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Friday, October 24, 2025

भो-रम-देव

‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो‘ कहे जाने वाले भोरमदेव में शब्दों के साथ भटक रहा हूं। यह भटकना, रास्ता भूलना नहीं, रास्ते की तलाश भी नहीं, बल्कि मनमौजी विचरण है। भोरमदेव, शब्द पर बहुत सी बातें कही-लिखी गई हैं, भोरमदेव, बरमदेव है, ब्रह्म, बूढ़ादेव, बड़ादेव, इतने मत-मतांतर कि भरम होने लगे। अलेक्जेंडर कनिंघम 1881-82 में गजेटियर के हवाले से कहते हैं- The Great Temple of Boram Deo or Buram Deo। छत्तीसगढ़ में भिर्रा या भिरहा (Chloroxylon swietenia) कहे जाने वाले पेड़ को पड़ोसी पश्चिमी ओडिशा में ‘भोरम‘ कहा जाता है, इससे कोई रिश्ता बने न बने, शाब्दिक ही सही, मेल बनता है। भोरम के करीब का छत्तीसगढ़ी शब्द है, भोरहा यानी भ्रम, संदेह या भूल। शायद इसी भूल-भटक में राह सूझे, इसलिए फिलहाल इसे यहीं छोड़कर, उसके आसपास, अगल-बगल। कुछ नादान तोड़-फोड़ करनी हो तो ‘भो!रम देव‘, ‘भोर-म-देव‘, हे देव, भोर होते ही तुझमें मेरा मन रमा रहे।
भोरमदेव मंदिर
भोरमदेव, स्मारक का नाम है न कि गांव का। इस स्मारक के साथ मड़वा महल और छेरकी महल भी हैं, गांव हैं- छपरी और चौंरा। इनमें छपरी का छापर, छावनी या छप्पर नहीं, बल्कि सलोनी मिट्टी से से आया होगा। चौंरा का संदर्भ फणिनागवंशी शासक रामचंद्र के मड़वा महल शिलालेख, विक्रम संवत 1406 में है, जहां चतुरापुर या चवरापुर का उल्लेख है। ‘चंवरा‘ शब्द यज्ञ वेदी के लिए तैयार की गई चौकोर समतल भूमि, ‘चत्वरक‘ तद्भव रूप चउंक-चांतर से आता है। सती चौरा या माता चौंरा जेसे शब्दों में इस शब्द का आशय छोटा मंदिर या देवस्थान, निहित है। चौरा का ताल्लुक अब कबीरपंथी मान्यताओं से भी जुड़ गया है। एक गांव लाटा है, जिसे लाटा-बूटा या लता-नार से संबंधित माना जाना है, मगर यह भी ध्यान रहे कि लाटा, गुफा, सुरंगनुमा, संकरे-बंद घिरे स्थान का- जहां लेट कर, सरक कर, रेंग कर जाना पड़े, का भी पर्यायवाची होता है। भोरम और हरम शब्द आसपास हैं, पास ही गांव है ‘हरमो‘, ईंटों वाली महलनुमा संरचना ‘सतखंडा हवेली‘ के कारण यह गांव चर्चित है। इसे कुछ ‘हरम‘ से जोड़ कर देखते हैं तो दूसरी ओर एक आस्था ‘महाप्रभु वल्लभाचार्य‘ से जुड़ी है, जिससे संबद्ध कर हरमो को ‘हरि-नू‘, गुजराती ‘हरि का‘ भी मानने वाले हैं। इतिहास में काल-निर्धारण की दृष्टि से यह क्षेत्र फणिनाग, कलचुरि वंशजों, मंडला के गोंड़ तथा मराठों से जुड़ता है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में योद्धा स्मारक और सती स्मारक प्रतिमाएं शक्ति संतुलन के लिए होने वाले युद्धों का प्रमाण हैं।
सतखंडा हवेली, हरमो 

यह कछारी जमीन वाला इलाका है। जंगल-पहाड़ नदी-नाले और बांध-तालाब से बची रेतीली जगह- कछार, जिस पर छोटी और कंटीली झाड़ियों वाली वनस्पति, कछार में टिकने के लिए जड़ें मजबूत होनी चाहिए। कछार, धान के लिए उपयुक्त नहीं, लेकिन धान से ही तो काम नहीं चलता। जलधाराओं के नजदीक और पानी उतर जाने पर पाल कछार और उससे दूर पटपर कछार। यहां एक और कछार है- सरकी कछार, इस नाम की कई शास्त्रीय व्याख्या होती है, यह भी माना जाता है कि छेरकी ही सरकी बन गया, संभव है, क्योंकि स-द, छ-स होता रहता है, ज्यों रायपुर के पास का गांव छेरीखेड़ी-सेरीखेड़ी। सरकी का जोड़ सरकना है यानी रेंगना या खिसकना, छत्तीसगढ़ी का सलगना- पेट के बल सरक-सरक कर चलना, सरीसृप की तरह। मगर यह भी संभव जान पड़ता है कि यह सरकी-चटाई या टाट (ज्यों टाट-पैबंद या टाटीबंद) यानि समतल-पटपर का समानार्थी है मगर ‘दादर‘ से कुछ अलग।

संकरी नदी पर दुरदुरी आता है, जो तुरतुरिया, खरखरा, सुरसुरी की तरह पानी के बहाव से होने वाली ध्वनि से बना शब्द है। मगर यह सोचने का रास्ता दिखाता है कि जलधारा का बहाव कैसा है, स्थान पथरीला, रेतीला, चौड़ा-संकरा, छोटा-लंबा, कम-अधिक ऊँचाई वाला, धाराओं में बंटा हुआ या अन्य कुछ। जिस तरह का नाम है, यानि नामानुरूप ही ध्वनि सबको सुनाई देती है या इस पर सुनने वाले और आंचलिक भाषा का भी प्रभाव होता है। जलधाराओं की बात हो तो गंगा का स्मरण होता ही है और गंगा के लिए कहा जाता है- ‘गं गं गच्छति गंगा‘।

बजरहा यादव जी ठेठवार मिले, मैं पूछता हूं- देसहा, कनौजिया, कोसरिया, झेरिया, बरगाह, महतो? मुस्कुरा कर छोटा सा ‘पॉज‘ देते मेरे इस ‘ज्ञान‘ को ध्वस्त करते हुए गर्व से बताते हैं-दुधकौंरा। दुधकौंरा सुनकर पहले तो रायपुर का मठ, दूधाधारी-दुग्धआहारी याद आया फिर ठेठवारों के ‘कौंराई‘ का। मैं भी हार मानने को तैयार नहीं, कभी पाली-कटघोरा की ओर किसी कौंराई ठेठवार से मिला था, कौंराई से तुक जमाने की कोशिश करता हूं, वे टस से मस नहीं होते। मड़वा महल में बैठे हैं, आसपास छेरी चराते हैं। अब इन दोनों महलों मड़वा और छेरकी की ओर ध्यान जाता है। महल, पत्थरों वाली पक्की इमारत के कारण नाम पड़ा होगा और मड़वा, इस मंदिर के साथ जुड़ी रोचक बात कि मंदिर के सामने का स्तंभयुक्त मंडप, शादी के मड़वा जैसा है साथ ही इस स्मारक का एक नाम ‘दूल्हादेव’ मंदिर प्रचलित रहा है। इस मंदिर की बाहिरी दीवार पर जंघा में विभिन्न मिथुन मूर्तियां हैं, कुछ अजूबी भी। गर्भगृह के सामने से बाईं ओर परिक्रमा शुरू करें तो, काम-कला वाली मिथुन प्रतिमाओं का ‘अजीबपन‘ बढ़ता जाता है और आखिरी पहुंचते तक शिशु को जन्म देती नारी प्रतिमा है। मिथुन प्रतिमाओं के कारण ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो‘ के नाम से इसकी ख्याति रही, खजुराहो काम-कला वाली मिथुन मूर्तियों का पर्याय बन गया। मंडपयुक्त संरचना, मड़वा वाले इस महल की मूर्तिकला से यह मान लिया गया है कि इस मंदिर की दीवार पर विवाह उपरांत गृहस्थ जीवन के काम पुरुषार्थ के लिए ‘कामसूत्र‘ का शिल्पांकन किया गया है, जो नर-नारी समागम-संसर्ग से संतानोत्पत्ति करते वंशवृद्धि के ज्ञान देने वाली मूर्तियों में जीवंत प्रशिक्षण वाली पाठशाला जैसा है। कहा जाता है, यहां भाई-बहन का साथ जाने का निषेध है, मगर ऐसा अब तक नहीं सुना कि विवाह के बाद इस मंदिर के दर्शन और परिक्रमा करने का नियम है।
पश्चिमाभिमुख मडवा महल मंदिर
दक्षिणी जंघा पर प्रतिमाएं

कछार और छेरकी या छेरी यानि बकरी-बकरे को जोड़ कर सोचने का प्रयास करता हूं। छेरकी महल के लिए कहा जाता है कि छेरी चराते हुए, बरसात हो जाने पर बकरी चराने वाले चरवार इस मंदिर में शरण लिया करते थे, संभव है मगर लगता है कि इस कछारी इलाके में गोपालक भी बड़ी तादाद में बकरा-बकरी पालन करते हैं इसलिए छेरी-चरवार हैं। फिर बात आती है कि क्या कछार और छेरी का रिश्ता शब्द ‘छ-र‘ से आगे भी कुछ है। गोवंश और अजवंश के एक खास अंतर की ओर ध्यान जाता है। अजवंश की उपरी और निचली, दोनों दंतपंक्तियां होती हैं, जबकि गोवंश की उपरी दंतपंक्ति नहीं होती, इसलिए दोनों की चराई में अंतर होता है। संभव है कि सामान्य मैदानी घास-पात गोवंश के चरने भरण-पोषण के लिए अधिक उपयुक्त होता हो और कछारी भूमि की वनस्पति अजवंश, बकरे, घोड़े और हिरण परिवार के जीवों के लिए। इस क्षेत्र में देसी बकरे ही पाले जाते हैं जो बौनी-नीची झाड़ियों और घास वाली चराई क्षेत्र में graze करते हैं लंबे और लटके कान वाले जमनापारी बकरे, जो graze के बजाय browse करते हैं, ऐसे चराई क्षेत्र के लिए अनुकूल साबित नहीं होते। ‘हरिन छपरा‘ गांव भी दूर नहीं है। उल्लेखनीय कि यहां नाम छेरी-छेरकी है, इसी तरह सरगुजा में प्राचीन मंदिर ‘छेरकी नहीं छेरका‘ हैं। खैर! अपनी विशेषज्ञता का क्षेत्र न हो तो उस पर बहुत बातें करना अपनी जांघ उघाड़ने जैसा है, फिर भी इतना तो मुंह मारा ही जा सकता है।
छेरकी महल मंदिर


यहां एक परत और है, छेरकी महल के आसपास लीलाबाई यादव जी मिल जाया करती थीं और पूछने पर धाराप्रवाह कहानी सुनाती थीं- ‘देवांसू राजा बिना महल के राखय छेरिया, त छेरकिन कहिस, अतका तोर छेरी-बेड़ी ला चराएं देव, फेर एको ठन महल नई बनाये। अभी हमर देवता-देवता के पहर हावय कोई समय मनखे के पहर आहि, त देखे-घुमे ल आही अइसे कहि के। त कस छेरकिन, महूं त एके झन हावंव, कइसे महल बनावंव कथे। चल त एकक कनि तोर छेरिया चराहूं, एकक कनि महल बनान लगहूं। त छेरी चरात-चरात छेरकिन अउ देहंसू राजा बनाय हे एला। बन लिस त भीतरी म दे छेरिया ओल्हियाय हे। त आघू छेरी के लेड़ी रहय इंहा, भीतरी म। ए मडवा महल, भोरमदेव कस भुईयां म गड्ढा रहिसे। त फर्रस जठ गे, माटी पर गे, छेरी लेड़ी मूंदा गे। अब पर्री परया अचानक भकरीन-भकरीन आथे, बकरा ओइले सहिं, तेखर सेती छेरकी महल आय एहर। अउ, भोरम राजा हर न भरमे-भरम में बने हे।‘

