए गए हे, जे कर माध्यम से गतिविधि चलत हे। योजना आयोग के अंतर्गत भी कई समिति, उपसमिति, वर्किंग ग्रुप बने हे। बइठक भी होत हे। ध्यान रहना चाहिए कि संस्कृति-पुरातत्व के क्षेत्र म नया सोचे, करे से जादा जरूरी होथे, चले आत हे, ते व्यवस्था हर नियमित हे, ओ म कोई बड़चन तो नइ आत हे, याने ए म रख-रखाव के जरूरत अधिक होथे। कुछ समय पहिली संस्कृति बर अलग संचालनायल के मंजूरी होए हे। ए कर जरूरत बहुत समय से रहिस। का बर कि पुरातत्व के काम पिछड़ जात रहिस, सब अधिकारी-कर्मचार संस्कृति के काम म लगे रहंय। ते कारण पुरातत्व के काम मानदेय, मानद, प्रतिनियुक्ति से चलत रहे हे। अब संस्कृति बर नया रायपुर म जगह भी ठउका लिए गए हे, त जरूरी हे कि जल्दी से जल्दी संस्कृति बर अलग अधिकारी के नियुक्ति हो जाय, नइ त साना-घटा चलत रइही, सरकार जे सोच के ए निर्णय लेहे हे ते कार्यरूप म नइ आही।

कहूं मौका म श्रीकांत वर्मा जी, श्रीमती इंदिरा गांधी से पूछिन- ‘क्या आप मानती हैं कि समाज को लेखक या कि बुद्धिजीवीनेतृत्व प्रदान करता है, राजनेता नहीं? त ओ जवाब दिहिन- ‘जिस नेतृत्व की चर्चा मैं कर रही हूं वह समाज को राजनेता नहीं दे सकता। राजनेता की दिलचस्पी बहुत तात्कालिक और व्यावहारिक प्रकृति के सवालों में होती है, जबकि लेखक-बुद्धिजीवी ज्यादा गहरे प्रश्नों से साक्षात्कार करता है। उसकी चिंता का क्षेत्र मनुष्य और उसका समाज तथा उसकी नियति होती है। सांस्कृतिक समाज अउ राजनीति या सरकार के आपसी संबंध, कोन कहां, का बर, कतका जरूरी आय, साफ ढंग से कहे गए हे, ए ध्यान रखे वाला बात आय। अउ ए आधार म जरूरी होथे कि दुनों पक्ष एक-दूसर के महत्व ल समझय-मानय अउ सम्मान दय।

कला, संगीत, साहित्य, पुरातत्व के क्षेत्र म सुनइया, देखइया के पसंद, लोकप्रियता के महत्व हे, लेकिन ओ कर मुख्य होना ठीक नो हय, का बर संस्कृति तो जीवन के अंग आय, ओ हर प्रदर्शन तक, अउ ओकरे बर सीमित हो जाही, ते ल ठीक नइ माने जा सकय। संस्कृति म प्रगति, विकास अउ निर्माण अलग तरह से होथे, ओ हर दरअसल परिवर्तन होथे, हमर जीवन के परिस्थिति के अनुसार, धीरे-धीरे, कि पता नइ लगय, सहजता से बदल जाथे। समय के साथ बहुत अकन बात अउ चीज के छूटना जरूरी हो जाथे अउ समय के साथ नया के जुड़ना भी ओतके जरूरी हो जाथे। संस्कृति बर लोग अगुवा रहंय अउ जहां तक हो सकय सरकार ए काम बर ओ कर अनुसार ही चलय, त सबके कल्याण होही।

’द सूत्र‘ वाले याज्ञवल्क्य जी की जिद का मैं सम्मान करता हूं, इसके बदले वे मेरी मनाहियों को बरदाश्त करते रहते हैं। पिछले हफ्ते कुछ दिन का समय देते हुए उन्होंने ऐसा कुछ लिखने को कहा। मैंने कहा कि इतना समय हो तो यह संभव न हो सकेगा। यदि फोन रखते ही इसी काम में जुट जाउं तभी संभव हो सकेगा। फिर पुरौनी आया कि छत्तीसगढ़ी में होना चाहिए, शब्द-सीमा भी। वे मेरी मनाही का मान रखते हैं, इसलिए जवाबी, उनकी जिद पूरी करना कठिन हुआ, पर जैसे-तैसे पूरी कर सका, लगभग वही उनकी सहमति से यहां प्रस्तुत।

Wednesday, May 18, 2022

CONFLICTORIUM

आज 18 मई को अंतरराष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर सुबह-सुबह याद कर रहा हूं 24 फरवरी 2021 को, जिस दिन दो युवतियों ने कन्फ्लिक्टोरियम प्रतिनिधि के रूप में अपना परिचय दिया था। तब उनकी बातचीत का आशय, अगर मैं ठीक समझ सका तो यह था कि रायपुर, छत्तीसगढ़ में ऐसे संग्रहालय की क्या संभावना है? और इसके बारे में मैं उन्हें क्या बता सकता हूं। यानि उन्हें क्या जानना चाहिए यह भी मुझे बताना है। मुझे यह मनोरंजक पहेली जैसा लगा था।

मैंने बताया कि यह तो खल्लारी के देवपाल वाले मंदिर जैसे उदाहरणों वाला छत्तीसगढ़ है। मगर कन्फ्लिक्ट ही ठहराना हो तो वह कहां नहीं, लेकिन अक्सर बिना समझे, जल्दबाजी कर उसमें दखल देना, उसे हवा देने जैसा होता है। इसलिए मैं मानता हूं कि संग्रहालय के बजाय आचरण और व्यवहार हो, वह भी समन्वय का। वैचारिक भिन्नता तो स्वाभाविक है, रहेगी, आवश्यकता उसके प्रति उदारता की हो सकती है, ... आदि कारणों से मैं कन्फ्लिक्टोरियम जैसा कोई संग्रहालय, छत्तीसगढ़ के लिए निरर्थक मानता हूं।

मुझे तब लगा था कि ऐसे संग्रहालय का निर्णय तो किसी स्तर पर हो चुका होगा, बाद में अपनी बात पर खुद विचार करते हुए लगा था कि उसे मेरी असहमति, कन्फ्लिक्ट मान कर यहां कन्फ्लिक्टोरियम की सख्त आवश्यकता, उनके प्रतिवेदन में होगी, इसलिए समझ नहीं पाया था कि मैं इसके लिए स्वयं को सहमत मानूं या असहमत? बहरहाल, यह बात याद रह गई और पिछले दिनों आपसी चर्चा में आई, मगर आई-गई हो गई। आज फिर याद आने पर लगा कि पहले इसकी तलाश कर लेनी चाहिए।

अटकते-भटकते बैरन बाजार के जनता कालोनी में पहुंचा, वहां बोर्ड दिख गया।
तीर की दिशा में ठिठकते आगे बढ़ा, क्योंकि यह घरों के पिछवाड़े वाली गली थी, एक रहवासी गृहणी ने बताया कि सामने जाइए, बड़ा पीपल का पेड़ है, वही म्यूजियम का प्रवेश है, ऐसा लगा कि उनसे म्यूजियम का पता पहली बार किसी ने पूछा है और पता बताने के अलावा इससे उनका कोई ताल्लुक नहीं है। बताए पते पर दरवाजा बंद और उस पर बोर्ड मिला, कुछ आशा बंधी।

एक युवती पीपल के पेड़ पर जल अर्पित कर रही थी, उससे पता पूछा, उसने कहा कि प्रवेश पीछे गली से है। मैंने कहा कि गली से ही लौट कर आ रहा हूं। संयोग कि वही संग्रहालय की प्रभारी थी, इसलिए उसके बताए रास्ते, यानि घरों के पिछवाड़े वाली गली में वापस लौटा, इस बार आगे बढ़ने पर झांकता सा संकेत मिला।

अब मैं आधे बंद दरवाजे के सामने था, झिझकते हुए प्रवेश किया।
मेरा यहां तक पहुंचना उन्हें कुछ अजीब सा लग रहा था, इसलिए मैंने अनपा परिचय देना जरूरी समझा कि मुझे आकस्मिक दर्शक न मान लें। मैं इसकी पृष्ठभूमि से परिचित हूं और स्वयं संग्रहालय विज्ञान का विद्यार्थी हूं साथ ही संग्रहालय से संबंधित कामों से भी जुड़ा रहा हूं। संग्रहालय प्रभारी स्वागत की मुद्रा में तो थीं ही, अब आश्वस्त भी हो गईं। काउंटर पर देखा कि यह 14 अप्रैल 2022 से खुला है।

अंदर जाने के लिए उन्होंने मुझे हैलमेट दिया, मैंने पूछा कि किसी खतरे की आशंका है, सावधानी बरतनी है? उन्होंने आश्वस्त करते हुए टोपी पर लगे बल्व को जला दिया और बताया कि इस बंद दरवाजे के अंदर अंधेरा है, इससे आपको मदद मिलेगी। सुरंगनुमा अंधेरा संकरा गलियारा, थोड़ा उबड़-खाबड़ भी। अलग सा महसूस करते इसे पार कर आगे बढ़ते जिस कक्ष में ठहरा वहां संविधान की प्रति और अंबेडकर जी के चित्र लगे थे। अंबेडकर-संविधान ने द्वंद्व-CONFLICT को रेखांकित कर उसे मिटाने की राह बनाई? इसलिए? मुझे लगा कि इसके साथ संविधान निर्मात्री सभा के छत्तीसगढ़ के सदस्यों का भी नामोल्लेख, परिचय होता! काउंटर पर के चित्र में ‘रायपुर का अपना CONFLICTORIUM‘ लिखा है, मगर इसमें रायपुर या छत्तीसगढ़ का अपना कुछ नहीं दिखा, तो यह ‘अपना‘ बेगाना-सा लगा। अपनी इस बात से प्रभारी को अवगत कराया।
कुछ और प्रादर्श थे, प्रभारी ने उन सबसे परिचित कराया। मैं फिर पूरा समय ले कर आने की बात कहते, दर्शक पंजी पर अपना नाम दर्ज कर वापस निकल आया। इस संग्रहालय दिवस पर, इस संग्रहालय तक पहुंचने वाला मैं शायद अकेला दर्शक रहा।

Wednesday, January 26, 2022

पद्म-2022

छत्तीसगढ़ में यह साल पद्म पुरस्कारों के नाम पर सूना रहा। बधाइयों का तांता लगने का अवसर नहीं बना तो स्वाभाविक ही अफसोस, उपेक्षा, पक्षपात, क्षोभ, पात्रता, काबिलियत, प्रतिभा, राजनीति पर बातें होने लगीं। यह मौका सयापे से अधिक इस ओर ध्यान देने का है कि चूक कहां हो जाती है, हम पिछड़ कहां जाते हैं। ऐसा भी होता आया है कि किसी को नहीं मिला का शोक करने वाले, पुरस्कृत की पात्रता पर भी सवाल उठाने में देर नहीं करते। जबकि राज्य से किसी का चयन हो खुशी की बात होनी चाहिए और नाम न होने पर अफसोस करने से जल्द उबर कर, अपने प्रयासों को प्रभावी बनाते अगले साल पर ध्यान देना सार्थक होगा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि छत्तीसगढ़ में प्रतिभाओं की कमी नहीं, ऐसा भी नहीं कि पद्म पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियां न गई हों, मगर संयोग कि इस वर्ष के पद्म पुरस्कारों की सूची में छत्तीसगढ़ का नाम नहीं आया। अब तक के पद्म पुरस्कारों पर नजर डालें तो छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद 2002 और 2003 में क्रमशः हबीब तनवीर और तीजनबाई को पद्मभूषण सम्मान मिला था। इसके बाद 2006 ऐसा वर्ष था, जब छत्तीसगढ़ से कोई नाम नहीं था। यहां उल्लेख आवश्यक है कि हबीब तनवीर को यह सम्मान छत्तीसगढ़ से नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश कोटे से मिला था, उन्हें पद्मश्री सम्मान भी दिल्ली कोटे से मिला था। इसी तरह जगदलपुर वाली मेहरुन्निसा परवेज अब भोपालवासी, बिलासपुर वाले दिवंगत सत्यदेव दुबे, रायपुर वाले शेखर सेन अब पुणेवासी, स्वामी निरंजनानंद सरस्वती अब मुंगेर और भिलाई वाले बुधादित्य मुखर्जी अब कोलकातावासी, को भी अन्य राज्यों के कोटे से सम्मान मिला न कि छत्तीसगढ़ कोटे से।

याद करते चलें यद्यपि पश्चिम बंगाल कोटे से, किंतु 1965 में छत्तीसगढ़ के पद्म सम्मानित पहले व्यक्ति डॉ. द्विजेन्द्रनाथ मुखर्जी हैं। बैरन बाजार का मुखर्जी कम्पाउंड उन्हीं के नाम पर है। बताया जाता है कि बागवानी के शौकीन डॉ. मुखर्जी ने सेवानिवृत्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ जेनेवा में नियुक्ति के प्रस्ताव को बगीचे के मोह में ठुकराया और रायपुर रह गए। डा. मुखर्जी को टेनिस, फोटोग्राफी, शिकार, चित्रकारी तथा वन और पशु-पक्षियों सहित कुत्तों का शौक रहा। कविता करने वाले डॉ. मुखर्जी ने बच्चों के लिए बांग्ला में पुस्तक ‘मोनेर कोथा’ - मन की कथा, भी लिखी। वहीं छत्तीसगढ़ राज्य गठन के पूर्व एकमात्र पद्म सम्मान 1976 में मुकुटधर पाण्डेय को मिला था।

पद्म सम्मान की कार्यवाही केंद्र सरकार में गृह विभाग के अधीन होती है। पिछले वर्षों से पद्म सम्मान के लिए प्रविष्टियां आनलाइन आमंत्रित की जाती हैं। सामान्यतः नामांकन की प्रक्रिया मई माह से आरंभ हो कर प्रविष्टि की अंतिम तिथि 15 सितंबर निर्धारित होती है और अक्टूबर से चयन प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। गत वर्षों में सूचना का अधिकार के तहत ली गई जानकारी से पता चला कि आनलाइन प्रक्रिया के बाद प्रविष्टियों की संख्या दस हजार से भी अधिक होती है। जानकार बताते हैं कि प्रविष्टियों के आरंभिक परीक्षण के पश्चात नवंबर माह तक समिति सम्मान हेतु नामों का चयन कर लेती है और इसके पश्चात दिसंबर में नामों की पुष्टि और सत्यापन की कार्यवाही कर सूची को जनवरी के आरंभ तक अंतिम रूप दे दिया जाता है। प्रत्येक वर्ष 25 जनवरी इन सम्मानों के घोषणा के लिए नियत तारीख है।

