Friday, September 25, 2026

रजत छत्तीसगढ़

2025-26, छत्तीसगढ़ राज्य गठन का रजत जयंती वर्ष। सरकार के लिए जश्न का मौका। जोर-शोर से तैयारियां शुरू हुईं। कुछ आपसी लोग, जो सरकार से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े हैं, मुझसे संपर्क कर बताया कि इन वर्षों की (सरकारी) सांस्कृतिक यात्रा पर मुझे लिख कर देना है। लिखने का उत्साह न होने के बावजूद कर्तव्य निर्वाह और आपसी संबंधों के माध्यम से आई बात रखने के लिए एक नोट तैयार किया और इस शर्त के साथ भेज दिया कि उपयोगी हो तो इसे बिना नाम के या किसी अन्य के नाम से भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह किसी काम का हुआ हो, संभव है छपा हो। 

इस बीच पत्रकार श्री अमित चौहान ने इस विषय पर बात करना चाहा, मेरी उदासीनता पर उनका उत्साह भारी पड़ा, छत्तीसगढ़ी में हुई एक घंटे से भी अधिक की बातचीत उन्होंने रिकॉर्ड कर ली, जिसका एक अंश ‘स्वदेश‘ में छपा है, जो यहां दे रहा हूं। इसी क्रम में वह नोट भी याद आया, संयोगवश मिल गया, अब लगा वह भी प्रस्तुत किया जा सकता है। सो, पहले वह नोट, उसके बाद स्वदेश में प्रकाशित साक्षात्कार- 

छत्तीसगढ़ राज्य में संस्कृति विभाग के अंतर्गत संचालनालय बना, वह प्रशासकीय आसानी और स्थापना व्यय नियंत्रित करने वाला था। इस संचालनालय में संस्कृति, राजभाषा, पुरातत्व, संग्रहालय, अभिलेखागार, गजेटियर, पर्यटन सभी एक साथ थे। बंटवारे में एक खास बात यह थी कि मध्यप्रदेश के दौरान संस्कृति के लगभग सारे काम सीधे संस्कृति विभाग के बजाय विभिन्न परिषद और अकादमियों के माध्यम से होता था, यथा- साहित्य परिषद, कला परिषद, आदिवासी लोक कला परिषद, कालिदास अकादमी, चक्रधर कत्थक केंद्र, उर्दू अकादमी आदि। बंटवारे में तय हुआ कि विभाग का निर्धारित हिस्सा छत्तीसगढ़ में जाएगा, जैसा कि हुआ भी। मगर परिषद, अकादमियों आदि के लिए तय हुआ कि जो जहां स्थापित है, वहीं रहेगा। छत्तीसगढ़ के हिस्से में तब सिर्फ एक पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजन पीठ था, जो पहले अध्यक्ष डॉ. प्रमोद वर्मा के बाद से बंद-सा पड़ा था, वही एक छत्तीसगढ़ के हिस्से में आया।

संस्कृति-पुरातत्व की गतिविधियां आरंभ हुई साथ ही विभागीय नीति तैयार करने पर भी काम शुरू हुआ। संस्कृति नीति 2001 घोषित की गई जिसके अंतर्गत विभागीय गतिविधियों को नया आयाम दिये जाने का प्रयास आरंभ हुआ। स्पष्ट किया गया कि राज्य की कोई विशेष या औपचारिक नीति के स्थान पर परम्पराओं एवं मान्यताओं का समावेश एवं उनका पोषण एवं संवर्धन करना है, इसलिए संस्कृति नीति में सांस्कृतिक उद्‌देश्यों की परिकल्पना पर ज्यादा जोर दिया गया। नीति, जिसे संकल्प भी कहा गया, में कहा गया कि राज्य अभिलेखीय एवं गैर अभिलेखीय परंपराओं के आधार पर संस्कृति को परिभाषित करेगा। राज्य समुदायों के अंतर्पारस्परिक संबंधो को बनाये रखने एवं उनके मध्य समन्वय स्थापित करने का प्रयास करेगा, इसे अतिरिक्त सीमावर्ती पडोसी राज्यों के, छत्तीसगढ़ राज्य के साथ सांस्कृतिक संबंधों की नये परिपेक्ष्य में व्याख्या की जायेगी। राज्य की बोलियों को प्रोत्साहन देने हेतु वाचिक परंपराओं और साहित्य का अभिलेखन, विश्व की दूसरी बोलियों, समुदायों के मध्य संबंधों को प्रोत्साहित किया जायेगा। संस्कृति के ज्ञान का संचयन एवं उसका उपयोग समग्र रूप से एक सतत प्रक्रिया के रूप में देखे जाने पर जोर दिया गया। 

विभागीय नीति-संकल्प के साथ विभाग ने अपने क्रियाकलाप में शामिल किया- साहित्य एवं कला का विकास, सांस्कृतिक परम्परा का संरक्षण, ललित कला तथा संगीत शिक्षा को प्रोत्साहन, पुराने अभिलेखों का संरक्षण, संवर्धन, ऐतिहासिक महत्व के स्मारकों का संरक्षण तथा संग्रहालयों का विकास, शासकीय कार्य में हिन्दी भाषा का प्रयोग तथा उसके विकास संबंधी कार्य, शैक्षणिक संस्थाओं में हिन्दी भाषा का प्रयोग तथा उसके विकास संबंधी कार्य, जिला/राज्य गजेटियर का उत्पादन और पुनर्मुद्रण, सिनेमा अधिनियम के तहत नये सिनेमागृहों को लायसेंस, अर्थाभावग्रस्त कलाकारों/साहित्यकारों को पेंशन व आर्थिक सहायता, अशासकीय सांस्कृतिक संस्थाओं को प्रोत्साहन व आर्थिक सहायता, चयनित कलाकारों/साहित्यकारों/विद्वानों को सम्मानित करने का कार्य, कला, संस्कृति एवं ऐतिहासिक विषयों के दुर्लभ एवं प्रामाणिक ग्रंथों, दस्तावेजों, स्मृति चिन्हों का संग्रह, प्रकाशन, प्रदर्शन तथा संबंधित व्याख्यान, संगोष्ठियों आदि का आयोजन और इनके साथ छत्तीसगढ़ राज्य की संस्कृति का समग्र विकास । 

पुरातत्व के क्षेत्र में स्मारकों का संरक्षण एवं पर्यटन को बढ़ावा देने को इस नई नीति का विशिष्ट अंग माना गया। समुदायों के जैव सांस्कृतिक तत्व तथा उनके मध्य परिवेशीय अंतःसंबंध को एक नया आयाम देते हुये यह प्रयास, संस्कृति को संपूर्ण रूप से एक तत्व मानकर, उसका संवर्धन एवं परिवर्धन, शोध संगोष्ठी एवं विभिन्न उत्सवों के माध्यम से संस्कृति के निरंतर प्रवाह को बनाये रखना ही नयी संस्कृति नीति का सार कहा गया। नीति के इस आरंभिक स्वरूप और गतिविधियों में आगे परिवर्धन होता रहा। 

राजकाज की शुरुआत का दौर था। संस्कृति और सांस्कृतिक आयोजन प्रकटतः अतएव प्राथमिकता के होते हैं, तब पूरे संचालनालय का अमला इन्हीं कामों में लग जाता था, जो कमोबेश स्थिति लंबे समय तक बनी रही। पर्यटन अलग हुआ और स्वतंत्र मंडल गठित हो कर काम करने लगा। गजेटियर के लिए प्रशासनिक अधिकारी अध्यक्ष बनाए गए, मगर स्वतंत्र रूप से गजेटियर के काम खास प्रगति नहीं हुई। इसका एक कारण, नये-नये जिलों का बनना था, दूसरी तरफ छोटे जिला इकाइयों के लिए आंकड़े तो पृथक हो सकते थे, इतिहास-भूगोल जैसे खंडों में जानकारी बांटना व्यावहारिक नहीं होता। इंटरनेट और सूचना तंत्र का विकास भी एक कारण बना। यह भी चर्चा रही कि अब ‘मानव विकास प्रतिवेदन‘ पर्याप्त होगा, पृथक-पृथक जिला गजेटियर अप्रासंगिक होंगे। 

सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रही। मध्यप्रदेश के दौरान संभागीय उत्सव और समय-समय पर प्रसंगों के आयोजन हुआ करते थे। छत्तीसगढ़ में रामगढ़-सरगुजा, चक्रधर-रायगढ़ और मल्हार महोत्सव प्रमुख थे। राज्य गठन के बाद विभिन्न मेलों, पर्व के अवसर पर उत्सव महोत्सव होने लगे, जिनमें सबसे प्रमुख राजिम मेला महोत्सव, कुंभ कल्प जैसे बदलते नामों के साथ आयोजित होता रहा। अब विभागीय सूची के अनुसार इन सांस्कृतिक उत्सव, महोत्सव, मेला-मड़ई की संख्या 89 हो गई है। इस क्रम में सर्वाधिक उल्लेखनीय राज्य स्थापना दिवस पर राज्योत्सव का आयोजन है। प्रतिवर्ष राज्योत्सव के आयोजन का स्वरूप व्यापार मेला जैसा भी होता है। राज्योत्सव में विभिन्न विभागों के पवेलियन, फन-फूड तो होता ही है। बड़े फिल्मी अभिनेताओं, गायक-संगीतकारों की प्रस्तुतियों का आकर्षण होता है। इसके साथ इस अवसर पर दिए जाने राज्य सम्मान, जिनकी संख्या आरंभिक वर्षों में दर्जन भर भी नहीं थी, अब तीन दर्जन है। 

अब संस्कृति विभाग के अंतर्गत ही पूरे दर्जन भर सम्मान हैं, जिनमें साहित्य/आंचलिक साहित्य के क्षेत्र में पं. सुन्दरलाल शर्मा सम्मान, कला/शिल्प कला के क्षेत्र में चक्रधर सम्मान सम्मान, लोक कला के क्षेत्र में दाऊ मंदराजी सम्मान, हिन्दी/छत्तीसगढ़ी सिनेमा में रचनात्मक लेखन, अभिनय, पटकथा निर्माण तथा हिन्दी/छत्तीसगढ़ी सिनेमा में सर्वश्रेष्ठ फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में क्रमशःराज्य और राष्ट्रीय स्तर के किशोर साहू सम्मान/अलंकरण, प्रदर्शनकारी छत्तीसगढ़ी लोक कला के क्षेत्र में देवदास बंजारे स्मृति पुरस्कार, देश के बाहर उल्लेखनीय कार्य के क्षेत्र में छत्तीसगढ़ अप्रवासी भारतीय सम्मान, साहित्य/आंचलिक साहित्य के क्षेत्र में लाला जगदलपुरी पुरस्कार, लोक शैली पंथी नृत्य प्रदर्शनकारी कला के क्षेत्र में देवदास बंजारे पंथी नृत्य पुरस्कार, छत्तीसगढ़ी/हिन्दी/ अन्य भाषा नाटक, रूपंकर कलाएँ, रंगकर्म के क्षेत्र हबीब तनवीर सम्मान, छत्तीसगढ़ी लोक संगीत के क्षेत्र में खुमान साव सम्मान सम्मान राशि रू. 1.00 लाख तथा छत्तीसगढ़ी लोकगीत के क्षेत्र में लक्ष्मण मस्तुरिया सम्मान दिया जा रहा है। 

जैसाकि प्रत्येक सम्मान के साथ होता है, घोषणा के बाद प्रतिक्रियाएं आती हैं, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि इन सम्मानों के कारण राज्य की प्रतिभाओं का सम्मान, प्रेरक और उत्साहवर्धक हुआ। उल्लेखनीय कि यह आयोजन नवंबर पहले सप्ताह में होता है और यही चुनावी सालों में आचार-संहिता का समय, इसलिए उन वर्षों में स्थगित होता है तथा किन्हीं अन्य वर्षों में उपचुनाव वाले क्षेत्रों के कारण प्रभावित होता है। राज्य निर्माण के बाद राष्ट्रीय पुरस्कार-सम्मान की दृष्टि से खासी उपलब्धियां छत्तीसगढ़ के हिस्से आईं। जिनमें पद्म पुरस्कार, संगीत नाटक अकादेमी तथा अन्य पुरस्कारों में भी राज्य की प्रतिभाओं का नाम दर्ज हुआ। 

राज्य में साहित्य, संगीत, नृत्य, रंगमंच, चित्रकला. मूर्तिकला, सिनेमा और आदिवासी एवं लोककलाओं की शासन की नीतियों के अनुरूप सम्मान, विस्तार, प्रोत्साहन और संरक्षण करने के उ‌द्देश्य से श्छत्तीसगढ़ संस्कृति परिषद् गठित है, जिसके अंतर्गत साहित्य अकादमी, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी सृजनपीठ, श्रीकांत वर्मा पीठ, गुरु घासीदास शोध पीठ, कला अकादमी (चक्रधर कत्थक केन्द्र रायगढ़), आदिवासी एवं लोक कला अकादमी (नाचा केन्द्र राजनांदगांव), छत्तीसगढ़ फिल्म विकास निगम, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, छत्तीसगढ़ सिंधी अकादमी, इकाइयां हैं। 

राज्य के बाहर आयोजित होने वाले समारोहों में कलाकारों की नियमित भागीदारी होने लगी वहीं देश की प्रतिष्ठित संस्थाओं, मंडलियों के आयोजनों के साथ-साथ संगीत नाटक अकादेमी और दक्षिण-मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के विभिन्न आयोजन राज्य में होने लगे। ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत‘ के अंतर्गत गुजरात राज्य से सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ। भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली और उत्तरप्रदेश के संस्कृति विभाग के साथ सांस्कृतिक समझौता ज्ञापन हस्ताक्षर हुए। राजधानी दिल्ली के आयोजनों में समय-समय पर और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में छत्तीसगढ़ राज्य दिवस का प्रतिष्ठापूर्ण आयोजन होने लगा, जिसमें छत्तीसगढ़ के दिल्लीवासी प्रतिष्ठित नागरिक, उच्चाधिकारी, विद्यार्थी और श्रमिक भी एकत्र होते हैं। केंद्र शासन के गीत नाटक प्रभाग तथा अन्य विभागों की योजनाओं के लाभ की स्थिति भी बेहतर हुई। इसके अतिरिक्त पावस प्रसंग, सफर मुक्ताकाश, शिल्प और कला प्रशिक्षण शिविर ‘आकार‘ जैसे विभागीय आयोजन और आइटीसी संगीत रिसर्च अकादमी के सहयोग से आयोजित सांगीतिक कार्यक्रम, ‘शतरूपा‘, ‘जाणता राजा‘ जैसे विभिन्न सफल और स्मरणीय हैं। ‘आजादी का अमृत महोत्सव’, ‘आदि परब‘, ‘जनजातीय गौरव दिवस‘, कुंभ मेलों में सांस्कृतिक भागीदारी जैसे उल्लेखनीय आयोजन हुए। सन 2006 गुरु घासीदास जी की 250 वीं वर्षगांठ के अवसर पर 18 से 31 दिसंबर तक पूरे राज्य में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए साथ ही परिचयात्मक पुस्तिका प्रकाशित की गई थी। 

अन्य विभागों जैसे जन-संपर्क विभाग द्वारा आयोजित साहित्य महोत्सव, प्रतिवर्ष गणतंत्र दिवस पर झांकी और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से राज्य कला-परंपरा के लिए नये अवसर बने। खेल-कूद युवक कल्याण विभाग तथा आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा भी सांस्कृतिक आयोजन, प्रतियोगिताएं कराई जाने लगीं। कला-मंडलियों, कलाकारों, संस्थाओं आदि को वित्तीय सहायता और अनुदान दिया जा रहा है। 

पुरातत्व के क्षेत्र में अनुरक्षण, संरक्षण यानि प्राचीन स्थल-स्मारकों की मरम्मत और रख-रखाव, सर्वेक्षण और संग्रहालय संबंधी कार्य होते हैं, किंतु इनमें उत्खनन को पुरातत्व का पर्याय जैसा मान लिया जाता है। छत्तीसगढ़ में राज्य निर्माण के पहले पुरातात्विक खुदाई का काम सिरपुर, धनोरा, मल्हार, ताला, डीपाडीह, कलचा-भदवाही, गढ़धनोरा, भोंगापाल, करकाभाट जैसे स्थानों पर हुआ था। राज्य निर्माण के बाद इस दिशा में उल्लेखनीय महत्व के काम हुए, जिनमेे सिरपुर, सिसदेवरी, सिरकट्टी, अमलीडीह, पचराही, महेशपुर, मल्हार, मदकूदीप, तुरतुरिया, तरीघाट, राजिम, डमरू, देवरी, जमरांव, और रीवांगढ़ शामिल हैं। इन कामों के फलस्वरूप विभिन्न स्मारक और पुरावशेष प्रकाश में आए, जिनसे राज्य के प्राचीन इतिहास के गौरवशाली स्वर्णिम पृष्ठ उजागर हुए। विभिन्न तहसीलों का ग्रामवार सर्वेक्षण तथा नदी-घाटी संस्कृति, गढ़, गुरु घासीदास की रावटियां जैसे थीमेटिक सर्वेक्षण कराए गए। 

