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Sunday, March 27, 2022

बिलासपुर की प्राचीन नवपुरी

सात जिलों वाले छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के पुरातात्विक स्थलों पर सन 1985 से 1997 तक, विभिन्न प्रयोजन हेतु जानकारियां तैयार की जाती रहीं। इस दौरान बिलासपुर के पुरातत्व कार्यालय में पदस्थ रहते हुए मुझे यह अवसर बार-बार मिला। इन्हीं में से एक यह तत्कालीन बिलासपुर जिले के नौ प्रमुख पुरातात्विक स्थलों की संक्षिप्त जानकारी यहां प्रस्तुत है-

1. अड़भार- बिलासपुर से लगभग 65 किलोमीटर दूर, सक्ती अनुविभाग में स्थित है। संभवतः इसी ग्राम को प्राचीन अभिलेखों में अष्टद्वार कहा गया है। स्थल पर 7-8 वीं सदी ईस्वी के स्थापत्य अवशेष विद्यमान है, जो मूलतः शिव मंदिर रहा होगा। पश्चिमाभिमुख यह शिव मंदिर अष्टकोणीय तारानुकृति तल-विन्यास वाला है, जिसमें प्रवेश हेतु दो द्वार अब भी विद्यमान है। प्रवेश द्वार-शाखाओं पर नाग तथा संभवतः गरुड़ और सिरदल पर कार्तिकेय व उमा-महेश का अंकन है। मंदिर परिसर में अत्यंत आकर्षक अष्टभुजी महिषमर्दिनी तथा जैन तीर्थकर पार्श्वनाथ की प्रतिमाएं हैं साथ ही नंदी तथा अष्टभुजी नटराज शिव की भी प्रतिमा है, जो तत्कालीन कला-प्रतिमानों में प्रतिनिधि प्रतिमा के रुप में प्रस्तुत की जा सकती है। स्थल से ऐतिहासिक महत्व को विभिन्न शिलालेख, ताम्रपत्र व कलात्मक प्रतिमाएं प्रकाश में आई है। प्राचीन मृत्तिका-दुर्ग अथवा धूलि-दुर्ग (mud fort) की रुपरेखा भी अवशिष्ट है। समीप ही दमउदहरा नाम से प्रसिद्ध तीर्थस्थल ऋषभतीर्थ 'गुंजी' है, जो महत्वपूर्ण धार्मिक, ऐतिहासिक और प्राकृतिक दृश्यावली सम्पन्न स्थल है।

2. खरौद-शिवरीनारायण- खरौद, बिलासपुर से लगभग 63 किलोमीटर दूर, जांजगीर अनुविभाग में स्थित है। यह स्थान विगत सदियों से 'परगना' के रुप में प्रशासनिक इकाई का मुख्यालय रहा है। यहां 7-8 वीं सदी ईस्वी के ईंट-निर्मित मंदिर विद्यमान है, जिनमें इन्दल देउल और शबरी मंदिर मुख्य है। दोनों मंदिर तारकानुकृति तल-विन्यास पर निर्मित है। इन्दल देउल के पाषाण निर्मित प्रवेश द्वार पर पूरे शाख के आकार की नदी देवियाँ गंगा, यमुना उल्लेखनीय है। शबरी मंदिर के प्रवेश द्वार पर नाग तथा गरुड़ का क्षेत्रीय परम्परागत अंकन है। शबरी मंदिर के मंडप की प्रतिमाएं तथा स्तंभ भी महत्वपूर्ण हैं एक अन्य प्राचीन मंदिर लक्ष्मणेश्वर है, जिसे विशेष धार्मिक मान्यता प्राप्त है। इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना और शैव-द्वारपाल है। मंदिर के स्तंभों पर रामकथा का अंकन है तथा मंडप की भित्तियों पर दो प्राचीन महत्वपूर्ण शिलालेख जड़े हैं। मंदिर परिसर में कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रतिमाओं के साथ अभिलिखित राजपुरुष की प्रतिमा भी विद्यमान है। ग्राम में अन्य प्रतिमाएं तथा स्थापत्य अवशेष भी प्राप्त हुए है तथा अवशिष्ट धूलि-दुर्ग के लक्षण परिखा (खाई) के रुप में विद्यमान है।

संलग्न स्थल शिवरीनारायण, महानदी-शिवनाथ-जोंक संगम त्रिवेणी के निकट स्थित, छत्तीसगढ़ का प्रमुख वैष्णव केंद्र है। यहां 11-12 वीं सदी ईस्वी के नर-नारायण मंदिर, केशवनारायण मंदिर, चंद्रचूड़ मंदिर सहित पिछली सदी का राम-जानकी मंदिर है। प्राचीन शिलालेख और ताम्रपत्र भी प्राप्त हुए हैं। सन 1891 तक यह तहसील मुख्यालय रहा साथ ही जगन्नाथ पुरी से संबद्धता और माघ पूर्णिमा पर मेला भी उल्लेखनीय है।

