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Tuesday, March 10, 2026

श्रीराम-राज्य-वियोग

‘जाज्वल्या‘ पत्रिका का प्रकाशन जांजगीर-चांपा जिला से विगत वर्षों से किया जा रहा है। इस संबंध में पत्रिका के मुख्य संपादक, कलेक्टर, जिला जांजगीर-चांपा श्री जनमेजय महोबे ने संपादकीय में लिखा है-... जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक कृषि मेला जिले की सांस्कृतिक चेतना का प्रतिनिधि बन चुका है।

यह महोत्सव शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों, कलाकारों, कृषकों एवं आम नागरिकों की सहभागिता से साकार होने वाला एक सामूहिक सांस्कृतिक अनुष्ठान है। तीन दिवसीय इस आयोजन में छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध लोक कलाकारों के साथ-साथ स्थानीय कलाकारों, विद्यालयीन एवं महाविद्यालयीन छात्र-छात्राओं की प्रस्तुतियाँ लोक संस्कृति की विविध छवियों को मंच प्रदान करती हैं। यह मंच नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य भी करता है।
... ... ...
इस अवसर (9 से 11 फरवरी) पर प्रकाशित जाज्वल्या स्मारिका जिले की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक चेतना का दर्पण है। इसमें जिले के पर्यटन, ऐतिहासिक, पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक स्थलों पर आधारित लेख, कविताएँ एवं रचनाएँ नए दृष्टिकोण के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत की गई हैं ...

‘जाज्वल्या 2026‘ में प्रकाशित मेरे लेख को समय-सीमा के कारण इसे वांछित रूप नहीं दे सका था, मगर पत्रिका के संपादक मंडल ने इसे पत्रिका में प्रमुखता से स्थान दिया, इसके लिए आभार। वह लेख अब कुछ आवश्यक संवर्धन सहित यहां प्रस्तुत- 

श्रीराम-राज्य-वियोग की काव्य-करुणा और जीवन-उमंग 

वैष्णवी भक्ति में वियोग को भी कृपा की तरह देखा गया है, क्योंकि वियोग में जैसी उद्दाम भावना और विकल स्मृति होती है, वह संयोग में नहीं। संभवतः यही भावधारा प्रवाहित हुई होगी शिवरीनारायण सज्जनाष्टक के पं. यदुनाथ भोगहा के पुत्र मालिकराम भोगहा जी के मन में, जिसका परिणाम हुआ ‘श्रीराम-राज्य-वियोग नाटक‘ की रचना। इस महत्वपूर्ण नाटक की प्रति दुर्लभ होने के कारण इसकी चर्चा कम ही हुई है। यह रचना छत्तीसगढ़ की आरंभिक महत्वपूर्ण नाट्य-कृति है, जिसे पढ़ कर कोई संदेह नहीं रह जाता कि यह अपने दौर के राम-साहित्य की एक अनुपम और बेजोड़ रचना है। इस पुस्तक के आरंभ में पं. लोचनप्रसाद पांडेय जी ने ग्रन्थकार पण्डित मालिकराम त्रिवेदी भोगहा (द्विजराज) की संक्षिप्त जीवनी लिखी है, जिसका एक अंश इस प्रकार है-

12 जनवरी सन् 1910 के मारवाड़ी (नागपुर) के अंक में, पं. मालिकरामजी की सचित्र, संक्षिप्त, जीवनी प्रकाशित हुई थी और उक्त पत्र के 22 दिसंबर 1909 के अंक के सम्पादकीय स्तम्भ में उनपर एक नोट छपा था। हम उसे नीचे उद्धृत करते हैं- ‘छत्तीसगढ़ के एक गुप्त हिन्दी साहित्यसेवी पं. मालिकराम त्रिवेदी भोगहा की असामयिक मृत्य से हिन्दी माता को बड़ी क्षति पहुंची है। पं. मालिकराम सुप्रसिद्ध ठाकुर जगन्मोहनसिंह के प्रवीण और प्रियतम शिष्य थे। वर्षों तक आप ठाकुर साहब के साथ रहे थे और देशाटन भी किया था। बिलासपुर ज़िले के अन्तर्गत शबरीनारायण क्षेत्र में आप निवास करते थे। शबरीनारायण मन्दिर के पुजारी (भोगहा) और कई गाँवों के अधिकारी थे। आप हिन्दी के उत्कृष्ट लेखक और कवि थे। रामराज्य-वियोग (नाटक); सुलोचना सती (नाटक); स्वप्नसम्पत्ति (नवन्यास); पद्यबद्ध शबरीनारायण महात्म्य; मालती (काव्य); सुरसुन्दरी (काव्य); आदि कई एक ग्रन्थ आपने रचे हैं। अफसोस आप अपने ग्रन्थों को प्रकाशित न कर सके। हिन्दी के सिवा, आप संस्कृत, प्राकृत, उर्दू, उड़िया, बँगला, मराठी और अँगरेज़ी भी जानते थे। गान और संगीत विद्या के बड़े प्रेमी और बड़े ईश्वर-भक्त थे। आपकी मृत्यु 30 नवम्बर 09 को हुई। आपकी उम्र 37-38 वर्ष की थी। आपके वियोग से आपके वृद्ध पिता और कुटुम्ब के लोगों के साथ साथ हिन्दी को भी बड़ी हानि पहुंची है। ईश्वर आपके कुटुम्बियों को धैर्य और मृत आत्मा को शान्ति प्रदान करे।‘
पं. मालिकराम भोगहा

इस कृति पर आगे चर्चा के पहले स्मरण करते चलें कि शिवरीनारायण न सिर्फ जिले का, बल्कि संपूर्ण छत्तीसगढ़ का पुराना वैष्णव मठ है। जिले के लक्ष्मणेश्वर मंदिर, खरौद और जांजगीर के विष्णु मंदिर में रामकथा के प्रसंगों का सुंदर शिल्पांकन है। हमारा जिला रामनामी समुदाय की भक्ति से ओतप्रोत है, जहां अकलतरा में रामलीला की ऐतिहासिक परंपरा रही है। साथ ही बनारी के पं. रामरक्षित, धुरकोट के ठाकुर रणजीत सिंह, जांजगीर के पं. जगदीश्र चंद्र तिवारी तथा कोड़ाभाट के जगदीश्वर सिंह जैसे रामकथा वाचकों की परंपरा रही है।

