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Sunday, May 6, 2012

सिनेमा सिनेमा

आशीष कुमार दास
सिनेमा के 100 वर्षों के सफर को भिलाई के आशीष कुमार दास जी ने छत्तीसगढ़ रेडियो श्रोता संघ, रायपुर और मोहम्मद नईम तथा अपने अन्‍य सहयोगियों की मदद से आज रायपुर में प्रदर्शित किया। आशीष जी के पास पुराने दस्‍तावेजों, प्राचीन सिक्‍कों के अतिरिक्‍त महात्‍मा गांधी, नेहरू जी, नेताजी बोस, गुरुदेव रवीन्‍द्र, स्‍वतंत्रता संग्राम संबंधी सामग्री का भी संकलन है। भारतीय सिनेमा की इस प्रदर्शनी में फिल्मों के लगभग 100 बुकलेट-पुस्तिकाओं का संकलन रखा गया है। चलचित्रों की इस प्रदर्शनी की झलक, चित्रों में-
फिल्‍म पुस्तिकाएं
सिनेमा हाल के टिकट
द राजपूताना टाकीज लिमिटेड, जयपुर का शेयर सर्टिफिकेट
बाम्‍बे टाकीज के फिल्‍मों की सूची यहां दर्ज है.
रियासती पोस्‍ट कार्ड पर फिल्‍मी विज्ञापन
इस फिल्‍म के छत्‍तीसगढ़ से रिश्‍ते की बात होती है
और दर्शाया कलाकार, अन्‍य राजकुमार (छोटे) हैं. 
फीयरलेस नाडिया और जान कवास के साथ पेश
बकरा कल्‍लू उस्‍ताद
स्‍वयं के हस्‍ताक्षर युक्‍त देविका रानी का दीवाली ग्रीटिंग कार्ड

छत्‍तीसगढ़ के एक और खोजी शिवानंद कामड़े जी और 'आलम आरा' की बातें अगली किसी पोस्‍ट के लिए।

Sunday, February 12, 2012

रुपहला छत्‍तीसगढ़

'जय शंकर', हबीब जी के नया थियेटर का अभिवादन-संबोधन रहा है। 'पीपली लाइव' के पात्र इसका अनुकरण करते हैं तब लगता है कि हम नया थियेटर के किसी वर्कशाप में उपस्थित हैं। फिल्‍म आरंभ होती है हबीब तनवीर और नया थियेटर को धन्‍यवाद देते हुए। निर्माता आमिर खान हबीब जी से जुड़े रहे हैं तो फिल्‍म के निर्देशक दम्पति अनुशा रिजवी और महमूद फारूकी (सह-निर्देशक) हबीब जी के करीबी रहे हैं। इस सिलसिले के चलते फिल्म के नायक 'नत्था' यानि ओंकार दास मानिकपुरी के साथ छत्तीसगढ़वासी (नया थियेटर के) कलाकारों का लगभग पूरा समूह, चैतराम यादव, उदयराम श्रीवास, रविलाल सांगड़े, रामशरण वैष्णव, मनहरण गंधर्व, और लता खापर्डे फिल्म में हैं। पात्र शैल सिंह- अनूप रंजन पांडे के पोस्‍टर और नारों की झलक फिल्‍म में जगह-जगह है। शुरुआती एक दृश्‍य में नत्‍था, लोकप्रिय छत्‍तीसगढ़ी ददरिया 'आमा ल टोरेंव...' की पंक्तियां गाते, जाता दिखाया गया है।

फिल्‍म में 'महंगाई डायन' के अलावा गीत है 'चोला माटी के हे राम'। लता मंगेशकर ने आमिर खान को शुभकामनाएं दीं- ''आपने लोक गीत गायकों से इतने अलग ढंग का गाना रिकॉर्ड कराया। आप हमेशा कुछ नया और अलग प्रयोग करते हैं।'' मानों इस ट्‌वीट में वे गीत को बरबस गुनगुना भी रही हैं।
छत्‍तीसगढ़ी गीत गाने की तैयारी में
लता जी, संगीतकार कल्‍याण सेन के साथ
वैसे लता जी, ऊषा मंगेशकर के साथ सन 2005 में छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍म 'भकला' के लिए गीत 'छुट जाही अंगना...' गा चुकी हैं। संयोगवश इस गीत की पृष्‍ठभूमि विवाह (सास-बहू) और विछोह यानि राग-विराग का द्वंद ही है। 'चोला माटी के ...' प्रायोगिक लोक गीत ही है, जो अब इस फिल्म के गीत के रूप में जाना जाने लगा। काफी पहले से सुनते आए इस गीत की पंक्तियां यहां नगीन तनवीर के ही गाये हबीब जी के जीवन-काल में रिकॉर्ड हो चुके गीतों की सीडी से ली गई है। दोनों में कोई खास फर्क नहीं है। गीत के बोल हैं -

चोला माटी के हे राम
एकर का भरोसा, चोला माटी के हे रे।
द्रोणा जइसे गुरू चले गे, करन जइसे दानी
संगी करन जइसे दानी
बाली जइसे बीर चले गे, रावन कस अभिमानी
चोला माटी के .....
कोनो रिहिस ना कोनो रहय भई आही सब के पारी
एक दिन आही सब के पारी
काल कोनो ल छोंड़े नहीं राजा रंक भिखारी
चोला माटी के .....
भव से पार लगे बर हे तैं हरि के नाम सुमर ले संगी
हरि के नाम सुमर ले
ए दुनिया माया के रे पगला जीवन मुक्ती कर ले
चोला माटी के .....

फिल्‍म की म्‍यूजिक लांचिंग से लौटे कोल्हियापुरी, राजनांदगांव निवासी अमरदास मानिकपुरी ने बताया कि शुरुआती दौर में 'चोला माटी के' गीत को टोली के फिदाबाई, मालाबाई, भुलवाराम, बृजलाल आदि गाया करते थे लेकिन तब से लेकर फिल्‍म के लिए हुई रिकार्डिंग और म्‍यूजिक लांचिंग के लाइव शो में भी मांदर की थाप उन्‍हीं की है।

इंटरनेट पर उपलब्‍ध इस गीत के फिल्‍मी संस्‍करण के बोल अंगरेजी-रोमन में हैं (हिन्‍दी फिल्‍मों का कारोबार इसी तरह चलता है) और जाहिर है कि किसी छत्‍तीसगढ़ी जानने वाले की मदद नहीं ली गई है, इसलिए यहां बोल में, भरोसा, दानी व अभिमानी के बदले क्रमशः बरोसा, दाहिक व बीमाही जैसी कई भूलें हैं। गीत के गायक और संगीतकार का नाम नगीन तनवीर और गीतकार, गंगाराम सखेत अंकित है। फिल्‍म में एक कदम आगे बढ़कर स्‍पष्‍ट किया गया है कि गीत की धुन मध्‍यप्रदेश के गोंड़ों की है और गीतकार छत्‍तीसगढ़ के लोक कवि हैं।

गीत के संदर्भ और पृष्‍ठभूमि की बात आगे बढ़ाएं। यह गीत छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती मंडलाही झूमर करमा धुन में है, जिसका भाव छत्तीसगढ़ के पारम्परिक कायाखंडी भजन (निर्गुण की भांति) अथवा पंथी गीत की तरह (देवदास बंजारे का प्रसिद्ध पंथी गीत- माटी के काया, माटी के चोला, कै दिन रहिबे, बता ना मो ला) है। इसी तरह का यह गीत देखें -
हाय रे हाय रे चंदा चार घरी के ना
बादर मं छुप जाही चंदा चार घरी के ना
जस पानी कस फोटका संगी
जस घाम अउ छइंहा
एहू चोला मं का धरे हे
रटहा हे तोर बइंहा, रे संगी चार घरी के ना।

