Friday, June 28, 2013

समलैंगिक बाल-विवाह!

जशपुर जिले का फरसाबहार विकासखंड नागलोक कहा जाता है। यह क्षेत्र विषैले सांपों, नदी-नालों में पाए जाने वाले स्वर्ण-कण और टमाटर की उपज के लिए जाना जाता है। पिछले दिनों इस इलाके से चर्चा में सुनिता रही। ग्राम बांसाझाल के सुरेन्द्र टोप्पो की संतान 15 वर्षीय सुनिता, तीन बेटियों और एक बेटे में सबसे छोटी, आठवीं कक्षा की छात्रा है।
सुनिता पिछले साल से मां दुर्गा की पूजा-अर्चना में लगी रहती और एक दिन उसने मां दुर्गा से विवाह करने की घोषणा कर दी। परिजनों ने उसका फैसला मान लिया और शादी के लिए 17 जून 2013, सोमवार तिथि तय हुई। बाकायदा निमंत्रण पत्र बांटे गए। शादी के कार्ड में 'सुनिता टोप्पो संग मां दुर्गा का शुभ विवाह' छपा है। साथ ही 'महिलाओं का निमंत्रण इसी पत्रिका द्वारा स्वीकार करें' भी मुद्रित है। घर की दीवार को पहले 'सुनिता' संग बाद में नीचे 'मां दुर्गा' लिख कर सजाया गया। निर्धारित तिथि पर दिन में 11 से 12 बजे के बीच विवाह सम्पन्न हुआ, जिसमें सुनिता (वधू?) की मांग में सिंदूर भराई हुई। विवाह में परिजनों सहित आसपास के ग्रामीण इकट्ठे हुए साथ ही सीमावर्ती राज्य झारखंड और उड़ीसा से भी लोग आये।
विवाह सम्पन्न कराने वाले पुरोहित सर्प विज्ञानी डॉ. अजय शर्मा ने कहा कि ''बालिका किसी मनोरोग से ग्रसित नहीं है, बल्कि यह उसकी मां दुर्गा के प्रति असीम श्रद्धा है। ... मां दुर्गा एवं सुनीता दोनों ही कन्या होने के नाते भारतवर्ष के लिए अटपटा लगता है। पर इसे पागलपन करार नहीं दिया जा सकता।''

इतिहास विभाग, जशपुर महाविद्यालय के प्रो. डॉ. विजय रक्षित ने कहा है कि ''वनवासी समाज में ऐसा मामला पहले भी सामने आया है। समाज में अंधविश्वास की जड़े काफी गहरी है। वनवासियों को आसपास का परिवेश भी प्रभावित करता है।''

मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ. विवेक रंजन का कहना है कि ''यह मनोविकृति है। इसे डेल्युजनल डिसऑर्डर कहते हैं। सुनीता 'ग्रेडियोस टाइप' की डिसआर्डर की शिकार है। इसमें व्यक्ति को ऐसा विश्वास हो जाता है कि उसका किसी पौराणिक पात्र से रिश्ता है।''

एसडीएम, जशपुर ने कहा है कि ''ऐसे मामलों का संबंध आस्था से होता है। कानून ऐसे विवाह को मान्यता नहीं देता है। बाल विवाह की शिकायत पर प्रशासन द्वारा कार्रवाई की जाती है। इस प्रकरण में किसी भी ओर से शिकायत नहीं मिली है।''

सीधा हिसाब लगाएं तो मामला समलैंगिक बाल विवाह का माना जा सकता है, लेकिन सुनिता की सोच में शक्तिशाली का वरण, भक्त और भगवान के एकाकार हो जाने से दैवीय-शक्ति सम्पन्न होने की चाह (महिला सशक्तीकरण), संतानोत्पत्ति और वंश-वृद्धि से इतर विवाह-प्रयोजन, जीवन-साथी के रूप में स्थायी-निर्विघ्न साथ, इसके अलावा उसका परिवेश, उसके परिजन जैसे और क्या कारक निर्णायक हुए होंगे, विचारणीय है। बहरहाल, विवाह के लिए 'मंगल' और 'कल्‍याण' समानार्थी जैसे प्रयुक्‍त होते हैं...इस विवाह के सालगिरह पर खबर पाने का इंतजार तो रहेगा ही।