अब नजर डालें छत्तीसगढ़ और सम्मान की प्रविष्टियों पर। आनलाइन के पहले ऐसे भी उदाहरण रहे हैं जब पद्म पुरस्कार के लिए प्रपत्र में प्रविष्टि तैयार कर भेजने के बजाय हस्ताक्षर अभियान चलाया गया, जैसे लाला जगदलपुरी के लिए। कई प्रविष्टियां ऐसी भी होतीं, जैसा बच्चों को स्कूल में अवकाश के लिए एक पेज का आवेदन पत्र लिखाया जाता है। निर्धारित प्रारूप और प्रक्रिया के प्रति आमतौर पर अनभिज्ञता होती थी। आनलाइन के दौर में भी ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें आवेदनकर्ता प्रविष्टि जमा करने के लिए कलेक्टर, संस्कृति विभाग या मंत्रालय के चक्कर लगाते रहते हैं और उनकी शिकायत होती है कि उनका आवेदन नहीं लिया जा रहा था या उसे दिल्ली नहीं भेजा गया। फिर जोर-जुगाड़ की संभावना, आशा और आशंका। जबकि आनलाइन आवेदन प्रक्रिया स्वयं में पूरी तरह पारदर्शी और स्पष्ट है, जिसमें आवश्यकता इस बात की होती है कि निर्धारित प्रारूप में निर्देशों के अनुकूल शब्द संख्या में जानकारी और प्रपत्र तैयार कर निर्धारित समय-सीमा में अपलोड कर दिया जाए।

पद्म सम्मानों की पात्रता और उपयुक्तता को ले कर भी टिप्पणियां की जाती हैं। इस संबंध में डा. सुरेन्द्र दुबे, अनुज शर्मा और अनूप रंजन के नामों के साथ प्रतिकूल प्रतिक्रिया आती रही थी। उक्त तीनों से मेरा व्यक्तिगत परिचय है तथा कुछ मुद्दों पर इनसे मेरी गंभीर असहमतियां और मतभेद भी हैं किंतु इनके पद्म सम्मान पर मुझे हमेशा प्रसन्नता और गर्व महसूस हुआ है। जहां तक औचित्य और पात्रता का सवाल है डॉ. सुरेन्द्र दुबे की लोकप्रियता असंदिग्ध है और अमरीकी वाइट हाउस में कविता पढ़ने जैसी उपलब्धि उनके नाम है। इसी तरह अनुज शर्मा आंचलिक फिल्मों के ऐसे कलाकार हैं, जिनके नाम सफलता और उपलब्धियों के ढेरों रेकार्ड हैं, जिन तक न सिर्फ छत्तीसगढ़, बल्कि अन्य राज्यों में शायद ही कोई पहुंचा हो। अनूप रंजन पांडेय, कई दशकों से बस्तर के अंदरूनी इलाकों में बिना किसी संस्थागत मदद के कलाकारों से नियमित संपर्क में रह कर, बस्तर की सांगीतिक परंपरा को सामने ले कर आए, वह अपने में अनूठी मिसाल है। यों भी भावनात्मक रूप से छत्तीसगढ़ या राज्य से जुड़े किसी भी व्यक्ति का सम्मानित होना, सदैव स्वागतेय होना चाहिए।

इसी क्रम में 2021 के पद्म पुरस्कार में ध्यान देने की बात है कि भिलाई के राधेश्याम बारले को पद्मश्री सम्मान मिला, पंथी नर्तक के रूप में उनकी खासी प्रतिष्ठा है मगर रायपुर, दुर्ग, राजनांदगांव और बिलासपुर के ही दस से अधिक ऐसे पंथी दल हैं जो उनके दल से कम नहीं, फिर बारले ही क्यों? यहां रेखांकित करना आवश्यक है कि पंथी के अतिरिक्त अन्य गतिविधियों तथा उनसे जुड़ी अपनी उपलब्धियों के दस्तावेजों को जमा करते हुए उन्हें सुरक्षित व्यवस्थित रखने और उन्हें प्रस्तुत करने का उन जैसा कौशल सब में नहीं होता। तात्पर्य यह कि ऐसे किसी सम्मान के लिए आवश्यक प्रक्रिया और दस्तावेज, जानकारियों का अभाव हो तो पात्र भी सम्मान पाने से वंचित हो सकते हैं। याद कर लें कि देवदास बंजारे को पद्म सम्मान नहीं मिला था।

ध्यान देना होगा कि पुरस्कार समिति के सदस्य, विचार के लिए प्रस्तुत सभी प्रविष्टियों, व्यक्तियों एवं उनकी प्रतिभा से स्वयं परिचित हों, संभव नहीं। समिति के लिए न यह अवसर होता, न ही संभव होता कि वे किसी गायक या वादक को सुन कर निर्णय लें या किसी साहित्यकार की रचना को पढ़ें या किसी समाजसेवी के काम को मौके पर जा कर देखें। उनकी भूमिका किसी न्यायाधीश की तरह होती है, जिसे उपलब्ध प्रमाण और साक्ष्य के आधार निर्णय लेना होता है, बल्कि यहां तो साक्ष्य यानि गवाही लेना भी संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में सारा निर्णय प्रविष्टि में प्रस्तुत जानकारी और उन जानकारियों की पुष्टि के लिए संलग्न दस्तावेज के आधार पर करना होता है। संक्षेप में, वस्तुपरक जानकारी के व्यक्तिपरक परीक्षण से निर्णय लिए जाते हैं। ऐसी स्थिति में पूरी संभावना होती है कि कम योग्य, बेहतर दस्तावेज वाली प्रविष्टि, प्रतिभाशाली किंतु मामूली दस्तावेजों वाली प्रविष्टि की तुलना में सम्मान की हकदार बन जाए।

कुछ अन्य बातें। एक ओर छत्तीसगढ़ के धरमपाल सैनी और दामोदर गणेश बापट पद्म सम्मानित हुए। वहीं पी.डी. खेड़ा, केयूर भूषण, पवन दीवान, गहिरा गुरु का नाम इस सूची में शामिल नहीं हुआ, इसका तात्पर्य यह नहीं कि इनमें से कोई नाम सम्मान के उपयुक्त नहीं था। इसी तरह साहित्य के क्षेत्र में विनोद कुमार शुक्ल और राजेश्वर दयाल सक्सेना को अब तक पद्म सम्मान नहीं मिला है। लाला जगदलपुरी, बिमलेंदु मुखर्जी, अरुण कुमार सेन, तुलसीराम देवांगन, गुणवंत व्यास, पीडी आशीर्वादम, बसंत तिमोथी, मनीष दत्त का नाम भी इस संदर्भ में याद किया जाना चाहिए, जिन्हें पद्म सम्मान नहीं मिला। पुरातत्व के क्षेत्र में डा. विष्णु सिंह ठाकुर के अवदान को भी नहीं भुलाया जा सकता। विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय ऐसे कई नाम निर्विवाद हैं, जिनकी पात्रता पर कोई सवाल नहीं हो सकता, जिनमें उदाहरणस्वरूप नाम डॉ. योगेश जैन, डॉ. ओमप्रकाश वर्मा, डॉ. आदित्य प्रताप देव, ट्रांसजेंडर विद्या राजपूत हैं। इनमें ऐसे लोग भी हैं, जो किसी सम्मान, पुरस्कार के लिए उद्यत नहीं रहे, जबकि इसके लिए जागरूकता और पुरस्कार के लिए आवश्यक प्रक्रिया अनुकूल उद्यम आवश्यक होता है। इसलिए पुरस्कार को मात्र योग्यता और पात्रता से सीधे जोड़ कर देखना उचित नहीं होता।

सम्मान के निर्धारित विभिन्न क्षेत्र संक्षेप में यथा- कला, सामाजिक कार्य, सार्वजनिक क्षेत्र, विज्ञान-प्रौद्योगिकी, व्यापार-उद्योग, चिकित्सा, साहित्य-शिक्षा, लोक सेवा, खेल तथा अन्य, शासन की अधिकृत वेबसाइट पर स्पष्ट विस्तार से दर्शित होते हैं। आनलाइन नामांकन में सामान्यतः नामांकन विवरण, प्रशस्ति 800 शब्द, महत्वपूर्ण योगदान/ उपलब्धि 250 शब्द/ पुरस्कार-मान्यता राज्य, राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय 250-250 शब्द/ काम का प्रभाव-क्षेत्र में योगदान 250 शब्द/ समाज को योगदान 250 शब्द/ फोटो 1 एमबी/ दस्तावेज 5 एमबी की सीमा होती है, जिसके साथ स्पष्ट निर्देश भी होते हैं। सभी प्रविष्टियां समिति को प्रस्तुत की जाती हैं, जिसके प्रमुख कैबिनेट सचिव होते हैं। समिति में गृह सचिव, माननीय राष्ट्रपति के सचिव और चार से छह प्रख्यात व्यक्ति, सदस्य शामिल होते हैं। समिति की अनुशंसा प्रधानमंत्री जी को माननीय राष्ट्रपति के अनुमोदन हेतु प्रस्तुत की जाती है। पद्म सम्मान के लिए प्रक्रिया को मोटे तौर पर समझने के लिए यह जानकारी दी जा रही है, किंतु इसकी पुष्टि अधिकृत वेबसाइट से अवश्य कर लेवें।

इस वर्ष पद्म-सूनेपन के साथ तोहमत और सयापे से जितनी जल्दी हो सके उबरना श्रेयस्कर और इसके प्रति जागरूकता के साथ उपयुक्त प्रयास की ओर ध्यान देना आवश्यक, ताकि अगले वर्षों में राज्य में बधाइयों का संयोग लगातार बनता रहे।

Sunday, January 23, 2022

जैन शिल्प-संपदा

भगवान महावीर की  2600 वीं जयन्ती महोत्सव के अवसर पर, जैन अध्ययन संस्थान, रायपुर, छत्तीसगढ़ द्वारा सन 2001 में ‘छत्तीसगढ़ का जैन शिल्प‘ पुस्तिका प्रकाशित की गई थी, जिसका संपादन डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम ने किया था। श्री रमेश जैन सह-सम्पादक थे। पुस्तिका में डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम का ‘छत्तीसगढ़ में जैन धर्म एवं कला का सर्वेक्षण‘ महत्वपूर्ण लेख है। इस लेख में रायपुर, बिलासपुर संग्रहालय और परगनिहादेव (विमलनाथ) मंदिर, मल्हार की जैन प्रतिमाओं के साथ आरंग, सिरपुर, राजिम, (नगपुरा),मल्हार, रतनपुर, धनपुर, नेतनागर, पुजारीपाली, महेशपुर, अड़भार, कुरुसपाल, गढ़ बोदरा, बारसूर, कुम्ही, केशगवां से प्राप्त प्रस्तर प्रतिमाओं का उल्लेख है, जिनमें धनपुर की तीर्थंकर प्रतिमाएं शैलोत्खात हैं। इसी प्रकार सिरपुर से प्राप्त नवग्रहयुक्त ऋषभदेव तथा ऋषभदेव की ही एक अन्य धातु प्रतिमा के अलावा आरंग से प्राप्त पार्श्वनाथ तथा शीतलनाथ की दो, इस प्रकार कुल तीन स्फटिक प्रतिमाओं का उल्लेख है।
इस पुस्तिका में मेरा लेख  बिलासपुर संग्रहालय की जैन शिल्प-सम्पदा सम्मिलित है, आंशिक संशोधन सहित यहां प्रस्तुत-

दक्षिण कोसल के प्राचीन इतिहास एवं पुरातत्व की दृष्टि से बिलासपुर क्षेत्र अत्यधिक समृद्ध है। यहाँ के विशिष्ट कला केन्द्रों के रूप में मल्हार, ताला, रतनपुर, अड़भार, शिवरीनारायण आदि स्थलों को विशेष रूप से रखांकित किया जा सकता है। इस क्षेत्र में दक्षिण कोसल के प्राचीन से राजवंशों शरभपुरीय, सोम-पाण्डुवंशीय तथा कलचुरि के काल में निर्मित शैव, वैष्णव, बौद्ध एवं जैन धर्म से संबंधित शिल्प सम्पदा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। तत्कालीन राजवंशों की धार्मिक सहिष्णुता एवं उदारता के फलस्वरुप सभी धर्मों के देवालय, मठ और विहारों का निर्माण सम्पूर्ण दक्षिण कोसल क्षेत्र में दिखाई देता है।

बिलासपुर जिले में शरभपुरीय एवं पाण्डुवंशीय राजाओं के शासनकाल में मल्हार और कलचुरियों के शासन काल में रतनपुर विशेष महत्व के रहे हैं। छत्तीसगढ़ अंचल में प्राचीन मंदिरों के भग्नावशेषों से निर्मित अनेक देवालयों में शैव, वैष्णव के साथ-साथ बौद्ध और जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएँ भी भित्तियों में जड़ी हुई हैं तथा कहीं-कहीं ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिष्ठापित भी हैं, जिनकी पूजा-आराधना सम्मिलित रूप से की जाती है। यह जनमानस की अज्ञानता, रुढ़िवादिता अथवा धर्म-भीरुता का उदाहरण नहीं है अपितु पाषाण में प्रतिष्ठित देवात्मा की आराधना तथा कला-अवशेषों का मूल्यांकन एवं अपनी संस्कृति के प्रति जागरुकता का समग्र रुप भी है।

बिलासपुर जिले में जैन धर्म की कलाकृतियों के प्रारंभिक उदाहरण मल्हार से प्राप्त हुए हैं। सोमवंश के शासकों के काल लगभग 7-8वीं सदी ईस्वी में मल्हार, धार्मिक केन्द्र के रुप में विकसित हो चुका था। इस काल की अधिकांश प्रतिमाएँ भूरा-बलुआ प्रस्तर से निर्मित हैं। कलचुरियों के काल में जैन धर्म की लोक-व्यापी स्वरुप देखने को मिलता है। 10-11वीं सदी ईस्वी में जैन कलाकृतियों के प्रचुर अवशेषों से यह भी आभासित होता है कि शैव एवं वैष्णव धर्म के आचार-विचार तथा प्रतिमा-शास्त्रीय मान्य सिद्धांत जैन स्थापत्य कला में भी अनेक अंशों में ग्राह्य हो चुके थे। प्रतिमा विज्ञान में यह तीर्थंकर आदिनाथ, अम्बिका, गोमुख यक्ष, मातृकाओं तथा नवग्रहों के विश्लेषणात्मक अध्ययन से विशेष रुप से स्पष्ट होता है।

जिला पुरातत्व संग्रहालय, बिलासपुर में बिलासपुर क्षेत्र की जैन प्रतिमाओं का अच्छा संग्रह है। इन प्रतिमाओं का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
 
तीर्थंकर
प्राप्ति स्थल - रतनपुर, सामग्री - ग्रेनाइट प्रस्तर, माप - 64X42X20 सेंटीमीटर, काल - 11 वीं सदी ईस्वी। प्रतिमा का अधिष्ठान भाग खण्डित होने के कारण तीर्थंकर का अभिज्ञान संभव नहीं है। तीर्थंकर को पद्मासन में ध्यान मुद्रा में प्रदर्शित किया गया है। उनके शिरोभाग के पीछे वृत्ताकार मणि-मुक्ता जड़ित प्रभामण्डल है तथा ऊपरी भाग में त्रिशिखर छत्र अभिषेकरत गजयुक्त मालाधारी विद्याधर-युगल प्रदर्शित हैं। तीर्थंकर के शीर्ष पर उष्णीशबद्ध बुदबुदाकार केश हैं। कंधों तक स्पर्श करते हुए. लंबे कान, वक्ष पर श्री-वत्स चिन्ह तथा गले पर आवर्त रेखाएँ दृष्टव्य हैं। उनकी मुख-मुद्रा अत्यन्त सौम्य है। मध्य भाग पर दोनों ओर चंवरधारी इन्द्र द्विभंग में प्रदर्शित हैं। तीर्थंकर प्रतिमा की दोनो हथेलियां एवं अधिष्ठान पर, लांछन भग्न है।