यहां छत्तीसगढ़ के राम-साहित्य का संक्षिप्त उल्लेख प्रासंगिक होगा। छत्तीसगढ़ के कवि शुकलाल प्रसाद पांडेय (1885-1951) की रचना है ‘मैथिली मंगल‘। उन्होंने सरल भाव से व्यक्त किया है कि जबलपुर के राजा गोकुलदास के यहां विवाह का कल्पनातीत वृहद आयोजन देख कर उनके मन में आया कि राम-सीता का विवाह कितना दिव्य रहा होगा और उसे किस तरह से शब्दों में, काव्य में उतारा जा सकता है। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ की ही एक अन्य उल्लेखनीय और मनोरम रचना गिरधारीलाल रायकवार जी रचित हल्बी नाटक ‘सीता बिहा नाट‘ है। इस नाटक के संदर्भ में 1998 में मध्यप्रदेश के जनसंपर्क विभाग से प्रकाशित (तत्कालीन मंत्री हमारे गृह जिले के डॉ. चरणदास महंत) डॉ. हीरालाल शुक्ल संपादित-संयोजित हल्बी, माड़िया और मुरिया रामकथा के तीन भारी-भरकम खंडों का उल्लेख आवश्यक है, जिनमें गिरधारीलाल जी की यह रचना शामिल है। एक अन्य उल्लेख, छत्तीसगढ़ सम्मिलित मध्यप्रदेश के दौरान भोपाल में 1970 में ‘रामचरित मानस चतुश्शताब्दी समारोह समिति’ का गठन किया गया। इस समिति के संस्थापक हमारे गृहग्राम अकलतरा निवासी पं. रामभरोसे शुक्ल के मानस-मर्मज्ञ पुत्र पं. गोरेलाल शुक्ल जी (आईएएस) थे। समिति के मानस भवन से ‘तुलसी मानस भारती (मासिक)‘ पत्रिका का प्रकाशन पं. शुक्ल के प्रधान संपादकत्व में आरंभ हुआ। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के राम-साहित्य साधकों का स्मरण आवश्यक है, उन बहुतेरों में से कुछेक-

बिलासपुर निवासी महामहोपाध्याय जगन्नाथ प्रसाद ‘भानु‘ अल्प-चर्चित राम-रसिक हैं। उन्होंने तुलसी रामायण का अनुशीलन करते हुए महत्वपूर्ण मीमांसक कृतियों का प्रणयन किया, जो नवपंचामृत रामायण (1896), ‘तुम्हीं तो हो‘ का पहला भाग ‘रामाष्टक‘ (1914), श्रीतुलसी तत्वप्रकाश, रामायण प्रश्नोत्तरमाला सहित (1931), श्रीरामायण वर्णावली (1936), श्रीतुलसी भावप्रकाश (1937) हैं। डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र, मानस में रामकथा (1952), भारतीय संस्कृति को गोस्वामी तुलसीदास का योगदान (चार व्याख्यानों का संग्रह 1953), मानस-माधुरी (1958), खंड काव्य राम-राज्य (1960, पाठ्य संस्करण 1972), तुलसी-दर्शन (1938-39 में डी. लिट्. के लिए हिंदी में प्रस्तुत प्रथम शोध-प्रबंध, सातवां संस्करण 1967 में प्रकाशित) जैसी पुस्तकों के लेखक हैं।

हरि ठाकुर ने ‘छत्तीसगढ़ में रामकथा का विकास‘ शीर्षक लेख द्वारा इस विषय का विस्तार से परिचय दिया था। उनकी 1990 की डायरी में 47 रामकथा-साहित्य की सूची है, जो महाकवि नारायण के रामाभ्युदय महाकाव्य से आरंभ होती है, मगर क्रमांक में आरंभिक 10 इस प्रकार हैं- 1 राम प्रताप-महाकवि गोपाल, 2 तास रामायण-ठाकुर भोला सिंह बघेल, 3 छत्तीसगढ़ी रामचरितनाटक- उदयराम, 4 मैथिली मंगल-शुकलाल प्रसाद पाण्डेय, 5 कोशल किशोर-डा. बलदेव प्रसाद मिश्र, 6 छत्तीसगढ़ी रामायण-पं. सुन्दरलाल शर्मा, 7 वैदेही-विछोह- कपिलनाथ कश्यप, 8 राम विवाह- टीकाराम स्वर्णकार, 9 राम केंवट संवाद-पं. द्वारिका प्रसाद तिवारी विप्र 10 राम बनवास- श्यामलाल चतुर्वेदी आदि। इस क्रम में हमारे जिले के मेरे गृह-ग्राम अकलतरा निवासी गुलाबचंद देवांगन का ‘छत्तीसगढ़ी रमायेन‘ उल्लेखनीय प्रकाशन है। यह क्रम लंबा है, इसे यहां विराम देते हुए वापस श्रीरामराज्यवियोग नाटक पर आते हैं।

श्रीरामराज्यवियोग नाटक की प्रकाशित पुस्तक में भूमिका स्वयं भोगहा जी ने लिखी है, इससे स्पष्ट होता है कि इस नाटक के प्रकाशन की योजना तैयार हो गई थी, मगर प्रकाशन-पूर्व उनका निधन हो गया। भूमिका में वे लिखते हैं- कई वर्षों के कठिन परिश्रम से आज इसकी भूमिका लिखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। लोक प्रसिद्ध है,- ‘कोई भी वृहत् कर्म काल पा-कर, अवशेष पावे, तो उस कर्मकर्त्ता का हृदय अमित आनन्द का आगार बन जाता है।‘ उसी तरह मैं भी आज प्रफुल्ल हृदय हो, इस हर्ष से नहीं अघा सकता। इसका प्रारम्भ विचारने में एक कल्प बीत गया। अनेक आधि, व्याधि और उपाधियों से मन को कई बार समाधि देनी पड़ी थी। परन्तु दृढ़ साहस से अनेक असह्य दुःख रूपी पर्वत को लांघते आज अकस्मात् आनन्द-सागर के पुण्य-तट पर आ पहुँचा। ... ... ... इस पुस्तक की पूर्ति सात अंकों में हुई है। गर्भांकों की संख्या बीच बीच में मिलेगी। जिस प्रकार प्रस्तावना में प्रतिज्ञा है उसी रीति पर रचना की गई है। प्रत्येक रस को यथामति उनके स्वरूप ही में वर्णन किया है। यों तो इस में शक्तिभर प्रत्येक रस का विवरण है, परन्तु करुणा रस प्रधान है। इसी से मुझे सुदृढ़ आशा है कि, पाठक गण इसे आदर देंगे। ... ... ... इस कहावत से- परको अवगुण देखिये, अपनो दृष्टि न होय। करै उजरो दीप पै, तरे अँधेरो होय।। मैं अपना दोष नहीं देख सकता। आशा है कि, क्षमाशील पाठक गण कृपापूर्वक सूचित करेंगे, तो दूसरी आवृत्ति में अशुद्धियां शुद्ध कर दी जावेंगी। नाटक के पूर्व कवित्त है, जिसका अंतिम पद है- ‘धर्म चाहो कर्म चाहो वेदहू के मर्म चाहो, तो हे मीत! चाहो नित रामायण देखनो।‘ - रामायण में धर्म, कर्म और वेद का मर्म भी है। जैसाकि वाल्मीकि ने भी अपने ग्रंथ को ‘वेदोपबृंहणार्थाय‘ बताया है। शांत रस प्रधान, यथार्थपरक महाभारत का मूल स्वर वैराग्य है तो आदर्शपरक रामायण को करुणा-शोक का महाकाव्य निरूपित किया गया है। वाल्मीकि रामायण बालकांड द्वितीय सर्ग में ‘शोकार्तस्य प्रवृत्तो मे श्लोका ...‘ कहा गया है। 

