Friday, June 26, 2026

पुरा-शहडोल

बात की शुरुआत देश-काल से। 35-40 साल पुराने मध्यप्रदेश का समय। बिलासपुर में पुरातत्व विभाग के दो कार्यालय, रजिस्ट्रीकरण अधिकारी और संग्रहाध्यक्ष, हुआ करते थे। बिलासपुर कार्यालय का कार्यक्षेत्र तब सात जिलों वाले छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, सरगुजा और रायगढ़ जिला वाला बिलासपुर संभाग। इसमें खास कि तब का शहडोल जिला, जिसमें उमरिया और अनूपपुर भी होते थे, बिलासपुर कार्यालय के अधीन होता था। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद शहडोल अलग हुआ, लेकिन कार्यक्षेत्र यही बना रहा। प्रसंगवश बिलासपुर जिला कार्यालय में किसी ने मुझे समझाइश दी कि कलेक्टर को नाराज मत कर लेना, आपका सीआर वही लिखेगा, इस समझाइश में धमकी की धमक मैंने सुन ली। बातों-बातों में हमारे संचालक रहे प्रदीप पंत जी से यह बताया, उन्होंने कहा, जिसने ऐसा कहा है उसे शायद पता नहीं कि कलेक्टर जिले का अधिकारी होता है और आपके अधीन पूरा संभाग है।

वापस बात पटरी पर, तो पुरातत्व के मामले में तब का शहडोल जिला, तब के बिलासपुर जिला कार्यालय के अधीन होता था, इसलिए हमलोगों का शहडोल से अपनापा था। शहडोल संग्रहालय की स्थापना, जिला पुरातत्व संघ की पहल पर हुई थी, अमलाई पेपर मिल के जनसंपर्क अधिकारी राजेन्द्र कुमार बंसल, इस संघ के सक्रिय सदस्य थे। संग्रहालय में विभागीय मुलाजिम लाल बहादुर सिंह की तैनाती हुई तो संग्र्रहालय के कामकाज में बंसल जी की दखल के चलते विवाद होने लगे। इसके बाद शहडोल संग्रहालय में सिंह जी के बाद डॉ. अशर्फीलाल पाठक पदस्थ हुए, उनसे शहडोल जिले के पुरातत्वीय समाचार मिलते रहते थे। फिर अप्रैल 1987 में शहडोल जिले के पुरातत्वीय स्थलों के सर्वेक्षण में वरिष्ठ अधिकारी जी.एल. रायकवार जी का साथ रहा। अप्रैल 1989 में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, पुराविद डॉ. कल्याण चक्रवर्ती जी के साथ सघन दौरा हुआ तथा मध्यप्रदेश में पुरातत्वीय सलाहकार रहे भारतेन्दु परिवार के, हार्वर्ड विश्वविद्यालय वाले डॉ. प्रमोदचन्द्र जी तथा उनकी पत्नी श्रीमती मैरी कार्मेन के साथ, जिले के स्थलों को और बांधवगढ़ में रुककर, विशेष अनुमति सहित वहां के पुरावशेषों, अभिलिखित गुफाओं को देखने-समझने का अवसर मिला। श्रीमती मैरी ने इस अंचल की कलचुरि कला पर शोध किया है।

डॉ. प्रमोदचन्द्र मानते हैं कि त्रिपुरी कलचुरियों की कला से उत्कृष्ट प्रमाण इस क्षेत्र में हैं। उल्लेखनीय है कि विदेशों में आयोजित होने वाले ‘फेस्टिवल आफ इंडिया‘ के लिए चयन का जिम्मा डॉ. प्रमोदचन्द्र का था, उन्होंने भारतीय कला के प्रतिनिधि उदाहरणों में शहडोल, सोहागपुर के कुंवर मृगेन्द्र सिंह के निजी संग्रह के ‘भैरव‘ को भी चुना था। उनकी सलाह पर हमने मेमायर्स आफ द आक्यालाजिकल सर्वे आफ इंडिया, नं. 23 का आर.डी. बैनर्जी का ‘द हैहयाज आफ त्रिपुरी एंड देअर मान्युमेंट्स-1922‘ उड़नछू बांच लिया था। डॉ. रमानाथ मिश्र की किताब से इस अंचल की प्राचीन कला को जानने-समझने में मदद मिली और डॉ. रहमान अली के इस अंचल के शोध की जानकारी प्रत्यक्ष उनसे सुनने को मिलती रहती थी। देवकुमार मिश्र की ‘सोन के पानी का रंग‘ का सहारा तो था ही, यों भी मेरी पढ़ी-जानी किताबों में यह नदियों पर लिखी हिंदी की पहले नंबर पर रखी जाने वाली किताब है। वेगड़ जी की ‘तीरे तीरे नर्मदा‘ के प्रति पूरे सम्मान के बावजूद ऐसी और किसी किताब की गिनती मेरे लिए पांच के बाद ही शुरू होगी।

तब न मोबइल फोन था न गूगल, तो ऐसे काम पर निकलते हुए तैयारी में एक जरूरी चीज होती ‘मजमुली नक्शा‘ और दूसरी जिले के कक्षा तीसरी की भूगोल किताब। जिले का संक्षिप्त गजेटियरनुमा, इस भूगोल पाठ्य पुस्तक के अध्याय होते थे- स्थिति और विस्तार, भू-रचना, जलवायु, वनस्पति तथा पशुधन, खनिज-संपत्ति, सिंचाई तथा विद्युत सुविधाएं, कृषि और उसकी उपजें, उद्योग-धंधे? परिवहन के साधन, जिले के प्रसिद्ध स्थान, जिले की प्रशासनिक इकाइयां और जिले के निवासी। इस पचास पेजी सचित्र किताब को अच्छी तरह बांच लेने के बाद सव्रेक्षण-दौरे की योजना बनाना तो आसान होता ही था, जरूरत पड़ने पर अपनी जानकारी का रौब या परिस्थिति अनुसार उस अंचल से अपनी निकटता जाहिर कर, बहुत सारे काम आसान हो जाते। सर्वेक्षण का काम पूरा हो जाने पर इस पुस्तिका की जानकारियां प्रतिवेदन बनाने में भी उपयोगी होती। (इस पुस्तिका की पीडीएफ प्रति मेरे पास अब भी सुरक्षित है, कोइ महानुभाव इच्छुक हों तो कमेंट में अपना वाट्सएप नंबर दे दें, प्रति भेज दी जाएगी, इस निवेदन सहित कि हो सके तो वे मेरे तब के जिले बिलासपुर की भूगोल पुस्तिका पीडीएफ उपलब्ध करा दें, जो अब मेरे पास नहीं रही।) इतनी तैयार के बाद चाक-चौबंद, आश्वस्त मैदान में उतर गए।

पुरानी बातों के कोर-कार दुरुस्त कर देता है समय। वह वैसी ही याद नहीं रह जाती जैसी वह होती है, इसलिए लिखने बैठें तो यादों की चकरघिन्नी। यों भी याददाश्त से कहीं अधिक भरोसा अपने भूलने पर है, सो भूल-चूक माफ। आगे अपनी डायरी के नोट्स, मगर उसके पहले कुछ भूला-कुछ याद किया, पेश-