3. जांजगीर- बिलासपुर से लगभग 58 किलोमीटर दूर, अनुविभाग मुख्यालय है। यह स्थल रत्नपुर शाखा के कलचुरि शासक जाजल्लदेव प्रथम द्वारा बसाया गया माना जाता है। यहां 11-12 वीं सदी ईस्वी के दो मंदिर विशेष उल्लेखनीय है। शिखर-विहीन विष्णु मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से पूर्ण विकसित एवं तत्कालीन कला का प्रतिनिधि उदाहरण है। मानवाकार प्रतिमाओं युक्त विशाल जगती (चबूतरे) पर मंदिर निर्मित है। जगती पर देव प्रतिमाओं के साथ कृष्ण-कथा एवं राम-कथा के कुछ अत्यंत रोचक दृश्यों का महत्वपूर्ण अंकन है। पूर्वाभिमुख मंदिर की बाहरी दीवार पर विष्णु के अवतार, ब्रह्मा, सूर्य, शिव, देवियाँ, अष्ट दिक्पाल व विभिन्न मुद्राओं में योगियों के साथ अप्सरा तथा व्याल प्रतिमाएं है। प्रवेश द्वार पर त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नवग्रह, त्रैलोक्य भ्रमण विष्णु, नदी देवी, द्वारपाल तथा अर्द्ध स्तंभों पर कुबेर अंकित है। अन्य मंदिर, शिव मंदिर है, जिसका मूल स्वरूप नवीनीकरण से प्रभावित है, किन्तु प्रवेश द्वार यथावत है। यहां सिरदल के मध्य में नंदी सहित चतुर्भुजी शिव का कलात्मक रुपायन है। नदी देवियों के साथ उभय पार्श्वों में द्वारपाल प्रतिमाएं है। बाहरी दीवार पर अपेक्षाकृत कम संख्या में किन्तु शास्त्रीय व कलात्मक सूर्य, हरिहर-हिरण्यगर्भ, शिव-नटराज, गणेश, सरस्वती आदि प्रतिमाएं है।

4. ताला- बिलासपुर से लगभग 30 किलोमीटर दूर ग्राम अमेरीकांपा में स्थित स्थल है। शिवनाथ और मनियारी नदी के संगम के निकट 5-6 वीं सदी ईस्वी के दो प्राचीन मंदिर अवशेष है, जिन्हें देवरानी-जिठानी नाम से जाना जाता है। विस्तृत जगती पर निर्मित पूर्वाभिमुख देवरानी मंदिर शिखर विहीन है किंतु विशाल आकार के शिलाखंडों से निर्मित गर्भगृह, अन्तराल-मण्डप, अर्द्धमण्डप, सोपानक्रम तथा प्रतिमाओं की विशिष्टता रोचक है। प्रवेश द्वार के भीतरी पार्श्वों पर उमा-महेश्वर, शिव-पार्वती द्यूत-क्रीड़ा, भगीरथ-अनुगामिनी गंगा आदि अंकन आकर्षक और सजीव है। द्वार-शाखा की जालिकावत् लता-वल्लरी और पत्र-पुष्पीय संयोजन का कीर्तिमुख अंकन विशेष उल्लेखनीय है। मंदिर परिसर में मयूररूढ़ कार्तिकेय, नृत्यमग्न शिवगण, मेषमुखगण, उपासक तथा विश्व प्रसिद्ध विशालकाय रुद्र-शिव प्रतिमा विशिष्ट है। दक्षिणाभिमुख जिठानी मंदिर में पूर्व तथा पश्चिम सोपानक्रम से भी प्रवेश की व्यवस्था है। मंदिर का तल-विन्यास अत्यंत विशिष्ट प्रकार का है। यहां से कार्तिकेय, शिव-मस्तक, वरुण, अर्द्धनारीश्वर-वक्ष, कृश उपासक शीर्ष, नंदिकेश्वर मुख, गौरी और विष्णु फलक तथा मंदिर स्थापत्य-खंडों पर कार्तिकेय, गणेश, शिवलीला प्रसंगों के साथ नंदी और शिवगण का अंकन भी उपलब्ध हुआ है। यहीं से शरभपुरीय शासक प्रसन्नमात्र का रजत सिक्का तथा कलचुरि शासकों के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। स्थल पर स्थानीय-संग्रह में भी पुरावशेष एकत्र कर रखे गए हैं।

5. तुमान- बिलासपुर से लगभग 95 किलोमीटर दूर कटघोरा अनुविभाग में स्थित है। यह स्थल इस क्षेत्र के कलचुरियों की आरंभिक राजधानी रही है। यहाँ पश्चिमाभिमुख शिव मंदिर, लगभग 11 वीं सदी ईस्वी का स्थापत्य उदाहरण है। भू-सतह पर आधारित मूल संरचना से उन्नत तथा विशाल मंडप संलग्न है। खुले मंडप में पहुंचने के लिए पश्चिम, उत्तर व दक्षिण तीनों दिशाओं में सोपान व्यवस्था है। प्रवेश द्वार में सिरदल पर शिव का अंकन है, किन्तु शाखाओं पर विष्णु के दशावतारों को प्रदर्शित किया जाना रोचक है। प्रवेश द्वार पर नदी देवियों के साथ परवर्ती परंपरा के दो-दो द्वारपालों से भिन्न मात्र वीरभद्र और भैरव की प्रतिमाएं है। स्थानीय संग्रह में नंदी, नंदिकेश्वर, माता-शिशु, नटराज, उमा-महेश्वर आदि प्रतिमाएं है। मंदिर के चतुर्दिक प्राचीन टीले हैं तथा सतखण्डा क्षेत्र में भी पुरावशेषों के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। स्थल का प्राचीन नाम तुम्माण लगभग प्रत्येक कलचुरि अभिलेखों में प्राप्त होता है। प्रतिमाओं के संग्रह और प्रदर्शन की व्यवस्था भी स्थल पर है।