अगर हवाला न हो कि यह गीत खटोला, अकलतरा के एक अन्जान से गायक-कवि दूजराम यादव की, लगभग सन 1990 की रचना है तो ('पानी कस फोटका' का साम्‍य गुलजार के 'बुलबुला है पानी का' से याद करते हुए) यह झूमर करमा का पारंपरिक लोक गीत मान लिया जावेगा। यह चर्चा का एक अलग विषय है, जिसके साथ पारंपरिक पंक्तियों को लेकर नये गीत रचे जाने के ढेरों उदाहरण हैं।

परम्‍परा की तलाश में एक और तह पर चलें- छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का एक बड़ा भाग प्राचीन महापाषाणीय (मेगालिथिक) शवाधान संस्‍कृति के प्रमाण युक्त है। यहां सोरर-चिरचारी गांव में 'बहादुर कलारिन की माची' नाम से प्रसिद्ध स्थल है और इस लोक नायिका की कथा प्रचलित है। शवाधान क्षेत्र की संरचना अवशेष को बहादुर कलारिन की माची मानना और इस पृष्‍ठभूमि पर तैयार नाटक में शरीर की नश्‍वरता का गीत 'चोला माटी के...' के संयोग में तो काव्‍य सी तरलता भी है। हबीब जी ने इसे आधार बनाकर 'बहादुर कलारिन' नाटक रचा, जिसमें प्रमुख भूमिका फिदाबाई (अपने साथियों में फीताबाई भी पुकारी जाती थीं।) निभाया करती थीं।

फिदाबाई मरकाम की प्रतिभा को छत्‍तीसगढ़ी लोकमंचों के पुरोधा दाऊ मंदराजी ने पहचाना था। छत्तीसगढ़ी नाचा में नजरिया या परी भी पुरुष ही होते थे लेकिन नाचा में महिला कलाकार की पहली-पहल उल्लेखनीय उपस्थिति फिदाबाई की ही थी। वह हबीब जी के नया थियेटर से जुड़ कर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहुंचीं। तुलसी सम्मान, संगीत नाटक अकादेमी सम्मान प्राप्त यह कलाकार चरनदास चोर की रानी के रूप में अधिक पहचानी गईं। फिदाबाई के पुत्र मुरली का विवाह धनवाही, मंडला की श्यामाबाई से हुआ था। पारंपरिक गीत 'चोला माटी के हे राम' का मुखड़ा हबीब जी ने श्यामाबाई की टोली से सुना और इसका आधार लेकर उनके मार्गदर्शन में गंगाराम शिवारे (जिन्हें लोग गंगाराम सिकेत भी और हबीब जी सकेत पुकारा करते थे) द्वारा सन 1978 में तैयार हुआ। यह गीत पारागांव, महासमुंद के 'बहादुर कलारिन' वर्कशाप में नाटक का हिस्‍सा बना। जैसे 'सास गारी देवे' पारंपरिक ददरिया सन 1973 में हबीब जी के रायपुर नाचा वर्कशाप में रचे नाटक 'मोर नांव दमांद, गांव के नांव ससुरार' में गीत बन कर शामिल हुआ था।

'दिल्ली 6' का गीत 'सास गारी देवे' गीत थोड़े फर्क से छत्तीसगढ़ी फिल्म 'मया दे दे मयारू' में भी आया है, लेकिन मूलतः रिकार्डेड हबीब तनवीर जी की टोली के गाये इस गीत के बोल हैं -

सास गारी देवे, ननंद मुंह लेवे, देवर बाबू मोर।
संइया गारी देवे, परोसी गम लेवे, करार गोंदा फूल।
केरा बारी में डेरा देबो चले के बेरा हो॥
आए बेपारी गाड़ी म चढ़िके।
तो ल आरती उतारव थारी म धरिके हो॥ करार...
टिकली रे पइसा ल बीनी लेइतेंव।
मोर सइकिल के चढ़इया ल चिन्ही लेइतेंव ग॥ करार...
राम धरे बरछी लखन धरे बान।
सीता माई के खोजन बर निकलगे हनुमान ग॥ करार...
पहिरे ल पनही खाये ल बीरा पान।
मोर रइपुर के रहइया चल दिस पाकिस्तान ग॥ करार...

लगभग 35 साल पुराना रिकार्ड, जिसके 'ए' साइड में 'तो ल जोगी जानेंव रे भाई, तो ल साधु जानेंव ग' था और 'बी' साइड में यह गीत 'सास गारी देवे' था, जिसके समूह स्वर में हबीब जी की आवाज साफ पहचानी जा सकती है, किंतु पूरे महत्‍व के साथ भुलवाराम यादव, बृजलाल लेंझवार, लालूराम और बरसन बाई, चम्पा जैसे नामों का उल्लेख जरूरी है, जिनके स्वर में यह गीत रिकार्ड हुआ था। बताया जाता है कि यह गीत रघुवीर यादव से होकर एआर रहमान तक पहुंचा और अब इस पारंपरिक धुन वाले गीत के संगीतकार के रूप में उनका नाम है। गीत के फिल्‍मी संस्‍करण के गीतकार प्रसून जोशी तथा गायिकाएं रेखा भारद्वाज, श्रद्धा पंडित और सुजाता मजुमदार हैं, इसके बोल हैं-

सैंया छेड़ देवे, ननद चुटकी लेवे, ससुराल गेंदा फूल
सास गारी देवे, देवर समझा लेवे, ससुराल गेंदा फूल
छोड़ा बाबुल का अंगना, भावे डेरा पिया का हो, सास गारी ...
सैंया है व्‍यापारी, चले है परदेस सुरतिया निहारूं,
जियरा भारी होवे, ससुराल ...
बुश्‍शर्ट पहिने, खाई के बीड़ा पान पूरे रायपुर से अलग है,
सैंया जी की शान, ससुराल ...

इस पारंपरिक ददरिया के मूल बोल और धुन, लोक की थाती है। ददरिया में पारंपरिक पंक्तियों को लेकर सवाल-जवाब किस्म की आशु तुकबंदियां गाते-गाते ही, राउत नाच के दोहों, बस्‍तर में नाट, जगार आदि के चाखना और सरगुजा के बायर पदों की तरह, गढ़ ली जाती हैं, यानि गायक-गीतकार का फर्क लगभग नहीं होता, इसलिए गाने के साथ जोड़-घटाव, परिवर्तन आसानी से संभव होता है और परम्परा में यह हर गाने वाले के साथ अपना हो जाता है।

