Saturday, October 8, 2011

राम की लीला

6 अक्‍टूबर, फिल्‍म रास्‍कल्‍स आम नियत रिलीज दिन शुक्रवार से एक दिन पहले आ गई है, दशहरे पर। 25-26 हजार आबादी वाले कस्‍बे अकलतरा में फिल्‍म का पोस्‍टर, जिस पर श्री सुदर्शन सिनेमा में यूएफओ प्रदर्शन की चिप्‍पी है।
अकलतरावासी, जो इन दिनों प्रवासी हैं उनके लिए खास खबर। मेरे लिए ग्‍लोबलाइज होती दुनिया का एक पहलू। कभी अस्‍थायी, टीन-टप्‍पर वाले, टूरिंग टाकीज सुदर्शन सिनेमा, जहां नई फिल्‍मों के लिए बरसों इंतजार करना होता, के एयरकंडीशंड यूएफओ केबिन और वहां के झरोखे से रिलीज के ही दिन फिल्‍म की झलक देखा। घनघोर किस्‍म के हिन्‍दीवादियों के लिए चिंता की खुराक होगी कि फिल्‍म का न सिर्फ नाम अंगरेजी में है, बल्कि देवनागरी में लिखा भी नहीं गया है।
टाकीज के पास ही रावण पुतला और चौपहिया प्रचार वाहन खड़ा है।

यह देख कर दशहरा-रामलीला से अनुपम टाकीज, भोंपू, सायकल, रिक्‍शे से आगे बढ़ता प्रचार और श्रुति-स्‍मृति से जो चलचित्र मानस पटल पर धावमान है, वह खुद देखते हुए लगा कि ढंग की किस्‍सागोई आती तो बता पाता। खैर, हाजिर की हुज्‍जत नहीं, गैर की तलाश नहीं। यह है, करीब 80 साल पुराना अकलतरा रामलीला का पोस्‍टर, जिसमें विज्ञापन शीर्षक से सूचना है। तब इस गांव की आबादी पांच हजार भी न रही होगी। गांव की अपनी लीला का दौर बीता, खास मौकों पर रहंस-गम्‍मत के आयोजन में दूर-पास के कलाकार आते रहे।

लगभग सन 1950 में छः-एक हजार हो गई आबादी वाले अकलतरा में पहले-पहल 'गणेश' टाकीज स्‍थापित हुई। इसके कर्ता-धर्ता शिवरीनारायण नाटक-लीला से जुड़े द्वारिका प्रसाद खण्‍डेलिया जी थे। अकलतरा रामलीला से जुड़े मुलमुलावासी प्रसिद्ध तबलावादक भानसिंह जी के पुत्र जीतसिंह जी ने राजलक्ष्‍मी टूरिंग टाकीज शुरू कर, केन्‍द्र अकलतरा को रखा। इस टाकीज के साथ लोग याद करते हैं सोहराब मोदी के शेर मार्का मिनर्वा मूवीटोन वाली फिल्‍म 'झांसी की रानी'। राजलक्ष्‍मी टाकीज के रुपहले परदे पर पहली बार यह रंगीन चलचित्र प्रदर्शित हुआ। विदेशी तकनीशियनों की मदद से बनी संभवतः पहली टेकनीकलर हिन्‍दुस्‍तानी फिल्‍म थी यह। रामलीला के सूत्रधार बैरिस्‍टर छेदीलाल जी के भतीजे केशवकुमार सिंह जी (उनके न रहने का यह पहला दशहरा था मेरे लिए) ने लगभग इसके साथ ही सन 1957 में अनिल टाकीज शुरू की।

