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Monday, April 4, 2011

चाल-चलन

शास्‍त्र वचन चरैवेति, चलते रहो... को अपनाया गांधीजी ने, दाण्‍डी यात्रा की और उनकी चाल ने कितने ही कमाल किए। उन्‍होंने कहा- पैदल चलना कसरतों की रानी है। बाद में यही बात शुभचिंतकों ने कही, फिर डॉक्‍टरों ने। अब तो शुरू करना ही होगा, सोचकर लेने गए टी-शर्ट और जूता। लेकिन यह क्‍या, प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः। 'थीम टी-शर्ट' धारण करने से पहले ही किसी ने टोक दिया- सतजुगी चरैवेति और एकला चलो के दिन लद गए, अब एसी जिम के ट्रेडमिल पर वॉक का जमाना है। 'कीप वॉकिंग' का तर्ज, गांधी का ही क्‍यों न हो, अब 'राह पकड़ तू एक चला चल पा जाएगा मधुशाला' हो गया है। आप खु्द समझदार हैं, आगे चले चलिए ...

गांधी और नशे से जुड़ी एक और बात। छत्‍तीसगढ़ में गुणवत्‍तापूर्ण विदेशी शराब का व्‍यापार और सरकार के लिए राजस्‍व अर्जन के उद्देश्‍य से गठित इकाई का एक समाचार था- मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ स्टेट बेवरेजेस कार्पोरेशन के नशा मुक्त जीवन जीने का संदेश देने वाले पोस्टरों का विमोचन किया।

समाचार में आगे है- वाणिज्यिक कर मंत्री ने मुख्यमंत्री को बताया कि पिछले वित्तीय वर्ष में कार्पोरेशन को 29 करोड़ रूपए का लाभ अर्जित हुआ है। शराब से राजस्‍व/लाभ अर्जन वाली संस्‍था द्वारा नशा मुक्ति के विज्ञापन का विपर्यय, अनूठा प्रयास है।

इस इकाई का काम विदेशी शराब से जुड़ा है, नाम भी अंगरेजी है। इसका हिंदी नाम शायद है नहीं, होगा तो प्रचलित कतई नहीं। कारण जान पड़ता है कि दारू या शराब के बजाय मदिरा/मादक पेय/बेवरेज कहना शालीन लगता है, जैसे गुप्‍तांग और उससे जुड़ी क्रिया-प्रक्रियाओं के लिए ठेठ बानी को अश्‍लील, अमर्यादित और भदेस मान कर इसके बजाय संस्‍कृत, उर्दू या अंगरेजी के पर्यायवाची का इस्‍तेमाल किया जाता है।

टी-शर्ट से आगे बढ़े, चाल बहकी लगे तो माफ करें और आएं 'वॉक' के लिए जरूरी जूते पर। पढ़े-लिखों की तरह अब हम भी समझदार हो गए हैं। हां, बचपन की बात कुछ और थी, ज‍ब कहीं किसी कापी-किताब या कागज के टुकड़े पर भी पैर पड़ जाए, उस पर अक्षर हों, कुछ लिखा-छपा हो तो उसे माथे से लगाते थे। अब बचपना नहीं रहा हम पढ़े-लिखे समझदार हो गए, मुक्‍त कर लिया है अपने को इन रूढि़यों और संस्‍कारों से। देखिए यह जूता, चप्‍पल या कह लें पादुका और 'वेलकम' से स्‍वागत करता पांवदान।

बाल मन परेशान है, जो जूता पसंद आ रहा है, उस पर देश का नाम, अक्षर-भाषा और पूरी राष्‍ट्रीयता यानि हमारे राष्‍ट्र ध्‍वज जैसा ही तिरंगा भी बना है। फिर 'वेलकम' पांवदान और एक प्‍यूमा इंग्‍लैण्‍ड चप्‍पल ही नहीं यहां तो पूरी श्रृंखला है।

पढ़ाई-लिखाई सब जूती की नोक पर और सारी राष्‍ट्रीयता पैरों तले। समझदार मन ने जमा-नामे शुरू किया। क्‍या इंग्‍लैण्‍ड प्‍यूमा चप्‍पल हमारी कुंठा को राहत देने के लिए है। यह भी जुड़ रहा है कि प्‍यूमा, जर्मन बहुराष्‍ट्रीय कंपनी है। वही जर्मनी, जिसके इतिहास से आप परिचित हैं ही, याद कीजिए, जर्मन कुत्‍ते की नस्‍ल इंग्‍लैण्‍ड आई तो जर्मन शेफर्ड नाम तक से परहेज हुआ और नामकरण हुआ अलसेशियन।

समझदार मन, बाल मन को अपने साथ चला ले रहा है- सुबह-सबेरे पैदल चल कर स्‍वस्‍थ्‍य बने रहने के बजाय शहर के अंदेशे से काजी जी ही क्‍यों दुबले हों, पंडित विचार करें, क्‍या चरैवेति का अर्थ 'सब चलता है' नहीं निकाला जा सकता।

उत्‍पादों और उनमें समानता की जानकारी अनुपम से और कुछ चित्र गूगल से साभार

पुनश्‍चः

इस संदर्भ में मई 2011 के पहले सप्‍ताह में आस्‍ट्रेलियन फैशन वीक में लीसा बुर्क के लक्ष्‍मी चित्रांकित स्विम सूट प्रदर्शित करने की ताजी घटना, सन 2005 में राम के चित्र वाले मिनेली जूतों के विवाद की याद दिलाती है।