इन दोनों गीतों की चर्चा के साथ छत्‍तीसगढ़ के फिल्‍मी रिश्‍तों को याद कर लेना प्रासंगिक होगा। सन 1948/1953 में आई फिल्मिस्‍तान की दिलीप कुमार और कामिनी कौशल अभिनीत 'नदिया के पार' से, फिल्‍मों में छत्‍तीसगढ़ी गीतों का प्रवेश माना जाता है, इसके शुरुआती हिस्‍से में मल्‍लाहों के (किशोर साहू के लिखे) संवाद में तो छत्‍तीसगढ़ी का पुट है लेकिन गीतकार मोती के 'मोरे राजा हो ले चल नदिया के पार' गीत सहित फिल्‍म में कोई छत्‍तीसगढ़ी गीत नहीं है। इसी प्रकार 1960 की फिल्‍म 'माया मछिन्‍दर', जिसमें मनहर देसाई ने मछेन्‍द्रनाथ और (छोटे) राजकुमार ने गोरखनाथ की भूमिका निभाई थी, की चर्चा फिल्‍म में शामिल किसी छत्‍तीसगढ़ी गीत के लिए की जाती है, साथ ही पुरानी बस्‍ती, रायपुर निवासी बहुमुखी प्रतिभा के धनी पहलवान-कवि-गायक मोहनी पोद्दार (सोनी) का ददरिया जैसा ही गीत 'दाई मोर बर मछरी ले दे' रंजीत मूवीटोन की किसी फिल्‍म में शामिल, पहला छत्‍तीसगढ़ी गीत बताया जाता है, किंतु इनकी पुष्टि मेरे स्‍तर पर अब तक संभव नहीं हुई।

सन 1920 में खड़गवां, कोरिया में राजदान मैनेजर बन कर आए, 1943 वाली फिल्‍म रामराज्‍य के राम, प्रेम अदीब की बहन इसी परिवार में ब्‍याही थीं, इसके चलते प्रेम अदीब के बचपन के उन्‍नीस सौ तीसादि दशक के कुछ साल यहां बीते और प्राथमिक शिक्षा हुई। इसी तरह ऋत्विक घटक के मामा के के राय, कोरिया स्‍टेट में अभियंता थे और तब उन्‍नीस सौ चालीसादि दशक में ऋत्विक घटक उनके साथ रहते हुए स्‍कूल की कुछ कक्षाएं यहां पढ़े तो 1959-60 में अपूर संसार का कुछ हिस्‍सा फिल्‍माने सत्‍यजित राय चिरमिरी-बैकुंठपुर आए। लगभग 1964 में सुलक्षणा पंडित ने प्राइमरी स्‍कूली पढ़ाई का एक साल जांजगीर जिले के उसी नरियरा में बिताया, जिस गांव का उल्‍लेख अमृता प्रीतम की कहानी गांजे की कली में है।

16 अप्रैल, 1965 को प्रदर्शित लेखक, निर्माता, निर्देशक मनु नायक की 'कहि देबे संदेस' वस्‍तुतः पहली छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍म है, जिसके संगीतकार मलय चक्रवर्ती और गीतकार डॉ. हनुमंत नायडू (राजदीप) हैं। इसके बाद निर्माता विजय कुमार पाण्‍डेय और लेखक-दिगदर्शक निरंजन तिवारी की 1971 में रिलीज 'घर द्वार', जिसके संगीतकार जमाल सेन और गीतकार हरि ठाकुर थे। अब तक छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍मों के लिए लता मंगेशकर, मोहम्‍मद रफी, महेन्‍द्र कपूर, साधना सरगम, कुमार शानू, अनूप जलोटा, विनोद राठौर, उदित नारायण, सुदेश भोंसले, कविता कृष्‍णमूर्ति, सुमन कल्‍याणपुर, मीनू पुरषोत्‍तम, मन्‍ना डे, बाबा सहगल, अनुराधा पौडवाल, सोनू निगम, अभिजीत, बाबुल सुप्रियो और सुरेश वाडकर आदि भी अपना स्‍वर दे चुके हैं।

कुछ और संदर्भों का स्‍मरण। सन 1957 में बनी अर्न सक्‍सडॉर्फ की स्‍वीडिश फिल्‍म के प्रदर्शन से बस्‍तर, गढ़ बेंगाल निवासी दस वर्षीय बालक चेन्‍दरू अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर प्रसिद्ध हुआ। फिल्‍म का नाम 'एन डीजंगलसागा' ('ए जंगल सागा' या 'ए जंगल टेल' अथवा अंगरेजी शीर्षक 'दि फ्लूट एंड दि एरो') था। फिल्‍म में संगीत पं. रविशंकर का है, उनका नाम तब उजागर हो ही रहा था। यह कान फिल्‍म फेस्टिवल 1958 में प्रदर्शित फिल्‍मों की सूची में रही है। उसी दौरान चेन्‍दरू और शेर के साथ उसकी दोस्‍ती पर किताब भी प्रकाशित हुई। सन 1998 में अधेड़ हुए चेन्‍दरू और इस पूरे सिलसिले को नीलिमा और प्रमोद माथुर ने अपनी फिल्‍म 'जंगल ड्रीम्‍स' का विषय बनाया। चेन्‍दरू, इन दिनों अपने गांव में 'गैर-फिल्‍मी' दिनचर्या बसर कर रहा है, किन्‍तु रूपहले परदे का पहला छत्‍तीसगढ़ी सुपर स्‍टार वही है।

फिदाबाई ने भी विदेशी फिल्‍मों में काम किया है। हार्वे क्रासलैंड निर्देशित सन 1993 में बनी भारत-कनाडाई फिल्‍म 'द बर्निंग सीजन' के लिए भुलवाराम ने गीत गाया है, जिस छत्‍तीसगढ़ी गीत की शुरुआत हिन्‍दी जैसी है-
कोई नहीं है साथी अरे मन तेरा कोई नहीं साथी
भाई बइठे, भतीजा बइठे, बइठे बेटा नाती
इनके आगे में जीव निकलगे, पथरा के कर लिन्‍ह छाती
कोई नहीं है साथी.....

इस क्रम में छत्‍तीसगढ़ के निर्माता-निर्देशक कांतिलाल राठोड़ की 'कंकु' को 1970 का श्रेष्‍ठ गुजराती फीचर फिल्‍म का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिला और यह इसी साल अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह, शिकागो में भी पुरस्‍कृत हुई। 1980 की मिथुन-स्मिता की कम चर्चित लेकिन महत्‍वपूर्ण हिन्‍दी फिल्‍म 'द नक्‍सलाइट्स' के लिए निर्माता-निर्देशक ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास जगदलपुर में रहे, फिल्‍म का कुछ भाग कुरंदी (कोटपाड़) गांव में फिल्‍माया गया। मणि कौल ने सन 1980 में मुक्तिबोध के 'सतह से उठता आदमी' पर नीला अहमद (नीलू मेघ) की मुख्‍य भूमिका वाली तथा साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कार और पं. सुंदरलाल शर्मा सम्‍मान प्राप्‍त विनोद कुमार शुक्‍ल के प्रसिद्ध उपन्‍यास 'नौकर की कमीज' पर सन 2000 में पंकज मिश्रा अभिनीत फिल्‍म बनाई। सन 1981 में सत्‍यजित राय की प्रेमचंद की कहानी पर, छत्‍तीसगढ़ में फिल्‍माई टेली फिल्‍म 'सद्गति' है, जिसमें भैयालाल हेड़उ मुख्‍य भूमिका में तथा बाल कलाकार ऋचा मिश्रा (अब डॉ. ऋचा ठाकुर) हैं। प्रसिद्ध कत्‍थक नृत्‍यांगना वासंती वैष्‍णव, सन 1993 में बनी फिल्‍म 'अनुकंपन' में अपनी भूमिका की चर्चा करती हैं। सरगुजा में हाथियों की पृष्‍ठभूमि पर सन 1994 में बनी माइक पांडे की फिल्‍म 'द लास्‍ट माइग्रेशन', चर्चित और पुरस्‍कृत हुई। सन 2005 में बनी बाल चित्र समिति की फिल्‍म ‘छुटकन की महाभारत’ रायगढ़ के ग्राम भेलवाटिकरा के आसपास फिल्‍माई गई और इस फिल्‍म में वरिष्‍ठ रंगकर्मी अनिल कालेले के अलावा इप्‍टा, रायगढ़ के कलाकारों सहित सरपंच के रूप में अजय आठले की मुख्‍य भूमिका थी।