इसी साल रामलीला में प्रमुख भूमिका निभाने वाले शिवाधीन महराज के पुत्र रमेश दुबे जी ने 'जय अम्‍बे' फिल्‍म प्रदर्शन के साथ अनुपम टाकीज शुरू किया। उनकी श्री टाकीज बनी और सक्‍ती से रघुवीर टूरिंग टाकीज आती-जाती रही। तब तक बिजली आई नहीं थी, जनरेटर का सहारा होता। 'ओम जै जगदीश हरे और हरे मुरारे मधुकैटभारे...' आरती रिकार्ड के साथ भारतीय समाचार चित्र, फिल्‍म्‍स डिवीजन की भेंट, आरंभ होता। फिल्‍म में मध्‍यांतर तो होता ही, बीच में ''कृपया शांत रहें, रील बदली जा रही है'' स्‍लाइड दिखाया जाता। एक तरफ मर्दाना तो दूसरी तरफ जनानी-बच्‍चों की बैठक और बीच में स्‍क्रीन वाली व्‍यवस्‍था भी प्रचलित रही। चाह रहा हूं, वैसी बात, वह रफ्तार और रवानी नहीं बन पा रही, सो वापस दशहरे पर।

पुरानी रामलीला, न जाने कब दशहरे की झांकी में सीमित हो गई है। सोचता हूं लीला पुरुष तो कृष्‍ण हैं और राम मर्यादा पुरुषोत्‍तम, लेकिन अवतार और विग्रह लीला ही है, राम की हो या कृष्‍ण की। सामने से झांकी गुजर रही है। राम-रावण दरबार साथ-साथ ट्रेक्‍टर की एक ही ट्राली पर। गीत बज रहा है 'डीजे'- ''इश्क के नाम पर करते सभी अब रासलीला हैं, मैं करूं तो साला, कैरेक्टर ढीला है'' - क्‍या यह रावण की ओर से कहा जा रहा है?
रावण-वध की तैयारी है। तीनेक साल का बच्‍चा कंधे पर सवार, सवाल किए जा रहा है और मचल रहा है, पापा! हमू लेमनचूस (लॉलीपाप) लेबो, ओ दे रावन घलो धरे हे।
सब प्रभु की माया, राम तेरी लीला न्‍यारी।

कुछ दिनों से बार-बार ध्‍यान में आता है कि सभ्‍यता का सब-आल्‍टर्न इतिहास- गनीमत है कि यह दलित, शोषित, उपेक्षित, वंचितों का इतिहास नहीं, बल्कि हाशिये का या उपाश्रयी इतिहास कहा जाता है, सही मायनों में ब्‍लाग पर ही लिखा जा रहा है।

Tuesday, October 4, 2011

लोक-मड़ई और जगार

(इस पोस्‍ट पर टिप्‍पणी अपेक्षित नहीं)

सांस्कृतिक अस्मिता के गौरव-प्रदेश छत्तीसगढ़ में इस वर्ष (सन 2004) का नवम्बर-दिसम्बर माह एक विशेष संदर्भ में उल्लेखनीय है। छत्तीसगढ़ राज्य की चौथी वर्षगांठ पर राज्‍य स्‍थापना दिवस 1 नवंबर, राज्योत्सव से आरंभ होकर वैसे तो यह मड़ई-मेला और जगार का समय है, लेकिन लोक-मड़ई और जगार का जिक्र यहां उत्सव-मात्र के संदर्भ में नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ में लोक संस्कृति और परम्परा पर केन्द्रित प्रकाशन के गम्भीर प्रयासों के लिए है।

रावत नाच महोत्सव का आयोजन बिलासपुर के शनिचरी में पारंपरिक रूप से आयोजित होने वाले मातर-मड़ई का परिष्कृत रूप है। यह आयोजन रावत नाच महोत्सव समिति, बिलासपुर द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है। आयोजन समिति द्वारा महोत्सव के साथ 10वें वर्ष 1987 से 'मड़ई' पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया गया।

'मड़ई' के आरंभिक अंकों में अधिकतर यादव कुल की संस्कृति और परंपरा, रावत नाच और उससे संबद्ध विभिन्न पक्षों पर स्थानीय और आंचलिक लेखकों की रचनाएं हैं, किन्तु साल में एक बार प्रकाशित होने वाली इस निःशुल्क पत्रिका ने छत्तीसगढ़ की संस्कृति के विभिन्न पक्षों को गंभीरता से उजागर करने में धीरे-धीरे अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। आगे चलकर पत्रिका में छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य क्षेत्रों से संबंधित लेख और लोक संस्कृति के महत्वपूर्ण अध्येताओं, विशेषज्ञों के लेखों का समावेश होने लगा और लोक संस्कृति पर गम्भीर विमर्श भी 'मड़ई' में प्रकाशित हुए।

