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Monday, August 17, 2026

रघु राय

दहाई साल बीतने को आया, यादें अब भी ताजा हैं। रघु राय और जतिन दास का रायपुर प्रवास। वे समय ले कर आए थे। अपने शिष्य नागपुर वाले शेखर सोनी के आग्रह पर उन्हें रामनामियों से फिर से मिलने जाना था। यात्रा में शिवरीनारायण और सिरपुर भी शामिल हुआ तो मैं भी जुड़ गया। गाड़ी रुकती तो उनका कैमरा ठहर जाता, चलती गाड़ी में शीशे के भीतर से भी बार-बार क्लिक करते रहते। शायद प्रभाव और संभावना का अनुमान लगाते। पूरी यात्रा में शास्त्रीय भजन और सूफी गीत बजते रहे, वे ताली पर ताल देते साथ गाते गुनगुनाते रहे। जतिन दास के साथ उनकी जोड़ी के क्या कहने। जतिन दा को छेड़ते, उनकी बातों का जवाब देते, जिनमें हर बार ऐसा गुदगुदी होती कि उसके भीतर का चुटीलापन अखरे नहीं था। 

 
शिवरीनारायण पहुंचने के पहले महानदी के पुल पर गाड़ी रुकवाई। अंधेरा घिरने को, अप्रैल का महीना मगर बिजली चमक रही थी, बूंदाबांदी हो रही थी। फोटोग्राफी के लिए एमदम प्रतिकूल और तभी उनका कैमरा निकला, फोटो लेते रहे। शिवरीनारायण रेस्ट हाउस पहुंचने पर बत्ती गुल मिली। जैसा आमतौर पर सरकारी रेस्ट हाउस में होता है, चौकीदार का ठिकाना नहीं। किसी तरह कमरा खुला, मगर खाने का कोई इंतजाम नहीं। जतिन दा, बेहिचक, बिना समय गंवाए, शेखर जी को लेकर खरीदी करने निकले। जैसे तैसे पकाने खाने की व्यवस्था बनी। तब पता चला कि जतिन दा आले दरजे के बावर्ची हैं। रघु जी बरसती अंधेरी रात में कैमरा लेकर बाहर घूमते रहे। बिजली चमकती, नदी रोशन होती और उनका कैमरा क्लिक होता। न जाने कितनी तस्वीरें उन्होंने ली होंगी।
 

फोटोग्राफी के बारे में शायद ही कोई बात करते, अक्सर शांत, चेहरे पर मुलायम सी मुस्कान, एक इंच से भी कम। मुस्कान, जो आंखों में और तनाव रहित चेहरे के कारण उभरती थी। साथ समय बिताते समझ में आता कि वे ऐसे नामचीन हैं, जो अपनी गरिमा और मर्यादा बनाए, सामने वाले को सहज रख सकते हैं। पत्रिकाओं में उनके लिए फोटो एडिटर पद का सृजन और समाचारों के लिए फोटोग्राफी पर बात करने पर उन्होंने अपने कैरियर के शुरुआती दिनों को याद करते हुए बताया कि अखबार के लिए फोटोग्राफी करते हुए, किसी बैठक की तस्वीर लेनी होती थी। यों यह सबसे आसान और फटाफट वाला काम होता था, लेकिन वे वे बैठक में हो रही बातचीत, मुद्दों, नरम-गरम को ध्यान से सुनते और कोशिश करते कि ऐसा क्षण क्लिक हो, जो बैठक की चर्चा की खबर से अधिक प्रभावी अभिव्यक्त हो। 

शिवरीनारायण, सिरपुर के मंदिरों के लिए उन्होंने कैमरा छुआ भी नहीं, बस देखते सराहते रहे। जतिन दा की कला-पारखी दृष्टि, जो स्मारक के काल-भेद को कला-शैली के आधार पर आसानी से बूझते गए, मगर रघु जी शांत भाव से मानों बस रस पीते रहे। हां, किसी तरह की हलचल हो, जीवन हो, गाय या कुत्ता बैठा हो, पूंछ हिला रहा हो, तब कैमरे पर उनकी उंगलियां तुरंत थिरकने लगती थीं। मुझे समझ में आया कि ऐसा कोई स्थिर दृश्य, जो कभी भी क्लिक किया जा सकता है, उन्हें दिलचस्पी नहीं होती थी, जहां गति हो स्पंदन हो या किसी स्थिर दृश्य पर क्षणिक कौंध हो, वे वही क्लिक करना चाहते हैं। ऐसा अनूठा, जिसे पकड़ना मुश्किल हो, भूतो न भविष्यति हो। जब यह बात मैंने उनसे साझा की, उनकी मुस्कान ने मुझे बता दिया कि वे मेरी कोई कैंडिड तस्वीर जरूर लेंगे और ऐसा हुआ भी। 

मैंने उनसे सत्यजित रे की चौंकी हुई फोटो, मदर टेरेसा, कलकत्ता पूजा, इंदिरा गांधी आदि की याद दिलाई, इस पर बस हां-हूं करते रहे। उनके लौटने के बाद मेरे पास एक लिफाफा आया, जिसमें उनकी प्रयाग कुंभ वाली किताब और शिवरीनारायण के केशवनारायण मंदिर के सामने जतिन दा के साथ बैठे हुए मेरी, उनकी ली हुई, हस्ताक्षरित तस्वीर थी। 
जाते जाते उन्होंने दिल्ली आने पर अपने फार्म हाउस पर रुक कर साथ समय बिताने का प्रस्ताव दिया था। कुछ ऐसे प्रस्ताव होते हैं, जिनका प्रबल आकर्षण होता है, मगर कहीं उसे बने रहने देना अधिक समझदारी होती है, मैंने इस प्रस्ताव पर वही समझदारी दिखाई और अब उनका यह प्रस्ताव (उनके न रहने पर पहला विश्व फोटोग्राफी दिवस) मेरे लिए अमर हो गया। 

यहां आई तस्वीरें रघु राय, शेखर सोनी और रूपेश यादव द्वारा ली हुई

Tuesday, March 10, 2026

श्रीराम-राज्य-वियोग

‘जाज्वल्या‘ पत्रिका का प्रकाशन जांजगीर-चांपा जिला से विगत वर्षों से किया जा रहा है। इस संबंध में पत्रिका के मुख्य संपादक, कलेक्टर, जिला जांजगीर-चांपा श्री जनमेजय महोबे ने संपादकीय में लिखा है-... जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक कृषि मेला जिले की सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधि बन चुका है।

यह महोत्सव शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, कलाकारों, कृषकों एवं आम नागरिकों की सहभागिता से साकार होने वाला एक सामूहिक सांस्कृतिक अनुष्ठान है। तीन दिवसीय इस आयोजन में छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध लोक कलाकारों के साथ-साथ स्थानीय कलाकारों, विद्यालयीन एवं महाविद्यालयीन छात्र-छात्राओं की प्रस्तुतियाँ लोक संस्कृति की विविध छवियों को मंच प्रदान करती हैं। यह मंच नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य भी करता है।
... ... ...
इस अवसर (9 से 11 फरवरी) पर प्रकाशित जाज्वल्या स्मारिका जिले की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक चेतना का दर्पण है। इसमें जिले के पर्यटन, ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक स्थलों पर आधारित लेख, कविताएँ एवं रचनाएँ नए दृष्टिकोण के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की गई हैं ...

‘जाज्वल्या 2026‘ में प्रकाशित मेरे लेख को समय-सीमा के कारण इसे वांछित रूप नहीं दे सका था, मगर पत्रिका के संपादक मंडल ने इसे पत्रिका में प्रमुखता से स्थान दिया, इसके लिए आभार। वह लेख अब कुछ आवश्यक संवर्धन सहित यहां प्रस्तुत- 

श्रीराम-राज्य-वियोग की काव्य-करुणा और जीवन-उमंग 

वैष्णवी भक्ति में वियोग को भी कृपा की तरह देखा गया है, क्योंकि वियोग में जैसी उद्दाम भावना और विकल स्मृति होती है, वह संयोग में नहीं। संभवतः यही भावधारा प्रवाहित हुई होगी शिवरीनारायण सज्जनाष्टक के पं. यदुनाथ भोगहा के पुत्र मालिकराम भोगहा जी के मन में, जिसका परिणाम हुआ ‘श्रीराम-राज्य-वियोग नाटक‘ की रचना। इस महत्वपूर्ण नाटक की प्रति दुर्लभ होने के कारण इसकी चर्चा कम ही हुई है। यह रचना छत्तीसगढ़ की आरंभिक महत्वपूर्ण नाट्य-कृति है, जिसे पढ़ कर कोई संदेह नहीं रह जाता कि यह अपने दौर के राम-साहित्य की एक अनुपम और बेजोड़ रचना है। इस पुस्तक के आरंभ में पं. लोचनप्रसाद पांडेय जी ने ग्रन्थकार पण्डित मालिकराम त्रिवेदी भोगहा (द्विजराज) की संक्षिप्त जीवनी लिखी है, जिसका एक अंश इस प्रकार है-

12 जनवरी सन् 1910 के मारवाड़ी (नागपुर) के अंक में, पं. मालिकरामजी की सचित्र, संक्षिप्त, जीवनी प्रकाशित हुई थी और उक्त पत्र के 22 दिसंबर 1909 के अंक के सम्पादकीय स्तम्भ में उनपर एक नोट छपा था। हम उसे नीचे उद्धृत करते हैं- ‘छत्तीसगढ़ के एक गुप्त हिन्दी साहित्यसेवी पं. मालिकराम त्रिवेदी भोगहा की असामयिक मृत्य से हिन्दी माता को बड़ी क्षति पहुंची है। पं. मालिकराम सुप्रसिद्ध ठाकुर जगन्मोहनसिंह के प्रवीण और प्रियतम शिष्य थे। वर्षों तक आप ठाकुर साहब के साथ रहे थे और देशाटन भी किया था। बिलासपुर ज़िले के अन्तर्गत शबरीनारायण क्षेत्र में आप निवास करते थे। शबरीनारायण मन्दिर के पुजारी (भोगहा) और कई गाँवों के अधिकारी थे। आप हिन्दी के उत्कृष्ट लेखक और कवि थे। रामराज्य-वियोग (नाटक); सुलोचना सती (नाटक); स्वप्नसम्पत्ति (नवन्यास); पद्यबद्ध शबरीनारायण महात्म्य; मालती (काव्य); सुरसुन्दरी (काव्य); आदि कई एक ग्रन्थ आपने रचे हैं। अफसोस आप अपने ग्रन्थों को प्रकाशित न कर सके। हिन्दी के सिवा, आप संस्कृत, प्राकृत, उर्दू, उड़िया, बँगला, मराठी और अँगरेज़ी भी जानते थे। गान और संगीत विद्या के बड़े प्रेमी और बड़े ईश्वर-भक्त थे। आपकी मृत्यु 30 नवम्बर 09 को हुई। आपकी उम्र 37-38 वर्ष की थी। आपके वियोग से आपके वृद्ध पिता और कुटुम्ब के लोगों के साथ साथ हिन्दी को भी बड़ी हानि पहुंची है। ईश्वर आपके कुटुम्बियों को धैर्य और मृत आत्मा को शान्ति प्रदान करे।‘
पं. मालिकराम भोगहा

इस कृति पर आगे चर्चा के पहले स्मरण करते चलें कि शिवरीनारायण न सिर्फ जिले का, बल्कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ का पुराना वैष्णव मठ है। जिले के लक्ष्मणेश्वर मंदिर, खरौद और जांजगीर के विष्णु मंदिर में रामकथा के प्रसंगों का सुंदर शिल्पांकन है। हमारा जिला रामनामी समुदाय की भक्ति से ओतप्रोत है, जहां अकलतरा में रामलीला की ऐतिहासिक परंपरा रही है। साथ ही बनारी के पं. रामरक्षित, धुरकोट के ठाकुर रणजीत सिंह, जांजगीर के पं. जगदीश्र चंद्र तिवारी तथा कोड़ाभाट के जगदीश्वर सिंह जैसे रामकथा वाचकों की परंपरा रही है।

यहां छत्तीसगढ़ के राम-साहित्य का संक्षिप्त उल्लेख प्रासंगिक होगा। छत्तीसगढ़ के कवि शुकलाल प्रसाद पांडेय (1885-1951) की रचना है ‘मैथिली मंगल‘। उन्होंने सरल भाव से व्यक्त किया है कि जबलपुर के राजा गोकुलदास के यहां विवाह का कल्पनातीत वृहद आयोजन देख कर उनके मन में आया कि राम-सीता का विवाह कितना दिव्य रहा होगा और उसे किस तरह से शब्दों में, काव्य में उतारा जा सकता है। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ की ही एक अन्य उल्लेखनीय और मनोरम रचना गिरधारीलाल रायकवार जी रचित हल्बी नाटक ‘सीता बिहा नाट‘ है। इस नाटक के संदर्भ में 1998 में मध्यप्रदेश के जनसंपर्क विभाग से प्रकाशित (तत्कालीन मंत्री हमारे गृह जिले के डॉ. चरणदास महंत) डॉ. हीरालाल शुक्ल संपादित-संयोजित हल्बी, माड़िया और मुरिया रामकथा के तीन भारी-भरकम खंडों का उल्लेख आवश्यक है, जिनमें गिरधारीलाल जी की यह रचना शामिल है। एक अन्य उल्लेख, छत्तीसगढ़ सम्मिलित मध्यप्रदेश के दौरान भोपाल में 1970 में ‘रामचरित मानस चतुश्शताब्दी समारोह समिति’ का गठन किया गया। इस समिति के संस्थापक हमारे गृहग्राम अकलतरा निवासी पं. रामभरोसे शुक्ल के मानस-मर्मज्ञ पुत्र पं. गोरेलाल शुक्ल जी (आईएएस) थे। समिति के मानस भवन से ‘तुलसी मानस भारती (मासिक)‘ पत्रिका का प्रकाशन पं. शुक्ल के प्रधान संपादकत्व में आरंभ हुआ। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के राम-साहित्य साधकों का स्मरण आवश्यक है, उन बहुतेरों में से कुछेक-