6. पाली- बिलासपुर से लगभग 50 किलोमीटर दूर, कटघोरा अनुविभाग में स्थित है। यहां पूर्वाभिमुख महादेव मंदिर कलचुरि स्थापत्य शैली के महत्वपूर्ण स्मारक के रुप में विद्यमान है। मंदिर बाणवंशी शासक मल्लदेव के पुत्र विक्रमादित्य द्वारा निर्मित कराये जाने की जानकारी प्रवेश द्वार में सिरदल पर अभिलिखित है। कलचुरि शासक जाजल्लदेव प्रथम के काल में मंदिर का पुनरुद्धार हुआ। मंदिर की बाहरी दीवार पर नटराज, अंधकासुर वध, गजासुरवध, हरिहर, अर्द्धनारीश्वर, कार्तिकेय, सूर्य, नर्तकी, योगी, अष्ट दिक्पाल के साथ विविध प्रकार के व्याल तथा मिथुन प्रतिमाएं सज्जित है। गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना, शैव, द्वारपाल तथा द्वार-शाख पार्श्वों पर शिव-पार्वती लीला और उपासना के दृश्य हैं। मंदिर में बहुलिखित ‘मगरध्वज जोगी 700‘, भी अभिलिखित है।

7. मल्हार- बिलासपुर से लगभग 33 किलोमीटर दूर, बिलासपुर अनुविभाग में स्थित है। यह स्थल जिले और अंचल का प्रमुख पुरातात्त्विक स्थल है। यहाँ ईस्वी पूर्व 7-8 वीं सदी से मुगल काल तक निरंतर कालक्रम में स्थापत्य अवशेष, प्रतिमाएं, शिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्के, मुहर, मृदभाण्ड, मनके, मृणमूर्तियाँ आदि विविध सामग्रियां बड़ी मात्रा में प्राप्त हुई है। देउर मंदिर विशाल संरचना है। पश्चिमाभिमुख मंदिर के द्वार पार्श्वों में शिवलीला, गजासुरवध, शिव-विवाह तथा उमा महेश्वर का अत्यंत मनोहारी और बारीकी से अंकन हुआ है। इस मंदिर का काल 7-8 वीं सदी ईस्वी माना गया है। 11-12 वीं सदी ईस्वी के दो मंदिर है। इनमें केदारेश्वर अथवा पातालेश्वर अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित अवस्था में है और डिडिनेश्वरी मंदिर का अधिष्ठान भाग, अंशतः तथा मंडप व अर्द्ध मंडप मात्र तल विन्यास में ही दृष्टव्य है। डिडिनेश्वरी मंदिर में काले पत्थर की अत्यंत कलात्मक प्रसिद्ध प्रतिमा 'डिडिन दाई' के रुप में पूजित है। केदारेश्वर मंदिर के मंडप में भी तीन दिशाओं से प्रवेश की व्यवस्था है। शिखर विहीन गर्भगृह में काले पत्थर की लिंग-पीठिका के त्रिकोणीय विवर में लिंग स्थापना है। द्वार शाखों के भीतरी पाश्वों पर द्यूत-प्रसंग, गणेश-वैनायिकी, नंदी पर नृत्त शिव, रेखांकित वीणाधर शिव, शिव-विवाह, उमा-महेश्वर, नृत्त गणेश, अंधकासुर वध आदि उत्कीर्ण है। अभिलिखित विष्णु प्रतिमा, मेकल पाण्डववंशी ताम्रपत्र, प्रसन्नमात्र का ताम्र सिक्का आदि पुरावशेष, विशेष उल्लेखनीय हैं। यहां भी धूलि दुर्ग का अस्तित्व है, जिसमें विभिन्न पुरावशेष विद्यमान होने की जानकारी मिलती है। पातालेश्वर मंदिर परिसर का स्थानीय संग्रह भी विशेष उल्लेखनीय है।

8. रतनपुर- जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर, बिलासपुर अनुविभाग में स्थित है। यह स्थल सुदीर्घ अवधि तक इस अंचल का प्रशासनिक मुख्यालय रहा है। रतनपुर और निकटवर्ती ग्रामों, यथा जूना शहर में कलचुरि और मराठा शासकों से सम्बंधित अवशेष आज भी विद्यमान है। महामाया मंदिर की ख्याति सिद्ध क्षेत्र के रुप में है जिसके प्रवेश द्वार पर परवर्ती कलचुरि शासक वाहर साय का शिलालेख है। मंदिर परिसर में विविध देव प्रतिमाएं हैं। कण्ठी-देउल भी परवर्ती काल की संरचना है जिसमें शाल भंजिका, राजपुरुष, लिंगोद्भव कथानक आदि प्रतिमाएं लाकर जड़ी गई हैं। मराठाकालीन स्मारक रामटेकरी मंदिर, प्राचीन किला-अवशेष तथा जूना शहर में कथित सतखंडा महल, बावली आदि विद्यमान है। रतनपुर से अत्यंत महत्वपूर्ण कलचुरि शिलालेखों, प्रतिमाओं की प्राप्ति हुई है। यहां स्थानीय संग्रह भी दर्शनीय है।