तीर्थंकर आदिनाथ
प्राप्ति स्थल - रतनपुर, सामग्री - ग्रेनाइट प्रस्तर, माप - 50X48X18 सेंटीमीटर, काल - 11 वीं सदी ईस्वी। तीर्थंकर आदिनाथ प्रतिमा का उर्ध्वभाग अत्यंत कलात्मक है। उनके शिरोभाग पर जटाजूट बद्ध केशराशि का अंकन है जिसकी लटें स्कंध पर्यन्त विस्तीर्ण हैं। शिरोभाग के पीछे अलंकृत प्रभामण्डल है, जिसके ऊपर त्रिशिखर छत्र, दुन्दुभिवादक, अभिषेकरत गज-युग्म तथा बाह्य पार्श्व में मालाधारी विद्याधारी-युगल दृष्टव्य हैं। आदिनाथ के समीप दोनों ओर स्थित चंवरधारी इन्द्र अवशिष्ट हैं। इस प्रतिमा का वक्ष भाग खंडित है तथा मध्यभाग अनुपलब्ध है।

तीर्थंकर आदिनाथ
प्राप्ति स्थल - रतनपुर, सामग्री - ग्रेनाइट प्रस्तर, माप - 75X51X24 सेंटीमीटर, काल - 11 वीं सदी ईस्वी। तीर्थंकर आदिनाथ पद्मासन में ध्यानमग्न अवस्थित हैं। उनके मुख पर ध्यान के भाव हैं। शिरोभाग पर जटा भारयुक्त गुंफित केश हैं तथा स्कंध पर्यन्त विस्तीर्ण हैं। शिरोभाग के पीछे वृत्ताकार अलंकृत प्रभामण्डल अवशिष्ट है तथा अन्य प्रतीक भग्न हैं। वक्ष पर श्रीवत्स लांछन है। उनके दायें ओर चंवरधारी इन्द्र स्थित हैं। सिंहासन के उत्कीर्ण पटल के मध्य प्रसन्न मुख बलिष्ठ नंदी दृष्टव्य है जिसके नीचे धर्मचक्र एवं उपासना करते प्रतिष्ठापक दम्पत्ति तथा अन्य आराधक अंकित हैं। सिंहासन के दोनों ओर सिंह बैठे हुये दृष्टव्य हैं।

तीर्थंकर मल्लिनाथ
प्राप्ति स्थल - रतनपुर, सामग्री - ग्रेनाइट प्रस्तर, माप - 97X26X19 सेंटीमीटर, काल - 11 वीं सदी ईस्वी। तीर्थंकर मल्लिनाथ की स्थानक प्रतिमा ध्यानस्थ प्रदर्शित है। उनके शिरोभाग पर उण्णीषबद्ध बुदबुदाकार केश हैं। उनके कर्ण तथा भुजाएं अत्याधिक बड़े हैं जो क्रमशः कंधा तथा घुटनों तक विस्तृत हैं। वक्ष पर श्रीवत्स लांछन दृष्टव्य है। तीर्थंकर मल्लिनाथ के शिरोभाग के पीछे वृत्ताकार, अलंकृत प्रभामण्डल है तथा शिखर छत्र, दुन्दुभिवादक अभिषेक करते गज-युग्म, मालाधारी विद्याधर आदि दृष्टव्य हैं। नीचे पैरों के समीप चंवरधारी इन्द्र एवं शासन यक्ष-यक्षिणी कुबेर और अपराजिता लघु रूप में दृष्टव्य हैं। अधिष्ठान भाग पर अंकित उत्कीर्ण पटल पर तीर्थंकर मल्लिनाथ का लांछन, ‘कलश‘ चिह्न का अंकन है। सिंहासन पर दोनों ओर सिंह प्रदर्शित हैं।

तीर्थंकर
प्राप्ति स्थल - रतनपुर, सामग्री - ग्रेनाइट प्रस्तर, माप - 70X20X12 सेंटीमीटर, काल - 11 वीं सदी ईस्वी। तीर्थंकर समभाग स्थानक मुद्रा में खड़े हैं। उनके मस्तक पर बुदबुदाकार उष्णीषबद्ध केश हैं। मुख पर ध्यान के भाव है तथा नेत्र अर्धनिमीलित हैं। उनके कान कंधों तक विस्तीर्ण हैं तथा भुजाएं घुटनों को स्पर्श कर रही हैं। वक्ष पर मध्य में श्रीवत्स लांछन हैं। तीर्थंकर के शिरोभाग के पीछे वृत्ताकार प्रभामण्डल है तथा दुन्दुभिवादक, त्रिशिखर छत्र, अभिषेकरत गज-युग्म एवं मालाधारी विद्याधर आदि पारंपरिक अलंकरण हैं। नीचे पैरों के समीप चंवरधारी इन्द्र अवशिष्ट हैं।

गोमेद-अंबिका
प्राप्ति स्थल - दारसागर, सामग्री - बलुआ पाषाण, माप - 85X58X18 सेंटीमीटर, काल - 11 वीं सदी ईस्वी। आम्र वृक्ष के नीचे गोमेद तथा अंबिका अर्ध पर्यंकासन में बैठे हुए प्रदर्शित हैं। गोमेद का मुख तथा दाहिना हाथ भग्न है। उनके बायें हाथ में अस्पष्ट वस्तु है। अंबिका के शिरोभाग पर किरीट मुकुट है तथा चक्राकार कुंडल, मुक्ताहार, स्तनसूत्र, भुजबंध, कटिसूत्र एवं नुपूर पहने हुई हैं। उनके दायें हाथ में बीजपूरक है तथा बायां हाथ भग्न है। अधिष्ठान भाग पर मध्य में पद्मासन आराधक अनुचरों सहित दृष्टव्य हैं। इस प्रतिमा में शिशु रूपायित नहीं हैं।

बाहुबली
प्राप्ति स्थल - रतनपुर, सामग्री - भूरा बलुआ प्रस्तर, माप - 80X23X18 सेंटीमीटर, काल - 11 वीं सदी ईस्वी। बाहुबली की यह प्रतिमा रतनपुर के पुलिया में जड़ी हुई थी, जिसे वहाँ से निकाले जाने के पश्चात् संग्रहालय में लाया गया है। यह छत्तीसगढ़ में ज्ञात एकमात्र बाहुबली की प्रतिमा है। जैन पुराणों में बाहुबली के द्वारा मोक्ष प्राप्ति के लिए अत्यंत कठिन तपश्चर्या की कथा है जिसमें उल्लेख है कि उनके निश्चल देह पर लता गुल्म विकसित-पल्लवित हो गये थे। बाहुबली की यह तपस्या जैन धर्म की एक अत्यंत प्रभावोत्पादक कथा है। संग्रहालय की इस प्रतिमा में उपरोक्त तपश्चर्या का शिल्पीय रुपांकन है। बाहुबली समपाद स्थानक मुद्रा में स्थित रहकर तप कर रहे में हैं। उनके मुख पर असीम ध्यान के भाव हैं। शिरोभाग के पीछे वृत्ताकार प्रभामण्डल है। उनके जांघों के ऊपर लता गुल्म स्वाभाविक रुप से लिपटे हुए हैं तथा छिपकली सदृश्य एक जन्तु भी अंकित है। अंत में पैरों के समीप दोनों ओर चंवरधारी देव दृष्टव्य हैं। सिंहासन पीठिका पर मध्य में उत्कीर्ण पटल, धर्म चक्र तथा सिंह दृष्टव्य है।

उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि बिलासपुर जिले से ही नहीं अपितु संपूर्ण छत्तीसगढ़ क्षेत्र में जैन धर्म के पर्याप्त अनुयायी थे तथा कुछ अंशों में इन्हें राज्याश्रय भी प्राप्त था। इन प्राचीन प्रतिमाओं के अध्ययन से हमें तत्कालीन धार्मिक सद्भाव, कलात्मक प्रवृत्तियाँ, लोक-व्यवहार तथा शिल्पीय प्रवृत्तियों की जानकारी भी प्राप्त होती है। जैन प्रतिमा विज्ञान का अध्ययन तथा उपलब्ध कलाकृतियों के सूक्ष्म अवलोकन से शास्त्रीय वर्णन तथा शिल्पीय कर्म-कौशल के मध्य एक सुदृढ़ ज्ञान-विज्ञान की प्रचलित परम्परा का संवहन स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

पुनश्च- उक्त लेख में जैन-परंपरा की तीन अन्य प्रतिमाओं का उल्लेख यहां जोड़ा जा रहा है, जो श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, अकलतरा, जिला- जांजगीर-चांपा के नाम पर 24.09.86 को पंजीकृत तथा 31.01.08 को बिलासपुर संग्रहालय के लिए संकलित की गईं हैं। उक्त तीनों प्रतिमाएं रजिस्ट्रीकरण अधिकारी कार्यालय, बिलासपुर में पंजीकृत हैं। इनमें, पार्श्वनाथ (पंजीयन क्र. 561), 12 वीं सदी ईस्वी- काले ग्रेनाइट पत्थर की पद्मासन में बैठी प्रतिमा है। पंचफण नाग, पादपीठ पर सर्प लांछन है। ऋषभदेव (पंजीयन क्र. 562), 12 वीं सदी ईस्वी- लाल बलुआ पत्थर की पद्मासन में बैठी प्रतिमा है। शीर्ष पर प्रभामण्डल है। पादपीठ पर लांछन स्पष्ट नहीं है। संभवनाथ (पंजीयन क्र. 563), 11 वीं सदी ई.- काले ग्रेनाइट पत्थर की कायोत्सर्ग मुद्रा की प्रतिमा है। पादपीठ पर अश्व लांछन है।

Saturday, January 22, 2022

छत्तीस पांती तालाब

छत्तीसगढ़ के तालाबों और जल-प्रबंधन पर लिखते हुए कभी बात हुई कि इन जानकारियों को जल-जीवन, तालाब की छत्तीस पांती (पंक्ति) के रूप में किस तरह सजाया जा सकता है, इसी प्रयास का परिणाम-

01. छत्तीसगढ़ में जल-संसाधन और प्रबंधन की समृद्ध परम्परा के प्रमाण, तालाबों के साथ विद्यमान है और इसलिए तालाब स्नान, पेयजल और अपासी (आबपाशी या सिंचाई) आवश्यकताओं की प्रत्यक्ष पूर्ति के साथ जन-जीवन और समुदाय के वृहत्तर सांस्कृतिक संदर्भयुक्त बिन्दु हैं।

02. नौ लाख ओड़िया, नौ लाख ओड़निन के उल्लेख सहित दसमत कइना की गाथा, एक लाख मवेशियों का कारवां लेकर चलने वाला लाखा बंजारा और नायकों के स्वामिभक्त कुत्ते का कुकुरदेव मंदिर सहित उनके खुदवाए तालाब, लोक-स्मृति में जीवन्त हैं।

03. खमरछठ (हल-षष्ठी) की पूजा के साथ प्रतीकात्मक तालाब-रचना और संबंधित कथा में तथा बस्तर अंचल की लछमी जगार गाथा में तालाब खुदवाने संबंधी मान्यता और सुदीर्घ परम्परा का संकेत है।

04. सरगुजा अंचल में कथा चलती है कि पछिमहा देव ने सात सौ तालाब खुदवाए थे और राजा बालंद, कर के रूप में खीना लोहा वसूलता और जोड़ा तालाब खुदवाता। उक्ति है- सात सौ फौज, जोड़ा तलवा; अइसन रहे बालंद रजवा।

05. यह रोचक है कि छत्तीसगढ़ में आमतौर पर समाज से दूरी बनाए रखने वाले नायक, सबरिया, भैना, लोनिया, बेलदार और रामनामियों की भूमिका तालाब निर्माण में महत्वपूर्ण होती है और उनकी विशेषज्ञता तो काल-प्रमाणित है ही।

06. छत्तीसगढ़ में पड़े भीषण अकाल के समय किसी अंग्रेज अधिकारी द्वारा खुदवाए गए उसके नाम स्मारक बहुसंख्य ‘लंकेटर तालाब’ अब भी जल आवश्यकता की पूर्ति और राहत कार्य के संदर्भ सहित विद्यमान हैं।

07. छत्तीसगढ़ के ग्रामों में तालाबों की बहुलता इतनी कि ‘छै आगर छै कोरी’, यानि 126 तालाबों की मान्यता रतनपुर, मल्हार, खरौद, महन्त, अड़भार, आरंग, धमधा जैसे कई स्थानों के साथ सम्बद्ध है। बस्तर अंचल के बारसूर, बड़े डोंगर, कुरुसपाल और बस्तर आदि ग्रामों में ‘सात आगर सात कोरी’ (147) तालाबों की मान्यता है, इन गांवों में आज भी बड़ी संख्या में तालाब विद्यमान हैं।

08. भीमादेव, बस्तर में पाण्डव नहीं, बल्कि पानी के देवता हैं। बस्तर में विवाह के कई नेग-चार पानी और तालाब से जुड़े हैं। विवाह के अवसर पर दूल्हा अपनी नव विवाहिता को पीठ पर लाद कर स्नान कराने जलाशय ले जाता है और पीठ पर लाद कर ही लौटता है।

09. छत्तीसगढ़ में छत्तीस से अधिक संख्या में परिखायुक्त मृत्तिका-दुर्ग (मिट्टी के किले या गढ़) जांजगीर-चांपा जिले में ही हैं, इन गढ़ों का सामरिक उपयोग संदिग्ध है किन्तु गढ़ों के साथ खाई, जल-संसाधन की दृष्टि से आज भी उपयोगी है।

10. छत्तीसगढ़ में तालाबों के विवाह की परम्परा भी है, जिस अनुष्ठान (लोकार्पण का एक स्वरूप) के बाद ही उसका सार्वजनिक उपयोग आरंभ होता था। विवाहित तालाब की पहचान सामान्यतः तालाब के बीच स्थित स्तंभ से होती है। इस स्तंभ से घटते-बढ़ते जल-स्तर की माप भी हो जाती है।

11. छत्तीसगढ़ में तालाबों के विवाह की परम्परा रही है और कुछ तालाब अविवाहित भी रह जाते हैं, लेकिन ऐसे तालाबों का अनुष्ठानिक महत्व बना रहता है क्योंकि ऐसे ही तालाब के जल का उपयोग चिन्त्य या पीढ़ी पूजा के लिए किया जाता है।

12. जांजगीर-चांपा जिले के किरारी के हीराबंध तालाब से प्राप्त काष्ठ-स्तंभ, उस पर खुदे अक्षरों के आधार पर दो हजार साल पुराना प्रमाणित है। इस उत्कीर्ण लेख से तत्कालीन राज पदाधिकारियों की जानकारी मिलती है।

