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Saturday, November 1, 2014

रेरा चिरइ


रेरा चिरइ, रम चूं... चूं... चूं
मोर नरवा तीर बसेरा
रोवत होही गदेला, रम चूं... चूं... चूं
रम चूं... चूं... चूं

सब झन खाइन कांदली
मैं पर गेंव रे फांदली, रम चूं... चूं... चूं
मोला सिकारी उड़ान दे
मोर मुंह के चारा ल जान दे, रम चूं... चूं... चूं

मोर रद्‌दा ल जोहत होही
भुख-पियासे म रोवत होही, रम चूं... चूं... चूं
नई उघरे उंकर रे आंखी
नई जामे हे डेना अउ पांखी, रम चूं... चूं... चूं

बछरू ल गाय पियात हे
ओला देख के सुरता आत हे, रम चूं... चूं... चूं
सुरुज बुड़े बर जात हे
लइकोरहिन लइका खेलात हे, रम चूं... चूं... चूं

सिकारी कहिस रे चिरइया
तंय मोर भूख मिटइया, रम चूं... चूं... चूं
लइका संग हंड़िया उपास हे
तोर काया ले सबके आस हे, रम चूं... चूं... चूं

गरीबी महा दुखदाई
मै काला बतावंव चिराई, रम चूं... चूं... चूं
मैं तोला बेंचे बर जाहूं
बलदा म चाउंर बिसाहूं, रम चूं... चूं... चूं

तोर दुखड़ा ल लइका ल बताहूं
मैं होत बिहाने आहूं, रम चूं... चूं... चूं
फेर मोला बेंच के खा ले
तंय भूख के आगी बुझा ले, रम चूं... चूं... चूं

अंधियार म रेरा भटक गे
गर म कांटा खबस गे, रम चूं... चूं... चूं
भुंइया म गिरे गदेला
रोवत हे माटी के ढेला, रम चूं... चूं... चूं

खोजत सिकारी ह आइस
मरे देख पछताइस, रम चूं... चूं... चूं
गदेला ल छू छू देखय
रेरा ल देख के रोवय, रम चूं... चूं... चूं

नई मारे के खाइस किरिया
मै निच्चट पांपी कोढ़िया, रम चूं... चूं... चूं
अब नांगर बइला बिसाहुं
मै धान कोदो ल जगाहूं, रम चूं... चूं... चूं

अब चहकय रेरा के डेरा
उठावै नांगर के बेरा, रम चूं... चूं... चूं
लइका संग खेलय गदेला
अब नइये कउनो झमेला, रम चूं... चूं... चूं

श्री सनत तिवारी
कैफियत- खरौद के बड़े पुजेरी कहे जाने वाले पं. कपिलनाथ मिश्र का अनूठा काव्यात्‍मक पक्षीकोश ''खुसरा चिरई के ब्याह'' है। छत्तीसगढ़ में पक्षियों पर अन्य रचनाएं भी हैं, इन्हीं में एक लोरीनुमा यह गीत ''रेरा चिरइ'' है। रेरा या सुहेरा छत्तीसगढ़ में बया को कहा जाता है। इस पारंपरिक गीत के कुछ ही शब्द और टूटी-फूटी पंक्तियां मिलती थीं। कभी बातों में बिलासपुर के श्री सनत तिवारी जी ने ''रेरा अउ सिकारी के गोठ'' कविता, पूरे लय और मार्मिकता सहित गा कर सुना दी। मैं चकित रह गया, फिर पंक्तियों को दुहरा कर ध्यान दिया तो संदेह हुआ कि क्या पारंपरिक, पुराना स्वरूप ऐसा ही था। वन-पर्यावरण के प्रति सदैव सजग सनत जी ने सहजता से स्वीकार किया कि गीत कुछ-कुछ ही ध्यान में था, क्योंकि बचपन में दादी-नानी से ''रम चूं... चूं... चूं, रम चूं... चूं... चूं'' बार-बार सुनते नींद आ जाती थी, बाद में अपनी ओर से शब्द और पंक्तियां जोड़ कर यह गीत बनाया है, अब इसे छत्तीसगढ़ी का पारंपरिक गीत कहें या सनत जी की मौलिक रचना, बहरहाल मुझे अत्यंत प्रिय है और सनत जी से सस्वर सुनने का अवसर मिले फिर तो वाह, इसके क्या कहने, एकदम रम चूं... चूं... चूं ... ... ...

इस छत्‍तीसगढ़ी पद्य को पहली बार हिन्‍दी में अनुवाद का प्रयास किया है-

बया चिड़िया कहती है, नाले के पास मेरा बसेरा है, (वहां मेरा) चूजा रो रहा होगा.

सब ने चारा चुगा, (लेकिन) मैं फंदे में पड़ (फंस) गई, शिकारी मुझे उड़ जाने दो, मेरे मुंह के चारा को (ले) जाने दो.

(चूजा) मेरा रास्ता (जोह) देख रहा होगा, भूख-प्यास से रो रहा होगा, (अभी) उसकी आंखें नहीं खुली हैं, पंख-डैने नहीं (उगे) जमे हैं.

बछ्ड़े को गाय (दूध) पिला रही है, उसे देख कर मुझे (अपने बच्चों की) याद आ रही है, सूर्य डूबने जा रहा है, जच्चा बच्चे को बहला रही है.

शिकारी चिड़िया से कहता है, तुम मेरी भूख मिटाने वाली हो, मेरा लड़का हांडी सहित (बिना निवाले के) उपवास है, तुम्हारी काया से (पेट भरने की) सबकी आस है.

गरीबी महा दुखदाई है, मैं किसे बताऊं चिड़िया, मैं तुम्हें बेचने जाऊंगा, बदले में चावल खरीदूंगा.

(‍चिड़िया मोहलत मांगते हुए कहती है) मैं तुम्हारा कष्ट अपने चूजे को बताऊंगी, मैं सुबह होते ही आ जाऊंगी, फिर मुझे बेच कर (चावल) खा लेना, तुम (अपने) भूख की आग बुझा लेना.

(मोहलत पा कर अपने बसेरे के लिए वापस लौटते हुए) अंधेरे में चिड़िया भटक गई, (उसके) गले में कांटा चुभ गया, (उधर) चूजा जमीन पर गिर गया, (वहां अगर कोई रोने को है, तो बस) मिट्टी का धेला रो रहा है.

(चिड़िया के वापस न लौटने पर) शिकारी खोजते हुए आया, (चिड़िया को) मरा देख कर पछताया, चूजे को छू छू कर देखता है, ‍चिड़िया को देख कर रोता है.

(शि‍कारी) शिकार न करने की कसम खाता है, (सोचता है) मैं घोर पापी, आलसी हूं, अब हल-बैल खरीदूंगा, मैं धान-कोदो उपजाऊंगा.

अब बया के घोंसले में चहक (रौनक) है, (शिकारी के) हल उठाने का समय है, चूजा (शि‍कारी के) बच्चे के साथ खेल रहा है, अब कोई झमेला नहीं है.