9. चैतुरगढ़ (लाफा) - बिलासपुर से लगभग 82 किलोमीटर दूर, कटघोरा अनुविभाग में स्थित है। यहां पहाड़ी पर बना किला क्षेत्र के दुर्गमतम किलों में से एक माना जाता है। किले में प्रवेश के लिए तीन द्वार है। मुख्य प्रवेश द्वार गणेश द्वार से है। अन्य प्रवेश द्वारों पर सुरक्षा हेतु दोहरे दीवाल की व्यवस्था व देवकुलिकाओं में मातृका-देवियों की प्रतिमाएं है। पहाड़ी पर परवर्ती कलचुरि कालीन महामाया मंदिर है, जिसके गर्भगृह में महिषमर्दिनी प्रतिमा स्थापित है। गर्भगृह से संलग्न स्तंभ आधारित मण्डप है। यही पहाड़ी श्रृंखला एक छोटी नदी जटाशंकरी का उद्गम भी है। स्थल का प्राकृतिक दृश्य सौन्दर्य चित्ताकर्षक है।

Thursday, January 20, 2022

चैतुरगढ़

बिलासपुर-कटघोरा मार्ग पर ग्राम पाली से बांये व्यपवर्तन से ग्राम लाफा होकर पहाड़ी के तल पर स्थित ग्राम बगदरा से नव-निर्मित सीढ़ियों के द्वारा चैतुरगढ़ पहुंचा जा सकता है। बिलासपुर से चैतुरगढ़ की कुल दूरी लगभग 80 किलोमीटर है। इस प्राचीन गढ़ को अत्यंत सुदृढ़ किला माना जाता है। पहाड़ी पर प्राकृतिक गुफा को महादेव खोला या शंकरखोला कहते हैं, जो एक छोटी नदी जटाशंकरी (अहिरन) का उद्गम है। यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अधीन संरक्षित है।

पहाड़ी के ऊपर संरचनाओं और पुरावशेषों की अधिकतम प्राचीनता लगभग 11-12 वीं सदी ई. है। किले में प्रवेश के लिए गणेश द्वार, देवी द्वार और हुंकरा द्वार है। इन पाषाण निर्मित दोहरे द्वारों के साथ प्राचीन कलचुरिकालीन प्रतिमाएं आलों में रखी हुई हैं। पहाड़ी के चारों ओर पत्थर से निर्मित प्राकार के अवशेष भी विद्यमान है।

इस गढ़ में गणेश द्वार के निकट देवी का मंदिर है, जिसके गर्भगृह में महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है। गर्भगृह से संलग्न पाषाण स्तंभों पर आधारित मण्डप है। मण्डप में पहुंचने के लिए सोपान क्रम की व्यवस्था है। मंदिर की बाहरी दीवार सादी है। पहाड़ी पर तीन तालाब है किन्तु मंदिर से संलग्न तालाब ही जल से परिपूर्ण रहता है। मंदिर का काल लगभग 15-16 वीं सदी ईस्वी है। नवरात्रि के अवसर पर दीप प्रज्वलन एवं विशेष पूजा अर्चना की जाती है।

उक्त संक्षिप्त परिचय लाफागढ़ का है। छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक धरोहर श्रृंखला के लिए मेरे द्वारा सन 1988 में तैयार पूरा आलेख इस प्रकार-

मानव जाति के मनोभूगोल के विकास में पृथ्वी के धरातल पर बनी उॅंची-नीची, छोटी-बड़ी पर्वत-श्रेणियों की भूमिका महत्वपूर्ण है। पर्वत-श्रेणियों की उपस्थिति से दूरी के साथ निकटता और भय के साथ सुरक्षा की भावना आदिकाल से ही मानव मन में बनती-विकसित होती रही है। आदि-मानव का तो निवास ही शैल-गह्वर रहे, तब से ही पहाड़ियों-पर्वत श्रेणियों की सुरक्षात्मक उपयोगिता की प्रबल धारणा मानव मन में उपजी। मानव में सामाजिक भावना के साथ-साथ केन्द्रीय नियामक शक्ति की आवश्यकता से राजसत्ता का विकास हुआ और व्यवस्थित राजनैतिक स्थिति के प्रादर्शों के प्रारंभिक विवरणों में कौटिल्य का ‘गिरिदुर्ग’, ऐसी ही सोच के विकसित परिणाम थे, जिनका राजसत्ता में महत्वपूर्ण स्थान रहा। शैलाश्रयों के शैलचित्र, शिलोत्खात स्थापत्य और पर्वतों पर दुर्गीकरण, पर्वत-श्रृंखलाओं पर अंकित मानव मनःस्थितियों के चित्रण हैं, हमारे देश में उपलब्ध ऐसे अनेक स्थल जीवन-चर्या में सन्निहित कला, धर्म और सुरक्षात्मक प्रयासों के प्रमाण हैं।