पुरातत्व की विभागीय शोध पत्रिका ‘कोसल‘ और संस्कृति, कला, साहित्य, परंपरा पर केंद्रित पत्रिका ‘बिहनिया‘ का निर्णय राज्य गठन के बाद आरंभ में ही ले लिया गया था। इन दोनों पत्रिकाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रकाशन हुए। साथ ही समय-समय पर विभागीय संगोष्ठी, प्रदर्शनी, आयोजनों, पुरातत्वीय स्थलों, संग्रहालय आदि से संबंधित प्रकाशन उपयोगी साबित हुए हैं। स्तरीय साहित्य और इतर लेखन को प्रोत्साहन देने के लिए वित्तीय सहायता का भी प्रावधान किया गया। छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास का सबसे विश्वसनीय स्रोत अभिलेख पर केंद्रित पुस्तक ’उत्कीर्ण लेख’ का पुनर्प्रकाशन किया गया था। 

रायपुर, बिलासपुर और जगदलपुर के विभागीय पुरातत्वीय संग्रहालयों के अलावा जिलों में पुरातत्व संघ के अधीन संग्रहालयों को विभागीय सहयोग से विकसित किया गया है साथ ही विभिन्न पुरातात्विक केंद्रों पर स्थल संग्रहालय भी स्थापित किए गए हैं। महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर में छत्तीसगढ़ के पारंपरिक व्यंजन और खान-पान का केंद्र ‘गढ़ कलेवा‘ बहुत लोकप्रिय हुआ है। संग्रहालय से संबद्ध ग्रंथागार शहीद स्मारक भवन में संचालित है, जो प्रतियोगी परीक्षार्थियों, शोधार्थियों, प्रबुद्ध और सामान्य पाठकों सभी के लिए उपयोगी है। बहुआयामी संस्कृति संस्थान की रूपरेखा बनी, विवेकानंद प्रबुद्ध संस्थान के निर्णय हुआ, इनके वांछित स्वरूप को आकार देने का प्रयास किया जा रहा है। स्वामी विवेकानंद के तरुण आयु में रायपुर प्रवास के बूढ़ापारा स्थित भवन को स्मारक विकसित किये जाने की योजना पर काम हो रहा है। 

एक महत्वाकांक्षी केंद्र ‘पुरखौती मुक्तांगन‘ विकसित हुआ। यह खुला संग्रहालय, राज्य की संस्कृति, परंपरा, पुरातत्व, पर्यावरण और जीव-सृष्टि की सन्निधि में विकास की कल्पना को साकार करने का केंद्र बनाने की योजना को मूर्त करने का उद्यम है। इसके महामहिम राष्ट्रपति महोदय द्वारा पुरखौती मुक्तांगन के प्रथम चरण का लोकार्पण किया गया, लोकार्पण समारोह में महामहिम राष्ट्रपति महोदय ने निर्माणाधीन इस योजना की सराहना की। लगभग 200 एकड़ परिक्षेत्र में फैला निरंतर विकासशील पुरखौती मुक्तांगन को ऐसे शैक्षणिक केन्द्र के रूप में विकसित करने का प्रयास है जिसमें राज्य की जनजातीय संस्कृति, कलाशिल्प, प्राकृतिक संरचना और भौगोलिक परिदृश्य, पर्यावरण और जैव विविधता को प्रदर्शित किया जाए। यहां भव्य प्रवेश द्वार, पर्यटन सूचना केन्द्र, पाथ-वे, माड़ियापथ, बैगा चौक, देवगुड़ी, छत्तीसगढ़ हाट, आभूषण पार्क, छत्तीस खम्भा चौक, जलपृष्ठीय रंगमंच, मनोरंजक उद्यानगृह, सरगुजा और बस्तर प्रखंड, राम वनगमन पथ, स्वतंत्रता सेनानियों की मूर्तियों का निर्माण, मुखौटे आदि हैं, जो जनरुचि का केंद्र बना हुआ है। 

विभाग द्वारा अभिनव योजनाओं के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी पारंपरिक व्यंजनों के आस्वादन का अवसर सुलभ कराने का केंद्र ‘गढ़-कलेवा‘, छत्तीसगढ़ के पारंपरिक ज्ञान पद्धति से निर्मित उत्पादों के विक्रय हेतु विभिन्न संस्थाओं द्वारा अपने विक्रय पटल, छत्तीसगढ़ी पारंपरिक उत्पादों को देखने तथा स्मृतिचिन्ह के रूप में क्रय की सुविधा, गुजरात टूरिज्म बोर्ड, छत्तीसगढ़ पर्यटन मण्डल तथा दक्षिण मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र की छत्तीसगढ़ ईकाई के कार्यालय वाला ‘गढ़-हटरी‘ है। विभाग द्वारा राज्य के कलाकारों के महत्व को ध्यान देने के उद्देश्य से कलाकारों के पंजीयन हेतु वेबसाईट का निर्माण किया गया है. जिसके अंतर्गत चिन्हारी के माध्यम से ऑनलाईन पंजीयन की सुविधा दी जा रही है, जिससे राज्य के हर वर्ग के कलाकारों को विभाग से सीधे सम्पर्क करने का अवसर मिला है और विभाग के पंजीकृत कलाकारों को विभागीय कार्यक्रमों से लाभान्वित किया जा रहा है। अब तक कुल 13525 कलाकारों का ऑनलाईन पंजीयन प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार अनुदान पोर्टल विकसित किया गया है, जिसमें राज्य की अशासकीय पंजीकृत संस्थाएं जो कला विशेष में उच्चस्तरीय प्रशिक्षण एवं प्रदर्शन हेतु विशिष्ट स्तर के संगीत समारोह, नाट्य समारोह, कला प्रदर्शनियां, साहित्य समारोह, शिविर अथवा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि के आयोजन करते हैं, उन्हें आर्थिक सहायता दिये जाने का प्रावधान है। 

राज्य के संस्कृति के विविध आयामों पर प्रलेखन हेतु सांस्कृतिक प्रलेखन के क्षेत्र में प्रतिष्ठित संस्था सहपीडिया के साथ अनुबंध किया गया है। इसके अंतर्गत 100 विषय वस्तुओं पर प्रलेखन माड्यूल तैयार कर बेबसाईट पर अपलोड किये जाने का कार्य किया जा रहा है। अब तक लगभग 60 माड्यूल तैयार कर लिये गये है। इस कार्य से सूचना क्रांति के वर्तमान युग में राज्य के समृद्ध संस्कृति पर यथेष्ठ सामग्री वेबसाईट के माध्यम से समूचे दुनिया के लोगों को सुलभता से उपलब्ध करायी जा रही है। 

सिंगल विंडो डेश बोर्ड साफ्टवेयर का निर्माण छत्तीसगढ़ में फिल्म निर्माण करने वाले निर्माता/निर्देशकों को अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने हेतु किया गया है। इस साफ्टवेयर के माध्यम से छत्तीसगढ़ के समस्त विभाग से जिला दण्डाधिकारी के द्वारा अनापत्ति प्रमाणपत्र प्राप्तकर निर्माता / निर्देशक को फिल्म निर्माण हेतु अनापत्ति प्रमाणपत्र प्रदान करना है। अब तक छत्तीसगढ़ में 12 हिन्दी फिल्मों की शूटिंग की गई है। 

विभाग द्वारा संस्कृति का संरक्षण संवर्धन हेतु विभागीय लक्ष्यों में लोक कलाकारों की सूची तैयार करना, जिसमें चिन्हारी पोर्टल के माध्यम से ऑनलाईन पंजीयन की सुविधा विभागीय वेबसाईट पर उपलब्ध है। जिससे लोक कलाकारों का ऑनलाईन पंजीयन किया जाता है। 5029 कलाकार / संस्था तथा 6208 रामायण मंडलियों का पंजीयन किया गया है। वर्तमान कलासाधकों, अर्थाभावग्रस्त साहित्यकारों / कलाकारों को मासिक वित्तीय सहायता / मासिक पेंशन, ईलाज हेतु कलाकार कल्याण कोष, कलाकार / संस्था / जिला कलेक्टर को आयोजनों के लिए आर्थिक अनुदान की व्यवस्था की गई है। लोककलाओं को सोशल मिडिया के माध्यम से लोकप्रिय बनाने का प्रयास विभाग द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों को फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम में 03 दिवस तथा यूट्यूब में 07 दिवस के अंदर अपलोड किया जा रहा है। उपलब्ध लिखित साहित्य सामग्री का संकलन उपलब्ध पांडुलिपियों एवं दस्तावेजों का संकलन कार्य किए जाने का निर्णय लिया गया है। साथ ही यह भी तय किया गया है कि छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध नाटक जैसे चंदैनी गोंदा, लोरिक चंदा इत्यादि के मंचन हेतु मुक्ताकाशी मंच महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय परिसर में प्रत्येक माह एक अर्थात वर्ष में 12 प्रसिद्ध नाटकों का मंचन किया जायेगा। 

अब तक की नियमित गतिविधियां और नवाचार उल्लेखनीय है, मगर कई ऐसे पक्ष हैं जिनका उल्लेख इस प्रसंग के अनुकूल नहीं है। संक्षेप में हमारा ध्यान इस ओर भी उतना ही होना आवश्यक है कि अब तक क्या नहीं हो पाया है और क्या करना आवश्यक है। 

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स्वदेश 

राहुल कुमार सिंह से विशेष बातचीत...

जुन्ना सामग्री संग नवा दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड के घलो डिजिटलीकरन होय 

चक्रधर, मल्हार, भोरमदेव, सिरपुर महोत्सव सहित राज्योत्सव प्रदेश के पहचान बनिस 

स्वदेश समाचार रायपुर 

छत्तीसगढ़ राज्य अपन गठन के 25वां वर्ष म प्रवेश कर चुके हे। संस्कृति, लोककला, पुरातत्व अउ ऐतिहासिक धरोहर प्रदेश के पहचान के महत्वपूर्ण आधार ये। इही विषय म 500 से ज्यादा अइसने अध्ययन म शामिल राहुल कुमार सिंह, पुरा-संस्कृतिधर्मी धरोहर वार्ताकार एवं प्रमुख, परोहर परियोजना, बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर ले अमित चौहान के बातचीत के प्रमुख संपादित अंश प्रस्तुत हे.... 

सवाल- 25 बछर म संस्कृति अउ पुरातत्व के क्षेत्र म का-का प्रमुख बड़े उपलब्धि आपमन के ध्यान म आथे? 
जवाब- राज्य गठन के बाद संस्कृति के क्षेत्र म सीधा काम करे के मौका मिलिस। डॉ. कल्याण कुमार चक्रवर्ती, डॉ. इंदिरा मिश्रा अउ श्री प्रदीप पंत जइसने अधिकारी मन के योगदान प्रमुख हे। राज्योत्सव, चक्रधर महोत्सव, रामगढ़ महोत्सव, मल्हार, भोरमदेव, तातापानी, चित्रकोट अउ सिरपुर जइसने आयोजन अऊ परंपरा प्रदेश के सांस्कृतिक पहचान के हिस्सा बनिस ये बड़े उपलब्धि ये। 

सवाल- प्रमुख पुरातात्विक धरोहर अउ सामग्री मन के संरक्षण अउ विकास बर आगू का प्रयास करे जा सकत हे? जवाब- नवा उत्खनन ला लेके उत्साह बने हावय, फेर ओकर ले घलो जादा जरूरी पहिली ले सामने आ चुके धरोहर मन के रखरखाव हवय। मल्हार, ताला, सिरपुर, भोरमदेव सहित प्रदेश के दूसर पुराना स्थल मन के मूल स्वरूप ला सुरक्षित रखे के जरूरत हवय। भोरमदेव जइसन कई ठन मंदिर के आसपास बढ़त व्यावसायिक गतिविधि मन ला नियंत्रित करना जरूरी हवय। जुन्ना अउ पुरातात्विक स्थल म अनावश्यक बदलाव के बजाय संरक्षण अउ मरम्मत ला प्राथमिकता मिलना चाहिए। 

सवाल- जम्मो पुरातात्विक धरोहर मन के जानकारी के डिजिटल रिकॉर्ड कइसे तियार करे जा सकत है? 
जवाब- संग्रहालय मन म नियमित संग्रहाध्यक्ष अउ क्यूरेटर के जरूरत हे। महंत घासीदास संग्रहालय के जुन्ना रिकार्ड अउ ओकर रखरखाव ला दुरुस्त करे जाय। जम्मो के डिजिटललाइज़ेशन होना ही चाहिए। जुन्ना सामग्री के संग वर्तमान के दस्तावेज, फोटो, रिकॉर्ड अउ ऐतिहासिक सामग्री घलो डिजिटल रूप म सुरक्षित होना चाहिए, ताकि भविष्य म ओला आंसानी ले देखे अउ उपयोग करे जा सके। 

सवाल- पुरातत्व ले जुड़े लेख, शोध, दस्तावेज के संग्रह अउ प्रकाशन बर अउ का जरूरी प्रयास के जरूरत हे? जवाब- राजपत्र अउ विभागीय वार्षिक प्रतिवेदन मन ला ऑनलाइन उपलब्ध कराए के जरूरत हे। शासन-प्रशासन द्वारा प्रकाशित सामग्री ला व्यवस्थित रूप ले डिजिटल प्लेटफॉर्म म रखे जाना चाहिए। हर प्रकाशन के संग उचित वर्गीकरण अउ मेटाडेटा होना चाहिए, ताकि शोधकर्ता अउ आम लोगन मन ला सामग्री आसानी ले मिल सके। केवल कुछ सामग्री उपलब्ध होना पर्याप्त नइ हे, बल्कि कम से कम जरूरी सामग्री घलो व्यवस्थित रूप ले उपलब्ध होना चाहिए। 

सवाल- अवोइया 25 बछर म आपमन छत्तीसगढ़ के संस्कृति अउपुरातत्व धरोहर आदि ला कइसन रूप म देखना चाहत हव? 
जवाब- सच कहों तो मैं आने वाला 25 नइ बल्कि 250 अउ कहों त 2500 साल तक येकर विस्तार अउ संरक्षण ल देखना चाहत हंव। आने वाला समय म डिजिटलीकरन प्रमुख जरूरत है। सामग्री ला मेटाडेटा के संग वर्गीकृत करके छत्तीसगढ़ सरकार के आर्काइव पोर्टल पर उपलब्ध कराए जा सकत हें। एखर ले प्रदेश के सांस्कृतिक, पुरातात्विक अउ ऐतिहासिक सामग्री भविष्य बर सुरक्षित रह सकही, अउ शोधकर्ता मन के संग आम जनता ला घलो आसानी ले उपलब्ध हो सकही। 

सवाल- नवा पीढ़ी ल अपन धरोहर ले जोड़े बर का कदम उठाए के जरूरत हे? 
जवाब- लोककला म बदलाव अउ प्रयोग के गुंजाइश होना चाहिए। कलाकार जब नवा प्रयोग करथें अउ जनता ओला स्वीकार करथे, त लोककला के नवा स्वरूप विकसित हो सकथे। लोककला ला केवल जुन्ना स्वरूप मा स्थिर रखे के बजाय प्रतिभाशाली कलाकार मन के प्रयोग अउ जनस्वीकृति ला घलो महत्व मिलना चाहिए। येकर से नवा लइका मन अपन मन के जुड़त जाही।

Tuesday, September 22, 2026

अपने अपने राम

रामकथा को आधार बना कर अभिव्यक्ति के कौन-कौन से अनूठे आयाम का संधान संभव है इसका उदाहरण है भगवान सिंह की यह पुस्तक ‘अपने अपने राम‘। राम का चरित्र वर्ण कुव्यवस्था के खिलाफ और समावेशी राजनय के व्याख्याकार के रूप में गढ़ा गया है। स्वाभाविक ही युवराज और राजा राम के चारों ओर राजनयिक षडयंत्र का वातावरण बना रहता है। उनके समक्ष (मुख्यतः कैकेयी और वशिष्ठ द्वारा) प्रतिकूल स्थितियां लगातार निर्मित होती हैं, मगर धैर्य, न्यायप्रियता, निष्ठा, सच-ईमान वाले व्यवहार व वाक्-कौशल, मानवीय संवेदना पर कायम रहते राम, मर्यादा पुरुषोत्तम स्थापित होते हैं।

राज-काज और राजघरानों के प्रसंग में कई बातें बड़े पते की आई हैं, जैसे- ‘राजघरानों में आधे संकट दुस्साहस से पैदा होते हैं, आधे भीरुता से‘ ... ‘रूढ़िग्रस्तता का भी अपना अर्थशास्त्र और मूर्खता का भी अपना तर्कशास्त्र होता है।‘ ... राजा अपने लिए राज्य नहीं करता। राष्ट्रहित के लिए ही वह शासन करता है। राष्ट्रहित से ही राजा मित्रों और शत्रुओं का निश्चय करता है और यह मैत्री और शत्रुता भी स्थायी नहीं होती, प्रासंगिक होती है। ... राज परिवारों में अभिधा से अधिक व्यंजना ही समझ में आती है। यदि कोई बात सहज ढंग से कही गई हो तो भी वे उसमें से व्यंजना की खोज करके ही दम लेते हैं। ... राजनय और व्यक्तिगत गुणों के संदर्भ में लक्ष्मण का विचार है कि अनन्यता और आत्मीयता स्थापित करना राम की शक्ति है। और राम कहते हैं- ‘यदि कोई व्यक्ति या प्राणी तुम्हारे मन में घृणा पैदा करने में सफल हो गया तो समझो, वह जीत गया, तुम हार गए।‘ ... 'अतः सुमित्रा ने अपने दोनों पुत्रों में से एक को राम के साथ लगा दिया था, दूसरे को भरत के साथ। स्वयं भी इन्हें दोनों भाइयों के प्रति अनन्य सेवा भाव का उपदेश देती रहती थीं। राजा कोई भी बने, उनका अपना जीवन और सम्मान तो निरापद रहे!'