जैसिंहनगर, तहसील आफिस के आसपास मंडराते जीव। तहसीलदार साहब सागर विश्वविद्यालय के पुरातत्व के विद्यार्थी रहे ज्योति सक्सेना जी। बाद में वे ही अनूपपुर में भी मिले। अपनी शासकीय सेवा में कभी उनका जुड़ाव पुरातत्व से होगा, उन्होंने शायद ही सोचा होगा। सर्वेक्षण का परवाना दिखाने की जरूरत बस इसलिए हुई कि ऐसा भी सरकारी काम होता है। वे सहयोग के लिए तत्पर। चाय-पानी के इंतजाम तक हम तहसील के दर्दी-फरियादियों से गुफ्तगू करते रहे। वे अपनी सारी परेशानी, गिला-शिकवा भूलकर, खुद आगे बढ़ कर पुराने ठौर-ठिकानों का पता देते रहे, किस्से सुनाते रहे। एक सयाने ने बताया कि जैसिंहनगर नाम, रीवां के राजा जयसिंह देव से आया है। राजा का सिक्का चलता था, सचमुच का, तांबे का टकसाली सिक्का। लोगों की जबान पर पुराना नाम ही बना रहता था। राजा का फरमान आया कि नमकहराम होगा, जो अपने गांव का पुराना नाम लेगा। पता लगता, जिस किसी ने गांव का पहले वाला नाम लिया है, उसकी जबान बदलने के लिए पूरी मुट्ठी भर नमक खिलाए जाने की सजा तजवीज कर दी गई। सयाने ने कहा मगर बाप-दादा से सुना नाम हमें अब भी याद है, चारों तरफ नजर घुमाई फिर गुम हुआ नाम धीरे से उचारा- ‘गुमगौर‘। बदले में हमने उसका मुंह मीठा कराया, चाय पिला कर।

सुन रखा था कि पुराने समय में कोरिया, छत्तीसगढ़ के चांगभखार यानी जनकपुर-भरतपुर जाने के लिए यहां से जाना होता था, तो कुछ दूर यह रास्ता भी नाप लिया। तब वहां बातों-बातों में मसीराघाट पर बन रहे पुल का जिक्र आता था, वहां तक भी हो आए। ठेकेदार के कारिन्दों ने अकारण आग्रहपूर्वक चाय पिलाई, उन्हें निर्देश रहा होगा कि सरकारी मुलाजिम आएं, किसी भी विभाग के, किसी भी काम से, बिना पूछ-परख न जाने दें। सरकारी आदमी, जाने कौन, कब, कैसी मुसीबत खड़ी कर दे।

एक वकील साहब भी मिले, पेशी और मुवक्किल से निपट चुके थे, बताने लगे- यहां क्या मिलेगा आपको, विराट मंदिर के दर्शन कर लीजिए बाकी तो बंजर, जंगल, खदानें, बेरोजगारी, आदिवासी। कोई उद्योग नहीं, विकास नहीं। तहसीलदार साहब ने पयासी जी को साथ कर दिया। वे मानों शहडोल के देसी आडियो गजेटियर। कथा बांच रहे हैं- सोन-जोहिला और नर्मदा के त्रिकोण की। मसीरा घाट और दशरथ घाट दिखा लाने का वादा, चाहे छुट्टी लेनी पड़े। सोन-जोहिला संगम पार करने लायक छिछला पानी, रायकवार जी की देखा-देखी, संगम में पैर डालने के पहले सिर पर पानी डाला, आचमन किया, दशरथ घाट के दर्शन कर लौटे।


वापसी में एक सूने कच्चे घर की बाहिरी दीवार पर चित्रकारी दिखी। चित्र के अनुसार यह ग्राम बरहा के सुखसेन बैगा की कृति है, जो अपने को अभी नौसिखुआ-आधा पेन्टर मानता है, लिखा है- आई यम पेन्टर अभी 1/2। चित्र में वनस्पति गमले में आ गई है, धनुष-बाण और मुकुटधारी राजा है, शायद सोन नद का मानवीकरण, जिसमें वह खुद को देख रहा है और साथ उसके सपनों की रानी? नर्मदा-जोहिला? आधुनिका- बॉब्ड। संभव है उसने मोहनजोदड़ो की नर्तकी कांस्य प्रतिका का चित्र देखा हो। कांस्य नर्तकी कमर पर हाथ टिकाए हुए है, मूर्तिकला की शब्दावली में ‘कट्यावलंबित‘। आ देखें जरा ... वाली चुनौतीपूर्ण देहभाषा (बॉडी लैंगुएज), जबकि, कल्पनाशील चित्रकार की नायिका ने दोनों हाथ कमर रखे हैं। स्त्रैण नजाकत वाली, कुछ-कुछ पीटी मुद्रा। ‘तिपतिया लॉकेट‘ ठीक उसकी नकल जैसा ही है। अंचल के बैगा युवक की आदिम चेतना में शायद इसी तरह की आधुनिकता के गणित की खिचड़ी पक रही है।

दियापीपर। शहडोल से जैसिंहनगर के रास्ते पर सोन का पुल पार करते ही बैरियर, बड़े लट्ठ-अड़गड़ वाला टोल नाका। सरकारी काम वाली गाड़ी का हवाला दिया, कुछ नरम-गरम। बात बन गई, बैरियर खुल गया। मगर इस बातचीत के दौरान नाका वालों को पता चला कि हम पुरानी जगहों की खोज कर रहे हैं, मंदिर-मूर्तियों की, तो वे भक्ति-भावना से भर कर बताने लगे कि हम आगे बढ़ कर दाएं मुड़ जाएं। ढेरों पुराने पत्थर, मूरत, देवी-देवता हैं। सीधे के बजाय हम दाहिने मुड़ कर आगे बढ़े। बड़ी तादाद में ढेरों पुरावशेष बिखरे हुए। लेकिन समस्या थी कि पूरे मैदान में ऊँची- ऊँची, सूखी घास थी। थोड़ी साफ-सफाई की और कुछ खुले में पड़ी कलाकृतियों की फोटोग्राफी, विवरण दर्ज करते रहे। तब तब न जाने कहां से कोई चिंगारी उठी और देखते-देखते सूखी घास में आग फैलने लगी, झाड़ू-बुहारू जैसे सब उपाय, जो भी संभव था, किया। बड़ी मुश्किल से बात बनी। चारों ओर सुनसान था, फिर भी मौके की नजाकत का अनुमान कर काम आगे बढ़ाए बिना बढ़ लिए। ड्राइवर से पूछा, तुमने सिगरेट के लिए तीली जलाई थी?, वह लगातार मना करता रहा और सफाई देने लगा कि गाड़ी के एक्जास्ट से चिंगारी निकली होगी, जिसके चलते ऐसा हुआ और नाम भी तो ऐसा है ‘दियापीपर। बहरहाल वापस लौटते फिर बेरियर पर रुके तो बताया गया- आपलोगों को मालूम, दियापीपर मैदान घास में आग लग गई थी। हमने कहा, सब हरिइच्छा, अब तो सारे देव प्रकट हो गए होंगे। फिर वहां जा कर, छूटा काम पूरा किया।