श्‍याम बेनेगल की चरनदास चोर में नाचा कलाकार लालूराम, मदन निषाद ने और सन 1999 में बनी उनकी फिल्‍म 'समर' में राजकमल नायक ने अभिनय किया है। बस्‍तर पर बेनेगल ने वृत्‍त चित्र बनाया ही, सन 1980 में 'कस्‍तूरी' नामक फीचर फिल्‍म भी बनी, बिमल दत्‍त की इस फिल्‍म में मिथुन चक्रवर्ती, नूतन, श्रीराम लागू, अरविंद देशपांडे जैसे अभिनेता हैं। फिल्‍म की अन्‍य विधाओं व अभिनय में पं. सत्‍यदेव दुबे, अशोक मिश्र, अनुराग बसु, सूरज (जाफर अली) फरिश्‍ता, गोपाल (जी.एम.) भटनागर, संदीप श्रीवास्‍तव, जयंत देशमुख, संजय बत्रा, शंकर सचदेव, सोमेश अग्रवाल, प्रसिद्ध वामन कलाकार राजनांदगांव के श्रीराम नत्‍थू दादा, 'फंस गए रे ओबामा' वाले बस्‍तर के दिनेश नाग और रायगढ़ के स्‍वप्निल कोत्रीवार हैं। छत्‍तीसगढ़ के निर्माता निशांत त्रिपाठी-अभिषेक मिश्रा और निर्देशक मनीष मानिकपुरी की हिन्‍दी फिल्‍म 'आलाप' इसी साल मार्च में प्रदर्शित होने वाली है, फिल्‍म में अमित पुरोहित के साथ रघुवीर यादव-ओंकारदास मानिकपुरी जोड़ी ने भी (यहां जीजा-साला) अभिनय किया है।

भुलाए-से इन गीत-प्रसंगों में छत्तीसगढ़ी रुपहले ख्‍वाबों और सुर-संवाहकों के बहाने अपनी परम्परा-स्‍मृति को खंगालने और ताजी कर लेने का यह वक्‍त है। लोक परम्‍परा की सीमा लांघते हुए छत्‍तीसगढ़ के पहचान का परिशिष्‍ट जुड़ रहा है तो यह मौका है अपनी इकहरी होती याद को संदर्भ के साथ व्यापक करने का, आत्म सम्मान को परम्परा के सम्मान में समाहित करने का। यही लोक-संगीत, परम्परा का सूत्र बनकर संस्कृति को संबल देगा।
मेरी पोस्‍ट क्रमशः दिल्‍ली-6, सास गारी देवे, पीपली में छत्‍तीसगढ़ और छत्‍तीसगढ़ी फिल्‍म में तथा पत्रिकाओं बिलासपुर की 'मड़ई' 2010, रायपुर की 'दशहरा', रायगढ़ की 'रंगकर्म' 2011 और हरिभूमि अखबार के चौपाल 6 अक्‍टूबर 2011 में प्रस्‍तुत मेरे लेखों की जानकारी को एक साथ और अद्यतन कर यहां प्रस्‍तुत किया गया है।

Saturday, November 12, 2011

ईडियट के बहाने

भेद-भाव की अपनी समस्‍याएं हैं तो समानता के भी अलग संकट हैं, ऐसी किसी वजह से ''एक सिर बराबर एक मत (वोट)'', बीसवीं सदी का सबसे खतरनाक अविष्कार कहा गया होगा। 'थ्री ईडियट्‌स' फिल्म की प्रशंसा से अलग कुछ कहना शायद इसीलिए जल्दी संभव नहीं हुआ। उग्र प्रजातंत्र के माहौल में अपनी राय प्रकट करने के पहले कोई पक्ष बहुमत बन चुका हो तो सावधानी जरूरी है। लेकिन यहां राय, अल्पमत में रहकर विशेषाधिकार पा लेने या धारा के विरुद्ध खड़े होने जैसी क्रांतिकारिता के कारण नहीं है और यह वाद-विवाद प्रतियोगिता भी तो नहीं, जिसमें अपनी बात 'मैं इस सदन की राय के विपक्ष में कहने खड़ा हुआ हूं' इस जुमले की तरह रस्‍मी हो।

आप कभी-कभार और मुख्‍यतः अत्यधिक अनुशंसा के कारण फिल्में देखने जाते हों तो वापस आकर फिल्म की आलोचना का साहस जुटाना कठिन हो जाता है, क्योंकि ऐसा करने पर आप अनुशंसकों के आलोचक बनते हैं फिर निर्माता-निर्देशक ने तो आपको आमंत्रित किया नहीं था, आपने खुद चलकर, समय लगाकर, खर्च कर फिल्म देखी इसलिए फिल्म देखने का अपना निर्णय ईडियॉटिक मानने के बजाय, दुमकटी लोमड़ी बनकर हां में हां मिलाना अधिक सुविधाजनक और समझदारी भरा जान पड़ता है।

यह फिल्म पसंद न आने में मैंने अपने संस्कार और रूढ़ मन को टटोलना शुरू किया। सत्तरादि दशक के आरंभ में हम माध्यमिक शाला की पढ़ाई आठवीं कक्षा पास कर लेते तो उच्चतर शाला की नवीं कक्षा में प्रवेश के लिए जाते, बिना ताम-झाम और तैयारी के। पढ़े-लिखे, जागरूक अभिभावकों को भी खबर नहीं होती थी। सब गुरुजी तय कर देते। साठ फीसदी तक अंक वाले छात्रों का नाम नवीं 'अ' में पचास तक 'ब' में और उसके नीचे 'स' में। अ का मतलब होता, गणित विषय, इन्जीनियर, ब का मतलब बायोलाजी (उच्चारण होता बैलाजी) यानि डाक्टर बनेगा और बचे-खुचों के लिए स, माना जाता कि आगे पढ़ना तो है ही सो स यानि कला की पढ़ाई और क्या बनेगा के सवाल पर जवाब होता- अफसर न हुआ तो काला कोट पहनेगा, तो कभी भूगोल की प्रायोगिक कक्षा की याद दिला कर कहा जाता जमीन की पैमाइश तो कर ही लेगा। इस अ, ब, स में परिवर्तन कभी-कभार ही होता।