आनंदवर्धन, ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत की कारिका-5 में ‘मा निषाद ...‘ पर कहते हैं- ‘नाना प्रकार के शब्द, अर्थ और संघटना के प्रपंच से मनोहर काव्य का सारभूत वही अर्थ है। तभी सहचरी के वियोग से कातर कौंच के क्रंदन से उत्पन्न आदिकवि वाल्मीकि का शोक श्लोक रूप में परिणत हुआ है- ‘... शोकः श्लोकत्वमागतः‘। आगे चतुर्थ उद्योत की कारिका-5 में कहा है- ‘रामायणे हि करुणो रसः स्वयमादिकविना सूत्रितः ‘शोकः श्लोकत्वमागतः‘ इत्येवंवादिना।‘ इस तरह रामायण में स्वयं कवि ने करुण रस का प्राधान्य सूचित किया है।

श्रीराम-राज्य-वियोग नाटक में वही करुणा, वैसी ही दारुण व्यथा उभरती है, भोगहा जी ने स्वयं लिखते है- ‘मैं यह नहीं कह सकता कि, इस नाटक की रचना का अन्त, महाराज दशरथ के अन्त तक ही क्यों रखा गया?‘ ऐसा जान पड़ता है कि भोगहा जी की यह कृति उनके स्वयं के जीवन की रामायणमय-करूणा और व्यथा से उपजी है, उनके एक पत्र का हवाला पंडित लोचनप्रसाद जी ने दिया है, यह पत्र अपने अंतिम दिनों में उपचार के लिए प्रयाग के राजवैद्य पंडित जगन्नाथ शर्मा के यहां से उन्हें लिखा था- ‘मेरी दशा शोचनीय है। एक ईश्वर ही अवलम्ब है। कहो, कि यहाँ क्यों आये? मनमें निश्चय करके कि- डूब गये तो डूबगे, पार भये तो पार। पिता एक तरफ रोते रहते, स्त्री एक तरफ रोती रहती. प्रिय परिवार सब अपनी अपनी ओर खींचते। इससे निश्चिन्त यहाँ अटल समाधि लगा कर सो जाने का सानन्द समय मिलेगा।‘ क्या अपने नवजात पुत्र की मृत्यु के पश्चात से अस्वस्थ रहने लगे, मरणासन्न हाल में पहुच गए भोगहा जी का जीर्ण तन और व्यथित मन, अपने पिता के पुत्र-विछोह की आशंका महसूस कर रहा था? 

वियोग की करुणा और विराग की निष्काम तटस्थता में भी काव्य-रस का अविरल-प्रवाह, जीवन के उमंग को अनुप्राणित करता रहता है। 

(श्रीराम-राज्य-वियोग नाटक की प्रति का अवलोकन भोगहा जी के वंशज श्री वीरेन्द्र तिवारी जी एवं श्री हर्षवर्धन तिवारी जी के अनुग्रह से तथा श्री रवीन्द्र सिसोदिया जी के मार्गदर्शन और श्री रमाकांत सिंह जी के सहयोग से संभव हुआ।)

राहुल कुमार सिंह अकलतरा,
प्रमुख, धरोहर परियोजना,
बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर

Tuesday, October 11, 2022

संत बाबू - जाज्वल्या 2008

आंचलिक प्रकाशनों का अपना खास महत्व होता है, यथा- स्कूल-कॉलेज की वार्षिक पत्रिकाएं, कस्बा-नगर, व्यक्ति अथवा अवसर/आयोजन-विशेष पर संयोजित अंक। एक खासियत, इनकी कुछ-कुछ अनगढ़ता होती है। समय और संसाधनों की सीमा के साथ (अक्सर भारी-भरकम) संपादकीय टीम की समझ, रुचि और पक्षधरता का असर होता है। इन सबके बावजूद ऐसे प्रकाशन उन तथ्यों, जानकारियों, सूचनाओं, भावनाओं और अभिव्यक्ति का अमूल्य दस्तावेज होते हैं जो अन्यथा दुर्लभ हैं। इस क्रम में जिला- जांजगीर-चांपा से प्रति वर्ष आयोजित ‘जाज्वल्यदेव लोक महोत्सव एवं एग्रीटेक कृषि मेला‘ की स्मारिका ‘जाज्वल्या‘ का विशेष महत्व है।

जनगणना और गजेटियर के अंतराल में कई बार ऐसे प्रकाशन ही काम आते हैं। स्मारिका ‘जाज्वल्या‘, संभवतः छत्तीसगढ़ के किसी भी जिले से लंबे समय (2002) से प्रतिवर्ष प्रकाशित होने वाली एकमात्र स्मारिका है। ऐसी सामग्री को डिजिटाइज कर, वेब पर अपलोड किया जाना आवश्यक है। इस उद्देश्य की आंशिक पूर्ति की दृष्टि से यहां अर्थात इस ब्लॉग ‘सिंहावलोकन‘ पर, समय-समय पर ‘जाज्वल्या‘ के चयनित लेखों को प्रस्तुत करने की तैयारी है, इसी क्रम में मेरे पिता सत्येन्द्र कुमार सिंह जी पर रविन्द्र कुमार सिंह बैस का लेख। 

लेखक रविन्द्र जी, स्थानीय विभूतियों के महत्व को पहचानने और उनके अभिलेखन के लिए सदैव प्रयासरत रहते हैं। बुजुर्गों की सोहबत की मानों धुन है, उन्हें। अभिलेखन का उद्यम उन्होंने विकसित किया है, मगर संस्मरण की अनमोल वाचिक परंपरा उन्हें अपने पिता भद्दर डाक्टर के नाम से ख्यात, बलभद्र सिंह जी से मिली है। मैं याद कर पाता हूं कि इस लेख की तैयारी में रवि, लंबे समय तक घंटों, पिताजी के साथ, उनकी बातें सुनते बैठा करते थे। तब शायद ही उनके मन में कभी संस्मरण लिखने की बात रही हो, क्योंकि बुजुर्गों की बातों में डूबे रहना, मानों उनका शगल है और उनके संस्मरण सुनकर मैंने जाना है कि बुजुर्ग, खुलकर अपने अंतरंग प्रसंग उनसे कह-बोल लेते हैं, जैसे अपने अभिन्न मित्रों के साथ। यह रवि गुरु जी की शालीन गंभीरता है कि वे इन संस्मरणों को सुनाते हुए कुछ प्रसंगों को हल्के-फुल्के ढंग से बता दिया करते हैं, लेकिन लिखते हुए किसी कठोर संपादक की तरह अनुशासित रहते, जानकारी और सूचनाओं का सजग-सावधान चयन मर्यादापूर्वक करते हैं। रविन्द्र जी की सहमति से छपाई की कुछ अशुद्धियों को ठीक करते, आगे यह लेख-

व्यक्तित्व

निष्काम कर्मयोगी स्व. सत्येन्द्र कुमार सिंह (संत बाबू)

दूर हजारों की भीड़ में अलग एवं विशेष दिखने वाले, जिनकी ऊँचाई 6 3, गौरवर्ण, जिनकी भव्य एवं आकर्षक शारीरिक बनावट जो एकदम सरल, सहज, एवं निर्विवाद ‘जीनियस‘ हो। हम बातें कर रहे हैं, अकलतरा के प्रतिष्ठित एवं सुशिक्षित सिसोदिया परिवार में 17 फरवरी 1927 को पिता डॉ. इन्द्रजीत सिंह (लाल साहब) एवं माता शांति देवी के कोख से अवतरित हुये सत्येन्द्र कुमार सिंह जी। जिन्हें घर में संत, बाहर में संत महाराज एवं मित्रों के बीच सत्येंद्र, नाम से पुकारने थे। उनके अग्रज राजेन्द्र कुमार सिंह, अनुज डॉ. बसंत कुमार सिंह, श्री धीरेन्द्र कुमार सिंह (पूर्व विधायक एवं साडा अध्यक्ष, कोरबा) एवं बहन श्रीमती बीना देवी हैं। उनके पिता डॉ. इन्द्रजीत सिंह सी.पी. एंड बरार के पहले डॉक्टरेट मानवशास्त्री हुये, जिन्होंने बीहड़ बस्तर, अबूझमाड़ एवं सरगुजा में जाकर जनजातियों के जीवन पर, लखनऊ विश्वविद्यालय से शोध कार्य ‘द गोंड एंड द गोड़वाना‘ की रचना कर समूचे छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया।