बिलासपुर जिले के कटघोरा तहसील की चैतुरगढ़ या चिताउरगढ़ पहाड़ी इसी संदर्भ में चर्चित है। लाफा जमींदारी में स्थित होने के कारण लाफागढ़ के नाम से प्रसिद्ध यह पहाड़ी जिले के महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल पाली से लाफा होते पहुंचा जा सकता है। मध्ययुगीन क्षेत्रीय इतिहास को निर्धारित करने वाले राजवंश- कलचुरियों का इस क्षेत्र में पहला पड़ाव तुम्माण भी लाफागढ़ से अधिक दूर नहीं है। समुद्र तल से 3410 फुट उंचे पहाड़ी शिखर के चतुर्दिक लगभग 4 किलोमीटर उत्तर-दक्षिण और डेढ़ किलोमीटर पूर्व-पश्चिम लम्बे-चौड़े पठार की भौगोलिक अनुरूपताओं ने तत्कालीन क्षेत्रीय राजवंश को इस ओर आकृष्ट किया, फलस्वरूप यह स्थल इतिहास में सुरक्षित दुर्ग और कला-धर्म केन्द्र के रूप में हमारी धरोहर बनकर विद्यमान है।

लाफा से किले की दूरी अधिक नहीं है, किन्तु पहाड़ी का यह दक्षिण-पश्चिम हिस्सा खड़ी चिनाई से सपाट दीवार के मानिन्द है अतः इस ओर से किले पर प्रवेश संभव नहीं हो पाता। लाफा से आगे उत्तर की ओर बगदरा (बघधरा) पहुंचना होता है। बगदरा से पहाड़ी के उत्तर-पश्चिम हिस्से पर स्थित सिंह द्वार पहुॅंचा जाता है। यह रास्ता अत्यंत दुर्गम, अनियमित पगडंडी है, जिस पर स्थानीय पथ-प्रदर्शक के बिना चलना दुष्कर है। जंगल-झाड़ी के बीच से होकर गुजरने वाले इस मार्ग का अंतिम हिस्सा अत्यधिक कठिन तथा कुछ दूर सीधी चढ़ाई वाला है। चढ़ाई का अधिकांश मार्ग किले की दीवार से लगा हुआ है। यह संकरा रास्ता वस्तुतः पहाड़ी की खड़ी चिनाई और दीवार के बीच का ही संक्षिप्त भाग है, जिसमें से गुजरने पर दीवार या उसकी ओट से आसानी से निगाह रखी जा सकती है।

इस किले पर पहुंच की कठिनाई को देखकर लाफागढ़ पहुॅंचे दो अलग-अलग अंगरेज अधिकारियों, कैप्टन जे. फारसाइथ और जे.डी. बेग्लर ने इस दुर्गमता की विशेष रूप से चर्चा की है। पुरातत्व विभाग के अधिकारी बेग्लर के अनुसार ‘इस सत्र में मेरे द्वारा देखा गया यह अधिकतम मजबूत प्राकृतिक किला है।’ उन्होंने भारत के सुदृढ़तम किलों में भी लाफागढ़ की गणना की है। इन अंगरेज अधिकारियों की रपटों से यह स्पष्ट होता है कि किले की संरचनाएं तभी जर्जर होकर ध्वस्त हो रही थी। वर्तमान स्थिति में किले की दीवार तथा द्वार अधिकांशतः भग्न है। संरचना की दृष्टि से यहॉं कंकड़-बजरी तथा कहीं-कहीं ठोस पाषाण-खंडों से निर्मित दीवार के अवशेष, सिंह अथवा गणेश द्वार, मनका दाई द्वार और हुंकरा द्वार नामक तीन प्रवेश एवं महामाया मंदिर ही शेष हैं। रक्षा-भित्तियां अनियमित पहाड़ी कगार के अनुक्रम में निर्मित हैं।

रक्षा-भित्तियों का विस्तार पहाड़ी पर स्थित किले की दुरूह पहुंच को देखते हुए अधिक उपयोगी नहीं जान पड़ता। रक्षा-भित्तियां बजरीले कंकड़ और चूना-गारे से निर्मित है, किन्तु प्रवेश द्वारों की संरचना लगभग समान है। विशाल और चौड़े किन्तु वर्तमान में ध्वस्त, द्वार संयोजन दोहरे हैं, जिनके दोनों पार्श्वों पर रक्षक गृह बनाये गये थे। रक्षक-गृह, शैव तथा देवी उपासना कक्ष के रूप में भी प्रयुक्त रहे होंगे, यह तथ्य द्वारों के साथ प्राप्त होने वाले प्रतिमा खण्डों, देव-कोष्ठकों में स्थापित प्रतिमाओं और स्तंभयुक्त मंडप तुल्य योजना वाली संरचना से स्पष्ट होता है। भूरे बलुआ पत्थर से निर्मित ये स्तंभ लगभग सादे और चौकोर हैं। द्वारों पर प्रवेश करने पर 90 अंश कोण पर मोड़ सुरक्षात्मक दृष्टि से उपयोगी योजना है। द्वारों का निर्माण भी ठोस पाषाण खंडों के संयोजन से किया गया है।