13. तालाबों के स्थापत्य में कम से कम मछन्दर (पानी के सोते वाला तालाब का सबसे गहरा भाग), नक्खा या छलका (लबालब होने पर पानी निकलने का मार्ग), गांसा (तालाब का सबसे गहरा किनारा), पैठू (तालाब के बाहर अतिरिक्त पानी जमा होने का स्थान), पुंछा (पानी आने व निकासी का रास्ता) और मेढ़-पार होता है।

14. तालाबों के प्रबंधक अघोषित-अलिखित लेकिन होते निश्चित हैं, जो सुबह पहले-पहल तालाब पहुंचकर घटते-बढ़ते जल-स्तर के अनुसार घाट-घठौंदा के पत्थरों को खिसकाते हैं, घाट की काई साफ करते हैं, दातौन की बिखरी चिरी को इकट्ठा कर हटाते हैं और इस्तेमाल के इस सामुदायिक केन्द्र के औघट (पैठू की दिशा में प्रक्षालन के लिए स्थान) आदि का अनुशासन कायम रखते हैं।

15. तालाबों के पारंपरिक प्रबंधक ही अधिकतर दाह-संस्कार में चिता की लकड़ी जमाने से लेकर शव के ठीक से जल जाने और अस्थि-संचय करा कर, उस स्थान की शांति- गोबर से लिपाई तक की निगरानी करते हुए सहयोग देता है और घंटहा पीपर (दाह-क्रिया के बाद जिस पीपल के वृक्ष पर घट-पात्र बांधा जाता है) के बने रहने और आवश्यक होने पर इस प्रयोजन के वृक्ष-रोपण की व्यवस्था भी वही करता है। ऐसे व्यक्ति मान्य उच्च वर्णों के भी होते हैं।

16. तालाबों का नामकरण सामान्यतः उसके आकार, उपयोग, चरित्र पर आधारित होता है, इनमें खइया, नइया, पचरिहा, खो-खो तालाब, पनपिया, सतखंडा, अड़बंधा, डोंगिया, गोबरहा, पुरेनहा, देउरहा, नवा तलाव, पथर्रा, कारी, पंर्री जैसे नाम हैं।

17. तालाबों का नामकरण उसके चरित्र-इतिहास और व्यक्ति नाम पर भी आधारित होता है, जैसे- फुटहा, दोखही, भुतही, छुइहा, फूलसागर, मोतीसागर, रानीसागर, राजा तालाब, गोपिया, भीमा आदि। बरात निकासी, आगमन व पड़ाव से सम्बद्ध तालाब का नाम दुलहरा पड़ जाता है।

18. पानी और तालाब से संबंधित ग्राम-नामों की लंबी सूची है इनमें उद, उदा, दा, सर (सरी भी), सरा, तरा (तरी भी), तराई, ताल, चुआं, बोड़, नार, मुड़ा, पानी आदि जलराशि-तालाब के समानार्थी शब्दों के मेल से बने गांवों के नाम आम हैं।

19. जल अभिप्राय के उद, उदा, दा जुड़कर बने ग्राम नाम के कुछ उदाहरण बछौद, हसौद, तनौद, मरौद, रहौद, लाहौद, चरौदा, कोहरौदा, बलौदा, मालखरौदा, चिखलदा, रिस्दा, परसदा, फरहदा हैं।

20. जल अभिप्राय के सर, सरा, सरी, तरा, तरी, के मेल से बने ग्राम नाम के उदाहरण बेलसर, भड़ेसर, लाखासर, खोंगसरा, अकलसरा, तेलसरा, बोड़सरा, सोनसरी, बेमेतरा, बेलतरा, सिलतरा, भैंसतरा, अकलतरा, अकलतरी है।

21. तालाब समानार्थी तरई या तराई तथा ताल के साथ ग्राम नामों की भी बहुलता है। कुछ नमूने डूमरतराई, शिवतराई, पांडातराई, बीजातराई, सेमरताल, उड़नताल, सरिसताल, अमरताल हैं।

22. चुआं, बोड़ और सीधे पानी जुड़कर बने गांवों के नाम बेंदरचुआं, घुंईचुआं, बेहरचुआं, जामचुआं, लाटाबोड़, नरइबोड़, घघराबोड़, कुकराबोड़, खोंगापानी, औंरापानी, छीरपानी, जूनापानी जैसे ढेरों उदाहरण हैं।

23. तालाबों और स्थानों का नाम सागर, डबरा तथा बांधा आदि से मिल कर भी बनता है तो जलराशि सूचक बंद के मेल से बने कुछ ग्राम नाम ओटेबंद, उदेबंद, कन्हाइबंद, बिल्लीबंद, टाटीबंद जैसे हैं।

24. तालाब अथवा जल सूचक स्वतंत्र ग्राम-नाम तलवा, झिरिया, बंधवा, सागर, डबरी, डभरा, गुचकुलिया, कुंआ, बावली, पचरी, पंचधार, सेतगंगा, गंगाजल, नर्मदा और निपनिया भी हैं।

25. छत्तीसगढ़ की प्रमुख नदी का नाम महानदी और सरगुजा में महान नदी है तो एक जिला मुख्यालय का नाम महासमुंद है और ग्राम नाम बालसमुंद (बेमेतरा) भी है लेकिन रायपुर जिले के पलारी ग्राम का बालसमुंद, विशालकाय तालाब है। जगदलपुर का समुद्र या भूपालताल बड़ा नामी है।

26. कार्तिक-स्नान, ग्रहण-स्नान, भोजली, मृतक संस्कार के साथ नहावन और पितृ-पक्ष की मातृका नवमी के स्नान-अनुष्ठान, ग्राम-देवताओं की बीदर-पूजा, अक्षय-तृतीया पर बाउग (बीज बोना) और विसर्जन आदि और पानी कम होने जाने पर मतावल, तालाब से सम्बद्ध विशेष अवसर हैं।

27. हरेली (सावन अमावस्या) की गेंड़ी को पोरा (भाद्रपद अमावस्या) के दिन तालाब का तीन चक्कर लगाकर गेंड़ी के पउवा (पायदान) का विसर्जन तालाब में किए जाने का लोक विधान है और विसर्जित सामग्री के समान मात्रा की लद्दी (गाद) तालाब से निकालना पारम्परिक कर्तव्य माना जाता है।

28. गांवजल्ला (ग्रामवासियों द्वारा मिल-जुल कर) लद्दी (गाद) निकालने के लिए गांसा काट कर तालाब खाली कर लिया जाता है। पानी सूख जाने पर तालाब में झिरिया (पानी जमा करने के लिए छोटा गड्ढ़ा) बना कर पझरा (पसीजे हुए) पानी से आवश्यकता पूर्ति होती है।

29. तालाब की सत्ता, उसके पारिस्थितिकी-तंत्र के बिना अधूरी है, जिसमें जल-वनस्पति, सीप-घोंघी, जोंक, संधिपाद, चिड़िया (ऐरी), मछलियां, उभयचर आदि और कहीं-कहीं ऊद व मगर भी होते हैं।

30. जलीय जन्तुओं को देवतुल्य सम्मान देते हुए सोने का नथ पहनी मछली और लिमान (कछुआ) का तथ्य और उससे सम्बद्ध विभिन्न मान्यताएं तालाब की पारस्थितिकी सत्ता के पवित्रता और निरंतरता की रक्षा करती हैं।

31. जल की रानी, मछलियों के ये नाम छत्तीसगढ़ में सहज ज्ञात होते हैं- डंडवा, घसरा, अइछा, सोढ़िहा या सोंढ़ुल, लुदू, बंजू, भाकुर, पढ़िना, भेंड़ो, बामी, काराझिंया, खोखसी या खेकसी, झोरी, सलांगी या सरांगी, डुडुंग, डंडवा, ढेंसरा, बिजरवा, खेगदा, तेलपिया, ग्रासकाल।

32. तालाब जिनकी दिनचर्या का हिस्सा हैं, उनके जबान पर कटरंग, सिंघी, लुडुवा, कोकिया, रेछा, कोतरी, खेंसरा, गिनवा, टेंगना, मोहराली, सिंगार, पढ़िना, भुंडी, सांवल, बोलिया या लपची, रुखचग्घा, केवई, मोंगरी, पथर्री, चंदैनी, कटही, भेर्री, कतला, रोहू और मिरकल मछलियों के नाम भी सहज आते हैं।

33. सामुदायिक-सहकारी कृषि का क्षेत्र- बरछा, कुसियार (गन्ना) और साग-सब्जी की पैदावार के लिए नियत तालाब से लगी भूमि, पारंपरिक फसल चक्र परिवर्तन और समृद्ध-स्वावलंबी ग्राम की पहचान माना जा सकता है। आम के पेड़ों की अमरइया भी प्रमुख तालाब के अभिन्न अंग होते हैं।

34. तालाब स्नान के बाद जल अर्पित करने के लिए शिवलिंग, मंदिर, देवी का स्थान- माताचौंरा या महामाया और शीतला की मान्यता सहित नीम के पेड़ और अन्य वृक्षों में पीपल (घंटहा पीपर) भी तालाबों के अभिन्न अंग हैं।

35. छत्तीसगढ़ में तालाब के साथ जुड़े मिथक, मान्यता और किस्सों में झिथरी, मिरचुक, तिरसाला, डोंगा, पारस-पत्थर, हंडा-गंगार, पूरी बरात तालाब में डूब जाना जैसे पात्र और प्रसंग तालाब के चरित्र को रहस्यमय और अलौकिक बनाती है।

36. तालाब से जुड़ी दंतकथाओं में पत्थर की पचरी, मामा-भांजा की कथा, राहगीरों के उपयोग के लिए तालाब से बर्तन निकलना और भैंसे के सींग में चीला अटक जाने से किसी प्राचीन निर्मित या प्राकृतिक तालाब के पता लगने का विश्वास, जन-सामान्य के इतिहास-जिज्ञासा की पूर्ति करता है।

Sunday, October 17, 2021

छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ी और छत्तीसगढ़िया

छत्तीसगढ़ की भूमि का स्वभाव शांत, सौम्य और संतुष्ट है। यह विशिष्टता अगर किसी पूरे भौगोलिक खण्ड में सामान्य-सहज ढंग से उपलब्ध हो तो यह निश्चय ही अत्यंत सम्पन्न सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर ही विकसित होना संभव है।

कहावत है कि ‘पूत के पांव पालने में दिखाई पड़ते हैं’ और इतिहास की झलकियां इस अंचल की विशिष्टताओं की साक्षी हैं। इस सांस्कृतिक विरासत के रूप-आकार में हमारा समष्टि उद्यम तो कारक बना ही, प्राकृतिक स्थितियों का महत्व भी कम नहीं है। छत्तीसगढ़ की पहाड़ियों और वन-कान्तार में जैव विविधता, खनिज-सम्पदा, नदी-नाले, वह सभी कुछ है, जो सभ्यता-शिशु को अपनी गोद में दुलार-संवार कर पाल-पोसकर सक्षम बना सकता है। इस भूभाग के उपजाऊ मैदान से छत्तीसगढ़ की पहचान सिर्फ ‘धान का कटोरा’ कहकर किया जाना, अंचल को कमतर आंकना होगा। प्रकृति ने इस अंचल को विशिष्टता प्रदान की है और उसका सम्मान कर अंचल ने जो प्रतिमान रचे-गढ़े हैं, वही पृष्ठभूमि इस सम्पन्न धरती पुत्रों की संतुष्टि और शालीनता में अभिव्यक्त होती है। सभ्यता विकास के विभिन्न चरणों के लिए इस धरती की उपयुक्तता सहज देखी जा सकती है, जहां इतिहास में ऋषभतीर्थ-गुंजी विकसित हुआ उसी से जुड़ा आधुनिक औद्योगिक तीर्थ कोरबा भी बुलंदियों पर है। चित्रकला, मूर्तिकला, भाषा-लिपि के विभिन्न अप्रतिम, सर्वोच्च, सर्वप्रथम और विशिष्ट चमत्कार यहां घटित हुए हैं जिनमें कुछ अल्पज्ञात हैं, कुछ अचर्चित तो कुछ विस्मृत। इन्हीं का विवरण किसी (भूभाग) के निवासियों के साथ उनकी संस्कृति में प्रस्फुटित हो जीवन की सतरंगी छटा बिखेरता है और अपनी पहचान स्थापित करता है।

गौरव गाथा के क्रम में वर्तमान परिस्थितियों की प्रासंगिकता भी उतनी ही आवश्यक होती है और यह समय प्राकृतिक आपदाओं का, संसाधनों के निर्मम दोहन को उत्पादन घोषित करने वालों और क्षेत्रीय हितों को स्वहितों से घालमेल कर आगे बढ़ने वालों का है। ऐसी परिस्थिति में इस भूमि पर गर्व करने वालों की शालीनता और संतुष्टि में सक्षम और सजग रहने का समावेश अपरिहार्य हो गया है। पंचतंत्र की नीति शिक्षा है- ‘‘अपनी शक्ति को प्रकट न करने से शक्तिशाली मनुष्य भी अपमान सहन करता है, काठ के भीतर सोई आग को लोग आसानी से लांघ जाते हैं किन्तु धधकती ज्वाला को नहीं।’’ और दिनकर की पंक्ति है-
छीनता हो स्वत्व तेरा और तू, त्याग, तप से काम ले, यह पाप है,
है उचित विच्छिन्न का देना उसे, बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है।

गढ़ों का तिलस्म
छत्तीसगढ़ के नामकरण का आधार तो निस्संदेह रतनपुर राज्य मुख्यालय के अंतर्गत विभक्त प्रशासनिक इकाईयां हैं। देवार गीतों में भी मंडला राज के बावनगढ़, सम्बलपुर राज के अट्ठारहगढ़ और रतनपुर राज के छत्तीसगढ़ गिनाये जाते हैं, लेकिन इसके साथ-साथ भौतिक स्वरूप वाली परिखा (खाई) और प्राकार (दीवार) युक्त संरचनाओं का अस्तित्व भी इस अंचल में हैं।

मृत्तिका या धूलि दुर्ग नाम से अभिज्ञात इन गढ़ों में व्यवस्थित वैज्ञानिक उत्खनन अब तक नहीं हुआ है, इसलिए इनका तिलस्म कायम है लेकिन यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि ऐसे गढ़ लगभग 2700 साल तक पुराने और इतिहासपूर्व युग को ऐतिहासिक काल से संबद्ध करने वाली कड़ी साबित हो सकते हैं। विभिन्न आकार प्रकार की इन विशिष्ट संरचनाओं को महाजनपद काल का माना जाता है। मिट्टी के इन गढ़ों की संख्या व वितरण इनके सामरिक प्रयोजन को संदिग्ध बनाता है। जांजगीर जिले में ही ऐसे गढ़ों की संख्या छत्तीस से अधिक है। दो गढ़ों की आपसी दूरी कहीं-कहीं तो सिर्फ तीन किलोमीटर है, जैसे मल्हार और कोनारगढ़। ऐसे उदाहरण पामगढ़-शिवरीनारायण के बीच और जांजगीर-केरा के बीच बहुतायत में है। मिट्टी के इन गढ़ों की विशालता और उसके निर्माण में लगे मानव श्रम का अनुमान चकित कर देने वाला है। मल्हार जैसे कुछ गढ़ों से मिलने वाले प्राचीन अवशेष की विपुलता और विविधता भी कम आश्चर्यजनक नहीं है। अंचल के ऐसे सभी गढ़ों की प्राचीनता अगर अनुरूप हो तो इनके व्यवस्थित अध्ययन से इतिहास का रोमांचक पृष्ठ खुल सकता है और अपने अनूठेपन के साथ-साथ इतिहास को सार्थक तथ्य उपलब्ध करा सकता है।