प्रोपोगैंडा और आधुनिक ट्रोल के संदर्भ में इस अंश को पढ़ना रोचक होगा- ‘एक बार विकसित हो जाने पर इस पर उन जनों का अधिकार हो जाएगा जिनके विरुद्ध पण्डितों और पुरोहितों का प्रचारतन्त्र काम करता है। यह है कुशीलवों और गाथाकारों की परम्परा। नाटकों, गायनों और स्वांगों की परंपरा। कथावाचकों और कथाकारों की परंपरा। नर्तकों, विटों और भांड़ों और भाटों की परम्परा। इससे उन सभी सम्भावित दूषकों और दुष्प्रचारों को निरस्त किया जा सकेगा, लक्ष्मण।‘

विश्वामित्र जिनका कथन आता है- ‘राजा को अपने गुरु की छाया से, यथासम्भव, दूर ही रहना चाहिए। उसके परामर्श भी आदेशवत हो जाते हैं। इससे राजा को स्वतंत्र निर्णय लेने में बाधा पड़ती है।‘ पुस्तक में औचित्यहीन ब्राह्मणवादी यज्ञ-व्यवस्था के ‘इष्ट‘ के बजाय लोक हितकारी ‘पूर्त‘ प्रतिष्ठा की अंतर्धारा का मद्धिम मगर स्थायी और दृढ़ स्वर है। ऐसा लगता है कि विश्वामित्र का चरित्र स्वयं लेखक के चिंतन का स्वरूप है और राम के कथन, उसकी अभिव्यक्ति।

सनातन रूढ़ नहीं होता जीवंत होता है। वह सनातन, जो शास्त्रों में ‘एष धर्मः सनातनः‘ है और बुद्ध वचन में ‘एस धम्मो सनंतनो‘ है। यहां लेखक भी उसी सनातनता के पक्षधर है, जो तार्किक, विवेकपूर्ण और वास्तविक यानी सर्वकालिक अतएव युगानुकूल परिवर्तनशील है। वसिष्ठ से राम की असहमति में यह रेखांकित होता है- ‘राम ने हाथ जोड़ लिए थे, जो तर्क की आँच न सह सके उस शास्त्र के विधान से कम से कम राम को बचाए रहें, आचार्य।‘ ... और कहते हैं- ‘शास्त्र और धर्म तो युग के अनुरूप बदलते हैं आचार्य।‘ जिस पर प्रतिक्रिया आती है- ‘राम कुछ भी कर सकते हैं। वह न किसी शास्त्र को मानते हैं, न किसी व्यवस्था को। कहते हैं, मनुष्य को आत्म-प्रमाण होना चाहिए।‘ या यह अंश- ‘कृत्याकृत्य की कसौटी शास्त्र नहीं, मनुष्य का अपना विवेक है।‘ इस क्रम में वे देवताओं के आलोचक और मनुष्यत्व के पक्षधर भी दिखाए गए हैं, कुछ इस तरह- ‘देवता मनुष्य से निकृष्ट होता है और वह कपटी लोगों का मानस पुत्र होता है।‘

रुढ़ संस्कार के घटाटोप में सच से आंखें मिलाना, सच को कह सुन सकने से अधिक महत्व का होता है। कबीर की टेक है- ‘जो तू बाभन बाभनी जाया, तो आन बाट काहे नहीं आया।‘ इसी तरह यहां वर्ण-व्यवस्था की रूढ़ि पर बार-बार आघात है- ‘कितना व्यर्थ है जन्म और रक्त की श्रेष्ठता का दंभ! कितनी मूर्खतापूर्ण है वर्णों की यह सीमा।‘ ... ‘यदि श्रेष्ठता-कनिष्ठता का आधार अलग-अलग अंगों से जन्म लेना हो तो इन वर्णों के लोगों को आज भी उन्हीं-उन्हीं अंगों से जन्म लेना चाहिए।‘ ... 'अयोनिज जन्म की कल्पना तो किसी कसाई के मन में ही उपज लगती है' ... ‘आज तो सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय उसी रीति से पदा होते हैं जैसे शूद्र। सभी का जन्म माँ के गर्भ से होता है अतः सभी जन्म से शूद्र ही पैदा होते हैं। जिन्हें उचित संस्कार मिल जाता है वे द्विज हो जाते हैं, ब्राह्मण और क्षत्रिय और वैश्य बन जाते हैं, जिन्हें यह सुलभ नहीं वे शूद्र रह जाते हैं। यदि उन्हें भी उचित संस्कार मिलें तो वे भी द्विज बन सकते हैं।‘ ... क्या उस वेद के महात्म्य को स्वीकार किया जा सकता है आचार्य, जो एक शूद्र को पवित्र नहीं कर सकता, पर उसके उच्चारण मात्र से स्वयं अपवित्र हो सकता है? तब तो मानना होगा कि शूद्र वेद से भी अधिक शक्तिशाली है। वेद उसे प्रभावित नहीं कर सकता, पर वह वेद को प्रभावित कर सकता है! यह कुछ अलग मगर उतना ही खरा-खरा, अष्टभुजा शुक्ल की कविता में आता है- ‘दूध सभी का उज्जर होगा, रक्त सभी का लाल। अष्टभुजा के मुँह मत लगना, अष्टभुजा चंडाल।‘

पुस्तक के ऐसे कई अंश, वस्तुतः तार्किक और शास्त्र-मर्यादित अभिव्यक्तियां, सतही तौर पर धर्म और आस्था विरुद्ध मानी जा कर उद्वेलित कर सकती हैं। मगर उद्भट विद्वान लेखक ने धर्मशास्त्रों का गहराई से अवगाहन किया है, स्पष्टता की चमक उनके लेखन की पहचान है। वैदिक, पौराणिक, महाकाव्यीय और लौकिक प्राचीन संदर्भों के सजग और प्रखर व्याख्याकार हैं, तभी ऐसी महत्वपूर्ण क्रांतिकारी कृति पाठकों को उपलब्ध हुई है।

Wednesday, September 2, 2026

विविध रामायण

आनंद नीलकंठन के जितने काम की सूची मिलती है, वह सारा काम नाम करने वाला है। उनका लक्ष्य और प्रयास दिखता है कि किस तरह धर्मग्रंथों को लोकप्रिय स्वरूप में लाया जा सकता है। वे अध्येता, संकलक-संयोजक हैं, अपने सारे उद्यम को किताब, फिल्म, टेलीविजन धारावाहिक, ऑडियो बुक में परिणत कर देने वाले। इसी क्रम में उनकी पुस्तक का अनुवाद ‘विविध रामायण विविध पाठ‘ आया है।

यह शीर्षक देखते ही पहले ए.के. रामानुजन के चर्चित लेख, वस्तुतः लंबे शोध-पत्र ‘थ्री हंड्रेड रामायण्स ...‘ की ओर ध्यान जाता है और दूसरा कामिल बुल्के की ओर। नीलकंठन, अपनी इस किताब के ‘कथोपरांत‘ में लिखते हैं- ‘ए.के. रामानुजन ने अपने विद्वत्तापूर्ण लेख में 300 रामायणें गिनाई हैं।‘ यह भी कहा जाता रहा कि तीन सौ की यह संख्या कामिल बुल्के से ली गई है, मगर मुझे उपलब्ध रामानुजन के किसी मूल या अनुवाद और संपादकीय टिप्पणी सहित प्रकाशित संस्करणों में अब तक ऐसी कोई गिनती नहीं गिनाई मिली। दूसरी तरफ बुल्के ने 600 ई.पू. से 1600-1700 तक की रामकथाओं की सूची दी है, जिसकी संख्या 300 नहीं है। ऐसा लगता है कि यह बात चल पड़ी, तो चल पड़ी वाली है। रामानुजन के लेख पर हुई उग्र प्रतिक्रिया के दौरान यह टिप्पणी होती थी कि विरोध करने वालों में शायद ही किसी ने वह लेख ठीक से पढ़ा है। यह उल्लेख इसलिए कि या तो इन्हें पढ़ा नहीं जाता या एजेंडा बनाने का इरादा नहीं किया जाता, वरना यह किताब, ऐसे विरोध का शिकार रामानुजन से अधिक हो सकती है। इतना ही क्यों मूल वाल्मीकि रामायण के कुछ ऐसे अंश है, जो आपत्तिजनक माने जा सकते हैं और गंभीर विवाद का कारण बन सकते हैं।

रामकथा की आधुनिक पुस्तकों में एक साहित्यिक वर्ग है, जिसमें नरेन्द्र कोहली की रामकथा श्रृंखला से आशुतोष राना की ‘रामराज्य‘ से शैलेन्द्र तिवारी की 'मेरे राम' तक है। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, प्रेमचंद और रस्किन बॉन्ड ने भी रामकथा प्रस्तुत की है। दूसरा फैंटेसी वाला अमीश त्रिपाठी वर्ग है। इसके अलावा गंभीर अध्येताओं- बलदेव प्रसाद मिश्र, राधावल्लभ त्रिपाठी, कुबेरनाथ राय, भगवान सिंह का काम है। ऐसा एक कम चर्चित मगर महत्वपूर्ण प्रकाशन डॉ. शोभा निगम का ‘वाल्मीकि-कथा‘ है। शास्त्रीय-गंभीर कामों में डोंगरे जी महराज और करपात्री जी के साथ ‘मानस पीयूष‘ जैसी टीका भी है। एक काम माताप्रसाद गुप्त के पाठालोचन का है तो दूसरी तरफ पं. रामकिंकर जी महराज जैसे कथावाचक हैं। नीलकंठन की इस किताब को देवदत्त पटनायक वाले समूह में रखा जा सकता है। वे स्वयं कहते हैं कि इस पुस्तक को अकादमिक तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए।

नीलकंठन की कुछ टेक है, जिससे वे न सिर्फ रामायणों, बल्कि दूसरे महाकाव्य महाभारत और पुराण आदि अन्य ग्रंथों को देखते हैं, इस क्रम में भटके से सांख्य दर्शन पर गंभीरता से विचार करने लगते हैं, वहीं सवाल उठाते हैं कि अंतिम बार आपने बिना मोबाइल की ओर देखे या बिना किसी से बात किए या बिना कोई किताब पढ़े कब खाना खाया था। वे टिप्पणी करते चलते है- ‘जीवन दरअसल कर्म और नियति दोनों से मिलकर बना होता है ... परिस्थितियों को ही चयन करने के लिए छोड़ देना भी एक प्रकार का चयन है ... कोई भी चीज पूर्णतः अच्छी या बुरी नहीं होती ... परिस्थितियों के अनुसार धर्म की परिभाषा बदल जाती है ... किस जीवन शैली को हम गलत, पापपूर्ण मानते हैं और किसे सही, यह हमारे नजरिए पर निर्भर करता है ... स्वधर्म का अर्थ है- धर्म के बारे में आपकी अपनी व्याख्या और समझ ... नैतिकता और नियम दूसरों पर नियंत्रण करने के लिए बनाए जाते हैं ... न मैं अच्छा हूं, न बुरा। मैं रावण हूं। ... परम सत्य नाम की कोई चीज नहीं होती ... जीवन को समझना एक जटिल कार्य है। जीवन जीना सरल है। बस जीते रहिए। ...

कार्य-कारण और परिणाम। जिसमें परिणाम, पुनः कारण बन सकता है। यह तय करना भी आसान नहीं होता कि कौन सा कार्य है, कौन कारण और क्या परिणाम, क्योंकि परिणाम जान पड़ना एक अनंतिम सी दशा है। यह ऐसी धारा है, जिसे किसी भी जगह रोक कर देखें, अपने आगे-पीछे का प्रभाव दिखेगा। नीलकंठन जो बार-बार दुहराते हैं, वह है- विकल्पों का चयन और परिणाम, कर्म का फल, कर्मों के चयन के लिए मूल्य चुकाना, उन्हीं के शब्दों में- ‘प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों और उनके फल के लिए जिम्मेदार होता है और उसे विकल्पों के बीच चयन का मूल्य अदा करना होता है, यह भाव भारतीय मानस में रचा-बसा है। चाहे पवित्र धर्मग्रंथ हों या लोक कथाएँ, इस विचार को बार-बार दोहराया जाता है।‘

अध्याय 32- ‘राम के पाले में विभीषण‘ में रामेश्वरम शिवलिंग स्थापना का प्रसंग आया है, जिसमें बताया गया है कि इस अवसर पर रावण पुरोहित बनता है, जो कथा आनंद रामायण के अलावा और कहीं नहीं मिलती। मगर आनंद रामायण के गीता प्रेस वाले संस्करण में मुझे ऐसा कुछ नहीं मिला। इसी तरह अध्यात्म रामायण को हर बार आध्यात्म रामायण और बिरहोर रामायण को बिहोर रामायण लिखना, अखरने वाला है। कुछ शब्द सामान्य से भिन्न प्रयुक्त हुए हैं, दक्षिण भारतीय प्रचलन के कारण, या अंगरेजी-हिंदी के कारण, जैसे- आजीविक न कि आजीवक, अहिल्या न कि अहल्या, क्षीरध्वज-सीरध्वज, विभांतक-विभांडक, कार्तिवीरार्जुन-कार्तवीर्यार्जुन, द्वैवायन-द्वैपायन, अनारण्य-अनरण्य, कुंब-निकुंब न कि कुंभ-निकुंभ, मायन-मय।

सामान्य पाठक कुवेंपु का आशय शायद ही समझ सके, जो वस्तुतः कुप्पल्ली वेंकटप्पागौड़ा पुटप्पा हैं। इसी प्रकार कुछ शब्द, जिनमें कर आता है, को जोड़ कर- धारणकरते, अपहरणकरवाकर, निर्धारणकरेगा, लिखे जाने पर ध्यान अटकता है। कुछ मशीनी अनुवाद वाली चूक है, जैसे- ‘हनुमान घायल अवस्था में खून से लथपथ सुग्रीव को उसके छिपने की जगह पर ...‘ इसमें हनुमान के बाद विराम नहीं है, वैसे भी सीधा वाक्य होता- घायल अवस्था में खून से लथपथ सुग्रीव को हनुमान, उसके छिपने की जगह पर ...‘