प्रवेश द्वारों में विभिन्न प्रतिमाएं दृष्टव्य हैं। सिंह द्वार से सम्बद्ध प्रतिमाओं में गणेश, पशुमुखी नारी तथा उत्कटासन में स्थित एक अन्य नारी प्रतिमा है। मनका या मनिया दाई द्वार में दोहरे पद्मपीठ पर पद्मासन में स्थित चतुर्भुजी अत्यंत अलंकृत देवी प्रतिमा है। हुंकरा द्वार की विभिन्न प्रतिमाओं में मातृकाएं हैं। षट्भुजी वैष्णवी पद्मपीठ पर ललितासन में स्थित है। भुजाएं वरद मुद्रा तथा चक्रयुक्त हैं। एक अन्य देवी प्रतिमा जटामुकुट तथा कपालधारी प्रदर्शित है। इन्द्राणी की चतुर्भुजी प्रतिमा की अवशिष्ट भुजाएं वरद मुद्रा व सनाल पद्मयुक्त है। पादपीठ पर गज वाहन अंकित है। ब्रह्माणी की प्रतिमा त्रिमुखी है तथा पादपीठ पर हंस वाहन अंकित है। वराहमुखी वाराही जटामुकुट युक्त ललितासन में स्थित प्रदर्शित है।

किले में विशेष उल्लेखनीय संरचना महामाया मंदिर है। मंदिर पहाड़ी के पश्चिम भाग में सिंह द्वार के समीप स्थित है। पूर्वाभिमुख मंदिर नरम बलुआ पत्थर से निर्मित है। ऊंची जगती पर निर्मित मंदिर में पहुंचने के लिए सोपानक्रम की व्यवस्था है। अर्द्धमण्डप, मंडप, अंतराल और गर्भगृह युक्त मंदिर की संरचना शास्त्रीय दृष्टि से सादी और सपाट है। मंडप में पांच पंक्तियों में पांच-पांच स्तंभ व अर्द्धस्तंभ हैं। गर्भगृह के प्रवेशद्वार में सिरदल पर गणेश अंकित है। वाह्य भित्ति में सादे अधिष्ठान और जंघा पर शिखर है। गर्भगृह की प्रतिमा उल्लेखनीय है जिसमें दुर्गा के महिषासुर मर्दन का रूपांकन है। देवी की प्रतिमा द्वादशभुजी है। दाहिनी भुजाओं में क्रमशः परशु, त्रिशूल, खेटक, खट्वांग आदि आयुध हैं, बायीं भुजाओं का अधिकांश खंडित है। देवी के पैरों के निकट महिषासुर का अंकन है। वाहन सिंह भी महिष पर आक्रमणरत प्रदर्शित है। मंदिर के निकट ही ‘पाट तालाब’ है। इतनी ऊंचाई पर भी इस तालाब में सदैव जलराशि बनी रहती है। पहाड़ी पर दो अन्य तालाब भी थे, जो अब सूख गये हैं।

पुरातात्विक महत्व के इस स्थल-लाफागढ़ का निरपेक्ष काल निर्धारण, साक्ष्यों के अभाव में, संभव नहीं है। तर्क-प्रमाण के आधार पर स्थल 14-15 वीं सदी ईस्वी का प्रतीत होता है। महामाया मंदिर चूना गारा युक्त भित्तियां व कुछ कलाकृतियां निश्चय ही इस काल से पूर्व की नहीं है। देव प्रतिमाएं अवश्य इस स्थापना में संदेह पैदा करती है, किन्तु प्रतिमाओं और अवशेषों का स्थान परिवर्तन की संभावना से यह संदेह निर्मूल हो जाता है। ऐसा भी संभव है कि 10-11 सदी ईस्वी में कलचुरियों के आरंभ के साथ इस स्थल पर दुर्ग स्थापना हुई हो। अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा तैयार पारम्परिक सूची में लाफागढ़ का निर्माता पृथ्वीदेव को बताया जाता है। दन्तकथाओं से भी ऐसा ही पता चलता है किन्तु इसकी आवश्यकता न होने पर, साथ ही राजधानी रत्नपुर स्थानान्तरित हो जाने से किले का रख-रखाव नहीं हो पाया होगा और 14-15वीं शताब्दी में संभावित मुस्लिम आक्रमणों के भय से इसे पुनर्निर्मित किया गया हो। मुस्लिम आक्रमणों के प्रभाव का इतिहास इस क्षेत्र के अन्य गिरिदुर्ग गढ़कोसंगा अर्थात कोसईगढ़ से सम्बद्ध है, अतः लाफागढ़ की ऐतिहासिकता में भी इन्हीं तत्वों की संभावना प्रकट की जा सकती है। इस कथित सुदृढ़तम दुर्ग के साथ शौर्य एवं वीरता को कोई ऐतिहासिक तथ्य प्राप्त नहीं होता।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक लाफागढ़ दुरूह होने के कारण आवागमन में आसान नहीं है। सघन साल वन से आच्छादित लाफागढ़ पहाड़ी के चतुर्दिक वन्य पशु-पक्षी भी सहज दृष्टिगोचर होते हैं। पुरातत्वीय महत्व के साथ नैसर्गिक सौंदर्य, पर्यटन की दृष्टि से स्थल को प्राप्त प्राकृतिक वरदान है। आवागमन व्यवस्था व अन्य सुविधाएं विकसित कर विद्यार्थियों एवं पर्यटकों का सहज आकर्षित किया जा सकता है।