नवीं 'ब' में भरती हुई लेकिन डॉक्टर बनने के लक्षण और योग्यता मेरे परीक्षा परिणामों में नहीं दिखी। अपनी क्षमताओं का 'तत्‍वज्ञान' मुझे तो काफी हद तक हो ही चला था, इससे एक तरफ परीक्षा प्रणाली पर मेरा विश्‍वास बना रह गया और दूसरी ओर स्नातक बनने के लिए बीएस-सी से बीए करने लगा। विषय चुनने की बात आई, तो इस बात पर दृढ़ रहा कि मेरी पढ़ाई का विषय भाषा-साहित्य या गणित नहीं होगा, क्‍योंकि ये दोनों विषय मुझे आरंभ से और अब भी उतने ही पसंद हैं। मुझे लगता, बल्कि दृढ़ मान्यता रही कि पढ़ाई के लिए विषय के रूप में इनका चयन कर लेने पर इनमें मेरी रुचि बनी नहीं रह पाएगी, इन विषयों की स्‍वाभाविक समझ और उनके प्रति मौलिक सोच बची न रह पाएगी, इन्‍हें प्रशिक्षित रूढ़ ढंग से देखना शुरू कर दूंगा और ये दोनों विषय तो यों भी पढ़ लूंगा फिर और कुछ क्यों न आजमाया जाए।

बाद में मेरी पढ़ाई और स्नातकोत्तर डिग्री प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व की हुई, बावजूद इसके कि विगत में रुचि होने पर भी इतिहास मेरे सख्‍त नापसंद का विषय था। विषय चयन करने की बात पर मैंने इतिहास के लिए अपनी अरुचि प्रकट की तो मुझसे इसका कारण पूछा गया। मैंने बताया कि तिथि-सन रटना न मुझे पसंद है न मुझसे हो सकता। तब बताया गया कि पुरातत्व ऐसा इतिहास है, जिसमें सन का रट्‌टा नहीं है। सदी से और कभी सदियों और सहस्राब्दी से भी काम चल जाता है फिर तो कुछ पता किए बिना यह चयन करने में कोई असमंजस नहीं रहा।

स्‍नातकोत्‍तर परीक्षा के प्रश्‍न-पत्रों के अंतराल में परीक्षा की पढ़ाई के साथ 'चांद का मुंह टेढ़ा है', 'कुरु कुरु स्‍वाहा' और 'प्‍लेग' पढ़ा। इस परीक्षाफल में मुझे प्रथम स्‍थान और फलस्‍वरूप स्‍वर्ण पदक प्राप्‍त हुआ। इस बार परीक्षा प्रणाली के प्रति विश्‍वास(?) बना कि मैं इस खेल के नियम कुछ-कुछ समझने लगा हूं, बस इतना ही और इसके बावजूद अव्‍वल आने की न चाहत बनी न आदत। वैसे भी अव्‍वल होते रहने के भाव के साथ कभी छल-छद्म का सहारा और सूक्ष्‍म हिंसा तो लगभग सदैव जुड़ी होती है।
अंततः संयोग यह भी बना कि निजी तौर पर अपरिग्रहवादी मैंने संग्रहालय विज्ञान में पत्रोपाधि ली। इस चाहे-अनचाहे अनिश्चित सिलसिले का सिला, शासकीय सेवा के अपने काम में पुरातत्व-इतिहास के साथ भ्रमण, दूरस्थ अंचलों में लंबी अवधि तक कैम्प, लोककला और संस्कृति से जुड़ाव का रुचि-अनुकूल अवसर मिलता रहा है।

थ्री ईडियट्‌स का नायक बीएड नहीं है, बाल मनोविज्ञानी भी नहीं, उद्यमी भी नहीं लेकिन स्कूल चला रहा है, व्यवसायी नहीं पर अविष्कार कर उसे पेटेंट करा रहा है। आइआइटीयन चेतन भगत युवा लेखक और विचारक हैं। दो-तीन आइआइटीयन को मैं जानता हूं, जिनमें से एक ने डिग्री पूरी कर सन्यास ले लिया, कोई रेडियो जॉकी बन गया या उनमें से कुछ और इसी तरह का भलता कुछ काम करने लगे और यों अपरिचित और काम के नए क्षेत्र में सफल भी हैं। देकार्त विधिस्नातक थे, सैनिक बने, गणित करने लगे और दार्शनिक के रूप में जाने गए। लियोनार्डो दा विंची, बैरिस्‍टर गांधी और आइसीएस बोस ... न जाने कितने उदाहरण हैं। पढ़ाई के विषय और रुचि में तादात्म्य, रोजगार-जीवन यापन की शुरुआत, बीच में बदलाव और कई बार उसके समानान्तर कार्य को रुचि के अनुकूल बना लेना या पसंद का काम, मुआफिक संभावना खोज लेना भी आवश्यक कौशल है।

'तारे जमीं पर' की याद करते चलें, जो मुझे कुछ बेहतर फिल्‍म लगी, बावजूद इसके कि डिस्लैक्सिया और बच्चों में छिपी नैसर्गिक प्रतिभा और उसके उजागर होने को गड्‌ड-मड्‌ड कर दिया गया है, मध्यान्तर तक नायक नहीं आता, लेकिन आता है तो फिर नायक, नायक ही है और ईशान भी अंततः फर्स्ट आता है, तभी जाकर फिल्म और शायद फिल्मकार की मुराद पूरी होती है।

थ्री ईडियट्‌स की कामेडी चर्चा में रही और पसंद की गई लेकिन यहां भी व्यापक मान्यता और स्वीकृति पा लेने के बाद इसे सहज आसानी से भोंडा की हद तक सुरुचिरहित कहना कठिन हो रहा है। फिल्म के हास्य की आलोचना की कठोरता कम करने के लिए यह कहा जा सकता है कि शालीनता और मर्यादा में हास्य की गुंजाइश कम होती है। अब तो 'दबंग' और 'डेल्ही बेली' भी हैं, जिसके भोंडेपन को जीवन और सामाजिक व्यवहार की स्वाभाविकता के तर्क में रंगा जा सकता है। इस फिल्म की कामेडी ऐसी है कि अपनी दिनचर्या में सभ्य नागरिक को इन बातों या स्थितियों का सामना करना पड़े तो वह असहज हो जाता है, लेकिन यहां...। सभ्य और नागरिक शब्द क्रमशः सभा और नगर से बने हैं और इसी तरह भदेस, गवांरु, देहाती शब्द देसी-गवंई से बने हैं लेकिन फूहड़ और अश्लील के लिए रूढ़ हो गए हैं। इसे संदर्भ के साथ आप जोड़ लें। मैं तो यही कहूंगा कि लोकप्रिय हो जाने के कारण, लोगों (बच्चे-बच्चे) की जबान पर चढ़ जाने के कारण भोंडे और फूहड़ को सुरुचिपूर्ण की स्वीकृति नहीं मिल जाती।

निष्कर्ष इतना कि कुछ अच्छे सीक्वेंस, संवाद, दृश्य-गीत के बावजूद मैं इसे बतौर अच्‍छी फिल्म स्‍वीकार नहीं कर पाया। बहरहाल, इस ईडियट के बहाने आमिर खान ने अपनी बाक्‍स आफिस समझ जरूर साबित की है।

