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Friday, October 19, 2012

रविशंकर

छत्तीसगढ़ के सजग जोड़ा शहर दुर्ग-भिलाई से पत्रकार कानस्कर जी का फोन आया, रविशंकर जी नहीं रहे। मेरे कानों में कुछ देर स्मृति में दर्ज उनकी खिलखिलाहट बजती रही। उनसे आमने-सामने का संपर्क बहुत पुराना नहीं था, मगर अपेक्षा-रहित उनके भरोसे का संबल मुझे अनायास मिलता रहा। ऐसे निरपेक्ष विश्वासी कम ही होते हैं।
पं. रविशंकर शुक्‍ल
21.01.1927-10.10.2012
उनका निवास भिलाई के सेक्टर-5 में था। पहली बार उनके घर गया। बात होने लगी, 'घर ढूंढने में कोई अड़चन तो नहीं हुई', मैंने कहा- आपने अपने घर के रास्ते का नामकरण जीते-जी करा लिया है 'पं. रविशंकर शुक्ल पथ' (वस्तुतः उनके हमनाम पूर्व मुख्‍यमंत्री)। धीर-गंभीर, प्रशांत, लगभग भावहीन चेहरा और खोई सी आंखें, लेकिन देखकर सहज पता लग जाता कि उनके मन में लगातार कुछ चल रहा है, रचा जा रहा है, मेरा जवाब सुनकर, थोड़ा ठिठके फिर खिलखिला पड़े थे, बालसुलभ-दुर्लभ अविस्मरणीय हंसी। उदार इतने कि आपके रुचि की पुस्तक या ऐसी कोई वस्तु उनके पास हो तो सौंपने को उद्यत होते।

छत्तीसगढ़ का पारम्परिक नाचा-गम्मत पचासादि के दशक में 'लोकमंच' में बदलने लगा। श्वसुर डॉ. खूबचंद बघेल और पृथ्वी थियेटर के नाटकों से प्रेरित दाऊ रामचंद्र देशमुख ने 1950 में 'छत्तीसगढ़ी देहाती कला विकास मंडल' स्थापना की, आरंभिक दौर में नाटक मंचित करते, लेकिन बड़ी और विशेष उल्लेखनीय प्रस्तुति 26 और 27 फरवरी 1953 को पिनकापार में हुई। यही मंच ऐतिहासिक 'चंदैनी गोंदा' की पृष्ठभूमि बना, जिसकी स्थापना 7 नवंबर 1971 को हुई।

दाऊजी के शब्दों में- ''भटकने की नियति आरंभ हुई। रात-रात भर गाड़ी में, कड़कती हुई धूप में, धूल भरे कच्चे रास्तों पर भटकना, गांवों में कलाकार ढूंढना ...।'' प्रतिभाएं तलाशी-तराशी गईं। लाला फूलचंद, लक्ष्मण दास, ठाकुरराम, भुलवा, मदन, लालू जुड़े। बांसुरी-संतोष टांक, बेन्जो-गिरिजा सिन्हा, तबला-महेश ठाकुर, मोहरी-पंचराम देवदास पर्याय बनते गए। टेलर मास्टर, कवि-गायक लक्ष्मण मस्तुरिया, राजभारती आर्केस्ट्रा के गायक-अभिनेता भैयालाल हेड़उ, कविता हिरकने-वासनिक, केदार यादव, अनुराग ठाकुर साथ हुए।

दाऊजी और संगीतकार खुमान साव के साथ कवि-गायक रविशंकर शुक्ल की त्रयी, चंदैनी गोंदा की सूत्रधार बनी। शुक्ल जी का रचा शीर्षक गीत- 'देखो फुल गे, चन्दैनी गोंदा फुल गे, चन्दैनी गोंदा फुल गे। एखर रंग रूप हा जिउ मा, मिसरी साही घुर गे।' छत्तीसगढ़ी लोक-जीवन के मिठास का प्रतिनिधि गीत बन गया।