नागपुर स्कूल से रिटायर्ड मास्टर शेख सुल्तान एवं नूर मोहम्मद से घर में ही शिक्षा पाये, पं. गुनाराम एवं अयोध्या दीक्षित के सानिध्य में उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके जन्म स्थान अकलतरा में सम्पन्न होने के पश्चात् आगे अध्ययन के लिये बिलासपुर रेलवे कालोनी स्थित यूरोपियन स्कूल में दाखिला लिया, तब यूरोपियन स्कूल केवल एंग्लो इंडियन बच्चों की पढ़ाई के लिये खुला था। उसमें भारतीय बच्चों के लिये भर्ती होना आसाधारण घटना थी। वहॉं बालक सत्येन्द्र कुमार सिंह को पढ़ने का अवसर मिला।

जहाँ अंग्रेजी, विज्ञान में विशेष दक्षता हासिल कर क्रिश्चियन शिक्षक स्टीफन टीडू के प्रिय पात्र बने रहे। हालांकि उनके कथनानुसार बाल्यकाल में उन्हें पढ़ने-लिखने की रुचि बिल्कुल नहीं थी। यूरोपियन स्कूल के बाद बिलासपुर नगर की सुप्रसिद्ध ‘मल्टीपरपस गौरमेंट हाईस्कूल‘ में इन्होने सन् 1947 में मैट्रिक की परीक्षा पास की। अध्ययन के दौरान बी.एन. डे एवं प्रख्यात शिक्षाविद् लाला दीनानाथ के कुशल एवं प्रभावी अध्यापन कौशल के वे कायल हो गये। सक्रिय खेलकूद गतिविधियों में हिस्सा लेकर वालीबाल के उदीयमान खिलाड़ी साबित हुये। गुजरे जमाने के बिलासपुर जिले में इनकी टीम का मुकाबला सिर्फ पुलिस टीम ही कर पाती थी। इनके बैच में प्रतिभाशाली सहपाठियों की भरमार थी। जबलपुर के ख्यातिप्राप्त अधिवक्ता श्री सतीशचंद्र दत्त, पूर्व कलेक्टर स्वरूपसिंह पोर्ते, पुरातत्वविद् डॉ. शंकर तिवारी, नेत्ररोग विशेषज्ञ, डॉ. आर.के. मिश्रा के अलावा अनेक विद्वान एवं बुद्धिजीवी इनके मित्र रहे हैं।

बिलासपुर से मेट्रिक उत्तीर्ण कर नागपुर के ख्यातिप्राप्त ‘विक्टोरिया कॉलेज आफ साइन्स‘ में प्रवेश लेकर, उच्च शिक्षा हेतु आगरा प्रस्थान हुए, जहाँ 1952 में बी. ए. और 1955 में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. की डिग्री ‘हीवेट हॉस्टल‘ में रहकर हासिल की। यहाँ अकलतरा के प्रख्यात जनप्रिय चिकित्सक डॉ. सी. बी. सिंह का उन्हें मार्गदर्शन मिला, पारिवारिक पृष्ठभूमि, शारीरिक आकर्षण, खेल, व्यवहार एवं कार्यशैली से प्राध्यापकों एवं सहपाठियों में वे काफी लोकप्रिय हुये।

1952 में पिता डॉ. इन्द्रजीत सिंह के निधन के बाद उनका अकलतरा में स्थायी रूप से रहना हुआ। 1953 में आशा देवी से इनका विवाह बनारस में हुआ, जो शादी के बाद फाइन आर्टस् एवं पेंटिंग्स में स्नातक हुई। 1956 में प्रथम पुत्र रत्न राजेश एवं तीन वर्ष पश्चात् द्वितीय पुत्र रत्न राहुल का जन्म, मिशन अस्पताल बिलासपुर में ऑपरेशन के फलस्वरूप हुआ। श्री राजेश सिंह चिंतक, विचारक एवं सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हैं। श्री राहुल सिंह, छ.ग. शासन के संस्कृति विभाग में उपसंचालक (पुरातत्व) के पद पर रायपुर मुख्यालय में पदस्थ हैं।

सत्येन्द्र कुमार सिंह, अकलतरा एजुकेशन ट्रस्ट की रूपरेखा, सी.सी.आई. कारखाना के लिये पत्र व्यवहार एवं अन्य बौद्धिक विकास कार्य हेतु उनके हमउम्र राणा चितरंजन सिंह का मार्गदर्शन लेकर अनेक लोकहित के चुनौतीपूर्ण कार्य को अंजाम देकर आधुनिक अकलतरा की बुनियाद रखी। ट्रस्ट द्वारा स्थापित हाईस्कूल संयुक्त बिलासपुर जिले का ही नहीं वरन् समूचे छत्तीसगढ़ के अग्रणी शिक्षा केन्द्र के रूप में विख्यात हुआ।

वैसे तो वे सक्रिय राजनीति से दूर रहते थे, किन्तु जनता की मांग पर जरूरत पड़ने पर ग्राम पंचायत अकलतरा (1976) एवं जनपद पंचायत अकलतरा के अध्यक्ष (1978) निर्वाचित हुये। जिसे उन्होंने चुनौती के रूप में स्वीकार कर आदर्श स्थापित किये। उनके कार्यकाल का स्कूल भवन ग्राम अमलीपानी व कटघरी में देखने योग्य है। आज के पंचायत प्रतिनिधियों को उक्त दोनों ग्रामों क भवनों का अवलोकन कर उन्हें आत्मसात करने का प्रयत्न करना चाहिए। 

अकलतरा में बंगलादेशी शरणार्थियों के लिये भोजन, कपड़ा, स्नान, साबुन, सिंदूर, कुमकुम, चूड़ी यहॉ तक की कफन के लिये कपड़े, बच्चों के लिये फल एवं दूध की व्यवस्था अकलतरा के संवेदनशील नागरिकों ने राजेन्द्र कुमार सिंह एवं सत्येन्द्र कुमार सिंह के सहयोग से यह अद्भुत एवं अपूर्व मानवीय कार्यों को अंजाम दिया।