बिलासपुर निवासी महामहोपाध्याय जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ अल्प-चर्चित राम-रसिक हैं। उन्होंने तुलसी रामायण का अनुशीलन करते हुए महत्वपूर्ण मीमांसक कृतियों का प्रणयन किया, जो नवपंचामृत रामायण (1896), ‘तुम्हीं तो हो‘ का पहला भाग ‘रामाष्टक‘ (1914), श्रीतुलसी तत्वप्रकाश, रामायण प्रश्नोत्तरमाला सहित (1931), श्रीरामायण वर्णावली (1936), श्रीतुलसी भावप्रकाश (1937) हैं। डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र, मानस में रामकथा (1952), भारतीय संस्कृति को गोस्वामी तुलसीदास का योगदान (चार व्याख्यानों का संग्रह 1953), मानस-माधुरी (1958), खंड काव्य राम-राज्य (1960, पाठ्य संस्करण 1972), तुलसी-दर्शन (1938-39 में डी. लिट्. के लिए हिंदी में प्रस्तुत प्रथम शोध-प्रबंध, सातवां संस्करण 1967 में प्रकाशित) जैसी पुस्तकों के लेखक हैं।

हरि ठाकुर ने ‘छत्तीसगढ़ में रामकथा का विकास‘ शीर्षक लेख द्वारा इस विषय का विस्तार से परिचय दिया था। उनकी 1990 की डायरी में 47 रामकथा-साहित्य की सूची है, जो महाकवि नारायण के रामाभ्युदय महाकाव्य से आरंभ होती है, मगर क्रमांक में आरंभिक 10 इस प्रकार हैं- 1 राम प्रताप-महाकवि गोपाल, 2 तास रामायण-ठाकुर भोला सिंह बघेल, 3 छत्तीसगढ़ी रामचरितनाटक- उदयराम, 4 मैथिली मंगल-शुकलाल प्रसाद पाण्डेय, 5 कोशल किशोर-डा. बलदेव प्रसाद मिश्र, 6 छत्तीसगढ़ी रामायण-पं. सुन्दरलाल शर्मा, 7 वैदेही-विछोह- कपिलनाथ कश्यप, 8 राम विवाह- टीकाराम स्वर्णकार, 9 राम केंवट संवाद-पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र 10 राम बनवास- श्यामलाल चतुर्वेदी आदि। इस क्रम में हमारे जिले के मेरे गृह-ग्राम अकलतरा निवासी गुलाबचंद देवांगन का ‘छत्तीसगढ़ी रमायेन‘ उल्लेखनीय प्रकाशन है। यह क्रम लंबा है, इसे यहां विराम देते हुए वापस श्रीरामराज्यवियोग नाटक पर आते हैं।

श्रीरामराज्यवियोग नाटक की प्रकाशित पुस्तक में भूमिका स्वयं भोगहा जी ने लिखी है, इससे स्पष्ट होता है कि इस नाटक के प्रकाशन की योजना तैयार हो गई थी, मगर प्रकाशन-पूर्व उनका निधन हो गया। भूमिका में वे लिखते हैं- कई वर्षों के कठिन परिश्रम से आज इसकी भूमिका लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लोक प्रसिद्ध है,- ‘कोई भी वृहत् कर्म काल पा-कर, अवशेष पावे, तो उस कर्मकर्त्ता का हृदय अमित आनन्द का आगार बन जाता है।‘ उसी तरह मैं भी आज प्रफुल्ल हृदय हो, इस हर्ष से नहीं अघा सकता। इसका प्रारम्भ विचारने में एक कल्प बीत गया। अनेक आधि, व्याधि और उपाधियों से मन को कई बार समाधि देनी पड़ी थी। परन्तु दृढ़ साहस से अनेक असह्य दुःख रूपी पर्वत को लांघते आज अकस्मात् आनन्द-सागर के पुण्य-तट पर आ पहुँचा। ... ... ... इस पुस्तक की पूर्ति सात अंकों में हुई है। गर्भांकों की संख्या बीच बीच में मिलेगी। जिस प्रकार प्रस्तावना में प्रतिज्ञा है उसी रीति पर रचना की गई है। प्रत्येक रस को यथामति उनके स्वरूप ही में वर्णन किया है। यों तो इस में शक्तिभर प्रत्येक रस का विवरण है, परन्तु करुणा रस प्रधान है। इसी से मुझे सुदृढ़ आशा है कि, पाठक गण इसे आदर देंगे। ... ... ... इस कहावत से- परको अवगुण देखिये, अपनो दृष्टि न होय। करै उजरो दीप पै, तरे अँधेरो होय।। मैं अपना दोष नहीं देख सकता। आशा है कि, क्षमाशील पाठक गण कृपापूर्वक सूचित करेंगे, तो दूसरी आवृत्ति में अशुद्धियां शुद्ध कर दी जावेंगी। नाटक के पूर्व कवित्त है, जिसका अंतिम पद है- ‘धर्म चाहो कर्म चाहो वेदहू के मर्म चाहो, तो हे मीत! चाहो नित रामायण देखनो।‘ - रामायण में धर्म, कर्म और वेद का मर्म भी है। जैसाकि वाल्मीकि ने भी अपने ग्रंथ को ‘वेदोपबृंहणार्थाय‘ बताया है। शांत रस प्रधान, यथार्थपरक महाभारत का मूल स्वर वैराग्य है तो आदर्शपरक रामायण को करुणा-शोक का महाकाव्य निरूपित किया गया है। वाल्मीकि रामायण बालकांड द्वितीय सर्ग में ‘शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोका ...‘ कहा गया है। 

आनंदवर्धन, ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत की कारिका-5 में ‘मा निषाद ...‘ पर कहते हैं- ‘नाना प्रकार के शब्द, अर्थ और संघटना के प्रपंच से मनोहर काव्य का सारभूत वही अर्थ है। तभी सहचरी के वियोग से कातर कौंच के क्रंदन से उत्पन्न आदिकवि वाल्मीकि का शोक श्लोक रूप में परिणत हुआ है- ‘... शोकः श्लोकत्वमागतः‘। आगे चतुर्थ उद्योत की कारिका-5 में कहा है- ‘रामायणे हि करुणो रसः स्वयमादिकविना सूत्रितः ‘शोकः श्लोकत्वमागतः‘ इत्येवंवादिना।‘ इस तरह रामायण में स्वयं कवि ने करुण रस का प्राधान्य सूचित किया है।

श्रीराम-राज्य-वियोग नाटक में वही करुणा, वैसी ही दारुण व्यथा उभरती है, भोगहा जी ने स्वयं लिखते है- ‘मैं यह नहीं कह सकता कि, इस नाटक की रचना का अन्त, महाराज दशरथ के अन्त तक ही क्यों रखा गया?‘ ऐसा जान पड़ता है कि भोगहा जी की यह कृति उनके स्वयं के जीवन की रामायणमय-करूणा और व्यथा से उपजी है, उनके एक पत्र का हवाला पंडित लोचनप्रसाद जी ने दिया है, यह पत्र अपने अंतिम दिनों में उपचार के लिए प्रयाग के राजवैद्य पंडित जगन्नाथ शर्मा के यहां से उन्हें लिखा था- ‘मेरी दशा शोचनीय है। एक ईश्वर ही अवलम्ब है। कहो, कि यहाँ क्यों आये? मनमें निश्चय करके कि- डूब गये तो डूबगे, पार भये तो पार। पिता एक तरफ रोते रहते, स्त्री एक तरफ रोती रहती. प्रिय परिवार सब अपनी अपनी ओर खींचते। इससे निश्चिन्त यहाँ अटल समाधि लगा कर सो जाने का सानन्द समय मिलेगा।‘ क्या अपने नवजात पुत्र की मृत्यु के पश्चात से अस्वस्थ रहने लगे, मरणासन्न हाल में पहुच गए भोगहा जी का जीर्ण तन और व्यथित मन, अपने पिता के पुत्र-विछोह की आशंका महसूस कर रहा था? 

वियोग की करुणा और विराग की निष्काम तटस्थता में भी काव्य-रस का अविरल-प्रवाह, जीवन के उमंग को अनुप्राणित करता रहता है। 

(श्रीराम-राज्य-वियोग नाटक की प्रति का अवलोकन भोगहा जी के वंशज श्री वीरेन्द्र तिवारी जी एवं श्री हर्षवर्धन तिवारी जी के अनुग्रह से तथा श्री रवीन्द्र सिसोदिया जी के मार्गदर्शन और श्री रमाकांत सिंह जी के सहयोग से संभव हुआ।)

राहुल कुमार सिंह अकलतरा,
प्रमुख, धरोहर परियोजना,
बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर

Tuesday, October 25, 2022

खरौद

खरौद, पुनः खरौद और शिवरीनारायण। उन्नीस सौ अस्सी आदि दशक के दौरान इन दोनों स्थानों पर बार-बार जाते हुए, नोट्स लेता रहा था, वह सब मिला-जुला कर एक विस्तृत लेखनुमा शोधपत्र की तैयारी थी। अब जो, जितना, जैसा था, उनमें से पहला, ‘खरौद‘ प्रस्तुत-

सदियों से मानव के जीवन यापन का क्षेत्र, और वह भी यदि ऐतिहासिक कला-साधना की तपोभूमि भी रहा हो, अवश्य ही सहज आकर्षण का केन्द्र होगा। वर्तमान खरौद ऐसी ही पवित्र भूमि पर बसा है और इसका आकर्षण भौगोलिक स्थिति के कारण और भी प्रबल हो जाता है। अन्य लोगों सहित मेरी भी यह धारणा है कि नदी तट का क्षेत्र व निवासी, विशेषकर यदि वह संगम क्षेत्र का हो, मनो-भौगोलिक कारणों से स्वाभाविक ही उसका विकास उदारचेता व्यक्ति के रूप में होता है। विशालता, उदात्तता और विस्तृत सोच का समावेश उसके व्यक्तित्व में सरलता से दिखाई देता है और ऐसे व्यक्तियों का कृतित्व अपनी कला-संस्कृति को अभिव्यक्त व विकसित कर, सुदीर्घं अवधि तक युग चेतना को आह्लाद और दिशा-निर्देश प्रदान करता है। इस क्षेत्र का विशिष्ट पुरातात्विक स्थल खरौद भी ऐसा ही स्थान है। 

यों तो खरौद में इतिहास की झांकी अत्यंत प्राचीन काल से मिलने लगती है। यहाँ के ध्वस्त-उजड़े गढ़ के धरातल की ही प्राप्तियों के आधार पर उस भूमि पर सभ्यता का इतिहास २६०० साल से भी अधिक पुराना माना जाता है, किन्तु व्यवस्थित उत्खनन अथवा विशिष्ट प्राप्तियों जैसे- सिक्के, ठीकरे आदि के लगभग अभाव के कारण, इसकी तिथि-सीमा निश्चित किया जाना संभव न हो सका है। परन्तु साथ ही यह भी संभावना है कि संबंधित संस्थाओं, व्यक्तियों एवं ग्रामवासियों की जागरुकता व प्रयास से निश्चय ही ऐसे प्रमाण प्रकाश में आ सकते हैं, जिससे खरौद तथा साथ ही साथ इस क्षेत्र के ऐतिहासिकता की स्पष्ट रूपरेखा निर्धारित की जा सके।

पुरातत्व की दृष्टि से खरौद के गढ़ का विशेष महत्व है। यह इस क्षेत्र के लगभग सौ गढ़ों में से एक है, जिनकी स्पष्ट विवेचना अब तक नहीं हो सकी है तथा छत्तीसगढ़ के पुरातल में जिनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण समझी जाती है। लक्ष्मणेश्वर मंदिर के निकट का विशाल भू-भाग खाई से घिरा हुआ है यद्यपि वर्तमान में यह खाई स्थान-स्थान पर टूट गई है, किन्तु खाई (परिखा) की वृत्ताकार रेखा का अनुमान अब भी स्पष्टतः होता है। गढ़ क्षेत्र में पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण, उन्नत व विस्तृत टीले हैं तथा पूरे गढ़ क्षेत्र के धरातल पर टूटे-फूटे मिट्टी के बर्तन, धातु मल व कहीं-कहीं किसी संरचना के अस्पष्ट चिन्ह देखे जा सकते हैं। लगभग इसी क्षेत्र से सागर विश्वविद्यालय के सर्वेक्षण दल को मिट्टी के बर्तन का विशिष्ट टुकड़ा प्राप्त हुआ था, जिसके आधार पर डा. श्यामकुमार पान्डेय ने इस क्षेत्र की प्राचीनता chalcolithic होने की संभावना व्यक्त की है, किन्तु ऐसे अन्य प्रभावों की अभी भी प्रतीक्षा है, जिनसे यह संभावना, निश्चय में परिवर्तित हो सके।