छत्तीसगढ़ी का पहला नमूना
छत्तीसगढ़ी का पहला नमूना अभिलेख पत्थर पर उत्कीर्ण व सुरक्षित है। यह शिलाखंड दंतेवाड़ा में स्थापित है। लेख में शासक दिकपाल देव का उल्लेख है और तिथि सम्वत् 1760 यानि सन् 1702 है। लेख वस्तुतः साथ लगे संस्कृत शिलालेख का अनुवाद है, लेख का अन्य संबंधित विषय स्वयं स्पष्ट है -

दंतावला देवी जयति।। देववाणी मह प्रशस्ति लिषाए पाथर है महाराजा दिकपालदेव के कलियुग मह संस्कृत के बचवैआ थोरही हैं ते पांइ दूसर पाथर मह भाषा लिखे है। ..... ते दिकपालदेव विआह कीन्हे वरदी के चंदेल राव रतनराजा के कन्या अजवकुमरि महारानी विषैं अठारहें वर्ष रक्षपाल देव नाम जुवराज पुत्र भए। तव हल्ला ते नवरंगपुरगढ़ टोरि फांरि सकल वंद करि जगन्नाथ वस्तर पठै कै फेरि नवरंगपुर दे कै ओडिया राजा थापेरवजि। पुनि सकल पुरवासि लोग समेत दंतावला के कुटुम जात्रा करे सम्वत् सत्रह सै साठि 1760 चैत्र सुदि 14 आरंभ वैशाष वदि 3 ते संपूर्न भै जात्रा कतेकौ हजार भैसा वोकरा मारे ते कर रकत प्रवाह वह पांच दिन संषिनी नदी लाल कुसुम वर्न भए। ई अर्थ मैथिल भगवान मिश्र राजगुरू पंडित भाषा औ संस्कृत दोउ पाथर मह लिषाए। अस राजा श्री दिकपाल देव देव समान कलि युग न होहै आन राजा।

सामाजिक समरसता
जाति चरित्र का सूक्ष्म अध्ययन करने की परम्परा का प्रमाण बिलासा केंवटिन के देवार गीत में मिलता है किन्तु सामाजिक समरसता और जाति सद्भाव-सम्मान की अनूठी परम्परा इस अंचल मेें रही है। बिलासा केंवटिन, राजिम तेलिन, बहादुर कलारिन, किरवई की धोबनिन, गंगा ग्वालिन और मुरहा राउत, परऊ बैगा, बैगा-बैगिन जैसे लोक चरित्रों की प्रतिष्ठा तथा उनके प्रति सम्मान प्रकट कर गौरव बोध होना अंचल की सामाजिक समरसता का द्योतक है। लोक गाथा गायक देवार जाति के इतिहास के अनाम नायकों के शौर्य, महानता और उदारता की गाथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी गाकर हाशिये के इतिहास की चारण-गाथा को सुरक्षित रखा है।

गांव के दो समान नाम वाले जाति, वर्ग, धर्म भेद से परे ‘सहिनांव’ मितान बन जाते हैं और ननिहाल आये बच्चों के लिए पूरा गांव मामा-मामी और नाना-नानी बन जाने की सौहार्द्रपूर्ण परम्परा की सम्पन्नता भी इस अंचल में है। खल्लारी में देवपाल नामक मोची ने छः सौ साल पहले मंदिर निर्माण कराया और उसे इस काम में राजा के साथ ब्राह्मण और कायस्थ जातियों का समर्थन और सहयोग मिला था।

धूमिल भित्तिचित्रों से मुखरित सदियों पुरानी चित्रकला
रामगढ़, सरगुजा की ख्याति नाट्यशाला और सुतनुका के लिये है किन्तु यहां एक और अनजाना सा दुर्लभ प्रमाण ऐतिहासिक चित्रकला का भी है, जो अजंता और बाघ की विश्वप्रसिद्ध भित्तिचित्रों से भी अधिक पुरानी है। चित्रों की रेखाएं ओर रंग धूमिल हो जाने से उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिली, जिसकी वे हकदार है, किन्तु उनका अस्तित्व आज भी विद्यमान है। छत्तीसगढ़ में कैप्टन टी. ब्लाश ने सन् 1904 में इन चित्रों का अवलोकन कर, इन्हें ‘‘दो हजार साल से भी अधिक पुरानी और संभवतः’’ भारत को प्राचीनतम भित्तिचित्र के प्रमाण माना। प्राचीनता के प्रमाण स्वरूप इनमें चैत्य गवाक्ष आकृतियां, दो पहियों वाली तीन या चार घोड़ों द्वारा खींची जाने वाली गाड़ी और प्राचीन रूपाकार मानव चित्रित हैं। ये चित्र सफेद पृष्ठभूमि पर सिंदूरी जैसे रंग से बनाए गए हैं और मानव, हाथी और वृक्ष के लिए समान रंग प्रयोग में लाया गया है, जबकि रेखांकन काले रंग से किया गया हैं। आंख के स्थान सफेद छोड़े गए हैं जबकि बाल काले रंग से बने हैं और कहीं कहीं बाल को बांई ओर जूड़ा बंधा दिखाया गया है। वस्त्राभरण सफेद रंग के लाल रेखांकन से प्रदर्शित है। विभिन्न दृश्यों से अर्द्धवृत्त में लाल रेखाओं से विभक्त किया गया है। सबसे निचले भाग में पीले और लाल रंग से चित्रित अस्पष्ट दृश्य हैं। रामगढ़ की इस पहाड़ी में पाली में उत्कीर्ण है- सुतनुका व रूपदक्ष की गाथा। विश्व में भारतीय कला को प्रतिष्ठा दिलाने वाले कला मर्मज्ञ आनंद कुमारस्वामी ने इन चित्रों की कलात्मकता और प्राचीनता को स्वीकृति देते हुए इन्हें प्रतिष्ठित किया है।

जैन, बौद्ध, शैव और वैष्णव धर्मों की भूमि
लगभग दो हजार साल पहले बूढ़ीखार (मल्हार) में दान स्वरूप निर्मित कराई गई विष्णु की प्रतिमा को भारतीय मूर्तिकला में विष्णु की प्राचीनतम प्रतिमा का गौरव प्राप्त है। चतुर्भुजी विष्णु की मानवाकार प्रतिमा दण्ड, चक्र सहित है। बौद्ध तथा जैन प्रतिमा भी मल्हार तथा सिरपुर से बड़ी संख्या में मिली हैं।

शैव प्रतिमा का आंचलिक अनूठापन भी निर्विवाद है, चाहे ताला के ‘रूद्र शिव’ की पहचान और नामकरण का मामला विवादग्रस्त हो। पशु-पक्षियों से शारीरिक अंगों का रूपांकन और पूरे शरीर पर मानव मुख अंकित हैं। आठ फुट ऊंची यह प्रतिमा पांच टन से भी अधिक भारी है। इस प्रतिमा की विशिष्टता का साम्य मांढल (महाराष्ट्र) की शिव-प्रतिमाओं, चीन के गुहा शिल्प, नेपाल के तांत्रिक चित्रों और सेल्टिक पेंटिंग्स में तलाशने का प्रयास किया गया, किन्तु इस प्रतिमा के शिल्पशास्त्रीय और धार्मिक परम्परा का रहस्य इसके अनूठेपन को बढ़ाता है। शैव प्रतिमा निर्माण का स्थल सरदा (दुर्ग) भी कम विस्मयकारी नहीं है जहां उमा-महेश और अर्द्धनारीश्वर जैसी प्रतिमाओं में पाशर््िवक-विपर्यय हुआ है। यानि शास्त्रीय विधान में शिव के बाएं और इसी तरह बांया अर्द्धांग नारी का होता है किन्तु यहां इसे उलट कर व्यतिक्रम करते हुए मानों कोई समांतर शास्त्र की रचना हुई थी।

सुदीर्घ राजनैतिक स्थिरता का दुर्लभ इतिहास
रतनपुर, आज भी इस अंचल में राज और राजा के लिए सदैव न सिर्फ याद किया गया है, बल्कि राजशक्ति का पर्याय बन गया है क्यों न हो, कलचुरि, हैहय या चेदि वंश के नाम से ज्ञात संबद्ध कालखण्ड किसी एक राजवंश का संभवतः सर्वाधिक दीर्घ अवधि का राज्यकाल रहा है। पुराण-महाकाव्यों का महानायक सहस्रबाहु कार्त्तवीर्यार्जुन हुआ। इतिहास में हैहयवंशी महिष्मती में रहे, इसके बाद उनकी राजधानी त्रिपुरी (जबलपुर-भेड़ाघाट के निकट वर्तमान तेवर ग्राम) बनी। त्रिपुरी के कलचुरियों का प्रभाव कोसल अर्थात वर्तमान छत्तीसगढ़ क्षेत्र में भी रहा और संभवतः इस वंश के राजपुत्र दक्षिण कोसल के सामंत नियुक्त होते रहे। लगभग दसवीं सदी में इस वंश की एक शाखा ने दक्षिण कोसल पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर, अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी। इनकी राजधानी तुम्माण (कटघोरा के निकट वर्तमान तुमान ग्राम) बनी। तुमान के राजधानी बनने में निश्चय ही इस स्थान की भौगोलिक स्थिति प्रमुख कारण थी। तुमान-खोल के पूरे क्षेत्र में प्रवेश और निकास का एक-एक मार्ग है बाकी पूरा भू-भाग दुुर्गम पहाड़ी से घिरा हुआ है। 

तुमान में आज भी प्राचीन मंदिर और सतखण्डा क्षेत्र में पुरावशेष उपलब्ध होते हैं। राजधानी समय के साथ परिवर्तित होकर रतनपुर आ गई, लेकिन कलचुरियों की यह शाखा रतनपुर के कलचुरियों के नाम से प्रसिद्ध होकर लगभग साढ़े सात सौ साल अखण्ड राज्य करती रही। बीच-बीच में त्रिपुरी कलचुरियों, चक्रकोट के नागवंशियों, बाणवंशियों, क्षेत्रीय मूल के स्थानीय राजाओं और अंततः मुगलों से संघर्ष और मनमुटाव हुआ, किन्तु यह राजवंश पीढ़ी पर पीढ़ी दान, स्थापत्य-निर्माण आदि की कीर्ति-पताका फहराते रतनपुर राजधानी से सन् 1740 तक राज्य करता रहा। इतनी सुदीर्घ अवधि तक अविच्छिन्न राज्य का इतिहास में यह अत्यंत दुर्लभ उदाहरण है। 

नागपुर के भोंसला-मराठों के आगमन के पश्चात् भी उन्नीसवीं सदी तक इस वंश की शाखा सहित इसका प्रभाव बना रहा। रतनपुर के कलचुरियों की इस गौरव गाथा के प्रमाण रतनपुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ में पचासों अभिलेखों, हजारों-हजार सिक्कों और मूर्तियों, बहुसंख्यक मंदिर हैं जिसका कोई भी अंश प्रत्यक्ष पाकर उस गरिमामय सुदीर्घ कालखण्ड की झलक अभिभूत कर देने के लिए पर्याप्त साबित होती है।

छत्तीसगढ़ का ‘पाणिनी’-हीरालाल
आज हम जिस छत्तीसगढ़ी के लिए भाषा या बोली तथा उसके नियमित-वैज्ञानिक व्याकरण के विवाद में उलझ जाते हैं तब शायद यह तथ्य नजरअंदाज होता है या हम भूल जाते हैं कि पूरी एक सदी से भी अधिक पहले एक व्यक्ति ऐसा भी हुआ, जिसने तर्क-वितर्क या विवाद पैदा करने अथवा कोई नारा गढ़ने के बजाय अपनी प्रतिभा को पूरी लगन और समर्पण से छत्तीसगढ़ का व्याकरण तैयार करते हुए, मानों न सिर्फ छत्तीसगढ़ी का, बल्कि पूरे इस अंचल की जबान का गौरवशाली इतिहास रचा। यह मनीषी था- धमतरी के एंग्लो-वर्नाकुलर स्कूल का हेड मास्टर- हीरालाल काव्योपाध्याय।

छत्तीसगढ़ी व्याकरण का यह इतिहास एक अन्य ऐतिहासिक तथ्य से जुड़ा हुआ है। लगभग सौ साल पहले जार्ज ए. ग्रियर्सन द्वारा कराया गया भारत का भाषा सर्वेक्षण पूरी दुनिया में किसी भी क्षेत्र में हुए सर्वेक्षणों में भाषा सर्वेक्षण का विशालतम पैमाना था। इस पूरे सर्वेक्षण के दौरान एकमात्र छत्तीसगढ़ी का वैज्ञानिक व्यवस्थित व्याकरण प्राप्त हुआ था और इसका गौरव-मंडन स्वयं ग्रियर्सन ने किया। यह व्याकरण प्राप्त होने पर ग्रियर्सन इतने रोमांचित और उत्साहित हुए कि उन्होंने हीरालाल काव्योपाध्याय के ससम्मान नामोल्लेख सहित इसे सन् 1890 में एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल, शोध-पत्रिका के खंड-49, भाग-1 में अनूदित और सम्पादित कर प्रकाशित कराया। छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी व्याकरण की यह परम्परा आगे सतत् विकसित होती रही। सन् 1921 में पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय ने रायबहादुर हीरालाल के निर्देशन में इस व्याकरण को विस्तृत रूप से पुस्तकाकार प्रकाशित कराया। इसी परम्परा में बिलासपुर के डॉ. शंकर शेष और रायपुर के डॉ. नरेन्द्रदेव वर्मा का कार्य भी स्मरणीय हैं।

धरती में गढ़ा इतिहास का अनमोल खजाना
धरती में गड़ा धन और खजाने की खोज की चर्चा भी रोमांचकारी होती है। किन्तु पुराने सिक्कों में दर्ज इतिहास का रोमांच भी कम नहीं होता, तभी तो प्रसन्नमात्र के ताम्बे के सिक्के के सामने इसी शासक के सोने के सिक्कों की कीमत दो कौड़ी जैसी हो जाती हैै।

मल्हार, बालपुर जैसे स्थानों में प्राचीन सिक्कों का ऐसा भूमिगत भंडार भरा है कि मल्हार में ‘संफरिया नांगर’ (जोड़ी में हल) चलाने का रिवाज नहीं है, हल चलाते हुए कभी भी, कुछ भी मिल सकने की उम्मीद जो बनी रहती है, और किंवदन्ती यह भी है कि कोटगढ़ के राजा के आह्वान पर मल्हार में सोने की बरसात हुई थी। बालपुर के लिये कहा जाता है कि वहां भू-गर्भ में पूरी दुनिया को ढाई दिन खिला सकने जितनी सम्पदा गड़ी हुई है। कोटमी-धुरकोट का साधु प्रसिद्ध है जो चिमटे से बिच्छू कमण्डल में डालकर चांदी के सिक्के बना देता था और रमल विचार कर यहां-वहां खुदाई की खबरें मिलती रहती हैं।