एक किस्सा कौड़िया का। चंदिया से दस-दस किलोमीटर बांयें-दायें दो पुरातत्वीय भंडार, कौड़िया और पथरहटा। सुराही वाले चंदिया रोड स्टेशन से परिचय पुराना रहा। अब चंदिया पहुंचे। इलाके से लगभग अपरिचित, तो पहले पहुंचे पुलिस थाना। थानेदार साहब का इंतजार करने लगे। हमें जाना था कौड़िया। देर हो रही थी, दुविधा में थे कि इंतजार करें या निकल चलें। समय बिताने के लिए थाने में लगी तख्तियां बांचने लगे। एक तख्ती लगी थी- ‘बदमाश गांवों की सूची‘, उस पर सबसे ऊपर पहला नाम था ‘कौड़िया‘। थानेदार साहब आए, हमलोगों को शुभकामनाएं देते विदा करते ताड़ लिया कि हमारी नजर तख्ती पर कहां जा रही है। मुंशीजी उसी इलाके के थे, हमलोगों के काम और साथ देने के प्रति उत्सुक। थानेदार साहब ने उन्हें हमारे साथ कर दिया। मुंशी जी पूरे इलाके का इतिहास-भूगोल बताते रहे, उनकी बातचीत में किसी अपराध, दीवानी-फौजदारी का भूले से भी जिक्र नहीं आया। कौड़िया के रास्ते में हमें कुछ ग्रामवासी कुछ आगे पास के गांव ‘बिलासपुर‘ जाने वाले मिले। बीच में हम माइक्रोलिथिक टूल्स मिलने की संभावना से रुके, तो हमारी देखा-देखी, इस काम में वे सबसे आगे रहे।

हमारा इरादा था कि दिन रहते कौड़िया-सलैया और पथरहटा कर, अंधेरा होते शहडोल वापस लौट जाएंगे। मगर कौड़िया-सलैया के कुछ हिस्से के नोट्स और फोटो लेते अंधेरा होने लगा। शहडोल वापस लौट कर अगले दिन फिर आना, कशमकश में थे। गांव में सरपंच जी से मिले अकड़े से युवा और देख कर ही समझ में आ गया हेठी न खाने वाले। बात होने लगी तो पता लगा कि गांव में दो-पार्टी वाली फूट है, जिसके कारण अपराध दर्ज होते रहते हैं। हमारे मामले में दोनों पार्टी के लोग तदर्थ रूप से सहयोगी बन गए। रात रुकने का इंतजाम और भोजन अपने निवास पर सरपंच जी ने कराया। गांव के इकट्ठे हुए लोग सहयोग की अपनी भूमिका के लिए तत्पर थे। उस इलाके में कुछ घटनाओं की जानकारी थी, जिसमें पुरातात्विक सामग्री की जानकारी और उसमें रुचि लेने वालों की गाड़ी में तोड़-फोड़ और पिटाई भी हो चुकी है। जबकि हम दूसरे दिन काम पूरा कर शहडोल संग्रहालय के लिए गांव वालों की मदद से एक सूर्य प्रतिमा, अपनी जीप में लदवा कर वापस लौटे।

रायकवार जी का 'पूर्वानुमान" कभी अनर्गल जान पड़ता है, मगर कई बार चौंकाता भी है। कौड़िया में घूमते हुए वे कभी पूछते और कहीं भी तो मूर्तियां नहीं रखी हैं, कुंए के पास, देवालय में, इस-उस दिशा में, हमें लगता तीर-तुक्का, लगभग सही ही बैठ रहा है। बात जुड़ी कि गांव वाले जो किस्सा सुना रहे थे- बहुत पहले दो लोग एक बड़ी गाड़ी ले कर आए थे, अपने को पुरातत्व विभाग का बताया और एक मूर्ति ‘चुरा‘ कर ले गए थे। वापस आते यह भेद रायकवार जी ने खोला कि उन्हें और वी.पी. नगायच जी को शहडोल संग्रहालय के लिए प्रतिमा संग्रह का आदेश हुआ था। तब, रायकवार जी सागर में और वे रीवां में पदस्थ थे। अजीत जोगी जी शहडोल कलेक्टर थे, और कुंवर अर्जुन सिंह के रिश्तेदार हरचरण सिंह जी, उमरिया एसडीएम, उन्होंने एमपीइबी की डग्गा गाड़ी दे दी, जिसमें उनके द्वारा शहडोल संग्रहालय के लिए कौड़िया से सूर्य प्रतिमा लाई गई थी। रायकवार जी ने अपनी शैली में यह किस्सा सुनाया। बाद में सविस्तार विवरण नगायच जी ने याद किया- सन 1978 की बात है।

इस दौरान धरहर, राजेन्द्रग्राम (तत्कालीन राष्ट्रपति जी के प्रवास के कारण रखा गया नाम) का विशाल वृक्ष ‘पपीता बाबा‘, मढ़ीबाग का सुनसान, रहस्यमय वातावरण, वीरसिंहपुर पाली की देवी प्रतिमा, अन्तरा की चामुण्डा, सिंहपुर का प्रवेश द्वार, राजाबाग का संग्रह अविस्मरणीय है।

