Tuesday, September 22, 2026

अपने अपने राम

रामकथा को आधार बना कर अभिव्यक्ति के कौन-कौन से अनूठे आयाम का संधान संभव है इसका उदाहरण है भगवान सिंह की यह पुस्तक ‘अपने अपने राम‘। राम का चरित्र वर्ण कुव्यवस्था के खिलाफ और समावेशी राजनय के व्याख्याकार के रूप में गढ़ा गया है। स्वाभाविक ही युवराज और राजा राम के चारों ओर राजनयिक षडयंत्र का वातावरण बना रहता है। उनके समक्ष (मुख्यतः कैकेयी और वशिष्ठ द्वारा) प्रतिकूल स्थितियां लगातार निर्मित होती हैं, मगर धैर्य, न्यायप्रियता, निष्ठा, सच-ईमान वाले व्यवहार व वाक्-कौशल, मानवीय संवेदना पर कायम रहते राम, मर्यादा पुरुषोत्तम स्थापित होते हैं। 

राज-काज और राजघरानों के प्रसंग में कई बातें बड़े पते की आई हैं, जैसे- ‘राजघरानों में आधे संकट दुस्साहस से पैदा होते हैं, आधे भीरुता से‘ ... ‘रूढ़िग्रस्तता का भी अपना अर्थशास्त्र और मूर्खता का भी अपना तर्कशास्त्र होता है।‘ ... राजा अपने लिए राज्य नहीं करता। राष्ट्रहित के लिए ही वह शासन करता है। राष्ट्रहित से ही राजा मित्रों और शत्रुओं का निश्चय करता है और यह मैत्री और शत्रुता भी स्थायी नहीं होती, प्रासंगिक होती है। ... राज परिवारों में अभिधा से अधिक व्यंजना ही समझ में आती है। यदि कोई बात सहज ढंग से कही गई हो तो भी वे उसमें से व्यंजना की खोज करके ही दम लेते हैं। ... राजनय और व्यक्तिगत गुणों के संदर्भ में लक्ष्मण का विचार है कि अनन्यता और आत्मीयता स्थापित करना राम की शक्ति है। और राम कहते हैं- ‘यदि कोई व्यक्ति या प्राणी तुम्हारे मन में घृणा पैदा करने में सफल हो गया तो समझो, वह जीत गया, तुम हार गए।‘ 

प्रोपोगैंडा और आधुनिक ट्रोल के संदर्भ में इस अंश को पढ़ना रोचक होगा- ‘एक बार विकसित हो जाने पर इस पर उन जनों का अधिकार हो जाएगा जिनके विरुद्ध पण्डितों और पुरोहितों का प्रचारतन्त्र काम करता है। यह है कुशीलवों और गाथाकारों की परम्परा। नाटकों, गायनों और स्वांगों की परंपरा। कथावाचकों और कथाकारों की परंपरा। नर्तकों, विटों और भांड़ों और भाटों की परम्परा। इससे उन सभी सम्भावित दूषकों और दुष्प्रचारों को निरस्त किया जा सकेगा, लक्ष्मण।‘ 

विश्वामित्र जिनका कथन आता है- ‘राजा को अपने गुरु की छाया से, यथासम्भव, दूर ही रहना चाहिए। उसके परामर्श भी आदेशवत हो जाते हैं। इससे राजा को स्वतंत्र निर्णय लेने में बाधा पड़ती है।‘ पुस्तक में औचित्यहीन ब्राह्मणवादी यज्ञ-व्यवस्था के ‘इष्ट‘ के बजाय लोक हितकारी ‘पूर्त‘ प्रतिष्ठा की अंतर्धारा का मद्धिम मगर स्थायी और दृढ़ स्वर है। ऐसा लगता है कि विश्वामित्र का चरित्र स्वयं लेखक के चिंतन का स्वरूप है और राम के कथन, उसकी अभिव्यक्ति। 

