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Sunday, March 8, 2026

मेघदूत: एक नई कहानी

78 आर.पी.एम. का तवा, जिस पर गीत बजता था- ओ वर्षा के पहले बादल, मेरा संदेसा ले जाना, अंसुवन की बूंदन बरसाकर, अलका नगरी में तुम जाकर, खबर मेरी पहुंचाना। मुझे याद है कि यह स्टैंडर्ड प्ले रिकार्ड हमने सुन-सुन कर घिस डाला था और तब सुई अटक जाती थी, ‘खबर मेरी पहुंचाना‘ पर। किसी फिल्मी गीत प्रेमी ने बताया कि यह तुम्हें इतना पसंद है, तो इसे भी सुन लो- ‘ओ आषाढ़ के पहले बादल, ओ नभ के काजल। विरही जनों के करुण अश्रु जल, रुक जा रे एक पल। दूर दूर मेरा देश, जहाँ बिखराए केश, विरहन का बनाये वेश। प्रिया मेरी विदेश, कैसे काटे कलेश, उसे देना मेरा ये संदेश रे।‘ मगर मन वहीं अटका रहा, जो पहले सुनता रहा था- 'ओ वर्षा के पहले बादल ... खबर मेरी पहुंचाना, खबर मेरी पहुंचाना'।

स्कूली शिक्षा के अलावा जितनी और जैसी भी दीक्षा मिली अधिकतर फिल्मों से ही मिली, या चालू, ऐयारी-जासूसी किताबों से, जानकारियों और जिज्ञासा का खजाना। तब कहां पता था कि यह मेघदूत है, महाकवि कालिदास की अमर कृति पर आधारित गीत। कहा गया है ‘माघे मेघे गतं वयः‘ और ‘काव्येषु माघः कवि कालिदासः‘। कालिदास के काल की चर्चा में कहीं पढ़ा था- संस्कृत परीक्षाएं जब से होती हैं, उनमें आज तक यह प्रश्न नहीं आया कि कालिदास कब हुए? अंगरेजी कोर्स के इम्तहान में इस प्रश्न से शायद ही कभी अपना छुटकारा कर सकें।

किताब हाथ में आई है, जिस पर बादल और घुंघरू वाले पैर हैं। मेघदूत की राह तो आकाशीय है और पथिक, धरातलीय, फिर यह कैसा शीर्षक हुआ ‘मेघदूत की राह के पथिक‘! किताब खोल कर कदम-दर-कदम आगे बढ़ें तो पन्ने-दर-पन्ने जमीनी हकीकत के संग-साथ ‘आज तो पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे‘ जैसी ‘मध्यमा‘ धुन मन में होती है, आप किसी धुनी के साथ हों बिना धूनी रम सकते हैं। किसी जोगी की विरक्ति में आसक्ति, वियोग में ही संयोग-कामना प्रबल होती है और कवि मन ‘द्यावा-पृथिवी‘ में स्थित रचना-संभव होता है।

उमड़ते-घुमड़ते मेघ में आशा-आशंका दोनों है, वहीं जैसा विद्यानिवास मिश्र कहते हैं- ‘पर सुकुमार और परुष ये दोनों पक्ष बादल के पौरुष के प्रतीक हैं। वही धरित्री का कामरूप पुरुष है। उसके लिए धरित्री की पुकार प्रोषित पति के लिए प्रियतमा की पुकार है। आना जी बादल ज़रूर।‘ वही मानस के राम ‘प्रियाहीन डरपत मन मोरा‘ कहते हैं तो वाल्मीकि के राम शरद और वसंत में भी सीता-विरह से व्यथित हैं। वर्षा ऋतु आने पर उन्हें बिजलियां, सोने के कोड़े के समान, मेघों की गर्जना आर्तनाद के समान जान पड़ती है, और कहते हैं कि ये कुटज पुष्प मेरी प्रेमाग्नि को उद्दीप्त कर रहे हैं।

लेखक, हजारीप्रसाद द्विवेदी के ‘मेघदूत: एक पुरानी कहानी‘ से गुजरती हैं उनकी राह का पथिक बन मैं भटका पाठक द्विवेदी जी के ‘संदेशरासक‘ का भी रस लेने लगता हूं। ग्यारहवीं सदी का अपभ्रंश काव्य, जिसमें विरहिणी नायिका का संदेश वाहक पथिक मनुष्य है। द्विवेदी जी ने ‘मेघदूत‘ और ‘सन्देशरासक‘ की तुलना करते हुए मार्के की बात कही है- ‘संदेश कैसे दिया जाता है और क्या दिया जाता है, मुख्य बात यही है। वस्तुतः दोनों में कथावस्तु को बहाना बनाकर विरह-वर्णन का चित्रण करना ही कालिदास और अद्दहमाण का उद्देश्य है।