‘खरौद‘ शब्द की व्युत्पत्ति एवं गढ़ के अस्तित्व में घनिष्ट संबद्धता मानी जा सकती है। इस शब्द का विग्रह ‘खर+उद्‘ किया जा सकता है, यहां ‘उद‘ शब्द का विशेष महत्व है। इस क्षेत्र के विभिन्न सर्वेक्षणों तथा बन्दोबस्त-जनगणना रपटों आदि में उदश् अन्त वाले ग्राम नामों को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है, जहाँ ‘उद‘ का तात्पर्य ‘जल‘ से है। खरौद निवासी पं. नन्हेंप्रसाद द्विवेदी ने भी लगभग यही व्युत्पत्ति सुझाई है। इस संदर्भ में इस विशेष संयोग की ओर ध्यान देना आवश्यक हो जाता है कि ‘उद्‘ अन्त नाम वाले ग्रामों से अधिकांशतः मिट्टी के गढ़ों (धूलि दुर्ग) की सूचना प्राप्त होती है। सागर विश्वविद्यालय ने अपने सर्वेक्षणों के आधार पर पूर्व में इन गढ़ों को ‘आटविक‘ प्रकार के दुर्ग ठहराया था, किन्तु अब डा. पान्डेय ने स्वयं अपने मत में परिवर्तन करते हुए उन गढ़ों का ‘औद्यक दुर्ग‘ होना स्वीकार किया है। डा. पान्डेय अपने हाल के सर्वेक्षणों से इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि इन गढ़ों की प्राचीनता २६००-२७०० साल की है, अपने मत की प्रामाणिकता हेतु उन्होंने भी गढ़ क्षेत्रों का उत्खनन आवश्यक माना है।

‘खरौद‘ की उपर्युक्त व्युत्पत्ति यदि मान्य होती है और ‘उदान्त‘ नाम वाले ग्रामों की संबद्धता ‘औद्यक दुर्गों‘ से स्वीकार कर ली जाती है, तो प्रचलित ‘खर$दूषण‘ से व्युत्पत्ति का मत स्वतः अमान्य करना होगा। वैसे भी धर्म-पुराणों पर आधारित दन्तकथाओं की तुलना में प्रत्यक्ष पुरातात्विक प्रमाण की मान्यता ही अधिक श्रेयस्कर है, किन्तु पुरातात्विक विवेचना में भी गढ़ों का शास्त्र सम्मत पूर्ण परीक्षण आवश्यक है।

खरौद गढ़ का व्यवस्थित इतिहास प्रकाश में नहीं आया है अतः यहां के मंदिरों के निर्माता शासकों व गढ़ प्रशासन की सम्बद्धता पर निश्चित टिप्पणी संभव नहीं है, किन्तु बाद के काल (लगभग अठारहवीं सदी ई.) में खरौद गढ़ के महत्व की सूचना प्राप्त होती है, जो अंग्रेजी शासन के आरंभ तक रही, जब खरौद छत्तीसगढ़ (तब छत्तीसगढ़ का मुख्यालय क्रमशः रतनपुर व बिलासपुर तथा रायपुर रहा, बाद में दो भिन्न जिला मुख्यालय बिलासपुर व रायपुर बने) का प्रमुख परगना था। तत्कालीन खरौद व अन्य प्रशासनिक ईकाइयों पर डा. प्रभुलाल मिश्र ने सविस्तार विवेचना की है। अंग्रेजी शासन के दौरान ही खरौद की प्रशासनिक इकाई के स्थान पर शिवरीनारायण तहसील मुख्यालय बनाया गया, जो सन् 1885 की बाढ़ के पश्चात् जांजगीर स्थानान्तरित हो गया।

इस प्रकार दो निकटस्थ प्राचीन धार्मिक स्थलों खरौद व शिवरीनारायण की महत्ता में महानदी की भूमिका अनुमानतः निर्णायक रही। महानदी को बहाव, प्राचीन काल में वर्तमान की अपेक्षा संभवतः बायीं ओर हटकर था अथवा बाढ़ के बहुधा प्रकोप से नदी के निकटतम स्थल शिवरीनारायण के स्थान पर खरौद धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित हुआ और संभवतः भौगोलिक परिवर्तनों से अनुकूल स्थिति बनने पर नदी के निकटतम स्थल, शिवरीनारायण का विकास हुआ। यही कारण हो सकता है, जिसके फलस्वरूप खरौद में सातवीं-आठवीं सदी ई. के पुरावशेष बहुलता से प्राप्त होते हैं जबकि शिवरीनारायण की ज्ञात लगभग समस्त सामग्रियों की प्राचीनता दसवीं सदी ई. से अधिक नहीं। इसी संदर्भ में यह उल्लेख भी आवश्यक है कि खरौद-शिवरीनारायण, जगन्नाथ पुरी, प्राचीन तीर्थयात्रा मार्ग का महत्वपूर्ण पड़ाव था।

संगम क्षेत्र और उसकी धार्मिक महत्ता के विकास में इस स्थल का इतिहास सोमवंशी काल (लगभग सातवीं सदी ई.) से आरंभ हुआ माना जा सकता है। सोमवंशी शासकों द्वारा इस स्थान पर अनेक मंदिरों का निर्माण कराया गया, जिनमें से मात्र लक्ष्मणेश्वर, इन्दल देउल व शबरी ही विद्यमान हैं। खरौद के शेष स्मारक जो स्थानीय पिछली पीढ़ी की स्मृतियों में है अथवा बेग्लर की रिपोर्ट (सन् 1873-74) में उल्लिखित हैं, वर्तमान में नष्टप्राय हैं। इनमें से एक, कथित सूर्य मंदिर का उल्लेख अवश्य किया जा सकता है। इन मंदिरों को दृष्टिगत करते हुए, यह कहना अत्युक्ति नहीं होगी कि खरौद तत्कालीन, अत्यंत विशिष्ट धार्मिक स्थल तो था ही, जो कोसली (तारकानुकृति) मंदिर स्थापत्य शैली के ईंटों के मंदिर-केन्द्र के रूप में आज भी देश का अद्वितीय केन्द्र है।

खरौद के तीन प्रमुख मंदिरों का काल अब तक सुनिश्चित नहीं हो सका है। इनमें से लक्ष्मणेश्वर मंदिर आठवीं सदी ई. का माना गया है। अन्य दो मंदिरों का काल सातवीं सदी ई. माना जाता है, किन्तु इनमें कौन सा अधिक प्राचीन है, यह निर्विवाद नहीं है। एक अमरीकी शोधकर्ता डोनाल्ड एम. स्टेडनर ने इन्दल देउल का काल ई. सन 650-660 तथा शबरी मंदिर का काल ई. सन् 700-710 निर्धारित किया है। लक्ष्मणेश्वर मंदिर के मंडप में जड़े एक सोमवंशी अभिलेख से यह सूचना प्राप्त होती है कि ईशानदेव ने लक्ष्मणदेव के मंदिर का निर्माण कराया और महामहोपाध्याय वासुदेव विष्णु मिराशी ने इस मंदिर को वर्तमान लक्ष्मणेश्वर मंदिर मानते हुए ईशानदेव की तिथि ई. सन् 540 निर्धारित की है। इस प्रकार इस मंदिर का निर्माण काल छठीं सदी ई. में पड़ता है। लक्ष्मणेश्वर मंदिर के उक्त शिलालेख में एक अन्य शासक इन्द्रबल का नाम प्राप्त हुआ है इस व्यक्ति नाम से इन्दल देडल की नाम-व्युत्पत्ति की समीक्षा भी रोचक आधार बन सकती है।

इन मंदिरों के काल निर्धारण संबंधी मतों की सूक्ष्म विवेचना भविष्य के शोध का विषय हो सकता है किन्तु यहां इतना कहना कि इन मंदिरों का निर्माण क्रम शबरी, इन्दल देऊल, लक्ष्मणेश्वर मंदिर, अधिक विश्वसनीय प्रतीत होता है।

क्रमानुसार विवरण में प्रथमतः शबरी मंदिर, जिसके संबंध में मान्यता स्वरूप शबरी और राम के जूठे बेर का प्रसंग, प्रचलित है अतः यह आदिवासी देवता से संबंधित माना जाता है किन्तु मंदिर के गर्भगृह में स्थापित प्रतिमा की पहचान अत्यधिक, वस्त्र अलंकरण के कारण निश्चित नहीं हो पाती किंतु यह अनुमानतः महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा का खंड है और प्रतिमा का शीर्ष भाग ही संभवतः मंदिर के बाहर एक छोटे से छतयुक्त चबूतरे पर स्थापित है। मंदिर का प्रवेश द्वार अत्यंत आकर्षण है। नाग- युग्म अलंकरण से रचे अभिकल्प का संतुलन देखते ही बनता है। प्रवेश द्वार के बीचों बीच ललाट-बिंब पर गरुड़ की आकृति उत्कीर्ण है। ललाट-बिंब पर गरुड़ की उपस्थिति से मंदिर वास्तु के शास्त्रीय निर्देशों के अनुसार संभव है कि मंदिर मूलतः वैष्णव रहा हो। प्रवेश द्वार पर ही उपर दोनों पार्श्वों में दो नारी आकृतियां हैं, एवं द्वार पार्श्वों पर ही मूल में भी दो नारी आकृतियां है। इन आकृतियों की पहचान आसानी से नदी-देवियों, गंगा एवं यमुना के रूप में की जा सकती है। इसके पश्चात मंडप की संरचना की चर्चा में पहले पर स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि मंदिर का यह भाग पुनर्संरचित है।

मंडप में अर्द्धस्तंभों पर विभिन्न प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं, जिनमें से दो प्रतिमाएं शिव गण अथवा शैव द्वारपाल के रूप में पहचानी जा सकती हैं। एक प्रतिमा सिंहवाहिनी दुर्गा की है। एक अन्य नारी प्रतिमा पादपीठ पर मकर अंकित होने के कारण गंगा के रूप में पहचानी जा सकती है। शेष तीन प्रतिमाएं, जिनमें दो पुरुष व एक नारी प्रतिमा है, की पहचान राम, लक्ष्मण व सीता के रूप में की गई है। कथित राम-लक्ष्मण की प्रतिमाओं को सूक्ष्मता से देखने पर प्रतिमाओं के वक्ष पर कवच व पैर उपानहयुक्त (जूतों से ढके) दिखाई पड़ते हैं, जिनसे संभावना प्रकट की जा सकती है कि ये प्रतिमाएं सूर्य के अनुचर या पार्श्व देवता हो सकते हैं। यदि इन प्रतिमाओं को सूर्य परिवार से संबंधित माना जाता है तो खरौद में सूर्य मंदिर की उपस्थिति तथा शबरी मंदिर का लोक प्रचलित नाम ‘सौंराई‘ जो ‘सौर‘ शब्द का अपभ्रंश हो सकता है, आदि अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं। इससे खरौद सौर सम्प्रदाय के एक विशिष्ट स्थल के रूप में दर्ज किया जा सकता है।

मंदिर के बाहर रखी व्याघ्रचर्मधारी अर्द्धनारीश्वर प्रतिमा संतुलित और आकर्षक है। मंदिर, भू-योजना में ताराकृति तथा ईंटों से निर्मित होने के कारण भारतीय स्थापत्य कला का विशिष्ट उदाहरण माना जाता है। संदर्भवश शिवरीनारायण की दो प्रतिमाओं की विवेचना भी आवश्यक है, जो वहां मुख्य मंदिर के अन्तराल में दोनों पार्श्वों में स्थापित हैं। ये दोनों आदमकद प्रतिमाएं, विष्णु के आयुध पुरुष अर्थात शंख एवं चक्र पुरुष हैं। शिरोभाग पर शंख व चक्र का अंकन अत्यंत रोचक है। ये प्रतिमाएं शबरी मंदिर के उक्त गण या द्वारपाल प्रतिमाओं के ही समरूप है।

इन्दल देउल मंदिर की योजना भी ताराकृति है और यह मंदिर भी ईंटों से निर्मित है, किन्तु मंदिर के चारों ओर आलों (चैत्य गवाक्ष अथवा कुडु) में विभिन्न प्रतिभाएं यथा- गणेश, नरसिंह आदि अब तक स्पष्ट पहचान में आती हैं। इन्दल देउल मंदिर का चबूतरा अथवा जगती, शबरी मंदिर की तुलना में भिन्न है। शबरी मंदिर को चबूतरे की ऊंचाई कम व विस्तार अधिक है जबकि इन्दल देउल का चबूतरा अधिक ऊंचा व कम विस्तृत है। इस मंदिर में विशेष महत्व की गंगा-यमुना की प्रतिमाओं का है, जो तत्कालीन भारतीय कला में अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं। इन प्रतिमाओं का प्रवेशद्वार की तुलना में आकार और अलंकरण सौंदर्य, दोनों ही विशिष्ट प्रकार का है। अतः भारतीय कला की प्रामाणिक पुस्तकों में इनकी चर्चा की गई है। भारतीय मंदिर वास्तु पर स्टेला क्रैमरिश ने स्तुत्य कार्य किया है, इनकी पुस्तक ‘द हिन्दू टेम्पल्स‘ में इन प्रतिमाओं का उल्लेख करते हुए लिखा है कि खरौद के इन्दल देउल की गंगा यमुना प्रतिमाएं पूरे प्रवेश द्वार की ऊंचाई की हैं और उन्होंने इसे विशिष्ट माना है। भारतीय हिन्दू प्रतिमा शास्त्र पर प्रामाणिक कार्य टी.ए. गोपीनाथ राव का माना गया है। उन्होंने अपनी पुस्तक में चित्र सहित इन प्रतिमाओं का विवरण दिया है। इस पुस्तक में अधिकांश दक्षिण भारत के ही प्रतिमा उदाहरणों का समावेश किया गया है। शेष भारत के ऐसे ही अद्वितीय उदाहरणों को सम्मिलित किया गया है। नदी देवियों की इन प्रतिमाओं के पार्श्व से भित्ति बाहर की ओर निकलती है जो वर्तमान में अंशतः शेष है किन्तु इससे अनुमान होता है कि मंदिर संरचना में मंडप आदि उपांग भी थे, जो अब नष्ट हो गये हैं।