यह खबर दैनिक भास्कर, रायपुर में 15 जून को पृष्ठ 10 पर, नई दुनिया, बिलासपुर, 18 जून को मुखपृष्ठ पर तथा अन्य समाचार माध्यमों पर आई, इसके अलावा छायाचित्र व जानकारियां जशपुर के शशिकांत पांडेय जी से प्राप्त हुईं।

Thursday, May 9, 2013

लघु रामकाव्‍य

''रामकथा की ऐसी पाण्डुलिपि प्राप्त हुई है जिसमें 32 पंक्तियों में रामायण के समस्त सर्गों को छंदबद्ध किया गया है। रामकथा पर उपलब्ध यह सबसे लघुकाय कृति है। यह रचना खैरागढ़, सिंगारपुर ग्राम में अगहन सुदी 07 संवत 1945 को जन्मे भक्त कवि गजराज बाबू विरचित है, जो पदुमलाल पुन्नालाल बख्‍शीजी के सहपाठी थे।'' यह जानकारी दैनिक नवभारत समाचार पत्र में 28 जनवरी 1981 को प्रकाशित हुई थी, जिसमें उल्लेख था कि डॉ. बृजभूषण सिंह आदर्श को यह कृति मिली है। मुझे इसकी प्रति राम पटवा जी के माध्‍यम से (वाया डॉ. जे.एस.बी. नायडू) मिली, जिसके दूसरे पेज पर लंका कांड की चौपाई व अन्‍य कुछ हिस्‍सा क्षत, इस प्रकार है-
श्री गणेशाय नमः
अथ रामायणाष्टक प्रारंभः
चौपया छंद
शंकर मन रंजन, दुष्ट निकंदन, सुन्दर श्याम शरीरा।
सुर गण सुखदायक, खल गण घाय(ल)क, गुण नायक रघुबीरा॥
मुनि चित रोचक, सब दुःख मोचक, सुखधामा रणधीरा।
बिनवै गजराजा, हे रघुराजा, राखहु निज पद तीरा॥१॥
जन्मे रघुनाथा, शक्तिन साथा, दशरथ नृप गृह आई।
करिमख रखवारी, खलगण मा(री) ताड़कादि दुखदाई॥
तारी रिषि नारी, भंजि धुन भारी, व्याह्यो सिय जग माई।
विनवै गजराजा, सिय रघुराजा, देहु परम पद साईं॥२॥ (इति बालकांड)
कुबरी मति मानी, दशरथ रानी, दियो राम बन राजा।
सीता रघुराई, सह अहिराई, गये बनहि सुर काजा॥
त्यागा नृप प्राना, भरत सुजाना, गये निकट रघुराजा।
समुझाय खरारी, अवध बिहारी, सह पांवरिं गजराजा॥३॥ (इति अयोध्या कांड)
तजि जयन्त नैना, सुखमा ऐना, पंचवटी पुनि धारी।
खर भगनी, आई, नाक कटाई, मारयो खर दनुजारी॥(मारे खर भुवि भारी)
कंचन मृगमारी, अवध बिहारी, खोयो जनक दुलारी।
भाखत गजराजा, पुनि रघुराजा, गीध अरु शबरी तारी॥४॥ (इति आरण्यकांड)
सुग्रीव मिताई, करि रघुराई, हते बालि कपि भारी।
हनुमत चित दीन्हा, लै प्रभु चीन्हा, खोजन जनक दुलारी॥
नारी तपधारी, सिय सुधि सारी, कही वास बन चारी।
खोजत गजराजा, तट नदराजा, आये वानर सारी॥५॥ (इति कृषकिंधा कांड)
सुरसा मद भाना, कपि हनुमाना, आयो सागर पारा।
लखि रमा दुखारी, गिरिवर धारी, धरि लघुरूप निहारा॥
सब बाग उजारी, अच्छहि मारी, कियो लंकपुर छारा।
तरि निधि बारी, सह कपि सारी, वन गजराज सिधारा॥६॥ (इति सुन्दरकांड)
.............................................
..........................................-धारी।
मुर्छित अहिराया, हनुमत लाया, द्रोणाचल ...
लखन मुरारी, रिपु हति अवध सिधारी ॥७॥ (इति लंका कांड)
सिय हरि अहिनाथा, सब कपि साथा, पहुंचे अवध मुरारी।
मिलि भरत सुजाना, राम सयाना, मिले सकल महतारी॥
राजे रघुराया, मंगल छाया, टारि सब दुख भारी।
विनवै गजराजा, वसु रघुराजा प्रियसः जनक दुलारी॥८॥ (इति उत्तर कांड)
 नृप दशरथ लाला, मख रखवाला, शिव धनुभंजन हारी।
पितु आज्ञा धारी, बनहि सिधारी, खरदूषण दनु जारी॥
शबरी गिध तारी, रावण मारि, पुर गजराज निहारी।
यह अष्टक गावे, प्रभु पद पावे, कटैं पाप कलि भारी॥