छत्तीसगढ़ व सीमावर्ती क्षेत्र से मिलने वाले ठप्पांकित या उभारकर सिक्के, एक तरह से अंचल की पहचान हैं क्योंकि एसे सिक्के सिर्फ इस अंचल से उपलब्ध हुए हैं, जो पूरी दुनिया के मुद्राशास्त्रीय इतिहास में अनूठे हैं। ये उभारदार सिक्के लगभग छठी सदी ई. के हैं। इन सिक्कों की प्राप्ति रायपुर जिला में खैरताल, पितईवंद, रीवां, महासमुुंद, सिरपुर से, बस्तर के एड़ेंगा से, दुर्ग के कुलिया से, रायगढ़ के साल्हेपाली से बिलासपुर के मल्हार, ताला, नन्दौर और तलवा से हुई है। संलग्न राज्य सीमाओं पर उड़ीसा के बहरमपुर, नहना, मारागुड़ा, मदनपुर-रामपुर, महाराष्ट्र के भण्डारा, बिहार के शाहाबाद व अन्य फुटकर स्थानों से मिलने के साथ-साथ उत्तरप्रदेश व पश्चिम बंगाल के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। इन सिक्कों में 215-महेन्द्रादित्य, 127-प्रसन्नमात्र, 4-क्रमादित्य, 29-वराहराज, 3-भवदत्त, 1-नंदनराज, 1-स्तंभ तथा 4 सिक्के संभवतः कुषाण तथा गुप्त शासकों से संबंधित हैं। इनमें संख्या की दृष्टि से बिलासपुर जिले के बाराद्वार के निकट तलवा से प्राप्त 81 स्वर्ण सिक्के से भी अधिक की प्राप्ति, ऐसे सिक्कों की विशालतम निधि है और मल्हार के ताम्बे का तथा ताला के चांदी का सिक्का अपने प्रकार के अकेले उदाहरण हैं।

अंचल से प्राप्त होने वाले सिक्कों के कुछ अन्य प्रमुख स्थान रायपुर में तारापुर, आरंग, खैरताल, दलाल सिवनी, रायगढ़ में बार और पाराडीह, दुर्ग में सिरसा, खैरागढ़ और रायगढ़ रियासतों में तथा बिलासपुर के अकलतरा, केरा, बछौद, चकरबेड़ा, केन्दा, पेण्डरवा, झझपुरी, भगोद, धनपुर आदि हैं। इनमें बिलासपुर जिले के सोनसरी से प्राप्त 600 सोने के सिक्के विशेष उल्लेखनीय हैं। छत्तीसगढ़ की इस विशिष्ट मुद्रा निर्माण तकनीक के ठप्पांकित सिक्के अन्यत्र दुर्लभ, मौलिक और असमान्तर कृतियां हैं। 

अक्षरों की कहानी, लिपि का रहस्य
छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास में अक्षरों की अपनी कहानी है। उत्कीर्ण लिपियों का अपना रहस्य है, जो पूरी दुनिया को आकर्षित कर अंचल को गौरवशाली प्रतिष्ठा देता है। रामगढ़, गुंजी, किरारी और सीमावर्ती विक्रमखोल इस दृष्टि से उल्लेखनीय हैं। 

प्राचीनतम रंगशाला, रामगढ़, जिला-सरगुजा के नाट्यमण्डप होने से दो राय हो सकती है, किन्तु सुतनुका देवदासी और देवदीन मूर्तिकार का अभिलिखित प्रणय-प्रसंग दो हजार से भी अधिक साल की प्राचीनता सहित आरंभिक उत्कीर्ण राग लेख है, संक्षिप्त किन्तु सम्प्रेषण-समर्थ -

सतुनुका। देवदाशिय। सुतनुका नाम देवदाशी।
तं कामयिथ बालुणसुएये देवदीन नाम लूपदखे।

लगभग दो हजार साल पहले इस अंचल में लकड़ी पर लिपि उत्कीर्ण करने का भी प्रयोग हुआ, जो पूरी दुनिया में अपनी तरह का अनूठा नमूना है। किरारी (चन्द्रपुर) से प्राप्त अभिलिखित काष्ठ स्तंभलेख का अब अंश ही सुरक्षित बच सका है, किन्तु हीराबंध तालाब से निकले इस लकड़ी के खंभे का महत्व समझकर स्थानीय ग्रामवासी पंडित लक्ष्मीधर उपाध्याय ने इसकी नकल उतार ली थी और उसे जांचकर तत्कालीन पुरालिपि विशेषज्ञों ने प्रामाणिक मानकर उसी के आधार पर लेख का अध्ययन किया, जिसमें तत्कालीन राज पदाधिकारियों का उल्लेख है।

सक्ती के निकट दमऊदहरा अथवा गंुजी लगभग दो हजार साल पहले ऋषभतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध था। दक्षिण कोसल के इस तीर्थ का नामोल्लेख महाभारत में भी हुआ है। यहां राजा, अमात्य, दण्डनायक और बलाधिकृत ने दो बार एक-एक हजार गायों का दान किया। अन्य अमात्य और दण्डनायक ने भी एक हजार गौओं का दान दिया। यह अभिलिखित प्रमाण भी अपनी प्राचीनता के कारण दुर्लभ जानकारी और क्षेत्र की सम्पन्न परम्परा को द्योतक हैै।

आंचलिक सीमा से संलग्न विक्रमखोल का चट्टान लेख हड़प्पाकालीन संकेतों और ब्राह्मी लिपि के बीच की कड़ी माने जाने के कारण अत्यधिक महत्वपूर्ण और अनूठा प्रमाण है। 

मल्हार की कालधारा में पुरावशेषों की विविधता
सभ्यताओं के बनते-बिगड़ते इतिहास और वैभवशाली विशाल अट्टालिकाओें-प्रासादों का खंडहर में तब्दील होना मानों स्वाभाविक नियति-चक्र है, किन्तु हड़प्पायुगीन सभ्यता के नगर हों या मजमूली नक्शों में अंकित वीरान गांव, यह जिज्ञासा अवश्य जगाते हैं, कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि समय के साथ मिट्टी को परतों में दबकर कोई स्थान इतिहास का पन्ना बनकर रह गया। विस्मयकारी यह भी है कि कोई सात-आठ किलोमीटर की परिधि कालक्रम और अवशेषों की विविधता से इतनी सम्पन्न हो, जैसा मल्हार। विशाल और विख्यात कोई भी पुरातात्विक स्थल विविधता की दृष्टि से मल्हार के सीमित किन्तु सघन क्षेत्र के सामने बौना लगने लगता है।

मल्हार और निकटवर्ती ग्रामों जैतपुर, बूढ़ीखार, नेवारी, बेटरी, जुनवानी आदि से अब तक प्रकाश में आये पुरावशेषों को देखकर लगता है कि धरती का यह छोटा सा हिस्सा सदैव प्रबल आकर्षण का केन्द्र रहा और सभ्यता-संस्कृति के सभी कर्ताओं को अपने अंक में पाला-पोसा है। मल्हार में प्राचीनता के प्रमाणस्वरूप सागर विश्वविद्यालय द्वारा कराये गये उत्खनन से लगभग अट्ठाइस सौ साल पुरानी बसाहट के चिन्ह प्राप्त हुए हैं। महामाया खोदा गया तो पातालेश्वर मंदिर निकट आया और भीमा-कीचक टीला खुदा तो देउर मंदिर निकल आया। किसानों को तो विशेषकर भसर्री क्षेत्र में कुआं खोदते हुए पुराना रेडीमेड पक्का कुआं मिल जाता है, तो कहीं नींव खोदते हुए पत्थर की बनी बनाई प्राचीन नींव। हल चलाते हुए धातु, पत्थर, मिट्टी, इंट का कोई पुरावशेष मिल जाता है तो बरसात में पानी के कटाव से सिक्के निकल आते हैं। यानि पूरा सिलसिला है पत्थर, तांबे, मिट्टी पर उकेरे-उभरे हजारों शब्दों का भण्डार- शिलालेख, ताम्रपत्र, मूर्तिलेख, राजमुद्रा और मुद्रांक, इसके आगे पत्थर और मिट्टी पर गढ़ी गई मूर्तियां हैं। मंदिर और स्थापत्य के अनेकानेक नमूने हैं। 

पत्थर और मिट्टी की गुरिया, मनके, मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, सोने, चांदी, तांबा, सीसा और पोटीन के सिक्कों का तो अकूत भंडार है यहां। यह भी कम आश्यर्चजनक नहीं कि काल की दृष्टि से इन सामग्रियों का क्रम अनवरत है। मल्हार के जिक्र में वहां से शंख के जीवाश्म की प्राप्ति इस स्थल की पहेली को अधिक अबूझ बना देती है तो भूगर्भ में विद्यमान संभावनाएं इस समृद्धि का अनुमान लगाने में भी मानव-मस्तिष्क को अचंभित कर जड़ कर देती हैं।

ईंटों पर रचा तकनीक का काव्य
भारतीय स्थापत्य कला के इतिहास में राजिम, ताला और जांजगीर के पाषाण-निर्मित मंदिरों का अपना-अपना विशिष्ट स्थान है। राजिम में राजीव लोचन मंदिर का शिखर शैलीगत आरंभिक स्थिति का प्रमाण है तो ताला के जिठानी और देवरानी मंदिर की निर्माण योजना अत्यंत विशिष्ट संरचना है। आरंभिक काल के इस उदाहरणों के पश्चात लगभग 12 वीं सदी का जांजगीर का भीमा मंदिर या विष्णु मंदिर स्थापत्य विकास का चरमोत्कर्ष है जहां जंघा के साथ-साथ जगती पर भी आदमकद प्रतिमाएं जड़ी हैं। लेकिन इस अंचल ने तारकानुकृति मंदिरों की योजना को ईंट माध्यम का प्रयोग कर साकार किया है तथा स्थापत्य इतिहास में जो प्रतिमान रचे हैं उनका कोई साम्य नहीं मिलता।

खरौद का शबरी और इन्दल देउल, सिरपुर का लक्ष्मण और राम मंदिर, पलारी का सिद्धेश्वर मंदिर, धोबनी का चितावरी मंदिर, पुजारीपाली के केंवटिन और गोपाल मंदिर, यह पूरी श्रृंखला ईंटों पर बारीक नक्काशी और साफ जुड़ाई अनूठी है। अष्टकोणीय भू-योजना का अड़भार मंदिर और ताराकार ईंटों के उल्लिखित मंदिरों सहित भोरमदेव का भग्न मंदिर और शिवरीनारायण के केशवनारायण मंदिर की कोणिक रचना-पद्धति को कोसली नामकरण सहित शास्त्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।

इन मंदिरों की निर्माण प्रक्रिया के लिए अनुमान है कि बिना पकी उकेरी गई ईंटों को पतली छनी गीली मिट्टी को जुड़ाई के लिए इस्तेमाल कर पूरी संरचना तैयार कर ली जाती थी और इसके बाद पूरी रचना भट्ठी लगाकर उसे पकाया जाता था। यह अनूठी स्थापत्य योजना व अभिकल्प और प्रयोग हमारी वैचारिक तकनीकी सम्पन्नता का प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए सक्षम उदाहरण है।

देश में राजस्व व्यवस्थापन की छत्तीसगढ़ी गुरूआत
देश के इतिहास में राजस्व भू-व्यवस्थापन के साथ सदैव अकबर और उनके नवरत्नों में से एक राजा- टोडरमल को याद किया जाता है, किन्तु हम स्वयं भी अक्सर अपने क्षेत्रीय गौरव कलचुरि शासक कल्याण साय की जमाबंदी को भूल जाते हैं। कल्याण साय (सन् 1550) के जमाबंदी की पृष्ठभूमि निश्चय ही अकबर से पहले की है।

इस जमाबंदी में दर्ज ऐतिहासिक राजस्व व अन्य राजकीय सूचनाओं का महत्व अंग्र्रेज अधिकारियों ने पहचाना। सन् 1861-68 के दौरान (पहला) सेटिलमेंट करते हुए मि. चीजम ने इसी जमाबंदी को अपने कार्य का आधार बनाया और फिर सन् 1909-10 में बिलासपुर जिला गजेटियर तैयार करने के सिलसिले में मि. नेल्सन द्वारा इसकी खोज की गई, यह मूल अभिलेख न मिल पाने के फलस्वरूप ढेरों जानकारियां जो मि. चीजम ने उद्धृत की थीं, ज्यों की त्यों इस्तेमाल कर गजेटियर पूरा किया जा सका। कल्याण साय की जमाबंदी तत्कालीन, अत्यंत रोचक और महत्वपूर्ण जानकारियों का दस्तावेज है, जिसके अनुसार रतनपुर राज के गढ़ों यानि सिर्फ खालसा क्षेत्र से साढ़े छह लाख रूपये का राजस्व वसूल होता था, तब के रूपये का मूल्य अनुमान कर तत्कालीन सम्पन्नता समझी जा सकती है। कल्याण साय की सेना में बंदूकधारियों (मैचलाक) सहित 14,200 सैनिक थे और 116 हाथियों की फौज अलग थी। 

कल्याण साय की जमाबंदी से तत्कालीन इतिहास की जो तस्वीर उभरती है, उससे इस क्षेत्र के नामकरण के पीछे छत्तीस प्रशासनिक इकाईयां गढ़ ही आधार बनीं, इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता। इस दृष्टि से यह अभिलेख और भी प्रासंगिक हो जाता है। तत्कालीन गढ़ चौरासी गांवों का परम्परागत समूह होता था और इसके प्रभारी दीवान कहलाते थे। आगे विभाजन बियालिस, चौबीसा, बरहों में होता था और इन समूहों में ग्रामों की संख्या सदैव नियमित होना आवश्यक नहीं था लेकिन अंतिम इकाई गांव ही होती थी। जमाबंदी में अड़तालिस गढ़ नामों को अलग-अलग संख्या में समूह-वर्गीकरण कर इस संख्या को छत्तीस बनाया गया है, जिसमें वर्तमान जमींदारियां भी शामिल है। इन्हीं गढ़ों की व्यवस्था तीन परगनों में बदल गई। इन परगनों बिलासपुर (रतनपुर), मुंगेली (नवागढ़) व शिवरीनारायण (खरौद) के अंतर्गत ग्रामों की संख्या क्रमशः 241, 482 व 145 थी। कलचुरियों के सुदीर्घ और निर्विघ्न राज्य का प्रमुख आधार संभवतः उनका यहां व्यवस्थित और सुसंगठित राजस्व-व्यवस्थापन था, जो छत्तीसगढ़ के नामकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण और इतिहास में प्राचीनता की दृष्टि से अनूठा हैै।