प्रसंगवश, छत्तीसगढ़ी में शिकारी और चिडि़या के अन्य कई मार्मिक प्रसंग सुनाए जाते हैं, जैसे- ''तीतुर फंसे घाघर फंसे, तैं का बर (या तूं कइसे) फंस बटेर, मया पिरित के फांस म आंखी ल देहें लड़ेर।'' आशय कि शिकारी ने जाल फैलाया, जाल के छेद इतने बड़े थे कि उसमें तीतर और घाघर फंसे, लेकिन छोटी चिडि़या बटेर को भी फंसी देख कर शिकारी पूछता है कि तुम कैसे फंस गई। बटेर जवाब देती है- तुम्हारे जाल में नहीं, बल्कि (जिनके साथ दाना चुग रही थी, उनका साथ निभाने) ममता-प्रीति के फंदे में फंसी आंखें बंद कर पड़ी हूं। 

छत्तीसगढ़ी लोक मन का  'मा निषाद प्रतिष्ठां...' कम मार्मिक नहीं। और ध्यातव्य, 'नैषधीयचरित' में नल द्वारा पकड़ लिये जाने पर हंस कहता है- 
मदेकपुत्रा जननी जरातुरा नवप्रसूतिर्वरटा तपस्विनी। गतिस्तयोरेष जनस्तमर्दयन्नहो विधे त्वां करुणा रुणद्धि नो॥ 
(मैं अपनी माँ की एकमात्र संतान हूँ। मेरी माँ वृद्धावस्था से आकुल है। मेरी हंसिनी ने अभी-अभी चूजे जन्मे हैं। इन दोनों का मैं ही अकेला सहारा हूँ। हे विधाता, ऐसे मुझको मारते हुए क्या तुम्हें करुणा रोक नहीं रही?)

Tuesday, April 23, 2013

गुलाबी मैना

तिलयार नाम सुनते ही रोहतक की झील (और ब्लागर मीट) याद आती है, लेकिन यह एक चिड़िया का भी नाम है। मैना परिवार की इस चिड़िया का नाम तिल्‍यर या तेलियर जैसा भी उच्‍चारित होता है। गुलाबी मैना कही जाने वाली इस चिडि़या का मधुर कन्नड़ नाम है, मधुसारिका। अंगरेजी नाम रोजी स्टारलिंग, रोजी पास्टर या रोजकलर्ड स्टारलिंग है।
नवा-नइया तालाब के आसमान पर शाम का नजारा
इनसेट में 24 मई 2000 को जारी डाक टिकट
संकरी-पेन्ड्रीडीह बाइपास मार्ग पर बिलासपुर से लगभग 15 किलोमीटर दूर बेलमुड़ी (बेलमुण्डी) गांव में नवा तालाब को घेरे, अर्द्धचंद्राकार लंबाई में फैला नइया तालाब सड़क से दिखता है। तालाब के 'पुंछा' वाले हिस्से में 'पटइता' घास है। नइया तालाब का यह भाग लाख संख्‍या में अनुमान की जाने वाली गुलाबी मैना का डेरा बना और इन तालाबों के ऊपर शाम करीब पांच बजे से साढ़े छः बजे तक आकाश में पक्षी-झुंडों की करतबी उड़ान का नजारा और उसकी चर्चा मार्च के अंतिम सप्ताह से अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक रही।

2 अप्रैल 2013 के दैनिक नवभारत, बिलासपुर में प्रकाशित सचित्र समाचार में इन पक्षियों का मूल एशिया, यूरोप, रसिया(!) और कनाडा बताया गया है। यहां डीएफओ हेमंत पाण्डे के हवाले से इन्हें ब्लैक हेडेड गुल(!?गल) कहा गया है। 6 अप्रैल 2013 के दैनिक भास्कर, बिलासपुर में सचित्र समाचार प्रकाशित हुआ, जिसमें पक्षियों को मध्य यूरोप, एशिया और कनाडा से आए तथा पक्षियों के जानकार केके सोमावार और पर्यावरण प्रेमी अनुराग शुक्ला का उल्लेख करते हुए उनके हवाले से इन्हें रोजी पेस्टर या ब्लैक हेडेड गुल प्रवासी पक्षी बताया गया।
पेड़ पर पत्तियां नहीं, चिडि़यों का झुंड है.
प्राण चड्‌ढा जी बताते हैं कि बसंत पंचमी (इस वर्ष 15 फरवरी) को आ जाती है, नवरात्रि में (इस वर्ष 18 अप्रैल तक) लौटती है। कमल दुबे जी ने अवधि फरवरी तीसरे हफ्ते से मार्च अंत तक बताई है। कुछ फोटो रमन किरण जी से मिले। गांव वालों ने बताया कि फरवरी में ही आने लगी थीं, लेकिन शिवरात्रि, 10 मार्च के आसपास बड़े झुंडों में दिखने लगीं और 10 अप्रैल तक वापसी हुई।

इस पक्षी की कुछ जानकारी पुस्तकों और नेट पर तो मिली, लेकिन इन विवरणों से उस दृश्य का अनुमान भी नहीं होता, जो यहां रहा-

यह रिकार्डिंग चि. यश, सौ. शुभदा और विवेक जोगलेकर जी ने की है।
दूसरी रिकार्डिंग कमल दुबे जी की है, लेकिन इसके पहले 35 सेकंड का हिस्सा बीत जाने दें।
एक अन्य रिकार्डिंग राजेश तिवारी जी ने लगाई है।
इन्‍हें देखकर Bezier Screensaver याद आता है।
पक्षियों से भरा तालाब अब रीता है.
बेलमुड़ी पहुंचा हूं, तालाब मौजूद है और गांव वालों में पिछले दिनों की यादें, किस्से, उसका रोमांच भी। चिड़ियों को जगह भा गई और लगता है पक्का रिश्ता बन गया है। मुझे पहुंचने में देर हो गई या शायद समय से दस-ग्यारह महीने पहले आ गया।

Saturday, June 23, 2012

रॉबिन

मौसम-मिजाज से, न खैर-खबर से, कभी तो सलाम-बंदगी भी रह जाती है, जब मोहित साहू जी से बात शुरू होती है। वे पूछ रहे हैं, पिछले साल की पंडुक, गौरैया, लिटिया के बारे में, मेरे पास जवाब खाली है, बचने को कहता हूं, पिछले दिनों व्‍यस्‍त रहा खुसरा चिरई के ब्‍याह में, कुछ नया बताऊंगा इस साल। मई का आखिरी हफ्ता। नवतपा की दोपहर। याद कर रहा हूं, इस मौसम में भी सक्रिय रॉबिन के जोड़े को। सोचता हूं, उन पर ध्यान दूं, शायद मोहित जी से अगली बातचीत तक कोई जवाब बन जाए।

रॉबिन?, यह किस चिड़िया का नाम है। इसका पूरा नाम इंडियन रॉबिन है यानि Saxicoloides fulicata या हिन्दी में कलचुरि और छत्तीसगढ़ी में कारीसुई (और इसकी जोड़ीदार मैगपाई रॉबिन छत्तीसगढ़ में बक्सुई कही जाती है)। हमारे लिए आमतौर पर इंडियन या मैगपाई रॉबिन के बजाय रॉबिन ब्ल्यू अधिक सुना गया शब्द है, जो लगभग नील का पर्याय था और इसी के कारण मैं मानता था कि रॉबिन का रंग नीला होता होगा, बहुत बाद में पता लगा कि नीली रॉबिन हिमालय की तराई, म्‍यांमार, पश्चिमी घाट और श्रीलंका में तो होती है लेकिन इस अंचल के लिए रॉबिन का नीलापन विसंगत है।

