Saturday, December 21, 2019

हाशिये पर

• हमारे सम्माननीय 80 पार चुके बुजुर्ग हैं शर्मा जी, पिछले दिनों तटस्थ भाव से कहा, पत्नीे बिस्तर पर हैं, मेरे सामने चली जाएं तो ठीक, हमने हंसी की, उन्होंने भी साथ दिया फिर संजीदा हुए, कहा, यदि मैं पहले गया तो उनकी देखभाल कौन करेगा। हम आपस में बात करने लगे कि उनके बच्चे बहू..., सब हैं, 'भरा-पूरा परिवार', दोनों नौकरी-पेशा, किसी और शहर, दूर देश में हैं। मां-बाप का ध्यान नहीं, अपने में ही मगन। मगर बुजुर्गों की सयानी बात। शर्मा जी कहने लगे, जिसका दाना-पानी जहां लिखा। बेटा-बहू, अपने ही बच्चों की देखभाल नहीं कर पा रहे थे सो हास्टल में दाखिला कराया है, मां-सासू मां के लिए क्या और कितना कर पाएंगे। किसी पक्ष की आलोचना की जा सकती है, लेकिन है यह वस्तुतः आज की सहज, सामान्य, स्वाभाविक परिस्थितियां।

• कुछ बरस पहले बिलासपुर में एक अखबार ने जानना चाहा कि ऐसा कौन सा सरकारी दफ्तर है, जो सबसे कम जनोपयोगी है (या जिसे बंद किया जा सकता है), इसमें अव्वल नंबर पर था पुरातत्व विभाग यानि मेरा कार्यालय। मैंने उन पत्रकार महानुभाव का पता करने की कोशिश की, प्रेस ने तो नहीं बताया लेकिन पता लग गया, वे युवा पत्रकार परिचित निकले और स्वयं पहल कर खेद व्यक्त किया। फोन पर धन्यवाद देने पर उन्हें लगा कि मैं व्यंग्य या खीझ में ऐसा कह रहा हूं। बाद में प्रत्यक्ष मुलाकात में मैंने स्पष्ट‍ किया कि यह तो मेरे लिए अपेक्षित था, क्योंकि इस (और ऐसे अन्य सर्वेक्षण संबंधी) कार्यालय का सामान्य-जन से सीधा ताल्लुक कम ही होता है। मैं यह भी मानता हूं कि पुरातत्व‍-संस्कृति जैसी चीज हाशिये पर ही होनी चाहिए। मुख्य धारा में तो रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्य्य, शिक्षा, बिजली, पानी, सड़क और भू-राजस्व के साथ कानून-व्यवस्था को ही होना चाहिए। राग-रंग को हाशिये पर ही होना चाहिए। पुरातत्व-संस्कृति मुख्य धारा में आए तो इनका और समाज दोनों का बंठाधार होते देर नहीं। वैसे भी हाशिया महत्वपूर्ण, विशेष उल्लेखनीय और ध्यान देने योग्य के लिए नियत स्थान है। 

• चर्चित, पुरस्कृत कलाकार-साहित्यकार सब से अच्छे न माने जाएं, लेकिन अधिकतर अच्छे कलाकार जरूर होते हैं और कुछ उदाहरणों में अनूठे और श्रेष्ठ भी। सम्मानित-पुरस्कृत कलाकारों में आमतौर पर (अन्य से अलग) अपनी कला क्षमता के साथ 'नागर समाज या मुख्य धारा' में उपयुक्त साबित हो कर हाशिये पर सुशोभित होने के लिए आवश्यक अतिरिक्त गुण (जागरूकता और उद्यम), अन्य की अपेक्षा अधिक होता है। 

• विनोद कुमार शुक्ल के चर्चित उपन्यास 'नौकर की कमीज' का अंगरेजी अनुवाद, संभवतः 2000 प्रतियों का संस्करण, 'द सर्वेन्ट्स शर्ट' पेंगुइन बुक्स ने 1999 में छापा था, उन्हें 2001 में छत्तीसगढ़ शासन का साहित्य के क्षेत्र में स्थापित पं. सुंदरलाल शर्मा सम्माःन मिला। लगभग इसी दौर में एक विवाद रहा, जैसा मुझे याद आता है- पेंगुइन बुक्स ने श्री शुक्ल को पत्र लिखा कि उनकी पुस्तकें बिक नहीं रही हैं, यों ही पड़ी हैं, जिन्हें वे लुगदी बना देने वाले हैं, लेकिन श्री शुक्ल चाहें तो पुस्तक की प्रतियों को किफायती मूल्य पर खरीद कर पुस्तकों को लुगदी होने से बचा सकते हैं, यह बात समाचार पत्रों में भी आ गई। साहित्य बिरादरी, विनोद जी के प्रशंसकों, और खुद उनके लिए यह अप्रत्याशित था, प्रमाण जुटाने के प्रयास हुए कि किताब खूब बिक रही है और प्रकाशक रायल्टी देने से बचने के लिए ऐसा कर रहा है। 