'मड़ई' के ताजे 18वें अंक (वैसे इसे वर्ष-6, अंक-1 बताया गया है) का कलेवर पिछले अंकों से भिन्न है। इसका स्वरूप राष्ट्रीय लोक संस्कृति की पत्रिका का हो गया है, जिसमें देश के विभिन्न अंचल की लोक-सांस्कृतिक परम्पराओं से संबंधित लेख प्रदेशवार शामिल किए गए हैं और एक रचना 'वेस्‍टइंडीज की कविताएं' भी है, जिससे मड़ई का वितान अब छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहा, लेकिन मड़ई के अंकों में प्रकाशित छत्तीसगढ़ लोक संस्कृति की रचनाओं के कारण अब सुलभ न होने के बावजूद आरंभिक अंक पठनीय, उपयोगी और संग्रहणीय हैं। इस अंक के संपादक के रूप में डॉ. कालीचरण यादव और संपादन में डॉ. राजेश्‍वर सक्‍सेना के अलावा 10 और नाम हैं।

लोक मड़ई उत्सव समिति, आलीवारा, राजनांदगांव द्वारा 'लोक मड़ई' का प्रकाशन सन्‌ 2000 से आरंभ हुआ। प्रतिवर्ष प्रकाशित होने वाली यह निःशुल्क पत्रिका, उत्सव आयोजन के साथ जुड़ी है। पत्रिका के आरंभिक अंकों में लोक संस्कृति के विभिन्न वैचारिक पक्षों के साथ छत्तीसगढ़ की लोक-कला के कलाकारों, विधाओं, संस्कृति और शिल्प पर अंचल के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों की भागीदारी रही। 'लोक मड़ई' लगातार निखरती गई और 2002 के अंक से नई लीक पड़ी। इस अंक में स्फुट रचनाओं के साथ पत्रिका का महत्वपूर्ण भाग, 'विवाह' के सांस्कृतिक पक्ष पर पठनीय रचनाएं हैं।

'लोक मड़ई' का पिछले साल का अंक 'हरियाली' पर केन्द्रित रहा। ठेठ कृषक संस्कृति के त्यौहारों का विशिष्ट छत्तीसगढ़ी स्वरूप सावन अमावस्या की 'हरेली' जैसे एक विषय पर केन्द्रित पत्रिका का यह स्वरूप निःसंदेह अब अधिक उपयोगी हो गया है और इस वर्ष समिति के सदस्य और रचनाकारों के लगभग पूरे साल भर के उद्यम के परिणामस्वरूप पत्रिका का ताजा अंक तैयार हुआ है जो देश के विभिन्न अंचलों में प्रचलित प्रसिद्ध लोकगाथा जसमा ओड़न के छत्तीसगढ़ के अपने निजी लोकगाथा स्वरूप दसमत ओड़निन, 'दसमत कैना' पर एकाग्र है। इसकी तैयारी के पीछे की दृष्टि और मेहनत, अंक में स्वयं उजागर है।

जगार का तात्कालिक संदर्भ है कि बस्तर के पारंपरिक 'लछमी जगार' का आयोजन, इस वर्ष के अंतिम सप्ताह में कोण्डागांव क्षेत्र में खोरखोसा ग्राम में किया जा रहा है। एक सप्ताह तक चलने वाले इस जगार का सबसे महत्वपूर्ण अंश 'नारायण राजा और महालखी का विवाह' 30 दिसम्बर को दोपहर 12 बजे से रात 9 बजे तक चलेगा। बस्तर की लोक गाथाओं के गंभीर अध्येता श्री हरिहर वैष्णव द्वारा कराया जा रहा यह आयोजन अपने आपमें विशिष्ट है, क्योंकि यह संकल्प ऐसे व्यक्ति का है जो इस परंपरा के द्रष्टा ही नहीं, भोक्ता भी हैं।