इस चिड़िया के नाम कलचुरि-इंडियन रॉबिन के साथ रॉबिनहुड, रॉबिन ब्ल्यू नील, नील की तीन कठिया खेती, चम्पारण, स्वाधीनता संग्राम, गांधी जी, कलचुरि राजवंश ... ... यानि प्रकृति, पर्यावरण, भूगोल, पुरातत्व-इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र, राष्ट्रीयता, शौर्य, लोकोपकार, सब कुछ जुड़ जाता है, लेकिन फिलहाल तो ललित निबंध लिखने का कोई इरादा नहीं है। यह पोस्ट रॉबिन चिड़िया की जानकारी के लिए भी नहीं है, क्‍योंकि चिड़ियों के मामले में मेरी जानकारियों की तुलना में रुचि का पलड़ा एकतरफा भारी होता है। जानकारी के लिए पहल करने वाले मोहित साहू जी, विवेक जोगलेकर जी सहज उपलब्ध हो जाते हैं और फिर भी कुछ न निपट पाए तो सालिम अली हैं, जिन्होंने चिड़ियों के पीछे पूरा जीवन बिता दिया, उनकी पुस्तक देख लेता हूं और उनके काम और जीवन की सार्थकता को अपने-आप में पुष्ट करता रहता हूं।

मोहित जी से पिछले हफ्ते फिर बात हुई, मैं आगे बढ़ कर बताने लगा। रोजाना के रास्ते में, मेरी पहुंच में, बस नाम की ओट में, अहिंसा की प्रतिमूर्ति तीर्थंकर पार्श्‍वनाथ प्रतिमा (निबंध लिखना हो तो अब धर्म भी है और कला भी) की छत्रछाया में रॉबिन का जोड़ा अपने चूजे पाल रहा है। मोहित कहते हैं कि यह चिड़िया अपने घोंसले की सफाई का खास ध्यान रखती है, चूजे का पोषण चिड़ा, चिड़ी दोनों करते हैं और कई तरह की ढेरों जानकारियां, इसलिए फिलहाल मुझे न सालिम अली की जरुरत है न गूगल की। अपनी रुचि के अनुकूल अवसर है। चूजे तो बेझिझक हैं ही, चिड़ा-चिड़ी का रवैया भी सहयोगी है, सो कुछ तस्वीरें निकल आई हैं-


चिड़ी का चुग्‍गा

घोसले के आसपास चिड़ा-चिड़ी

अब चिड़े की बारी
लगभग महीने भर का वक्‍त, रॉबिन के पलने-पालने में उनके लिए किस तरह पल-पल बीता होगा, मेरे लिए तो समय के मानों पर लग गए और वह पंछी की तरह फुर्र हुआ।

Monday, June 11, 2012

खुसरा चिरई

औद्योगिक तीर्थ भिलाई, दुर्ग के साथ मिलकर छत्‍तीसगढ़ का जुड़वा शहर और कला-संस्‍कृति तीर्थ भी है। आसपास ऐसे कुछ अन्‍य तीर्थ हैं- पद्मभूषण तीजनबाई का गांव गनियारी, बिसंभर यादव मरहा और दाउ रामचंद्र देशमुख का बघेरा, देवदास बंजारे का धनोरा, दाउ महासिंग चंद्राकर का मतवारी, फिदाबाई का सोमनी, झाड़ूराम देवांगन का बासिन, पद्मश्री पूनाराम निषाद और भुलवाराम का रिंगनी और खड़े साज नाचा का जोड़ा गांव दाउ मंदराजी का रवेली, देवार कलाकारों का डेरा, दुर्ग का सिकोलाभांठा, पचरीपारा, दुर्ग वाले गुरुदत्‍त-परदेसी (राम बेलचंदन) और दुर्ग के शहरी आगोश में समाया, लेकिन विलीन होने से बचा गांव पोटिया।

पोटिया (वरिष्‍ठ हास्‍य अभिनेता शिवकुमार दीपक भी इसी गांव के हैं) में केदार यादव के परम्‍परा की स्‍मृति है। अपने दौर से सबसे लोकप्रिय छत्‍तीसगढ़ी गायक केदार की प्रतिभा ''चंदैनी गोंदा'' के मंच पर उभरी और उसके बाद ''नवा बिहान'' की शुरुआत हुई। उनसे ''तैं बिलासपुरहिन अस अउ मैं रयगढि़या'' और ''हमरो पुछइया भइया कोनो नइए ग'', जैसे रामेश्‍वर वैष्‍णव के गीत सुनना, अविस्‍मरणीय हो जाता। पहले गीत की मूल पंक्ति ''आज दुनों बम्‍बई म गावत हन ददरिया'' में बम्‍बई को बदलकर उस स्‍थान का नाम लिया जाता, जहां कार्यक्रम प्रस्‍तुत किया जा रहा हो और इसी तरह दूसरे गीत में ''ए भांटो'' का महिला स्‍वर आते ही लोग झूम जाते। केदार के साथ पूरी परम्‍परा रही, जिसमें उनकी जीवनसंगिनी-सहचरी साधना, उनके भाई गणेश उर्फ गन्‍नू यादव और उनकी जीवनसंगिनी-सहचरी जयंती तथा अन्‍य कलाकार भाई पीताम्‍बर, संतोष रहे हैं।

झुमुकलाल जी की विरासत
  के साथ गन्‍नू यादव
पूरे परिवार को संगीत के संस्‍कार मिले पिता झुमुकलाल यादव से, जो परमानंद भजन मंडली के सदस्‍य थे। पचास-साठ साल पहले रायपुर-दुर्ग में सैकड़ों ऐसी मंडलियां थीं, जिनमें मुख्‍यतः बद्रीविशाल परमानंद के गीत गाए जाते थे। झुमुकलाल, बद्रीविशाल जी के साथी थे, उनकी औपचारिक शिक्षा की जानकारी नहीं मिलती, लेकिन जिस सजगता और व्‍यवस्थित ढंग से उन्‍होंने गीत-परम्‍पराओं का अभिलेखन कर उन्‍हें सुरक्षित किया, वह लाजवाब है। इस अनमोल खजाने में अप्रत्‍याशित ही ''खुसरा चिरई के ब्‍याह'' मिल गई। खरौद के बड़े पुजेरी कहे जाने वाले पं. कपिलनाथ मिश्र की यह रचना, (ऐसे ही शीर्षक की रचनाकार के रूप में जगन्‍नाथ प्रसाद 'भानु' का नाम भी मिलता है) खूब सुनी-सुनाई जाने वाली, मेलों में बिकने वाली, लेकिन लगभग इस पूरी पीढ़ी के लिए सुलभ नहीं रही है। बिलासा केंवटिन के गीत में जिस तरह सोलह मछलियों से सोलह जातियों की तुलना है उसी तरह यहां कविता क्‍या, आंचलिक-साहित्यिक, परम्‍परा और पक्षी-विज्ञान की अनूठी आरनिथॉलॉजी है यह-