अब डायरी के नोट्स - 

# चितरांव - जैसिंहनगर से जनकपुर मार्ग पर जाकर बायाँ व्यपवर्तन कुल दूरी 20 किमी. painted rock-shelter site, tools. 
# जोहिला नदी के नौरोजाबाद सड़‌क पुल के नीचे tools.
# चंदि‌या से पथरहटा मार्ग पर खेतों में tools
# (छोटी)महानदी-मछड़ार संगम (चंदि‌या-कौड़िया मार्ग) के निकट कारी पाथर unpainted shelters, tools. 
# बसोहरा - जैसिंहनगर से 12 किमी. shelter तथा tools. 
# निगाई - जैसिंहनगर से मानपुर जाने पर tools.
# नगरवाह - जैसिंहनगर से मुख्य मार्ग पर 6 कि.मी. कौवासरई से 4 किमी. shelter, tools.
# शह‌डोल - सोहागपुर का विराटेश्वर मंदिर, निकटवर्ती क्षेत्र के mounds में rich remains जैन मंदिर में प्रतिमाएं / कुँवर साहब, राजाबाग के यहाँ कृष्ण लीला के तीन पटल, भैरव, गजासुरवध, (outstanding), शिव, शेषशायी विष्णु, कुबेर, त्रिदेवी (वैष्णवी, ब्रह्माणी, माहेश्वरी), अन्य कई प्रतिमाएं 
# धरहर- राजेन्द्र‌ग्राम से अमरकंटक मार्ग पर 7 कि. मी. से दायें व्यपवर्तन पर 1 कि.मी. late 12th या 13th cent. का पूर्वाभिमुख कलचुरि (रतनपुर?) शैली का शैव मंदिर / प्रवेश द्वार के उपर (सामने), पत्थर गिरा हुआ, द्विशाख, ललाट-बिंब पर शिव - त्रिदेव तथा नवग्रह, द्वारशाख पर गंगा-यमुना, शैव द्वारपाल/उदुम्बर, कलशधारी उपासक / त्रिअंग (पंचरथ), दक्षिणी भित्ति की द्वितल जंघा पर- कार्तिकेय, गणेश (अन्तराल), दिक्पाल, मिथुन युगल, मध्य रथ पर ब्रह्मा, नटराज (सौम्य), दिक्पाल, पश्चिम भित्ति पर - मिथुन शेष ध्वस्त, उत्तर भित्ति पर - वीणाधर शिव, नटराज (उग्र-भैरव), अन्तराल में माहेश्वरी, चामुण्डा उत्सेध में - अधिष्ठान (वेदिबंध), खुर, कपोत, सूचिका, मुकुल, खुरछाद्य, गजथर - जंघा. तुल्य सरगाँव (बिलासपुर) का धूमनाथ मंदिर, इससे कुछ और परवर्ती. 
# सीतामढ़ी - सोहागपुर-मानपुर मार्ग पर चौरी से 3 किमी., कुल लगभग 25 किमी. 3 छोटे मंदिर 9th cent. (प्रतिहार शैली) 
# हर्रा- अन्तरा-केलमनिया मार्ग पर 22 किमी./ गोमेद-अंबिका, दो कृष्ण कथा फलक, नृवराह, विष्णु सिरदल, नवग्रह पटल, उमा- महेश द्यूत (जबलपुर संग्रहालय की प्रतिमा तुल्य)
# दुलहरा - हर्रा के निकट / विष्णु, गणेश, नायिकाएँ, small door frame, remains.
# केसवाही - बुढ़ार से जैतपुर मार्ग पर 27 किमी./ शाहपुर (8 किमी.) में विष्णु, ध्वस्त मंदिर के अवशेष, सांडामाल (8 किमी.) में ध्वस्त विशाल मंदिर एवं अवशेष / सगरा (7 किमी.), में remains. 
# मानपुर - मानपुर से ताला भार्ग पर 5 किमी. ज्वालामुखी मंदिर - विष्णु मंदिर, मंदिर में भूमिस्पर्श मुद्रा में बुद्ध प्रतिमा.
# मार्कण्डेय आश्रम- मानपुर-अमरपाटन मार्ग पर छोटी महानदी व सोन के संगम पर उमा-महेश, विष्णु, दिक्पालों की प्रतिमाएँ.
# आमडीह - अनूपपुर से कोतमा मार्ग पर 18-20 किमी. (फुनगा, पसला के निकट, बिजौड़ी ग्राम से लगा हुआ) /ब्रह्मा, तीन लक्ष्‌मीनारायण, दो उमा-महेश, हनुमान तथा अन्य अवशेष.
# छुलकारी - उपरोक्त स्थल के पास ही/ विष्णु, लक्ष्मीनारायण, योगियों की प्रतिमाएँ.
# सामतपुर - अनूपपुर में 13th cent. का मंदिर, कर्ण व अर्जुन का युद्ध दो स्तंभों पर अंकित (सूर्य व इन्द्र सहित), सिरदल, उत्तरंग पर पंक्ति में standing दशावतार, अलंकृत स्तंभ, नदी देवी, शैव द्वारपाल, बाहर उमा-महेश, लक्ष्मीनारायण.
# अन्तरा - केलमनिया मार्ग पर 9 किमी./ कंकाली मंदिर में unique चामुण्डा (cement retouching), विशाल, अति प्रभावशाली, उमा-महेश, विष्णु, आदिनाथ, योगिनी प्रतिमाएँ, temple mounds. 
# सिंहपुर - पतखई मार्ग पर 14 किमी. / परवर्ती संरचना, कथित पंचमठा या मान्य शिव मंदिर किन्तु शायद वस्तुतः मकबरा या समाधि में पंचशाख, अत्यंत विकसित और भव्य वैष्णव प्रवेश द्वार लगा है, यहीं विशाल वैष्णव प्रतिमा शीर्ष (capital), बौद्ध तारा, योगिनी, गरुड़ की एकाकी मुख्य प्रतिमा, सप्तमातृका पट्ट व pillars भी लगे हैं। दूसरे नवनिर्मित मंदिर में चामुण्डा (अन्तरा तुल्य आकार में छोटी पर अधिक सुरक्षित), गणेश प्रदक्षिणा में आदिनाथ, पार्श्वनाथ की कई प्रतिभाएँ.
# वीरसिंहपुर पाली- बिरासनी देवी मंदिर - मुख्य गर्भगृह में विशाल हरिहर, एक अन्य हरिहर, एक विष्णु, एक अन्य (संभवतः विष्णु), प्रतिमा तथा अन्य गर्भगृह में गणेश, महिषमर्दिनी बाहर प्रांगण में महिषमर्दिनी, अन्धक-गजासुर वध शिव, नटराज, तीन-चार उमा-महेश, सूर्य कुछ अन्य
# उमरिया - सगरा मंदिर के ancient door frame को paint कर दिया गया है।
# मढ़ीबाग - उमरिया से शहपुरा मार्ग पर 13th cent. का शैव मंदिर, मंडप पुनर्रचित, दिक्पाल, सूर्य, गजासुर वध, नृसिंह, चामुण्डा, सिरदल पर शिव, सरस्वती, गणेश
# बांधवगढ़- 2nd cent. के inscribed rock-cut chambers विस्तृत विवरण N.P. Chakravarti का paper, E.I. Vol. XXXI part IV, Oct. 1955 में top पर 5 मंदिर प्रतिहार शैली?, 8th से 10th cent. A.D. के / monolithic rock-cut वराह, मत्स्य, नृवराह (18‘), साथ में स्तंभ, शेषशायी विष्णु ( कथित चरणगंगा पर -11.75 मीटर), पैर की ओर ब्रह्मा, सिर की ओर शिवलिंग, विभिन्न स्थानों पर कलचुरि युवराजदेव के अभिलेख / राजा तालाब या बाबा तालाब के निकट मढ़िया में सूर्य, गजलक्ष्मी, विष्णु, शिव, गौरी, ब्रह्मा, कार्तिकेय, गंगा तथा पास ही रेवन्त प्रतिमा-सभी 12-13th cent. की / एक अन्य मंदिर व अवशेष, बड़ी शेषशायी पर building remains भी, 10th cent. का पश्चिमाभिमुख संभवतः शिव मंदिर, जाते हुए चढ़ाई में habbitational remains. यह स्थान तानसेन, सेन भगत व धर्मदास से संबंधित किया जाता है, प्रमाण के रूप में कुछ अवशेष भी विद्यमान हैं।
# अमरकंटक- कर्ण के मंदिर के नाम से ज्ञात मंदिर समूह, पातालेश्वर शिव मंदिर तथा नर्मदा उद्गम कुंड पर विभिन्न परवर्ती मंदिर, इनमें कलचुरि (संभवतः रत्नपुर के) राजा-रानी, दम्पति / अश्वारोही व गजारोही प्रतिमाएँ / पास ही जंगल में शिलोत्कीर्ण गणेश (त्रिकूट या कर्ण मंदिर से आगे 5 कि.मी.) की दो प्रतिमाएँ 8th cent A.D. स्थल सिद्ध विनायक या भृगुकमण्डल के नाम से जाना जाता है।
# जैसिंहनगर - पुराना नाम ‘गुमगौर‘। ग्राम के फूलमती व दुर्गा मंदिर में विष्णु, शिवलिंग, आमलक, नृसिंह, गजशार्दूल आदि प्रतिमाएँ
# अटरिया - जैसिंहनगर से मान‌पुर मार्ग में सोन के पूर्व दायाँ व्यपवर्तन कुल 25 किमी. सूर्य, विष्णु, हरिहर आदि प्रतिमाएँ
# बनचांचर - अटरिया के निकट घाटी डोंगरी नामक पहाड़ी पर स्थापत्य-प्रतिमा अवशेष सूर्य, विष्णु, दुर्गा, महिषमर्दिनी, उमा-महेश आदि
# मऊ - ब्यौहारी से 8 किमी./ भग्न मंदिरों के अवशेष, सूर्य, कार्तिकेय, विष्णु, गौरी, लक्ष्‌मीनारायण, योगिनी, एकमुख लिंग, गणेश, जैन प्रतिमाएँ.
# केल्हई- जैसिंहनगर से खन्नौधी से सन्ना होकर कुल 20 किमी. सोन-जोहिला संगम, दशरथ घाट पर कार्तिकिय.
# दियापीपर- शहडोल-जैसिंहनगर मार्ग पर 20 किमी. सोन पार कर दायां व्यपवर्तन विभिन्न मंदिरों के mounds, प्रतिमाएँ, स्थापत्य खंड.
# गोकरद - मसीराघाट, सोन पर नवनिर्मित सड़‌क पुल, मानपुर मार्ग पर विष्णु, सूर्य प्रतिमा.
# कोयलारी - अमरकंटक से राजेन्द्रग्राम आते दायाँ पुनः बायाँ व्यपवर्तन 32 किमी. पर- partially standing temple & remains.
# बुढ़ार के पास बम्हनी से प्राप्त मेकल पाण्डवंश का ताम्रपत्र
# ब्यौहारी तहसील से प्राप्त, रायपुर संग्रहालय में जमा कुषाण, गुप्त व मुगल, शताधिक सिक्के.
# बांधवगढ़? से प्राप्त माघ शासकों के सिक्के.
# पथरहटा - चंदिया से 10 किमी./ अवशेष, माहेश्वरी, नृसिंह, विष्णु, उमा-महेश, योगिनी, हनुमान, तीर्थकर चतुष्टिकाएँ, आदिनाथ, सूर्य, अम्बिका, मिथुन, नृत्य फलक, शिवलिंग, स्तंभ, सती प्रस्तर-अभिलेख आदि.
# कौड़िया-सलैया - बावली में द्वारशाख, सिरदल, आदित्य पट्ट, एकाधिक उमा-महेश, सूर्य, गणेश, जैन प्रतिमाएं / बावली के अतिरिक्त स्थल- गढ़ी व जात्रा, खेतों में भी remains.