सनातन रूढ़ नहीं होता जीवंत होता है। वह सनातन, जो शास्त्रों में ‘एष धर्मः सनातनः‘ है और बुद्ध वचन में ‘एस धम्मो सनंतनो‘ है। यहां लेखक भी उसी सनातनता के पक्षधर है, जो तार्किक, विवेकपूर्ण और वास्तविक यानी सर्वकालिक अतएव युगानुकूल परिवर्तनशील है। वसिष्ठ से राम की असहमति में यह रेखांकित होता है- ‘राम ने हाथ जोड़ लिए थे, जो तर्क की आँच न सह सके उस शास्त्र के विधान से कम से कम राम को बचाए रहें, आचार्य।‘ ... और कहते हैं- ‘शास्त्र और धर्म तो युग के अनुरूप बदलते हैं आचार्य।‘ जिस पर प्रतिक्रिया आती है- ‘राम कुछ भी कर सकते हैं। वह न किसी शास्त्र को मानते हैं, न किसी व्यवस्था को। कहते हैं, मनुष्य को आत्म-प्रमाण होना चाहिए।‘ या यह अंश- ‘कृत्याकृत्य की कसौटी शास्त्र नहीं, मनुष्य का अपना विवेक है।‘ इस क्रम में वे देवताओं के आलोचक और मनुष्यत्व के पक्षधर भी दिखाए गए हैं, कुछ इस तरह- ‘देवता मनुष्य से निकृष्ट होता है और वह कपटी लोगों का मानस पुत्र होता है।‘ 

वर्ण-व्यवस्था की रूढ़ि पर बार-बार आघात है- ‘कितना व्यर्थ है जन्म और रक्त की श्रेष्ठता का दंभ! कितनी मूर्खतापूर्ण है वर्णों की यह सीमा।‘ ... ‘यदि श्रेष्ठता-कनिष्ठता का आधार अलग-अलग अंगों से जन्म लेना हो तो इन वर्णों के लोगों को आज भी उन्हीं-उन्हीं अंगों से जन्म लेना चाहिए।‘ ... ‘आज तो सभी ब्राह्मण, क्षत्रिय उसी रीति से पदा होते हैं जैसे शूद्र। सभी का जन्म माँ के गर्भ से होता है अतः सभी जन्म से शूद्र ही पैदा होते हैं। जिन्हें उचित संस्कार मिल जाता है वे द्विज हो जाते हैं, ब्राह्मण और क्षत्रिय और वैश्य बन जाते हैं, जिन्हें यह सुलभ नहीं वे शूद्र रह जाते हैं। यदि उन्हें भी उचित संस्कार मिलें तो वे भी द्विज बन सकते हैं।‘ ... क्या उस वेद के महात्म्य को स्वीकार किया जा सकता है आचार्य, जो एक शूद्र को पवित्र नहीं कर सकता, पर उसके उच्चारण मात्र से स्वयं अपवित्र हो सकता है? तब तो मानना होगा कि शूद्र वेद से भी अधिक शक्तिशाली है। वेद उसे प्रभावित नहीं कर सकता, पर वह वेद को प्रभावित कर सकता है! 

पुस्तक के ऐसे कई अंश, वस्तुतः तार्किक और शास्त्र-मर्यादित अभिव्यक्तियां, सतही तौर पर धर्म और आस्था विरुद्ध मानी जा कर उद्वेलित कर सकती हैं। मगर उद्भट विद्वान लेखक ने धर्मशास्त्रों का गहराई से अवगाहन किया है, स्पष्टता की चमक उनके लेखन की पहचान है। वैदिक, पौराणिक, महाकाव्यीय और लौकिक प्राचीन संदर्भों के सजग और प्रखरता व्याख्याकार हैं, तभी ऐसी महत्वपूर्ण क्रांतिकारी कृति पाठकों को उपलब्ध हुई है।

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