मानव सेवा सुश्रुषा को स्थायित्व प्रदान करने के लिये सत्येन्द्र कुमार सिंह ने ‘मानव कल्याण समिति‘ की स्थापना की थी। इस संस्था के माध्यम से लगभग 500 नेत्ररोग निदान एवं महिला रोग निदान शिविर आयोजित किया गया था। वे लायंस क्लब अकलतरा के संस्थापक थे। उनकी रुचि भ्रमण, ललितकला, पुरातत्व, ऐतिहासिक स्थलों, छत्तीसगढ़ के लोकजीवन एवं संस्कृति से उनका निकट का जीवंत संपर्क रहा। मशीनों से उनका विशेष अनुराग जग-जाहिर था। मोटर, प्रोजेक्टर, ग्रामोफोन, रेड़ियो, सायकल, गैसबत्ती, कैमरा अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणों में विशेष दक्षता हासिल थी। फोटोग्राफी एवं पत्रकरिता में उनकी दिलचस्पी सर्वविदित थी। सामयिकी ंएवं पशु-पक्षियों के बारे में उनकी लेखनी खूब धारदार थी जो जनजीवन को प्रभावित किये बिना नहीं रहती थी। उन्होंने बिलासपुर टाइम्स के स्थायी स्तंभ ‘तिराहे से‘ के लिये काफी कलम चलाई, वे दैनिक नवभारत एवं भास्कर में भी छपते रहे हैं।

सत्येन्द्र कुमार सिंह का निधन बिलासपुर में 13.07.1999 में हुआ था। अद्भुत स्मरणशक्ति के स्वामी महान चिंतक एवं विचारक सत्येन्द्र कुमार सिंह, गीता के निष्काम कर्मयोग के सिद्धांत को जिये, नेपथ्य में रहकर नींव का पत्थर बनकर कर्तव्य के पथ पर चलने वालों के लिये उनका सारा जीवन अनुकरणीय है।

रविन्द्र कुमार सिंह बैस
पोस्ट - अकलतरा (आजाद चौक)
जिला - जॉजगीर चांपा

Monday, November 1, 2021

जांजगीर-चांपा का पुरातत्व

बीसेक वर्ष पहले मेरे द्वारा तैयार किया गया लेख

जिला जांजगीर-चांपा, पुरातात्विक दृष्टि से विशिष्ट और अत्यंत महत्वपूर्ण भू-भाग है। यहां सर्वाधिक उल्लेखनीय अवशेष ‘गढ़’ हैं, इन गढ़ों की चर्चा के पूर्व दो बिन्दुओं पर स्पष्टीकरण आवश्यक है। पहला, गढ़ का शाब्दिक अर्थ- किला, दुर्ग, कोट, घेरा या गड्ढा, जिसके अनुरूप परिखा-खाई और वप्र-प्राकार युक्त भौतिक आकार स्वरूप वाले गढ़ हैं। पुष्ट जानकारी है कि ऐसे गढ़ों की संख्या छत्तीसगढ़ अंचल के इस जिले के सीमित भू-भाग में ही 36 पूरी हो जाती है-

(1) बछौद (2) कोटगढ़ (3) कोटमी (सुनार) (4) कोनार (5) कोसा (6) जेवरा (7) पामगढ़ (8) डोंगा कोहरौद (9) कोड़ाभाठ (10) कोसला (11) खरौद (12) हथनेवरा (13) पिसौद (14) धुरकोट (जांजगीर) (15) अंवरीद (16) भैंसदा (17) सिऊंढ़ (18) टुरी (19) नवागढ़ (20) खपराडीह (21) केरा (22) बाराद्वार (23) सरहर (24) लखुर्री (25) कोटेतरा (26) कांसीगढ़ (27) ओड़ेकेरा (28) अड़भार (29) पोता (30) सिंघरा (31) डभरा (32) धुरकोट (33) बघौत (34) कोटमी (35) सपोस (36) तरौद (अकलतरा)।

इसके अतिरिक्त संलग्न क्षेत्र में बिलासपुर जिले का मल्हार और विजयपुरगढ़, खरसिया के निकट तेलीकोट, सारंगढ़ के निकट उलखर और भेड़वन (तथा कोसीर?), दुर्ग जिले का मारो तथा रायपुर जिले के गढ़ सिवनी, छातागढ़, लीलर आदि स्थान भी गढ़ ग्राम है। इसके साथ ही जांजगीर-चांपा जिले के सर्वेक्षण तथा स्थानीय सूचनाओं द्वारा गढ़ ग्रामों के पहचान की प्रबल संभावना है।

चर्चा का दूसरा बिन्दु या दूसरे प्रकार के गढ़, वस्तुतः केन्द्र का अर्थ प्रकट करते हैं, जो इस अंचल में प्रचलित लगभग 15 वीं सदी ईस्वी के भू-राजस्व व्यवस्थापन से संबंधित है। इस प्रचलन का प्रथम लिखित प्रमाण 15 वीं सदी ईस्वी के अंत में आता है तथा सोलहवीं सदी ईस्वी के मध्य में कलचुरि शासक कल्याणसाय की जमाबन्दी पुस्तक में सर्वप्रथम इन छत्तीस गढ़ों (वस्तुतः 48 प्रशासनिक इकाईयों) या राजस्व व्यवस्थापन केन्द्रों का नाम पृथक-पृथक उल्लेखित है। इसी क्रम में प्राचीन केन्द्रीय सत्ता के उपक्रम, जो भीतरी और दुर्गम भौगोलिक भागों में स्थित जमीन्दारियों के रूप में स्थापित हुए, इनके मुख्यालय की गढ़ नाम से जाने गए।

इस प्रकार यहां गढ़ों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है- प्रथम भौतिक स्वरूप वाले प्राचीन गढ़ एवं दूसरे मध्ययुग के बाद कलचुरि काल में राजस्व केन्द्रों के रूप में विकसित गढ़। इनमें खरौद, कोटगढ़ जैसे कुछ उदाहरण हैं, जो दोनों वर्गों में सम्मिलित हो सकते हैं, अर्थात् इन प्राचीन भौतिक स्वरूप वाले गढ़ों में ही कलचुरि और बाद में मराठा प्रशासनिक व्यवस्था में भी केन्द्र के रूप में इस्तेमाल किया गया है, यही कारण है कि कोटगढ़ जैसे गढ़ में प्राचीन अवशेषों के साथ-साथ कलचुरि अभिलेख व प्रतिमाएं तथा मराठाकालीन स्थापत्य के अवशेष भी विद्यमान है।

प्रसंगवश यह उल्लेख भी आवश्यक है कि अंचल के कई ग्रामों में दशहरा पर्व पर मिट्टी के स्तंभ बनाकर उसके ऊपर पहुंचने की प्रतियोगिता और गढ़ विजय का प्रचलन है। खरौद में शबरी मंदिर के निकट ऐसा स्तंभ है तथा सारंगढ़ में यह आयोजन धूमधाम से होता आया है। गढ़ों की पहचान में इस परम्परा के गढ़ों से भ्रम की स्थिति बनती हैं।

जांजगीर-चांपा जिले के संदर्भ में भी भौतिक स्वरूप वाले गढ़ विशेष उल्लेखनीय है। इन गढ़ों की प्राचीनता महाजनपद काल में उत्तर कोसल से भिन्न कोसल (दक्षिण कोसल या महाकोसल जनपद) से सम्बद्ध की जा सकती है। रतनपुर के हैहय (कलचुरि या चेदि) राजाओं की परम्परागत सूची कलियुग संवत् 3958 अर्थात् ईसवी पूर्व 857 से आरंभ होती है। पुराण कथाओं में यादवों द्वारा विजित देशों में नर्मदा-मेकल, शुक्तिमती और ऋक्षवत् के साथ मृत्तिकावती का नामोल्लेख है, जिसका तात्पर्य संभवतः मृद्दुर्ग का सघन क्षेत्र, वर्तमान छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा जिला अंचल से है।