आंकस ग्राम देवताओं की भूमि
आधी रात के बाद गांव की गली में टपा-टप घोड़े की टाप सुनाई पड़ती है। सात हाथ का झक्क सफेद घोड़ा और सवार भी सफेद धोती-कुरता पहने, सफेद ही पागा बांधे चला जा रहा है। इसे किसी ने आज तक सामने से नहीं देखा और देखा तो बचा नहीं। बड़े बुजुर्ग बताते हैं देव है, गांव का मालिक देवता, ठाकुर देव, बड़ा देव। गांव की निगरानी में निकलता है। सीवाने के देवता अंधियारी पाठ को ताकीद करने। 

ठाकुरदेव सहित अन्य सभी देवता आज भी उतने की जागृत हैं, जितनी हमारी मौलिक सांस्कृतिक चेतना। छत्तीसगढ़ में ग्राम देवताओं का मण्डल व्यापक और सुरक्षित है। ग्राम देवताओं की पूजा-उपासना पद्धति व संबंधित भाषा विशिष्टता में यहां की वर्तमान समेकित संस्कृति के मूल घटकों-उपादानों की पहचान हो सकती है। ठाकुरदेव और बड़ादेव जैसा ही महत्वपूर्ण देवता बूढ़ादेव है। बूढ़ादेव के साथ बढ़ावन की मान्यता होती है, जो पत्थर की गोल गोटियां हैं। वार्षिक उत्सव बार के अवसर पर बढ़ावन की पूजा होती है। पर्यावरण-सजग कोल समुदाय के वन्य ग्रामों में ग्राम से संलग्न वन खंड, अधिकतर शाल वृक्ष समूह में ‘सरना’ स्थापित-मान्य होता है। इसे अत्यंत पवित्र और जागृत क्षेत्र माना जाता है। ग्राम व क्षेत्र की मनोरंजन-गोष्ठियां और सामान्य बैठक से लेकर पंचायत-फैसले, देव-साक्ष्य में सरना में होते हैं, साथ ही सरना राहगीरों को रात्रि विश्राम के लिए शरण भी देता है।

उजाड़ वीराना, टीलों में डीह, डिहवार या डिहारिन दाई की मान्यता होती है। मातृ शक्तियों के रूप माताचौंरा या महामाया सामान्य रूप से लगभग प्रत्येक गांव में विद्यमान हैं। मातृकाओं में सतबहिनिया और अक्कइसो बहिनी भी पूजी जाती हैं। कुछ क्षेत्रों में सतबहिनियां का नाम जयलाला, बिलासिनी, कनकुद केवदी, जसोदा, कजियाम, वासूली और चण्डी मिलता है, जबकि छत्तीसगढ़ अंचल में सतबहिनिया को चेचक या सात माता, बूढ़ी मां, मटारा, लोहाझार, कथरिया, सिंदुरिया, कोदइया और आलस के नाम से भी पूजा जाता है। अन्य प्रचलित देवियां- कमलई, समलई, महलई, खमदेई, कोसगई, केन्दई, विशेसरी, सत्ती, चण्डी, मावली, कालिका, कंकालिन, परेतिन दाई, रात माई, आदि हैं, जो ग्राम के मध्य, थाना-गुड़ी या सीवाने पर हो सकती हैं।

ग्राम देवताओं के पुजारी बैगा, गुनिया, देवार, सिरहा आदि नाम से जाने जाते हैं, इनमें ठाकुर देव और बाहुकों जराही-बराही के साथ परउ बैगा की मान्यता होती है कुछ क्षेत्रों में बैगा के सहायक होमदेवा भी होते हैं, जो केवल होम दे सकते हैं। देव-आह्वान का अधिकार मात्र बैगा का होता है। परऊ बैगा जैसी ही प्रतिष्ठा दइगन गुरू, राउतराय, बिरतियाबावा, लाल साहब, संवरादेव, सौंराइनदाई की है जबकि गोंड जनजाति में परगनिहा और कुमर्रा देव प्रचलित हैं। अन्य बैगा देवता, सुनहर, बिसाल, बोधी, राजाराम, तिजऊ, लतेल, ठंडा आदि हैं। इसी प्रकार की प्रतिष्ठा मुनिबाबा, पांडेदेव, धुरूआदेव की भी होती है।

बाबा देवताओं में सिद्ध या सीतबावा, बरम, भैरो, मुड़िया, अघोरी, कलुआबावा आदि हैं। पाट या पाठ देव अधिकतर वृक्ष देवता हैं, जिनमें कुर्रु, बासिन, डूंगर, कोटरा, सिंहासन, भंवर, अंधियारी, अंजोरी, बघर्रा, डोंगा, बइहार, नगनच्चा आदि पाठ हैं। कुकुरदेव को बंजारों का देवता और बंजारी देवी को वन देवी माना गया है। ग्राम के प्रभारी प्रतीक दाऊ साहब और रियासत जमीदारियों की दन्तेश्वरी, सरंगढ़िन, कुदरगढ़िन, चांगदेवी आदि हैं। मार्ग सूचना या यात्रा संकल्प के देव ओंगनापाठ, चिथरीदाई, चिरकुटी, ढेलादेव आदि हैं। अन्य कुछ देवताओं में हरदेलाल, घोड़ाधार, सांढ-सांढ़िन, साहड़ादेव, नागदेव, चिरकुटी, खूंटदेव, मेंड़ोदेव, खरकखाम्ह, अखराडांड, गौरइया, धूमनाथ, चितावारी, ठेंगहादेव से डॉक्टरदेव तक विस्तृत सूची है। छत्तीसगढ़ के लोक संसार का इन देवताओं के प्रति आत्मीय साहचर्य तब प्रकट होता है, जब देवताओं से कथित भयभीत होकर उन्हें सम्मान देने वाला जनमानस वर्षा के लिए देवता को गोबर या मिट्टी लीप-पोत कर या धूप में बाहर निकालकर सजा भी देता है। छत्तीसगढ़ की जनजातीय और मौलिक संस्कृति की सच्ची पहचान के लिए ग्राम देवताओं के विस्तृत और गहन सर्वेक्षण शोध आवश्यक है, क्यांेकि इसी बिन्दु को पहचान कर हम सृष्टि में अपनी सहोदरा प्रकृति और अंग्रेजों से स्वयं तक की सांस्कृतिक अनेकता में एकता के सूत्र पा सकते हैं।

पर्यावरणीय चेतना के बीज
कहा जाता है कि सभ्यता का आरंभ उस दिन हुआ होगा, जिस दिन पहला पेड़ कटा और पर्यावरण का संकट तब पैदा हुआ, जब आरे का इस्तेमाल शुरू हुआ। तात्पर्य यह कि पर्यावरण का असंतुलन, प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग से नहीं बल्कि दोहन के कारण होता है। इस दृष्टि से मिथकीय दन्तकथाओं का हमारा सार्थक और सम्पन्न संसार है। कृष्ण-मोरध्वज का प्रसंग और आरे की कथा भूमि में आरे का प्रयोग निषिद्ध मानकर, इस अंचल ने अपनी पर्यावरणीय चेतना और दूरदर्शिता का परिचय दिया।

कथा संक्षेप में यह है कि राजा मोरध्वज द्वारा कृष्ण को दिये गए वचन के पालन में, उसने अपना आधा शरीर आरे से चिराकर दान देना चाहा, इसके लिए आरे को एक ओर रानी कुमुद देवी ने और दूसरी ओर पुत्र ताम्रध्वज ने संभालकर आरा चलाना शुरू किया। कृष्ण ने देखा कि राजा मोरध्वज की बांयी आंख से आंसू बह रहा है। इस पर कृष्ण ने दान ग्रहण करने से मनाही की, किन्तु राजा ने इसका कारण बताया कि बांये अंग को इस बात का दुख हो रहा है कि केवल दायां अंक ही समर्पित हो पा रहा है, बांये अंग का कोई उपयोग नहीं हो रहा है। मोरध्वज को हैहय-कलचुरि राजाओं का पूर्वज माना जाता है और यह भी कहा जाता है कि रतनपुर कलचुरि शासकों की नाक के ऊपर से कपाल के पिछलेे भाग तक आरे से चिरा जैसा चिन्ह हुआ करता था। 

स्थान नाम आरंग की व्युत्पति को भी आरे और इस कथा से संबद्ध किया जाता है और परम्परा में अब तक बस्तर के प्रसिद्ध दशहरे के लिए रथ के निर्माण में केवल बसूले का प्रयोग किया जाता है। मि. चीजम ने उल्लेख किया है कि इस अंचल में आरे का प्रचलन मराठा शासक बिंबाजी भोंसले के काल से हुआ और तब तक की पुरानी इमारतों में लकड़ी की धरन, बसूले से चौपहल कर इस्तेमाल हुई है। अंचल में आरे के प्रयोग को निकट अतीत में भी अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था और आरा चलाने वाले ‘अरकंसहा’ को महत्व देने के बाद भी उनके पेशे को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा गया है।

परम्परा का इतिहास और इतिहास की परम्परा
कहा जाता है कि कहानी से बड़ा सच और इतिहास से बड़ा झूठ कुछ नहीं होता। कहावत है, तो सच्चाई भी होगी और सच न हो तो कोई ईमानदार दृष्टिकोण तो जरूर होगा। इस सिलसिले में जब विदेशी आलोचना करते हैं कि हमें इतिहास-बोध नहीं हैं, हम इतिहास के बदले पुराण और किस्से-कहानी सुनाने लगते हैं, तो इस विसंगति की ओर ध्यान जरूर जाता है कि यह आलोचना उन्हीं की ओर से आ सकती है, जिनका न कोई इतिहास है न कोई पुराण। अपनी अविच्छिन्न परम्परा से हम सनातन हैं और इतना सुदीर्घ इतिहास अगर निरन्तर विकाशील है तो वह परम्परा में ही बदल सकता है, वस्तुतः इतिहास और परम्परा किसी तथ्य अथवा घटना के दो लगभग विपरीत किन्तु दोनों सार्थक दृष्टिकोण हैं, परम्परा से जुड़ा व्यक्ति विषयगत हो जाता है तो बाहरी इसे प्रति अपनी नामसझी से इसे कपोल-कल्पना साबित करने में जुट जाता है।

दरअसल पारम्परिक मान्यताएं ही सांस्कृतिक सूत्र के झीने ताने-बाने हैं जो समष्टि सोच की मजबूत पृष्ठभूमि तैयार करते हैं। छत्तीसगढ़ में घुग्घुस राजा, दामा धुरुआ, लोहार रानी, कुम्हार राजा, भोंसला राज केवल कल्पना नहीं सार्थक शब्द हैं। छमासी रात का मंदिर, सतजुगी मंदिर, रतनपुर राज का मंदिर, काल निर्धारण की हमारी निजी शैली है। नये मिट्टी के ठीकरों से पण्डवन चुकिया की अलग पहचान के लिये सदैव पुराविद होना आवश्यक नहीं होता। बरात का पत्थर में तब्दील हो जाना और बरतिया भांठा के अपने अर्थ हैं। देवरहा, जोगीडीपा, पुतरा-पुतरी, खइया और गंगार में गहरे संकेत हैं। माची पखना, झांपी पखना और छंकना पथरा में भिन्नता है। जिठानी-देवरानी, ममा-भांचा, भीमा-कीचक सिर्फ रिश्ते और नाम नहीं इसके आगे के भेद का पता देते हैं। 

सोने की बरसात, डीह, डोंगा, कुकुरदेव और नायक बंजारा, मंदिर का कलश चढ़ने के पहले सूर्योदय या भाई-बहन का साथ-साथ मंदिर न जाना, गुड़ी, ठाकुरदेव, महामाया या माताचौंरा, छः आगर छः कोरी तलाब, अड़बंधा तलाब और सतखंडा तलाब या महल, अड़भार (अष्टद्वार) और बारादुआर (द्वादशद्वार) ऐसे न जाने कितने शब्द है, जिससे हम अपनी संस्कृति से अपनी आत्मीय समझ के साथ संबद्ध हैं। यह कहा जा सकता है कि जिसे ये शब्द आत्मीय लगें वही दरअसल छत्तीसगढ़िया है और जिसे भदेस या बेगाने लगे वह अपनी पहचान स्वयं तय करे।

छत्तीसगढ़ इसी प्रकार के शब्द और परम्परा-मान्यताओं से सम्पन्न है, जिसके माध्यम से लोक समझ का संसार स्पंदित रहता है। एक दृष्टिकोण यदि किसी ऐतिहासिक स्थल या सामग्री को खंडित, भग्न या खंडहर मान लेता है तो इस अंचल की जन-चेतना में जीवन शैली बनकर अंगीकार हो गया है। शुष्क इतिहास को जीवन परम्परा बनाकर युगों-युगों की सांस्कृतिक उपलब्धियों की संघटित धारणा से सम्पन्न और शास्त्रीय प्रतिमानों में मौलिक संवेदना से प्रवहमान गति संचार हमारी विशिष्टता है।

खरौद के मंदिर में अद्वितीय गंगा-यमुना
भारतीय संस्कृति में मंदिर, मात्र धार्मिक श्रद्धा के केन्द्र नहीं बल्कि सुदीर्घ और सम्पन्न अवधारणा का मूर्तन हैं, इसलिए प्रतिमा रहित, अधूरे छूटे या भग्न खण्डहर भी आकर्षण के केन्द्र और दर्शनीय होते हैं, बल्कि शायद पूजित मंदिरों की गहमा-गहमी के माहौल में जो चीजें छूटती हैं, वे खण्डहरों के गहरे सन्नाटे में उपलब्ध हो जाती हैं।

मंदिर स्थापत्य के स्पष्ट उदाहरण लगभग चौथी सदी से मिलने लगते हैं। आंरभिक मंदिरों में एक कक्ष ईश्वर के लिए होता है, जो प्रवेश द्वार से स्तंभ आश्रित खुले मंडप से संलग्न होता है। इन मंदिरों का ऊपरी भाग यानि छत सपाट है। शिखर का विकास उत्तरोत्तर हुआ है। मंदिर स्थापत्य में विकास के साथ उसकी रचना और अवधारणाएं दोनों, परिवर्धित होकर संश्लिष्ट होती गई और सबसे महत्वपूर्ण भाग बना गर्भगृह का प्रवेश द्वार, जिसमें से गुजर कर व्यक्ति, भक्त समूह से पृथक होकर, गर्भगृह में एकाकी प्रवेश करता है और मानों पुनर्जन्म प्राप्त कर लौटता है, इस बिन्दु पर भक्त और भगवान के बीच का अन्तर नाममात्र रह जाता है।