प्रसंगवश बस्तर में तीन अन्य गाथाएं भी प्रचलित हैं- 'तिजा जगार' 'आठे जगार' और 'बाली जगार'। इस परिप्रेक्ष्य में 'लछमी जगार' की मौखिक परम्परा का लिप्यंतर और प्रकाशन का महत्वपूर्ण कार्य हुआ है। बस्तर की धान्य देवी की कथा 'लछमी जगार' का संक्षेपीकरण, अनुवाद, एवं संपादन हरिहर वैष्णव द्वारा सी.ए.ग्रेगॅरी के सहयोग से किया गया है। जिसके प्रकाशन में आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी का सहयोग है।

इस ग्रंथ में पूरी गाथा को 4 खण्ड और 36 अध्यायों में समेटा गया है। ग्रंथ का परिचय हिन्दी और अंग्रेजी में है और गाथा हल्बी, हिन्दी व अंग्रेजी में समानान्तर रूप से तीन कॉलम बनाकर छापी गई है। ग्रंथ परिचय में जगार अनुष्ठान, उसके आयोजन भूगोल, गायक, वाद्ययंत्र, गीत, कथा, प्रतीक/मिथक, मूल्य और आनुष्ठानिक स्वरूप की चर्चा है। ककसाड़ प्रकाशन, सरगीपालपारा, कोण्डागांव जैसे अजाने से स्थान से प्रकाशित यह सचित्र ग्रंथ छत्तीसगढ़ में हो रहे गम्भीर, स्तरीय और सुरूचिपूर्ण प्रकाशन का मानक स्थापित करता है। बस्तर की संस्कृति और परम्पराओं के प्रलेखन-प्रकाशन में हरिहर वैष्णव द्वारा संपादित 'बस्तर का लोक साहित्य' भी विशेष उल्लेखनीय है, जिसमें मिथक, कथा, गीत, गाथा, मुहावरे और पहेलियां मूल रूप में हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित हैं।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति के अध्ययन और प्रकाशन के दौर में यह चर्चा इस क्षेत्र में हुए और हो रहे अन्य कामों को खारिज करने के लिए कतई नहीं है, बल्कि यह रेखांकित करने के लिए है कि छपाई आसान हो जाने के दौर में छत्तीसगढ़ की संस्कृति के कथित विशेषज्ञ और स्वयंभू दावेदारों के संख्‍या-बल, उस भीड़ और उसके दबाव में गुम होने से मुकाबिल कोशिशों में से कुछ-एक मड़ई, लोक मड़ई और जगार हैं।

टीप -
ब्‍लाग युग में लिखने, काट-छांट, फेयर करने, छपने भेजने, न छपने, रचना वापस आने- न आने का अनुभव कैसे हो। अपनी कहूं तो न छपने का अनुभव, छपने की तुलना में कम से कम दस गुना अधिक है। रचना न छपती, वापस आती, तो पहला हफ्ता संपादक को गरियाने में बीतता, अगले कुछ दिन 'जुगाड़ का जमाना है' पर विशद चर्चा होती, इसी तरह कोई महीने भर बाद ध्‍यान जाता कि रचना फिर से पढ़ ली जाए, तब ज्‍यादातर समझ में आ जाता कि संपादक का निर्णय गलत न था। फिर अक्‍सर रचनाएं फाड़ कर फेंक दी जातीं और कुछ मोहवश या यूं ही बची रह जातीं। अब ऐसा भी होने लगा है कि अपना लिखा कुछ, जो कहीं छपने लायक नहीं लगता लेकिन ब्‍लाग के लिए अनुकूल जान पड़ता है। रचना, किसे और कैसे भेजें, उसे ही क्‍यों यह भी प्रश्‍न होता और कुछ रचनाएं इस उधेड़बुन में भी छूटी रह जातीं। कम्‍प्‍यूटर पर लिखी, अब तक अप्रकाशित पड़ी रह गई यह समीक्षा, बस मोहवश, अब अपने ब्‍लाग पेज पर प्रकाशित करने की सुविधा के कारण इरादा बना कि इस्‍तेमाल कर ली जाए। बताने का एक कारण कि कई बार रचना तैयार होने के पहले समीक्षा-समीक्षक तय होते हैं लेकिन यहां अब कहने की जरूरत नहीं रही कि इन तीनों प्रकाशन से जुड़े लोगों से परिचित अवश्‍य हूं, पर कोई वादा नहीं था कि ऐसा कुछ लिखूंगा।