मैदानी छत्तीसगढ़ के गांवों में गुड़ बनाने के लिए सामुदायिक गन्ने की पैदावार, सामुदायिक रूप से बरछा में ली जाती थी। बरछा, तालाब के नीचे की भूमि होती थी। अब भोरमदेव, कवर्धा क्षेत्र की एक पहचान शक्कर कारखाना और गन्ना उपजाने वाले इलाके की भी है। यहां संकरी नदी है। छत्तीसगढ़ में सांकर, संकरी जैसी संज्ञाधारी कई-एक हैं, जिनमें ओड़ार संकरी, संकरी-भंइसा, संकरी-कोल्हिया जैसे ग्राम नाम और संकरी नदी को इन सब के साथ जोड़ कर देखना होगा। संकरी, वर्णसंकर है? सांकर यानी संकल-जंजीर है? संकरा यानी कम चौड़ा है? छत्तीसगढ़ी में कहा जाता है- ‘अलकर सांकर‘। संकरी नदी के करीब का एक नाम चैतुरगढ़-कटघोरा-कोरबा वाली शंकरखोला की जटाशंकरी-अहिरन। इस तरह संकरी, शिव-शंकर के पास भी है। और क्या इसका शर्करा-शक्कर से जुड़ा होना संभव है। पुराने अभिलेखों में शर्करापद्रक, शर्करापाटक, शर्करामार्गीय, गुड़शर्कराग्राम जैसे स्थान-क्षेत्र नाम आते हैं, ये नाम क्या शक्कर से संबंधित हैं या नदी के रेत-कण को महिमामंडित किया गया है- बुझौवल तो है ही, ‘बालू जैसी किरकिरी, उजल जैसी धूप, ऐसी मीठी कुछ नहीं, जैसी मीठी चुप।‘

जेन अभ्यास होता है, जिसमें सारे विचार ‘मू‘ के अव्यक्त में पहुंचकर मौन हो जाते हैं, ‘चुप‘।

Saturday, May 27, 2023

मड़वा महल सतीलेख

मड़वा महल, कवर्धा फणिनाग वंश के शासकों के काल में निर्मित स्मारक हैं। भोरमदेव मंदिर, मड़वा महल तथा छेरकी महल, फणिनाग वंश के शासकों के काल के सर्वाधिक प्रसिद्ध स्मारक हैं। भोरमदेव के आसपास से अनेक प्रतिमायें, स्थापत्य खंड तथा सतीलेख भी मिले हैं। मड़वा महल का निर्माण नाग नरेश रामचन्द्र के शासनकाल में विक्रम संवत् 1406 (ईसवी 1349) में करवाया गया है। मड़वा महल से प्राप्त एक अभिलेख में इस वंश के राजाओं के वंशावली के साथ इस मंदिर के निर्माण का उल्लेख भी प्राप्त होता है। मड़वा महल के स्थापत्य अलंकरण में वाममार्गी शैवाचार्यों के तांत्रिक साधना और उपासना परंपरा की झलक दिखाई देती है। इस मंदिर के बाह्य भित्तियों में विविध मैथुन दृश्यों का अंकन हैं। गर्भगृह में शिवलिंग प्रस्थापित है। मड़वा महल के जीर्ण-शीर्ण मंडप को अनुरक्षण कार्य से यथावत स्वरूप प्रदान किया गया है। इस मंदिर के सुरक्षा के लिए दीवार निर्माण करने के लिए फरवरी 2003 में नींव खोदते समय पश्चिम दिशा में एक खंडित शिलालेख प्राप्त हुआ है। 


यह सतीलेख है तथा लगभग 3 फीट लंबा एवं 1 फीट चौड़ा है। भूरे बलुआ रंग के इस प्रस्तर लेख में कुल 7 पंक्तियां हैं। लेख का बांया बाजू टूटा हुआ है, जिससे पंक्तियां अपूर्ण हैं। साथ ही साथ इसका ऊपरी भाग भी खंडित है। इस सती लेख की जानकारी श्री जी.एल. रायकवार, पुरातत्ववेत्ता, रायपुर को प्रथमतः ज्ञात हुई थी तथा उन्होंने इसका प्रारंभिक वाचन किया है। इस लेख में संवत 1407 का अंकन है, तदनुसार यह ईसवी सन् 1349-50 है। अभिलेख में मास तथा पक्ष का उल्लेख नहीं हैं, परन्तु 11वीं तिथि और दिवस सोम (वार) उल्लेखित है। 

इस सती लेख में फणिवंश के राजा सरदा, मही (धर अथवा देव) एवं महाराज सतीम का नामोल्लेख मिलता है। लेख की अंतिम दो पंक्तियों में पितृकुल तथा पति के कुल के उद्धार के लिए राउत घाघम की पुत्री के सहगमन (सती होने) का उल्लेख है। फणिवंश के अज्ञात राजाओं के नाम तथा राउत जाति की नारी की सती होने की जानकारी के कारण यह सतीलेख विशेष महत्वपूर्ण है। तत्कालीन फणिनाग राजाओं की वंशावली तथा सामाजिक जातिगत प्रथा पर यह सतीलेख नवीन प्रकाश केन्द्रित करता है। 

यह लेख देवनागरी लिपि में है तथा भाषा अशुद्ध संस्कृत है। इस लेख का छायाचित्र मुझे श्री जी.एल. रायकवार, पुरातत्ववेत्ता, रायपुर के द्वारा उपलब्ध कराये गए हैं, जिसके आधार पर मेरे द्वारा लेख का वाचन किया गया है। 

मूल पाठ 

1. संवत 1407 वषे (वर्षे) घोरे ... ... ... 
2. 11 सोमे सौ त (-) डग्रे ... ... 
3. फणिवंस (श) राजो सरदा ... ... 
4. ते गार्य (-) राजेन महि (धर) ... 
5. पुत्रः श्री महराज सतीम ... 
6. ग ग एनं राउत घाघम पुत्र (त्री) 
7. दुई कुल उधरे (उद्धारे) सहगमन 

(इस शिलालेख का पाठ ‘उत्कीर्ण लेख‘, परिवर्धित संस्करण-2005 तथा इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से प्रकाशित ‘कला-वैभव‘, अंक-12, 2002-03 में प्रकाशित है।)

Friday, May 26, 2023

भोरमदेव – 2006

छत्तीसगढ़ के मूर्धन्य पुराविद डॉ. विष्णुसिंह ठाकुर, सन 2006 में भोरमदेव पर पुस्तिका की तैयारी कर रहे थे, इसके पूर्ण होने या प्रकाशन की जानकारी मुझे नहीं है, मगर इस क्रम में उनके द्वारा तैयार नोट का यह हिस्सा मेरे पास सुरक्षित रहा, यथावत प्रस्तुत- 


भोरमदेव महोत्सव 2006 के अवसर पर प्रकाशित विवरणिका में फणिनागवंश की उत्पत्ति पर आधारित ऐतिहासिक आख्यायिका का सांकेतिक उल्लेख प्रथम बार लिखित रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। समकालीन राजनीतिक इतिहास में फणिनाग वंष के स्थान एवं महत्व को रेखांकित करने वाले कुछ-एक सन्दर्भों का भी निर्देष विवरणिका में लेखक द्वारा प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया गया है। फणिनाग वंश के विभिन्न नरेशों के राजत्वकाल में राजधानी चउरापुर में किये गये निर्माण कार्यों का भी मात्र एक शिलालेख के आधार पर संक्षिप्त में उल्लेख है। पाठकों में सब कुछ सही-सही जानने की तीव्र उत्कण्ठा जगा रही है यह विवरणिका। सम्भवतः लेखक का यही उद्देश्य हो। राजनीतिक इतिहास के ही समान फणिनागवंशीय शासन काल के मध्य ‘‘स्थापत्य एवं शिल्प कला’’ का भी सर्वांगपूर्ण प्रकाशन अपेक्षित है। राज्य तथा देश के इतिहासकार एवं कला अध्येता इन अपेक्षाओं को पूर्ण करने के लिए सामने आयेंगे इस आशा के साथ-प्रस्तुत है यह विवरणिका ... 

भोरमदेव 

छत्तीसगढ़ के कबीरधाम (कवर्धा) जिले के मुख्यालय से उत्तर-पश्चिम दिशा में 17.6 कि.मी. की दूरी पर राजस्व ग्राम चौरा स्थित है। यह सम्पूर्ण ग्राम पुरातत्वीय महत्व के टीलों, तीन प्राचीन मन्दिरों, सतखण्डा महल नामक स्मारक के समाप्तप्राय भग्नावषेशों तथा प्राचीन दुर्ग के नष्टप्राय प्राचीन स्थापत्य अवशेष को अपने क्रोड़ में समेट गौरवशाली प्राचीन इतिहास का मूकसाक्षी बना आज भी अपनी भौतिक सत्ता बनाये हुए है। यहाँ के ऐतिहासिक वास्तुरूपों में निम्न मन्दिर विशेष उल्लेखनीय महत्व के हैं – 

(अ) मड़वा महल मन्दिर- इसका निर्माण फणिनागवंशी महाराज रामचन्द्र के शासन काल में चौदहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ था। यह मन्दिर मड़वा महल अभिलेख के अनुसार राम के उपास्य पशुपति रामेश्वर शिव को समर्पित था। 

(आ) छेरकी महल मन्दिर - फणिनागवंशी नरेश महाराज रामचन्द्र के द्वारा एक विष्णु मन्दिर के निर्माण किये जाने का उल्लेख मड़वामहल अभिलेख में हुआ है। छेरकी महल मन्दिर के प्रवेश द्वार के सिरदल पर तीन छद्म देवपीठ मूर्तांकित है। इनके मध्य में बायीं से दायीं दिशा की ओर क्रमशः अर्धपर्यंकासन में बैठे गणेश, मध्य में पद्मासन मुद्रा में बैठी दोनों हाथों पद्मपुष्प धारण की हुई श्री लक्ष्मी तथा दक्षिण में अर्धपर्यंकासन में वीणावादन करती सरस्वती का मूर्तांकान है। प्रवेश द्वार के मध्यवर्ती ललाट बिम्ब पर लक्ष्मी के मूर्ताकंन से इस मन्दिर को मूलतः विष्णु को समर्पित मन्दिर स्वीकार करना साक्ष्यसिद्ध कहा जा सकता है। 

(इ) भोरमदेव मन्दिर - चौरा में उपलब्ध ऐतिहासिक महत्व के मन्दिरों में स्थापत्य एवं शिल्प निदेशित शैलीगत वैशिष्ट्य की दृष्टि से भोरमदेव मन्दिर को चौरा के मुकुट का मूल्यवान मणि सम्बोधित किया जा सकता है। 