लक्ष्मणेश्वर मंदिर का मंडप भी शबरी की भांति पुनर्संरचित है, जिसमें दो प्राचीन शिलालेख जड़े हैं। गर्भगृह का हिस्सा भी परवर्ती काल में अंशतः परिवर्तित है। इसी तरह अनुमान होता है कि यह मंदिर भी मूलतः ईंटों से निर्मित संरचना है जिसे बाद के काल में प्लास्टर से ढक दिया गया है। मंदिर के गर्भगृह में अष्टकोणीय शिवलिंग मूलतः विद्यमान है किन्तु ‘लैटराइट‘ पत्थर का होने के कारण जलवायुगत प्रभाव के कारण रन्ध्रयुक्त हो गया है और इसके संग लक्षरंध्रयुक्त होने की मान्यता जन-विश्वास में प्रबल हो गई है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर अन्य दोनों मंदिरों की भांति किन्तु भिन्न प्रकार से नदी देवियों का अंकन है। यहां प्रवेशद्वार की ऊंचाई दो भागों में विभक्त है, जिसके निचले भाग पर द्वारपाल व उपरी भाग पर गंगा व यमुना को उनके वाहनों क्रमशः मकर व कच्छप पर स्थित दिखाया गया है। मंदिर के प्रवेश द्वार के समक्ष मंडप दो स्तम्भ है। इनमें से एक स्तंभ पर रामकथा के दृश्य व सर्प अलंकरण युक्त है। जबकि दूसरे स्तंभ पर शैव धर्म से संबंधित उकेरन है। यह मंदिर धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्व है।

Saturday, October 8, 2022

तुलाराम गोपाल

तुलाराम जी के नाम से मेरा पहला परिचय 1980 में कुलदीप सहाय जी के माध्यम से हुआ। इस दौरान मैं ‘जांजगीर का विष्णु मंदिर‘ शोध निबंध के लिए नियमित जांजगीर जाता था। कुलदीप सहाय जी अनुभव, जानकारियों और संस्मरणों का खजाना थे। भीमा तालाब के सूख जाने और उसे साफ कराने के संस्मरण सुनाते हुए उन्होंने बताया था कि विष्णु मंदिर, शिखर रहित, अधूरा होने के कारण नकटा मंदिर या साथ लगे तालाब के नाम पर भीमा मंदिर कहा जाता है। मगर गर्भगृह में देव-प्रतिमा न होने के कारण पूजित नहीं है, इसलिए यह सूना मंदिर है और इसी नाम ‘सूना मंदिर‘ शीर्षक से तुलाराम गोपाल जी ने खंड काव्य की रचना की है। संयोग कि तब मेरी जानकारी इस चर्चा तक ही सीमित रही, किंतु स्मृति में यह बात बनी रही। इस स्मारक के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए साहित्यिक रचना करने वालों को यह नाम भा गया। साहित्यकार अश्विनी कुमार दुबे ने इस मंदिर पर लेख लिखा था, जिसका शीर्षक कुछ यूं था- ‘मैं सूना मंदिर हूं, मुझमें दीप धरो‘। 

तुलाराम जी के ‘सूना मंदिर‘ और साहित्यिक अवदान के प्रति मेरी जिज्ञासा बनी रही। पुनः अब संयोग बना कि मेरी मुलाकात तुलाराम जी के पुत्र सूर्य कुमार जी की पुत्री, अर्थात तुलाराम जी की सुयोग्य पौत्री अकलतरा निवासी श्रीमती वर्षा यादव से हुई, श्री रमाकांत सिंह जी माध्यम बने। वर्षा जी ने उत्साहपूर्वक सहयोग करते हुए तुलाराम जी की पुस्तक ‘शिवरीनारायण और सात देवालय (सोलह पुष्पों सहित)‘ का अवलोकन कराया, जानकारी दी कि ‘सूना मंदिर‘ के प्रकाशन की योजना है और तुलाराम जी के जीवन-वृत्त से भी परिचित कराया।

वर्षा जी से जानकारी मिली कि तुलाराम गोपाल जी का जन्म 31 जनवरी 1934 को चंद्रग्रहण के महामूल में हुआ था, जिससे यह बालक गरहन (ग्रहण) कहलाया। शाला-प्रवेश के समय गुरुजी ने तुलाराम गोपाल नामकरण किया। {संभवतः गुरुजी के मन में 1857 के क्रांतिवीर हरियाणा के अहिरवाल (यादव) तुलाराम राव की छवि थी।} बी.ए. एल.एल.-बी शिक्षा प्राप्त कर 1954 में सरकारी सेवा में आए। मगर शासकीय सेवा से त्यागपत्र दे कर 1968 से वकालत करने लगे। जांजगीर में ‘सांस्कृतिक विकास मंडल‘ की स्थापना में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिसके अंतर्गत सांस्कृतिक, धार्मिक एवं मानस के प्रचार प्रसार में उत्कृष्ट कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ. शांतिलाल गोपाल के सहयोग से स्वजाति बंधुओं के लिए संविधान एवं आचार संहिता का निर्माण किया। वे यादव महासभा के निर्वाचित अध्यक्ष भी रहे। आप मां शारदा के अनन्य भक्त थे। नवरात्रि पर्व में पूरे नौ दिवस मौन रह कर उपवास एवं हवन किया करते थे। आप के द्वारा निर्मित जांजगीर कचहरी चौक में स्थित मां शारदा मंदिर में आज भी नवरात्र में हवन एवं पूजन पूरे परिवार द्वारा किया जाता है। 19 अक्टूबर 1990 को एकादशी के दिन मां दुर्गा का विसर्जन हो रहा था, आप विधिवत नवरात्रि व्रत पूरा कर गो-लोक प्रस्थान कर गए।
 
‘बलिदान‘ और ‘पेकिंग सुनले मोर कबीर‘ के पश्चात पुस्तक ‘शिवरीनारायण और सात देवालय (सोलह पुष्पों सहित)‘ का प्रकाशन 1975 में जांजगीर से हुआ था। पुस्तक में कुल आठ मंदिरों- शिवरीनारायण का मंदिर, पीथमपुर का शिवालय, खरौद का अखलेश्वर मंदिर, अमरकंटक का नर्मदा मंदिर, चंद्रपुर की चंद्रसेनी देवी का मंदिर, चांपा की समलेश्वरी का मंदिर, जांजगीर का जगदंबा मंदिर और मैहर की शारदा माता मंदिर, पर काव्य रचना है। साथ ही शीर्षक अनुरूप, कुलदीप सहाय जी के शब्दों में ‘सोलह प्रार्थना-पुष्पों को इस पुस्तक में स्थान दिया है- वे षोडशोपचार पूजन की विविध विधियों के काव्यात्मक प्रतीक हैं।‘ 

पुस्तक में प्रकाशक सूर्य कुमार गोपाल, जांजगीर का वक्तव्य है। विस्तारपूर्वक भूमिका लिखी है, कुलदीप सहाय, अधिवक्ता (एवं सेवा, लोकमत, पीपुल्स व्हाइस आदि के यशस्वी भूतपूर्व संपादक) ने। जगदीश चन्द्र तिवारी, अधिवक्ता, जांजगीर के ‘दो शब्द‘ हैं। प्रकाशक की ओर से शुद्धिपत्र लगाया जाना उल्लेखनीय है। इसी तरह आमुख में रचनाकार तुलाराम गोपाल ने मार्के की बात कही है कि ‘प्रस्तुत पुस्तक के बोलते हुये मंदिरों के माध्यम से मैंने अपने साहित्यिक बंधुओं से एक आत्मीय निवेदन किया है कि वे कुतुबमीनार, ताजमहल, अजंता, एलोरा तथा विदेशों के कई स्थलों और प्रसंगों पर बहुत कुछ लिख चुके हैं। अब वे कृपया अपने घर और आसपास स्थित कथा वस्तुओं पर भी लिखने का कष्ट करें, जिन पर हमने समीपता के कारण सदा से उपेक्षा की है।‘ 

तुलाराम जी की भावना और विचारों के अनुरूप मेरा मानना रहा है कि हम सभी अपनी प्रत्येक स्थिति-संदर्भों के कारण विशेष-सुविधायुक्त होते हैं, (स्वाधीनता संग्राम के दौरान जेल में की गई रचनाएं इसका उदाहरण हैं।) इसका लाभ लेना चाहिए, साथ ही यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि आसपास ‘ स्थान, वस्तु, व्यक्ति, घटना‘ पर ध्यान रहे, क्योंकि यह हमें ही करना होगा, हम ही बेहतर कर सकते हैं और शायद हम न कर सके तो अन्य कोई करने नहीं आएगा। 

इस क्रम में तुलाराम गोपाल जी और उनके कृतित्व का स्मरण करते हुए गौरव-बोध हो रहा है।

Sunday, August 14, 2022

वीर नारायण सिंह - क्रांति और भ्रांति

ए.ई. नेल्सन संपादित 1909 के रायपुर गजेटियर के इतिहास खंड में सोनाखान, जो बिलासपुर से रायपुर जिले में स्थानांतरित किया गया था, के जमींदार नारायण सिंह और उनकी गिरफ्तारी का ब्यौरा है, जो सी.बी.एल. स्मिथ, स्थानापन्न असिस्टेंट कमिश्नर के पत्र क्रमांक 657, दिनांक 9 दिसंबर 1857 पर आधारित है। स्मिथ ने यह पत्र रायपुर के डिप्टी कमिश्नर लेफ्टिनेंट सी. इलियट को लिखा था।

शंभूदयाल गुरु, हरि ठाकुर और प्रभुलाल मिश्र जैसे विद्वानों ने मूल स्रोतों के आधार पर वीर नारायण सिंह से संबंधित इतिहास लेखन किया। सोनाखान के इस परिवार का माखन साव परिवार, कसडोल के मिश्र परिवार तथा पड़ोसी जमींदारियों के साथ विवाद की जानकारी मिलती है। 1835 की घटना का उल्लेख मिलता है, जिसमें नारायण सिंह पर कसडोल के देवनाथ मिश्र की हत्या का आरोप लगा था। प्रसंगवश हरि ठाकुर का खंड काव्य ‘शहीद वीर नारायण सिंह‘ उल्लेखनीय है, जिसका सन 2014 संस्करण, छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी, रायपुर द्वारा प्रकाशित किया गया है। इसी क्रम में हरि ठाकुर की परंपरा के संवाहक उनके सुयोग्य पुत्र ने ‘1857 सोनाखान‘ की रचना की है, जो इसी वर्ष 2022 में ‘हरि ठाकुर स्मारक संस्थान‘ से प्रकाशित हुई है। खंड काव्य के उक्त संस्करण की भूमिका डॉ. बलदेव ने लिखी है, जिसमें उन्हें संबोधित रामविलास शर्मा के 23.2.90 के पत्र का उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि ‘मेरी जानकारी में सन सत्तावन पर हिन्दी में खण्डकाव्य नहीं लिखा गया है।‘


उक्त खंड काव्य का आरंभ होता है, ‘ये महानदी के घाटी। ये छत्तिसगढ़ के माटी‘। यह पद आचार्य डॉ. रमेंन्द्रनाथ मिश्र का न सिर्फ तकिया कलाम जैसा हो गया, उन्होंने वीर नारायण सिंह संबंधी विभिन्न प्रकाशन कराए। सन 1998 में मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी ने उनके द्वारा संपादित ‘वीर नारायण सिंह‘ का प्रकाशन किया। एक अन्य पुस्तिका 10 मई 2008 को संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन के सौजन्य से प्रकाशित हुई, जिसके संपादक आचार्य रमेंद्र नाथ मिश्र,और लेखक डॉ. श्रीमती सुनीत मिश्र हैं। पुस्तिका का शीर्षक ‘छत्तीसगढ़ में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम-1857‘, ‘सोनाखान के जमींदार क्रांतिवीर नारायण सिंह‘ है। इस बीच डॉ. रमेन्द्र नाथ मिश्र, डॉ. श्रीमती सुनीत मिश्र की पुस्तिका ‘छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद वीर नारायण सिंह‘ का प्रकाशन तथा इसी शीर्षक से पुनर्प्रकाशन हुआ, जिसमें लेखक का नाम नहीं है। इतिहासकार आचार्य रमेन्द्रनाथ मिश्र द्वारा तैयार की गई, किंतु ‘छत्तीसगढ़ जनसंपर्क‘ द्वारा मुद्रित कराई गई इतिहास संबंधी इन पुस्तिकाओं में प्रकाशन तिथि/वर्ष का उल्लेख नहीं है। पुस्तिकाओं में मुख्यमंत्री अजीत जोगी का संदेश है तथा मंत्री माधव सिंह ध्रुव के संदेश में ‘नवनिर्मित छत्तीसगढ़‘ उल्लेख है, इससे अनुमान होता है कि उक्त पुस्तिकाओं का प्रकाशन सन 2000 में हुआ है।