यह प्रसंग छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में खरौद के तीन मंदिरों- इंदल देउल, लक्ष्मणेश्वर और सौंराई मंदिर से जुड़ा हुआ है। मंदिरों के प्रवेश द्वार पर गज-लक्ष्मी, ब्रह्मा-विष्णु-महेश, गणेश, सप्तमातृका नवग्रह, द्वादश-आदित्य आदि का अंकन धरन की क्षैतिज शिला यानि सरदल पर हुआ करता है तथा दोनों उर्द्ध बाजुओं अर्थात् द्वारशाखा पर नदी देवी गंगा-यमुना सहित द्वारपाल, ऊपर विभिन्न शाखाओं, यथा- रूपशाखा, मिथुनशाखा, पत्रशाखा आदि, विभाजन होता है। फर्श पर उदुम्बर-शिला में कल्पवृक्ष या लक्ष्मी अंकित होती हैं। इन अंकनों का अभिप्राय यह है कि भक्त कल्पवृक्ष से ऊपर उठकर, प्रतिहारियों द्वारा अशुभ शक्तियों के निवारण से गर्भगृह प्रवेश की इच्छा करता है वैसे ही गंगा-यमुना (अर्थात पवित्र संगम-जल) उसका अभिषेक करती हैं और ग्रह, नक्षत्र, देव-राशि उसके पक्ष में हो जाते हैं। 

मंदिरों के प्रवेश द्वार पर नदी-देवियों का अंकन गुप्त काल से आरंभ हो गया था किन्तु इस शास्त्रीय परम्पराओं में जो आंचलिक प्रयोग खरौद में हुआ है, वह पूरी भारतीय कला में दुर्लभ है। सौंराई मंदिर की द्वारशाखा के निचले लगभग तिहाई भाग मंे गंगा-यमुना हैं तो लक्ष्मणेश्वर में परम्परागत अगल-बगल के बजाय, आधे ऊपरी द्वार शाखा में नदी देवियां और निचले आधे भाग में द्वारपाल हैं और सर्वाधिक विलक्षण और दुर्लभतम उदाहरण इंदल देउल में है, जहां पूरी द्वारशाखा की लम्बाई-चौड़ाई गंगा और यमुना की मानवाकार प्रतिमाओं से पूरित है, यह भारतीय स्थापत्य का अपनी तरह का एकमात्र उदाहरण है।

ताला के मंदिर
मंदिर वास्तु की संरचना भारतीय मनीषा का ठोस और जीवन्त प्रतीक हैं। भारतीय मंदिर वास्तु का नियमित इतिहास गुप्तों के स्वर्ण युग के आरंभ होता है, उदयगिरी (विदिशा) और सांची के मंदिर के बाद क्रमिक विकास का उत्स उत्तर भारत के खजुराहो, उड़ीसा के भुवनेश्वर और दक्षिण भारत के मदुरै जैसे कला केन्द्रों में परिलक्षित होता है। हालांकि छत्तीसगढ़ क्षेत्र में आरंभिक मंदिरों का स्वरूप प्राप्त नहीं हुआ है, किन्तु प्रसिद्ध पुरातात्विक केन्द्र ताला के प्रकाश में आने के बाद स्थापत्य के क्रमिक विकास की अनहोनी और शास्त्रीय सीमा के अन्तर्गत ऐसा व्यतिक्रम उद्घाटित हुआ कि यह पूरे विश्व के प्राच्य-विद्या विशारदों को अंचभे में डाल दिया।

शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम के निकट मनियारी बसंती संगम पर छठी सदी ई. के दो स्मारक टीले जिठानी-देवरानी, सिद्ध-बाबा और देउर नाम से जाना गया, यह अमेरीकांपा ग्राम सीमा में तालाखार में स्थित है। इस स्थल का पहला ज्ञात उल्लेख 1873-74 में मि. बेगलर ने किया। छठें दशक में पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने इन खण्डहरों को निजी-नोट््स में दर्ज किया। सातवें दशक में डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने इनकी जानकारी सार्वजनिक की। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर 1980 में अमरीकी शोधार्थी डोनाल्ड स्टेडनर ने ताला के देवरानी मंदिर का छायाचित्रों और रेखाचित्र सहित प्रकाशित कराया और इसके पश्चात प्रदेश शासन के पुरातत्व विभाग की उपलब्धियां हुई।

ताला के जेठानी मंदिर का स्थापत्य नासिक, भाजा, कार्ले के चैत्य वास्तु की झलक युक्त है। विलक्षण दक्षिणामुख इस मंदिर में पूर्व व पश्चिम से भी प्रवेश की व्यवस्था है। मंदिर में विशाल आकार के पाषाण स्थापत्य खंडों पर विविध आकृति भाव व अलंकरणयुक्त गुणों का अंकन अनूठा है। देवरानी मंदिर पूर्वाभिमुख गर्भगृह अंतराल और मुखमंडप वाली संरचना है। प्रवेश द्वार की बारीक और सूक्ष्य नक्काशी जाली का काम अत्याकर्षक है तथा द्वारशाखा पार्श्वों में कीर्तिमुखों के रौद्र भाव के लिये कोमल पुष्प-पत्रों का अभिकल्प प्रयुक्त हुआ है। रूद्र शिव की प्रतिमा आकार के साथ, विभिन्न मानवमुखों युक्त तथा जीव-जंतुओं को मुख व अंगों में प्रदर्शित किया गया है।

ताला से प्राप्त छठी सदी ई. के शरभपुरीय शासक प्रसन्नमात्र का सिक्का निश्चित तौर पर ज्ञात इस शासक का एकमात्र रजत सिक्का है। ताला प्रतिमाशास्त्र में भी गहन शोध अध्ययन की आवश्यकता है, तभी भारतीय वास्तु व कला इतिहास के इस विशिष्ट अध्याय से देश व अंचल के इतिहास का गौरव प्रतिपादन हो सकेगा।

सूर्य पुत्र रेवन्त के मंदिर की मिसाल, बेमिसाल 
प्रकृति-पूजा की परम्परा, हमारे देश में आदिकाल से रही है और उसमें सूर्य की प्रखरता ने पूरे विश्व की धार्मिक भावना को चकाचौंध कर उभारा है। वेदों में सूर्य का स्थान इंद्र और वरूण के साथ तीन प्रमुख देवताओं में है।

मंदिर स्थापत्य में सूर्य के अत्यंत प्रसिद्ध मंदिर अल्प संख्या में किन्तु विभिन्न क्षेत्रों में विद्यमान हैं। उड़ीसा का कोणार्क सूर्य मंदिर, राजस्थान के बरमान और ओसियां के मंदिर, गुजरात में प्रभासपाटन के निकट तथा मोढेरा का मंदिर, कश्मीर का मार्तण्ड मंदिर और दक्षिण भारत के त्रिकूट मंदिर सूर्य के प्रसिद्ध मंदिर हैं। बिहार में देव का मंदिर भी विख्यात है तथा वहां सूर्य-षष्ठी पर सूर्य की पूजा लोक जनजीवन में रचा बसा है। मध्यप्रदेश में मंदिरों की नगरी खजुराहो में चित्रगुप्त मंदिर, वस्तुतः सूर्य मंदिर ही है। छत्तीसगढ़ क्षेत्र में भी सरगुजा जिले के डीपाडीह और रायपुर जिले के नारायणपुर में सूर्य-आदित्य के मंदिर विद्यमान हैं तथा बिलासपुर जिले के मल्हार से प्राप्त एक आकर की विविध सूर्य प्रतिमाएं, वहां द्वादश आदित्य मंदिर की प्रबल संभावना प्रकट करती है।

इस परिप्रेक्ष्य में अकलतरा के शिलालेख में एक अत्यंत दुर्लभ उल्लेख प्राप्त होता है, जो पूरे भारतीय स्थापत्य में बेमिसाल है वह है रेवन्त का मंदिर। रेवन्त के एकमात्र मंदिर के निर्माण का विवरण इस शिलालेख में मिलता है, जिसमें रेवन्त को सप्ताश्र्व (सूर्य) का पुत्र कहा गया है। मंदिर निर्माता के रूप में कलचुरि शासकों के सामंत हरिगण के पुत्र वल्लभराज का नाम मिलता है। वल्लभराज निश्चय ही कलचुरि राज्य का अत्यंत महत्वपूर्ण व्यक्ति था, क्योंकि कलचुरि शासकों के अन्य अभिलेखों में उसका नाम आया है साथ ही उसके द्वारा वल्लभसागर तालाब तथा अन्य सार्वजनिक, धार्मिक कार्य कराये जाने की जानकारी मिलती है। रेवन्त को शिल्प में अधिकतर शिकार यात्रा पर दिखाया जाता है। रेवन्त, बड़वारपी संज्ञा, जो विश्वकर्मा की पुत्री और सूर्य की सर्वप्रधान पत्नी थी, के गर्भ से उत्पन्न गुहों का अधिपति माना जाता है। पुराणों के अनुसार राजा लोग तोरण प्रान्त में प्रतिमा या घर में सूर्य पूजा की विधि के अनुसार रेवन्त की पूजा करते हैं। शिलालेख में उल्लिखित इस रेवन्त मंदिर का मूल स्थान संभवतः कोटगढ़ अथवा महमंदपुर में रहा होगा। मंदिर के प्रवेश द्वार, शिखर व अन्य स्थापत्य खंडों के साथ कोटगढ़ के द्वार पर देव-कोष्ठ में स्थापित सूर्य की प्रतिमा एकमात्र ज्ञात रेवन्त मंदिर का मुख्य अवशेष है।

छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग
सोमवंश का शासक, महाशिवगुप्त बालार्जुन का लगभग तेरह सौ साल पुराना इतिहास छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग माना जाता रहा और इस मान्यता पर मुहर लगी, जब सिरपुर से इस शासक के 27 ताम्रपत्रों (9 सेट) की निधि एक साथ मिली। किसी एक ही शासक के इतने प्राचीन ताम्रलेख इस तादाद में अब तक कहीं नहीं प्राप्त हुए हैं (विश्वसनीय जानकारी के अनुसार इस निधि में ताम्रपत्रों की संख्या इससे भी अधिक थी), यह प्राप्ति केवल संख्या की दृष्टि से ही उल्लेखनीय नहीं हैं, बल्कि यह तत्कालीन छत्तीसगढ़ के स्चर्ण युग की गौरव-गाथा का अमूल्य अभिलेख है। महाशिवगुप्त बालार्जुन, सोमवंश में उत्पन्न हुआ और वंशानुगत वैष्णव धर्म से भिन्न शैव धर्म के सोम सम्प्रदाय का अनुयायी बनकर, अपने पूर्वजों के विपरीत स्वयं को परम भागवत के बदले परम माहेश्वर कहलाने लगा, किन्तु उसके राजस्व काल में माता वासटा द्वारा बनवाया गया विष्णु मंदिर, जो अब सिरपुर के लक्ष्मण मंदिर के नाम से जाना जाता है और बौद्ध आचार्यों को उसके द्वारा दिये गए दान से, उसकी धार्मिक सहिष्णुता का परिचय मिलता है।

वासटा के सिरपुर शिलालेख की प्रशस्ति, अतिशयोक्तिपूर्ण होगी, किन्तु इस महान शासक के सद्गुणों, क्षमता और शक्ति का साफ अनुमान जरूर होता है। इस शिलालेख के अनुसार ‘धर्मावतार दिखाई पड़ने वाले महाशिवगुप्तराज ने पृथ्वी को जीत लिया। यह भीष्म पितामह से भी महान होगा, पराक्रम से आचार्य द्रोण को जीतेगा, तब रण में सामना करने के लिए कौन इसके लिये समान बल वाला कर्ण बनेगा। इस प्रकार बालार्जुन को अस्त्र विद्या में सभी को जीतने वाला और कुशल मानकर शत्रुओं ने अपने जीवन की इच्छा छोड़ दी, सम्पत्ति की इच्छा तो वे पहले ही छोड़ चुके थे। कृष्ण भी इस बालार्जुन के समान नहीं थे और न ही भावी कल्कि ही इसके समान हो सकेंगे।’

महाशिवगुप्त बालार्जुन की सिरपुर ताम्रपत्र निधि के अलावा बरदुला, बोंडा, लोधिया से एक-एक तथा मल्हार से तीन ताम्रलेख, सेनकपाट और मल्हार शिलालेख के साथ-साथ सिरपुर से विभिन्न शिलालेख प्राप्त होते हैं। मल्हार (वस्तुतः जुनवानी) से प्राप्त अब तक ज्ञात उसके अंतिम 57 वें राज्यवर्ष के ताम्रलेख में महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सूचनाओं सहित, अत्यंत रोचक विवरण आता है, जिसमें भूमिदान, हाथ के माप के पैमाने से दिया गया है तथा यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि हाथ का मान 24 अंगुल के बराबर होगा। संभवतः तब भी यह किस्सा प्रचलन में रहा होगा, जिसमें राजधानी सीमा में राजा द्वारा ब्राह्मण को एक खाट के बराबर भूमिदान की चर्चा होती है, किन्तु बाद में दान प्राप्तकर्ता ने खाट की रस्सी खोलकर पूरे राजमहल को घेर लिया था।

सिरपुर ताम्रपत्र निधि से मिलने वाली ऐतिहासिक जानकारी के साथ ही तत्कालीन राजधानी श्रीपुर में राज परिवार के सदस्यों द्वारा दिये गये दान का जिक्र है और यहां शैव सम्प्रदाय की अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा का पता चलता है और विभिन्न शैव-आचार्यों की गुरू-शिष्य परम्परा के नाम यथा अघोरशिव, दीर्घाचार्य, व्यापशिवाचार्य मिलते हैं जबकि जुनवानी ताम्रलेख में सोम सिद्धांत के आचार्यों भीमसोम, तेजसोम, रूद्रसोम और सोमशर्मा जैसे नाम मिलते हैं। निःसंदेह महाशिवगुप्त बालार्जुन इन्हीं शैव-सोम सम्प्रदाय के आचार्यों से दीक्षित होकर परम माहेश्वर की उपाधि का धारक बना था।

टीप
प्राचीन इतिहास, पुरातत्व और परंपराओं को एकजुट कर अंचल को समझने के प्रयास में छत्तीसगढ़ के विभिन्न पक्षों पर मेरा यह नोट किश्तों में, कभी समग्र रूप से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में छपा, जिसमें से उल्लेखनीय दैनिक भास्कर, बिलासपुर में 9 से 29 मई 1998 के बीच 20 किश्तों में छपा, इसे कुल 36 किश्त छपना था, लेकिन अटक गया। पुनः मध्यप्रदेश शासन, उच्च शिक्षा विभाग एवं मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी के समवेत उपक्रम की द्विमासिक पत्रिका ‘रचना‘ के छत्तीसगढ़ राज्य गठन के विशेष अंक, नवंबर-दिसंबर 2000 में मुख्य लेख के रूप में प्रकाशित हुआ। 

पत्रिका 'बहुमत' अंक 24, मार्च 2014 में यह विशेष रूप से प्रकाशित हुआ, जिसमें कहा गया है कि- ‘वे सांस्कृतिक भूमण्डलीकरण के इस दौर में भी अपने आसपास के जनजीवन को ही रचना और विचार के केन्द्र में रखते हैं। ऐसे समय में जब आधुनिकतावाद और उत्तरआधुनिकतावाद जैसे जुमले साहित्यिक विमर्श के केन्द्र में आते जा रहे हैं जिनसे साहित्य का आम पाठक अपने आपको सम्पृक्त नहीं कर पा रहा, राहुल सिंह उस दुनिया और समाज को अपनी अभिव्यक्ति का हिस्सा बनाते हैं जो आम तौर पर किसी भी साहित्यिक बातचीत में हाशिए पर ही खड़ा दीखता है।‘