इस मन्दिर के महामण्डप के अन्तराल से संलग्न अर्धमण्डप के दाहिने ओर गर्भगृह की बाहरी भित्ति से सटाकर एक सम्मुखाभिमुख मूर्ति रखी हुई है। इस मूर्ति में राजपुरुष और राजमहिषी का करबद्ध मुद्रा में मूर्तांकन है। इस मूर्ति के पादपीठ पर ‘‘संवत् 840, राणक श्री गोपाल देव राज्ये’’ उत्कीर्ण है। संवत् 840 को समकालीन कोसल में प्रचलित कलचुरि संवत् की तिथि माना गया है। अर्थात् इस मन्दिर का निर्माण फणिनागवंशी महाराज श्री गोपाल देव, जो रत्नपुर के कलचुरि नरेश के अधीनस्थ सामन्त थे, द्वारा कलचुरि संवत् 840 अर्थात् ई.स. 840$248=1088-89 में किया गया। सामान्यतः इस मन्दिर को छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जाता है। इस प्रकार की तुलना का प्रमुखतम कारण मन्दिर के बाह्य अंगो में बैठायी गई अथवा उकेरी गयी मूर्तियों में मैथुन मूर्तियों की उपस्थिति है। उल्लेखनीय है कि जो भी मन्दिर तांत्रिक उपासना से सम्बद्ध थे उनकी बाह्य भित्ति पर मैथुन मूर्तियाँ पाई जाती हैं। मात्र मैथुन मूर्तियों के कारण इसे खजुराहो कहना इसकी शिल्पगत वैशिष्ट्य पर पर्दा डालने जैसा है। इस मन्दिर के स्थापत्य शैली पर कोसलीय शैली के अतिरिक्त किसी बाहरी शैली का प्रभाव है तो वह है परमार मन्दिर स्थापत्य शैली। 

भोरमदेव मन्दिर से लगभग 3 मी. दूरी पर ईंटों का एक भग्न मन्दिर विद्यमान है। इस मन्दिर में विमान तथा छोट सा मुख मण्डप दो अंग है। विमान का अधिष्ठान ताराकृति वाला है। यह मन्दिर 8-9 वीं शताब्दी ई. सन की निर्मिति है। भोरमदेव मन्दिर परिसर के बाहर उत्तर दिशा में लगभग 10 मी. की दूरी पर एक विशाल तालाब विद्यमान है। मड़वामहल अभिलेख में इसे ‘‘महास्तडागः’’ कहा गया है। चौरा गाँव के पुरा स्थल के दक्षिण दिशा में संकरी नामक नदी है। मड़वा महल अभिलेख में इसे ‘‘हरिशंकरी’’ कहा गया है। इस हरिशंकरी के दक्षिण तट में स्वयम्भू हटकेश्वर शिव प्रकट हुए है। हटकेश्वर शिव फणिनागवंश के आराध्य कुल देवता थे। 

चौरा का भोरमदेव मन्दिर छत्तीसगढ़ अंचल में अपने ढंग की वास्तु योजना का एकाकी उदाहरण है। इस मन्दिर की वास्तु योजना का अनुकरण करते हुए 13 वीं 14 वीं शताब्दी में देव बलौदा के शिव मन्दिर का निर्माण फणिनागवंशी शासकों द्वारा कराया गया है। कालगत अन्तर का स्पष्ट प्रभाव वास्तु अंगों के प्रस्तुतीकरण में दिखाई पड़ता है। तांत्रिक शैवोपासना का केन्द्र होते हुए भी भोरमदेव मन्दिर की देव प्रतिमाओं में सर्व समन्वयात्मक धार्मिक प्रवृत्ति की जीवन्तता देखने में आती है। यहाँ के शिल्पों का गहन अध्ययन तत्कालीन सांस्कृतिक दशा के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण सिद्ध होता है। 

द्वादश महोत्सव

भोरमदेव महोत्सव का यह बारहवाँ वर्ष था। दिनांक 27 मार्च 2006 से दिनांक 28 मार्च 2006 को इस वर्ष दो दिवसीय महोत्सव आयोजित किया गया। छत्तीसगढ़ के महामहिम राज्यपाल माननीय के.एम. सेठ के कर कमलों द्वारा महोत्सव का विधिवत उदाघाटन किय गया। अपने उद्बोधन में महामहिम राज्यपाल ने ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा पुरातत्वीय महत्व के धरोहरों का संरक्षण और उससे सम्बद्ध परम्परागत विष्वासों तथा जन आस्था के पक्षों को अनुरक्षित करते हुए उसके लोकसम्मत संवर्धन की दिशा में राज्य शासन के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी स्थान से जुड़ी परम्परागत आस्था-विश्वास को संरक्षित रखते हुए उसके सम्वर्धन की दिशा को गति प्रदान करने के लिए अध्येताओं, जिज्ञासुओं, शोधार्थियों, सुरूचि सम्पन्न पर्यटकों को इसकी ओर आकर्षित करना आवश्यक होता है। इस प्रक्रिया से स्थान विशेष के इतिहास एवं संस्कृति के बहुआयामी स्वरूप का उद्घाटन कर पाना सम्भव हो जाता है। 

उद्घाटन के पश्चात् देर रात तक सांस्कृतिक कार्यक्रम होता रहा। 

दूसरे दिन 28 मार्च को समापन समारोह के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ शासन के मुख्यमंत्री माननीय रमन सिंह के मुख्य आतिथ्य में आरम्भ हुआ। माननीय मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह ने लोगों को बताया की भोरमदेव को पर्यटन केन्द्र के रूप में विकासित करने हेतु एक योजना राज्य शासन ने केन्द्र शासन को भेजा है। इस प्रस्तावित योजना पर 12 करोड़ रू. की लागत व्यय अनुमानित है। आगामी दो वर्षों में इसका परिणाम यहाँ दिखाई पड़ने लगेगा। इस अवसर पर माननीय महेन्द्र कर्मा एवं माननीय प्रेमप्रकाश पाण्डेय ने भी अपने विचार रखे। अन्त में संस्कृति, पुरातत्व एवं पर्यटन मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने आगामी वर्ष से महोत्सव को अधिक व्यापक बनाये जाने की बात कही। उपरान्त अतिथियों एवं उपस्थित लोगों ने अनुराधा पोडवाल के भजनों तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनन्द उठाया। 

लेखकीय 

भोरमदेव नाम स्मरण के साथ ही कबीरधाम जिला मुख्यालय कवर्धा से उत्तर-पश्चिम दिशा की ओर लगभग 17.6 कि.मी. की दूरी पर हरिशंकरी (संकरी) नदी के उभय तटों पर फैले जनशून्य ग्राम चौरा की विस्तार सीमा अन्तर्गत पद्मसरोवर नामक महातडाग के दक्षिण में 30 मी. की दूरी पर स्थित ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरभारतीय नागर प्राकर की मन्दिर स्थापत्य शैली में प्रस्तर निर्मित जिस मन्दिर विशेष की ओर ध्यान केन्द्रित होता है, उसके निर्माण का श्रेय प्राचीन चउरापुर वर्तमान चौराग्राम को राजधानी बनाकर अपनी स्वतन्त्र राजनीतिक पहिचान स्थापित करने वाले फणिनागवंशीय नरेशों के उत्तराधिकार क्रम में छठे क्रम पर राज्य करने वाले राजा श्री गोपालदेव को रहा है। वास्तु रूप की सर्वांगपूर्णता, विशालता, भव्यता, अलंकरणात्मक अभिकल्पों की अभिव्यंजना में गतिमयता, अभिरामता, चारूता, लयात्मकता तथा प्रतीकात्मक भावबोध, षिल्पों में निदेशित विषयगत विविधता, विराटता, समग्रता, भावाभिव्यंजना की प्रौढ़ता, सहजता, क्रमबद्धता के साथ-साथ अपरिमित सम्प्रेषणशीलता को अपने अंग-अंग में भास्वर करते इस मन्दिर का छत्तीसगढ़ के ‘प्राचीन मन्दिर स्थापत्य एवं शिल्प’ के इतिहास में अपना विषिष्ट स्थान एवं महत्व है। 

प्राचीन चउरापुर वर्तमान चौरा का राजनीतिक इतिहास के साथ-साथ समसामयिक सांस्कृतिक इतिहास के समस्त पक्षों पर महत्वपूर्ण साक्ष्यों को संरक्षित रखने वाले स्थान के रूप में अनुपेक्षणीय महत्व है। प्रस्तुत लघु विवरणिका के आरम्भ में चउरापुर को केन्द्र स्थानीय मानते हुए यहाँ के मन्दिरों, ऐतिहासिक स्मारकों के उल्लेख के साथ-साथ सम्पूर्ण परिवेश का दृश्यांकन प्रस्तुत किया गया है। यहाँ के मड़वामहल मन्दिर से प्राप्त शिलालेख में दिये गये विवरण के आधार पर फणिनागवंश के इतिहास पर प्रसंगानुरूप प्रकाश डाला गया है। विवरणिका में महोत्सव पर्व के उदघाटन तथा समापन सत्रों पर आधारित विवरण ही वर्तमान कृति के आलेखन का मुख्य प्रयोजनीय पक्ष रहा है। आशा है विवरणिका का वर्तमान प्रकाशन भावी अपेक्षाओं का पथ प्रदर्शक सिद्ध होगा। माननीय संस्कृति, पुरातत्व एवं पर्यटन मन्त्री श्री बृजमोहन अग्रवाल जी मेरे अभिन्न हैं। उनके द्वारा व्यक्त विचार एवं भावना इस लघु विवरणिका के सृजन के कारक आधार रहे हैं। अगर शरीर साथ देता रहा तो भविष्य में फणिनाग वंश और उनका काल शीर्षक से राजनीतिक तथा सांस्कृतिक इतिहास पर स्वतन्त्र पुस्तक छत्तीसगढ़ को अर्पित करने की अभिलाषा है।

इस लघु विवरणिका को उसके प्रस्तुत स्वरूप देने में वैचारिक स्तर पर मुझे राज्य पुरातत्व एवं संस्कृति विभाग के अधिकारी वर्ग का पूर्ण सहयोग रहा है। उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर उनसे प्राप्त सहयोग की भरपाई नहीं की जा सकती। मैं उन सबका ऋणी रहूंगा। कम्प्यूटर टाइपिंग से लेकर इसके प्रस्तुत रूप सज्जा को समूर्त रूप देने में सर्वश्री पी.सी. पारख, श्री तापस बसक, श्री संजय सिंह, श्री रविराज शुक्ल का उल्लेखनीय सहयोग रहा है। मैं इन्हें अपना हार्दिक धन्यवाद ज्ञापित करता हॅू। सुधि जनों को समर्पित है मेरा यह प्रयास ... 