Tuesday, January 18, 2022

लाफा-चैतुरगढ़ ट्रेक

यूथ हास्टल से मेरा परिचय 1980-81 में भोपाल में हुआ और तभी मैंने वाईएचआई, यूथ हास्टल्स एसोसिएशन आफ इंडिया की आजीवन सदस्यता ले ली थी। लगभग 15 साल बाद यात्रा के दौरान पुरी, तिरुपति और चाणक्यपुरी, दिल्ली में हास्टल में आसरा लिया और बिलासपुर के आसपास लाफा-चैतुरगढ़ तथा दलहा पहाड़, अकलतरा के ट्रेक के आयोजन में शामिल रहा। लाफा ट्रेक का संस्मरण तब 13 जनवरी 1996 के दैनिक समाचार पत्र ‘नवभारत‘, बिलासपुर में इस प्रकार प्रकाशित हुआ था- 

बंद गुफा की दन्तकथा सुनते, पहाड़ी पर इसके चैत्याकार कटाव को देखते, लाफागढ़ के तिलस्म को भेदने की इच्छा-उत्कंठा और सीधी खड़ी चुनौतीपूर्ण चढ़ाई पर आगे बढ़ने का रोमांच ही उस उत्साह का संचार करता है, जिसके सहारे कदम आगे बढ़ते हैं और पहाड़ी की किलोमीटर भर ऊंची दूरी ‘सर‘ होने लगती है। दिसम्बर के सुबह की रेशमी धूप की रोशनी भी मुलायम थी। स्कूली बच्चों का अदम्य उत्साह और ग्रामवासियों का हैरत भरा सवाल ‘पैदल जायेंगे..?‘ गर्मजोशी से भरा था। श्रीमती रत्ना राय बुखार से तपती दवा खाकर स्वस्थ्य बने रहने का प्रयास कर रही थीं। सैंतालीस वर्षीय श्री रंजन राय, दमा से पीड़ित, एस्थिलीन लिये और श्री विवेक जोगलेकर उच्च रक्तचाप के मरीज। इन सभी ने अपनी व्यथा, अपने तक सीमित रखी और अपना उल्लास खुले मन से सब बांटते रहे, यात्रा शुरू हुई। 

उपरोक्त पंक्तियाँ किसी कथा की पृष्ठभूमि नहीं वरन इसी शहर की एक संस्था यूथ हास्टल द्वारा आयोजित, स्थानीय स्तर पर मैकल (लाफागढ़) ट्रेकिंग ‘95 से संबद्ध है। 

चैतुरगढ़ या चितूरगढ़ के नाम से प्रसिद्ध यह स्थल, बिलासपुर से पाली-लाफा होकर लगभग 82 किलोमीटर दूर स्थित है। यह स्थान पुरातात्विक उपलब्धियों व प्राकृतिक, धार्मिक कारणों से भी विख्यात है। लगभग एक किलोमीटर (3244 फीट) ऊंची तथा 15 वर्ग किलोमीटर विस्तृत, इस पहाड़ी पर बारहवीं से सोलहवीं सदी ईस्वी तक के कलावशेष विद्यमान हैं। इस सीधी खड़ी चढ़ाई वाली पहाड़ी ने पिछले सदी के अंग्रेज पुराविद् मि. बेग्लर तथा वन संरक्षक कैप्टन जे. फारसिथ को आकर्षित किया था। अनियमित चारदीवारी तथा हुंकरा, मनका व सिंहद्वार युक्त पहाड़ी पर महिषासुरमर्दिनी का एक प्राचीन मंदिर तथा तालाब है। लाफागढ़, गढ़ा मंडला के गोंड राजाओं रतनपुर के कलचुरि शासकों की सूची में रहा है और परवर्तीकाल में इस पर लाफा के जमींदारों का पूर्ण आधिपत्य हो गया। यह पहाड़ी प्राकृतिक सौंदर्य औषधिगुण युक्त वृक्षों, पशु-पक्षी संपदा के साथ ही एक छोटी नदी जटाशंकर या अहिरन का उद्गम स्थल होने के कारण भी प्रसिद्ध है। 

गत वर्ष मई माह में यूथ हास्टल के निरीक्षण में दल ने ट्रेकिंग के लिए लाफागढ़ की यात्रा की थी तथा पिछले दिनों 24 व 25 दिसम्बर को यूथ हास्टल की बिलासपुर इकाई द्वारा विधिवत् प्रथम ट्रेकिंग का आयोजन किया गया। यह संस्था, युवक-युवतियों तथा युवा-भावना युक्त व्यक्तियों को, स्वच्छंद किन्तु अनुशासित भ्रमण के लिए प्रेरित कर, इस हेतु आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था करता है ताकि व्यक्ति, निजी शारीरिक क्षमता के साथ प्रकृति, पर्यावरण, इतिहास और संस्कृति का ज्ञान-मधु एकत्र कर, जागरूक हो सकें। यूथ हास्टल द्वारा आयोजित ट्रेकिंग तथा अन्य कार्यक्रमों के लिए केन्द्र शासन, राज्य शासन, बैंकिंग सेवा आदि के कर्मचारियों को विशेष आकस्मिक अवकाश की पात्रता देता है और प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र भी दिये जाते हैं। बिलासपुर इकाई के पदाधिकारियों और सदस्यों ने गत वर्षों में यूथ हास्टल एसोसिएशन द्वारा आयोजित विभिन्न राष्ट्रीय ट्रेकिंग कार्यक्रमों में सफलतापूर्वक भाग लिया है, जिनमें सतपुड़ा (पचमढ़ी) ट्रेकिंग हिमालयन सारपास ट्रेकिंग व कुल्लू-चंद्रखान प्रमुख हैं। 