रविशंकर जी की ज्यादातर रचनाएं लोकप्रिय हुई, इनमें से कुछ खास, जिन्होंने सभी के कानों में मिसरी घोली- 'झिमिर झिमिर बरसे पानी। देखो रे संगी देखो रे साथी। चुचुवावत हे ओरवांती। मोती झरे खपरा छानी।' फगुनाही गीत है- 'फागुन आ गे, फागुन आ गे, फागुन आगे, संगी फागुन आ गे, देखौ फागुन आ गे। अइसन गीत सुनाइस कोइली, पवन घलो बइहा गे।' और 'धरती मइया सोन चिरइया। देस के भुइयां, मोर धरती मइया।' जैसा गौरव-बोध का गीत। उनके रचे-गाए गीत बनारस की सरगम रिकार्ड कंपनी से बने पर स्‍वाभिमानी ऐसे कि गीत के बोल पसंद न आए, तो गीत गाने के फायदेमंद प्रस्‍ताव की परवाह नहीं करते।

आपने 'तइहा के बात ले गे बइहा गा' / 'फुगड़ी फू रे फुगड़ी फू' / 'सुन सुवना' / 'घानी मुनी घोर दे, पानी दमोर दे' जैसी पारम्परिक पंक्तियों को ले कर भी कई गीत रचे। उनकी लोरी 'सुत जा ओ बेटी मोर, झन रो दुलौरिन मोर। फेर रतिहा पहाही, अउ होही बिहनिया। आही सुरुज के अंजोर। सुत जा ...' में रात के मीठे सपने नहीं, बल्कि सुबह की आस का अनूठा प्रयोग है।
निधन के तीन दिन पूर्व का चित्र
सम्‍मानित हुए और इस अवसर पर गीत भी सुनाया
चित्र सौजन्‍य - आरंभ वाले श्री संजीव तिवारी, भिलाई

उनका पहला संग्रह 'धरती मइय्या' 2005 में चौथेपन में आया। अपनी बात में उन्होंने लिखा- ''चन्दैनी गोंदा, दौना पान, नवा बिहान व अनेक साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थाओं के लिए मैंने गीत लिखे, किन्तु अपनी रचनाओं को पुस्तकाकार न दे सकने का दुख छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मेलन, दुर्ग द्वारा मानस भवन में अपने साहित्य सम्मान के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में मैंने व्यक्त किया था। छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति विभाग के छोटे आर्थिक सहयोग से इस दुख से मुक्ति पा सका और यह संग्रह प्रस्तुत कर सका।'' इसी पुस्तक का अंतिम गीत है-

चल मोर संगी उसल गे बजार।
का बेंचे तॅंय हा अउ का बिसाये।
बड़े मुंधेरहा ले लेड़गा तॅंय आये॥

पिंजरा के धंधाये सोन चिरइ उड़ि गे।
माटी के चोला हा माटी म मिलि गे॥

तॅंय बइठे का देखत हावस आंखी फार-फार।
चल मोर संगवारी उसल गे बजार॥

एक दिन आए, बताया, अस्पताल से आ रहे हैं। कहा- तबियत ठीक है, बस एक कागज बनवाने गया था, आप भी इसकी प्रति अपने पास रखें, बिना कागज देखे मैंने अफसरी सवाल किया, ये बताइए कि करना क्या है, उन्होंने कहा, कुछ नहीं, बस अपने पास रखिए। तब मैंने कागज पर नजर डाली, वह था वसीयतनामा (मृत्‍योपरांत शरीर दान का घोषणा पत्र), मेरे और कुछ कहने से पहले रवानगी को तैयार हो गए।

अंतिम दिनों में अशक्त होने पर भी श्री जी संस्था के लिए सक्रिय रहे। भिलाई आ कर उनसे मिलने की बात हुई तो पते के लिए खास किस्‍म का 'विजिटिंग कार्ड' दिया। छपे हुए पते को 'बदल गया है' कहते हुए काट कर सुधारा।

अब उनका पता फिर बदल गया, लेकिन अपने गीतों में वे अभी भी हम सब के साथ हैं।