भवदीय 
विष्णु सिंह ठाकुर

Saturday, January 14, 2023

भोरमदेव पुस्तिका

श्री अजय चंद्रवंशी ने ‘भोरमदेव क्षेत्र‘ पुस्तक तैयार की है। किसी प्राचीन स्मारक, पुरातात्विक स्थल की बेहतर समझ के लिए स्थानीय मान्यताओं, लोक विश्वास मूल्यवान और सहायक होते हैं। इसी क्रम में स्थल-स्मारक से संबंधित परचे, पुस्तिकाओं का भी महत्व होता है। भोरमदेव के विभिन्न पक्षों पर चर्चा के दौरान अजय जी ने इस पुस्तिका की जानकारी और साफ्ट कापी उपलब्ध कराई, उसका अंश यहां प्रस्तुत-

भोरमदेव का संक्षिप्त इतिहास
(पद्यों में) 

प्रस्तुत अंश किसी कवि ने भोरमदेव के सिलालेखों को देख कर सं. १९५९ (बीसवीं सदी का आरंभिक सन) में लिखी है। उस पुस्तक का सारांश यहाँ प्रस्तुत है। संग्रहकर्ता के अथक प्रयास से सं. २००५ (सन 1948?) में इस लघु कृति का संकलन हो सका।

संकलनकर्ता
स्व. रामसहाय पुजारी (भोरमदेव मन्दिर) 
मूल्य ५० पैसा)                                                                                   (द्वितीय वृत्ति १०००


भोरमदेव मन्दिर का ऐतिहासिक चित्रण

भोरमदेव मन्दिर एक अविस्मरणीय अद्वितीय एवं दार्शनिक ऐतिहासिक परम पूज्य स्थल है। जो कवर्धा से पश्चिम दिशा में १६ कि. मी. और बोड़ला से दक्षिण दिशा में ९ कि.मी की दूरी पर स्थित है, पास ही में एक छोटा सा ग्राम छपरी है। भोरमदेव एक अद्वितीय स्थान है जिसे छत्तीसगढ़ का खजुराहो कहा जा सकता है। भोरमदेव मन्दिर के कुछ स्थान - ‘मड़वा महल‘ यह पुराने जमाने का एक विचित्र महल है जिसमें उस युग के वैवाहिक जीवन का मनोरम चित्रणं शिल्प कलाओं द्वारा प्रदर्शित किया गया है। जिसे देखकर मनुष्य अति आनन्द विभोर हो जाता है। भोरमदेव के निवास स्थान अभी भी खडहर के रूप में मौजूद हैं। मन्दिर के पश्चिम दिशा में लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर यह स्थान है यहां अभी भी एक तालाब है, तालाब के किनारे एक किला है। जिसकी दीवाल अभी भी खंडहर रूप में मौजूद है यह किला करीब १५ एकड़ के क्षेत्रफल में है। मन्दिर के दरवाजे पर कभी २ सफेद माग भी दिखाई देते हैं, मंदिर के अंदर जहां शिवलिंग स्थापित है, उसके नीचे भी शिवलिंग है, तालाब के अंदर मी मन्दिर है, उसमे पारस पत्थर भी है। कुछ समय पहले तालाब से खाना पकाने के लिये बर्तन निकलते थे, आज मी ८ बजे सुबह व रात्रि को मनोरम ध्वनि होती हैं जिसे सुनकर अनुमान लगाया जा सकता है कि यह कई प्रकार के वाद्य यंत्रों से युक्त होती है, दो बार ऐसी आवाज भी हुई है मानो मन्दिर गिर गया मगर ऐसा कुछ हुआ नहीं।

दक्षिण दिशा के द्वार पर कुंवार के महीने १५-२० दिन तक एक दो मुंह का नाग रहता है। वह नाग इतने दिन तक वहां से कहीं भी नहीं हटता।

दोहा - भोरमदेव प्रसिद्ध है शेषनाग को अंश।
यथा सुमरति सों बरनिहों, भयो जहां लों वंश।।

छप्पै - जातुकरन मुनि नाम रहत तेहि कानन माहि।
तेहके युगलकुमार एक कन्या छबि जाहीं।।
निरखत रूप लोभात उमर सुन्दर वारेशी।
रच विचार करतार मनहू सांचे ढारे सी।।
तेहि नाम कहत मिथला सुभगचन्द्र वदन गजगामिनी।
लोचन विशाल कंचन रचित चंवल छबि जनुदामिनी।।

सोरठा - तास बन्धू के नाम आदि सुसरमा जानिये।
दूसर शील सुभाव ताहिं देव सरमा कहत।। 
दूनौं बंधु चले जांय गिरी कन्दर तप करन हित। 
रहत कुटि के माह आपु अकेलो कन्य का। 
ताहि कुटी के पाहि रहो एक जल के गड्डा। 
निकसे कछु दिन मांहि तहां से सेवक शेष को।। 
निकसत देखी कुंवरि रूप सोने सो झलकै। 
बरत दीप से वदन लटक नागिन सो अलकै।।
... ... ...
... ... ...
... ... ...

सोरठा
दुर्गावती के माहिं छोटे से पर्वत सुघर।
अति रमणीक सुहाहिं उपर से झिरना झिरत।।
चली बहुरि होई धीर नाम ताहि सुरही नदी पावन।
कारीवारि नग्र कवर्धा होइ गई सुहावन।

समाप्त

प्रकाशक - राधेश्याम सोनी, ग्राम - चवरा
मुद्रक - दीपक प्रिंटिंग प्रेस, कवर्धा

Wednesday, January 4, 2023

किस्सा भोरमदेव

आस्था, विश्वास, मान्यता और उससे उपजी जिज्ञासा-पूर्ति कथाएं, इतिहास-पुरातत्व की पूरक हैं। पुरातात्विक-प्राप्तियों के साथ उनकी पृष्ठभूमि, परिवेश-संदर्भ जितना आवश्यक होता है, उतना ही आवश्यक किसी पुरातात्विक-ऐतिहासिक स्थल-स्मारक के साथ जुड़ी कथाओं को दर्ज किया जाना। इतिहास के ‘वैज्ञानिक‘ अध्ययन के साथ कथाएं, रिक्त स्थान की पूर्ति करती हैं और शोध के लिए अलग दृष्टि, नई संभावना का अवसर देती हैं।

अजय चंद्रवंशी ने अपनी पुस्तक ‘भोरमदेव क्षेत्र‘ पेज-18 पर उल्लेख किया है कि- अपने अध्ययन के दौरान हमें भोरमदेव की एक वृद्ध निरक्षर महिला, जो छेरकी महल में बैठती है, ने लगभग यही कहानी (मिथिला-शेषनाग का पुत्र अहिराज, फणिनागवंश का संस्थापक प्रथम शासक) सुनाई और बताया कि मिथिला के दोनों भाइयों को गर्भ के प्रति जो भरम (भ्रम) था उसी के कारण मंदिर का नाम भोरमदेव पड़ा। अजय जी ने वह किस्सा रिकॉर्ड भी किया है।

यहां भोरमदेव का वही किस्सा है, जिसे संस्कृति एवं पुरातत्व के विभागीय सहयोगी श्री रायकवार के साथ श्री जे.आर. भगत ने रिकॉर्ड किया और मेरे द्वारा श्री प्रभात सिंह की मदद से इसका लेख तैयार किया गया, यथासंभव, यथावत-

एखर ले बताहूं एही मेर ले - देवांसू राजा छेरिया राखे राहय ना त महल नई बनावय। बिना महल के राखय छेरिया ला देव ह, त छेरकिन कहिस, अतका तोर छेरि-बेड़ी ला चराएं देव, फेर एको ठन महल नई बनाये। अभी हमर देवता-देवता के पहर हावय कोई समय मनखे के पहर आहि, त देखे-घुमे ल आहि अइसे कहि के। त कस छेरकिन, महूं त एके झन हावंव, कइसे महल बनावंव कथे। चल त एकक कनि तोर छेरिया चराहूं, एकक कनि महल बनान लगहूं, बिन महल के राखथस। अभी हमर देव-देव के पहर हे, कोई समय मा मनखे के पहर आही, तेन देखे-घुमे ल आहि अइसे कइके। त छेरी चरात-चरात छेरकिन अउ देहंसू राजा बनाय हे एला। बन लिस त भीतरी म दे छेरिया ओल्हिआय हे। त आघू छेरि के लेड़ी रहय इंहा, भीतरी म। ए मडवा महल, भोरमदेव कस भूईयां म भूईयां गड्ढा रहिसे। त फर्रस जठ गे, माटी पर गे, छेरि लेड़ी मूंदा गे। अब पर्री परया अचानक भकरीन-भकरीन आथे, बकरा ओइले सहिं, तेखर सेती छेरकी महल आय एहर। 

अउ, भोरम राजा हर न भरमे-भरम में बने हे। देव मन ह, दू भाई एक बहिनी राहय। त देव के बहिनी गरभती म रई गे। त कइसे गरभती में भगवान। गांव-गोठन अदमी के तदमी हमर देव-देव के पहर भगवान कही, बड़े देव सोचे रोज कन। सोचते-सोचते एकात महीना सोचिस त छोटे देव ला सक करे अपने बहनीच संग, बड़े देव हर। ओ कथे - तोरो बहिनी मोरो बहिनी ए। अउ एके म खाना पिना होके रात बसे बर बहिनी के कुटिया मड़वा महल अतका रहय, दूनो भाई के कुटी छेरकी महल रहय। त तैं बहिनी ल परसों ले के देखबे देव। मोला झगरा झन कर देव रात म दूरिहा ले (अइसे कहिस)। त बहिनी के कुटिया रात बसे बर मड़वा महल अतका रहय। दूनो भाई के कुटी छेरकी महल रहय। त पचमुखी सेसनाग हर दिनमान सेसनाग बनय रात म राजकुमार बम्हन-रासपूत लड़का बनके फेर बहिनी के कुटिया म जावय। त परसों लिस त हिसाब जमीस ओला। अब बिहना होइस त देव पूछते - कइसे नोनी, हमर देवता-देवता के पहर तोर कुटिया म बम्हन-रासपूत लईका देखे हन अउ दिनमान नई देखउल दे हमर। कइसे भई कहिके। त ओ पचमुखी सेसनाग ए भईया। दिनमान सेसनाग बनथे, रात म राजकुमार बम्हन- रासपूत लड़का बन जाथे भई, अइसे कहिस, तउने मेर ले सोच-विचार लिस, देख-ताक लिस। त भोरमदेव ला न भरमाभूति में बनाए हे। तेखर सेती भोरमदेव कथे। नई त बहिनी संग भाई संग सक कर लिस, बहिनी ल। 

अब भोरमदेव ल बना के अपन मड़वा महल के सुरू करिस त देव के बहिनी फेर कथे - कइसे भईया अउ भउजी सब मंदिरे मूरति बनाथो। महूं जाहूं देखे-घूमे ला कहिके। त अनेक परकार के चीज बनाबो नोनी तोर भउजी संग, तोर जाय के नो हे। बन लिही त एके दारी भेजबो, हमन देखे बर तोला। तोर जाय के नो हे। मड़वा महल के सुरू करे हांव। तें आबेच झन कहे रहिस अउ आईच जाबे त बेगर घंटी बजाय मत खुसरबे, कहे रहिस देव ह। त देव के बहिनी, हरू करिन चुपे काल चल दिस, मड़वा महल देखे बर। ओमन ह जांवर-जोड़ी मूरति ल बनाय, बिना ओन्हा कपड़ा के। तो घंटी ला बजाय रतिस ओखर बहिनी, त ओमन कपड़ा पहिने रतिन। त देव रहाय तेन मूरति ल बनाते-बनाते रूख अन भाग गे। अउ बहिनी लजा गे, भाई लजा गे। त झन भाग भाई, झन भाग भाई, मोर से गलती होगे। भईया तैं झन आबे कहे रहे त आ पारें। भईया तैं घंटी बजाबे कहे त नइ बजाएं पाएं भईया लहुट जा भाई। लहुट कहिस त नइ लहुटिस। देव भागिस तेन ह त बहिनी लहुटाय ल गिस। तभो नइ लहुटिस। त भाई के कनिहा ला बहिनी पकड़े, भाई-बहिनी जंगल भाग गे। दूनो भाई-बहिनी तेन जाके पथरा लहुट गे, दूनो भाई-बहिन ह। 

देवता के मउर-मटुक, पर्रा-बिजना ओखर संग म भाग गे। सहसपुर ले आए रतिस मगरोहन मड़वा महल म। सुवासा-सुवासी मगरोहन बर रेंगे बर रेंग दिन, कुकरा ल नइ नेवतन पाइस। कुकरा ल नेवत दे रतिस आज राते के कि मगरोहन ल कुकरा ते झन पासबे न, त कुकरा नइ पासे रतिस। कुकरा राहय तेन भिनसरहा पहर रोज पासथों कहिके कुकरुस-कूं अइसे पास गे। त कुकरा के आवाज ल सुनके सुवासा-सुवासिन सहसपुर मनसफ होए हें। अउ देव मन के बनाय मगरोहन कुंदे-कुंदाय सहसपुर बांधा म पेनाय रतिस त मड़वा म सादी-बिहाव होय रतिस। त मगरोहन नइ आन पाय हे, सहसपुर बांधा ले। अइसे कहानी हे। ए चौरागांव ए अउ ए छेरकी कछार गांव ए, ए देवता सब चौरा खार ए, ओ चौरागांव ए, ओहिदे। अब अतके धुर ले कहानी ह।