पुस्तक के शीर्षक Lesson का यहां अनुवाद पाठ किया गया है। हिंदी का पाठ, पढ़ना तो है ही, वह एक ओर उच्चारण करते हुए दुहराने अर्थ देता है वहीं दूसरी ओर किसी रचना का दो व्यक्तियों का पाठ भिन्न हो सकता है, इतना ही नहीं एक व्यक्ति के अलग-अलग समय में पाठ/ पुनर्पाठ (समझा जाने वाला आशय)अलग हो सकते हैं। पाठ का एक विशिष्ट प्रयोग अपरिचित लिपि के लेख को पढ़ने के अर्थ में भी प्रयोग होता है, ज्यों किसी पुराने अभिलेख के लिप्यंतर को पाठ कहा जाता है। यों पाठ का आशय पाठ्य-पुस्तक का अध्याय, सीख, सबक, नसीहत, चेतावनी भी हो सकता है। मुझे लगता है हिंदी के पाठ का आशय, अंगरेजी के Lesson से अधिक व्यापक है, बेहतर भी माना जा सकता है।

नीलकंठन निष्कर्ष की तरह लिखते हैं- 'हालाँकि एक हद तक मैं कर्म और कर्मफल के सिद्धांत को समझता हूँ जो इस महाकाव्य के आधार हैं, लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि जीवन में घटने वाली हर घटना की व्याख्या कर्म के आधार पर करना संभव नहीं।' और यह भी- ‘मैंने एक लोक गायक के मुँह से इसकी बड़ी सटीक व्याख्या सुनी- जीवन का बहुत गहरा अर्थ होता है लेकिन जैसे ही हम उस अर्थ को समझ लेते हैं, यह अर्थहीन हो जाता है। जीवन के अर्थ की खोज ही इसकी विचित्रताओं को इतना सुंदर बनाती है।‘

यह किताब मेरे लिए विंडो शॉपिंग जैसी साबित हुई, मगर उपर उल्लेखित पुस्तकों से अच्छी तरह परिचित नहीं हैं और रामकथा की रोचक विविधता को फटाफट देख लेना चाहें, उनके लिए यह बहुत उपयोगी हो सकती है। इसकी एक खासियत यह भी कि लेखक ने लोकप्रिय पठनीयता के लिए गंभीरता से समझौता नहीं किया है। उनकी इस किताब के लिए एक वाक्य कहना हो तो मैं कहूंगा- ‘आनंद नीलकंठन अपनी इस पुस्तक में समूचे भारतीय चिंतन में ‘विकल्पों के चयन और उनके परिणाम, कर्म और उसके फल के बीच चलने वाले अनंत चक्र‘ को देखते हैं।‘

Monday, August 31, 2026

बनारस में सिरपुर ज्ञान-प्रवाह

भारतेन्दु परिवार के मोती चन्द्र जी और शांति जी के पुत्र प्रमोद चन्द्र जी, हार्वर्ड विश्वविद्यालय में भारतीय कला के आचार्य रहे। बनारस से उनके रिश्तों के चलते वहां अमेरिकन एकैडमी आया, जो बाद में चीफ कोर्ट हाउस, रामनगर में अमेरिकन इंस्टीट्यूट आफ इंडियन स्टडीज (अब गुड़गांव में) हुआ। इसी तरह वे ‘ज्ञान-प्रवाह‘ से जुड़े रहे। उनसे परिचय और उनका स्नेह होने के कारण इन संस्थाओं और बनारस से मेरा रिश्ता मजबूत होता गया। इस भूमिका के साथ स्मरण सन 2010 का। 

फोन पर विस्तृत चर्चा कर उन्होंने सिरपुर पर आयोजन के लिए सुझाव की जिम्मेदारी मुझपर सौंपी। मुझे सुझाना था कि ज्ञान-प्रवाह में ‘सिरपुर‘ पर आयोजन में कौन कौन विद्वान होंगे और उनके टॉपिक क्या होने चाहिए। इस पूरे दौरान मेरा संपर्क ‘ज्ञान-प्रवाह‘ की सुश्री बिमला पोद्दार जी से बना रहा। प्रमोद चन्द्र जी का ई-मेल 14-06-2010 यह था। बात आगे बढ़ी। आयोजन की पूरी कार्यवाही से मैं जुड़ा रहा और ई-मेल की प्रतियां मुझे भी आती रहीं। यह आयोजन 29-30 जनवरी 2011 को हुआ। निजी कारणों से मैं स्वयं शामिल न हो सका। 

ज्ञान-प्रवाह ने अपनी शोध-पत्रिका के अंक 14 में लेख छापे, जिनमें एक श्री जी. एल. रायकवार का ‘सिरपुर की कला परंपरा में कथा प्रसंग‘ था, उस लेख का चित्र और टेक्स्ट आगे दिया जा रहा है-

सिरपुर की कला परंपरा में कथा प्रसंग 
जी.एल. रायकवार 

दक्षिण कोसल के विशिष्ट स्मारक स्थलों में ताला, मल्हार, सिरपुर, राजिम, डीपाडीह, भोरमदेव आदि सुप्रसिद्ध कला केन्द्र हैं। विपुल स्थापत्य अवशेष तथा दुर्लभ कलाकृतियों के माध्यम से इस अंचल की समृद्ध प्राचीन कला परंपरा का बोध होता है। लगभग 6ठी शती. ई. से 12वीं शती ई. तक दक्षिण कोसल के शरभपुरीय, नल, सोमवंशी, नागवंशी तथा कलचुरि शासकों के प्रश्रय में शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन कला शैली क्रमशः यहाँ पल्लवित होती रही है। इस अंचल के प्रारंभिक काल की मूर्तिकला के केन्द्रों में गुप्तकालीन कला परंपरा के साथ-साथ क्षेत्रिय प्रवृत्तियाँ भी अन्तर्निहित हैं। यहाँ मूर्तिकला में मान्य शास्त्रीय बिम्बों के अतिरिक्त प्रकृति और लौकिक जगत् की रोचक विविधताओं का समावेश है। इस क्रम में देवरानी जेठानी मंदिर एवं ताला से प्राप्त रुद्रशिव की एकाश्म विशाल प्रतिमा में जीव-जगत् और वनस्पति जगत् का समायोजन अद्वितीय है। इसी मंदिर के सिरदल पर गजलक्ष्मी के अभिषेक दृश्य में नदी देवियों के मानव और सरिता रूप साथ-साथ रूपायित हैं। मूर्तिकला में प्रतिमा शास्त्रीय निर्देशों के साथ मनोरंजक, कौतूहलपूर्ण और विनोदात्मक भावों से परिपुष्ट कलाकृतियाँ विशेष रूप से आकृष्ट करती हैं और मौलिक कल्पना युक्त कथाओं का सृजन करती हैं।

सिरपुर का महातीवरदेव विहार (चित्र २६.१-२) 

कलाशैली की दृष्टि से इस विहार का निर्माण काल 530-650 ईसवी के मध्य निश्चित किया जा सकता है। यहाँ प्रवेश द्वार पर संयोजन द्वार शाखा के सम्मुख तथा पार्श्व भाग विविध कलात्मक दृश्यों से रूपायित हैं। रूप शाखा पर पारंपरिक मिथुन आकृतियों के अतिरिक्त विभिन्न जीव-जन्तुओं का अंकन है। ये कथाएँ प्रथमतः जातक तत्पश्चात् पंचतंत्र में उल्लिखित हैं। विहार के प्रवेश द्वार पर मकरारूढ़ वानर, गजयूथ, मेढ़ों की लड़ाई, मूषक पंक्ति, बक-कर्कट, शुक, उलूक, वृश्चिक, सर्प और मेंढक, मधुमक्खी, भौंरा, नीलगाय, महिष एवं कुक्कुट स्पष्टतः विद्यमान हैं तथा कुछ आकृतियाँ क्षरित होने से अस्पष्ट हैं। अर्धमंडप के एक स्तंभ पर श्वान सहित आखेटक दम्पति भी हैं। महातीवरदेव विहार के प्रवेश द्वार पर रूपायित कुछ महत्त्वपूर्ण कथाशिल्पों का परिचय निम्नांकित हैः 

मकरारूढ़ वानर (चित्र 26.3)- इस कथाशिल्प में मूर्ख मकर अपने मित्र वानर को कपटपूर्वक पीठ पर बैठाकर अगाध जलराशि के मध्य पहुँचता है और अपनी पत्नी की इच्छानुसार उसके हृदय का मांस पिंड खाने के लिए अपनी कपट योजना को सविस्तार व्यक्त करता है। आसन्न संकट से अविचलित चतुर वानर मकर को फुसलाकर तट स्थित पेड़ पर वापस पहुँच जाता है तथा मकर की भर्त्सना करता है। कुछ प्रकारान्तर से यह कथा (चूल कुणाल वर्ग), संसुमार्ग जातक एवं वानरेन्द्र जातक में वर्णित है।1 

बक कर्कट-इस शिल्पकलाकृति में धूर्त बगुले द्वारा सरोवर सूखने का भय प्रचारित कर उस सरोवर में रहने वाली समस्त मछलियों को अन्यत्र ले जाकर कपटपूर्वक खाये जाने तथा केकड़े द्वारा मृत मछलियों की एकत्र अस्थियों को देखकर व बगुले की धूर्तता समझ में आने पर उसके गले में अपने धारदार डंक गड़ाकर उसका प्राणान्त करने की कथा है। यह जातक कथा के कुलावक वर्ग में विद्यमान है।2

यहीं पर संकेत रूप में रूपायित अन्य जातक कथाएँ निम्नलिखित हैं- 

0 उलूक का अंकन समस्त पक्षियों द्वारा राजा चयन करने की कथा का प्रतीक है। इस कथा में कौवे के द्वारा विघ्न उत्पन्न किया जाता है; अंततः उलूक राज्याभिषेक से वंचित हो जाता है। यह कथा कोसिय वर्ग अन्तर्गत उलूक जातक में वर्णित है।3 
0 महिष का अंकन शांत महिष तथा एक उत्पाती वानर की कथा से संबंधित है। उत्पाती वानर महिष की पीठ पर चढ़कर उसे अनेक प्रकार से तंग करता था। शांत महिष वानर के उत्पात को सहन करता रहा। किसी दूसरे महिष को इसी प्रकार तंग करने पर उसके सींग के प्रहार से आहत होकर वानर की मृत्यु हो जाती है। यह कथा अरण्य वर्ग के महिष जातक में मिलती है।4 
0 कुक्कुट का रूपांकन रात्रिकाल में असमय बाँग देने वाले कुक्कुट की कथा का परिचायक है। कुक्कुट के अवांछनीय कर्म के कारण गुरुकुल में अध्ययनरत पीड़ित विद्यार्थियों द्वारा उस कुक्कुट की हत्या कर दी जाती है। यह कथा हंसीवर्ग अन्तर्गत अकालरावी जातक में वर्णित है।5 

सिरपुर में अब तक लगभग 8 बौद्ध विहार तथा अनेक शैव एवं वैष्णव मंदिर उत्खनन से प्रकाश में आये हैं। किन्तु महातीवरदेव विहार के अतिरिक्त किसी भी अन्य स्मारक पर इस प्रकार का कथात्मक अंकन नहीं है। अपवाद रूप में मल्हार (जिला बिलासपुर) में एक भग्न स्तंभ पर कच्छप और हंसों का अंकन है। यहाँ दो हंसों को एक लकड़ी को मुँह में दबाये उसके मध्य से लटकते कच्छप को आकाश मार्ग से अन्यत्र ले जाते दिखाया गया है। नीचे स्थित बालक वृन्द इस दृश्य को देखकर हर्षित हो रहे हैं। यह कलाकृति 7 वीं 8वीं शती में निर्मित मानी जा सकती है। यह कथा वीरणत्थम्भक वर्ग में कच्छप जातक के अन्तर्गत वर्णित है।6 

महातीवरदेव विहार के प्रवेश द्वार पर प्रदर्शित विवेच्य कलाकृतियों में जातक कथाओं की उपस्थिति सुसंगत है क्योंकि एक तो वे बौद्ध विहार के प्रवेश द्वार पर अंकित हैं और दूसरे यहाँ बुद्ध के पूर्व जन्म से संबंधित कथाएँ संकेत रूप में प्रदर्शित हैं। 

इसी विहार के सभा मंडप की भित्तियों पर प्रदर्शित एक फलक में प्रणय-अनुराग का रोचक अंकन है। इसमें दो अश्वमुखी यक्षणियों के मध्य एक रूपवान तरुण विवश बैठा है (चित्र 26.4)। दाहिनी ओर स्थित यक्षिणी तरुण की भुजा पकड़कर अपनी ओर खींच रही है तथा बायीं ओर की यक्षिणी उसके गले में लिपटे हुए उत्तरीय को पकड़े है। ऐसा प्रतीत होता है कि युवक साधक को साधना मार्ग से पतित करने के लिये दोनों यक्षणियाँ उद्यत हैं। यह भी कह जा सकता है कि कामुक यक्षणियाँ तरुण के सौंदर्य पर मोहित हो उसे अपने वश में करना चाह रही हैं। इसी के निकट अन्य फलक में चषक पकड़े हुए एक आसनस्थ प्रौढ़ पुरुष (कुबेर?) का अंकन है। उसके बायीं ओर स्थित सेवक सुराही पकड़े चषक भरने के लिए उद्यत है। समीप ही पुरुष के दाहिनी ओर स्थित नारी खिन्न (?) मुद्रा में खड़ी है। पुरुष के शिरोभाग पर अंकित प्रभामंडल देवत्व का द्योतक है। यहीं पर पार्श्व भाग में दो ओर एक-एक वानर भी रूपायित हैं। इन दृश्यों की पहचान अपेक्षित है। 

इसी विहार के अर्धमंडप में स्थित आखेटक युगल का चित्रण अत्यन्त प्रभावोत्पादक और वन्य संस्कृति का परिचायक है। आखेटक के हाथ में धनुष-बाण है जो रस्सी से बंधे श्वान को भी पकड़े हुए हैं। बायीं ओर स्थित उसकी गृहिणी के मस्तक पर टोकरी है तथा बायें हाथ से उसने शिशु को पकड़ा है। विहार के प्रवेश द्वार पर अंकित एक कथा दृश्य में कुएँ के भीतर स्थित विवर से एक सर्प निकल कर मेंढक को खा रहा है। इसका संबंध पंचतंत्र की कथा से जोड़ा जा सकता है (पंचतंत्र, काकोलूकीय तंत्र, मंडूक मंद विष सर्प कथा)। इस कथा के अनुसार एक वृद्ध सर्प कुएं के भीतर रहने वाले मेंढकों को फण पर बैठाकर घुमाता था और खा जाता था। सभी मेंढकों के स्माप्त हो जाने पर वह मेंढकराज के पुत्र को ही निगल गया। कलात्मकता की दृष्टि से गजयूथ विहार तथा मेढ़ों का युद्ध भी दर्शनीय है। पंक्तिबद्ध मूषकों का द्रुतगति से पलायन पंचतंत्र के हिरण्य ताम्रचूड़ कथा से समीकृत किया जा सकता है। 

वैसे महातीवरदेव विहार वाली कथाओं को कुछ विद्वान पंचतंत्र की कथाओं से जोड़ते हैं जो अधिक युक्तिसंगत नहीं लगता।

अन्य कलाकृतियाँ 

सिरपुर से प्राप्त उत्खनित देव प्रतिमाओं में हारीति, कार्तिकेय, नदी देवियां, गौरी, दिक्पाल, चामुंडा आदि विशिष्ट हैं। हारीति की एक सुन्दर प्रतिमा उत्खनित विहार के मंडप की भित्ति में जड़ी हुई मिली है। इससे सिरपुर के समस्त बौद्ध विहारों में हारीति तथा जंभल की स्थापना भी सुनिश्चित है। कार्तिकेय की एक भग्न प्रतिम में वाहन मयूर तीन शीर्षयुक्त प्रदर्शित हैं।7 

एक शैव मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनों ओर की शाखाओं पर नदी देवियों का युग्म प्रदर्शित है। मुख्य नदी देवी के साथ उसी के सदृश्य आकार, परिधान तथा अन्य लक्षणों वाला प्रतिरूप किंचित भेद से रूपयित किया गया है। इस अंचल के इसी कला शैली के सिद्धेश्वर मंदिर, पलारी में भी नदी देवियाँ युग्म रूप से प्रदर्शित है। 