Sunday, September 25, 2011

रामराम

वह परिवेश, जो होश संभालने के पहले से देखते रहें, उससे एक अलग ही रिश्ता होता है, जन्मना। जो पहले से है, वह सदैव से विद्यमान, शाश्वत लगता है। अक्सर उसके प्रति वैसा कुतूहल भी नहीं होता, क्योंकि हमारी जानी दुनिया वही होती है, मन मानता है कि वही दुनिया है और उसे वैसी ही होना चाहिए।
किसी रामनामी को पहली बार कब देखा, याद नहीं। कह सकता हूं कि होश संभालने के पहले से देखता रहा हूं। रामनामियों से मेरा ऐसा ही रिश्ता रहा है। जब देखा कि लोगों को आश्चर्य होता है, जिज्ञासा होती है इनके बारे में, तो मुझे अजीब लगा। बाद में जाना कि इनके बारे में जानने कोई अमरीकी आया करता था, शोध किया, वे डॉ. लैम्ब रामदास हुए, उनकी पुस्‍तक है- Rapt in the name: the Ramnamis, Ramnam, and untouchable religion in Central India। कुछ और परिचित पत्रकार-लेखक, अध्येता-विद्वानों को रूचि लेते देखा। दसेक साल पहले सुन्दरी अनीता से रामनामियों पर उनके शोध के दौरान मुलाकात और फिर मेल-फोन से सम्पर्क बना रहा। अनीता को लंदन विश्वविद्यालय से इस अध्ययन Dominant Texts, Subaltern Performances:Two Tellings of the Ramayan in Central India पर डाक्टरेट उपाधि मिली, जिसमें रामकथा, विशेषकर रामचरितमानस के पदों की खास 'रामनामी' व्याख्‍या और इस अंचल की रामलीला में कथा-प्रसंगों की निराली प्रस्तुति को शोध-अध्ययन का विषय बनाकर सामाजिक संरचना को समझने का प्रयास है।
बड़े भजन मेलों और शिवरीनारायण मेले में रामनामियों के साथ समय बिता कर मैंने देखा-जाना कि वे दशरथनंदन राम के नहीं बल्कि निर्गुण निराकार ब्रह्मस्वरूप राम के उपासक हैं और इस भेद को अपने तईं बनाए रखने के लिए राम का नाम एक बार कभी भूले से भी प्रयोग नहीं करते, रामराम ही कहते, लिखते, पढ़ते हैं (छत्‍तीसगढ़ी में इन्‍हें रामनामी नहीं रामरामी या रमरमिहा ही कहा जाता है)। रामराम पूरे शरीर पर, कहने से स्पष्ट नहीं हो पाता कि गुदना शरीर के गुह्‌य हिस्सों सहित आंख की पलकों और जीभ पर भी होता है। समय बदला है। पूरे शरीर पर गोदना, कम होते-होते माथे पर रामराम तक आया फिर हाथ में, लेकिन अब बिना गुदना के रामनामियों की संख्‍या बढ़ती जा रही है।
छत्तीसगढ़ में मेलों की गिनती का आरंभ अंचल की परम्परा के अनुरूप 'राम' अर्थात्‌ रामनामियों के बड़े भजन से किया जा सकता है, जिसमें पूस सुदी ग्यारस को ध्वजारोहण की तैयारियां प्रारंभ कर चबूतरा बनाया जाता है, दूसरे दिन द्वादशी को झंडा चढ़ाने के साथ ही मेला औपचारिक रूप से उद्‌घाटित माना जाता है, तीसरे दिन त्रयोदशी को भण्डारा में रमरमिहा सदस्‍यों एवं श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण होता है।
संपूर्ण मेला क्षेत्र में अलग-अलग एवं सामूहिक रामायण पाठ होता रहता है। नख-शिख राम-नाम गुदना वाले, मोरपंख मुकुटधारी, रामनामी चादर ओढ़े रमरमिहा स्त्री-पुरूष मेले के दृश्य और माहौल को राममय बना देते हैं। परिवेश की सघनता इतनी असरकारक होती है कि मेले में सम्मिलित प्रत्येक व्यक्ति, समष्टि हो जाता है। सदी पूरी कर चुका यह मेला महानदी के दाहिने और बायें तट पर, प्रतिवर्ष अलग-अलग गांवों में समानांतर भरता है। कुछ वर्षों में बारी-बारी से दाहिने और बायें तट पर मेले का संयुक्त आयोजन भी हुआ है। मेले के पूर्व बिलासपुर-रायपुर संभाग के रामनामी बहुल क्षेत्र से गुजरने वाली भव्य शोभा यात्रा का आयोजन भी किया गया है।