Tuesday, January 3, 2023

भोरमदेव क्षेत्र

इंटैक INTACH रायपुर अध्याय द्वारा अजय चंद्रवंशी की पुस्तक ‘भोरमदेव क्षेत्र‘ का प्रकाशन किया गया है। अजय जी की समीक्षा दृष्टि से मैं प्रभावित रहा हूं और पुरातत्व-संस्कृति से जुड़े होने के कारण, इंटैक का सदस्य न होते हुए भी, उस परिवार का सदस्य रहा हूं। किसी विशेषज्ञ-दृष्टि और शास्त्रीय अध्ययन के साथ स्थानीय सूचना-संदर्भों का महत्व आवश्यक होता है, इसे यह पुस्तक भी प्रमाणित करने वाली है। इस पुस्तक के लिए अजय जी ने मुझे भूमिका लिखने को कहा, और समय की कुछ मोहलत भी दी, इसलिए इस संदर्भ में अपनी सोच-समझ को ‘भूमिका‘ के रूप में अभिव्यक्त करने का संयोग बना, वही यहां प्रस्तुत-

माना जाता है कि भारतीय धार्मिेक क्रिया-कलाप और मान्यताओं में पूजा-उपासना वैदिक यज्ञ-याग की परंपरा में बलि-आडंबर, कर्मकांड बढ़ता गया और छठीं शताब्दी ईस्वी पूर्व का बौद्ध-जैन काल इसकी परिणिति थी, जब लोग अन्य आचार-विचार की ओर आकृष्ट होने लगे। इधर उपनिषदों के बाद पुराणों में वैदिक इंद्र-वरुण और रूद्र-आदित्य का महात्म्य ब्रह्मा-विष्णु-महेश में बदलने लगा और शैव, वैष्णव, शाक्त, सौर और गाणपत्य संप्रदाय विकसित हुए। सनातन धर्म के मूल्य वही रहे, किंतु बदलती मान्यताओं के साथ वैदिक निर्गुण यज्ञ, सगुण मंदिर उपासना केंद्र का रूप लेने लगे। अवतार, स्वरूप, विग्रह और देवकुल की अवधारणा के विकास ने धर्म-आचरण को अलग रूप दे दिया। 

स्मरणीय कि वैदिक ब्रह्मोद्य यानि वाद-संवाद वाहक शास्त्रार्थ की ज्ञान परंपरा रही है। शंकराचार्य की तरह स्वामी दयानंद ने पूरे देश में शास्त्रार्थ किया था। वे शास्त्रार्थ के लिए चार वेद, चार उपवेद, छह वेदांग, छह उपांग और मनु स्मृति प्रामाणिक मानते थे, पुराणों के विरोधी थे, ‘पाखंड खंडन‘ जैसी पुस्तक उन्होंने प्रकाशित कराई थी। 16 नवंबर 1869 को आनंदबाग, काशी में मंदिर और मूर्ति-पूजा पर स्वामी दयानंद का शास्त्रार्थ प्रसिद्ध है, जिसमें प्रतिवादी स्वामी विशुद्धानंद सरस्वती थे। इतिहास और परंपरा में इसे कालगत स्थितियों के विभिन्न पक्षों के रूप में देखा जाना समीचीन होता है। 

इसके साथ वास्तु इतिहास पर नजर डालें तो हड़प्पायुगीन सभ्यता के बाद संरचनात्मक वास्तु प्रमाणों का लगभग अभाव रहा है। मौर्य काल और गुप्त काल के बीच की सदियां, इस्वी-पूर्व और पश्चात के लगभग 500 वर्षों में संरचनात्मक के बजाय शिलोत्खात वास्तु का प्रचलन रहा। गुप्त काल से संरचनात्मक मंदिर वास्तु का स्पष्ट और क्रमिक विकास देखा जा सकता है। यह भी अनुमान होता है कि शिलोत्खात चैत्य वास्तु और संरचनात्मक स्तूप वास्तु में धरन, चूल, कोष्ठक आदि काष्ठ-कारीगरी तकनीक के अनुकरण के कारण है। क्रमिक विकास में संरचनात्मक पाषाण वास्तु, जिसमें भार-संतुलन से और बाद में लोहे के क्लैम्प का प्रयोग होने लगा। 8 वीं से 12 सदी ईस्वी, मंदिर वास्तु का उच्चतम विकसित काल है। 

छत्तीसगढ़ में मंदिर वास्तु के उदाहरणों में 11-12 वीं सदी ईस्वी में कलचुरि और नागवंशी शासकों के अधीन उत्कृष्ट उदाहरण ज्ञात हैं। रतनपुर कलचुरियों का क्षेत्र व्यापक रहा और त्रिपुरी कलचुरियों की शैली का स्पष्ट प्रभाव उत्तरी छत्तीसगढ़ के डीपाडीह और महेशपुर जैसे स्थलों में है। इसी प्रकार नागवंशियों में चक्रकोट के छि़दक नागों का बारसूर और नारायणपुर जैसे केन्द्र हैं। दक्षिण कोसल के इतिहास के इस कालखंड में पश्चिमी-मध्य छत्तीसगढ़ में फणिनागवंशी काल मेें वास्तु कला के प्रतिमान रचे गए, उनका उत्कृष्ट नमूना भोरमदेव है। मालवा के परमारों की भूमिज शैली के अपवाद के रूप में भी आरंग के भांड देउल मंदिर के साथ भोरमदेव मंदिर का उल्लेख होता रहा है। भांड देउल, उंची जगती अर्थात चबूतरे पर निर्मित है, किंतु भोरमदेव का मंदिर पूरी तरह भूमिज शैली का उदाहरण है। आर्क्यालॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया रिपोर्ट, खंड 17, 1881-82 अलेक्जेंडर कनिंघम ने पर्याप्त विस्तार से इसका विवरण दिया है। यह भी एक अपवाद कहा जा सकता है कि कनिंघम रिपोर्ट में इसके पुरातात्विक और कलात्मक महत्व के बावजूद यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित नहीं हुआ था। संभवतः रियासत के अधीन क्षेत्र में होने अथवा अधिसूचना जारी होने के पूर्व आपत्ति किए जाने के कारण ऐसा हुआ। बाद के वर्षों में यह मंदिर राज्य शासन द्वारा संरक्षित किया गया। मिथुन मूर्तियों के कारण यह ‘छत्तीसगढ़ का खजुराहो‘ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। 1984 में संचालनालय पुरातत्व एवं संग्रहालय, मध्यप्रदेश से विभागीय अधिकारी डॉ. गजेन्द्र कुमार चन्द्रौल की पुस्तक ‘भोरमदेव प्रदर्शिका‘ आई। 1989 में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ के डॉ. सीताराम शर्मा की पुस्तक ‘भोरमदेव‘ मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी, भोपाल से प्रकाशित हुई। 

मंदिर वास्तु के अध्ययन में पारिभाषिक शब्दों, अंग-प्रत्यंग का नामकरण और निर्देश वास्तुशास्त्रीय ग्रंथों में मिलते हैं। मोटे तौर पर दक्षिण भारतीय मंदिरों और उड़ीसा के मंदिरों के लिए प्रयुक्त शब्द उत्तर भारत के लिए भिन्न हो जाते हैं, जिसका उदाहरण मंडप के लिए उड़ीसा में प्रयुक्त शब्द ‘जगमोहन‘ है। इसी प्रकार भूमि-थर, अंग-रथ, अधिष्ठान-पीठ, अंतराल-कपिली, विमान-प्रासाद जैसे शब्दों का अर्थ और उपयुक्त प्रयोग के लिए विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। यह भी उल्लेखनीय है कि वास्तुशास्त्रीय ग्रंथों की पांडुलिपियों की प्राप्ति और अध्ययन के पश्चात, भारतीय मंदिर स्थापत्य की शैली और पारिभाषिक शब्दों में परिवर्तन होता रहा है। 

प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि भारतीय मंदिर वास्तु के अध्ययन में पर्सी ब्राउन और स्टेला क्रैमरिश के प्रयासों को मूल स्रोत-ग्रंथों के आधार पर कृष्णदेव और मधुसूदन ढाकी जैसे मूर्धन्य विद्वानों ने परिष्कार किया। औैर उत्तर भारत के मंदिर निर्माण परंपरा में सोमपुरा कुल, पांडुलिपियों के अध्ययन, संपादन, प्रकाशन के द्वारा शास्त्र के साथ-साथ तकनीक और प्रयोग में भी सक्रिय है। 

प्राकृतिक परिवेश, उत्कृष्ट संरचना और धार्मिक आस्था का केंद्र होने के कारण भोरमदेव मंदिर पर्यटक आकर्षण के केंद्र के रूप में विकसित हुआ है। किंतु इसका एक पक्ष यह भी है कि पर्यटक सुविधाओं, आवश्यकताओं की पूर्ति और आधुनिक साज-सज्जा का प्रयास किया जाता रहा है, जो मंदिर के संरक्षण, प्राचीन मूल स्वरूप और पूरे परिवेश पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। यह ध्यान रखना होगा कि ऐसे किसी भी प्राचीन स्थल-स्मारक का आकर्षण उसके मूल स्वरूप के कारण ही होता है अतः पर्यटक-सुविधाओं की दृकष्ट से किए जाने वाले कार्यों और कथित विकास के दबाव पर नियंत्रण आवश्यक है और इस दृष्टि से मंदिर और उसके परिवेश के मूल स्वरूप को संरक्षित-सुरक्षित रखते हुए, अनुशंसित सीमा की दूरी पर विकास कार्य किए जाएं। 

अंगरेज अधिकारियों के बाद भोरमदेव मंदिर पर डॉ. सीताराम शर्मा और डॉ. गजेन्द्र कुमार चन्द्रौल जैसे विद्वानों ने विस्तार से अध्ययन किया है। इस क्रम में अजय चंद्रवंशी न सिर्फ क्षेत्रीय इतिहास, बल्कि फिल्म, साहित्य आदि के भी सजग अध्येता हैं और तथ्यों की प्रस्नुति में रोचकता और विश्वसनीयता का संतुलन बनाए रखते हैं। उनकी यह पुस्तक भोरमदेव से संबंधित अब तक प्रकाशित लगभग सभी महत्वपूर्ण प्रकाशन, स्रोत-सामग्री का उपयोग कर तैयार की गई है, जिसमें उनकी सजग मीमांसा-दृष्टि के भी दर्शन होते हैं। इसलिए यह प्रकाशन भोरमदेव, क्षेत्रीय इतिहास और कला परंपरा के दस्तावेज के रूप में उपयोगी प्रतिमान साबित होगी, मेरा ऐसा विश्वास और शुभकामनाएं हैं। 

पुनः हमारी सनातन परंपरा में उपासना ने वैदिक यज्ञ ने मंदिर-मूर्तियों का रूप ले लिया। समय के साथ बदलती स्थितियों और मान्यताओं का संदर्भ लेते हुए 'जानउँ नहिं कछु भजन उपाई।' या मार्कण्डेय पुराण के दुर्गा सप्तशती अंश में आया ‘आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ...‘ का यहां उल्लेख प्रासंगिक होगा, अर्थात् ‘मैं आवाहन नहीं जानता, विसर्जन करना नहीं जानता तथा पूजा करने का ढंग भी नहीं जानता। क्षमा करो। मैंने जो मंत्रहीन, क्रियाहीन और भक्तिहीन पूजन किया है, वह सब आपकी कृपा से पूर्ण हो।‘