पुस्तिका के मुखपृष्ठ में अंकित है- ‘रायपुर का जयस्तंभ जहां पर वीर नारायण सिंह को फांसी पर लटकाया गया।‘ बैक कवर पर बताया गया है कि ‘सम्प्रति वीर नारायण सिंह का कोई चित्र उपलब्ध नहीं है, रायपुर जेल, संबलपुर, नागपुर, भोपाल, दिल्ली एवं सोनाखान में उनके परिजनों से भी जानकारी ली गई किंतु कोई अधिकृत चित्र उपलब्ध नहीं हो सका। उनके पारिवारिक जनों से प्राप्त जानकारियों के आधार पर चित्र बनाया गया जो कल्पित है, परन्तु वर्णित व्यक्तित्व के अनुरूप है।‘ साथ ही परिकल्पना- डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र और चित्रांकन- अरूण काठोटे का नामोल्लेख है। जबकि 10 मई 2008 को प्रकाशित पुस्तिका के मुखपृष्ठ पर तलवारधारी घुड़सवार का चित्र है, जिसमें आवरण: अजय देशकर, नामोल्लेख है।

इस तारतम्य में शहीद वीर नारायण सिंह की फांसी, फांसी-स्थल, चित्र आदि के बारे में पूछ-परख होती रहती है और बार-बार कई भ्रामक जानकारियां आती रहती हैं। इसलिए यहां कुछ मुख्य तथ्यों और दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जा रहा है। माना जाता है कि शहीद वीर नारायण सिंह, गुरु बाबा घासीदास और पं. सुंदरलाल शर्मा की चर्चा 1980 के बाद अधिक होने लगी। पी. साईनाथ की सोनाखान मौके की, टाइम्स ऑफ इंडिया में 1997 में प्रकाशित रपट भी खासी चर्चा में रही थी। 

इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ की शोध-पत्रिका ‘कला वैभव‘ के अंक-7, अप्रैल 1997 में डॉ. सीताराम शर्मा का ‘अमर शहीद वीर नारायण सिंह‘ शीर्षक लेख शामिल है, जिसमें उल्लेख है कि ‘उन दिनों रायपुर की ‘‘पुलिस लाइन‘‘ उस स्थान पर थी जहां आज पूर्वी छोर में स्टेट बैंक की इमारत और जय स्तम्भ है तथा पश्चिम छोर में शारदा चौक है। इसलिए यहीं विद्रोहियों को दण्ड दिया जाता था। जिस स्थान पर जय स्तम्भ बना है, वहीं पर देशभक्त वीर नारायण सिंह की जीवन-लीला समाप्त की गई थी। "हिस्ट्री ऑफ फ्रीडम मूव्होन्ट इन मध्यप्रदेश" के अनुसार सेना और जन समुदाय के सामने स्वतंत्रता सेनानी नारायणसिंह खुले आम फांसी पर लटका दिये गये। "रायपुर गजेटियर" के अनुसार लोगों की भीड़ और सेना की उपस्थिति में वे तोप से उड़ा दिये गये। तथ्य चाहे कुछ भी रहा हो, सत्य तो यही है कि वीर नारायण सिंह सन् 1857 के प्रथम स्वातंत्र्य संग्राम के अमर शहीद हो गये।

वीर नारायण सिंह से संबंधित तथ्यों का परीक्षण करते हुए प्राप्त दस्तावेजों, चित्रों की प्रति और इस संबंध में मेरी टिप्पणी-

मध्यप्रदेश अभिलेखागार में वीर नारायण सिंह से संबंधित
कम से कम तीन महत्वपूर्ण दस्तावेज होने की जानकारी मिलती है।


वीर नारायण सिंह की गिरफ्तारी
(मिलान/पुष्टि के लिए साथ मूल की प्रति भी लगाई गई है।)


फांसी आदेश की प्रति और यथासंभव पाठ


फांसी की जानकारी वाले पत्र की प्रति 
और यथासंभव पाठ



डाक टिकट, जिसके कारण भ्रम की स्थिति बनी।
बताया जाता है कि विज्ञप्ति जारी कर
डाक-तार विभाग ने इस भूल पर खेद जताया था।
यदि ऐसा नहीं हुआ था, तो ससंकोच कि
अभी तक क्यों नहीं? पहल करने की आवश्यकता है।
और यह भी नहीं तो इस भूल को दुहराने से तो बचें।

सोनाखान के शहीद वीर नारायण सिंह की तस्वीर,
जिसे राजस्थान के ठाकुर नारायण सिंह की तस्वीर में मामूली फेर-बदल कर बनाया गया है।
वर्तमान में यही तस्वीर स्वीकृत-मान्य है, जबकि वीर नारायण सिंह के वंशजों की तस्वीर के आधार पर
अब साफ्टवेयर की सहायता से तस्वीर तैयार कराया जाना चाहिए।

पुराने सर्किट हाउस, वर्तमान राजभवन का चौक,
जहां वीर नारायण सिंह के स्मारक स्वरूप कलाकृति कर लोकार्पण,
तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह जी ने किया था।
फांसी का स्थान डीकेएस भवन के पीछे
जेल-बैरक भवन के आसपास का कोई स्थान रहा होगा
किंतु अब सामान्यतः वह स्थान आजादी के बाद स्थापित
जय स्तंभ चौक को मान लिया जाता है।
 
डीकेएस अस्पताल के पीछे,
वर्तमान स्वास्थ्य विभाग के कार्यालय से संलग्न भवन,
पुराना जेलखाना, जहां वीर नारायण सिंह कैद रहे होंगे।





लेखक और प्रकाशन वर्ष उल्लेख रहित, सूचना तथा प्रकाशन संचालनालय, भोपाल द्वारा प्रकाशित पुस्तिका का मुखपृष्ठ, जिस पर रमेंन्द्रनाथ मिश्र जी के हस्ताक्षर के साथ तिथि 24.12.83? है। इस पुस्तिका में उल्लेख है कि ‘दिनांक 10 दिसम्बर 1957 को नारायण सिंह को रायपुर के एक प्रमुख चौराहे पर लाया गया, वहां सेना और भारी जनता के सामने क्रान्ति वीर को तोप के गोले से उड़ा दिया गया। वीर नारायण सिंह ने जहां शहादत पाई थी, रायपुर के उस स्थान को आज जय स्तंभ चौक कहते हैं।साथ के अखबार की कतरन में डा. रमेंद्रनाथ मिश्र के हवाले से उल्लेख आया है कि ‘फांसी की सजा के बाद 6 दिन तक शव को फंदे पर ही लटकाए रखा।‘, मगर इस बात का अन्यत्र कोई अधिकृत स्रोत मुझे प्राप्त नहीं हुआ है।
राज्य शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् छत्तीसगढ़ द्वारा
 ‘छत्तीसगढ़ की विभूतियां‘ पुस्तिका प्रकाशित की गई है,
जिसमें प्रकाशन वर्ष का उल्लेख नहीं है
किंतु ‘अरपा पइरी के धार...‘ राज्यगीत होने से
तय किया जा सकता है कि यह नवंबर 2019 के पश्चात प्रकाशित हुई है।
इसमें तोप वाले डाक टिकट का चित्र है और
विवरण में जयस्तंभ चौक पर फांसी दिये जाने का लेख है। 

राजवर्द्धिनी संगीता की पुस्तक ‘क्रांति वीर नारायण सिंह‘, सन 2014 में आई। पुस्तक पर ‘संस्कृति विभाग‘ छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग से प्रकाशित, छपा है। लेखिका ने मार्गदर्शन के लिए डॉ. र(ा?)मेन्द्रनाथ मिश्रा का शुक्रिया किया है। इस पुस्तक में उल्लेख है- ‘दिनांक 09 दिसम्बर 1857 को इलियट ने रायपुर स्थित तीसरी भारतीय पदाति सेना के कमांडर को सूचित किया कि नारायण सिंह को अगले दिन उषाकाल में फांसी पर लटकाया जाएगा। अतः इलियट ने निवेदन किया कि कमांडर इस कार्यवाही को देखने और जरूरत पर व्यवस्था बनाए रखने के लिए उनकी कमांड में जो रेजीमेंट है उसको जेल के निकट परेड कराये।‘ (पेज-131) तथा ‘आखिरी सांस लेने वाले नारायण सिंह को पकड़कर फांसी के फन्दे तक लाया गया और जबरदस्ती उनको फांसी पर लटकाया गया।‘ (पेज-133)

इस पुस्तक में असंगत जानकारी वाला हस्तलिखित लेखी प्रकाशित है (पेज-156-157), जिसका मजमून शब्दशः पत्र के चित्र के नीचे दिया जा रहा है। साथ ही अगले पेज पर वंशावली दी गई है, जिसके अनुसार पिता-पुत्र क्रम इस प्रकार है-
रामराय - नारायण सिंह - गोविन्द सिंह - भगवान सिंह - बैजल सिंह - रजपाल सिंह - कंवल सिंह - राजेन्द्र सिंह।

मैं दिवान राजेन्द्र सिंह प्रपौत्र स्व शहिद वीर नारायण सिंह अपने पूर्वजों से किंवदन्ती के अनुसार प्रमाणित करता हूं कि -
स्व. शहीद वीर नारायण सिंह को फांसी के पहले अन्तीम इच्छा पुछा गया- विर नारायण सिंह ने अपना राजकिय पोषाक मांगा एवं सिर से लेकर पैर तक दिखने वाला दर्पण की मांग की .

पस्चात् अपने हाथों, शिशा तोड़कर अपना गला काट लिया- जिनके मृत्यूपरान्त फांसी में लटका कर तोप से उड़ाया गया।

श्री रामराय पहले टूड्रा में रहते थे-

माखन द्वारा- (अनाज बंटवाने सम्बन्ध में) विर नारायण सिंह का पुतला एवं जिराबाई का पुतला बनाकर रोज सुबह शाम मारा जाता रहा जब इस घटना का पता चला तो नारायण सिंह द्वारा माखन परिवार का सफाया किया गया.

महाराज साय को मारने गोविन्द सिंह के साथ सम्बलपुर से कुछ सैनिक आये थे। जो वापसी में रास्ता भूल जाने के कारण देवरी वालों द्वारा उनकी देवी र्भे बली चढ़ा दिय गया -

वीर नारायण सिंह जी को ठाकुर-महाराज से सम्बोधित किया जाता था एवं गोविन्द सिंह को- बाबु की उपाधि से सम्बोधित करते थे।

अतः उपरोक्त कथन मैंने अपने पूर्वजों के मुंह से सुना था जो कि मेरी जानकारी में सत्य एवं सही है।

इस लेखी में आदमकद दर्पण में स्वयं की राजकीय (पागा, पिछौरी, पनही वाली) छवि देखना और शीशा तोड़कर गला काट लेना तथ्य नहीं माना जा सकता, मगर इसका आशय प्रतीत होता है कि शीशे को तोड़ कर उसमें बनी अपनी छवि को खंडित करते स्वयं के अस्तित्व को भी उसी तरह बिखर कर नष्ट हो जाने देना है। इस ‘कथन‘ को पूर्वजों के मुंह से सुना बताया गया है। निसंदेह कोई परिवार अपने पितृपुरुषों के स्मरण में उनके प्रति सम्मान और वंश-गौरव का ध्यान अधिक रखता है न कि दस्तावेजी इतिहास का। इस दृष्टि से यह भी इतिहास के उस पार्श्व को प्रकाशित करता है जिससे रासो-प्रशस्ति-स्तुति साहित्य रचा जाता है, अतः मेरे लिए यह इतिहास पूरक, एक कविता की तरह पढ़ा जाने वाला अभिकथन है।

इस बीच प्रधानमंत्री-युवा पुस्तकमाला में बलौदा बाजार निवासी इंदु वर्मा की पुस्तक ‘सोनाखान के सपूत शहीद वीर नारायण सिंह‘ आई है। युवा लेखक का प्रयास, विशेषकर पुस्तक की संदर्भ सूची उल्लेखनीय है। पुस्तक के पेज 66-67 पर वीर नारायण सिंह की फांसी के स्थल के संबंध में इतिहासकारों के दो मत की चर्चा है, मगर फांसी आदेश का चित्र देवनागरी-हिंदी में है, यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह मूल आदेश का अनुवाद है। कुछ अन्य बिंदु जिन पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है, वीर नारायण सिंह के डाक टिकट को छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा 1987 में जारी किया गया बताया है, जबकि डाक टिकट भारत सरकार जारी करती है और तब छत्तीसगढ़ पृथक राज्य भी नहीं था। इसी तरह पेज 24 पर माखनलाल बनिए का गोदाम कसडोल में बताया जाना भ्रामक है।

छत्तीसगढ़ के इतिहास से संबंधित ऐसे कई तथ्य हैं, जो उपेक्षित हैं, नजर-अंदाज हैं या सुविधापूर्ण व्याख्या के साथ, भ्रामक रूप में धड़ल्ले से प्रचलित हैं। आवश्यकता है कि अपने इतिहास के गौरवशाली पन्नों को तथ्य, मूल-प्राथमिक स्रोत और आधार के सहारे सार्वजनिक और स्थापित किया जाय। इतिहास संशोधन के लिए अपने पसंद का इतिहास नहीं, बल्कि प्रयास कर तथ्यात्मक जानकारियों वाला विश्वसनीय इतिहास तैयार करना आवश्यक होता है।