प्राचीन साहित्य जातक कथाओं, रामायण, कौटिल्य अर्थशास्त्र आदि ग्रन्थों में नगर के चारों और परिखा और वप्र बनाय जाने का उल्लेख मिलता है पुरातत्वीय अवशेषों में तक्षशिला में ईसा पूर्व की सदियों में नगर के चतुर्दिक बनाई गई मिट्टी की दीवार मिली है, जिसे स्थानीय लोग धूलकोट कहते हैं। इसी प्रकार अन्य प्राचीन नगरों में मुख्यतः मथुरा और शिशुपालगढ़ में नगर रक्षा के प्राकृतिक साधन के रूप में नदी, जल, पर्वत, प्रस्तर समूह, मरूभूमि तथा अरण्य एवं कृत्रिम साधनों में परिखा, प्राकार और रोपित अरण्य का उल्लेख है। शुक्र नीति के शिल्पकारों की सूची में दुर्गकारिणः नाम आया है। जातक कथाओं में परिखायुक्त मृद्दुर्गों का उल्लेख है, जिनमें जल परिखा या उदक अथवा तोयपूर्ण परिखा, पंक परिखा और रिक्त परिखा, ये तीन प्रकार बताये गये हैं। अर्थशास्त्र मंे घड़ियालयुक्त ग्राहवती परिखा का उल्लेख है। इन उल्लेखों से अनुमान होता है कि ईसवी पूर्व की तीसरी-चौथी सदी में मृद्दुर्गों की व्यवास्थित अवधारणा का पर्याप्त विकास हो चुका था।

जिले व संलग्न क्षेत्रों में मृद्दुर्गों से संबंधित ज्ञात पुरावशेष भी इन गढ़ों की प्राचीनता प्रमाणित करते हैं। कोटगढ़-महमंदपुर तथा आसपास के अन्य गढ़ ग्रामों बछौद, मल्हार आदि से मौर्यकालीन आहत सिक्के प्राप्त होने की जानकारी मिलती है और कोटमी (सक्ती) में किसी साधु द्वारा अपने कमंडल में बिच्छू डालकर चांदी के चौकोर सिक्के निकालने की कथा बताई जाती है, इस तारतम्य में बिच्छू का चांदी के सिक्के में परिवर्तित होना तथा प्राचीन गड़े धन-सिक्कों का बिच्छू के रूप में परिवर्तित हो जाने की प्रचलित मान्यता का अध्ययन रोचक और महत्वपूर्ण हो सकता है। बछौद और कोटगढ़ में बड़े आकार की ईंटें प्राप्त होती है। कोटगढ़ तथा अन्य गढ़ क्षेत्रों से भी नवपाषणयुगीन उपकरण प्राप्त होते हैं।

सागर विश्वविद्यालय के सर्वेक्षणों में खरौद तथा मल्हार से महाजनपद युगीन प्रमाण विशिष्ट मृद्भांड प्राप्त हुए हैं। कोटमी सुनार की खाई और तालाबों में अब भी मगर विद्यमान हैं। अड़भार तथा बाराद्वार क्रमशः अष्टद्वार और द्वादशद्वार के अपभ्रंश माने जा सकते हैं। स्थान नामों की दृष्टि से धुरकोट, कोटमी, कोटगढ़ कोटेतरा जैसे नाम तथा ‘उद्’ अन्त वाले ग्राम नाम, जहां उद् का तात्पर्य ‘जल’ से है, ऐसे कई ग्रामों से मिट्टी के गढ़ की जानकारी मिलती है, इसी प्रकार ग्राम नामों में गढ़ या कोट शब्द महत्वपूर्ण है, संक्षेप में भाषाशास्त्र की दृष्टि से स्थान नामों के अध्ययन के माध्यम से भी इन गढ़ों संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सकती है। अन्य संकेतों में रहौद और सिऊंढ़ जैसे गढ़ क्षेत्रों में 4-5 मीटर तक मोटे जमाव हैं। कोनार में अट्टालक (बुर्ज) व्यवस्था के अवशेष व मान्यता है। गढ़ों की वर्तमान स्थिति में इन्हें प्राकार युक्त और प्राकार रहित, वर्गाकार, वृत्ताकार, अण्डाकार, षटकोणीय, अष्टकोणीय आकार-प्रकार और स्वरूप के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है।

इन गढ़ों में से चूंकि किसी स्थल का वैज्ञानिक पुरातत्वीय उत्खनन नहीं हुआ है अतएव इनकी पृष्ठभूमि तथा व्याख्या के लिए अनुमान का सहारा लेना आवश्यक हो जाता है। यह तार्किक अनुमान किया जा सकता है कि तत्कालीन स्थितियों में छत्तीसगढ़ का यह समतल मैदानी भू-भाग घनी जनसंख्या वाला क्षेत्र रहा होगा। गढ़ों की संख्या, उनका आपस में सामीप्य तथा गढ़ों का विशाल आकार देखते हुए भी यह अनुमान पुष्ट होता है कि गढ़ निर्माण के कार्य हेतु भी बड़ी तादाद में मानव श्रम प्रयुक्त हुआ होगा। इन गढ़ों की सघन निकटता को देखते हुए प्रत्येक गढ़ के साथ किसी शासक या गढ़ों के सामरिक प्रयोजन मात्र का अनुमान उपयुक्त नहीं होता है बल्कि इन्हें छोटे-छोटे नगर राज्य मानना उचित हो सकता है। संभवतः मैदानी भू-भाग में बसने वाली तत्कालीन आबादी को प्राकृतिक एवं राजनैतिक-सामरिक आपदाओं में ‘गढ़’ सुरक्षा प्रदान करने वाली संरचनाएं रही होंगी। इस प्रकार जिले में गढ़ों के पुरातात्विक उत्खननों से भविष्य में आने वाले परिणामों के पूर्व भी इस अंचल के गढ़ शोध अध्ययन संभावनायुक्त, देश के पुरातत्वीय मानचित्र में विशिष्ट स्थान के अधिकारी हैं।

अगले चरण में लगभग दो हजार साल पहले लकड़ी पर लिपि उत्कीर्ण करने का प्रयोग भी इसी जिले में घटित हुआ है, जो पूरी दुनिया में अपनी तरह का अनूठा नमूना है। किरारी (चन्द्रपुर) से प्राप्त अभिलिखित काष्ठ स्तंभ लेख का सुरक्षित अंश, अब रायपुर संग्रहालय में प्रदर्शित है। हीराबंध (अब लगभग पट चुके तालाब) से निकले इस लकड़ी के खंभे पर खुदे अक्षरों को महत्वपूर्ण समझकर स्थानीय पंडित लक्ष्मीधर उपाध्याय ने इसकी यथादृष्टि नकल उतार ली थी और तत्कालीन पुरालिपि विशेषज्ञों ने जांचकर इसे प्रामाणिक पाकर, उसी के आधार पर लेख का अध्ययन किया जिसमें तत्कालीन राज पदाधिकारियों के पदों का उल्लेख कुछ इस प्रकार है - ’नगररक्षी वीरपालित और चिरगोहक, सेनापति वामदेव ... भटकेशव वीथिदकामिक...प्रतिहार खिपत्ति, गणक नाग हेअसि, गृहपतिक धरिक, भाण्डागारिक असाधिय... हस्त्यारोह, अश्वारोह, देवस्थानक, पादमूलिक रथिक सिसार खाखिमल आदि।