(जिन विवरणों में dates नहीं है, वे सामान्यतः, क्षेत्र के अधिकांश remains और sites भी, late 9th early 10th cent. के हैं, और क्षेत्र में त्रिपुरी कलचुरि कला के श्रेष्ठ उदाहरण द्यिमान हैं।) 

चलते-चलते -
मौके पर पहुंच कर डाक बंगला यानि लोक निर्माण विभाग के रेस्ट हाउस में ठहरने के लिए कमरा मिले न मिले, जाते जरूर थे, क्योंकि वही मुख्यालय का शून्य मील का पत्थर होता था, दूरियों की सारी पैमाइश वहीं से शुरू होती थी और तब इसे नोट कर रखना जरूरी काम होता था। अपनी डायरी में दर्ज कर लिया था- शहडोल से दूरियां, किलोमीटर में - रीवां 161, इलाहाबाद 292, कटनी 132, उमरिया 70, सतना 211, बांधवगढ़ 107, अमरकंटक 108, डिंडौरी 193, जबलपुर 222, मण्डला 318, बिलासपुर 225, अंबिकापुर 247, अमलाई 30, चचाई 40।

Saturday, June 20, 2026

अनाम संगी साथियों के नाम

अबाल-युवाओं की संगत में पता चलता है कि ट्रेंड क्या चल रहा है, वे ‘खुद की, जग की‘ क्या सोच रहे हैं, अपडेट करने का अवसर मुझे अक्सर मिलता रहता है। मध्यम शहरों के उच्च-मध्यम और बड़े शहरों के मध्यम वर्ग के युवाओं के व्यक्तिगत जीवन में, जिसे वे अब आसानी से शेयर कर लेते हैं, फ्रेंड, ब्रेक-अप, लिव इन, एकल जीवन, शादी/बच्चे करें या न करें, जैसे सवाल अहम होते गए हैं। वे अपने सिस्टम पर बैठे ग्लोबल दुनिया के सदस्य है, जिन पर राजेन्द्र गौतम की पंक्तियां हैं-
"हमने शब्द लिखा था- ‘रिश्ते‘/ अर्थ हुआ बाज़ार 
‘कविता‘ के माने ख़बरें हैं/ ‘सम्वेदन‘ व्यापार
भटकन की उँगली थामे हम/ विश्वग्राम तक आए।" 
सोमवार से शुक्रवार की शाम तक ताबड़तोड़ काम, फिर वीक-एंड पर बस चिल, कहे तो वर्क-अल-कोहलिक डूड।

दूसरी तरफ मेरी नजर मुझसे बेहतर-युवा विकल्पों की ओर रहती है। मैंने पाया है कि आप अपनी जगह पर स्थापित रहें और सोचते रहें कि आगे क्या होगा?, आप सचमुच ऐसा सोच रहे हों तो अपनी जगह खाली कर दीजिए, देखिएगा कि उस खाली स्थान की पूर्ति के लिए जल्द ही एकाधिक विकल्प सामने आ जाएंगे, और इस बात की पूरी संभावना होगी कि समय के साथ वे आपसे बेहतर साबित होंगे। कहा-सुना और मान लिया जाता है कि युवा पीढ़ी एकदम डब्बा है, पढ़ती-लिखती नहीं। मुझे अधिकतर इससे विपरीत मिला। मैंने पाया कि युवाओं में बहुत अच्छी समझ के साथ पढ़ने वाले और शुरुआती दौर में ही स्तरीय लिखने वाले अनेक हैं। ऐसा लगता है कि सिर्फ अपना लिखा पढ़ाने को और अपनी बात सुनाने को व्यग्र हों तो आपके लिए पाठक-श्रोताओं का टोटा है मगर आप नई चीज सुनने और पढ़ने को तैयार, बल्कि उत्सुक हैं फिर देखिए, आप पाएंगे कि भविष्य की रचनात्मकता को ले कर आपकी सारी निराशा दूर हो जाएगी। ‘कल और आएंगे..., मुझसे बेहतर कहने वाले, तुमसे बेहतर सुनने वाले।‘ इस पर कुछ रुक कर ...