प्रसंगवश, वीर नारायण सिंह वाले माखन साव की जानकारी सामान्यतः नाममात्र को मिलती है। माखन साव कहां के निवासी थे, उनकी धान की कोठी कहां थी, उनका परिवार-वंशज अब कहां है? आदि की चर्चा नहीं होती। इसे इतिहास अध्ययन की दृष्टि से एकांगी माना जाएगा। वीर नारायण सिंह की शहादत का सम्मान और महत्व उन जानकारियों के सामने आने से कम नहीं हो जाता। इसके बावजूद माखन को लगभग सभी लेखन में जमाखोर बनिया बताते हुए अनावश्यक ही खलनायक की तरह उभारा गया है। इस प्रसंग में स्पष्ट करना आवश्यक है कि चर्चित धान की कोठी (ढाबा) ग्राम हसुवा में थी, जो माखन साव के भाई गोपाल साव की देखरेख में थी। माखन साव, शिवरीनारायण का प्रतिष्ठित समाजसेवी, साहित्यप्रेमी परिवार रहा है, जिसका उल्लेख पं. शुकलाल पांडेय की कविता में आया है साथ ही ठाकुर जगमोहन सिंह ने ‘सज्जनाष्टक‘ में उन्हें शामिल किया है। इस केशरवानी परिवार के एक कुल दीपक डॉ अश्विनी केशरवानी का कथन यहां उद्धरण योग्य है- ‘जमाखोर वास्तव में माखन कौन थे, उसे अंधकार में रखकर प्राध्यापकों ने शोध कार्य किया है जो किसी भी मायने में उचित नहीं है।‘ माखन साव से संबंधित विस्तृत जानकारी ‘माखन वंश‘ में उपलब्ध है। 

पुनश्च-

इस पोस्ट पर सुधिजन की टिप्पणियां आईं, जिसमें पीयूष कुमार ने ध्यान आकृष्ट कराया कि इंटरनेट पर वीर नारायण सिंह के नाम पर किस तरह की जानकारियां हैं- 
स्वतंत्रता सेनानियों के नाम पर हम किस प्रकार का ‘भारत माता मंदिर‘ संग्रहालय बनाने जा रहे हैं! इस भ्रामक और आपत्तिजनक सामग्री पर मेरी टिप्पणी।

वर्ष 2024 में शासन द्वारा जारी विज्ञापन में
शहीद वीर नारायण सिंह का एक अन्य चित्र है,
संभव है कि इस चित्र का कोई आधार हो,
मगर इसकी जानकारी मुझे नहीं मिल सकी है, और
यह 19 वीं सदी के किसी जनजातीय व्यक्ति का चित्र होना
विसंगत लगता है।
 

Wednesday, December 22, 2021

रामः मूर्त और अमूर्त

‘छत्तीसगढ़ में रामः मूर्त और अमूर्त स्वरूप‘ राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन संस्कृति विभाग, छत्तीसगढ़ शासन द्वारा 5 से 7 फरवरी 2021 को किया गया था। संगोष्ठी के साथ श्रीराम यात्रा स्थलों की छायाचित्र प्रदर्शनी, रामनामी भजन तथा रामकथा के प्रसंगों की सांस्कृतिक प्रस्तुति के साथ स्थल भ्रमण का कार्यक्रम हुआ। शनिवार, 6 फरवरी के एक अकादमिक सत्र का दायित्व मुझे सौंपा गया, उस अवसर पर अध्यक्षीय वक्तव्य के रूप में कही गई बातें, मुख्यतः रिकार्डिंग तथा अपने नोट्स और स्मृति के आधार पर संशोधित कर यहां प्रस्तुत है-

राम-राम, जय जोहार। आप सबसे दुआ सलाम होती रही है, लेकिन औपचारिक तौर पर माइक्रोफोन पर आकर अब फिर से एक बार राम-राम। ‘राम वन-गमन पथ’ जिसकी बात आज यहां हो रही थी, राज्य में हो रही है, हम यहां प्रदर्शनी में देख रहे हैं और संगोष्ठी का विषय भी है- राम: मूर्त और अमूर्त। यहीं से अपनी बात शुरू करता हूं। दरअसल राम के मूर्त और अमूर्त दोनों पक्षों के बीच अगर हम कोई समन्वय देख पाते हैं, उसे देख पाने का, समन्वय का, महसूस कर पाने का ही, यह आयोजन है। कई शोध-पत्रों में, और उनमें आई बहुत सारी जानकारियों से स्पष्ट हो रहा है कि यह राम के नाम का ही प्रभाव है कि यहां पढ़े जा रहे परचों में शोध तो है ही लेकिन साथ-साथ उसमें अपनी अमूर्त-आस्था की बात भी कही गई है।

इस सत्र के संयोजक डॉ. ब्रजकिशोर प्रसाद, तथा प्रतिवेदक डॉ. रामकिंकर पाण्डेय का अभिवादन करते हुए, शैलेश कुमार मिश्रा जी का अंगरेजी परचा, जिसमें छत्तीसगढ़ की संस्कृति में भगवान श्री राम और रामकोठी की चर्चा हो रही थी, रामकोठी के बारे में बहुत सारी जानकारियां आई हैं और यह हमारे लिए गौरव का विषय है कि यह सामुदायिक सहकारिता की व्यवस्था है, बैंकिंग की, ऋण की व्यवस्था है, वह राम के नाम पर पारंपरिक रूप में छत्तीसगढ़ में अभी भी विभिन्न स्थानों में है। ललित शर्मा जी ने शुभ्रा रजक जी के साथ, छत्तीसगढ़ के रामनामी पंथ को रामभक्ति की पराकाष्ठा निरूपित करते हुए बहुत विस्तार से बातें रखीं। उनके परचे पर एक दो बात कहना चाहूंगा कि रामनामियों पर बहुत गंभीर शोध हुए हैं, जिनमें खासकर, एक शोध हुआ था, अमेरिकी शोधार्थी थे, डॉ. लैम्ब, उन्होंने अपना नाम बदलकर रामदास कर लिया था डॉ. रामदास लैम्ब। ‘रैप्ट इन द नेम: द रामनामीज, रामनाम एण्ड अनटचेबल रिलीजन इन सेन्ट्रल इंडिया‘ नामक उनकी पुस्तक है। दूसरी शोधार्थी दक्षिण भारतीय महिला हैं, जो भोपाल में रहती थी और अब इंग्लैंड में हैं सुन्दरी अनीथा, उनका भी रामनामियों पर शोधकार्य है- डॉमिनेंट टेक्स्ट्स, सबआल्टर्न परफारमेंसेजः टू टेलिंग्स आफ द रामायण इन सेंट्रल इंडिया। रामनामियों पर ये दो पुराने काम बहुत महत्वपूर्ण हैं और अब भी अध्ययन-प्रलेखन हो रहा है, फिल्म्स डिवीजन ने वृत्त-चित्र तैयार कराया है, इस विशिष्ट परंपरा का, हमारी धरोहर का, इस तरह सम्मान, यह सब आवश्यक और बहुत महत्वपूर्ण है।

पीयूष कुमार पाण्डेय जी ने छत्तीसगढ़ में राम और जनजातीय समाज की चर्चा, सरगुजा के संदर्भ में की है। आज ही मैं याद कर रहा था, समरबहादुर सिंह जी की बहुत प्रसिद्ध पुस्तक है ‘सरगुजा एक अध्ययन’, उन्होंने सरगुजिया रामायण पर भी गंभीर काम किया है। रामकथा पर सरगुजा में और भी काम इस तरह के हुए हैं। चंद्रशेखर शर्मा जी ने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में राम के व्यापक संदर्भों को रेखांकित किया। अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक आदरणीय योगेन्द्र प्रताप सिंह जी, तथा संजीब कुमार सिंह जी, डा. रामवतार शर्मा जी यहां हैं, जिनकी सार्थक भागीदारी से इस आयोजन की गरिमा बढ़ी है।

कुछ बातें संक्षेप में कहूंगा। राम के नाम पर जितनी बातें होती हैं, ‘बौद्धिक विमर्श‘ होते हैं, राम की सत्ता, वन-गमन पथ, उसकी ऐतिहासिकता आदि के संबंध में, उसके लिए एक बात याद आती है कि, यूं बड़े हल्केपन से कहा जाता था उस चुटकुले का मर्म मुझे बहुत बाद में समझ में आया। एक मरीज आपरेशन थियेटर में है, आपरेशन होता है और डाक्टर कहता है ‘ओह गॉड, सारी, ही इज नो मोर‘ और अपना छुरा, चाकू, कैंची, छोड़़कर, दस्ताने उतार कर, बाहर जाने लगता है। सिस्टर सब सामान इकट्ठा करने लगती है, मरीज कहता है कि सिस्टर मैं अभी जिंदा हूं। सिस्टर उससे कहती है ‘चुप रहो तुम डाक्टर से ज्यादा जानते हो क्या?‘ दरअसल हम उस युग में जी रहे हैं। ‘उस युग में जी रहे हैं‘ का आशय था कि, मैं किसी का नाम नहीं लूंगा, संदर्भ बार-बार आपके सामने आते होंगे, जाति प्रमाण-पत्र, जन्म प्रमाण-पत्र, मृत्यु प्रमाण-पत्र के अभाव में किसी तरह से किसी व्यक्ति के होने का अस्तित्व नकार या स्वीकार करने की स्थिति बन जाती है और वह विवादित हो जाता है। हमारे अब के समकालीन साथ के लोगों में जिनको हम जन्मना जान रहे हैं, उनकी जाति उनका जन्म, विवादित हो जाता है। फिर यह, यानि राम वन-गमन पथ, राम की ऐतिहासिकता, तो सदियों पुरानी बात है, उसका कभी मूर्त होना अब हमारी सामूहिक चेतना में अमूर्त सुरक्षित है। हमारी आस्था, हमारी परंपरा और हमारे विश्वास से संपृक्त।

मेरे सामने एक अवसर आया पासपोर्ट बनाने का, आवश्यक दस्तावेजों की सूची मिली, उसमें जन्म प्रमाण-पत्र भी था, मेरा जन्म प्रमाण-पत्र था नहीं, मैं घबरा गया, अब क्या करूंगा, मेरा अस्तित्त्व ही नहीं, ऐसी पासपोर्ट वाली दुनिया में। फिर ध्यान गया, कोई ‘कट आफ डेट‘ थी कि अगर अमुक सन के पहले पैदा हुए हों तो स्कूल के प्रमाण-पत्र में दर्ज जन्मतिथि से काम हो जाएगा, तब जाकर राहत हुई। हम इस युग में जी रहे हैं, जब राम की बात करते हैं तब वह बीती हुई, भूतकाल की बात है और भूतकाल की बात अनुमान होती है, वहां सिर्फ दस्तावेज और इतिहास के भरोसे नहीं, बहुत कुछ आस्था से चलता है। आप यहां जिस आधार पर आमंत्रित किये गये उस नस्ती पर जिसने दस्तखत किए, जिसके कारण आदेश जारी हुआ, वे इस विभाग के संचालक हैं। जब आपको आमंत्रण पहुंचा, हो सकता है कि आप नाम से परिचित हों, लेकिन शायद ही जानते हों, कि हस्ताक्षरकर्ता पदाधिकारी वास्तव में कौन है? और सोचिए उस अनजान के दस्तखत के भरोसे आप यहां पधारे। दुनिया इसी तरह चलती है। एक दूसरे के विश्वास के आधार पर। पूरा का पूरा एक नक्शा बन जाता है, कागज पर, एक प्लान, एलिवेशन बन जाता है, और वही मूर्त रूप लेता है, किसी भवन का, किसी मंदिर का। मूर्त और अमूर्त की आवाजाही, अभेद।

राम के बारे में एक प्रसंग रोचक लगता है। डा. के.पी. वर्मा जी के परचे का संदर्भ ले रहा हूं, शंभू यादव जी ने भी प्रकाश डाला था। विष्णु के दशावतार प्रतिमाओं की चर्चा थी। दशावतारों में, सातवें राम हैं। मूर्ति शिल्प में कई बार बलराम एक लिंक-संयोजक पात्र हैं। वे देवकी और रोहिणी के भी संयोजक हैं। एक में गर्भ, जन्म कहीं और। एक जगह वो सहोदर हैं एक जगह सयोनिज हैं। वे जिस तरह दो मांओं को आपस में जोड़ते हैं, उसी तरह कृष्ण और राम को भी जोड़ते हैं। विकास क्रम की बात ध्यान करा रहा हूँ, कहा जाता है परशुराम, सभ्यता के उस चरण के हैं जो आखेट का, आखेटजीवी युग था, परशु ले कर चलते हैं, शिकारी मानव के प्रतिनिधि हैं, जो गुफावासी मानव था। जब मानव सभ्यता मुख्यतः शिकार पर आश्रित थी। उसके बाद धनुर्धारी राम आते हैं, शिकार वे भी कर रहे हैं, लेकिन परशु वाला आदिम शिकार नहीं, धनुष-बाण से शिकार कर रहे हैं। वे कृष्ण से जुड़ते हैं, कृष्ण गो-पालक हैं, राम और कृष्ण, दोनों के बीच हलधारी, हलधर बलराम हैं। इस तरह परशुराम, राम और बलराम तीनों के नाम में राम तो हैं ही लेकिन कृष्ण और राम के बीच यानि धनुर्धारी शिकारी, और गोपालक के बीच, हलधारी कृषक बलराम इनमें संयोज्य, देखा जा सकता है। यों लक्ष्मण और बलराम दोनों, शेषावतार ही हैं।