इसी प्रकार सक्ती के निकट दमऊदहरा अथवा गुंजी, लगभग दो हजार साल पहले ऋषभतीर्थ के नाम से प्रसिद्ध था। दक्षिण कोसल के इस तीर्थ का उल्लेख महाभारत में भी हुआ है। यहां राजा कुमारवरदत्तश्री, अमात्य गोडछ के नाती अमात्य मातृजनपालित और वासिष्ठी के बेटे अमात्य, दण्डनायक और बलाधिकृत बोधदत्त ने दो बार एक-एक हजार गायों का दान किया। यह अभिलिखित प्रमाण भी अपनी प्राचीनता के कारण दुर्लभ जानकारी और क्षेत्र की सम्पन्नता का द्योतक है तथा यह स्थान आज भी जिले के महत्वपूर्ण धार्मिक तथा प्राकृतिक सौन्दर्ययुक्त प्राचीन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है।

जिले का ग्राम अमोदा प्राचीन अभिलेखों की प्राप्ति का महत्वपूर्ण स्थान है, इस ग्राम से सन 1924 एक घर की नींव खोदते हुए रतनपुर कलचुरि शासकों के तीन ताम्रपत्र सेट प्राप्त हुए थे, जो पृथ्वीदेव प्रथम, पृथ्वीदेव द्वितीय और जाजल्लदेव द्वितीय के काल अर्थात् ग्यारहवीं-बारहवी सदी ईस्वी के हैं। पृथ्वीदेव प्रथम के ताम्रपत्र में तुम्माण में वंकेश्वर मंदिर की चतुष्टिका निर्माण व ग्राम दान का उल्लेख है। पृथ्वीदेव द्वितीय के अभिलेख में वंकेश्वर ग्राम दान का उल्लेख है तथा जाजल्लदेव द्वितीय के ताम्रपत्र में राजा पर पड़ी विपत्ति व उससे छुटकारा पाने पर ग्राम दान किए जाने का विवरण आया है।

इसी प्रकार कोटगढ़ (अकलतरा) से प्राप्त शिलालेख भी विशेष उल्लेखनीय है, जिनमें पृथ्वीदेव द्वितीय के शासन काल में उसके मंत्री वल्लभराज के धार्मिक व अन्य कार्य, दान आदि का विवरण मिलता है, जिसके अनुसार उसने वल्लभसागर नामक तालाब खुदवाया तथा शिव एवं रेवन्त के मंदिरों का निर्माण कराया इससे अनुमान होता है कि तत्कालीन कलचुरि राज में वल्लभराज महत्वपूर्ण और लोकप्रिय मंत्री रहा होगा।

जिले के महत्वपूर्ण स्थापत्य उदाहरणों में सर्वप्रमुख जांजगीर का विष्णु मंदिर है, जिसे स्थानीय जन भीमा मंदिर या नकटा मंदिर के नाम से पुकारते हैं। दन्तकथाओं में कहा जाता है कि छोटा मंदिर (वस्तुतः शिव मंदिर) बड़े मंदिर का शिखर है, यह शिखर मंदिर के ऊपर रखा जाता, तभी निर्धारित अवधि रात पूरी हो गई, चिड़िया चहचहाने लगी, पौ फटने लगी और मंदिर अधूरा रहा गया। जांजगीर नगर, रत्नपुर शाखा के कलचुरि शासक जाजल्लदेव प्रथम द्वारा बसाया गया माना जाता है और संभवतः इन मंदिरों का निर्माण भी इसी काल में अर्थात 11-12 वीं सदी ईस्वी में निर्मित हुआ होगा।

शिखर रहित विष्णु मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से पूर्ण विकसित एवं तत्कालीन कला का प्रतिनिधि उदाहरण है। मानवाकार प्रतिमाओं युक्त विशाल जगती (चबूतरे) पर मंदिर निर्मित है। चबूतरे पर देव प्रतिमाओं के साथ-साथ कृष्ण कथा एवं रामकथा के कुछ महत्वपूर्ण प्रसंगों का अत्यंत रोचक अंकन है। जगती का अलंकरण व पूरे आकार की प्रतिमाओं की दृष्टि से यह मंदिर संभवतः भारतीय स्थापत्य कला का एकमात्र उदाहरण है। पूर्वाभिमुख मंदिर की बाहरी दीवार पर विष्णु, अवतार, रूप, वैष्णव कथाओं के अंकन के साथ-साथ ब्रह्मा, सूर्य, शिव, देवियां, अष्ट दिक्पाल, मिथुन, अप्सरा व व्याल प्रतिमाओं के अतिरिक्त विभिन्न मुद्राओं में वैष्णव योगियों का महत्वपूर्ण प्रतिमाएं हैं। प्रवेश द्वार पर त्रिमूर्ति-ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ त्रैलोक्यभ्रमण (गरुड़ासीन) विष्णु, नदी देवियां, द्वारपाल तथा पार्श्व अर्द्धस्तंभों पर कुबेर अंकित हैं।

अन्य मंदिर (छोटा मंदिर) शिव का है, जिसका मूल स्वरूप नवीनीकरण संरक्षण से प्रभावित है किन्तु प्रवेश द्वार यथावत सुरक्षित है। यहां सिरदल के मध्य में नंदी सहित चतुर्भुजी शिव का कलात्मक अंकन हैं द्वार शाखाओं में उभय पार्श्वों पर नदी देवियों और द्वारपाल की प्रतिमाएं रूपायित हैं। बाहरी दीवार पर अपेक्षाकृत कम संख्या में किन्तु शास्त्रीय व कलात्मक सूर्य, हरिहर-हिरण्यगर्भ, शिव-नटराज, गणेश, सरस्वती आदि प्रतिमाएं है। एक अन्य महत्वपूर्ण प्राचीन मंदिर की जानकारी पिछली सदी के भारतीय पुरातत्वीय सर्वेक्षण के प्रतिवेदन से प्राप्त होती है, जिसके अनुसार यह विशाल मंडपयुक्त अंलकृत मंदिर शिव को समर्पित था, किन्तु वर्तमान में इस मंदिर का अस्तित्व विद्यमान नहीं है।