गौरी की एक खंडित पाषाण प्रतिमा लक्षणों की दृष्टि से उल्लेखनीय है (चित्र 26.5)। इस प्रतिमा के वितान पर सूर्य, पंचाग्नि और चन्द्र का अंकन है। इसके नीचे एक ओर शिवलिंग तथा दूसरी ओर गणेश हैं। अन्य लक्षणों में यज्ञवेदी, गोह तथा सर्प अवशिष्ट हैं। दिक्पाल प्रतिमाएँ यहाँ विलग तथा भग्नप्रायः स्थिति में मिली हैं। यहाँ के भग्न बालेश्वर शिव मंदिर के प्रवेश द्वार पर दिक्पाल ऊर्ध्वक्रम में संयोजित रहे हैं। उनमें से ऊपर की ओर भग्न वायु तथा नीचे मेषारूढ़ अग्नि स्पष्ट हैं। इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर ऊर्ध्व तथा क्षैत्तिजीय क्रम में दिक्पालों का अंकन महत्त्वपूर्ण है।

इसी सन्दर्भ में शाक्त संप्रदाय से संबंधित षड्‌भुज चामुंडा की प्रतिमा का उल्लेख आवश्यक है (चित्र 26.6)। देवी शीर्ष विहीन शव पर आसीन है, जटाभार पर कुंडलित नाग तथा भालपट्ट पर कपाल अक्ति है, मस्तक पर त्रिनेत्र तथा कर्णलुंबी पर बेलनाकार ताटंक झूल रहे हैं। अस्थिस्तना देवी के बायें कंधे पर नरमुंडों का उपवीत है; ऊपर के दाहिने हाथ में मणिविभूषित नाग तथा बायें हाथ में उलूकदंड (ध्वज) है। शव का विच्छिन्न शीर्ष देवी के निचले बायें हाथ में है। शवासीन देवी शव के अंतड़ियों को उसके उदर से खींचकर भक्षण कर रही हैं। प्रतिमा के अधिष्ठान भाग पर शव का मांस नोचते और भक्षण करते हुए श्रृगाल-श्रृगाली तथा गृद्ध साथ-साथ अंकित हैं। चामुंडा की वीभत्स तथा उग्र मुखाकृति तंत्र शास्त्रों में वर्णित लक्षणों से परिपूर्ण है। कला प्रतिमानों की दृष्टि से यह प्रतिमा दक्षिण कोसल की उत्कृष्ट कलाकृतियों में एक है। 

सिरपुर में कृष्णलीला और महाभारत से संबंधित पात्र भी दर्शनीय हैं। सोमवंशी कलाशैली के वैष्णव मंदिरों में कृष्णलीला से संबंधित दृश्यों में पूतना वध, केशीवध, ऊखल बंधन (यमलार्जुन उद्धार) आदि दृश्य प्राप्त होते हैं। लक्ष्मण मंदिर के प्रवेश द्वार पर भी कृष्ण लीला के अनेक दृश्य रूपायित हैं। संग्रहालय की एक कलाकृति में कृष्ण अश्वरूपधारी केशी दैत्य के साथ युद्ध कर रहे हैं। यह एकाश्म कलाकृति लगभग 4 1/2 फीट ऊँची है तथा विदर्भ के वाकाटक गुप्तयुगीन कलाकृति के समतुल्य है। अन्य प्रदर्शित कलाकृतियों में भग्न धनुर्धर योद्धा का उर्ध्व भाग तथा अवशिष्ट अधिष्ठान पर अश्व सहित रथ रूपायित है। राजीवलोचन मंदिर, राजिम तथा कलचुरि कालीन अन्य स्मारकों से भी ऐसी प्रतिमाएँ प्राप्त हुई हैं। इस वर्ग की प्रतिमाओं की पहचान लक्षणों के आधार पर महाभारत के पराक्रमी योद्धा कर्ण तथा अर्जुन से की जा सकती है। सोमवंशी काल के राजीवलोचन मंदिर के मंडप के अर्धस्तंभ पर एक ओर कर्ण तथा दूसरी ओर अर्जुन की प्रतिमा स्थापित है। एक भग्न स्थापत्य खंड पर शिव-पार्वती के द्यूत क्रीड़ा का अंकन है। यह खंडित भाग किसी शैव मंदिर के प्रवेश द्वार के पार्श्व भाग अथवा मंडप में रहा होगा। यहाँ शिव तथा पार्वती परस्पर सम्मुख बैठे चौसर खेल रहे हैं। दोनों के मध्य लम्बवत ऊर्ध्व स्थिति में चौसर रखा है। द्यूत क्रीड़ा में शिव अपनी संपत्ति के साथ अपने वाहन नंदी को भी हार चुके हैं। विजयिनी पार्वती की सखियाँ नंदी को ढकेलती पीटती हुई पार्वती की ओर ले जा रही हैं। पीछे की ओर स्थित शिवगण व्यथित हैं। परवर्ती काल में गुर्जर प्रतिहार (बिनैका, सागर जिला), परमार और कलचुरि कला शैली में भी चौसर क्रीड़ा विविधताओं के साथ रूपायित है।

सिरपुर की अन्य सामग्री 

श्री अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में सिरपुर उत्खनन से बौद्ध धर्म से संबंधित 86 धातु प्रतिमाएँ मिली हैं (वर्ष 2004 में टीला क्र. एसआरपी 10 से सात एवं वर्ष 2008 में उन्यासी)। ये साँचे में ढालकर बनायी गयी हैं तथा इनके आभूषणों में मूल्यवान रत्नों का उपयोग किया गया है। इनमें बुद्ध, तारा, मैत्रेय, वज्रपाणि, जंभल, वसुधारा, मंजुघोष, प्रज्ञापारमिता आदि महत्त्वपूर्ण हैं। बौद्ध प्रतिमाओं के अतिरिक्त धातु के स्तूप भी उत्खनन से ज्ञात हुए हैं। कुछ बौद्ध प्रतिमाओं के पृष्ठ भाग पर बौद्ध मंत्र युक्त गोलाकार मुहरें जड़ी हुई हैं। जंभल की प्रतिमा निधि पात्र सहित तथा हारीति की प्रतिमा शिशु सहित रूपायित है। उत्खनन से आवासीय संरचना, भूगर्त भंडारण कक्ष, मार्ग-वीथिकाएँ, अभिनय-व्याख्यान मंच, तोरण मंडप, देवालयों के गज-अश्व तथा वृषभों को बांधने के लिए प्रस्तर निर्मित छिद्रयुक्त खूंट आदि की भी जानकारी उपलब्ध है। यहाँ से प्राप्त पाषाण लेख, ताम्रपत्र, अभिलिखित मुहरें तथा अन्य राजवंशों के सिक्के भी उल्लेखनीय हैं। कुछ कलाकृतियाँ शरभपुरीय शासकों के काल में बनी ज्ञात होती हैं। ऐसी प्रतिमाओं में गंधेश्वर मंदिर में रखी वामन और गरुड़ासीन विष्णु (यह प्रतिमा चोरी हो जाने से अब लुप्त है), लक्ष्मण मंदिर के गर्भगृह में रखी नागराज अथवा शेष और केशीवध की शिल्पाकृतियाँ मुख्य हैं। सिरपुर के बौद्ध विहार (आनंदप्रभ कुटी विहार तथा स्वस्तिक विहार) के गर्भगृह में प्रदर्शित विशालकाय प्रतिमाएँ पृथक-पृथक तराशे गये पाषाण खंडों को जोड़ कर निर्मित हैं। यहाँ की अधिकांश बुद्ध प्रतिमाएँ भू-स्पर्श मुद्रा में हैं। व्याख्यान मुद्रा में बुद्ध की मात्र एक प्रतिमा यहाँ से ज्ञात है। मुचलिन्द बुद्ध की एक प्रतिमा स्थानीय संग्रहालय में रखी है। कुछ विद्वान इसे तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा मानते हैं। बौद्ध धर्म से संबंधित अन्य अवशेषों में महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में संग्रहीत मंजुश्री, वज्रपाणि, अवलोकितेश्वर, आयागपट, धातु निर्मित लघु आकार के स्तूप तथा बुद्ध की प्रतिमाएँ, बौद्ध बीजमंत्र तथा आस्वामूलक अन्य सामग्रियाँ उल्लेखनीय हैं।

सिरपुर के अधिकांश बौद्ध विहारों में मुख्य गर्भगृह के साथ दोनों ओर आनुषंगिक पार्श्ववर्ती कक्ष निर्मित हैं। इनमें मुख्य गर्भगृह में बुद्ध तथा पार्श्ववर्ती कक्षों में अवलोकितेश्वर, वज्रपाणि एवं अन्य प्रतिमाएँ संयोजित रही हैं। उत्खनित विहारों की अन्य विशेषता यह है कि सभी विहार ईटों से निर्मित तथा दुमंजिले हैं। बौद्ध विहारों के संकुल से यह स्पष्ट है कि सिरपुर बौद्ध धर्म का एक प्रसिद्ध केन्द्र था। 

सोमवंशी शासक विशेषतः महाशिवगुप्त बालार्जुन के काल में शैव, वैष्णव और बौद्ध धर्म को राजकीय प्रश्रय प्राप्त रहा है तथा दूरस्थ अंचलों में भी मंदिर तथा विहारों के निर्माण होते रहे हैं। सोमवंशी शासकों की राजमुद्रा में वृषभ अथवा नंदी का अंकन धर्म तथा समाज में गोवंश की प्रतिष्ठा का परिचायक है। 

भग्नावशेषों के रूप में सिरपुर के अतीत के गौरवपूर्ण अध्याय की परतें उत्खनन से प्रकाश में आ रही हैं। पुराविदों, कला मर्मज्ञों के शोध और अध्ययन के लिए सिरपुर एक आदर्श पुरातत्त्वीय स्थल के साथ पर्यटन स्थल भी है। संक्षेप में दक्षिण कोसल के धर्म, ज्ञान-विज्ञान और कला का यह तीर्थ है। 

नोट: सिरपुर क्षेत्र से प्राप्त पार्वती तथा चामुण्डा की मूर्तियाँ प्रतिमा लक्षण की दृष्टि से विशेष महत्व की है। 

पार्वती की प्रतिमा में ‘एकपाद तपस्विनी द्विभुज पार्वती‘ तथा केले के वन (रंभावन) में स्थित ‘सिद्ध‘ गौरी की एकरूपता संकेतित हैं। केले के पेड़ पर चढ़ने वाली गोधा, सूर्य-चन्द्र के कीच मुण्डरूप में पञ्चाग्नि, शिवलिंग के नीचे बना चौकोर अग्निकुण्ड, गणेश के नीचे बना कुण्डलित सर्प तया देवी के पैर के पास बना सिंह इस प्रतिमा की अन्य विशेषताएँ हैं। 

चामुण्डा की प्रतिमा में देवी मस्तक विहीन शव के पेट से लंबी आंत खींचकर हाथ से अपने मुँह में ठूँस रहीं हैं। इस रूप में भीषणता की पराकाष्ठा संकेतित है, जिसे शव के पास विद्यमान दो श्रृंगाल तथा गिद्ध अभिवर्धित कर रहे हैं। देवी के बायें घुटने के नीचे बना अतिरिक्त मस्तक तथा शव की दाहिनी भुजा पर बना पंजा भी विचारणीय है। दूसरा वैशिष्ट्य ‘उलूकध्वज‘ है।

प्रतिमाशास्व की दृष्टि से दोनों कलाकृतियाँ अद्वितीय हैं। - संपादक 

संदर्भ 

1. भदन्त आनन्द कौसल्यान, जातक, तृतीय खण्ड, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, 1987, पृ. 297 
2. वही, प्रथम खण्ड, पृ. 295 
3. वहीं, तृतीय खण्ड, पृ. 78 
4. वही, पृ. 106 
5. वही, द्वितीय खण्ड, पृ. 43 
6. वही, पृ. 386

Sunday, August 30, 2026

रस्किन बॉन्ड

जीवन को अक्सर अभिनय की तरह देखा जाता है तो कुछ इसे कथा की तरह देखते हैं। अभिनय में आप स्वयं होते हैं, कथा में आप और आपका इर्द-गिर्द, व्यक्ति और परिवेश कमोबेश एक सी भूमिका निभाने वाले पात्र हो जाते हैं। कथा या गल्प- मनोहर श्याम जोशी के हवाले से- ‘‘स्व. हजारी प्रसाद द्विवेदी मौज में आकर ‘गप्प‘ को गल्प का पर्याय बता देते थे। उनकी इच्छा थी कभी सुविधा से कोई ‘माडर्न गप्प‘ लिखने की।‘‘ रस्किन लिखते हैं- ‘‘फिर भी, मुझे लगता है कि किस्से सुनाने के बारे में आया से मैंने कुछ सीखा है, और उस्मान से भी, हालाँकि मुझे मालूम नहीं था कि किसी रोज मैं भी एक तरह का गपोड़ी बन जाऊँगा।‘‘ यह उनकी आत्मकथा के प्रभात सिंह द्वारा किए गए हिंदी अनुवाद ‘अपनी धुन में‘ पुस्तक का अंश है। पुस्तक में जब वे लिखते हैं- ‘‘अपने सारे किरदारों में सबसे काल्पनिक मैं खुद हूँ।‘‘ तब मनोहर श्याम जोशी फिर याद आते हैं, लिखते हैं- ‘कुरु-कुरु स्वाहा‘ दृश्य और संवाद प्रधान, गप्प-बायस्कोप है। अतिरिक्त आग्रह करता है कि पढ़ते हुए देखा-सुना जाये। गप्प है, बायस्कोप है, इसलिए इसमें वर्णित सभी स्थितियाँ, सभी पात्र सर्वथा कपोल-कल्पित हैं। और सबसे अधिक कल्पित है वह पात्र जिसका जिक्र इसमें मनोहर श्याम जोशी संज्ञा और ‘मैं‘ सर्वनाम से किया गया है।

रस्किन बॉन्ड, ऐसे ‘भारतीय‘ जो लिखते हैं- ‘‘भारत को किसी ने लैंड ऑफ रिग्रेट्स कहा था; लेकिन मेरे लिए यह स्वीकार्यता की धरती थी। और यह भी कि- ‘‘...। और इनसानी रिश्तों की घनिष्ठता और बेतकल्लुफ़ी-इंग्लैंड में जिसकी सबसे ज़्यादा कमी मैं महसूस करता रहा। व्यवस्थित जीवन, बढ़िया समझ और शिष्टाचार, यह सब तारीफ़ के क़ाबिल है, मगर आत्मा की ख़ातिर उन लोगों ने कुछ नहीं किया है।‘‘ एक अन्य अंश- उन सिख सज्जन ने मुझसे पूछा कि मेरी पैदाइश कहाँ हुई थी, और मैंने उन्हें बताया कि कसौली में, जो तब सिख स्टेट ऑफ़ पटियाला का हिस्सा था, और बाद में पूर्वी पंजाब और अब हिमाचल प्रदेश में है। ‘और आप कहाँ पैदा हुए थे?‘ मैंने पूछा। ‘बर्मिंघम,‘ उन्होंने बताया।

इस आत्मकथा के लिए वे लिखते हैं- ‘‘कोई जिंदगी किसी दूसरे के मुकाबले ज्यादा या कम महत्वपूर्ण या दिलचस्प नहीं होती ...(यह) गुजरे जमाने का दस्तावेज, कुछ दिलचस्प और गुमनाम लोगों का परिचय है, और एक तरह के लेखकीय जीवन की झाँकी है।‘‘ फिर एक जगह यह भी कहते हैं- ‘‘... पर कुछ के बारे में खामोश ही रहूँगा, क्योंकि कुछ अनुभूतियाँ बहुत निजी होती हैं, और उन्हें जाने बगैर दुनिया का कुछ बिगड़ नहीं जाएगा।‘‘ जीवन-संस्मरणों के किस्सागो रस्किन की आत्मकथा की खबर मिली तो जिज्ञासा हुई, पढ़ कर कहा जा सकता है कि उनका अन्य लगभग सारा लेखन-कहानियां, आत्मकथा जैसा है तो उनकी यह आत्मकथा, एक कहानी ही है। ऐसा लेखक जो की-बोर्ड से कागज-कलम पर आया- ‘‘ टाइपराइटर से मैंने छुटकारा पा लिया है, क्योंकि यह शोर बहुत करता है, और अब मैं बॉल-पॉइंट या रोलर-बॉल पेन से लिखता हूँ। क्रलम और काग़ज़, और क़लम, हाथ और मन के बीच छुअन का जो भौतिक रिश्ता या तालमेल होता है, वह मुझे पसन्द है।‘‘

इस किताब पर पेज-दर-पेज कुछ पाठकीय टिप्पणियां- जामनगर के रणजीत सिंह जी के भतीजे के नाम दुलीप छपा है, जो संभवतः प्रूफ की भूल नहीं अंग्रेजी में स्पेलिंग ‘डी यू ...‘ के कारण है। जैसे जयसिंह का नाम स्पेलिंग के कारण जयसिम्हा लिखा पढ़ा जाता है और पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंह राव, नरसिम्हा राव लिखे जाते रहे, दूसरी तरह ‘सिंह‘ एसआइएनजीएच‘ से सिंघ हो जाते हैं। ... उनकी वह शैली, अंदाजे-बयां जगह-जगह है, जो उनके लेखन की पहचान है- ‘‘महल का कोई माली तो मैंने कभी देखा नहीं, लेकिन अगर कोई था भी तो यकीनन वह प्रकृति को अपने ढर्रे पर चलने देने में विश्वास रखता था।‘‘ ... जूनागढ़ के नवाब साहब का जिक्र आया है, जो अपने प्रिय कुत्तों को ले कर पाकिस्तान भाग गया। इसके बारे में जैसा मैंने पढ़ा है कि हवाई जहाज में कुत्ते और उनकी रानियां खचाखच भर गए, मगर उनके कुछ और बहुत प्यारे कुत्ते छूट रहे थे, इसलिए कुछ रानियों को निकाल बाहर कर बनी जगह में कुत्तों को सवार कराया गया। ...