खुसरा चिरई के ब्याह

     टेक जांघ बांध जघेंला बांध ले, और केड़ के ढाला
     खुसरा चिरई के ब्याह होवत है, नेवतंव काला काला
1   एक समय की बात पुरानी, सुनियों ध्यान लगानी
     बड़े प्रेम से कहता हू मैं, खुसरा चिरई के कहानी
2   एक समय का अवसर था, सब चिड़ियों का मेला
     खुसरा बिचारा बैठे वहां पर, पड़ा बड़ा झमेला
3   बड़े मौज से घुसरा बैठे, घुघवा करे सलाव
     खुसरा भइया तैं तो डिड़वा, जल्दी करव बिहाव
4   कौन ल भेजय सगा सगाई, कौन ल बररौखी
     कौन ल पगरहित बनावंय, कौन सुवासा चोखी
5   नंउवा कौंवा करे सगाई, कर्रउवा बररौखी
     पतरेगिया ल पगरहित बनाइस, सुवा सुवासा चोखी
6   बामंन आवे लगिन धरावंय, मंगल देवय गारी
     आन जात ल नरियर देवय, जात ल पान सुपारी
7   बिल ले निकरय बिल पतरेगिया, हाथे में धरे सुपारी
     भरही चिरैया कागज हेरे, चांची लगिन बिचारी
8   काकर हाथ में तेल उठगे, काकर हाथ में चाउंर
     कौन बैठगे लोहा पिंजरवा, कौन बैठगे राउर
9   पड़की हाथ में तेल उठगे, परेवना हाथ में चाउंर
     सुवा बैठगे लोहा पिंजरवा, कोयली बैठगे राउर
10 अवो नवाईन लबक लुआठी, चल चुलमाटी जाइन
     लाव लसगर नगर बलुउवा, गीत मनोहर गाइन
11 कठवा ले कठखोलवा बोलय, सुन रे खुसरा साथी
     बने बने मोला नेवता देबे, ठोनक देहंव तोर आंखी
12 दहरा के नेवतेंव दहरा चिरैया, नरवा के दोई अड़ंवा
     कारी अऊ कर्रउंवा ला नेवतेंव, तेला बनावय गड़वा
13 इहां के समधिन कारी हावंय, उंहा के समधीन भूरी
     ईहां के समधिन नकटायल है, उहां के समधिन कुर्री
14 छोटे दाब अैरी के नेवतेंव, कोयली देवय गारी
     मकुट बांध के सारस आवे, कुर्री के दल भारी
15 कौन चिरई मंगरोहन लावे, कौन गड़ावे मड़वा
     कौन चिरई करसा लावे, घर घर नेवते गड़वा
16 मंग रोहन चिरई मंगरोहन लावे, कन्हैया गड़ावे मड़वा
     पतरेगिया हा करसा लावे, घर घर नेवते गड़वा

17 पीपर पेड़ के भरदा नेवतेंव, अऊ नेंवतेंव मैं चाई
     टाटी बांधय तबल के बरछी, दल में मजा बताई
18 आमाडार ले कोयली बोलय, लीम डार ले कौंवा
     कर्री बाज के देखे ले मोर, जीव खेले डुब कइंया
19 भुइंया के भुई लपटी नेवतेंव, अऊ नेव तेंव मैं चुक्का
     खुसरा के बिहाव में सब, भरभर पीवे हुक्का
20 खुसरा दीखय दुसरा 2, मूढ़ हवय ढेबर्रा
     वोकर पांव है थावक थइया, चोच हवय रन कर्रा
21 अटेर नेवतेव बटेर नेवतेंव, अऊ नेवतेन नटेर
     बड़े बड़े ल मुढ़ पटका पटकेंव, तुम्हरे कौन सनेर
22 ओती ले आवय लावा लशगर, ओती ले आवय बाजा
     बनत काम ल मत बिगारव, तोला बनाहू राजा
23 सब चिड़िया ला नेवता बलाके, खुसरा बनगे राजा
     चेंपा नांव के चिरई ला लानय, तेला धरावय बाजा
24 पानी के पनडुबी ल नेवतेंव, घर के दूठन पोई
     धन्य भाग वो खुसरा के, मन चुरनी के घर होई
25 हरिल चिरैया हरदी कूटय, गोड़रिया कूटय धान
     खुसरा के बिहाव में सब, हार दिंग मताइन
26 इधर काम ले फुरसत पाके, भरदा बैठय तेलाई
     लडु़वा पपची बनन लागे, तब मेछा ल टेंवय बिलाई
27 कौन कमावे रनबन 2, कौन कमावे मन चीते
     कौन बैठगे भरे सभा में, झड़े भड़ौनी गीदे
28 पड़की कमावे रनबन 2, परेवना कमावे मन चीते
     बलही बैठगे भरा सभा में, झड़े भड़ौनी गीदे
29 अपन नगर से चले बराता, गढ़ अम्बा में जाइन
     धूमधाम परघौनी होवय, गीत मनोहर गाइन
30 दार होगे थोरे थोरे, बरा होगे बोरे
     आधा रात के आये बरतिया, दांत ल खिसोरे
31 गांव निकट परघौनी होवय, दुरभत्‍ता खाये ल आइन
     लड़ुवा पपची पोरसन लागय, चोंच भर भर पाइन
32 सबो चिरई समधी घर जाके, खुसरा ल खड़ा करावय
     वैशाख शुक्ल अऊ सत्पमी, बुधवार के भांवर परावय
33 एक भांवर दुसर तीसर, छटवें भांवर पारिन
     सात भांवर परन लागिस, तब खुसरा मन में हांसिन
34 खुसरा हा खुसरी ला पाइस, बाम्‍हन पाइस टक्का
     सबो बरातिया बरा सोहारी, समधी धक्का धक्का

35 सोन चांदी गहना गुठ्‌ठा, अऊ पाइन एक छल्ला
     रूपिया पैसा बहुत से पाइन, नौ खाड़ी के गल्ला
36 सूपा टुकना चुरकी सुपली, खुसरा दाईज पाईन
     गढ़ अम्बा से बिदा कराके, अपन नगर में आईन
37 गांव के बाहिर डोला आवय, तब गिधवा डोला उतारय
     बेटा ले बहुरिया बड़े, कइसे दीन निकारय
38 सबो चिरई खुसरा घर आके, नेवता खायेला बैठिन
     गरूड़ चिरैया पूछी मरोड़य, कर्रा मेछा ऐठिन
39 कोने ल देवय सोन चांदी, कोनो ल देवय लुगरा
     कोनो ल देवय लहंगा साया, कोनो ल देवय फुंदरा

आरंभ वाले संजीव तिवारी और बस्‍तर बैंड वाले अनूप रंजन, तीर्थ-लाभ हम तीनों ने साथ-साथ लिया, लेकिन प्रसाद वितरण का जिम्‍मा मैंने ले लिया।

यहां आए सभी नामों के प्रति आदर-सम्‍मान।

Thursday, September 1, 2011

लिटिल लिटिया

गौरैया के बाद पंडुक, फिर पंडुक-पंडुक, और अब लिटिया। आकार से लगता है कि अंग्रेजी के लिटिल और लिटिया नामधारी इस छोटी सी चिडि़या का कोई रिश्‍ता जरूर होगा। लिटिया यानि दरजी, फुटकी या टेलर बर्ड- Orthotomus sutorius। घोंसला-माहिर इस चिडि़या को बया यानि वीवर बर्ड के साथ याद किया जाता है। बया, बुनकर तो लिटिया, दरजी। लिटिया पत्‍तों और तिनके-डंठल को आपस में मिलाकर घोंसला रचती है। छत्‍तीसगढ़ के कई लिटिया/लटिया गांवों को शायद इसी से नाम मिला है।