इन गरमी की छुट्टियों में या ‘टीनोन्मुखी‘, ‘टीन‘ और इसके मुहाने बाहर निकलने ‘टीनातुर‘ आयु, मुझ वानप्रस्थ आयु वाले के लिए, 'बाल'-मित्र मिले, बने। हॉबी क्लासेस, गायन-वादन, नृत्य, चित्रकारी, खेलकूद ... कला-कौशल निपुण। उनकी कुछ जिज्ञासा, कई प्रश्न मुखर होते, कुछ मौन। अब याद कर रहा हूं कि उनसे जो कुछ कहना रह गया, वह अब यहां-

... जो बात हो रही थी उसे इस तरह समझो- कलाएं दो तरह की होती है क्रिएटिव और परफार्मिंग। इसमें चित्रकारी आदि क्रिएटिव है और नृत्य, गायन, वादन परफार्मिंग। इन दोनों का फर्क स्पष्ट है क्रिएटिव अपनी साधना, जैसा है, जो लोगों के सामने पूरा हो जाने पर आता है और आपके बिना भी किसी के सामने रखा जा सकता है जबकि परफार्मिंग, उतने समय तक ही लोगों के सामने होता है, जब तक आप परफार्म करते रहते हैं। इस फर्क के साथ यह ध्यान रखना चाहिए कि आपका अभ्यास, रियाज, प्रैक्टिस मुख्यतः अपने लिए होता है, जबकि मंच या खेल के मैदान में प्रस्तुति, जो लोगों के सामने होती है वह मुख्यतः दूसरों के लिए होती है। इसलिए जरूरी होता है कि आप अपनी साधना, अभ्यास नियमित करते रहें, यह रोज कमाने, रोज खाने जैसा है, या कहें कि नियमित जीवन-चर्या रूटीन लाइफ स्टाइल में आ जाना चाहिए। और बीच-बीच में उपयुक्त अवसर मिलने पर प्रस्तुति भी देते रहें, प्रतियोगिता में भाग लेते रहें। 

आप समूह में बैठे हों, वहां अधिकतर आपसे बड़े लोग हैं और आपको लगता है कि जो बातें हो रही हैं, वे अनावश्यक निरर्थक हैं, छोटे होने के कारण आप बीच में बोल-टोक नहीं पाते और न चाहते हुए भी चुप रह कर सुनते रहते हैं, ऐसी स्थिति में बातों का सिलसिला आपके अनुसार हो (यह एक नेतृत्व-कौशल भी है) तो बातों के बीच, उससे जुड़ी अपनी जिज्ञासा, प्रश्न या विनम्र असहमति-आपत्ति रखें, इससे बड़ों को बुरा नहीं लगेगा, वे मानेंगे कि तुम्हें नहीं आता, तुम उनसे पूछ रहे हो, समझना चाहते हो और फिर उनकी बातचीत की दिशा उस ओर मुड़ जाती है, जैसा आप चाहते हैं। साथ ही यह भी याद करने की कोशिश करें कि जब बातचीत में मुख्य भूमिका आपकी होती है, बातचीत की कमान आपके हाथों होती है, तब हम किस तरह के विषयों पर क्या बात करते हैं। तब हमारी बातचीत का मुख्य विषय क्या होता है हम स्वयं, आसपास के लोग, (अपनी प्रशंसा, दूसरों की बुराई?) नई-पुरानी घटनाएं या कोई विचार। ध्यान रखें कि बातचीत, व्याख्यान-प्रवचन की तरह न हो। वाद-विवाद में आरोप-प्रत्यारोप भी हो, मगर स्वस्थ यानी, जिसमें व्यक्तिगत टिप्पणी न हो।

ध्यान देने की एक और बात है कि हमें किस काम में और कब उपकरणों, सहायक सामग्री, सहयोगी व्यक्ति की जरूरत होती है और कहां इसकी जरूरत नहीं होती। इसके लिए खेलों में ट्रेक एंड फील्ड है, जिसमें दूसरे प्रतिद्वंद्वी की भी जरूरत नहीं। इसी तरह गायन या नृत्य, जिसमें अभ्यास में किसी और सामग्री की जरूरत नहीं होती। इसीलिए इस संदर्भ में याद कर सकते हैं- न चौर्यहार्यं न राजहार्यं न भातृभाज्यं न च भारकारि। अपने शरीर और अपनी बुद्धि की कमाई और कौशल हमेशा सिर्फ आपके साथ रहता है, उस पर आपका पूरा अधिकार होता है, उसका उपयोग आप अपनी पसंद और आवश्यकता अनुसार कभी भी कर सकते हैं, इसलिए उसे श्रेष्ठ माना गया है।

ईश्वर या संयोग आप जिसे भी मानते हैं, जिसके चलते आपने खाते-पीते परिवार में जन्म लिया है, सभी अंग सामान्य हैं, फिर आपकी जिम्मेदारी है, आप पर निर्भर है कि आप क्या कर सकते हैं। सबसे पहले स्वयं अपने लिए, उसके बाद परिवार-मित्रों के लिए और फिर समाज के लिए क्या और कितना अच्छा कर सकते हैं, ध्यान रहे कि आपकी प्राथमिकता आप स्वयं हैं, यह स्वार्थी होना कतई नहीं, कहा गया है, ‘आप भला तो जग भला।‘ और यह भी कि ‘न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।‘ सबकी कामना के लिए सब प्रिय नहीं होते, अपने ही प्रयोजन के लिए सबसे प्रिय होते हैं।

अपनी परिस्थितियों के बावजूद भी जो हासिल कर ले, वही वास्तविक उपलब्धि है। सारी परिस्थितियां अनुकूल हों, तब तो कोई भी आगे बढ़ जाता है, जैसे ढाल पर बिना पैडल मारे सायकिल, मगर इसमें कोई आनंद, सुख नहीं। अपनी मेहनत और उद्यम से हासिल का ही असल आनंद होता है। दुनिया में जड़-चेतन, जो कुछ भी है, आपके भाव से अनुप्राणित ही साकार-सार्थक होता है- न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये। भावे तु विद्यते देवस्तस्माद् भावो हि कारणम्।। तात्पर्य कि देवता न काठ में रहते हैं, न पत्थर में, न मिट्टी में। वे तो भाव में रहते हैं। भाव ही किसी को देवता बनाने में कारण होता है।

टाल्सटाय ने कहा है- 'ल्योबुश्का, तुम पढ़ते बिल्कुल नहीं हो, यह बहुत बुरी बात है। यह इस बात का सबूत है कि तुम अहंकार के शिकार हो। तुम्हारे विपरीत गोर्की बहुत ज्यादा पढ़ता है, यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि इससे आद‌मी में आत्मविश्वास की कमी का पता चलता है। मैं लिखता बहुत ज्यादा हूं, यह भी अच्छी बात नहीं है, क्योंकि इससे लगता है कि एक बूढ़ा आद‌मी सभी को अपने विचारों से प्रभावित करना चाहता है।'