एक और अंदाजे-बयां- ‘‘लन्दन, दिल्ली और फिर देहरादून में भी और हर मौके पर मुझे उसके साथ अलग पति मिले। मर्द उसे अच्छे लगते थे, मगर लगता है कि वे ही कभी उसकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे।‘‘ चक्करदार सीढ़ियों से उतरते ठोकर लगने से हुमायूँ के मौत का जिक्र है, मगर मुझे जैसा ध्यान है सीढ़ियां चक्करदार नहीं हैं और वह अपने चौड़े पांयचे वाले पाजामे में पैर फंसने से गिरा था, बहरहाल। उनकी कहानी में उनसे दूर परिवेश भी उनके कितने पास होता- ‘‘ दूर कहीं पर कुत्ते भौंकते- किसी अजनबी पर नहीं, बस अपनी आदत के चलते। कभी-कभी गीदड़ों के चीखने या नीम के पेड़ पर बैठी रात की किसी चिड़िया की आवाज़ सुनाई देती। खिड़की पर जाली लगी हुई थी तो इसके पल्ले मैं खुले रख सकता था, कीट-पतंगे, मक्खी-मच्छर और दूसरे उड़नेवाले कीड़े जाली से टकराते और बाहर ज़मीन पर गिर पड़ते। मानसून की शुरुआत के दिन थे, और हज़ारों-हजार उड़नेवाली चींटियाँ और पतंगे सड़कों के किनारे लगे खम्भों के लैम्प पर मँडराते, ये ख़ुशी-खुशी आत्मघाती मिशन पर निकले प्राणी थे; और सबेरे गौरैया और दूसरे कीटभक्षी परिंदे जमीन पर गिरे हुए उन पतंगों की दावत उड़ाते।‘‘ एक और वाक्य- ‘‘और जब सारी जंगें अपने अंजाम को पहुँच जाएँगी,‘ मैंने कहा, ‘तितली तब भी इतनी ही खूबसूरत होगी।‘‘ ... गिलहरी के लिए लिखते हैं- ‘‘वह हर रोज यहाँ आती है। उसने मेरे हाथ से खाना सीख लिया है। मैं उसे मूँगफली, डबलरोटी के टुकड़े और मटर खिलाता हूँ। आज मूँगफली नहीं है। वह मेरी हथेली और कलाई सूँघती है, और जब उसे यक़ीन हो जाता है कि मूँगफली आज नहीं मिलनेवाली तो मटर खाने के लिए राजी हो जाती है। वह कुछ बैरागी क़िस्म की जीव है, शिकायत नहीं करती।‘‘ ... वे हिमालयी मेपल-किरमोली, गढ़वाली ‘तितली वृक्ष‘ का विवरण देते हैं तो साल वृक्षों से झरते हेलीकाप्टर फूल याद आते हैं।

एक मार्मिक प्रसंग, जो तटस्थ सबक की तरह आया है, बालक रस्किन के पिता की चिट्ठियां, मिस्टर प्रिसली ने हिफाजत से रखने के लिए ले लीं कि स्कूल बंद होने के पहले रस्किन उन्हें वापस ले सकता है। रस्किन चिट्ठियां लेने पहुंचा तो उन्हें अपने मेज की दराजों में कोई चिट्ठी नहीं मिली और उन्होंने कहा कि वह सीनियर मास्टर से पूछेंगे। इस पर वे लिखते हैं- ‘‘कुछ देर मैं वहीं खड़ा रहा, फिर मुड़ा और बिना कुछ बोले लौट आया। बड़े लोगों के वादे का अब मेरे लिए कोई मोल नहीं रह गया था।‘‘ ... एक जगह वे लिखते हैं- ‘‘धीरे-धीरे मुझे नाउम्मीदियों की आदत पड़ने लगी थी। ... ‘‘मैंने दूसरों से कोई उम्मीद न रखना सीख भी लिया, लेकिन यह सब सीखने में मुझे बहुत-बहुत साल लग गए।’’ ... इसी तरह- ‘‘व्यक्तिगत त्रासदी के इम्तिहान से गुजरनेवाले लोग अक्सर बहुत दयालु स्वभाव के होते हैं।‘‘ ... ‘‘मेरी अपनी जिंदगी नीरस होने की वजह से, इन लेखकों की गढ़ी हुई दुनिया में खुद को भुला देना मुझे भला लगता था।‘‘ ... ‘‘अतिशय विनम्रता, और दूसरों को खुश रखने के लिए जरूरत से ज्यादा उत्सुकता मेरी तमाम खामियों में से एक है, ...‘। ... ‘‘कुँवारे लोग और बिल्ली के बच्चे करुणा के मुनासिब हकदार होते हैं।‘‘

अपनी परिस्थितियों को इस तरह तटस्थ-बेबाक दर्ज करने वाला, अपने दोस्तों की मौत का जिक्र भी स्वाभाविक घटना की तरह करता है। दूसरी तरफ मौत के सर एडमंड गिब्सन के नजरिए को याद करते हैं- ‘‘ एक दिन उन्होंने मुझसे कहा, ‘मरने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है, रस्किन, यह जरूर है कि जिन्दगी बहुत याद आएगी।‘ ज़िन्दगी के प्रति उनके नज़रिये का यह एक प्रभावशाली सारांश था।‘‘ सर एडमंड के गांधी संस्मरण-प्रसंग का भी उल्लेख रोचक है- ‘गांधी मुझे पसन्द थे,‘ वह कहते। ‘परिहास की प्रवृत्ति उनमें जबरदस्त थी। आज के दौर के नेताओं के मिज़ाज से तो हास्य सिरे से नदारद है। वे लोग खुद को ज़रूरत से ज्यादा गम्भीरता से लेते हैं। जब मैं जेल में गांधी से मिलने गया तो मैंने उनसे पूछा कि क्या आप आराम से हैं, और उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया था, ‘अगर मैं आराम से होता तो भी यह बात स्वीकार नहीं करूँगा!‘

वे हिंदी फिल्मों में दिलीप कुमार कामिनी कौशल वाली ‘नदिया के पार‘ का जिक्र करते हैं। हम छत्तीसगढ़ के लोग इसे छत्तीसगढ़िया किशोर साहू और फिल्म में कामिनी कोशल के एक छत्तीसगढ़ी संवाद के लिए याद करते हैं। बताया जाता है कि फिल्म की कहानी शिवनाथ नदी के नांदघाट के आसपास प्रचलित वास्तविक घटना की यादों पर आधारित थी। इसी तरह वे अपने हिंदी के शिक्षक मोहन राकेश को याद करते हैं कि एक बार जब मैंने उन्हें अपने हिंदी के ज्ञान से हैरान कर दिया तब से तो उन्होंने मुझे मेरे हाल पर छोड़ दिया।‘‘ फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का‘ का उल्लेख है कि वह कभी रिलीज नहीं हुई, यह शायद लेखक के ध्यान से छूट गया कि अमृत नाहटा की यह फिल्म अंततः 1978 में रिलीज हो गई थी।

किताब को बारीकी से पढ़ने के प्रमाण स्वरूप कुछ उल्लेख- पेज 74- ‘‘लेकिन उस आदमी तो रिक्शा भी दिखाई देता था।‘‘ यहां आदमी और तो के बीच ‘का‘ छूटा जान पड़ता है। पेज 75 पर ‘निस्पाप‘ को ‘निष्पाप‘ होना चाहिए? पेज 129 पर होटल की तनख्वाह वाला वाक्य खटकता है, शायद इसलिए कि अंगरेजी में विराम लगा कर लिखने-पढ़ने का जितना चलन है, हिंदी में नहीं, तो यहां ‘एलन के लिए...‘ के पहले वह या जो लगना अच्छा होता। अंगरेजी-हिंदी अनुवाद की समस्या का एक उदाहरण पेज 130 पर है, जिसमें धैर्य और हमदर्दी के लिए थोड़े-थोड़े लिखा गया है, जबकि होना चाहिए थोड़े से धैर्य और थोड़ी हमदर्दी। ... पेज 177 पर ‘हिन्दुस्तानी‘ से बाँधकर के बजाय ‘बँधकर‘ उपयुक्त होता। पेज 187 का उत्तम-पुरुष, उत्तर पुरुष का आशय स्पष्ट नहीं होता। पेज 208 का वाक्य ठीक है, मगर अंगरेजी की वाक्य-रचना और विराम-प्रयोग के कारण गड़बड़ाया-सा लगता है- ‘‘मेरा ज्यादातर लेखन सबेरे अपनी डेस्क पर बैठकर ही होता था, खासतौर पर गर्मी के दिनों में, जब दोपहर को मैं सो जाता था।‘‘ पेज 230 का ‘नीलकंठ‘, वस्तुतः ‘किलकिला-वाइट थ्रोटेड किंगफिशर‘ होगा। पेज 254 पर का ‘सबाब‘, ‘शबाब‘ है? ... पेज 320 पर जितना पहला था, का पहला ‘पहले‘ होना चाहिए।
यों मूल जैसा आनंद देने वाले इसके अनुवादक प्रभात सिंह जी बरेलवी हैं। उर्दू पर उनका अधिकार जाना-माना है। अनुवाद में दो-चार ऐसे उर्दू शब्द आते हैं, निश्चय ही वे हिंदी के किसी शब्द से अधिक उपयुक्त अर्थ देने वाले होंगे, मगर मुझ जैसे पाठक को वहां ठिठकना होता है।

(किसी पत्रिका के प्रवेशांक में छपा था- ‘इस अंक में प्रूफ की कुछ गलतियां हैं, क्योंकि हमने हर तरह के पाठकों की रुचि का ध्यान रखा है और कुछ पाठकों की अधिक रुचि प्रूफ की गलतियों में होती है।) 

पुनश्च- 

मुझे ध्यान आता है कि मैंने रस्किन बॉन्ड को ध्यान से पहली बार पढ़ा ‘अजब-गजब मेरी दुनिया में‘, तब उसके लिए लिखा था- 

रस्किन बॉन्ड का सहज निर्मल हास्य; हिन्दी हास्य-व्यंग्य से कुछ अलग-सा, मार्क ट्वेन, जेम्स थर्बर की याद दिलाता है। अब हिन्दी में बढ़िया अनुवाद आ गया है।

यह संग्रह हाथ लगे तो फटाफट पढ़ जाइए, अंकल केन के तो कहने क्या? ‘बहुरूपिये नानाजी‘ का रूप जरूर मोहित करेगा।

वे लिखते हैं- ‘दुनिया के सबसे ईमानदार लोग भी किताबें और फूल चुराने से नहीं चूकते‘ एक पुरानी बात, जो हम सुनते आए थे- किसी को पुस्तक देना नासमझी है, लेकिन उससे बड़ी नासमझी मांगी हुई पुस्तक को वापस लौटाना होता है।

पुस्तक समाप्त होती है- ‘एक पुरातत्त्वेत्ता की तरह बड़ा नहीं हुआ। या किसी माली की तरह। या संग्रहालय के किसी संरक्षक की तरह। लेकिन मुझे हमेशा इतिहास दिलचस्प लगता रहा है। और जब मुझे कोई कहानी लिखनी होती है तो यह मेरी मदद करता है।‘

मैं खुद, संग्रहालय का संरक्षक रहा, पुरातत्ववेत्ताई अब भी करता हूं, लेकिन मेरे लिए यह कहानी बनाने में रोड़ा ही बनती है, मदद नहीं करती। 

इसी क्रम में रस्किन बॉन्ड के तीन अंश, जो मुझे बहुत पसंद हैं- 

चाँद अभी भी निकला नहीं था। अँधेरे में लालटेनें झूल रही थीं। अधिकांश लोग, यहाँ तक कि अंधा भी लालटेन साथ लेकर चलता है। और अगर आप उस अंधे से पूछते हैं कि तुम्हें लालटेन की क्या जरूरत है? तो वह कहता है, “जिससे मूर्ख अँधेरे में मुझसे टकरा न जाएँ।”

’मैं अपराध, रहस्य, रोमांच और जासूसी कहानियाँ पढ़कर बड़ा हुआ हूँ, लेकिन मुझ पर उनका प्रभाव साहित्यिक ही रहा; जिस प्रकार अधिकांश पाठक हत्या और मारकाट से दूर हैं, मैंने भी अब तक कोई बड़ा अपराध नहीं किया है। ईमानदारी से कहूँ तो ऐसी बात नहीं है कि मुझमें कभी अपराध करने की इच्छा ही नहीं जगी हो। हममें से ज्यादातर में यह प्रबल इच्छा होती है कि हम किसी अप्रिय व्यक्ति मसलन किसी धौंस जमानेवाले, सतानेवाले, धोखेबाज या लुटेरे को हमेशा के लिए ठिकाने लगा दें। लेकिन हमारी नीच प्रकृति पर व्यावहारिक ज्ञान और सभ्य समाज के मानदंड हावी हो जाते हैं और हम सबसे जघन्य और अस्वाभाविक अपराध अर्थात् आदमी की हत्या करने से पीछे हट जाते हैं।'

’मैंने कुछ बड़े पेड़ देखे हैं पर यह उन सबसे ज्यादा पुराना व विस्तृत है। मुझे खुशी है कि शंकराचार्य ने इसके नीचे ध्यान लगाया था और इस तरह उसके संरक्षण को सुनिश्चित कर दिया था। अन्यथा वह भी इस क्षेत्र में फलने-फूलनेवाले अन्य पेड़ों व जंगलों की तरह कट चुका होता। 
एक छोटे से बच्चे ने मुझे याद दिलाया कि यह इच्छापूर्ति पेड़ है इसलिए मैंने भी कामना की। मैंने कामना की कि अन्य पेड़ भी इसी तरह फलें- फूलें। 
‘क्या तुमने भी इस पेड़ से कुछ माँगा है?‘ मैंने लड़के से पूछा। 
‘मैंने कामना की है कि आप मुझे एक रुपया देंगे।‘ उसने कहा।
उसकी इच्छा तुरंत पूरी हो गई। मेरी इच्छा अनिश्चित भविष्य की किसी कंदरा में जाकर छिप गई। पर उसने इच्छा करने के संदर्भ में मुझे एक पाठ सिखाया।

Monday, August 17, 2026

रघु राय

दहाई साल बीतने को आया, यादें अब भी ताजा हैं। रघु राय और जतिन दास का रायपुर प्रवास। वे समय ले कर आए थे। अपने शिष्य नागपुर वाले शेखर सोनी के आग्रह पर उन्हें रामनामियों से फिर से मिलने जाना था। यात्रा में शिवरीनारायण और सिरपुर भी शामिल हुआ तो मैं भी जुड़ गया। गाड़ी रुकती तो उनका कैमरा ठहर जाता, चलती गाड़ी में शीशे के भीतर से भी बार-बार क्लिक करते रहते। शायद प्रभाव और संभावना का अनुमान लगाते। पूरी यात्रा में शास्त्रीय भजन और सूफी गीत बजते रहे, वे ताली पर ताल देते साथ गाते गुनगुनाते रहे। जतिन दास के साथ उनकी जोड़ी के क्या कहने। जतिन दा को छेड़ते, उनकी बातों का जवाब देते, जिनमें हर बार ऐसा गुदगुदी होती कि उसके भीतर का चुटीलापन अखरे नहीं था। 