Sunday, February 20, 2022

आत्म परिचय - पं. लोचनप्रसाद पांडेय

मेरा जन्म चन्द्रपुर अंचल के बालपुर ग्राम में विक्रम संवत् 1943, पौष शुक्ल दशमी (तदनुसार 4 जनवरी सन् 1887) को हुआ था। चन्द्रपुर अंचल उस समय सी.पी. के छत्तीसगढ़ संभाग में उड़िया भाषी जिले सम्बलपुर में सम्मिलित था। मेरे प्रपितामह पं. शालिग्राम पाण्डेय इस अंचल के जाने-माने प्रतिष्ठित जन सेवी नागरिक थे। उनका निवास स्थान पहले चन्द्रपुर था। उनके पूर्वज अयोध्या सरवार से यहां आये थे। बाद में उन्होंने चन्द्रपुर छोड़ दिया और ग्राम बालपुर चले आये। बालपुर में उनका कृषि फार्म था। यहां वे अपने इकलौते पुत्र चिंतामणि के साथ रहने लगे।

बालपुर ग्राम महानदी के बायें किनारे पर बसा हुआ है। महानदी का दक्षिणी पाट लगभग एक मील तक सारंगढ़ रियासत के ग्रामों की उत्तरी सीमा को छूता हुआ अत्यंत मनोरम दृश्य उत्पन्न करता है। चन्द्रपुर अंचल में पं. शालिग्राम के तीन और ग्राम हैं।

कालांतर में, मैं अपने पिता चिंतामणि द्वारा बालपुर में संस्थापित निजी प्राथमिक पाठशाला में प्रविष्ट हुआ और जनवरी 1898 में प्राथमिक परीक्षा उत्तीर्ण की।

स्वामी रामदास नामक एक वैष्णव मद्रासी साधु हमारे जिले के इस अंचल में भ्रमण करते हुए आ पहुंचे। उन्हीं से मैंने तथा मेरे अग्रज और अन्य लोगों ने अंग्रेजी सीखी। समीपस्थ नगर रायगढ़ में उन दिनों कोई अंग्रेजी-पाठशाला नहीं थी अतः मुझे मेरे मामा (माताजी के चचेरे भाई) पंडित अनंतराम पाण्डेय के पास रखा गया। वे उन दिनों रायगढ़ की माध्यमिक पाठशाला में प्रधान अध्यापक थे। उन्होंने मुझे हिन्दी और अंग्रेजी में शिक्षा दी।

रायगढ़ प्रवास के दिनों में पं. कृपाराम मिश्र, जो मेरे पिता के शिष्य रह चुके थे, ने मेरी विशेष रुप से देखभाल की।

आगामी अध्ययन के लिए मैं शासकीय उच्चतर माध्यमिक शाला, सम्बलपुर में प्रविष्ट हुआ।

मैंने माध्यमिक अंग्रेजी की परीक्षा फरवरी 1902 में प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। सम्पूर्ण जिले में मेरा स्थान प्रथम रहा।

मैने एन्ट्रेंस परीक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय से 1905 में द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। परीक्षा केन्द्र मिदनापुर (बंगाल) था। शासकीय उच्च शाला सम्बलपुर के अपने विद्यार्थी जीवन में मैं ‘म्युचुअल इम्प्रूवमेंट सोसायटी‘ का अवैतनिक मंत्री था। इस सोसायटी के अध्यक्ष पद पर रेव्हरेंड हेवरलेट मिशनरी दो वर्षों तक रहे। मेरा पहला अंग्रेजी लेख ‘टोबैको एण्ड स्टूडेंट्स‘ 1904 में सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज बनारस की पत्रिका, जिसकी संपादिका महान विदुषी श्रीमती एनी बिसेन्ट थीं, में प्रकाशित हुआ था।

हिन्दी भाषा में ‘धर्म‘ पर लिखा गया मेरा पहला लेख सरस्वती-विलास प्रेस नरसिंहपुर सी.पी. से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘हिन्दी मास्टर‘ में छपा था।

उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए मैं सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज बनारस गया था, पर घर की विषम परिस्थितियों के कारण मुझे बीच में ही पढ़ाई छोड़ कर घर लौटना पड़ा। मैने पिताजी द्वारा संचालित पाठशाला का कार्यभार अपने ऊपर लिया और अपने चार अनुजों सहित कुछ अन्य लड़कों को अंग्रेजी, हिन्दी के साथ-साथ पढ़ाने लगा। इन दिनों मैं अपने फुरसत के समय को स्वाध्याय तथा अंग्रेजी व हिन्दी में लेख लिखने में व्यतीत करता था।

‘लेटर्स टू माई ब्रदर्स‘ और ‘दि वे टू बी हैप्पी एण्ड गे‘ मेरे द्वारा क्रमशः 1909 तथा 1911 में लिखे और प्रकाशित किये गये। 1911 में ही मैंने राधानाथ राय का, अंग्रेजी भाषा में एक छोटा सा जीवन चरित लिखा और उसे ‘राधानाथ, दि नेशनल पोयेट ऑफ उड़ीसा‘ के नाम से अपने ही खर्च पर प्रकाशित किया। मेरा पहला हिन्दी उपन्यास ‘दो मित्र‘ 1906 में लक्ष्मीनारायण प्रेस मुरादाबाद (उ.प्र.) से प्रकाशित हुआ। कालांतर में इस उपन्यास को, सी.पी. की पाठ्यपुस्तक समिति ने, सी.पी. एवं बरार की हिन्दी पाठशालाओं में बच्चों को पुरस्कृत करने के लिए तथा पुस्तकालयों में रखने के लिए स्वीकृत किया। 

खड़ी बोली में लिखी गई मेरी लघु-कविताओं का संग्रह ‘नीति-कविता‘ शीर्षक से मेरे मित्र श्री रामनारायण राठी द्वारा अपने मारवाड़ी प्रेस, नागपुर से 1909 में प्रकाशित किया गया। यह संग्रह भी सी.पी. एवं बरार की पाठ्य पुस्तक समिति द्वारा स्वीकृत किया गया। नागरी प्रचारणी सभा बनारस ने इसे ‘उत्तम-प्रकाशित-उपयोगी-पुस्तक‘ निरूपित किया। शिक्षाविद् व विद्वान रायबहादुर हीरालाल एवं छत्तीसगढ़ संभाग के एजेन्सी इन्सपेक्टर ऑफ स्कूल श्री गणपति लाल चौबे के द्वारा भी यह पुस्तक प्रशंसित हुई।

हिन्दी कविता संग्रह - ‘बालिका विनोद‘, ‘बाल विनोद‘ तथा ‘कृषक बाल सखा‘ - युवा विद्यार्थियों के उपयोग के लिए लिखे गये। मेरे पिता उड़िया एवं बंगला जानते थे। काशीराम दास लिखित बंगला-महाभारत की कुछ पंक्तियों (जैसे)

‘महाभारत कथा अमृत समान,
काशीराम दास कहे, सुने पुण्यवान‘ 

को पढ़ने व सुनने में बड़ा आनंद आता है। मेरे अग्रज को उड़िया भाषा के (ग्रंथ) ‘विचित्र- रामायण‘ तथा ‘मथुरा मंगल‘ (लोकप्रिय गीति पुस्तिका) बहुत प्रिय थे। जब मैं सम्बलपुर में, अपने सहपाठी नारायणनन्द के घर पर रहता था तब उनसे राधानाथ राय की उड़िया कविताएं, विशेषकर ‘दरबार‘ सुनता था । इन्हीं नारायणनन्द से मुझे उड़िया भाषा में रचना करने की प्रेरणा मिली।

मेरे मित्र प्रसन्न कुमार पुजारी ने (जो सम्बलपुर के प्रसिद्ध पुजारी घराने के थे) मेरी उड़िया कविताओं के संग्रह की पाण्डुलिपि को उड़िया भाषा के प्रसिद्ध कवि गंगाधर मेहर जी को दिखाया। गंगाधर मेहर जी सौभाग्य से हिन्दी लिपि (देवनागरी) जानते थे। मैं अपनी उड़िया कविताएं उड़िया लिपि की अपेक्षा हिन्दी लिपि (देवनागरी) में लिखना अधिक पसंद करता था। गंगाधर मेहर ने मुझे उत्साहित किया और मेरी कविताओं को सराहा। उन्हीं के उत्साहित किये जाने पर मैने अपना उड़िया कविता संग्रह ‘कविता- कुसुम‘ 1910 में प्रकाशित किया। यह संग्रह उड़ीसा के महत्वपूर्ण कवियों, जैसे- फकीर मोहन सेनापति, भक्त कवि मधुसूदन दास, श्री शशिभूषण राय (काली गली, कटक) तथा बाबू अखिल चन्द्र पालित (कूच बिहार, बंगाल) के द्वारा बहुत प्रशंसित हुआ। जागरूक एवं सुसंस्कृत राजा सच्चिदानंद त्रिभुवन देव, फ्यूडटरी चीफ, बामरा स्टेट (जो पहिले छत्तीसगढ़ संभाग में था) ने इन रचनाओं पर मुग्ध होकर मुझे ‘काव्य विनोद‘ की उपाधि प्रदान की। यह, मुझे प्राप्त हुई पहली साहित्यिक उपाधि थी। इस समय तक मेरी कविताएं तथा लेख- ‘हिन्दी प्रदीप‘ (प्रयाग), ‘सरस्वती‘ (आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा संपादित), ‘कमला‘ (कलकत्ता से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका) और ‘देवनागर‘ (जो कलकत्ता से ‘लिपि, विस्तार परिषद‘ के द्वारा प्रकाशित तथा कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश शारदा चरण मित्र के द्वारा नियंत्रित होता था) में प्रकाशित होने लगे थे।

‘देवनागर‘ में मेरी उड़िया कविताएं ‘प्रार्थना सप्तक‘, ‘भारत वंदना‘ तथा ‘हिन्दी र विनय‘ पहले-पहल 1907-1908 में प्रकाशित हुई। इसके तुरंत बाद मेरी उड़िया कविता ‘महानदी‘ पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक को मैंने बामरा नरेश, राजा सच्चिदानंद त्रिभुवन देव को समर्पित किया था।

सन् 1905-1906 में मैंने रे. लाल बिहारी डे-कृत ‘फोक टेल्स ऑफ बंगाल‘ का हिन्दी में अनुवाद करना प्रारंभ किया, जिसके कुछ अंश हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में छपे और कुछ बाद में ‘हरिदास एण्ड कंपनी लिमिटेड कलकत्ता‘ के द्वारा सन् 1910 में प्रकाशित मेरी रचना ‘आनंद की टोकनी‘ में समाविष्ट किये गये। इसी प्रकाशक ने ही मेरी रचनाओं- ‘मेवाड़ गाथा‘, ‘माधव मंजरी‘ एवं ‘चरित माला‘ को भी प्रकशित किया तथा मेरे पूज्य पिता पं. चिन्तामणि के जीवन वृत्तांत ‘मेरे पूज्यपाद पिता‘, का सन् 1914 में सचित्र प्रकाशन कर मेरी बड़ी मदद की। इस पुस्तक में मेरे पूज्य पिता की संक्षिप्त जीवनी सरल हिन्दी में लिखी गई है। उनका दुखद निधन सन् 1907 में हमारे ग्राम बालपुर में हुआ। उस समय उनके न केवल वृद्ध पिता पं. शालिग्राम एवं माता जीवित थीं बल्कि उनकी शतवर्षीया प्रपितामही भी जीवित थीं। उनके वृद्ध माता-पिता को अनेक वर्षों तक अपने इकलौते पुत्र के निधन की विरह-व्यथा को सहन करना पड़ा। 