एक और बात। हास्यास्पद लगने वाला विवाद होता है, कोई कथा ऐसी आई जो प्रचलित स्थापनाओं से कुछ अलग है, तो कहा जाता है कि बदमाशी है उस जर्मन मैक्समूलर की, आकर उसने सब वेद-शास्त्रों की तबाही कर दी, सब सत्व निकाल लिया। हमारे धर्म-ग्रंथ फिरंगियों के हाथ में पड़े, और उन लोगों ने गड़बड़ कर दी। लेकिन कथाओं का भिन्न पाठ गीता प्रेस के संस्करण में भी हो, तब बात बनाई जाती है, वह तो क्षेपक है। हम अपनी उदार परंपरा के विपरीत, अपनी मान्यता, अपनी धारणा से अलग किसी बात को स्वीकार करने में कई बार बहुत संकीर्ण होने लगते हैं। ए. के. रामानुजन बड़े अध्येता हैं शास्त्रों के, उनकी प्रसिद्ध पुस्तक, वस्तुतः एक छोटा सा शोध-पत्र है ‘थ्री हंड्रेड रामायणाज ...’। इसी तरह फादर कामिल बुल्के, यानि बाबा बुल्के का रामकथा पर शोध है, उस काम के आधार पर 300 रामायणों की बात कही जाती है, वैसे रामायण और रामकथा उससे भी अधिक हैं,‘रामायन सत कोटि अपारा‘। इनमें अलग-अलग कथा-क्रम और कथा का विन्यास, विकास है, अलग-अलग मान्यताएं हैं, जो क्षेपक मान ली जाती हैं वह भी कम रोचक, कम महत्वपूर्ण नहीं है, कम आस्था पैदा करने वाली नहीं है, वह भी कम रसमय नहीं हैं, इसलिए राम को कोई भी मन, उसे उतनी ही आसानी से स्वीकार कर सकता है, रम सकता है, अड़चन रूढ़िग्रस्त को ही हो सकती है, उदारचेता को नहीं।

दूसरी छोटी सी बात, हम पंचक्रोशी यात्रा की बात करते हैं। आज सुबह राकेश चतुर्वेदी जी ने की, वे ‘राम वन-गमन पथ‘ के चप्पे-चप्पे से परिचित हैं। उन्होंने सिल्क रूट की चर्चा की है, उस मार्ग पर की जाने वाली यात्रा या पंचक्रोशी यात्रा है, ठीक उसी तरह ‘राम वन-गमन पथ‘ है, वह भी वैसी ही यात्रा है। मराठी मित्र बताते हैं कि शिवाजी ने जो पन्हालगढ़ यात्रा की थी, उस विशाल गढ़ की यात्रा पर आज भी अनुकरण करते हुए लोग जातेे हैं और उस काल का स्मरण कर रोमांचित होते हैं, गौरव-बोध होता है, आनंद लेते हैं। पंचक्रोशी या ‘राम वन-गमन पथ‘ जैसे निर्धारित पथों पर चलना, ठीक वैसे ही उस पावन जातीय-स्मृति को जीना है।

राम वनगमन पथ, शिवरीनारायण
के राम-जानकी मंदिर में लगा शिलालेख

एक आखरी बात जो इस तरह के विवादों, कथाओं और काल निर्धारण को ले कर, वर्मा जी के परचे के संदर्भ में कहना चाहूंगा कि सीतामढ़ी गुफा में माना जाता है कि सीता ने विश्राम किया था, तो फिर इतिहास वालों को थोड़ी परेशानी होती है। आस्था है कि ऐसा हुआ था, फिर इसमें काल का विवाद अनावश्यक है। सीतामढ़ी का निर्माण काल 8वीं शताब्दी है, और उसी गुफा में सीता आई थीं, मतलब 8वीं शताब्दी के बाद? फिर तो इतिहास कालक्रम सीता का काल 8वीं सदी के बाद का हुआ। मगर कहें कि सीता किसी काल में यहां आई थीं, उनकी स्मृति में यह गुफा बनाई गई, तब तो कोई समस्या नहीं होगी, अन्यथा इतिहास की बात आती है और तब आस्था के साथ उसका घालमेल नासमझी होगी। कई बार ऐसा संकीर्ण दृष्टि के कारण होता है। उसके निराकरण के लिए, जो कुछ मैंने पढ़ाई की है, उसमें वासुदेव शरण अग्रवाल का उल्लेख करते अपनी बात पूरी करता हूँ। वासुदेव शरण अग्रवाल ने कहा है- ‘पुराण-निर्माता सुधी जनों ने भी वैदिक तत्वों को ही लोकोपकार के लिए अनेक तरह से कथा और गल्पों का आश्रय लेकर वर्णित किया है, . . . कितनी ही कथाएं श्रुतिवर्णित रहस्यों के विस्तार-मात्र हैं‘ मुख्य बात अब यहां आती है ‘साधारण लोग कथा में ही भटके रहते हैं, एक वे हैं, जो कथाओं को सत्य मानते हुये भी अनेक तत्व को नहीं जानते, दूसरे वे हैं जो तत्व को न देखते हुए कथाओं को असत्य मानते हैं, दोनों की बात एक सी है। ज्ञानी जन कथा से ऊपर उठकर इसके रहस्य को समझते हैं, और अनेक भांति से मूल सिद्धांत को ही पल्लवित देख आनंदित होते हैं।

मैं मानता हूं कि आप सभी के मन में वही आनंद, रस-संचार हो, धन्यवाद।

Tuesday, November 9, 2021

शिवरीनारायण - गिन्नौरे

भिन्न धार्मिक आस्था और भौगोलिक क्षेत्रों के संबंध-समन्वय की कथाएं और लोक-विश्वास, उदार सोच और सहिष्णुता को संबल देती हैं। इस दृष्टि से यहां प्रस्तुत, रविन्द्र गिन्नौरे जी का यह लेख (छत्तीसगढ़ राज्य गठन के पूर्व) दैनिक भास्कर, सबरंग में ‘रथयात्रा पर विशेष‘ के रूप में प्रकाशित हुआ था।

शिवरीनारायणः जहां जगन्नाथ जी आज भी आते हैं

मैकल पर्वत श्रृंखला के किनारे बिलासपुर से ६४ किलोमीटर दूर दक्षिण-पूर्व दिशा में २९-७१ उत्तरी अक्षांश ८०.५० डिग्री पूर्वी देशांस पर शिवरीनारायण है। महानदी, जोंक और शिवनाथ नदी का संगम जिसे पुराणों में चित्रोत्पला गंगा की उपमा दी गयी है। रामायण की प्रसिद्ध शबरी भीलनी की याद संजोये जहां से कभी भगवान राम गुजरे थे। आज इस ऐतिहासिक नगरी में नर-नारायण की अनेक मूर्तियां हैं। इसलिए इसे पुरूषोत्तम तीर्थ भी कहा गया है। भगवान विष्णु के चौबीस अवतारों में से एक बुद्ध को माना गया है। इंद्रभूति जो ‘वज्रयान‘ के संस्थापक रहे, उन्होंने ही जगन्नाथ की यहां स्थापना की। जिन्हें बाद में जगन्नाथपुरी में जगन्नाथ के नाम से प्रतिष्ठापित किया। चारों धाम के बीच तीर्थ शिवरीनारायण को इसलिए गुप्त तीर्थ धाम भी कहा जाता है। आज भी पूर्णिमा के दिन जगन्नाथ जी यहां आते हैं और इस दिन जगन्नाथ पुरी में भोग नहीं लगता।

शिवरीनारायण क्षेत्र में घना जंगल था, वहां शबर जाति के लोग निवास करते थे। वे भगवान जगन्नाथ की उपासना किया करते थे। बाद में एक ब्राम्हण ने जगन्नाथ की प्रतिमा शिवरीनारायण से हटाकर पुरी में स्थापित कर दी। इसके बदले में शबरी को वरदान प्राप्त हुआ था कि उनके नाम के साथ शबर नारायण हमेशा जुड़ा रहेगा। (बिलासपुर गजेटियर) इस तथ्य की पुष्टि करते हुए उड़िया के प्रसिद्ध महाकवि सरलादास ने लिखा है ‘भगवान जगन्नाथ स्वामी को शबरी नारायण से पुरी लाकर प्रतिष्ठित किया गया था।‘ इस कथन से यह सिद्ध होता है कि जगन्नाथ जी का मूल स्थान शिवरीनारायण ही है।

शबर एक प्राचीन जाति है जिसका उल्लेख रामायण, महाभारत और पुराणों में मिलता है। शबर प्राचीन काल से ही तंत्र-मंत्र विद्या में प्रवीण थे जिसके उपास्य इष्ट देव भगवान जगन्नाथ थे। कलियुग में इन्हीं शबर के मंत्रों की प्रसिद्धि है। जिसपर आज शबरतंत्र उल्लिखित है।

महामहिम कविराज गोपीनाथ ने लिखा है कि ‘शाबर आदि में मलेच्छ भाषाओं में भी मंत्र रहस्यों की व्याख्या होती थी।‘ इस मंत्रयान से ही वज्रयान की शाखा निकली। वज्रयान तांत्रिक बौद्धों की प्रमुख शाखा है। प्रो. कृष्णदत्त बाजपेयी ने भी छत्तीसगढ़ी क्षेत्र की दो प्राचीन जातियों का उल्लेख किया है जिसमें उन्होंने ‘शबर‘ और ‘निषाद‘ को बताया है।

डा. बलदेव प्रसाद मिश्र ने लिखा है- ‘(शबर) संवरा लोग भारत के मूल निवासियों में से हैं उनके मंत्रजाल की महिमा रामचरित्र मानस तक में की गयी है। शबरी नारायण में भी एक ऐसा शबर था जो भगवान जगन्नाथ जी का भक्त था।

श्री प्यारेलाल गुप्त ने ‘बिलासपुर वैभव‘ में लिखा है-जिस स्थान पर शबरी नारायण बसा, वहां उस समय जंगल था। प्राचीन समय में वहां एक शबर रहता था, वहां जगन्नाथ की मूर्ति थी। वह शबर उस मूर्ति की नित्य नियम से पूजा करता था। एक दिन एक ब्राम्हण ने उस मूर्ति को देख लिया वह उसे वहां से ले गया और जगन्नाथ पुरी में स्थापित कर दी।

भगवान जगन्नाथ की मूर्ति को शबरी नारायण से जगन्नाथपुरी ले जाया गया है, यह इतिहास के तर्कसम्मत विश्लेषण से ज्ञात होता है। परंतु मूर्ति को ले जाने वाले इंद्रभूति थे। इंद्रभूति वज्रयान के संस्थापक थे। डा. एन.के.साहू ने इंद्रभूति के बारे में लिखा है संभल (संबलपुर) के राजा इंद्रभूति जिन्होंने कोसल के इतिहास के अंधकार युग (आठवीं -नौवी शताब्दी) में राज्य किया था। बौद्ध धर्म के वज्रयान संप्रदाय के प्रवर्तक थे। इंद्रभूति पद्मवज्र (सरोरुह) वज्रयान के शिष्य अंगनवज्र के शिष्य थे। इंद्रभूति को कविराज गोपीनाथ ने ‘उड्डयन सिद्ध अवधूत‘ कहा है। सहजयान लक्ष्मीकरा इंद्रभूति की बहन थी। इंद्रभूति के पुत्र पद्मसंभव ने तिब्बत जाकर लामा संप्रदाय का स्थापना की। इंद्रभूति ने अनेक ग्रंथ लिखे। ‘ज्ञान सिद्धि‘ उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध तंत्र ग्रंथ है। उन्होंने अपने ग्रंथ ज्ञान सिद्धि में भगवान जगन्नाथ की बार-बार वंदना की है। इसके पूर्व जगन्नाथ जी को भगवान के रूप में मान्यता नहीं मिली थी। इंद्रभूति जगन्नाथ को भगवान बुद्ध के रूप में देखते थे। जगन्नाथ की प्रतिमा के सम्मुख बैठकर वे तंत्र साधन करते थे। ‘इवेज्र तंत्र साधना‘ और शाबर मंत्रों समन्वय से इंद्रभूति ने वज्रयान संप्रदाय की स्थापना की।

हरि ठाकुर ने लिखा है कि शबर यंत्र साधना और वज्रयान तंत्र साधना की जन्मभूमि दक्षिण कौशल ही है। सन १९०७ तक संबलपुर छत्तीसगढ़ में ही शामिल था। इन सबको मिलाकर यह क्षेत्र दक्षिण कोशल कहलाता था।

जे.पी.सिंह देव के अनुसार इंद्रभूति शबरी नारायण से भगवान जगनाथ को सोनपुर के पास समलाई पहाड़ी स्थित गुफा में ले गये उसके सम्मुख इंद्रभूति तंत्र साधनरत थे। शबरों के इष्टदेव जगन्नाथ जी को भगवान के रूप में मान्यता दिलाने का यश इंद्रभूति को ही है। असम के कलिका पुराण में लिखा है ‘तंत्र का उदय उड़ीसा में हुआ था। उसका आशय यही समलाई पहाड़ी स्थित गुफा.से है और भगवान जगन्नाथ उनके इष्ट देव थे।