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वापस अबाल-युवाओं पर, जिनसे बातचीत में कुछ ऐसे भी होते हैं, जो जीवन का उद्देश्य, सृष्टि का रहस्य और स्वयं के अस्तित्व पर जिज्ञासु, चर्चा-उत्सुक होते हैं। ऐसे ही शाश्वत प्रश्न हैं, जिनका समाधान नहीं हो पाया है, मगर विचार-चिंतन सभी ने किया है तब यहीं से धर्म-अध्यात्म और दर्शन विकसित होता है। इन पर विचार करते-करते अधिकांश इससे भटक-भूल जाते हैं और कुछ विचारक-दार्शनिक हो जाते हैं, उनकी बातों ऐसा लगता है कि ‘चलो, कुछ तो मिला‘ या मन बहल जाता है कि इसे भी कुछ नहीं मिला, बस बात बनाई है। और कभी यह मान कर कि ‘मुझे भी कुछ-कुछ ऐसा ही लगता है‘, उसके अनुयायी से ले कर अंध-भक्त बनने वाले भी कम नहीं। यों कहा जाता है कि ‘दर्शन, अंधेरे कमरे में अंधे व्यक्ति द्वारा ऐसी काली बिल्ली को खोजने का प्रयास है, जो वहां नहीं है।

खलील जिब्रान ने मौज-सी लेते कहा है-
सभ्यता उस समय शुरु हुई, जब मनुष्य ने पहले पहल धरती को खोदा और उसमें बीज बोये,
धर्म उस समय शुरु हुआ, जब मनुष्य ने धरती में बोये हुए अपने बीजों पर सूर्य की दया दृष्टि देखी, 
कला उस समय शुरू हुई, जब मनुष्य ने सूरज के प्रति आभार प्रकट करते हुए स्तुति गान किया,
दर्शन शास्त्र उस समय शुरु हुआ, जब मनुष्य ने धरती की पैदावार खाई और बदहजमी की पीड़ा अनुभव की।

हजारी प्रसाद द्विवेदी, समस्त भारतीय धर्म-साधना के तीन पक्षों को रेखांकित करते हैं- उसके पीछे काम करनेवाली तत्त्व-मीमांसा (दर्शन), उसको सरस रूप में उपस्थित करनेवाला वाङ्मय (काव्य) और उसे जीवन के व्यवहार के क्षेत्र में ले आने के लिए तत्त्वानुयायी कर्मकाण्ड (क्रिया)। ये तीनों ज्ञान, इच्छा और क्रिया के प्रतिपादक होते हैं। धर्म-साधना में इन तीनों का अन्तर्भाव होता है।

फिर ऐसे साथियों को याद दिलाना होता है, उपनिषद-पुराणों में प्रश्न आए हैं, वे कुछ इस तरह हैं-
उत्पत्तिः यह संसार किससे उत्पन्न होता है?
लयः अंत में यह किसमें लीन हो जाता है?
आधारः यह संसार किसमें स्थित है (किसके सहारे टिका है)?
मायाः वह क्या है जो काले सर्प की भांति सभी प्राणियों को ग्रसता है?
जीव की गतिः आत्मा का अंतिम लक्ष्य क्या है?
कर्मः कर्मों का असली रहस्य क्या है?

वैसे ही अव्याकृत कहे जाने वाले प्रश्न, बुद्ध जिनका जवाब नहीं देते थे, मुस्कुरा देते थे, कुछ इसी तरह के हैं-
# जगत शाश्वत है या नहीं? या दोनों है? या दोनों नहीं?
# जगत नाशवान (सीमित) है या असीमित है? या दोनों है? या दोनों नहीं?
# आत्मा और शरीर एक ही हैं? या अलग-अलग?
# मृत्यु के बाद अस्तित्व रहता है या नहीं? या दोनों? या दोनों नहीं?
इसी का परवर्ती स्वरूप ज़ेन परंपरा का ‘मु‘ है, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘नहीं‘, ‘कुछ नहीं‘, बल्कि ‘शून्यता‘ आशय का है। जो वैचारिक सीमाओं और प्रश्नाकुलता से परे निर्द्वंद्व अवस्था है।

टाल्स्टाय कहते हैं- ‘अगर जिंदगी का कोई मकसद नहीं, अगर जिंदगी खुद ही अपने में मकसद, तब तो जीने का कोई मतलब नहीं। अगर यह बात सच है तब शॉपनहावर, हार्तमान और बौद्धों के विचार भी बिल्कुल सही हैं। लेकिन अगर जिंदगी का कोई मकसद है तो यह जाहिर है कि जब वह मकसद पूरा हो जाए तभी जिंदगी को खत्म हो जाना चाहिए।‘

लाओत्से कहते हैं- ‘जीवन निरुद्देश्य है और सही आदमी सिर्फ वह है, जो जीवन को उसकी निरुद्देश्यता में जीने की कला को जान ले, जिसने भी जिंदगी में उद्देश्य खोजा, वह जिंदा रहने के रस से तो गया ही, उद्देश्य पाने के फितूर से भी मारा जाता है।‘

सालिम अली ने अपनी आत्मकथा में महमूद उज़ ज़फ़र खान को उद्धृत किया है- ‘जीवन न केवल विषय-वासनामय है और न केवल वैराग्यमय, परंतु बहुवर्णी और क्षणभंगुर। इसका आनंद लेने के लिए योग्य शरीर चाहिए, समझने के लिए सामान्य बोध। धर्म तथा दर्शन, अतएव, न तो आवश्यक हैं और न व्यावहारिकः तथापि विरोधाभास ही है कि, वे जमे हुए हैं।‘

बादल सरकार ने ‘एवम् इन्द्रजित्‘ नाटक में लिखा है- तीर्थ नहीं है केवल यात्रा। लक्ष्य नहीं, है केवल पथ ही। इसी तीर्थ पथ पर है चलना। इष्ट यही, गन्तव्य यही है।

महेश अनघ के ग़ज़ल की पंक्ति है-
जिंदगी जैसे बने जीना जीना हकीकत है। और बाकी सब किताबों की नसीहत है।

सुरेन्द्र मोहन पाठक सरलता से कह देते हैं- ‘जिंदगी को एक सिग्रेट की तरह एंजाय करो वरना सुलग तो रही ही है, एक दिन वैसे ही खत्म हो जानी है।‘

जिसे इस तरह भी कहा जाता है कि जीवन को रीझ कर स्वीकार करें या खीझ कर, उसे स्वीकार करना ही होगा।

जीवन की सार्थकता का सवाल- शांत और स्थिर का संतोष, उस समरस का अपना आनंद होता है। वह सार्थक और निरर्थक के द्वंद्व से ऊपर हो जाता है।

Thursday, June 18, 2026

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता

कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर छत्तीसगढ़ के अंतर्गत स्थापित, माधवराव सप्रे राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोध पीठ द्वारा (2011? में) ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता‘, हमारे पुरोधा: खण्ड-2 का प्रकाशन किया गया था। पुस्तिका के संपादक परितोष चक्रवर्ती, अध्यक्ष, माधवराव सप्रे राष्ट्रवादी पत्रकारिता शोध पीठ हैं। इसके पहले खंड की जानकारी पुस्तिका के निम्नलिखित ‘प्रस्तावना‘ में है, जो यथावत यहां प्रस्तुत है। इसके पश्चात इस खंड की परिचयात्मक जानकारी दी जा रही है।