मैं अपने अनेक मित्रों के साथ अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन दे(ख?)ने कलकत्ता गया था। प्रसिद्ध राष्ट्रभक्त दादाभाई नौरोजी इस अधिवेशन का सभापतित्व कर रहे थे। मेरे पूज्यपाद पिता पं. चिन्तामणि पाण्डेय, पं. कृपाराम मिश्र तथा अनंतराम पाण्डेय भी हम लोगों के मार्गदर्शक के रूप में हमारे साथ थे। वहाँ मुझे बड़े-बड़े देशभक्तों एवं वक्ताओं के दर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। यह, कलकत्ता की मेरी दूसरी यात्रा थी। (मैं पहली बार मार्च 1905 में, सम्बलपुर निवासी मेरे मित्र नारायणनंद व पं. प्रसन्न कुमार पुजारी के साथ यहां आया था)। जिनं देशभक्तों व वक्ताओं के दर्शन का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ उनमें अखिल भारतीय ख्याति प्राप्त बाबू एस.एन. बैनर्जी, सर फिरोजशाह मेहता, विपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपत राय, पं. मदन मोहन मालवीय, गोपालकृष्ण गोखले आदि बंगाल तथा अन्य प्रान्तों के नेतागण थे। 

मेरी पुस्तक ‘स्वदेशी-पुकार‘, जिसमें स्वदेशी आंदोलन तथा बहिष्कार पर लिखे गये राष्ट्रीय गीतों का संग्रह था, उस समय तैयार थी, यह संग्रह ‘भारत जीवन प्रेस, बनारस‘ को छापने के लिए भेजा गया, पर कोई प्रकाशक उसे छापने के लिए तैयार नहीं था। मुझे सलाह दी गई कि मैं उसके प्रकाशन के लिए कष्ट न उठाऊं। मेरे द्वारा लिखित नाटक ‘छात्र-दुर्दशा‘ और प्रहसन ‘साहित्य-सेवा‘ किसी प्रकार प्रकाशित हुए। 

सन् 1908 में मैंने कालीदास के मेघदूत में वर्णित ‘रामगिरी‘ के स्थान के निर्णय के सम्बन्ध में विचार किया और इस संदर्भ में श्री हीरालाल बी.ए. (बाद में रायबहादुर हीरालाल, डी. लिट्.) से पत्र व्यवहार किया। उस समय डॉ. हीरालाल, नागपुर में असिस्टेंट सुपरिन्टेन्डेन्ट, गजेटिर सी.पी., के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने बड़ी तत्परता से इस संबंध में मुझे वांछित जानकारियां दीं। मेरा आलेख ‘छत्तीसगढ़ में मेघदूत-वर्णित रामगिरी‘ शीर्षक से, सितम्बर 1914 में मासिक पत्र ‘इन्दु‘ (काशी) में प्रकाशित हुआ। इस मासिक पत्रिका के संपादक थे-श्री अंबिकाप्रसाद गुप्त। मेरा दूसरा लेख ‘छत्तीसगढ़ में रावण की लंका‘, जिसे मैंने इन्दौर के, सरदार कीबे के लेख के उत्तर में लिखा था, लखनऊ की मासिक पत्रिका ‘माधुरी‘ में छपा। ‘माधुरी‘ में ही मेरा एक अन्य लेख- ‘मेघदूत में पुरातत्व‘ भी प्रकाशित हुआ। सन् 1910 में मेरी प्रतिनिधि हिन्दी कविताएं ‘कविता कुसुममाला‘ के रूप में ‘इण्डियन प्रेस‘, इलाहाबाद से प्रकाशित हुई। आम जनता तथा प्रेस ने इस पुस्तक का हार्दिक स्वागत किया। इंडियन प्रेस ने इस पुस्तक के तीन संस्करण प्रकाशित किये। चौथा संस्करण जबलपुर के मिश्र बंधु-कार्यालय ने 1932 में प्रकाशित किया। 

सन् 1915 में ‘पद्य-पुष्पांजलि‘ में मेरी जन उपयोगी और सुधारवादी कविताएं छपी। इस संग्रह में महात्मा गांधी पर मेरी कविता ‘कर्मवीर मिस्टर गांधी‘ भी संकलित थी। संभवतः यह महात्मा गांधी पर लिखी गई प्रथम हिन्दी कविता है। इस संग्रह का प्रकाशन श्री नारायण प्रसाद अरोड़ा, बी.ए. कानपुर ने किया था। श्री अरोड़ा ‘कानपुर का इतिहास‘ के रचयिता थे।

राजा भूपदेव सिंह, रायगढ़ स्टेट (छत्तीसगढ़) ने सितम्बर 1911 में मुझे अपने निजी सचिव और संदेशवाहक की हैसियत से रीवां दरबार में भेजा। मुझे इस अनुमति के साथ भेजा गया था कि राजा साहब का पत्र, रीवां महाराज सर वेंकटरमण सिंह को देकर मैं इलाहाबाद में हो रहे हिन्दी साहित्य सम्मेलन के द्वितीय अधिवेशन में सम्मिलित हो सकता हूं। किन्तु रीवां नगर में अचानक बीमार हो जाने के कारण मैं अधिवेशन में सम्मिलित होने से वंचित रह गया। मेरी अनुपस्थिति में मेरे द्वारा खड़ी बोली में लिखित- ‘स्वागतम गान‘ (कविता), मेरे मित्र पं. जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल, आयुर्वेद पंचानन, संपादक मासिक पत्रिका ‘सुधांशु‘ द्वारा पढ़ा गया। मेरी कविता, अन्य कविताओं के साथ, अधिवेशन के विवरण (रिपोर्ट) में समाविष्ट की गई।

सन् 1913 में अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के तीसरे अधिवेशन का केन्द्र बनी प्रसिद्ध कलकत्ता नगरी। मैं, इस अधिवेशन में मध्य प्रांत (सेंट्रल प्राविंस) के प्रतिनिधि के रुप में अपने चतुर्थ भ्राता बंशीधर पाण्डेय तथा एक अन्य सम्बन्धी शुक्लाम्बर प्रसाद पाण्डेय के साथ सम्मिलित हुआ। यहां मुझे हिन्दी मां के दो सपूतों- बाबू राजेन्द्र प्रसाद, एम.ए. एम.एल., जो इस अधिवेशन की स्वागत समिति के मंत्री थे तथा बाबू पुरुषोत्तम दास टंडन, एम.ए., एल.एल.बी. जो इस अधिवेशन के महामंत्री थे, से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। स्वागत समिति ने मेरा स्वागत गीत अधिवेशन में पढ़ने के लिए स्वीकार कर लिया। उचित समय पर मुझे विशिष्ट विशाल श्रोता समुदाय के सम्मुख स्वागत गीत पढ़ने के लिए बुलाया गया। यह मेरे जीवन का एक अपूर्व अनुभव था। कलकत्ता के आंग्ल दैनिक समाचार पत्रों ने अधिवेशन के प्रथम दिन की रिपोर्ट में मेरे नाम का उल्लेख किया। बंगीय साहित्य समाज ने, ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन‘ में पधारे प्रतिनिधियों की अभ्यर्थना हेतु स्वागत समारोह का भी आयोजन किया। इस समारोह में मुझे बंगाल के बहुत से साहित्यिक जनों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रथम बार मेरी भेट महाकवि अयोध्या सिंह उपाध्याय, व्याकरणाचार्य पंडित रामावतार पाण्डेय ‘शर्मा‘, एम.ए., बाबू शिवनंदन सहारा, स्वामी सत्यदेव, पं. शकल नारायण शर्मा, पं. अम्बिका प्रसाद बाजपेई और बाबू गोपालराय गहमर से हुई। प्रो. विनय कुमार सरकार, एम.ए. ने कृपा कर अपनी बंगला एवं अंग्रेजी पुस्तकों का सेट अधिवेशन के अधिकांश प्रतिनिधियों को भेंट किया मुझे भी एक सेट प्राप्त हुआ। मेरा इनसे पत्र-व्यवहार पूर्व से था तथा मैं उनके ‘गृहस्थ-जर्नल‘ का नियमित ग्राहक भी था। प्रो. सरकार वर्षों तक अमेरिका में रहने के बाद जब भारत लौटे तब मेरी उनसे भेंट 1938 में कलकत्ता में हुई। उनके साथ उनकी अमेरिकन पत्नी व बेटी भी थीं। 

दिसम्बर 1913 के अंतिम सप्ताह में मेरा पुनः कलकत्ता जाना हुआ। इसी सप्ताह ठाकुर रवीन्द्रनाथ (टैगोर) शांतिनिकेतन, बोलपुर, से के.सी.आई.ई. की उपाधि लेने कलकत्ता आये हुए थे। इस बात की जानकारी मुझे एक युवक कलाकार से मिली, जिससे बामरा (उड़िसा) के राजा सच्चिदानंद त्रिभुवन देव, चित्रकला सीख रहे थे। राजा साहब उस समय पार्क-स्ट्रीट की एक विशालकाय इमारत में ठहरे हुए थे। वहीं उस युवक कलाकार से मेरी भेंट हुई। उसका टैगोर बंधुओं से घनिष्ठ सम्बन्ध था। उसने मुझे शांति निकेतन के गुरुदेव के दर्शन करने को प्रोत्साहित किया। उसी की सलाह पर मैं 25 दिसम्बर 1913 को गुरुदेव से मिलने उनके ‘जोरासांको‘ राजवाड़ी में गया। गुरुदेव ने कृपा कर मुझे भेंट का समय दिया। उनके पुत्र रथिन्द्रनाथ भी उनेक साथ थे। गुरुदेव का मैंने अभिवादन किया और अपनी हिन्दी, अंग्रेजी और उड़िया की रचनाएं उन्हें भेंट करने की अनुमति मांगी। उनकी आज्ञा मिलने पर मैंने अपनी रचनाएं- ‘रघुवंश सार‘, ‘वीर भ्राता लक्ष्मण‘, राधानाथ राय- ‘दि नेशनल पोयेट आफ उड़ीसा‘, ‘दि वे टू बी हैप्पी एण्ड गे‘ एवं ‘कविता-कुसुम माला‘ उन्हें भेंट स्वरुप दी, जिन्हें उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया। मेरी उस उड़िया कविता को जिसे मैंने एक माह पूर्व उनके पास भेजा था, उन्होंने याद किया और मुझसे मेरी उड़िया रचनाओं के विषय में पूछताछ की। हिन्दी और उड़िया में, उनको बधाई के रुप में लिखी और भेजी गई मेरी कविताओं पर उनका पत्र देवनागरी लिपि में, मेरे जन्म ग्राम बालपुर में दि. 3 दिसम्बर 1913 को मिला। हिन्दी जगत ने इसका बड़ा स्वागत किया, क्योंकि गुरुदेव के द्वारा हिन्दी में लिखित यह प्रथम पत्र था। 

कांग्रेस का जो अधिवेशन सन् 1917 में कलकत्ता में हुआ, वह अपने आप में बड़ा महत्वपूर्ण था। इस अधिवेशन की अध्यक्षता डॉ. एनी बिसेन्ट ने की। इस अधिवेशन में लोकमान्य तिलक, महामना मालवीय, भारत कोकिल सरोजनी नायडू, व्याख्यान वाचस्पति दीनदयाल शर्मा (झामर) और कर्मवीर महात्मा गांधी तथा अन्य नेताओं ने भाग लिया। महात्मा गांधी ने ‘सोशल सर्विस कान्फेरेन्स‘ में अपना भाषण अंग्रेजी में, हिन्दी के सवाल की वकालत करते हुए दिया। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, कलकत्ता ने लोकमान्य तिलक की अध्यक्षता में बैठक की, जिसमें मैं भी सम्मिलित हुआ। इस बैठक में महामना मालवीय, महात्मा गांधी तथा सरोजनी नायडू ने भी भाग लिया। राष्ट्रकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जो अपने आकर्षक गाउन और टोपी से सज्जित थे, कांग्रेस के खुले अधिवेशन में राष्ट्र को संदेश दिया। यह भारत के विभिन्न क्षेत्रों से आये प्रतिनिधियों और संपूर्ण श्रोता समुदाय के लिए एक अपूर्व दृश्य था। 