''इति गजराजकृत रामायणाष्टक सम्पूर्णम्‌॥

कुछ अन्‍य भी मिले, जिनमें श्री परमहंस स्वामी ब्रह्मानंद विरचित श्रीरामाष्टकम् का पहला श्लोक है-
कृतार्तदेववन्दनं दिनेशवंशनन्दनम्‌। सुशोभिभालचन्दनं नमामि राममीश्वरम्‌॥
और आठवां श्लोक है-
हृताखिलाचलाभरं स्वधामनीतनागरम्‌। जगत्तमोदिवाकरं नमामि राममीश्वरम्‌॥

इसी प्रकार श्रीव्यास रचित श्रीरामाष्टकम्‌ का पहला श्लोक है-
भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम्‌। स्वभक्तचित्तरंजनं सदैव राममद्वयम्‌॥
और आठवां श्लोक है-
शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम्‌। विराजमानदेशिकं भजे ह राममद्वयम्‌॥

एक रामायणाष्टकम्‌, स्तुतिमंडलसंकलन से, जिसके कवि के रूप में अनिमेष नाम मिला, इस प्रकार आरंभ होता है-
रामं संसृतिधामं सर्वदनिष्कामं जगदारामं क्षीरे पंकजमालाशोभितश्रीधामं भुवनारामम्‌। मायाक्रीडनलोकालोकतमालोकस्वननारम्भं वन्देऽहं भुजगे तल्पं भुवनस्तम्भं जगदारम्भम्‌॥
और अंतिम पंक्ति है-
वन्देऽहं श्रुतिवेद्यं वेदितवेदान्तं हरिरामाख्‍यम्‌॥

अब आएं एकश्लोकि रामायणम्‌ पर-
आदौ रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं कांचनं, वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम्‌।
बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लंकापुरीदाहनं, पश्चाद्रावणकुम्भकर्णहननमेतद्धि रामायणम्‌॥

एक छत्‍तीसगढ़ी बुजुर्ग ने शायद किसी मालवी की पंक्तियां सुन कर, अपने ढंग से रामायण याद रखा था, सुनाया-
एक राम थो, एक रावन्नो।
बा ने बा को तिरिया हरी, बा ने बा को नास करो।
इतनी सी बात का बातन्नो, तुलसी ने कर दी पोथन्नो।