प्रस्तावना

छत्तीसगढ़ की पावन धरा आदिकाल से ही आध्यात्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण रही है। इस धरा पर जन्में और पुष्पित पल्लवित हुए सामाजिक, सांस्कृतिक आंदोलन पूरे भारत वर्ष के लिए प्रेरणा के स्रोत बने और इसी से मार्गदर्शन प्राप्त कर देश के अन्य भागों में सामाजिक उन्नयन और सांस्कृतिक समुच्चयन के कार्य हुए। आधुनिक भारत के नवजागरण में भी छत्तीसगढ़ की रचनात्मक ऊर्जा एवं अस्मिता की महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ की पहचान सदा से ही अनोखी और निराली रही। अनादिकाल से छत्तीसगढ़ रचनात्मक ऊर्जा से परिपूर्ण एक ऐसे भूभाग के रूप में आलोकित रहा जिसका प्रकाश यत्र-तत्र सर्वत्र फैलता रहा।

छत्तीसगढ़ की इसी रचनात्मक ऊर्जा और सामाजिक उन्नयन का परिचय यहां की पत्रकारिता में भी देखने को मिलता है, जिसका अस्तित्व इसके प्रारब्ध से ही निराला रहा। छत्तीसगढ़ के पहले समाचार पत्र के रूप में ख्यात और सर्वज्ञात ‘छत्तीसगढ़ मित्र‘ सन् 1900 में पेंड्रा रोड से पं. माधवराव सप्रे द्वारा अपने दो अन्य मित्रों पं. रामराव चिंचोलकर और पं. वामनराव लाखे के सहयोग से निकाला गया। इस पत्र का नाम छत्तीसगढ़ मित्र होना ही इस राज्य की रचनात्मक मेधा और अस्मिता का परिचायक है। उसके बाट कबीर पंथी (रायपुर, 1913), कान्यकुब्ज नायक (रायपुर, 1919), विकास (बिलासपुर, 1925), ‘उत्थान‘ और ‘आलोक‘ (1925), ‘सरगुजा संदेश‘, ‘कांग्रेस पत्रिका‘ और ‘सचेत‘ (1937), अग्रदूत (1942), महाकौशल (1935) पत्रकारिता की अनवरत् श्रृंखला को रेखांकित करते दीप स्तंभ है। 

समाचार पत्रों की इस यात्रा के दौरान इस धरा पर कलम के अनेक योद्धा पैदा हुए जिन्होंने अपनी धारदार लेखनी के जरिये समाज में नई चेतना और ऊर्जा का संचार किया। वे ऐसे महामना थे जिन्होंने अपने निजी स्वार्थ और निजी विकास को परे रखकर देशहित और समाज हित के प्रति अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया।

विश्वविद्यालय द्वारा विगत वर्ष पत्रकारिता के ऐसे पुरोधाओं का स्मरण करते हुए पहला मोनोग्राफ ‘हमारे पुरोधा‘ खण्ड-1 निकाला था, जिसमें पं. माधवराव सप्रे, पं. रविशंकर शुक्ल, बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल, पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, कुलदीप सहाय, यदुनंदन प्रसाद श्रीवास्तव, केशव प्रसाद वर्मा, गजानन माधव मुक्तिबोध, पं. स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी, चंदूलाल चंद्राकर, मायाराम सुरजन और हरि ठाकुर का समावेश था। ऐसे ही कुछ और पुरोधाओं पर केन्द्रित दूसरा खण्ड अब सादर समर्पित है। हमारा प्रयास है कि और अधिक जानकारी एकत्रित कर हम ऐसे ही पुरोधाओं पर कुछ और खण्ड प्रकाशित करें। हमने यथासंभव अधिक से अधिक जानकारी एकत्रित करने का प्रयास किया है, फिर भी किसी महत्वपूर्ण जानकारी अथवा ऐसे कुछ महानुभावों का उल्लेख अवश्य छूट गया होगा, जिसका समावेश होना चाहिये था। इसके लिए सभी पुरोधाओं का श्रद्धापूर्वक स्मरण कर उनके प्रति हम क्षमा याचना अर्पित करते हैं।

यह मोनोग्राफ हमारी विनम्र श्रद्धांजलि हैं, रचनात्मकता के उन वीरों के नाम जिनके आशीर्वाद से आज छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता नई ऊंचाईयों को छू रही है और नवगठित राज्य की विकासयात्रा में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।
सच्चिदानंद जोशी
कुलपति

हमारे पुरोधा: खण्ड-2 में 12 पुरोधाओं की संक्षिप्त जानकारी इस प्रकार है-
नाम - जन्म/मुख्य कर्मभूमि, जन्म-निधन तिथि

# बारीन्द्रनाथ बैनर्जी - /रायगढ़, 19.11.1916-20.09.2006 
# पं. रामाश्रय उपाध्याय ‘वक्रतुण्ड‘ - बिहार/रायपुर, 02.08.1917-05.02.2005
# पं. शिवनारायण द्विवेदी - उत्तरप्रदेश/रायपुर, 20.07.1920-20.01.1999
# मधुकर खेर - रायपुर, 21.02.1928-31.03.1996
# केशवलाल मेहता - /कोरबा, 01.02.1929-05.02.2009
# कुमार साहू - मध्यप्रदेश/रायपुर, 22.10.2029-22.05.2008
# श्रीकांत वर्मा - बिलासपुर/दिल्ली, 18.12.1931-1986(25 मई)
# डी.पी. चौबे - बिलासपुर, 05.02.1935-19.06.1988 
# रम्मू श्रीवास्तव - लोहारा, कवर्धा/रायपुर, 19.12.1936-09.02.2006
# किरीट दोशी - /जगदलपुर, 29.11.1939-17.11.2009
# बसंत अवस्थी - रायपुर, 05.08.1940-11.07.2008
# सत्येन्द्र गुमास्ता - महासमुंद/रायपुर, 05.12.1940-13.06.1997

टीप -
0 पुस्तिका में प्रकाशन वर्ष अंकित नहीं है, यहां कोष्ठक में दर्शाया गया वर्ष 2011, अंतिम पृष्ठ पर छपे छत्तीसगढ़ संवाद के विज्ञापन February 2011 के आधार पर है।
0 पुस्तिका संपादक परितोष चक्रवर्ती स्वयं बिलासपुर से करीब से जुड़े रहे, मगर पुस्तिका में श्रीकांत वर्मा के निधन का वर्ष दिया गया है, तारीख नहीं। यहां कोष्ठक में दी गई तारीख अन्य स्रोत से ली गई है।
0 स्वयं पत्रकार रहे, परितोष जी की पहचान वामपंथी रुझान के साहित्यकार की रही। स्वाभिमानी परितोष कुछ समय भिलाई इस्पात संयंत्र में जनसंपर्क अधिकारी रहे, बाद में लंबे समय तक बिलासपुर एसइसीएल में जनसंपर्क विभाग प्रमुख का दायित्व निर्वाह किया। इस विश्वविद्यालय में उस दौर में इनकी नियुक्ति, विचारधारा के स्तर पर मेल नहीं खाती थी, चर्चा का विषय थी।
0 इस श्रृंखला का खण्ड-1 उपलब्ध नहीं हुआ है। प्राप्त होने पर वहां शामिल पत्रकार पुरोधाओं की इसी प्रकार संक्षिप्त जानकारी जोड़ी जाएगी।