यह चिडि़या आसपास हो तो इसके चहचहाने की आवाज के बाद इसकी काया जितनी लंबी और खास ढंग से उठी पूंछ, इस चंचल जीव की ओर जरूर ध्‍यान खींचती है। कुछ दिनों से घर की बैठकी के पास पारिजात, हरसिंगार, शेफाली या जास्‍मीन जैसे मधुर नाम (Nyctanthes arbor-tristis नाम से तो घबराहट होती है) वाले पेड़ पर अधिक फुदकती।
तब हमारा ध्‍यान गया कि जहां वह बार-बार आ कर बैठ रही है वहां एक छोटा घोंसला है, पत्‍तों में ओझल-सा।
अवसर पाकर घोंसले में झांका, वह यहां आप भी देखिए-
छोटी सी बात, बस इत्‍ती-सी। छत्‍तीसगढ़ी शब्‍द खोन्‍धरा (गांव का नाम भी) होता है घोंसला, खोता, नीड़ का समानार्थी और आशियाना या घरौंदा के अर्थ में भी प्रयुक्‍त होता है, लेकिन सोच रहा हूं कि घोंसला तो सौरघर, प्रसूति गृह के अधिक निकट का अर्थ देता है। पैतृक निवास से स्‍वेच्‍छया विस्‍थापित बसेरे से दूर, नीड़ का निर्माण कर वास करते मुझे, अब घर से खबर आई है, इन चूजों के उड़ जाने की।

(तस्‍वीरें, 22-23 अगस्‍त 2011, बिलासपुर, छत्‍तीसगढ़ की)

Tuesday, June 21, 2011

पंडुक-पंडुक

पंडुक, पंडुक से पंडुक-अंडा फिर पंडुक-बच्‍चा और फिर पंडुक-पंडुक। पिछली पोस्‍ट पंडुक का वाक्‍य है- ''अंडों में सांस ले रहे पंडुकों की करवट, का हाल परिशिष्ट बनाकर बाद में जोड़ा जा सकता है।'' उस पोस्‍ट पर उत्‍साहवर्धक टिप्‍पणियां भी मिलीं, जिनमें से एक, संजय जी की थी- ''गुडलक टु पेंडुकी परिवार।'' सुब्रह्मनि‍यन जी ने लिखा- ''अण्डों को सेने के बाद वाली स्थितियां अनुकूल रहें''। अभिषेक जी ने कहा- ''नये पंडुक आयें तो फिर तस्वीर पोस्ट कीजियेगा।'' आशा जोगलेकर जी ने भी इसी तरह की बात कही। अब अच्‍छी खबर है तो लगा, परिशिष्‍ट के बजाय पोस्‍ट क्‍यूं नहीं।

18 मई की अलस्‍सुबह जच्‍चा एकदम सजग-सक्रिय दिखी और अंडे के इस बाइसवें दिन सुबह साढ़े छः बजे पहला चूजा निकला। जच्‍चा, खोज-खबर ले कर, आश्‍वस्‍त दाना-चारा के लिए निकल गई। हमने एक कटोरी में उसके चारे का इंतजाम किया। वह बस हमारा मन रखने को ही मनुहार करती लेकिन चारा चुगने फिर निकल जाती और कटोरी के चारे का जश्‍न मनातीं गौरैया। गौरैया की इतनी चहल-पहल से पंडुक अनमनी होने लगती और कभी पंख भी फड़फड़ाती।
चूजे की हलचल बढ़ गई, वह गमले के किनार तक आ जाता, एक बार तो बाहर गिरते-गिरते बचा। जच्‍चे की अनियतता देख कर लगा कि दखल जरूरी है, सो सावधानी से चूजे को अंडों व पूरे घोंसले सहित उसी जगह पर एक ऊंचे किनार वाले चौड़े गमले में रख दिया।
लगभग तीन घंटे बाद जच्‍चा आई, आधे घंटे थोड़ी विचलित रही, लेकिन जल्‍दी ही एक-दो परिक्रमा कर इस नई व्‍यवस्‍था को अपना लिया। पहले से चार घंटे बाद दूसरा चूजा निकला। दोनों चूजे कभी अलग तो कभी लट-पट होते। जच्‍चा, कभी अंडों के साथ चूजों को भी ढक लेती तो कभी दोनों पर अपनी चोंच आजमाती दिखती।
गमले में चींटियां दिखीं और एक बार फिर व्‍यवस्‍था बदलनी पड़ी। चूजा, यूं दुबका बैठा रहता, लेकिन जच्‍चा, जो सुबह-दोपहर-शाम दिन में तीन बार आती, के आते ही जो दृश्‍य बनता, वह कुछ इस तरह होता।
मई की तारीख पूरी होते-होते चूजे के सिर पर रोएं घने होने लगे, बॉडी लैंग्‍वेज पंडुक की होने लगी और 1 जून को यानि 26 अप्रैल से छठां हफ्ता पूरा होने पर और यह चूजा, अपना तीसरा हफ्ता पूरा होते-होते गमले के बार-लांचिंग पैड पर आ बैठा।
लग‍भग आधे दिन यहीं डोलता-खुद को तोलता रहा और फिर उड़ान भर ली। हम सबको कुछ और समय लगेगा, पंडुक के साथ की आदत बदलने में, अभी तो वह मन में घर किया बैठा ही है।

Monday, May 9, 2011

पंडुक

26 अप्रैल 2011, मेरे लिए अब खास तारीख है। अपने पंछी-प्रेम की घोषणा आसान हो सकती है, लेकिन पंछी भी बच्चों की तरह आप पर आसानी से भरोसा नहीं करते। बड़े होते बच्चों को बहला-फुसला सकते हैं, लेकिन चिड़ियों को नहीं। पालतू बन जाने वाले कुछ पक्षियों को छोड़ दें, लेकिन उनमें भी तोते के लिए कहावत है 'सुआ, सुई और ... एक जाति, जान-पहचान के चलते मुरव्वत नहीं करते, बस नजर चूकी और काम हुआ। ... सालिम अली और जिम कार्बेट के चित्र जरूर देखने को मिलते हैं, जिनमें कोई चिड़िया उनके कंधों पर, हाथ में या हैट पर बैठी हो।

आत्म-केन्द्रित इस पोस्ट की संक्षिप्त भूमिका के साथ पृष्ठभूमि कि हफ्ते भर कभी-कभार और दो-तीन दिन लगभग लगातार एक पंडुक (Dove या Streptopelia senegalensis) दिखाई पड़ने लगी। आती, एकदम सजग। अच्‍छी तरह निरखा-परखा। घर में कोई अबोध-उधमी तो नहीं। सांप, चूहे-बिल्‍ली की तो दखल नहीं। हवा-पानी, सरद-गरम, ओट सब मुआफिक, निरापद। पंडुक पर मेरी भी निगाह बनी रही। मैदानी छत्‍तीसगढ़ में यही चिडि़या पंड़की (बघेलखंड से लगे क्षेत्र में पोंड़की) कही जाती है और अपनी जाति की बुढ़ेल, बनइला, छितकुल, चोंहटी और ललपिठवा से अलग पहचानी जाती है।

दसेक दिन बीतते-बीतते, इस यादगार तारीख 26 अप्रैल को सुबह देखा कि पंडुक ने मेरी नियमित बैठकी से सिर्फ 10 फुट दूर रखे गमले में दो अंडे दिए हैं। 28 अप्रैल को शाम से मौसम खराब रहा, वह रात भर नहीं दिखी, 29 अप्रैल को कम दिखी, फिर अनुपस्थित रही, 3 मई को पुनः दिखाई पड़ी, लेकिन यह चिड़िया आकार में कुछ बड़ी जान पड़ती है, नर जोड़ा तो नहीं ? फिर उसने रात बासा किया और 4 मई को सुबह तीसरा अंडा दिखा। 5 मई को चौथा अंडा भी दिखा। 8 मई को उसने एक अंडा अलग हटा दिया, लेकिन मैंने मान लिया कि पंडुक ने मुझे पक्षी-प्रेमी होने का प्रमाण पत्र दे दिया है। नेचर सोसाइटी और बर्ड वाचिंग क्‍लब की सदस्‍यता लेने का दीर्घ लंबित इरादा फिर मुल्‍तवी।