13 मई 2011 को इस हकीकत की कहानी, फिल्म्स डिवीजन के 51 मिनट के वृत्तचित्र, को सेंसर प्रमाण-पत्र मिला, जिसमें मैं विषय विशेषज्ञ के रूप में शामिल हूं। कमल तिवारी के कथालेख के साथ फिल्म शुरू होती है, कुछ इस तरह-
'समूची दुनिया किसी कथा के छूटे प्रभाव की तरह है' - योगवशिष्ठ कहता है। न जाने कितनी कथाएं हैं, जिनसे बनता है जगत।
एक कहानी यहां भी जी जा रही है। ... यहां श्रद्धा का एक सैलाब है जो तट पर बह निकला है। वैसे बहती श्रद्धा का आरंभ कहां होता है ... आत्मा का, विश्वासों का यह कौन सा भाव है जो अपने शरीर को ही वह पवित्र स्थल बना लेता है, जहां सारी श्रद्धा जैसे मंदिर की सी शक्ल में सिमट आती है। ... इसी आस्था की छुअन अपने शरीर पर लिये चले आए हैं। ये मेला है, आस्थाओं का समागम है, या जिन्दगी को जीने का एक अलग अंदाज़।
ये रामकहानी है, रामनामी समाज की। एक ऐसा समुदाय जो अपने होने में ही एक कथा है। इनके शरीर पर उभरते ये शब्द महज शब्द नहीं, जीवन को जीने के, समझने के सूत्र हैं। इन्हीं सूत्रों से बुनी गई है, रामनामी समाज की गाथा। वो गाथा जो एक सदी से कुछ ज्यादा समय में ले पाई है आकार। रामनामी समुदाय की पहचान है, उनके शरीर पर गुदने के रूप में लिखा रामराम। उनके सिर पर विराजता मोर मुकुट और बदन पर रामराम लिखा बाना।
... ट्रेलर समाप्त... आगे 'रुपहले परदे' पर देखना चाहें तो स्वयं उद्यम करें, या लाइव के लिए आ जाएं छत्तीसगढ़, आपका स्वागत है। आपने समझ लिया हो कि यह पोस्‍ट छत्‍तीसगढ़, फिल्‍म और स्‍वयं के प्रचार-प्रसार के लिए है, तो कहने की इजाजत लूंगा कि 'आप तो बड़े समझदार निकले।'

सभी तस्वीरें फिल्म निर्देशक भोपाल के सुनिल शुक्ल (अपना नाम वे इसी तरह लिखते हैं) ने उतारी हैं। मेरे प्रोफाइल वाली तस्वीर भी उन्हीं की ली हुई है। इस फोटो पर शुभाशंसा मिलती रही है, मैं सब से कहता हूं कि शकल तो वही है, जो हमेशा से है, लेकिन इसमें अलग कुछ है तो वह सुनिल जी की फोटोग्राफी के बदौलत है, सो इस मामले के सारे पिछले-अगले काम्प्लिमेंट, उन्हीं के नाम, रामराम।
28 सितंबर 2011, दैनिक भास्‍कर, रायपुरके सिटी भास्‍कर मुख्‍य पृष्‍ठ क्र. 17 की कतरन
इस तरह से भी प्रकाशित हुआ
इसका एक जिक्र राम के दीवाने... शीर्षक से भी है।

अखिल भारतीय रामनामी महासभा के तत्वाधान में आयोजित वार्षिक सम्मेलन (रामराम बड़े भजन मेला) की यह वर्षवार सूची मुख्यतः श्री गुलाराम जी द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर है। वर्षवार भजन मेला एक-एक वर्ष महानदी के दाएं और बाएं आयोजित होता है। बाद में दाएं और बाएं दोनों ओर भी आयोजित हुआ, जिसे दा/बा से दर्शाया गया है।