‘आषाढ़ का एक दिन‘ में मोहन राकेश इस सफर में अनंत तक पहुंच जाते हैं- ‘ये तो केवल कोरे पृष्ठ हैं। ... ... ...स्थान-स्थान पर इन पर पानी की बूंदें पड़ी हैं जो निःसंदेह वर्षा की बूंदें नहीं हैं। लगता है तुमने अपनी आंखों से इन कोरे पृष्ठों पर बहुत कुछ लिखा है। और आंखों से ही नहीं, स्थान-स्थान पर ये पृष्ठ स्वेद-कणों से मैले हुए हैं, स्थान-स्थान पर फूलों की सूखी पत्तियों पर अपने रंग इन पर छोड़ दिये हैं। कई स्थानों पर तुम्हारे नखों ने इन्हें छीला है, तुम्हारे दांतों ने इन्हें काटा है। और इसके अतिरिक्त ये ग्रीष्म की धूप के हल्के-गहरे रंग, हेमन्त की पत्रधूलि और इस घर की सीलन ... ये पृष्ठ अब कोरे कहां हैं मल्लिका? इन पर एक महाकाव्य की रचना हो चुकी है... अनन्त सर्गों के एक महाकाव्य की।‘

कवि बादल को तकता है और मानों बादल से परावर्तित एरियल व्यू वाले भूगोल को और इसी तरह इस राह की पथिक बनीं लेखक कैलास पहुंच जाती है। भटकता अतृप्त मेघ अपनी राह गहने वाले को वहां तक पहुंचा देता है, जहां- 
‘इस धरा के रहस्यों पर चलता, आस्था के दीये की लौ की कोमल उष्णता में मोम-सा पिघलता, शिखरों के मध्य चमकता पवित्र नदियों का उद्गम यह कैलास मेरे समक्ष है। ओह! यह कौन-सा पल है-
तारीख-20 अगस्त, 2018, दिन- सोमवार, हिन्दी महीना-सावन, तिथि-शुक्ल पक्ष, दशमी, समय- रात्रि 2ः45, योग- ब्रह्म, करण- भद्रा, नक्षत्र- विशाखा। 
मैं इस वक्त भीतर-बाहर से रिक्त थी। अब मैं ही दृष्टा और मैं ही दृश्य थी। अब मुझे सम्पूर्णता का आभास था।‘ 
(इस पुस्तक के पेज 225 का अंश)

पुनश्च- ब्रह्मपुत्र और सिंधु के साथ देश की तीसरी प्रमुख पुल्लिंग जलधारा ‘सोन नद‘ का स्मरण कि मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी द्वारा 1983 में प्रकाशित देवकुमार मिश्र की ‘सोन के पानी का रंग‘, नदियों पर मेरी पढ़ी किताबों में अग्रगण्य है तथा मेघदूत और रामगिरि की चर्चा के संदर्भ में पुणे की सुजाता देवधर जी का आभारी हूं, जिन्होंने कालिदास संशोधन मंडल, पुणे से 1960 में प्रकाशित वामन कृष्ण परांजपे की पुस्तक ‘Fresh Light on Kalidasa's Meghduta‘ की जानकारी दी, जिसमें उदयपुर, सरगुजा के रामगढ़ को मेघदूत से संबद्ध माना गया है। इसी तरह ऋत्विक घटक, कहानी ‘एक्सटैसी‘ में मध्यप्रदेश के मध्यतम प्रदेश के साथ महुआ और पलाश के पेड़ का उल्लेख करते लिखते हैं- ‘यह वही कालिदास के मेघदूत का देश है। हमारा सुंदर देश। निर्विकार ग्राम वधुओं की याद आ जाती है।‘

Friday, October 8, 2021

मेघ-बसंत

रहंगी, चकरभाटा कैम्प वाले डॉ. बसंतलाल शर्मा, आयुर्वेद चिकित्सक थे, रससिद्ध। उनकी रसिकता, शास्त्र और साहित्य-साधना में उनकी पैठ के साथ थी।

मेनका की कन्याओं में शकुंतला (और दुष्यंत) की कथा प्रचलित है। मेनका की एक और कन्या प्रमद्वरा की कथा महाभारत के आदि पर्व में है। यही प्रमद्वरा डॉ. बसंतलाल शर्मा से मेरे लगाव की कड़ी बनी। सन 2007 में वे इसी ‘प्रमद्वरा‘ शीर्षक से खण्ड काव्य रच रहे थे। इस विशिष्ट पात्र की कथा का कम प्रचलन है, जीवन-रक्षा और यौवन के लिए भी आयु देने लेने के कई प्रसंग पुराने आख्यानों में हैं, किंतु यहां बताया जाता है कि सांप काटने से मृत प्रमद्वरा के जीवन के लिए पति रूरू ने अपनी आधी आयु दे दी थी। इस कथा के अन्य उल्लेख और पहलुओं की रोचक व्याख्या शर्मा जी किया करते थे।