पंडुक आते-जाते अंडे ''से'' रही है, पूरे धैर्य के साथ, लेकिन मेरा काम सिर्फ निगरानी से तो नहीं चलेगा, मुझे पोस्ट भी तो लगाते रहना होता है, फिर आत्मश्लाघा का ऐसा अवसर। खुद को बहलाने की कोशिश की, थोड़ी खोजबीन कर पंडुक पर एक कायदे की पोस्ट बने तब लगाना ठीक होगा। याद कर रहा हूं- ''वो भी क्या दिन थे, जब फाख्‍ते उड़ाया करते थे'' ज्यों ''वे भी क्या दिन थे जब पसीना गुलाब था।'' शायद पंडुक से आसान शिकार कोई नहीं- ''बाप न मारे पेंडुकी (कभी मेंढकी भी), बेटा तीरंदाज'' और ''होश फाख्‍ता हुए'' कह कर, इस पंछी का नाम उड़ने के पर्याय में तो इस्तेमाल होता ही है। ईसाईयों में पवित्र आत्‍मा का प्रतीक और चोंच में जैतून की डंठल लेकर उड़ती चिडि़या, पंडुक ही है। छत्‍तासगढ़ी गीत ''हाय रे मोर पंडकी मैना, तोर कजरेरी नैना, मिरगिन कस रेंगना'' में पंडकी, प्रेम-संबोधन है। पंडुक का मनियारी गोंटी चरना (छोटे, गोल और चिकने मणि-तुल्‍य कंकड़ चुगना), साहित्यिक मान्‍यता नहीं, देखी-जांची हकीकत है।

इस पंछी के कुछ और संदर्भ याद आ रहे हैं। डेनियल लेह्रमैन का कथन- ''हरेक अच्छे प्रयोग को उत्तरों से ज्यादा सवाल खड़े करना चाहिए।'' (Every good experiment has to raise more question than its answers.- Daniel S Lehrman) उद्धृत करता रहा हूं, लेकिन इसी दौरान जान पाया कि यह बात उन्होंने पंडुक के प्रजनन व्यवहार के संदर्भ में ही कही है।

रेणु की परती परिकथा के आरंभ में वन्ध्या रानी की परिचारिका रह चुकी पंडुकी व्यथा समझती है और वैशाख की उदास दोपहरी में वह करुण सुर में पुकारती है- तुर तुत्तू-उ-उ, तू-उ, तु-उ तूः। कुमाऊंनी लोककथा में घुघूती यानि पंडुक ''पुर पुतइ पुरै पुर'' बिसूरती फिरती है। इससे मिलती-जुलती बस्‍तर की भतरी लोककथा में पंडुक रो-रो कर अपने मृत बच्‍चे को जगाती है- 'उठ पुता, उरला-पुरला' और हल्‍बी छेरता गीत की पंक्ति है- 'झीर लिटी, झीर लिटी, पंडकी मारा लिटी।' शायद इन्‍हीं से प्रेरित हैं छत्तीसगढ़ के कवि एकांत श्रीवास्तव की 'पंडुक' कविता-

''जेठ-बैशाख की तपती दोपहरें
........................
पृथ्वी के इस सबसे दुर्गम समय में
वे भूलते नहीं हैं प्यार
और रचते हैं सपने
अंडों में सांस ले रहे पंडुकों के लिए''

परती परिकथा का समापन है- ''पंडुकी नाच-नाच कर पुकार रही है- तुतु-तुत्तु, तुरा तुत्त। ... ... ... आसन्नप्रसवा परती हंसकर करवट लेती है।'' मानों बिसूरती पंडुक अब लाफिंग डॉव है।

खुद को इससे अधिक बहला पाने में असफल, सोचते हुए कि ''अंडों में सांस ले रहे पंडुकों की करवट'' का हाल परिशिष्ट बनाकर बाद में जोड़ा जा सकता है। फिलहाल यही जारी कर रहा हूं, पंडुक के हवाले से, हस्ताक्षरित नहीं चित्राक्षरित, बिना पदमुद्रा के लेकिन प्राधिकारपूर्वक स्वयं से, स्वयं को, स्वयं के लिए टाइप।
  • यों, पंछी-प्रेम के इस प्रमाण-पत्र पर मुझसे अधिक घर के बाकी सदस्यों का अधिकार बनता है, क्योंकि वे ही पूरे समय घर में रहते हैं, लेकिन 'कलम' की ताकत है, सो यह खुद के नाम कर लिया है।
  • गलतफहमी न रहे, खासकर शाकाहारवादियों को स्पष्ट कर दूं कि मैं (घर के अन्‍य सदस्‍यों सहित) सर्वभक्षी नहीं तो 'हार्ड कोर' मांसाहारी अवश्‍य हूं।
  • यह भी कि रायपुर में घरों के इर्द-गिर्द गौरैया के बाद सबसे आम यही चिड़िया, पंडुक दिखाई देती है।
याद करता हूं, नृतत्‍व-मनोविज्ञान में आहार, निद्रा, भय, मैथुन के अलावे मूल प्रवृत्ति के रूप में 'मातृत्‍व' (वात्‍सल्‍य या mother instinct) हाल के वर्षों में मान्‍य-स्‍थापित हुआ है। कल 8 मई 2011 को इस पोस्‍ट (को सेते हुए) की उधेड़-बुन में लगा रह कर, मातृत्‍व-वंचित वर्ग के सदस्‍य के रूप में मातृत्‍व-संपन्‍न नृवंशियों को नमन करते हुए, मातृ-दिवस मनाया।

Friday, March 18, 2011

गौरैया

''1906/07 जब मादा अंडों पर बैठी थी तब एक नर गौरैया सूराख के पास कील पर बैठा था। मैंने अस्तबल में खड़ी गाड़ी के पीछे से उस नर को मारा। ... ... ... अगले सात दिनों में मैंने उस स्थान पर आठ नर गौरैयों को मार गिराया'' अविश्वसनीय लग सकता है कि यह प्रसिद्ध पक्षी विज्ञानी सालिम अली की हरकत है और उन्हीं का बयान 'एक गौरैया का गिरना' से लिया गया है। इतना ही नहीं, आगे टिप्पणी है- ''मुझे इस नोट पर गर्व है। ... ... ... आज के व्यवहार संबंधी अध्ययन की दृष्टि से यह बहुत सार्थक सिद्ध हुआ है।''

पुस्तक के 'बस्तरः1949'अध्याय में लिखा है- ''अपने लंबे जीवन में सरगुजा के महाराजा की अपनी प्रजा के प्रति भलाई करने वाली एकमात्र प्रतिबद्धता थी, बाघों की हत्या करना। ... उन्होंने 1170 से अधिक बाघ मारकर, निश्चय ही किसी प्रकार का रिकार्ड बनाया होगा तथा अपने अंतकरण में, यदि उनमें था, उसकी कचोट अनुभव की होगी।'' एक अन्य उद्धरण है- ''सरगुजा राज्य के एक पड़ोसी राज्य, कोरेआ (पूर्वी मध्य प्रदेश) के महाराज के शिकार में अपना नाम अमर कर लिया है। उन्होंने ... भारत के अंतिम तीन चीतों का शिकार कर इस जाति का भारतीय जमीन पर से हमेशा के लिए सफाया कर दिया।''