भदेस सी लगने वाली इन पंक्तियों का भाव राममय तो है ही।

Tuesday, April 23, 2013

गुलाबी मैना

तिलयार नाम सुनते ही रोहतक की झील (और ब्लागर मीट) याद आती है, लेकिन यह एक चिड़िया का भी नाम है। मैना परिवार की इस चिड़िया का नाम तिल्‍यर या तेलियर जैसा भी उच्‍चारित होता है। गुलाबी मैना कही जाने वाली इस चिडि़या का मधुर कन्नड़ नाम है, मधुसारिका। अंगरेजी नाम रोजी स्टारलिंग, रोजी पास्टर या रोजकलर्ड स्टारलिंग है।
नवा-नइया तालाब के आसमान पर शाम का नजारा
इनसेट में 24 मई 2000 को जारी डाक टिकट
संकरी-पेन्ड्रीडीह बाइपास मार्ग पर बिलासपुर से लगभग 15 किलोमीटर दूर बेलमुड़ी (बेलमुण्डी) गांव में नवा तालाब को घेरे, अर्द्धचंद्राकार लंबाई में फैला नइया तालाब सड़क से दिखता है। तालाब के 'पुंछा' वाले हिस्से में 'पटइता' घास है। नइया तालाब का यह भाग लाख संख्‍या में अनुमान की जाने वाली गुलाबी मैना का डेरा बना और इन तालाबों के ऊपर शाम करीब पांच बजे से साढ़े छः बजे तक आकाश में पक्षी-झुंडों की करतबी उड़ान का नजारा और उसकी चर्चा मार्च के अंतिम सप्ताह से अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक रही।

2 अप्रैल 2013 के दैनिक नवभारत, बिलासपुर में प्रकाशित सचित्र समाचार में इन पक्षियों का मूल एशिया, यूरोप, रसिया(!) और कनाडा बताया गया है। यहां डीएफओ हेमंत पाण्डे के हवाले से इन्हें ब्लैक हेडेड गुल(!?गल) कहा गया है। 6 अप्रैल 2013 के दैनिक भास्कर, बिलासपुर में सचित्र समाचार प्रकाशित हुआ, जिसमें पक्षियों को मध्य यूरोप, एशिया और कनाडा से आए तथा पक्षियों के जानकार केके सोमावार और पर्यावरण प्रेमी अनुराग शुक्ला का उल्लेख करते हुए उनके हवाले से इन्हें रोजी पेस्टर या ब्लैक हेडेड गुल प्रवासी पक्षी बताया गया।
पेड़ पर पत्तियां नहीं, चिडि़यों का झुंड है.
प्राण चड्‌ढा जी बताते हैं कि बसंत पंचमी (इस वर्ष 15 फरवरी) को आ जाती है, नवरात्रि में (इस वर्ष 18 अप्रैल तक) लौटती है। कमल दुबे जी ने अवधि फरवरी तीसरे हफ्ते से मार्च अंत तक बताई है। कुछ फोटो रमन किरण जी से मिले। गांव वालों ने बताया कि फरवरी में ही आने लगी थीं, लेकिन शिवरात्रि, 10 मार्च के आसपास बड़े झुंडों में दिखने लगीं और 10 अप्रैल तक वापसी हुई।

इस पक्षी की कुछ जानकारी पुस्तकों और नेट पर तो मिली, लेकिन इन विवरणों से उस दृश्य का अनुमान भी नहीं होता, जो यहां रहा-

यह रिकार्डिंग चि. यश, सौ. शुभदा और विवेक जोगलेकर जी ने की है।
दूसरी रिकार्डिंग कमल दुबे जी की है, लेकिन इसके पहले 35 सेकंड का हिस्सा बीत जाने दें।
एक अन्य रिकार्डिंग राजेश तिवारी जी ने लगाई है।
इन्‍हें देखकर Bezier Screensaver याद आता है।
पक्षियों से भरा तालाब अब रीता है.
बेलमुड़ी पहुंचा हूं, तालाब मौजूद है और गांव वालों में पिछले दिनों की यादें, किस्से, उसका रोमांच भी। चिड़ियों को जगह भा गई और लगता है पक्का रिश्ता बन गया है। मुझे पहुंचने में देर हो गई या शायद समय से दस-ग्यारह महीने पहले आ गया।