पता लगा कि उनकी साधना निरंतर है, किन्तु उन्हीं के शब्दों में ‘अरसिकेषु काव्यानिवेदनम्‘ करना नहीं चाहते थे, इसलिए प्रकाशन में रुचि नहीं ली। इसी बातचीत में उनके ‘मेघदूत पद्यानुवाद‘ की चर्चा हुई, जिस पर मेघदूत का छत्तीसगढ़ी अनुवाद करने वाले साहित्य-मनीषी पं. मुकुटधर पाण्डेय जी ने 11.11.1979 को सम्मति-आशीर्वाद दिया था, इन शब्दों में-

श्रीराम
श्री डॉ. बसंत शर्मा कृत ‘मेघदूत‘ का पद्यानुवाद मुझे पढ़ने सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । यों तो हिन्दी में इसके अनेकानेक अनुवाद हो चुके है पर जो सहजता ओर सरसता इस अनुवाद में पाई जाती है- वह ब्रजभाषा के पूर्ण कवि कृत अनुवाद को छोड़ मैने कहीं नहीं पाया। 
-अनुवाद की विशेषता यही है कि भाषा मौलिक सी जान पड़े।
शर्माजी की भाषा से मैं बड़ा प्रभावित हुआ। यह अनुवाद यदि छप पाता है तो इससे हिन्दी साहित्य की श्री वृद्धि होगी, यह मेरा विश्वास है।
इत्यलम्!

2007 में पुस्तक छपी। रचनाकार के अनुसार ‘‘अब तक कुछ मन से, कुछ बेमन से कहने वाले मिलते थे। अब जा कर मन से कहने और कहने वाला मिला- उसके ही सार्थक प्रयास से यह प्रकाशित हो सका है।‘‘ शर्माजी के आग्रह का मान रखते, इस कृति पर अपनी भावना मैंने व्यक्त की थी, इस तरह-

उमड़ते-घुमड़ते मेघ से कोंपलें फूटने लगती हैं और उनकी गति, भाव-आलंबन बन कर अभिव्यक्त होती रही है, इस क्रम में महाकवि कालिदास की रचना ‘मेघदूत’ व्यापक देश-काल-पात्र की बात बनकर कालजयी है। इसमें आदिम मनोभावों का स्पंदन, वैदिक ऋक् द्रष्टाओं की सौंदर्यानुभूति और विरह संदेश-संप्रेषण की चिरंतनता है। मेघ, दूत के रूप में आकुल-व्याकुल मन की भावाभिव्यक्ति को दिशा देकर, राहत पहुंचाने के लिए ई-मेल से अधिक कारगर रहा है और रहेगा।

मेघदूत के रचनात्मक रूपान्तरणों में मेरे लिए स्मरणीय पद्मश्री पं. मुकुटधर पांडेय का छत्तीसगढ़ी ‘मेघदूत’ तो है ही, एक पुराना फिल्मी गीत भी यादगार है-

‘‘ओ वर्षा के पहले बादल, मेरा संदेशा ले जाना,
असुंवन की बूंदन बरसा कर, अलका नगरी में तुम जाकर,
खबर मेरी पहुंचाना, ओ वर्षा के.....’’

खैर! किसी कृति के रसास्वादन का एक तरीका यह भी है कि उसे पढ़ते हुए आत्मसात् कर, अपने अधिकार की भाषा-शैली में पुनः अभिव्यक्त किया जाय। दूसरे शब्दों में यह एक प्रकार का अनुवाद ही है, किन्तु इसका सौन्दर्य और महत्व इसकी रचनात्मकता में होती है, इसलिए यह भाषान्तरण या अनुवाद से आगे निकल जाता है। कुछ ऐसी ही रचना डॉं. बसन्त शर्मा जी की यह कृति ‘पद्यानुकृत मेघदूत’ है।

डॉ. शर्मा का यह उद्यम रसास्वाद का अपना तरीका है, ऐसा इसलिए भी माना जा सकता है कि सन् 1979 में यह कार्य किया जाकर इसके प्रकाशन के लिए उनके द्वारा तब से कोई प्रयास नहीं किया गया, प्रयास तो उनके द्वारा अभी भी नहीं किया गया, किन्तु संयोगवश यह अब हो रहा है और इस क्रम में मुझे भी डॉ. शर्मा और उनके कृतित्व से परिचित होने का अवसर मिला, यह मेरे लिए सुखद है।

डॉ. शर्मा की साधना, उनके ‘स्वान्तः सुखाय’ से बाहर निकल कर कितनी सीमाएं पार कर लेगी, यह तो सुधी पाठकों से तय होगा, किन्तु साहित्य भण्डार को समृद्ध करती रहेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।