बहरहाल, इस भावनात्मक उबाल को मेरी जानकारी में, समय और बाजार ने जल्द ही ठंडा कर दिया और अंततः क्या हुआ मुझे पता नहीं, लेकिन लुगदी बना देने वाली बात से यह सवाल अब तक बना हुआ है कि सामाजिक-जासूसी उपन्यास, जो लुगदी साहित्य कह कर खारिज किए जाते हैं, बड़ी संख्या में छपते-बिकते और पढ़े जाते हैं, सहेज कर रखे भी जाते हैं। तब सोचें कि ‍'लुगदी-पल्प' मुहावरा और शब्दशः के फर्क की विवेचना से क्या बातें निकल सकती हैं। लुगदी की तरह मटमैले कागज पर छपने वाला लेखन होने के कारण लुगदी साहित्य कहा जाता है या छपने-पढ़ने के बाद जल्द लुगदी बना दिए जाने के कारण। यह निसंदेह कि प्रतिष्ठित साहित्यकार भी अधिक से अधिक बिकना चाहता है और लुगदी लेखन करने वाले, साहित्यिक बिरादरी में अपने ठौर के लिए व्यग्र दिखते हैं।

Sunday, November 24, 2019

राज्‍य-गीत

साहित्यकार एवं भाषाशास्त्री आचार्य डॉ. नरेन्‍द्र देव वर्मा लिखित छत्तीसगढ़ी गीत 'अरपा पइरी के धार...' को मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल द्वारा राज्योत्सव के मंच से 3 नवम्बर 2019 को छत्तीसगढ़ का राज्य-गीत घोषित किया गया। इस दिन डॉ. वर्मा पूरे 80 वर्ष के होते। यह राज्य-गीत सोमवार, 18 नवम्बर 2019 को राजपत्र में प्रकाशित हो कर, अधिसूचना जारी दिनांक से प्रभावशील हो गया। राज्य-गीत का गायन सभी शासकीय कार्यक्रमों के प्रारंभ में सुनिश्चित किए जाने के निर्देश जारी हुए हैं। राज्य-गीत का अधिसूचित स्वरूप आगे है-

अरपा पइरी के धार महानदी हे अपार,
इन्द्राबती ह पखारय तोर पइँया।
महूँ पाँव परँव तोर भुइँया,
जय हो जय हो छत्तिसगढ़ मइया॥
सोहय बिन्दिया सही घाते डोंगरी, पहार
चन्दा सुरूज बने तोर नयना,
सोनहा धाने के संग, लुगरा के हरियर रंग
तोर बोली जइसे सुघर मइना।
अँचरा तोरे डोलावय पुरवइया।।
(महूँ पाँव परँव तोर भुइँया, जय हो जय हो छत्तिसगढ़ मइया।।)
रइगढ़ हाबय सुघर तोरे मँउरे मुकुट
सरगुजा (अऊ) बेलासपुर हे बहियाँ,
रइपुर कनिहा सही घाते सुग्घर फभय
दुरुग, बस्तर सोहय पयजनियाँ,
नाँदगाँवे नवा करधनियाँ
(महूँ पाँव परँव तोर भुइँया, जय हो जय हो छत्तिसगढ़ मइया।।)

इस गीत का अंग्रेजी अनुवाद स्‍वयं डॉ. नरेन्‍द्र देव वर्मा ने इस प्रकार किया था-

Arpa and Pairi, the streams
And the great Mahanadi flow,
Indravati washes your feet,
I salute thee, O my land,
My Mother Chhattisgarh

Hills and mountains are
A 'bindiya' on your forehead
The sun and the moon, your eyes
You are enriched with golden paddy
Your 'sari' is green
The wind flutters the full of your 'sari'
I salute thee, O my land,
My Mother Chhattisgarh.