 
शिवरीनारायण पहुंचने के पहले महानदी के पुल पर गाड़ी रुकवाई। अंधेरा घिरने को, अप्रैल का महीना मगर बिजली चमक रही थी, बूंदाबांदी हो रही थी। फोटोग्राफी के लिए एमदम प्रतिकूल और तभी उनका कैमरा निकला, फोटो लेते रहे। शिवरीनारायण रेस्ट हाउस पहुंचने पर बत्ती गुल मिली। जैसा आमतौर पर सरकारी रेस्ट हाउस में होता है, चौकीदार का ठिकाना नहीं। किसी तरह कमरा खुला, मगर खाने का कोई इंतजाम नहीं। जतिन दा, बेहिचक, बिना समय गंवाए, शेखर जी को लेकर खरीदी करने निकले। जैसे तैसे पकाने खाने की व्यवस्था बनी। तब पता चला कि जतिन दा आले दरजे के बावर्ची हैं। रघु जी बरसती अंधेरी रात में कैमरा लेकर बाहर घूमते रहे। बिजली चमकती, नदी रोशन होती और उनका कैमरा क्लिक होता। न जाने कितनी तस्वीरें उन्होंने ली होंगी।
 

फोटोग्राफी के बारे में शायद ही कोई बात करते, अक्सर शांत, चेहरे पर मुलायम सी मुस्कान, एक इंच से भी कम। मुस्कान, जो आंखों में और तनाव रहित चेहरे के कारण उभरती थी। साथ समय बिताते समझ में आता कि वे ऐसे नामचीन हैं, जो अपनी गरिमा और मर्यादा बनाए, सामने वाले को सहज रख सकते हैं। पत्रिकाओं में उनके लिए फोटो एडिटर पद का सृजन और समाचारों के लिए फोटोग्राफी पर बात करने पर उन्होंने अपने कैरियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि अखबार के लिए फोटोग्राफी करते हुए, किसी बैठक की तस्वीर लेनी होती थी। यों यह सबसे आसान और फटाफट वाला काम होता था, लेकिन वे वे बैठक में हो रही बातचीत, मुद्दों, नरम-गरम को ध्यान से सुनते और कोशिश करते कि ऐसा क्षण क्लिक हो, जो बैठक की चर्चा की खबर से अधिक प्रभावी अभिव्यक्त हो। 

शिवरीनारायण, सिरपुर के मंदिरों के लिए उन्होंने कैमरा छुआ भी नहीं, बस देखते सराहते रहे। जतिन दा की कला-पारखी दृष्टि, जो स्मारक के काल-भेद को कला-शैली के आधार पर आसानी से बूझते गए, मगर रघु जी शांत भाव से मानों बस रस पीते रहे। हां, किसी तरह की हलचल हो, जीवन हो, गाय या कुत्ता बैठा हो, पूंछ हिला रहा हो, तब कैमरे पर उनकी उंगलियां तुरंत थिरकने लगती थीं। मुझे समझ में आया कि ऐसा कोई स्थिर दृश्य, जो कभी भी क्लिक किया जा सकता है, उन्हें दिलचस्पी नहीं होती थी, जहां गति हो स्पंदन हो या किसी स्थिर दृश्य पर क्षणिक कौंध हो, वे वही क्लिक करना चाहते हैं। ऐसा अनूठा, जिसे पकड़ना मुश्किल हो, भूतो न भविष्यति हो। जब यह बात मैंने उनसे साझा की, उनकी मुस्कान ने मुझे बता दिया कि वे मेरी कोई कैंडिड तस्वीर जरूर लेंगे और ऐसा हुआ भी। 

मैंने उनसे सत्यजित रे की चौंकी हुई फोटो, मदर टेरेसा, कलकत्ता पूजा, इंदिरा गांधी आदि की याद दिलाई, इस पर बस हां-हूं करते रहे। उनके लौटने के बाद मेरे पास एक लिफाफा आया, जिसमें उनकी प्रयाग कुंभ वाली किताब और शिवरीनारायण के केशवनारायण मंदिर के सामने जतिन दा के साथ बैठे हुए मेरी, उनकी ली हुई, हस्ताक्षरित तस्वीर थी। 
जाते जाते उन्होंने दिल्ली आने पर अपने फार्म हाउस पर रुक कर साथ समय बिताने का प्रस्ताव दिया था। कुछ ऐसे प्रस्ताव होते हैं, जिनका प्रबल आकर्षण होता है, मगर कहीं उसे बने रहने देना अधिक समझदारी होती है, मैंने इस प्रस्ताव पर वही समझदारी दिखाई और अब उनका यह प्रस्ताव (उनके न रहने पर पहला विश्व फोटोग्राफी दिवस) मेरे लिए अमर हो गया। 

यहां आई तस्वीरें रघु राय, शेखर सोनी और रूपेश यादव द्वारा ली हुई

Sunday, August 16, 2026

छत्तीसगढ़ी काव्य पर विहंगम दृष्टि

75 पार रामेश्वर शर्मा जी छत्तीसगढ़ी के मूर्धन्य साहित्य-सेवियों में हैं, उतने ही निष्ठावान सायकिल-साधक। पचासेक सालों से निरंतर सक्रिय। छत्तीसगढ़ी काव्य पर उनकी नजर लगातार बनी रहती है और उसका परिणाम है, यह पुस्तक- छत्तीसगढ़ी काव्य, एक विहंगम दृष्टि (छत्तीसगढ़ी काव्य विधा अद्यतन)। पुस्तक में छत्तीसगढ़ी के 300 से अधिक कवियों की रचनाओं को विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है- यथा, बाल-साहित्य, वीर रस, हास्य रस, व्यंग्य, दोहा-चौपाई-कुण्डलियां, वार्णिक छंद, कविता, मुक्तक, ग़ज़ल, मुक्तछंद और गीत। संग्रह में क्षणिका का उल्लेख है किंतु कुछ प्रयोगधर्मियों ने छत्तीसगढ़ी में हायकू भी आजमाया है, उसे यहां जगह नहीं मिली है। इसी प्रकार इस दौर के लोकप्रिय और चर्चित मंचीय कवि मीर अली ‘मीर‘ यहां शामिल नहीं हैं। यों, मेरी जानकारी में छत्तीसगढ़ी काव्य को इस प्रकार वर्गीकृत करते, विभिन्न प्रमुख कवियों का उदाहरण लेते यह पहला प्रकाशन है। 

संग्रह के मुखपृष्ठ और अंदर के पृष्ठों पर भी रामेश्वर शर्मा नाम के साथ संपादक या संकलनकर्ता उल्लेख होना चाहिए था, जो नहीं है। पुस्तक के आरंभिक ‘स्वकथन‘ में उन्होंने जरूर स्पष्ट किया है कि ‘इसमें जो रचनाएं हैं, उन्हीं रचनाकारों की हैं। इसमें मेरा कोई हस्तक्षेप नहीं है, इन सभी रचनाकारों की रचना संकलित कर छत्तीसगढ़ी काव्य को एक विहंगम दृष्टि के लिए पाठकों को समर्पित है।‘ उन्होंने यह भी बताया है कि ‘जब इस पुस्तक में वरिष्ठ साहित्यकार की कमी लगी, तब ‘छत्तीसगढ़ के माटी चंदन‘ जिसका संपादन राकेश तिवारी ने किया है और ‘छत्तीसगढ़ी कविता के सौ साल‘ का संपादन डॉ. बलदेव किये थे। उसमें से रचनाकारों की रचना ली हैं।‘ 

पुस्तक के पहले अध्याय ‘छत्तीसगढ़ी काव्य के चितेरे‘ में जिन कवियों और उनकी पंक्तियों का उल्लेख है, वे इस प्रकार हैं- डॉ. हनुमंत नायडू, हरि ठाकुर, डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा, प्यारे लाल गुप्त, द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र’, नारायण लाल परमार, कोदूराम ‘दलित‘, भगवती सेन, बद्री विशाल यदु ‘परमानंद‘, हेमनाथ यदु, पद्मश्री श्याम लाल चतुर्वेदी, रविशकर शुक्ल, पण्डित दानेश्वर शर्मा, डॉ. विमल कुमार पाठक, मेहतर राम साहू, रामेश्वर वैष्णव, डॉ. जीवन यदु ‘राही‘, मुकुन्द कैशल, लक्ष्मण मस्तुरिया, डॉ. देवधर दास महंत, डॉ. चितरंजन कर, श्रीमती डॉ. निरुपमा शर्मा, श्रीमती दीप दुर्गवी, बुधराम यादव, डॉ. पीसी लाल यादव, डॉ. सन्तराम देशमुख ‘विमल‘, सीताराम साहू ‘श्याम‘, सुशील यदु, बसंत यदु, शिव कुमार यदु ‘शिकुम‘, बंधु राजेश्वर खरे, रमेश विश्वहार, रूपेश तिवारी, हबीब समीर, किशोर तिवारी। 

इस क्रम के अंत में वे स्वयं इन शब्दों में हैं- ‘रामेश्वर शर्मा छत्तीसगढ़ी एवं हिंदी के कवि-गीतकार, ग़ज़लकार, अनुवादक, समीक्षक, स्तंभकार, पत्रकार के रूप में जाना जाता हूँ। दैनिक अमृत संदेश में लगभग पाँच वर्ष तक ‘जाती मिलाती‘ नाम से स्तंभ लिखा। इनके द्वारा लिखे गीत को गायक-गायिकाओं ने गाया है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी गीत प्रसारित हुआ। छत्तीसगढ़ी फिल्म के लिए गीत लिखा। कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ किया। एक गीत, जिसमें गाँव का वर्णन है। उसका मुखड़ा और अंतिम अंतरा प्रस्तुत है- 
नदिया नरवा ढोडगा बीच मा मोर गंवई गांव हे। 
बर पीपर आमा के संगी सरग अइसन छांव हे। 
मंदिर देवाला चारो खूंट मा तुलसी चौरा आंगन मा, 
बद्री, द्वारिका, जगनाथ, रामातार अंतस पावन मा, 
तीरथ धाम सबो ले भव्य दाई-दादा के पाँव हे। 

पुस्तक के कॉपीराइट, इंप्रिंट पेज पर द्वितीय संस्करण, 2024 (संशोधित एवं परिवर्धित) छपा है, किंतु प्रथम संस्करण की जानकारी नहीं है। पुस्तक के अंत में दिए गए लेखक के परिचय से पता चलता है कि इस पुस्तक का प्रथम संस्करण 2022 में हुआ। अच्छा होता कि पुस्तक में छत्तीसगढ़ी कविता के इतिहास पर परिचयात्मक संक्षिप्त जानकारी होती और इसमें शामिल कवियों की सूची-अनुक्रमणिका दे दी जाती। पुस्तक के आरंभ में ‘गोल्डन बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड्स‘ का प्रमाण-पत्र छपा है, इस पर बस यही कह सकते हैं कि गिनीज बुक के बाद लिम्का बुक और इस तरह के रिकार्ड्स वाली जाने कितनी संस्थाएं अपना काम कर रही हैं, मगर इस पुस्तक को ऐसे किसी प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं है। 

सुदीर्घ अनुभव से तैयार की गई पुस्तक में स्वाभाविक ही यह संभव है कि रुचि, पसंद और उपलब्धता सीमा रही हो, मगर संदेह नहीं कि छत्तीसगढ़ी साहित्य अध्ययन के क्षेत्र में यह पुस्तक मील का पत्थर है।

Friday, August 14, 2026

बरसों बरस बनारस

एक गेरुआ सबेरा। कुछ पुराने और आगे आने वाले दिन।
बरसों से बनारस जाता रहा हूं, अब की कुछ बरस बाद गया, किस बरस? महाकाल की नगरी, कालातीत!


सुबह-ए-बनारस
पौने सात बजे
लंका चौमुहानी
ट्रैफिक जाम
लोग सौहार्दपूर्ण, धीरज धरे
दो पुलिस वाले और तीन नागरिक
व्यवस्था बनाने में सक्रिय।

तुलसी घाट, कबीरचौरा और भारतेन्दु भवन के बाद 
सुंघनी साहू,           बाबा जी दांत वाले में सांप्रदायिक जोग

किसी साथी ने कहा था- ‘ऐसा नहीं लगता कि बनारस ओवर रेटेड है?‘
किसी ने कहा था, ‘बनारस का एक हिस्सा बदलाव को अपना कर मर रहा है और एक हिस्सा उसे न अपना कर।‘

मृत्यु की प्रतीक्षा में जीवन, बेखबर जीवंत। लोक और शास्त्र, शाश्वत और नश्वर की संधि पर स्थित सनातन आनंद कानन काशी। श्रद्धा और भय के बीच अनुशासित बाबा कीनाराम की गद्दी।

गोपालजी, प्रधानमंत्री वाला ऑटो चलाते हैं। उनके भाड़ा बताने पर बिना मोल-भाव हम तैयार हो गए, तो शायद उन्हें लगा कि 50 के बदले 60 कहना था, कहने लगे जो मुनासिब है वही कहेंगे, आगे आपकी मर्जी। हमने सोचा कि रिजर्व जा रहे हैं, 60 ही दे देंगे। लंका चौमुहानी पर पहलवान लस्सी की अब चार दुकानें हैं, सवारी से आपसदारी न हो तो क्या बनारस? उन्होंने लस्सी की रिपोर्ट ले ली। उनके पूछने पर हमने बताया कि दही कुछ खट्टी थी, अब सामने मथकर भी नहीं देते, रेडीमेड है, उन्होंने आटो मोड़ते हुए दुकान के सामने रोका और चलते-चलते हमारी तरफ से लस्सी वाले से शिकायत दर्ज कराई। हॉस्पिटल गेट वाले सीताराम को याद किया तो उन्होंने कहा कि आप तो सब जानते ही हैं, मिश्राम्बु, केसरिया, रामनगर, कचौड़ी गली की लस्सी अब भी वैसी ही है। फिर बताया खोजवां में रहते हैं, मेरी जिज्ञासा का पहला शब्द ‘खराद‘ सुनते ही वहां बनने वाले लकड़ी के खिलौने और खराद के इतिहास पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। भाड़ा देते हुए मेरे पास 100 का नोट था, उनके पास फुटकर न था, इसलिए अपने पास फुटकर टटोला, चार 10 के नोट और एक 5 का सिक्का था, उन्होंने राजी-खुशी न सिर्फ स्वीकार किया, मुझे आश्वस्त भी किया कि बाकी के 5 फिर कभी।

दीक्षितजी टैक्सी वाले मिले। किसी को फोन पर समझाने लगे- मोड़वा पर, मनोजवा क दुकनिया... वा और या उपसर्ग-प्रत्यय के साथ अपनी बातों में लय रचते, पता लग जाता, समझाइश है, मार्गदर्शन या फटकार। अपनी बात उन्हें पांच बार दुहरानी पड़ी, मगर सुर में दुहराव नहीं, हर बार नयापन, ताजगी। उनसे संकटमोचन संगीत समारोह का सुझाव भी मिला। ट्रैफिक और भीड़ पर कहते हैं, दो-तीन कट्ठा जमीन यहां हर कोई लेना चाह रहा है, राजधानी बनेगा। और सब भीड़ टूरिस्ट की है, ये दर्शनार्थी थोड़े न हैं। मेरे लिए वाहन का इंतजाम करने बेताब, बाबतपुर रास्ते में दो किलो लाल पेड़ा दिलवाने का आग्रह। जब कभी आएं याद कीजिएगा का वादा लिया। 

गोदौलिया से दशाश्वमेध। सड़क, पर दुकानों, पैदल के लिए बचते-संभलते...पेनको और जहरलाल-पन्नालाल को कोई कैसे भूल सकता है। मोंगा अब रहा न होगा, मगर यह जान कर अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए पता नहीं किया। काली-मंदिर, दशाश्वमेध से प्रवेश वाली गली ज्यों की त्यों मिली। मान लिया कि काली मंदिर के बगल वाली मिष्ठी दही और लकड़ी के ठप्पे से कपड़े पर छपाई काम वाली दुकान भी जस की तस होगी। गली की दुकान पर मैंने पूछा, चौड़ी मोहरी वाला पाजामा, कर्मचारी ने पाजामा दिखाया, समझ में आया कि उसके लिए चौड़ा यानी जो चूड़ीदार न हो, मैंने खड़े हो कर अपना पाजामा दिखाया, मुस्कुरा कर उसने बुजुर्ग दुकानदार की ओर इशारा कर के कहा, बाबूजी की तरह, लिफाफा! बस एक पीस ही रह गया है, देख लीजिए। बात आगे बढ़ी। दुकानदार से मैंने कहा, पहले एक बंगाली दादा होते थे, आपकी जगह बैठते थे। कहा, हमारे मामा, अब नहीं रहे। उनसे कहा, लखनऊ चिकन का कुरता दिखाइए, उन्हें बात पसंद नहीं आई, मैंने भांप कर कहा अच्छा, बनारसी सिल्क होगा, वे दिखाने लगे, मेरे ऐसा वैसा कहते, ठीक न बता पाने पर सुझाया कि जो बांस कागज वाले रंग का आता है, वो? मेरी हामी पर कहा, फिर ऐसे कहिए कि काशी सिल्क चाहिए। 