जिम कार्बेट की हथेली पर चिडि़या
सिद्धार्थ और देवदत्त की प्रसिद्ध कहानी की सीख है- मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है, लेकिन प्राणी संरक्षण के लिए बात थोड़े अंतर से कही जा सकती है कि मारने वाला ही बचाने का काम बेहतर करता है (ज्‍यों डिसेक्‍शन करने वाले हाथ ही शल्‍य चिकित्‍सा कर जान बचाते हैं)। ऊपर आए उद्धरणों के साथ कुमाऊं और रूद्रप्रयाग के आदमखोरों के शिकारी जिम कार्बेट का उदाहरण, उनके एक हाथ में लिए अंडों को बचाते हुए दूसरे हाथ से गोली दागने वाले प्रसंग सहित, स्मरणीय है। यों कहें कि भक्षक ही रक्षक या संहारक ही संरक्षक बन जाए तो इससे बेहतर रक्षा, और क्‍या होगी। बेगूसराय, बिहार के चिडि़मार अली हुसैन को सालिम अली द्वारा अपना सहयोगी पक्षी संरक्षक बना देने की नजीर है ही।

वन-वन्‍यजीव संरक्षण के दो उद्धरण- पहला, मृदुला सिन्‍हा द्वारा लिपिबद्ध राजमाता विजयाराजे सिंधिया की आत्‍मकथा 'राजपथ से लोकपथ पर' से- ''अपने शौक के लिए ही क्‍यों न सही, वन्‍य-संपदाओं के संरक्षण के लिए इन राजा-महाराजाओं ने जितनी सतर्कता बरती थी, वैसी तो आज जंगलों की रक्षा और पर्यावरण के प्रहरी बनने का ढोल पीटने वाले आधुनिक लोग भी नहीं बरतते होंगे। ये राजा-महाराजा इस बात के लिए अत्‍यंत जागरूक रहा करते थे कि शेरों की संख्‍या निर्धारित सीमा के नीचे कभी न जाने पाए। इसीलिए उनके हाथों वन्‍य-जीवों का संगोपन और संवर्ध्‍दन हो सका। और दूसरा, थोरो के 'वाल्‍डन' से- ''शिकार के जानवरों का शायद सबसे बड़ा मित्र ('पशु-परोपकारी समाज' को मिलाकर भी) शिकारी ही होता है।''

सालिम अली से ठीक से परिचित हुआ मेरे पसंदीदा संपादकों, नवनीत के नारायण दत्त और इलस्ट्रेटेड वीकली के प्रीतीश नंदी के 25-30 साल पहले लिखे गए लेखों के माध्यम से। हैमलेट के अंश ''गौरैया के गिरने में विधि का विशेष विधान है'' से प्रभावित शीर्षक वाली पुस्‍तक 'एक गौरैया का गिरना' सालिम अली की आत्मकथा है, लेकिन इसलिए भी खास है कि इसमें लेखक का 'मैं' नाममात्र को है और पुस्तक पक्षी-विज्ञान की पूरी संहिता है। सालिम अली की पुस्तकों और जिस माध्यम से उनसे परिचित हुआ, शायद उसी के चलते जब भी अवसर मिले, मैं पंछी निहारन से चूकता नहीं।

छत्तीसगढ़ की प्राचीन नगरी खरौद के खुशखत, कवि कपिलनाथ मिसिर, बड़े पुजेरी की विशिष्ट और महत्वपूर्ण रचना है 'खुसरा चिरई के बिहाव'। यह काव्य, पक्षी कोश के साथ जैव विविधता जैसे आधुनिक शास्त्रीय विषयों और सूक्ष्म अवलोकन की समर्थ लोक अभिव्यक्ति हैं। रचना में खुसरा चिड़िया के विवाह अवसर पर पूरी जमात को शामिल और पक्षियों को उनके व्यवहार के अनुसार भूमिका निभाते बताया गया है। गौरैया के लिए 'गुड़रिया धान कुटाती है' और एक बार 'गौरेलिया पाठ पढ़ाता है' कहा गया है। वाद्यों में निसान, ढोल, मांदर, तमूरा, करताल, खंजरी, मोहरी, दफड़ा, टिमटिमी, नफेरी के साथ उनकी ध्वनि को शब्दों में उसी तरह बांधा गया है जैसे परती परिकथा में रेणु जी ने ('खुसरा...' का प्रकाशन 1948-49 में बताया जाता है)। इस रचना में विवाह के नेग-चार के साथ अन्न और पेड़ों की नाम-सूची के अलावा शिव-स्तुति श्लोक भी हैं।

धूल-स्‍नानःबाथ सीन
गौरैया, छत्तीसगढ़ी में सामान्‍यतः गुड़ेरिया और बाम्हन चिराई भी कही जाती है। कहा जाता है कि इसके चूजे को कोई व्‍यक्ति स्‍पर्श कर दे तो यह उसे त्‍याग देती है और यह भी कि बाम्हन चिराई को पानी मिला और वह नहाने लगती है। वैसे गौरैया धूल में भी नहाती है, घाघ-भड्‌डरी की कहावत है-
'कलसा पानी गरम है, चिड़िया नहावै धूर।
चींटी ले अंडा चढ़ै, तो बरखा भरपूर।'
गौरैया का धूल-स्नान, आसन्न वर्षा का तो जल-स्नान, वर्षा न होने का संकेत माना जाता है।

माना गया है कि गौरैया, रोग-व्‍याधि मुक्‍त स्‍थान पर ही घोंसला बांधती है। वह ब्राह्मणों की तरह छुआ-छूत में सख्‍त भी मानी गयी है। मनुष्य द्वारा छू लिये जाने पर उस गौरैया को छूत मान कर, जात निकाला दे कर चोंच मारा जाता है लेकिन सूपे को किसी डंडी से तिरछा टिका कर या कमरा बंद कर गौरेया पकड़ना, फिर उसे लाल-काला रंग कर या धागा बांधकर, उड़ाने के अभियान से शायद ही कोई बचपन अछूता हो।

एक किस्से में गौरेया मनुष्य जाति के लिए संदेश लेकर आती है कि दिन में एक बार खाना और दो बार नहाना, लेकिन कहने में उससे हुई चूक से मनुष्य एक बार स्नान और दो बार भोजन करने लगा। इसकी सजा स्वरूप उसके पैरों में अदृश्य बेड़ी पड़ गई और उसे चम्पा (एक साथ दोनों पैर पर, फुदककर) चलना पड़ता है। किस्से में यह भी बताया जाता है कि प्रायश्चित स्वरूप उसे खुद बार-बार स्नान करना पड़ता है और भोजन के फिराक में लगे रहना होता है। साल में दो बार त्यौहारों पर बेड़ी छूटती भी है, तब यह ठुमक-ठुमक कर, इतराती चलती है और यह दुर्लभ दृश्य, शुभ माना जाता है, इसके विपरीत गौरैया का प्रजनन देखना निषेध किया जाता है। पक्षी मैथुन, खासकर काग-मैथुन देख लेने पर झूठी मृत्यु सूचना दी जाती है और प्रायश्चित होता है जब कोई स्वजन इस खबर पर रो ले। पक्षियों, विशेषतः सर्वाधिक घरू गौरैया, मैना और कौए की बोली की व्याख्‍या करने वालों के भी रोचक संस्मरण सुनाए जाते हैं। गौरैये को लोक व्यवहार में पुंसत्व का भी प्रतीक माना गया है, संभवतः इसका कारण इस प्रजाति का बारहमासी प्रजनन काल और बारम्‍बारता है।
आंचलिक भावों के कवि कैलाश गौतम के फागुनी दोहे, बड़की भौजी जैसी कविताएं खूब पसंद की जाती हैं, उनकी ऐसी ही एक कविता 'भाभी की चिट्‌ठी' का दोहा है-
सिर दुखता है जी करता चूल्हे की माटी खाने को,
गौरैया घोंसला बनाने लगी ओसारे देवर जी।