पं. शकल नारायण पाण्डेय ने एन.पी. साहा (आरा) के जरिए मेरे प्रथम उपन्यास ‘दो मित्र‘ की पाण्डुलिपि का संशोधन, प्रेस में जाने के पूर्व किया था। उनकी मुझ पर बड़ी कृपा थी। उन्हीं के द्वारा उत्साहित होकर मैं उनके बताए हुए मार्ग पर चलता रहा। इसी प्रकार स्व. श्री गंगा प्रसाद अग्निहोत्री (तिभुरनी), पं. श्यामबिहारी मिश्र, एम.ए. डी.लिट. तथा राय देवी प्रसाद ‘पूर्ण कवि‘, हाईकोर्ट वकील कानपुर, ने भी समय समय पर मेरी कविताओं की पाण्डुलिपियों का अवलोकन कर मेरा बड़ा उपकार किया। मैं इन सभी महानुभवों का अत्यंत अभारी हूं। राय देवी प्रसाद ‘पूर्ण कवि‘ ने मेरे तथा मेरे प्रकाशक के अनुरोध पर मेरी काव्यकृति ‘पद्य-पुष्पांजलि‘ (जो सन् 1915 में प्रकाशित हुई थी) की भूमिका लिखने की कृपा की। 

श्री काशीप्रसाद जायसवाल से सन् 1908 से मेरा पत्र व्यवहार था। तब वे लन्दन के आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में कानून पढ़ रहे थे। उस समय मैंने उनसे अनुरोध किया था कि वे इंग्लैण्ड व यूरोप में हिन्दी में समाचार पत्र निकालें। मैंने सत्यदेव जी से भी ऐसा ही अनुरोध तब किया था जब वे सन् 1907-08 में शिकागो (अमेरिका) में विद्याध्ययन कर रहे थे। मैंने उन्हें अपनी एक लंबी हिन्दी कविता ‘स्वराज लेंगे, स्वराज लेंगे‘ भी भेजी थी। इन दोनों महानुभावों की मुझ पर बड़ी कृपा थी। जब वे अपने-अपने विश्वविद्यालयों से घर लौटे तब कलकत्ते में मेरी उन दोनों से भेंट हुई। 

एक समय मैं श्री जायसवाल जी के यहां उनके अमर स्ट्रीट (कलकत्ता) स्थित निवास में ठहरा था, स्वामी सत्यदेव की सहायता से मुझे, सन् 1907 में प्रकाशित, थामस पैनर की पुस्तक ‘मानव-अधिकार‘ (Rights of man) प्राप्त हुई। इस पुस्तक के आधार पर हिन्दी में एक पुस्तक लिखने का विचार किया गया। स्वामी सत्यदेव द्वारा लिखित पुस्तक ‘मनुष्य के अधिकार‘ का प्रकाशन, बाद में, उनके अमेरिका प्रवास से लौटने पर हुआ। 

सन् 1909-10 में हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए एक हिन्दी सम्मेलन शुरु करने का निर्णय लिया गया। हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक पं. गंगाप्रसाद अग्निहोत्री ने मुझे इस प्रकार के संस्थान की आवश्यकता को प्रतिपादित करने के उद्देश्य से छोटे-छोटे लेख लिखने का दायित्व सौंपा। खंडवा के बाबू माणिक्य चन्द्र जैन ने इस कार्य के लिए स्वेच्छा से अपनी सेवाएं हिन्दी साहित्य सम्मेलन को देने की इच्छा प्रकट की। ‘सम्मेलन‘ का प्रथम अधिवेशन काशी में महामना पं. मालवीय जी की अध्यक्षता में हुआ। बाद में जबलपुर सम्मेलन के लिए हम लोगों ने छत्तीसगढ़ में कठिन परिश्रम किया। पं. रविशंकर शुक्ल ने अपनी ओर से रायपुर जिले तथा पड़ोसी फ्यूडटरी रियासत के नवजवानों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया। छत्तीसगढ़ में हम लोग पं. विष्णुदत्त शुक्ल, बी.ए., सीहोर वाले के मार्गदर्शन में कार्य कर रहे थे। बाद में वे, सी.पी. से प्रथम व्यक्ति के रुप में पटना अधिवेशन का सभापतित्व करने के लिए आमंत्रित किए गए। अपने परिवार में बीमारी के कारण, बड़ी इच्छा रखते हुए भी मैं शुक्ल जी के साथ पटना नहीं जा सका। ‘पाटली-पुत्र‘ देखने की मेरी बड़ी इच्छा थी।

नागपुर के रामनारायण राठी, हिन्दी के ही प्रेमी सज्जन थे। उनके ‘मारवाड़ी‘ साप्ताहिक का मैं नियमित ग्राहक था। उन्होंने ही मेरी लघु पुस्तिका ‘लेटर्स टू माई ब्रदर्स‘ का प्रकाशन सन् 1909 में अपने मारवाड़ी प्रेस नागपुर से किया। जब काशी के मेरे परम मित्र बाबू गंगाप्रसाद गुप्त जी को नागपुर ‘मरवाड़ी‘ का संपादन करने के लिए बुलाया गया तब उन्होंने बड़ी इच्छा जाहिर की कि मैं उनके संपादक-मंडल में सम्मिलति हो जाऊं। गुप्त जी हिन्दी के प्रमुख लेखकों में से थे। हिन्दी में उनकी अनेक पुस्तकें हैं। उन्होंने झांसी की महारानी की जीवनी का भी हिन्दी में अनुवाद किया था। नागपुर में जब प्लेग का प्रकोप था तब उन्हें मजबूरी में एक दूर-दराज के गांव में रहना पड़ता था। यहां उनके 17-10-1909 के पत्र का एक अंश उद्धृत है -

“मैं तो आपको यहां आने का कष्ट देना चाहता था, परन्तु भयंकर प्लेग के कारण यह विचार त्याग देना पड़ा। उपर्युक्त योजना की आशा में ही मैंने आपके काव्य, लेखादि संपादकीय स्तंभों में छापना शुरु कर दिया था। कहिए, प्लेग कम होने पर आप यहां आ सकते हैं? या वहीं से सहायक संपादक के रुप में ‘मारवाड़ी‘ को अपना समझ कर इसकी सहायता कर सकते हैं?“ 

प्रसिद्ध विद्वान पं. गंगाप्रसाद अग्निहोत्री (नागपुर वाले) आगरा से मासिक पत्र ‘स्वदेश बांधव‘ निकालते थे। इस पत्र के 5 एवं 8 नवम्बर 1909 के अंकों में मेरी कृति ‘बालिका विनोद‘ (जो बालिकाओं के लिए लिखी गई थी) की समालोचना जब श्री गुप्ता जी ने पढ़ी तब वे स्वयं को, अपना अभिमत, अंग्रेजी में प्रकट करने से न रोक सके, जो कि निम्नानुसार था -

"The lethargy and negligence shown by sons of C.P. in the matter should be abhored in the face of your disinterested services and enthusiasm for Hindi"

इसके साथ इस आत्मकथा के कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रसंगों में एक, सारंगढ़ के प्रहलाद दुबे द्वारा रचित एक अप्रकाशित ग्रंथ्ज्ञ ‘जयचंद्रिका‘ को सारंगढ़ से तथा सम्बलपुर के गंगाधर मिश्रा द्वारा रचित एक संस्कृत रचना ‘कोशलानंद काव्यम‘ (जिसमें संबलपुर और पटना के राजाओं का इतिहास वर्णित है) की उनके द्वारा खोज का उल्लेख है। इसी प्रकार ब्राह्मी लिपि उत्कीर्ण किरारी के काष्ठ स्तंभ के बारे में स्पष्ट किया है कि ‘रासायनिक परीक्षण से ज्ञात हो गया है कि स्तंभ की लकड़ी मधुक (महुआ) है न कि साल या सरई- जैसा कि किरारी ग्राम के लोगों की धारणा थी।‘ एक अन्य प्रसंग पुरी और कोणार्क मंदिरों की मूर्तियों के बारे में है, जिसके संदर्भ में वे याद करते हैं- ‘महाकोशल स्थित बिलासपुर जिले के कवर्धा राज्य का एक राजा, ऐसे अश्लील चित्रों को भोरमदेव के मंदिर में देख कर इतना विचलित हुआ कि उसने इन चित्रों को नष्ट करने का आदेश ही दे डाला था।‘ गनीमत कि यह आदेश कार्यरूप में परिणित नहीं हुआ औैर भोरमदेव के मंदिर की मिथुन प्रतिमाओं के कारण ही उसकी प्रसिद्धि, मिनी खजुराहो या छत्तीसगढ़ का खजुराहो के रूप में हुई। एक अन्य महत्वपूर्ण उल्लेख है कि शांति निकेतन में हिन्दी अध्यापक के रूप में कार्य करने के लिए उन्हें, प्रयाग के पं. रामनरेश त्रिपाठी का तार मिला था, किंतु स्वास्थ्य संबंधी तथा पारिवारिक समस्याओं के कारण उन्होंने असमर्थता व्यक्त की। ‘कालांतर में बनारसीदास चतुर्वेदी शांति निकेतन में प्रथम हिन्दी अध्यापक हुए। बाद में पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी उनके उत्तराधिकारी हुए।‘ 1939 के त्रिपुरी कांग्रेस से संबंधित एक रोचक और महत्वपूर्ण उल्लेख यहां है।

जानकारी मिलती है कि पं. लोचन प्रसाद पांडेय जी की जन्मशती आयोजन समिति ने तय किया था कि उनके पुरातत्व पक्षों का संकलन और प्रकाशन पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर द्वारा किया जाएगा, जिसके अनुरूप 1988 में ‘कोसल कौमुदी‘ का प्रकाशन में हुआ। और उनके साहित्यिक अवदान तथा व्यक्तिगत पक्षों पर गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर द्वारा प्रकाशन किया जाएगा, इस क्रम में ‘समय की शिला पर ....‘ (पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय की आत्मकथा)का प्रकाशन, उनकी 110 वीं जयंती पर पर स्मरणांजलि, 4 जनवरी 1997 को प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में आयोजन समिति या ऐसे किसी निर्णय का उल्लेख तो नहीं है किंतु भूमिका में कहा गया है- ‘कौशल कौमुदी‘ का प्रकाशन कर रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर ने पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय के पुरातात्विक तथा इन्डोलॉजी सम्बन्धी कार्य को सुधी पाठकों तक पहुंचाया था।

पं. लोचनप्रसाद पाण्डेय की आत्मकथा उनकी हस्तलिखित अंग्रेजी पांडुलिपि, जिसका हिंदी में शाब्दिक अनुवाद उनके ज्येष्ठ पुत्र श्री प्यारेलाल पांडेय द्वारा किया गया था, उसका यह हिन्दी भावानुवाद ‘समय की शिला पर‘ उनके ‘साहित्यकार‘ से पाठकों का साक्षात्कार करायेगा, उनकी समाज सापेक्षता का परिचय देगा। यह प्रकाशन गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर के तत्कालीन कुलपति श्री रामकृपाल सिंह की अगुवाई में, डॉ. बी.एम. मुखर्जी, प्रो. सरोजकुमार मिश्र, प्रो. डी.एस. बल, प्रो. हेमलता महिस्वर के संपादन में हुआ था। इसके लिए सामग्री संकलन विनोद कुमार पाण्डेय ने तथा अनुवाद ईश्वरशरण पाण्डेय व हेमचंद्र पाण्डेय ने किया था।


यहां प्रस्तुत अंश ‘समय की शिला पर‘ पुस्तक का प्रथम अध्याय है।