ज्ञानवापी (अब गेट नं 4) पर पांडेयजी मिले, मेहरबान थे, 1769 और 1777 का रानी अहिल्याबाई के साथ का बाबा विश्वनाथ का इतिहास बताया। दर्शन के लिए जाएं तो क्या देखें, ध्यान दें, समझाया। मस्जिद में 1990 के बाद जाने की मनाही हो गई, बताया। ड्यूटी पर बड़ी संख्या में तैनात पुलिस बल। एक युवा सिपाही के माथे पर संक्षिप्त त्रिपुंड, उस पर ऊँ छाप। सूने कोने पर तैनात वाले मोबाइल स्क्रीन पर व्यस्त। पांडेय, तिवारी, मिश्रा, चौबे, एकाध सिंह, सोनकर, यादव भी।

एक खास दुकान होती थी, टिकठी-गोटेदार चुनरी सजी। पहले-पहल ध्यान जाने पर कभी वहां ठिठका था। अंतिम संस्कार की सजी दुकान, बस एक मुरदे की कमी। ‘मौत और ग्राहक का कोई भरोसा नहीं, कब आ जाए’, लेकिन यहां तो ग्राहक आएगा किसी मौत के साथ, मौत का ही भरोसा। मेरे मन में ‘किं आश्चर्यम्।‘ इसमें नाम तो मजेदार है ही Pandit Readymade छपा है, जिसके वास्तविक आशय का अनुमान शायद ही कोई लगा सके।

Pandit Readymade का मतलब तो यही समझ में आता है, लेकिन है कुछ अलग. ऐसी एक पुरानी दुकान इसके बगल में है और यह पहले रेडीमेड वस्त्रों की दुकान हुआ करती थी, बगल की दुकान की बिक्री देख कर इस दुकानदार को एक और ऐसे दुकान की संभावना दिखी, तब रेडीमेड कपड़ों की दुकान इसमें बदल लिया। दुकान का पुराने नाम, प्रतिष्ठा से पहचान भी बनाए रखना था फिर दुकानदार ने माना कि यह भी तो रेडीमेड तन-आवरण की दुकान है, पहले जीते-जागते के लिए अब मुरदों के लिए, तो फिर क्यों न नाम यही चलने दिया जाय। फ्यूनरल पार्लर! अंतिम क्रिया/दाह संस्कार के साथ पार्लर शब्द का प्रयोग कोई फक्कड़ भारतीय चेतना ही कर सकती है।

प्रवास के दौरान दिल्ली के विपिन गर्ग जी मिले, बनारस असर श्रद्धा-सिक्त। बड़ा गणेश-लोहटिया की गली में व्योमेश के लिए भटकते, ठक-ठुक-ठन-भड़ाम की ताल सुनते निराला, नागरी प्रचारिणी और रूपवाणी के युवा साथी। व्योमेश को शायद नहीं जाना है, मगर आसन लगाए हैं, मैं बातें जल्दी समेटने की कोशिश में कि उनके निर्धारित कार्यक्रम का समय हो रहा है। मेरी बेचैनी भांप कर बताया कि तापस को रवाना कर चुके हैं, बस हो गया, बैठकी निर्विघ्न। पुरातत्व वाले अपने जात-सगा कौशाम्बी वाले जी.आर. शर्मा जी (के सुपुत्र के साथ उन) की स्मृतियां। पुरातत्व की नई पीढ़ी सुनीता, रूपनारायण, शंभू, नीलम मिले। दिवाकर, गायत्री जी, लक्ष्मण जी से मिलना, इस बीच कलापिनी जी यहां है, बात हुई, मगर उनको सुनना रह गया।

बनारस से लौटते, चाह कि बहुत कुछ छूटा रहे, अगली बार के लिए।

बनारस पर और भी- 


Wednesday, August 12, 2026

लोककला का दफ्तरी-लेखा

कला-संस्कृति में कोई दखल न होने के बावजूद रुचि होना काम आने लगा, जब छत्तीसगढ़ राज्य गठन हुआ, हम पुरातत्व के लोग संचालनालय संस्कृति और पुरातत्व का हिस्सा बन गए। पुरातत्व की पूछ-परख कम होती और संस्कृति की चमक और आकर्षण सबका ध्यान आकर्षित करती। संस्कृति से जुड़े आयोजन और लिखना-पढ़ना, शासकीय कर्तव्य-निर्वाह का मुख्य हिस्सा बन गया। 

सरकारी कामकाज के दौरान आज शाम तक की प्राथमिकता, कल सुबह कार्यालय पहुंचने पर पता लगता कि कल शाम तक जो टॉप प्रियारिटी है, वह अब ‘उसे छोड़ो, बेकार की बात है, यह कर के लाइए, उच्च स्तरीय बैठक है‘ घंटे भर का समय होता, आप काम पर बैठें, शुरू कर पाएं, बुलावा आने लगता, ‘हुआ, हो गया ... और कितना समय लगेगा‘ आपलोग किसी काम की प्राथमिकता नहीं समझते, मंत्रालय से फोन आ रहा है। जब तक कहें कि आप बैठने दें, तब तो काम कर पाएं, फिर से मंत्रालय से आने वाले फोन की घंटी बज जाती ...। ‘आफिस-आफिस‘ खेल इसी तरह चलता रहता। 

ऐसी ही नौबत आई, जब कहा गया कि राज्य की संस्कृति पर संकट है, लोक-कलाएं विलुप्त और नष्ट हो रही हैं। इनका संरक्षण-संवर्धन आवश्यक है, इस पर तुरंत एक नोट तैयार करना है। पुरातत्व-प्रशिक्षित का स्वभाव कुछ-कुछ बोदा-सा माना जा सकता है, वह जाने कितनों को बनते-बिगड़ते को देखा-समझा होता है, और ऐसी सभी बातों, वस्तुओं को दशकों में नहीं सदियों में सोचता है। बहरहाल, हासिल यह कि कभी ऐसा काम भी करना होता, जो शायद दबाव में ही संभव हो। आज यह नौबत आए तो तुरंत एआइ की मदद याद आएगी, तब यह स्थिति नहीं थी, और सहयोगियों की मदद से जो नोट बना, समझ नहीं पाता कि वह कितना सार्थक है, फिर भी ... वह इस प्रकार था- 

लोक कलाओं का संरक्षण एवं संवर्धन 

परिचय - 
छत्तीसगढ़ कला और संस्कृति की दृष्टि से समृद्ध भूभाग है। यह विविधतापूर्ण पारंपरिक लोक संस्कृति से अनुप्राणित है। लोक संस्कृति की यह सम्पन्नता इस अंचल के विशिष्ट भौगोलिक स्थिति की वजह से भी है। यह चारो ओर से विभिन्न भाषा-भाषी राज्यों से जुड़ा हुआ है। यहाँ की स्थानीय जनजातीय और मैदानी लोकसांस्कृतिक तत्त्वों में उत्तर में सरगुजा अंतर्गत उत्तरप्रदेश और झारखण्ड, पूर्व में ओडिशा, दक्षिण में आंध्रप्रदेश और तेलंगाना तथा पश्चिमी भाग में महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के लोक सांस्कृतिक विशेषताओं का प्रभाव व समन्वय देखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ में इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मुख्य आधार इसका भूगोल ही है। 

कला रूप -
छत्तीसगढ़ में लोक कलाओं के विविध रूप विद्यमान हैं, जिन्हें यहाँ इस प्रकार वर्गीकृत कर प्रस्तुत किया गया है- 

1. लोकगाथा, लोकगीत एवं पारंपरिक वाद्य यन्त्र- यहाँ के अधिकांश लोकगीतों में किसी न किसी रूप में लोकगाथा का समावेश है। ये वस्तुतः गेय कहानियां होती हैं। इसके अंतर्गत पंडवानी, आल्हा-ऊदल, ढोलामारू, लोरिक चंदा और सरवन कुमार आदि उल्लेखनीय हैं। 

स्थानीय/आंचलिक लोक सांस्कृतिक परम्पराओं का संवहन लोकगीतों के माध्यम से होता है। यहाँ के अनेक लोकगीत और लोकनृत्य आपस में संबद्ध हैं। सुआ, भोजली, ददरिया, सधौरी, बिहाव गीत, गौरा-गौरी, डण्डा, करमा, मड़ई, बांस, जंवारा, देवार, रहस आदि यहाँ के प्रमुख लोकगीत हैं। 

लोकगीतों, लोकगाथाओं और लोकनृत्य/नाट्य इन सभी गेय अथवा प्रदर्शनकारी लोककलाओं में पारम्परिक वाद्यों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है। ये दर्शकों के मनोभाव को तरंगित करते और विधा को प्रभावोत्पादक बनाते हैं। छत्तीसगढ़ में भांति-भांति के पारंपरिक वाद्य यन्त्रों का प्रयोग यथा अवसर किया जाता है। ये वाद्य यन्त्र उस अवसर के अनुकूल मानवीय संवेदना को प्रगाढ़ करते हैं। यहाँ प्रचलित वाद्यों में ढोल, नगाड़ा, ढोलक, बांसुरी, हारमोनियम, बैंजो, तबला, मंजीरा, दफडा, निशान, चिकारा, सरांगी, इसराज, ढूगरू, राऊत बांसुरी, नमडेवन, खंझेरी, खल्हर, मंदरी, अलगोजा, चांग या डफ, ताशा, करताल, झांझ, मोहरी, बांस बाजा, सींग बाजा, मोहरी, धनकुल आदि हैं. 

2. लोकनृत्य- विभिन्न समुदायों के अपने-अपने पारंपरिक नृत्य हैं जो किसी खास अवसर पर कियो जाते हैं। इस अंचल में सरगुजा से लेकर बस्तर तक लोकनृत्यों की एक श्रृंखला दिखाई पड़ती है जो इस प्रकार हैं- करमा, डण्डा/शैला, सरहुल, सुआ, पंथी, रावत, डोमकच, गेंडी, ककसार आदि। इन लोकनृत्यों की भी अनेक स्थानीय शैलियाँ हैं। 

3. पारंपरिक नाट्य/मंचीय प्रस्तुतिकारी विधाएं- यहाँ की अनेक पारम्परिक लोकगाथाएं और लोकगीत जैसे पण्डवानी और रहस विधा का नाट्य शैली में प्रदर्शन प्रचलित है। इनके साथ ही नाचा, गम्मत, भतरा नाट, माओपाटा आदि प्रसिद्ध प्रस्तुतिकारी लोकनाट्य प्रचलित हैं। 

वर्तमान परिदृश्य - 
वर्तमान में छत्तीसगढ़ के प्रायः सभी कलारूपों के स्वरूप में समय के साथ हुये परिवर्तन को देखा जा सकता है। गांव के गुड़ी-चौपाल में होने वाली विभिन्न प्रदर्शनकारी कलाओं का मंचन अब राज्यस्तरीय/राष्ट्रीय लोक मंचों पर होने लगा है जिसके कारण इनके स्वरूप में धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगा है। जैसे पंडवानी की शास्त्रीय वेदमती शैली को पद्मविभूषण तीजनबाई एवं अन्य कलाकारों द्वारा एक नई शैली कापालिक के रूप में विकसित किया गया। इसी तरह ख्यात पंथी कलाकार स्व. श्री देवदास बंजारे द्वारा एक्रोबैटिक प्रदर्शन के प्रभाव से पंथी नृत्य कला के स्वरूप में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। इन लोककलाओं को विशेष ख्याति प्राप्त हुई। 

इस क्रम में कतिपय ऐसी लोककलाएं भी हैं जिनका प्रचलन अलग-अलग कारणों से समय के साथ कम होता गया और इनमें से कुछ तो विलुप्ति के कगार पर हैं। जैसे रहंस (रास) और जगार कई दिनों तक चलने वाले विशाल अनुष्ठानिक व्यय साध्य आयोजनों के कारण अब इनका सीमित आयोजन ही होता है। कुछ लोककला विधाएं, उनके साथ जुड़ी विचित्र मान्यताओं के कारण उनका प्रचलन कम हो गया है। तारे-नारे/घोड़ा नाच जैसे लोकप्रिय विधाओं का प्रचलन ऐसी ही मान्यताओं के कारण कम हो गया है। ऐसा माना जाता है कि इसमें भूमिका का निर्वाह करने वाले पात्र/चरित्र के साथ अनिष्ट हो जाता है। 

कार्य योजना - 
कम प्रचलित/विलुप्त होती लोककला शैलियों की पहचान कर सूची तैयार करना लोक संस्कृति हमारी अस्मिता और पहचान हैं, इसलिये इनका संरक्षण-संवर्धन अत्यावश्यक है। इसलिए ऐसी विधाएं जिनका प्रचलन कम हो गया/रहा है अथवा जो विलुप्ति के कगार पर हैं, उनके संरक्षण-संवर्धन के लिए दीर्घकालिक कार्य योजना बनाकर उनका क्रियान्वयन जरूरी है। 

ऐसी लोककला विधाएं जिनका प्रचलन कम होता जा रहा है अथवा विलुप्त होते जा रहे हैं, मुख्य रूप से इन 03 क्षेत्रों से संबंधित हैं- 

1. गायन- लोकगीत/लोकगाथा जैसे बांसगीत, चंदैनी, डोलामारू, भरथरी, गोपीचंदा, रतनपुरिहा भजन आदि. 
2. वादन- विविध वाद्य जैसे चिकारा, सरांगी, इसराज, हिरकी, ढुंगरू, राऊत बांसुरी, बांस, टामोक, तुड़बुड़ी, खंझेरी, हिरनांग, रोंजो, डांहक, टमड़िया, खल्हर, मंदरी, अलगोजा, चांग, दफड़ा, निसान, करताल, झांझ, मोहरी, सींग बाजा, धनकुल, तमूरा, आदि. 
3. नृत्य- कोरवा, बायर, छैला नाच आदि. 
4. नाट्य रूप- तारे-नारे, नाचा, गम्मत, नाटक, भतरा नाट, आनुष्ठानिक प्रस्तुतियाँ जैसे रहस, लक्ष्मी जगार, तीजा जगार आदि. 

कम प्रचलित/विलुप्त होती लोककला शैलियों की सूची का अद्यतनीकरण - 
1/ इन क्षेत्रों के विभिन्न लोककला शैलियों की पहचान कर सूची को अद्यतन करने के लिए यह आवश्यक होगा कि इस संबंध में जानकारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़, लोक कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय/राज्य स्तरीय सम्मान/पुरस्कार प्राप्त तथा अन्य प्रतिष्ठित विशेषज्ञों, संभागायुक्तों के माध्यम से जिला स्तर पर, पंचायत विभाग, आदिम जाति कल्याण विभाग, उच्च शिक्षा एवं स्कूल शिक्षा विभाग तथा स्थानीय विशेषज्ञों कलाकारों के माध्यम से जानकारी एकत्र कराई जाए। 
2/ इसके लिए तीन दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया जाए जिसमें लोककला विशेषज्ञ और कलाकार सहभागिता करेंगे और वे लोककलाओं के प्रचलन कम होने/विलुप्त होने के कारणों पर विमर्श कर उनके संरक्षण-संवर्धन के लिये ठोस नीति तैयार करने हेतु सुझाव देंगे। 
3/ विलुप्त होती विधाओं जैसे लोक गायन और लोक वाद्य पर पांच दिवसीय कार्यक्रम जिसमें दिन में डिमान्सट्रेशन लेक्चर और सायंकालीन प्रस्तुतियों का आयोजन किया जाए। 
4/ तदन्तर संरक्षण-संवर्धन के लिए योजना तैयार कर उसका मैदानी स्तर पर क्रियान्वयन की कार्यवाही की जाए। 

मान्य होने पर बजट प्रस्ताव तैयार कर प्रस्तुत किया जा सकेगा।