Sunday, September 25, 2011

रामराम

वह परिवेश, जो होश संभालने के पहले से देखते रहें, उससे एक अलग ही रिश्ता होता है, जन्मना। जो पहले से है, वह सदैव से विद्यमान, शाश्वत लगता है। अक्सर उसके प्रति वैसा कुतूहल भी नहीं होता, क्योंकि हमारी जानी दुनिया वही होती है, मन मानता है कि वही दुनिया है और उसे वैसी ही होना चाहिए।
किसी रामनामी को पहली बार कब देखा, याद नहीं। कह सकता हूं कि होश संभालने के पहले से देखता रहा हूं। रामनामियों से मेरा ऐसा ही रिश्ता रहा है। जब देखा कि लोगों को आश्चर्य होता है, जिज्ञासा होती है इनके बारे में, तो मुझे अजीब लगा। बाद में जाना कि इनके बारे में जानने कोई अमरीकी आया करता था, शोध किया, वे डॉ. लैम्ब रामदास हुए, उनकी पुस्‍तक है- Rapt in the name: the Ramnamis, Ramnam, and untouchable religion in Central India। कुछ और परिचित पत्रकार-लेखक, अध्येता-विद्वानों को रूचि लेते देखा। दसेक साल पहले सुन्दरी अनीता से रामनामियों पर उनके शोध के दौरान मुलाकात और फिर मेल-फोन से सम्पर्क बना रहा। अनीता को लंदन विश्वविद्यालय से इस अध्ययन Dominant Texts, Subaltern Performances:Two Tellings of the Ramayan in Central India पर डाक्टरेट उपाधि मिली, जिसमें रामकथा, विशेषकर रामचरितमानस के पदों की खास 'रामनामी' व्याख्‍या और इस अंचल की रामलीला में कथा-प्रसंगों की निराली प्रस्तुति को शोध-अध्ययन का विषय बनाकर सामाजिक संरचना को समझने का प्रयास है।
बड़े भजन मेलों और शिवरीनारायण मेले में रामनामियों के साथ समय बिता कर मैंने देखा-जाना कि वे दशरथनंदन राम के नहीं बल्कि निर्गुण निराकार ब्रह्मस्वरूप राम के उपासक हैं और इस भेद को अपने तईं बनाए रखने के लिए राम का नाम एक बार कभी भूले से भी प्रयोग नहीं करते, रामराम ही कहते, लिखते, पढ़ते हैं (छत्‍तीसगढ़ी में इन्‍हें रामनामी नहीं रामरामी या रमरमिहा ही कहा जाता है)। रामराम पूरे शरीर पर, कहने से स्पष्ट नहीं हो पाता कि गुदना शरीर के गुह्‌य हिस्सों सहित आंख की पलकों और जीभ पर भी होता है। समय बदला है। पूरे शरीर पर गोदना, कम होते-होते माथे पर रामराम तक आया फिर हाथ में, लेकिन अब बिना गुदना के रामनामियों की संख्‍या बढ़ती जा रही है।
छत्तीसगढ़ में मेलों की गिनती का आरंभ अंचल की परम्परा के अनुरूप 'राम' अर्थात्‌ रामनामियों के बड़े भजन से किया जा सकता है, जिसमें पूस सुदी ग्यारस को ध्वजारोहण की तैयारियां प्रारंभ कर चबूतरा बनाया जाता है, दूसरे दिन द्वादशी को झंडा चढ़ाने के साथ ही मेला औपचारिक रूप से उद्‌घाटित माना जाता है, तीसरे दिन त्रयोदशी को भण्डारा में रमरमिहा सदस्‍यों एवं श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण होता है।
संपूर्ण मेला क्षेत्र में अलग-अलग एवं सामूहिक रामायण पाठ होता रहता है। नख-शिख राम-नाम गुदना वाले, मोरपंख मुकुटधारी, रामनामी चादर ओढ़े रमरमिहा स्त्री-पुरूष मेले के दृश्य और माहौल को राममय बना देते हैं। परिवेश की सघनता इतनी असरकारक होती है कि मेले में सम्मिलित प्रत्येक व्यक्ति, समष्टि हो जाता है। सदी पूरी कर चुका यह मेला महानदी के दाहिने और बायें तट पर, प्रतिवर्ष अलग-अलग गांवों में समानांतर भरता है। कुछ वर्षों में बारी-बारी से दाहिने और बायें तट पर मेले का संयुक्त आयोजन भी हुआ है। मेले के पूर्व बिलासपुर-रायपुर संभाग के रामनामी बहुल क्षेत्र से गुजरने वाली भव्य शोभा यात्रा का आयोजन भी किया गया है।

13 मई 2011 को इस हकीकत की कहानी, फिल्म्स डिवीजन के 51 मिनट के वृत्तचित्र, को सेंसर प्रमाण-पत्र मिला, जिसमें मैं विषय विशेषज्ञ के रूप में शामिल हूं। कमल तिवारी के कथालेख के साथ फिल्म शुरू होती है, कुछ इस तरह-
'समूची दुनिया किसी कथा के छूटे प्रभाव की तरह है' - योगवशिष्ठ कहता है। न जाने कितनी कथाएं हैं, जिनसे बनता है जगत।
एक कहानी यहां भी जी जा रही है। ... यहां श्रद्धा का एक सैलाब है जो तट पर बह निकला है। वैसे बहती श्रद्धा का आरंभ कहां होता है ... आत्मा का, विश्वासों का यह कौन सा भाव है जो अपने शरीर को ही वह पवित्र स्थल बना लेता है, जहां सारी श्रद्धा जैसे मंदिर की सी शक्ल में सिमट आती है। ... इसी आस्था की छुअन अपने शरीर पर लिये चले आए हैं। ये मेला है, आस्थाओं का समागम है, या जिन्दगी को जीने का एक अलग अंदाज़।
ये रामकहानी है, रामनामी समाज की। एक ऐसा समुदाय जो अपने होने में ही एक कथा है। इनके शरीर पर उभरते ये शब्द महज शब्द नहीं, जीवन को जीने के, समझने के सूत्र हैं। इन्हीं सूत्रों से बुनी गई है, रामनामी समाज की गाथा। वो गाथा जो एक सदी से कुछ ज्यादा समय में ले पाई है आकार। रामनामी समुदाय की पहचान है, उनके शरीर पर गुदने के रूप में लिखा रामराम। उनके सिर पर विराजता मोर मुकुट और बदन पर रामराम लिखा बाना।
... ट्रेलर समाप्त... आगे 'रुपहले परदे' पर देखना चाहें तो स्वयं उद्यम करें, या लाइव के लिए आ जाएं छत्तीसगढ़, आपका स्वागत है। आपने समझ लिया हो कि यह पोस्‍ट छत्‍तीसगढ़, फिल्‍म और स्‍वयं के प्रचार-प्रसार के लिए है, तो कहने की इजाजत लूंगा कि 'आप तो बड़े समझदार निकले।'

सभी तस्वीरें फिल्म निर्देशक भोपाल के सुनिल शुक्ल (अपना नाम वे इसी तरह लिखते हैं) ने उतारी हैं। मेरे प्रोफाइल वाली तस्वीर भी उन्हीं की ली हुई है। इस फोटो पर शुभाशंसा मिलती रही है, मैं सब से कहता हूं कि शकल तो वही है, जो हमेशा से है, लेकिन इसमें अलग कुछ है तो वह सुनिल जी की फोटोग्राफी के बदौलत है, सो इस मामले के सारे पिछले-अगले काम्प्लिमेंट, उन्हीं के नाम, रामराम।
28 सितंबर 2011, दैनिक भास्‍कर, रायपुरके सिटी भास्‍कर मुख्‍य पृष्‍ठ क्र. 17 की कतरन
इस तरह से भी प्रकाशित हुआ
इसका एक जिक्र राम के दीवाने... शीर्षक से भी है।