एक किस्से में काम के दौरान व्यवधान की सजा बतौर गौरैया के पैरों में लुहार द्वारा बेड़ी डालने की बात कही जाती है। गौरेया के लिए प्रचलित एक अन्य कहानी में चियां-म्यांरी (चूजे-मां) कुदुरमाल (कबीरपंथियों का प्रमुख केन्द्र) मेला के बजाय भांटा बारी (बैगन की बाड़ी) पहुंच कर दुर्घटनाग्रस्त होते हैं और किस्से के साथ गीत में इसकी मार्मिकता बयान होती है। पंचतंत्र की गौरैया के अंडे मदमत्‍त जंगली हाथी के कारण गिर कर फूट जाते हैं, तब वह विलाप तो करती है, लेकिन कठफोड़वा, मक्‍खी और मेंढक की मदद से बदला भी लेती है।

गौरैयों की बात में, गीतफरोश और सन्‍नाटा वाले भवानी भाई की कविता ''चार कौए उर्फ़ चार हौए'' की कुछ पंक्तियां देखते चलें-
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गए,
इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गए।
हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में,
हाथ बांधकर खड़े हो गए सब विनती में।
हुकम हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगाएं,
पिऊ-पिऊ को छोड़ें कौए-कौए गाएं।
बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को,
खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को।

बताया जाता है कि 1958 में माओ त्से-तुंग, आजकल उच्चारण माओ जिदौंग है, ने गौरेयों से होने वाले फसल का नुकसान कम करने के लिए गौरैयों को ही कम कर देना चाहा, लेकिन इस चक्कर में गौरैयों के भोजन बनने से बच जाने से टिड्‌डे इतने बढ़े कि उनसे हुए नुकसान से अकाल की स्थिति भुगतनी पड़ी।

''गांवों में कहा जाता हैः जिस घर में गौरैया अपना घोंसला नहीं बनाती वह घर निर्वंश हो जाता है। एक तरह से घर के आंगन में गौरैयों का ढीठ होकर चहचहाना, दाने चुगकर मुड़ेरी पर बैठना, हर सांझ, हर सुबह हर कहीं तिनके बिखेरना, और घूम-फिरकर फिर रात में घर ही में बस जाना, अपनी बढ़ती चाहने वाले गृहस्‍थ के लिए बच्‍चों की किलकारी, मीठी शरारत और निर्भय उच्‍छलता का प्रतीक है।'' यह विद्यानिवास मिश्र के 'आंगन का पंछी' (और बनजारा मन) का उद्धरण है, जो निबंध, चीन में गौरैयों के साथ किए जा रहे उक्‍त सलू‍क के प्रति आक्रोश और व्‍यथा से उपजी रचना है। विश्‍वमोहन तिवारी ने अपनी पुस्‍तक में लिखा है कि ''घोंसला बनाने के लिए इसकी दृढ़ इच्‍छाशक्ति के सामने तो मौलाना अबुल कलाम आजाद भी हारे थे'' का आशय अब तक तलाश रहा हूं।

बीते माह उच्च स्तरीय अंतर-मंत्रालयी समिति के जिक्र सहित समाचार आया कि फोन टॉवरों से निकलने वाले रेडिएशन की वजह से मधुमक्खियां, तितलियां, कीट और गौरेया गायब हो गई हैं। वरिष्ठ साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल की हीरक जयंती के उपलक्ष्य में रायपुर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान 8 जनवरी को उन्‍होंने बातचीत में कहा कि हमने अपने घर के खिड़की-दरवाजों को जाली से इस तरह बंद कर लिया है कि मच्छर भी न घुस सके, फिर गौरैया कैसे घर में प्रवेश करे (पंछी भी पर न मार सके)।

25 अप्रैल 2003 को इंडियन हिस्टारिकल रेकार्ड्‌स कमीशन के 58वें सत्र के उद्‌घाटन अवसर पर छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्‍यमंत्री के उद्‌बोधन का समापन वाक्य था- 'देश का तीसरा गर्म शहर रायपुर में आपका गर्मजोशी से स्वागत करता हूं।' प्रदूषण में भी यह शहर अव्वल ही न हो, होड़ में तो जरूर होगा। इस गरम, प्रदूषित शहर के इतिहास में सन 1938 की एक रिपोर्ट में यहां संग्रहालय भवन में अपरिमित गौरैयों का प्रवेश परेशानी का सबब बताया गया है।
सन 1875 मे निर्मित संग्रहालय भवन

चटका पर चटका (संस्‍कृत में चिडि़या या गौरैया के लिए यही शब्‍द है, रायगढ़ के उड़ीसा सीमावर्ती झारा इसे चोटिया कहते हैं) यानि गौरैया पर क्लिक करें और देखें गत वर्ष से तय 20 मार्च, गौरैया दिवस के बारे में। हरेली पर चतुर्दिक हरियाली और दीपावली पर दीपों की रोशनी होती है, धन-धान्‍य से घर भरा हो तो नवाखाई और छेरछेरा, रंगों से सराबोर होली। लेकिन दिवस मनाने की अनिवार्य शर्त की तरह कमी और संकट का सयापा करना औपचारिकता बन गया है इसलिए ये 'दिवस', त्यौहार से भिन्न विलाप पर्व बन जाते हैं। अब हम क्या करें, गौरैया कम होने का रोना कैसे रोएं, कैसे हो इस दिवस की ऐसी औपचारिकता का निर्वाह। ये देखिए, शिवमंगल सिंह सुमन के शब्‍दों में 'मेरे मटमैले आंगन में फुदक रही गौरैया' या बच्‍चन जी के 'नीड़ का निर्माण फिर', 'ए‍क दूजे के लिए' और 'एक चिडि़या, अनेक चिडि़या' वाले मेरे इर्द-गिर्द के दृश्य।
इस शहर रायपुर में तो गौरैया बहुतायत थीं, हैं और मेरा विश्वास है कि रहेंगी। सो हम इस 'दिवस' को त्‍यौहार जैसा ही मान रहे हैं और क्‍यों न रायपुर को गौरैया नगर मान लिया जाए।

पोस्‍ट आपको पसंद आए तो श्रेय उन ढेरों (अब्‍लॉगर) लोगों का, जिनके पास ऐसी 'अनुत्पादक' सूचनाओं का खजाना होता है, इनमें कुछेक से मेरा संपर्क-संवाद बना रहता है। इनमें रायपुर निवासी और अब भोपालवासी अग्रज आदरणीय बाबूदा (श्री नंदकिशोर तिवारी) भी हैं, जिन्‍होंने तत्‍काल संवाद के इस युग में पत्र लिखकर आशीर्वाद-स्‍वरूप कुछ महत्‍वपूर्ण संदर्भ डाक से नहीं, बल्कि हस्‍ते भेजा। इनलोगों से मिलते रहने पर अपनी अल्‍पज्ञता के साथ वेब की सीमाओं का भान होता रहता है। यह भी लगता है कि सब हमारे ही जिम्‍मे नहीं, बड़े-बुजुर्ग भी हैं। ऐसे सुहृद, मेरी ललचाई नजर को पहचान लेते हैं और मुखर हो कर, घर-आंगन से दुनिया-जहान तक के किस्से सुनाने लगते हैं।