ट्रेकिंग आरंभ करते हुए दल को, पूर्व विधायक लाल कीर्तिकुमार, सरपंच श्री इन्द्रजीत सिंह तथा संयोजकों ने संबोधित किया, जिसमें ट्रेकिंग का परिचय, आवश्यक सावधानियों, निर्देशों के साथ यह भी ध्यान दिलाया गया कि दल का कोई भी सदस्य प्लास्टिक, पालिथीन, रैपर, कवर आदि न फैलाये बल्कि रास्ते में मिलने वाली ऐसी वस्तुएँ एकत्र करें और जो सदस्य सर्वाधिक रैपर एकत्र करेगा, उसे पुरस्कृत भी किया जावेगा। आशंकित, मगर उत्साहित युवा सरपंच दल को रवाना करते हुए स्वयं भी साथ हो लिये, मार्गदर्शन के लिए ग्राम के वरिष्ठ व सम्मानित नागरिक श्री उदय प्रताप सिंह साथ रहे। 

चालीस सदस्यीय पूरा दल, जिसमें अधिकतर डैफोडिल कान्वेंट स्कूल के शहरी माहौल में पले बढ़े बच्चे थे, उनकी आंखों में चमक झलक रही थी। हंसते खिलखिलाते, दौड़ते-भागते लेकिन शालीन और मर्यादित खुलेपन के माहौल में प्रकृति को सीधे सम्पर्क से जानने का आनंद अद्वितीय था। ऊपर आसमान पर सूरज अपनी मंजिल की ओर अग्रसर था और इधर ट्रेकिंग दल लाफागढ़ की ऊंचाई का फासला नाप रहा था। ट्रेकिंग के लिए जंगल के बीच से सीधी-चढ़ाई वाला रास्ता चुना गया था। वैसे तो यह संरक्षित वन है, लेकिन वृक्षों की अवैध कटाई धड़ल्ले से हो रही है और दुखद पहलू है कि शाल के मूल्यवान वृक्षों को थोड़े से गोंद (धूप) के लिए काटा गया है, और कटे पेड निरर्थक सड-गल रहे हैं। शाम ढलते-ढलते दल, हुंकरा द्वार पर पहुंच गया और आगे बढ़ने पर घंटों से प्रतीक्षारत समिति सदस्यों श्री चौहान, श्री नटवर लाल के साथ डॉ. बांधी ने सभी का स्वागत किया, पूरी पहाड़ी पर वानस्पतिक हरियाली और उबड़-खाबड़ विस्तार था। मंदिर के पास कुछ झोपड़ियाँ थीं, इन्हीं झोपड़ियों में रात बसर होनी थी। रात को कैम्प फायर में सभी ने भाग लिया और स्कूली छात्रा वर्षा सोन्थालिया ने सर्वाधिक रैपर इकट्ठे कर पुरस्कार जीता, तत्काल पुरस्कार की राशि सरपंच महोदय ने अपनी ओर से भेंट की। 

रात्रि-विश्राम के पश्चात् सुबह हुई. छात्र-छात्राएँ जो इस माहौल के प्रति उत्सुक और आशंकित थे, अब आश्वस्त और आत्मीय हो रहे थे। राजा-बैठकी से धुंध भरी वादियों और विस्तृत असीमित प्राकृतिक विविधता की दृश्यावली का सबने जी भरकर रसास्वादन किया। गढ़ की प्राचीनता और मंदिर स्थापत्य की जानकारी प्राप्त करते हुए. विद्यार्थियों ने सवालों की झड़ी लगा दी। सामान समेटा जाने लगा, तैयारी पूरी कर वापसी यात्रा आरंभ हुई। चढ़ाई का मार्ग आमटी-आमा वाला 9 किलोमीटर लम्बा था, तो वापसी के लिए नगोई भांठा की रोमांचक ढाल वाला 13 किलोमीटर लम्बा रास्ता। दल ने जैसे ही वापसी यात्रा आरंभ की, तालाब पर कम दबाव का क्षेत्र निर्मित होने से चारों ओर से कोहरा और बादल झूमते-लहराते आकर मानों तालाब में समाने लगे। सबके पैर ठिठक गए और पूरे दल को इस अद्भुत प्राकृतिक दृश्य की दुर्लभ छवि ने मानो विदाई देकर विभोर और अभिभूत कर दिया। उल्लासमय वातावरण में वापसी भी हो गई। लगभग सभी शहरी बच्चों ने ट्रेक की अवधि सात दिन तक लम्बी करने की सम्मति प्रकट की थी।