अखिल भारतीय रामनामी महासभा के तत्वाधान में आयोजित वार्षिक सम्मेलन (रामराम बड़े भजन मेला) की यह वर्षवार सूची मुख्यतः श्री गुलाराम जी द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के आधार पर है। वर्षवार भजन मेला एक-एक वर्ष महानदी के दाएं और बाएं आयोजित होता है। बाद में दाएं और बाएं दोनों ओर भी आयोजित हुआ, जिसे दा/बा से दर्शाया गया है।

1910-पिरदा, 1911-पिरदा, 1912-देवरबोड़, 1913-मंधाईभांठा 1914-दुर्ग, 1915-मुड़पार,
1916-परसाडीह, 1917-बड़े चुरेला 1918-छपोरा, 1919-छोटे चुरेला, 1920-सेंदरी,
1921-भिनोदा 1922-प्रधानपुर, 1923-कुरदी, 1924-भांठागांव, 1925-पिकरीपार
1926-जोगीडीपा, 1927-बटउपाली, 1928-जांजगीर, 1929-कोड़िया 1930-परसाडीह,
1931-रींवांपार, 1932-मोहतरा (बालपुर), 1933-कुटराबोर 1934-रमतला, 1935-पतेरापाली,
1936-बरभांठा, 1937-भटगांव 1938-भदरा, 1939-अकलतरा, 1940-बड़े सीपत,
1941-ग्वालिनडीह 1942-कोसीर, 1943-फगुरम, 1944-कटेकोनी, 1945-मड़वा,
1946-तालदेवरी, 1947-बिसनपुर, 1948-रायगढ़, 1949-सेन्दुरास 1950-केसला,
1951-दहिदा, 1952-मालखरौदा, 1953-खैरा 1954-ठठारी, 1955-छोइहा,
1956-सारसकेला, 1957-जेवरा 1958-रबेली, 1959-धनगांव, 1960-जवाली पुरेना,
1961-मल्दा 1962-करही, 1963-जमगहन, 1964-ओड़ेकेरा, 1965-डोमाडीह
1966-धुरकोट, 1967-मोहतरा, 1968-छपोरा, 1969-रईकोना 1970-खपरीडीह,
1971-चंदई, 1972-मौहापाली, 1973-पवनी 1974-सिंघरा, 1975-बलौदी-मुड़वाभांठा,
1976-कोरबा-छोटे सीपत, 1977-बरदुला-पासीद 1978-नरियरा, 1979-गोरबा, 1980-धुरुवाकारी,
1981-छिन्द, 1982-हरियाठी 1983-पंडरीपानी, 1984-बड़े पंड़रमुड़ा, 1985-सरसीवां,
1986-परसाडीह 1987-अरजुनी, 1988-सूपा, 1989-लेंन्ध्रा, 1990-कांशीगढ़
1991-कैथा, 1992-देवरीगढ़, 1993-नाचनपाली, 1994-पंडरीपानी-नवापारा दा-बा
1995-बिलासपुर-उरकुली दा-दा, 1996-परसदा-बेलादुला दा-बा 1997-खरकेना-कपिस्दा बा-दा,
1998-गौरादादर-खमरिया दा-बा 1999-मुनगाडीह-आनंदपारा (चुरेला) दा-दा,
2000-मरघटी-चरौदा बा-बा 2001-हरदी दा, 2002-चिस्दा-ठनगन बा-बा, 2003-दोमुहानी बा
2004-चारपारा बा, 2005-डंगनिया दा, 2006-बंदोरा बा 2007-शुक्लाभांठा दा,
2008-कुशियारीडीह-तुलसी बा-बा, 2009-पेलागढ़-गिरसानाला दा-दा,
2010-पिरदा (शताब्दी वर्ष) दा
2011-पंडरीपाली-बरतुंगा दा-दा, 2012-कुसमुल-कुटेला दा-दा
2013-बेल्हा (बिलाईगढ़) दा, रेड़ा (सारंगढ़) दा, रक्शा (कोसिर) दा
2014-रेड़ा से लालमाटी (हसौद) बा, रक्शा से बासिन (घोघरी) बा, बेल्हा से बिनौरी (मलार) बा
2015-कोदवा, 2016-रानीसागर-नगझर, 2017- इंदिरानगर (कोसीर)-तुषार,
2018- कुरदा-मुड़पार, 2019- सलौनीकला-गौराडीह, 2020- पिकरीपार,
2021- नंदेली-चंदलीडीह

Monday, September 12, 2011

हिन्‍दी

बुल्‍के जी की हस्‍तलिपि का नमूना
21-12-60 को रामवन, सतना के
 बाबू शारदाप्रसाद जी को लिखा पत्र,
 जिसमें 'भक्‍त शबरी' व रामकथा
संबंधी अन्‍य पुस्‍तकों का उल्‍लेख है।
हिन्‍दीसेवी बुल्‍के जी, फादर बुल्‍के के बजाय बाबा बुल्‍के कहलाने लगे थे। उन्‍होंने शायद हिन्‍दी सेवा का कोई घोषित किस्‍म का व्रत नहीं लिया, लेकिन सहज भाव से जहां इस भाषा को आवश्‍यकता थी, ऐसे क्षेत्र की पहचान की, जिससे भाषा को मजबूत किया जा सके और वहां उनके प्रयास से जो संभव था, किया। उनके द्वारा तैयार शब्‍दकोश और रामकथा शोध, इसी का परिणाम और उदाहरण है। बुल्‍के जी तक हिन्‍दी भाषा-साहित्‍य के शोध-प्रबंध भी अंगरेजी में लिखे जाने का कायदा था, लेकिन उन्‍होंने अपना शोध प्रबंध सन 1949 में हिन्‍दी में तैयार कर जमा करने के अपने निर्णय के साथ बुद्धिजीवियों-हिन्‍दीजीवियों पर कम भरोसा किया और अपने निदेशक डॉ. माताप्रसाद गुप्ता और गुरु डॉ. धीरेन्‍द्र वर्मा के माध्‍यम से इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के तत्‍कालीन कुलपति, डॉ. अमरनाथ झा और अकादमिक परिषद को भी प्रभाव में ले कर मजबूर किया, इस निर्णय को मान्‍य करने के लिए।

दूसरे, देवकीनंदन-दुर्गाप्रसाद खत्री याद आ रहे हैं, चंद्रकांता, चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, रोहतास मठ और विज्ञान फंतासियों वाले। यह वह दौर था जब भारतीय भाषाओं के नाम पर बांगला का ही प्रचार था और इसी भाषा में ढेरों मौलिक साहित्‍य और अनुवाद उपलब्‍ध होता था। कहा जाता है कि खत्री जी की इन किताबों को पढ़ने के लिए लोगों ने हिन्‍दी सीखी। उन्‍होंने शायद कभी हिन्‍दी सेवा का दंभ नहीं भरा और उन्‍हें इस तरह से याद भी कम ही किया जाता है। बरेली वाले पंडित राधेश्याम कथावाचक का राधेश्यामी रामायण और उनके नाटक, मुंशी सदासुखलाल का सुखसागर, सबलसिंह चौहान का महाभारत और गीता प्रेस, गोरखपुर की पत्रिका 'कल्‍याण' के नामोल्‍लेख के बिना बात अधूरी होगी।