Raigarh your crown, ceremonious and beautiful,
Sarguja and Bilaspur are your hands
Raipur is your waist
Durg and Bastar are your feet
Rajnandgaon in your new belt
I salute thee, O my land,
My Mother Chhattisgarh.

राज्य गीत गायन के संबंध में निर्देश
अवधि- 1 मिनट 15 सेकंड
यह गीत सन 1973 में लिखा गया, डाॅ. वर्मा के पारिवारिक सदस्यों ने बताया कि यह गीत डायरी में उनकी लिखावट में दर्ज सुरक्षित है। गीत के पांच अंतरा में से पहले दो अंतरा राज्य-गीत के रूप में आए हैं। गीत में रइगढ़ को मँउरे मुकुट और बेलासपुर के साथ सरगुजा को बहियाँ कहा जाना, ऐसी काव्यात्मक अभिव्यक्ति है, जो मेरे लिए जिज्ञासा का विषय है अर्थात् लगता है कि सरगुजा को मुकुट और रायगढ़ को बांह, क्यों नहीं कहा गया है? बहरहाल ...

इस गीत की रचना, संगीत और गायन डाॅ. वर्मा ने किया था। डाॅ. बिहारीलाल साहू और सुरेश देशमुख इसके प्रथम चरण का स्मरण करते हैं। रायपुर, जोरापारा के सुकतेल भवन में तब संगीत बैठकें होती थीं। इस गीत के साथ रामेश्वर वैष्णव, धनीराम पटेल, पद्मलोचन जायसवाल, ललिता शर्मा को भी याद किया जाता है। आगे चलकर यह गीत दाऊ महासिंग चंद्राकर के ‘सोनहा बिहान‘ के साथ जुड़ा। ‘सोनहा बिहान‘ डाॅ. वर्मा के हिन्दी उपन्यास ‘सुबह की तलाश‘ का नाट्य रूपांतर था। मुकुंद कौशल और विवेक वासनिक सोनहा बिहान के दौर और इस गीत की संगीत रचना के साथ गोपाल दास वैष्णव, सत्यमूर्ति देवांगन (बुद्धू गुरूजी), मुरली चंद्राकर, जगन्नाथ भट्ट, दुर्गा प्रसाद भट्ट, मदन शर्मा, श्रवण कुमार दास को याद करते हैं। यह सर्वविदित है कि इस गीत की रचना के बाद अब तक उस दौर के केदार यादव, साधना यादव, ममता चंद्राकर, लक्ष्मण मस्तुरिया, कविता वासनिक, गणेश यादव, जयंती यादव, कुलेश्वर ताम्रकार से आज की बाल प्रतिभा आरु साहू जैसे सभी प्रमुख गायकों ने अपना स्वर दे कर इसे राज्य के जन-गीत की प्रतिष्ठा दी है।

डॉ. नरेन्‍द्र देव वर्मा की डायरी में
उनकी हस्तलिपि में दर्ज गीत की पंक्तियां


Thursday, October 31, 2019

छत्तीसगढ़ की राजधानियां

छत्तीसगढ़ के प्राचीन इतिहास में गुहावासी पुरखों का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र रायगढ़ अंचल रहा, जहां सिंघनपुर, कबरा पहाड़, बसनाझर, ओंगना, करमागढ़, खैरपुर, छापामाड़ा, बोतलदा, भंवरखोल, अमरगुफा-छेरीगोडरी, सुतीघाट, टीपाखोल, नवागढ़ी, बेनीपाट, सिरोली डोंगरी, पोटिया, गीधा जैसे अनेक स्थल हैं। इस काल की गतिविधियों के प्रमाण कोरिया, बस्तर और दुर्ग-राजनांदगांव अंचल से भी चित्रित शैलाश्रयों के रूप में मिलते हैं। मौर्यकाल में सरगुजा के रामगढ़, शक-सातवाहनकाल में मल्हार और किरारी के पुरातात्विक प्रमाणों से अनुमान होता है कि ये स्थल तत्कालीन सत्ता के केन्द्र रहे होंगे।