1910-पिरदा, 1911-पिरदा, 1912-देवरबोड़, 1913-मंधाईभांठा 1914-दुर्ग, 1915-मुड़पार,
1916-परसाडीह, 1917-बड़े चुरेला 1918-छपोरा, 1919-छोटे चुरेला, 1920-सेंदरी,
1921-भिनोदा 1922-प्रधानपुर, 1923-कुरदी, 1924-भांठागांव, 1925-पिकरीपार
1926-जोगीडीपा, 1927-बटउपाली, 1928-जांजगीर, 1929-कोड़िया 1930-परसाडीह,
1931-रींवांपार, 1932-मोहतरा (बालपुर), 1933-कुटराबोर 1934-रमतला, 1935-पतेरापाली,
1936-बरभांठा, 1937-भटगांव 1938-भदरा, 1939-अकलतरा, 1940-बड़े सीपत,
1941-ग्वालिनडीह 1942-कोसीर, 1943-फगुरम, 1944-कटेकोनी, 1945-मड़वा,
1946-तालदेवरी, 1947-बिसनपुर, 1948-रायगढ़, 1949-सेन्दुरास 1950-केसला,
1951-दहिदा, 1952-मालखरौदा, 1953-खैरा 1954-ठठारी, 1955-छोइहा,
1956-सारसकेला, 1957-जेवरा 1958-रबेली, 1959-धनगांव, 1960-जवाली पुरेना,
1961-मल्दा 1962-करही, 1963-जमगहन, 1964-ओड़ेकेरा, 1965-डोमाडीह
1966-धुरकोट, 1967-मोहतरा, 1968-छपोरा, 1969-रईकोना 1970-खपरीडीह,
1971-चंदई, 1972-मौहापाली, 1973-पवनी 1974-सिंघरा, 1975-बलौदी-मुड़वाभांठा,
1976-कोरबा-छोटे सीपत, 1977-बरदुला-पासीद 1978-नरियरा, 1979-गोरबा, 1980-धुरुवाकारी,
1981-छिन्द, 1982-हरियाठी 1983-पंडरीपानी, 1984-बड़े पंड़रमुड़ा, 1985-सरसीवां,
1986-परसाडीह 1987-अरजुनी, 1988-सूपा, 1989-लेंन्ध्रा, 1990-कांशीगढ़
1991-कैथा, 1992-देवरीगढ़, 1993-नाचनपाली, 1994-पंडरीपानी-नवापारा दा-बा
1995-बिलासपुर-उरकुली दा-दा, 1996-परसदा-बेलादुला दा-बा 1997-खरकेना-कपिस्दा बा-दा,
1998-गौरादादर-खमरिया दा-बा 1999-मुनगाडीह-आनंदपारा (चुरेला) दा-दा,
2000-मरघटी-चरौदा बा-बा 2001-हरदी दा, 2002-चिस्दा-ठनगन बा-बा, 2003-दोमुहानी बा
2004-चारपारा बा, 2005-डंगनिया दा, 2006-बंदोरा बा 2007-शुक्लाभांठा दा,
2008-कुशियारीडीह-तुलसी बा-बा, 2009-पेलागढ़-गिरसानाला दा-दा,
2010-पिरदा (शताब्दी वर्ष) दा
2011-पंडरीपाली-बरतुंगा दा-दा, 2012-कुसमुल-कुटेला दा-दा
2013-बेल्हा (बिलाईगढ़) दा, रेड़ा (सारंगढ़) दा, रक्शा (कोसिर) दा
2014-रेड़ा से लालमाटी (हसौद) बा, रक्शा से बासिन (घोघरी) बा, बेल्हा से बिनौरी (मलार) बा
2015-कोदवा, 2016-रानीसागर-नगझर, 2017- इंदिरानगर (कोसीर)-तुषार,
2018- कुरदा-मुड़पार, 2019- सलौनीकला-गौराडीह, 2020- पिकरीपार,
2021- नंदेली-चंदलीडीह