इंद्रभूति के पश्चात आठवीं शताब्दी में उनके पुत्र पद्मसंभव ने योग्यता पूर्वक इस तंत्र पीठ को संचालित किया। वे भी अपने पिता के समान सिद्ध पुरुष थे। बाद में शांति रक्षित की अनुशंसा पर तिब्बत नरेश रवी स्रोंगल्देबत्सन ने पद्मसंभव को तिब्बत बुला लिया। वत्सन का शासन काल सन् ७८५? से ७९७ ई. तक का माना गया है। इंद्रभूति की बहन लक्ष्मीकंरा का विवाह जालेन्द्रनाथ से हो गया। भगवान जगन्नाथ की देखभाल करने वाल कोई नहीं था अतः इस संप्रदाय के लोग जगन्नाथ जी को पुरी ले गये।

जगन्नाथ जी के इतिहास का संबंध बौद्ध धर्म से भी है। कुछ बौद्ध धर्म की धातुवंश ग्रंथों में जिसमें बुद्ध के दांत का इतिहास है, उल्लेख है कि जगन्नाथ स्वयं बुद्ध का नाम है। उन्होंने कहा था मैं जगत का नाथ हूं जगन्नाथ के अतिरिक्त तीन मूर्तियां अशोक, महेंद्र और संघमित्रा की प्रतीक हैं। सम्राट अशोक जगन्नाथ के भक्त थे। जगन्नाथ मंदिर की मादल पंजी में ऐसा उल्लेख है जिसमें अशोक का नाम मिलता है। जगन्नाथ जी रथयात्रा में बौद्ध धर्म ही वैष्णव धर्म के रूप में प्रकट हुआ है। बुद्ध का दंत और तैत्तरीय ब्राम्हण का दारुब्रह्म दोनों का महान समन्वय की सुन्दरतम कल्पना है।

इसे पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी हिन्दी साहित्य की भूमिका में लिखा है। कहा जाता है कि जगन्नाथ का मंदिर पहिले बौद्धों का था बाद में बुद्ध की मूर्ति के सामने किसी वैष्णव राजा ने एक दीवार खड़ी कर दी और इन दिनों जिसे जगन्नाथ जी की मूर्ति कहते हैं वह भी बुद्ध देव के अस्थि रखने के पिटारे के सिवाय कुछ नहीं है।

शिवरी नारायण को गुप्ततीर्थ कहा गया है। इसका वर्णन रामावतार चरित और याज्ञवलक्य संहिता में मिलता है। यह नगर सतयुग में बैकुंठपुर त्रेतायुग में रामपुर, द्वापर में विष्णुपुर और कलयुग और नारायणपुर शिवरीनारायण के नाम से जाना जाता है। क्योंकि यहां नर नारायण के साथ महादेव व अन्य देवताओं का वास है।

उड़ीसा के देऊल तोला म... .कत है- मालव प्रदेश के राजा इंद्रद्युम्न से नारद ने कहा कि पूर्वीय समुद्र तट पर नील माधव रहते हैं। उस पर इंद्रद्युम्न ने अपने मंत्री विद्यापति को ढूंढने के लिये भेजा, विद्यापति बहुत कष्ट उठाकर नील माधव क्षेत्र नीलांचल पुरी पहुंचा उसने देखा कि विश्वासु नामक शबर (भील) नील माधव को जंगल में छिपाकर रखता है, किसी दूसरे को दर्शन नहीं करने देता। विद्यापति ने अतिथि के रूप में उसके यहां स्थान बना लिया है और धीरे-धीरे उसकी कन्या से प्रेम करने लगा। इस कन्या के माध्यम से विद्यापति ने गुप्त स्थान पर प्रतिमा की जानकारी करके नीलमाधव की प्रतिमा भी देख ली तथा राजा इंद्रद्युम्न को सूचना दी। इंद्रधुम्न सेना के साथ विश्वासु से संघर्ष करने लगा। विश्वासु ने आत्मसमर्पण कर दिया पर नीलमाधव अंतर्धान हो गये इस पर इंद्रधुम्न ने अन्न जल त्यागकर इक्कीस दिवस तक सत्याग्रह किया। उन्हीं दिनों से ज्ञात हुआ कि नील माधव लकड़ी के एक टुकड़े के रूप में समुद्र में बह रहे हैं अगर उस लकड़ी की .मूर्ति बना कर स्थापित की जाये तो नील माधव उसमें निवास करेंगे। वैसा ही किया गया उस लकड़ी से चार मूर्तियां बनी जगन्नाथ, बालभद्र, सुभद्रा और सुदर्शन साथ ही एक कौए की प्रतिमा भी वहां स्थापित की गयी जो वहीं वटवृक्ष में बैठा था कहते हैं कि इसे नीलमाधव के दर्शन हुए इसलिए यह सौभाग्यशाली था।

पुरुषोत्तम महात्म्य (चौरासी हजार वाला स्कन्दपुराण उत्तर खंड ७वां अध्याय) सतयुग में ब्रम्हा की पांच पीढ़ी में इंद्रधुम्न नामक सूर्यवंशी राजा मालव देश के अवन्ती नगरी में निवास करता था। एक समय उसने अपनी सभा में लोगों से पूछा कि ऐसा कौन सा क्षेत्र है जिसमें हम साक्षत भगवान का दर्शन कर सकेंगे। एक ब्राम्हण जिसने बहुतेरे तीर्थों का भ्रमण किया था राजा से बोला महराज भारत वर्ष में विख्यात ओढ़ देश में दक्षिण समुद्र तट के निकट पुरुषोत्तम क्षेत्र है। वहां नीलगिरी पर्वत के ऊपर चारों ओर से एक कोस में विस्तृत कल्पवृक्ष है जिसके पश्चिम दिशा में रोहिणी कुंड है, उसके पूर्व तट पर नीलेंद्रमणि की वासुदेव की प्रतिमा है। जो मनुष्य उस कुंड में स्नान करके पुरूषोत्तम का दर्शन करता है उसको एक हजार अश्वमेध का फल मिलता है और मुक्ति मिल जाती है। तुम विष्णु के भक्त हो इसलिए यह बात कहने को मैं तुम्हारे पास आया हूं। ऐसा सुन राजा इंद्रधुम्न ने अपने पुरोहित को वहां भेजा वह अपने भाई का साथ महानदी के एकामक्र वन में पहुंचा और जा कर नीलांचल पर चढ़कर भगवान को ढूंढने लगा जब उसको मार्ग नहीं मिला तब वह कुशों को बिछा कर वहां ही सो गया। उसका छोटा भाई विद्यापति उपर चढ़कर एक स्थान में चुपचाप बैठ गया। उस समय विश्र्वासु नामक एक शबर पुरूषोत्तम की पूजा करके उस स्थान पर आया उसने ब्राह्मण से पूछा कि तुम कहां से आये हो, ब्राह्मण ने अपने आने का सब वृतांत सुनाकर उससे कहा कि तुम मुझको भगवान के दर्शन कराओ। (बारहवां अध्याय)

कूर्मपुराण (उपरिभाग, ३४ वां अध्याय) पूर्व दिशा में जहां महानदी और विरजा नदी है पुरूषोत्तम तीर्थ में पुरूषोतम भगवान निवास करते हैं। वहां तीर्थस्नान करके पुरूषोत्तम की पूजा करने से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

याज्ञवलक्य संहिता में एक कथा है क्षत्रिय राजा कुलभूषण की रानी का सिर पिलपिला था। रानी विनिता पूर्वजन्म की ज्ञाता थी। एक बार रानी ने राजा को बताया कि वह पूर्व जन्म में बंदरिया थी और सिंदूरगिरी पर्वत के बांसों के जंगल में विचरण कर रही थी तभी फिसलकर रोहणी में गिर गयी लेकिन उसकी खोपड़ी बासों के बीच फंस गयी रोहणी कुंड गिरने से उसे मोक्ष प्राप्त हुआ लेकिन खोपड़ी बांसों के बीच लटकी रह गयी मोक्ष मिलने से वह इस जन्म में रानी बनी यह सुनकर राजा ने उस दुर्गम वन की तलाश आरंभ कर दी। आखिरकर उस बंदरिया की खोपड़ी बांसो के झुंड में मिली राजा ने बाणों की वर्षा कर कपाल को कुंड में तिरोहित किया तभी वहां से भगवान विष्णु की प्रतिमा प्रगट हुई। कालांतर में राजा ने वहां एक भव्य मंदिर बनाया वहीं शिवरीनारायण का मंदिर है यह पौराणिक कथा अब लोकमान्यता बन चुकी है।

पौराणिक कथाएं और लोकमान्यातओं को समेटे शिवरीनारायण छत्तीसगढ़ का प्राचीन नगर रहा है। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार कहा जा सकता है कि पुरी के भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा को यहीं से ले जाया गया था। शबर जाति के रहस्यमय तंत्र की साधना स्थली जिसका विराट स्वरूप तिब्बत में मिलता है शिवरीनारायण की देन है। माघ पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ वापस शिवरीनारायण आते हैं इसी लोकविश्वास पर आज भी जगन्नाथ पुरी के मंदिर के दरवाजे इस दिन बंद रहते हैं यहां तक कि उस दिन भोग भी नहीं लगता।

शिवरीनारायण में ही शबरी भीलनी से भगवान राम की भेंट हुई थी जहां राम ने शबरी के जूठे बेर खाये थे शबरी के नाम से जोड़कर बाद में नारायण नगर बसाया गया जो जिसे आज शिवरीनारायण के नाम से जाना जाता है।

प्रो. कृष्णदत्त बाजपेयी ने छत्तीसगढ़ के पुरातत्व में रामकथा में लिखा है श्रीराम की दक्षिण यात्रा का मार्ग मध्यप्रदेश के दक्षिण भाग से होकर प्रमाणित होता है। रामायण में जिस रजतगिरी का उल्लेख है, वह जबलपुर से भेड़ाघाट की संगमरमरी चट्टानों वाला गिरी हो सकता है। वहां से अमरकंटक जिला शहडोल तक का मार्ग विशेष कष्ट प्रदत्त था। अमरकंटक पहुंचने पर राम आदि को दक्षिण जाने के लिये नर्मदा पार करने की आवश्यकता नहीं पड़ी अमरकंटक नाम से सिद्ध होता है कि वह अमर या देव संस्कृति के मानने वालों के लिये रावण के समय में कंटक (दुखदायी) क्षेत्र बन चुका था। संभवतः आर्य विरोधियों ने तब तक अपने प्रभाव का विस्तार अमरकंटक तक कर लिया था। रावण ने वहां पर बिलासपुर जिले के खरौद शिवरीनारायण स्थानों तक अपने सहायकों को नियोजित कर दिया था। खरौद नामक स्थल खर-दूषण की स्मृति आज तक संजोए हुए है। इसी प्रकार शिवरीनारायण में रामयाण कथा की प्रसिद्ध शिबरी भिल्लनी की याद आज भी शेष है।

शिवरीनारायण से तीन किलोमीटर दूर खरौद में के दक्षिण प्रवेश द्वार पर शबरी मंदिर है जिसे सौराइन दाई का मंदिर कहा जाता है। मंदिर के अंदर और बाहर चतुर्भुजी मूर्तियां हैं इस मंदिर का निर्माण शबर राजा द्वारा किया गया है ऐसी किंवदन्ती है।

पुरातत्ववेताओं के अनुसार यहां के नर नारायण के मंदिर में नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक की मूर्ति एवं स्थापत्य कला की झलक मिलती है। यह मंदिर १७२ फीट ऊंचा १३६ फीट के घेरे में बना हुआ है। जिसमें दस फीट का स्वर्ण कलश स्थापित है। मंदिर का बाह्य चबूतरा दस हजार वर्ग मीटर का है। गर्भगृह में मूर्ति के चरण को स्पर्श करता रोहणी कुंड है। यहां कलचुरी कालीन मूर्तियां की बहुलता है। साधुचरण दास ने भारत भ्रमण में लिखा- नदी के तीर पर महादेव जी का और थोड़ी दूर पर शबरी नारायण और लक्ष्मण का मंदिर है एक लेख से ज्ञात होता है कि लगभग सन् ८४१ में शबरी नारायण मंदिर बना।

नर नारायण मंदिर के पूर्व दिशा में पश्चिम की ओर से नारायण की चतुर्भुजी मूर्ति है बारहवी शताब्दी की मूर्तियों में कलचुरिकालीन वास्तुकला की झलक दिखती है। पंचरथ शैली के मंदिर के द्वार पर गंगा यमुना की मूर्ति के साथ दशावतार उत्कीर्ण है।

केशव नारायण मंदिर के वायव्य दिशा में चंद्रचूड महादेव का प्राचीन मंदिर है। मंदिर के द्वार पर एक विशाल नंदी की मूर्ति है। गर्भगृह में शिवलिंग जिसकी दीवाल में पूजा अर्जना करती राजा रानी की मूर्ति है मंदिर के बाहर नंदी के बगल में चोटी धारण किये हुए महात्मा की मूर्ति है दीवाल पर एक पाली भाषा में लगे एक शिलालेख के अनुसार इस मंदिर का निर्माण संवत् ९१९ में कुपारपाल नामक कवि ने कराया है। इसमें रतनपुर के राजाओं की वंशावली उत्कीर्ण है इसके अलावा बाद में रामजानकी च नर नारायण का मंदिर बने हैं।

अनेक पौराणिक गाथाओं को समेटे विभिन्न काल की वास्तुकला और मूर्तिकला को समाहित किये शबरी नारायण का अनोखा प्राकृतिक सौंदर्य है। यहीं है, अनोखा कृष्ण वट जब तेज हवा बहती है तो बांसुरी की धुन फूट पड़ती है और मन उल्लासित हो उठता है।