नलों की राजधानी पुष्करी का समीकरण बस्तर के गढ़ धनोरा के साथ किया जाता है। श्रीपुर-सिरपुर शरभपुरियों के काल से प्रतिष्ठित होते हुए पांडु-सोमकाल में न सिर्फ राजधानी बल्कि छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण धार्मिक और आर्थिक केन्द्र रहा। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने दक्षिण कोसल की जिस भव्य राजधानी का बौद्ध केन्द्र के रूप में विवरण दिया है, उसका सबसे करीबी मेल सिरपुर से ही होता है। कलचुरियों ने तुमान के बाद रतनपुर को राजधानी बनाया तथा इसके साथ पाली, कोसगईं और चैतुरगढ़ भी महत्वपूर्ण केन्द्र रहे। बस्तर में छिंदक नागों की राजधानी बारसूर बना तो कांकेर परवर्ती सोमवंशियों की और 'बस्तर' (वर्तमान गांव) को काकतीयों की राजधानी का गौरव प्राप्त हुआ। कवर्धा-भोरमदेव फणिनागवंशियों की राजधानी रही और इस क्षेत्र का पचराही भी महत्वपूर्ण केन्द्र रहा।

इतिहास सम्मत जानकारी मिलती है कि कलचुरी राजा सिंघण के दो बेटे हुए, डंघीर और रामचन्द्र। डंघीर रतनपुर गद्दी पर रहे और उल्लेखनीय नाम संयोग कि ‘रामचन्द्र’ ने रायपुर नगर बसाकर इसे अपनी राजधानी बनाया। इस तरह कलचुरियों की ही एक शाखा ने चौदहवीं सदी के अंतिम चरण में रायपुर को पहली बार राजधानी बनाया। इस रामचन्द्र के पुत्र ब्रह्मदेव की राजधानी खल्वाटिका-खल्लारी का उल्लेख भी शिलालेखों में मिलता है। संवत 1470 यानि ईस्वी 1415 का लेख कलचुरि शासकों का अंतिम शिलालेख है। ब्रह्मदेव के लेखों से रामचन्द्र की फणिवंश के शासक भोणिंगदेव पर विजय, देवपाल द्वारा खल्वाटिका में मंदिर निर्माण तथा रायपुर में हाटकेश्वर महादेव मंदिर निर्माण का पता चलता है।

इतिहास का रास्ता भूल-भुलैया होता है अक्सर किसी ऐसे स्थल से संबंधित इतिहास, जो सुदीर्घ अवधि तक राजसत्ता का मुख्य केन्द्र, प्रशासनिक मुख्यालय के साथ-साथ धार्मिक तीर्थस्थल भी हो तो वहां इतिहास-मार्ग और भी दुर्गम हो जाता है, छत्तीसगढ़ की पुरानी राजधानियों की कहानी भी कुछ इसी तरह की है। चतुर्युगों में राजधानी के गौरव से महिमामण्डित मान्यता, मूरतध्वज की नगरी और भगवान कृष्ण की पौराणिक कथाओं से रतनपुर को सम्बद्ध कर देखा गया। सिरपुर की समृद्धि भी परत-दर-परत सामने आ कर, छत्तीसगढ़ के वैभव का इतिहास-प्रमाण बन रही है।

पुरातत्वीय वैभव से संपन्न सिरपुर में महानदी के सुरम्य तट पर कला-स्थापत्य उदाहरणों के साथ-साथ धार्मिक सौहार्द के प्रमाण सुरक्षित हैं, जिनमें ईंटों का प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर और अन्य मंदिर, भव्य कलात्मकता तथा अलंकरण अभिप्रायों वाला अद्वितीय तीवरदेव महाविहार और अन्य विहार, राजप्रासाद, विशाल सुरंगटीला मंदिर, स्तूप, आवासीय मठ-संरचनाएं इस नगरी की गाथा बखानती हैं। इसके अतिरिक्त यहां से प्राप्त सिक्के, ताम्रपत्र और धातु प्रतिमाओं की बहुमूल्य निधि प्राप्त हुई है। मल्हार-जुनवानी ताम्रलेख में रोचक विवरण है कि सिरपुर राजधानी में भूमिदान, हाथ के माप के पैमाने से दिया गया, जिसमें स्पष्ट कर दिया गया है कि हाथ का मान 24 अंगुल के बराबर होगा। संभवतः तब भी यह किस्सा प्रचलन में रहा होगा, जिसमें राजधानी सीमा में राजा द्वारा ब्राह्मण को एक खाट के बराबर भूमिदान की चर्चा होती है, किन्तु बाद में दान प्राप्तकर्ता ने खाट की रस्सी खोलकर पूरे राजमहल को घेर लिया था। इसी तरह सिरपुर ताम्रपत्र निधि से यहां शैव सम्प्रदाय की अत्यंत महत्वपूर्ण शाखा का पता चलता है महाशिवगुप्त बालार्जुन इन्हीं शैव-सोम सम्प्रदाय के आचार्यों से दीक्षित होकर परम माहेश्वर की उपाधि का धारक बना था। यह भी उल्लेखनीय है कि बालार्जुन के बाद छत्तीसगढ़ के स्वर्ण युग और उसकी राजधानी श्रीपुर की चमक फीकी पड़ने लगी।