जिले में प्राचीन स्थापत्य का विशेष महत्वपूर्ण केन्द्र खरौद है। यह छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र है। खरौद के ईंट निर्मित ताराकृति मंदिर विशेष उल्लेखनीय हैं। इनमें शबरी मंदिर चबूतरे पर निर्मित है, गर्भगृह का प्रवेश द्वार आकर्षक है, जिसमें नाग युग्म अलंकरण अभिकल्प का संतुलन देखते ही बनता है। प्रवेश द्वार के बीचों बीच ललाट-बिंब पर गरुड़ की आकृति उत्कीर्ण है, जिसमें मंदिर मूलतः वैष्णव होना संभावित है। प्रवेश द्वार पर दो नारी आकृतियों की पहचान नदी देवी गंगा-यमुना के रूप में की जा सकती है। मंदिर का मंडप पुनर्सरचित है, किन्तु अर्द्धस्तंभों पर शिवगण, द्वारपाल, सिंहवाहिनी दुर्गा तथा मकरवाहिनी गंगा की पहचान की जा सकती है। शेष तीन प्रतिमाएं, जिनमें दो पुरुष व एक नारी प्रतिमा है, की पहचान राम, लक्ष्मण व सीता के रूप में की जाती है, किन्तु इन प्रतिमाओं मे वक्ष पर कवच तथा पैर उपानहयुक्त (जूतों से ढके) दिखाई पड़ते हैं, जिससे इन प्रतिमाओं का सौर परिवार से संबद्ध किया जाना अधिक न्याय संगत है। मंदिर के बाहर एक अन्य महत्वपूण्र अर्द्धनारीश्वर प्रतिमा है, जिसे शास्त्रीय प्रतिमानों के अनुरूप अलंकृत तथा व्याघ्रचर्मधारी प्रदर्शित किया गया है।

इन्दल देउल मंदिर की योजना भी ताराकृति है, यह मंदिर ईंटों से निर्मित है, किन्तु बाह्य भित्ति के आलों में गणेश, नृसिंह आदि आकृतियां प्रदर्शित हैं। मंदिर का विशेष उल्लेखनीय अंग प्रवेश द्वार पर स्थापित गंगा-यमुना की प्रतिमाएं है, मानवाकार इन नदी देवी प्रमिाओं की भंगिमा, अलंकरण तो कलात्मक, सुरूचिपूर्ण व संतुलित है ही, इनका आकार भी द्वारशाखा के बराबर पूर्ण है, यह भारतीय मंदिर वास्तु का विशिष्ट लक्षण है। नदी देवी प्रतिमाओं के पार्श्व से बाहर की आरे प्रदर्शित भित्ति के चिह्न, गर्भगृह के समक्ष मंडप जैसे किसी अंग का अनुमान कराते हैं। खरौद का लक्ष्मणेश्वर मंदिर संरक्षण-सर्वधन कार्यों से अत्यधिक प्रभावित है, किन्तु गर्भगृह में स्थापित मूल अष्टकोणीय शिवलिंग के अवशिष्ट है। यहां प्रवेश द्वार को शाखाएं दो भागों में विभक्त हैं, जिसमें निचले भाग पर द्वारपाल व उपरी आधे भाग पर गंगा-यमुना को उनके वाहनों क्रमशः मकर व कच्छप पर स्थित दिखया गया है। मंदिर के मंडप में राम कथानक युक्त स्तंभ तथा दो प्राचीन शिलालेख भी जड़े है। धार्मिक दृष्टि से इस मंदिर की सर्वाधिक मान्यता है। खरौद के मंदिरों का काल ईस्वी सातवी-आठवीं सदी निर्धारित किया जा सकता है।

अड़भार, जिले का एक महत्वपूर्ण प्राचीन स्थल है, जहां ईस्वी सातवीं-आठवीं सदी के शिव मंदिर के अवशेष तथा अन्य पुरातशेश प्रकाश में आये हैं। अड़भार का मंदिर अष्टकोणीय ताराकृति योजना वाला मंदिर था, जिसमें प्रवेश हेतु दो द्वार अब भी मूलतः विद्यमान हैं। इसमें बाह्य अलंकृत द्वार पर नाग-गरूड़, कार्तिकेय व उमा-महेश का अंकन है। मंदिर परिसर में अत्यंत आकर्षक अष्टभुजी देवी महिषमर्दिनी तथा देगन गुरू के नाम से ज्ञात जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा है। मंदिर के सामने नंदी मंडप है, जिसमें अष्टकोणीय नृत्त शिव की प्रतिमा है, जो तत्कालीन कला प्रतिमानों में प्रतिनिधि प्रतिमा मानी जा सकती है।

शिवरीनारायण, खरौद से संलग्न महानदी के तट पर स्थित प्रसिद्ध केन्द्र है, जहां शबरीनारायण, केशवनारायण और चन्द्रचूड़ मंदिर प्राचीनता की दृष्टि से विशेष उल्लेखनीय हैं। इनमें केशवनारायण ईंट-पाषाण मिश्रित ताराकृति संरचना है, जिसके प्रवेश द्वार पर विष्णु के चौबीस रूपों का अंकन अत्यधिक सफाई से किया गया है, अन्य परम्परागत स्थापत्य लक्षणों के साथ गर्भगृह में दशावतार विष्णु की मानवाकार प्रतिमा है। शबरीनारायण या मुख्य मंदिर के प्रवेश द्वार के पार्श्व में शंख पुरूष व चक्र पुरूष की आदमकद मूर्तियां है, द्वारशाखा पर बारीक उकेरन और शैलीगत लक्षण की भिन्नता दर्शनीय है साथ ही मंडप में रखी परवर्तीकालीन गरूड़ासीन लक्ष्मी-नारायण प्रतिमा भी उल्लेखनीय है। चंद्रचूड़ मंदिर में अत्यंत महत्वपूर्ण सूचना युक्त कलचुरि कालीन शिलालेख जड़ा है।

यह जिला प्राचीन सिक्कों की प्राप्ति की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस क्रम में सर्वप्रथम ठठारी से प्राप्त चांदी के आहत सिक्के हैं, जिनका काल तीसरी-चौथी सदी ईसा पूर्व निर्धारित किया गया है, कुछ अन्य स्थानों से इस प्रकार के सिक्के प्राप्त होने की अपुष्ट सूचना प्राप्त होती है। बालपुर से प्राप्त एक सिक्का अपिलक (सालिलुक) का माना जाता है, जिसका काल ईस्वी की आंरभिक सदी है। यह सिक्का आन्ध्र शासकों के सिक्कों के समरूप है, बालपुर से ही स्थानीय शासकों के कुछ अन्य तांबे के सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनमें गज तथा देवी अथवा नाग का अंकन है। इसके साथ ही रोम, कुषाण शासकों आदि सिक्के भी जिले के संलग्न क्षेत्र व अंचल से प्राप्त हुए हैं। लगभग पांचवीं-छठीं सदी ईस्वी के शासकों प्रसन्नमात्र और महेन्द्रादित्य के 81 सिक्के बाराद्वार के निकट ग्राम तलवा से प्राप्त हुए हैं, ये सभी स्वर्ण सिक्के ठप्पांकित प्रकार के हैं और इस प्रकार के सिक्कों की यह सर्वाधिक संख्या निधि है। तीन चांदी और एक तांबे का चीनी सिक्का भी बालपुर से प्राप्त हुआ है। रतनपुर के कलचुरि शासकों का भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह केरा से प्राप्त हुआ था।

इस प्रकार संक्षेप में कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ अंचल के जांजगीर-चांपा जिले के मैदानी भू-भाग ने इतिहास में सभ्यता के प्रत्येक चरण में मानव को आकर्षित किया है और नैसार्गिक सम्पदा से परिपूर्ण इस जिले का वैविध्य सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनैतिक व कलात्मक गतिविधियों का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है, वर्तमान में अवशिष्ट हमारे अतीत के ये धरोहर हमें आत्म गौरव का बोध कराते हुए उज्जवल भविष्य की ओर अग्रसर रहने की प्रेरणा देते हैं।