राजधानी-नगरों की कहानी बड़ी अजीब होती है, कहीं तो उनका वैभव धुंधला जाता है और कभी-कभी उनकी पहचान खो जाती है। छत्तीोसगढ़ या प्राचीन दक्षिण कोसल के दो प्रमुख नगरों- राजधानियों शरभपुर और प्रसन्नपुर की पहचान अभी तक सुनिश्चित नहीं की जा सकी है। शरभपुर का समीकरण सिरपुर, मल्हार, सारंगढ़ तथा उड़ीसा के कुछ स्थलों से जोड़ा गया, किन्तु प्रसन्नपुर की चर्चा भी नहीं होती। इसी प्रकार इस अंचल में कोसल नगर और ‘गामस कोसलीय‘ नाम के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं, किंतु यह स्थान ‘कोसल’ राजधानी था अथवा नहीं, या कहां स्थित था, निश्चित तौर पर यह भी नहीं तय किया जा सका है। अंचल के सर्वाधिक अवशेष सम्पन्न पुरातात्विक स्थल मल्हार का राजनैतिक केन्द्र या राजधानी होना, अभी तक अनिश्चित है।

छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक राजधानी रतनपुर के संबंध में ऐसा कोई सन्देह नहीं है, जो रायपुर से पहले लगभग पूरी सहस्राब्दि छत्तीसगढ़ की राजधानी रहा। राजधानी तुम्माण का स्थानान्तरण रतनपुर को इस दृष्टिकोण से देखा जाना भी समीचीन होगा, कि यह काल कबीलाई छापामारी से विकसित होकर खुले मैदान में विस्तृत हो जाने का था। मुगलकाल में राजा टोडरमल का भू-राजस्व व्यवस्थापन आरंभिक माना जाता है, लेकिन इतिहास गवाह है कि तत्कालीन छत्तीरसगढ़ की व्यवस्था, जमींदारियों, ताहुतदारियों और खालसा में मालगुजारी और रैयतवारी में विभाजित कर ऐसा व्यवस्थित प्रबंधन रतनपुर राजधानी से हुआ था। छत्तीस गढ़ों की यही व्यवस्था इस राज्य के नाम का आधार बनी। रतनपुर राजधानी के साथ इन गढ़ों के माध्यम से खालसा क्षेत्र का केन्द्रीय प्रशासन होता रहा तो इसके समानांतर बस्तर, कांकेर, नांदगांव, खैरागढ़, छुईखदान, कवर्धा, रायगढ़, सक्ती, सारंगढ़, सरगुजा, उदयपुर, जशपुर, कोरिया, चांगबखार भी सीमित-संप्रभु रियासती सत्ता के केन्द्र रहे।

इतिहास में झांककर समाज के उज्जवल भविष्य की रूपरेखा बनती है और इतिहास के संदर्भ कोश से प्रेरक आशा का उत्साह संचारित होता है, आगत की तस्वीर उजागर होती है। रायपुरा से किला-पुरानी बस्ती और रायपुर से नया रायपुर तक का सफर न सिर्फ समय की बदलती करवट है, बल्कि यह राज्य की क्षमता और उसके पुरुषार्थ का भी प्रमाण है। नया रायपुर (अब अटल नगर, नवा रायपुर) के साथ नये संकल्पों का दौर आरंभ हो रहा है, इस नयी राजधानी में राज्योत्सव के शुभारंभ अवसर के लिए निर्धारित मुहूर्त पर प्रकृति ने जलाभिषेक कर मानों राज्य के उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त किया है। इस अवसर पर अपने गौरवशाली अतीत का स्मरण इतिहास-यज्ञ ही है, जिसमें दृढ़ संकल्पों के साथ कर्म-उद्यम का यज्ञफल राज्य के लिए शुभ और मंगल सुनिश्चित करेगा।

नवभारत, संपादकीय पृष्ठ पर 3 नवंबर 2012 को प्रकाशित