इसके बाद पचास के दशक से आरंभ होने वाला पूरा दौर रहा है इलाहाबाद से छपने वाली किताबों का, जब उर्दू जासूसी दुनिया का बांगला और हिन्‍दी उल्‍था होता। लेखक इब्‍ने सफ़ी (सफ़ी के बेटे- असली नाम असरार अहमद), बीए और हिन्‍दी अनुवादक प्रेमप्रकाश, बीए। जासूसी दुनिया प्रेमियों को खबर जरूर होगी कि ये किताबें आजकल मद्रास से रीप्रिंट हो कर एएचव्‍हीलर पर 60 रु. में मिल जा रही हैं। जासूसी साहित्य में ओमप्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक की भी लंबी पारी रही है। दूसरा महत्‍वपूर्ण नाम याद आता है कुसुम प्रकाशन, जिसमें भयंकर जासूस सीरीज के लेखक नकाबपोश 'भेदी' और प्रमुख पात्र इंस्‍पेक्‍टर वर्मा-सार्जेन्‍ट रमेश होते। इसी तरह भयंकर भेदिया सीरीज के लेखक सुरागरसां होते और जासूस जोड़ी बैरिस्‍टर सुरेश-सहकारी कमल कहलाती।
इसके अलावा सामाजिक उपन्‍यास कुसुम सीरीज में छपते जिनके लेखकों में एक खरौद, छत्‍तीसगढ़ के श्री एमएल (मनराखनलाल) द्विवेदी भी होते। जासूस महल की किताबें होतीं और अंगरेजी से अनूदित मिस्‍टर ब्‍लैक, टिंकर की जासूसी होती तो दूसरी ओर बहराम चोट्टा। इस दौर में हिंदी किताब का लगभग अर्थ जासूसी पुस्‍तक ही होता। जासूसी उपन्यासों की महिमा के कुछ उल्लेख प्रासंगिक होंगे- पदुमलाल पुन्नालाल बख्शीे 'चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति को निःसंकोच सबसे प्रिय उपन्यास कहते और पाब्लो नेरूदा से पूछा गया कि अगर आग लग जाए तो आप अपनी कौन सी किताब बचाना चाहेंगे, जवाब था मेरी कृतियों के बजाय मैं उन जासूसी कहानी संग्रह को पहले बचाना चाहूंगा, जो मेरा अधिक मनोरंजन करती हैं। जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा, अमृतलाल नागर के भी प्रिय रहे वहीं मुक्तिबोध, स्टेनली गार्डनर और अगाथा क्रिस्टी को भी पढ़ना पसंद करते थे।

तीसरे, हिन्‍दी फिल्‍में हैं, जिसने हिन्‍दी को न सिर्फ फैलाया, बल्कि प्रचलित रखने में इसकी भूमिका महत्‍वपूर्ण है और रहेगी, क्‍योंकि भाषा के लिए गंभीर साहित्‍य के साथ उसका प्रचलन में रहना जरूरी है। यदि आमतौर पर भारत की सम्‍पर्क भाषा अंगरेजी मानी जाती है तो इसके समानांतर आमजन की वास्‍तविक सम्‍पर्क भाषा, उत्‍तर से दक्षिण तक हिन्‍दी है और वह अधिकतर फिल्‍मों के कारण ही है। हिन्‍दी साहित्‍यकारों में ज्‍यादातर ने अपने नाम से या नाम छुपा कर हिन्‍दी फिल्‍मों के लिए काम किया है। राही मासूम रजा, कमलेश्‍वर और बाद में मनोहर श्‍याम जोशी, फिल्‍मों-सीरियल से जुड़े सबसे ज्‍यादा उजागर नाम रहे। इस संदर्भ में आनंद बक्षी जैसे गीतकार और फिल्‍मी गीत भी याद आ रहे हैं। ''सुनो, कहो, कहा, सुना, कुछ हुआ क्‍या, अभी तो नहीं, कुछ भी नहीं, चली हवा, उठी घटा...'' जैसे गीतों से ले कर मेरे नैना सावन भादों, फिर भी मेरा मन प्‍यासा, तक जैसे गीत। और फिर सलीम-जावेद जोड़ी के फिल्मी संवाद- ‘कितने आदमी थे‘, ‘मेरे पास मां है‘, या ‘मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं उठाता‘। यह सब चाहे व्‍यावसायिक-बाजारू, हल्‍का-फुल्‍का और मनोरंजन के लिए गिना जाए, मगर हिन्‍दी की लोकप्रियता, लोगों की जबान पर चढ़ने के लिए कम महत्‍व का नहीं।

हिन्‍दी की पृष्‍ठभूमि मजबूत मानी जा सकती है, वैदिक-लौकिक संस्‍कृत से प्राकृत-पालि और अपभ्रंश हो कर खड़ी बोली तक, लेकिन उसका इतिहास पुराना नहीं है और यही कारण है कि हिन्‍दी के विद्वानों को याद करें तो वे और उनकी पृष्‍ठभूमि में या कहें अधिकार की मूल भाषा उर्दू(अरबी-फारसी), संस्‍कृत या अंगरेजी होती है। यहीं राजाजी चक्रवर्ती राजगोपालाचारी के साथ तमिलभाषी रांगेय राघव और कन्नड़भाषी नारायण दत्त की हिन्दी साधना भी स्मरणीय हैं। आशय यह कि हिन्‍दी सेवा के लिए लगातार सहज भाव से उद्यम आवश्‍यक है और इसमें वक्‍त भी लगना ही है। भाषाएं यों ही खड़ी नहीं हो जातीं। हां, हिन्‍दी की पृष्‍ठभूमि और इतिहास पर मेरी दृष्टि में हजारी प्रसाद द्विवेदी जी की दो पुस्‍तकें, हिन्‍दी साहित्‍य का आदिकाल और हिन्‍दी साहित्‍य की भूमिका के साथ उनके कुछ निबंध सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण हैं।

हम में से अधिकतर, बच्‍चों के सिर्फ अंगरेजी ज्ञान से संतुष्‍ट नहीं होते बल्कि उसकी फर्राटा अंगरेजी पर पहले चमत्‍कृत फिर गौरवान्वित होते हैं। चैत-बैसाख की कौन कहे हफ्ते के सात दिनों के हिन्‍दी नाम और 1 से 100 तक की क्‍या 20 तक की गिनती पूछने पर बच्‍चा कहता है, क्‍या पापा..., पत्‍नी कहती है आप भी तो... और हम अपनी 'दकियानूसी' पर झेंप जाते हैं। आगे क्‍या कहूं आप सब खुद समझदार हैं।

मैं सोचने लगा कि क्‍या हम भाषा में सोचते हैं और हां तो मैं किस भाषा में सोचता हूं। लगता है, रोजमर्रा काम-काज को हिन्‍दी और छत्‍तीसगढ़ी में, गंभीर अकादमिक विषय-वस्‍तु, अंगरेजी और हिन्‍दी (उर्दू शामिल) में कभी संस्‍कृत में भी और किसी विद्वान का सहारा हो तो इंडो-आर्यन और इंडो-यूरोपियन तक। मन की ठाट, अपनी पहली जबान, सिर्फ छत्‍तीसगढ़ी में (सरगुजिया, हल्‍बी शामिल) और कभी इससे अलग तो भोजपुरी या बुंदेली में। बोलने में सबसे सहज छत्‍तीसगढ़ी, फिर हिन्‍दी को पाता हूं, कभी लंबी सोहबत रही तो जबान पर भोजपुरी और बुंदेली भी आ जाती है। कोई जर्मन, फ्रेंच या इटैलियन मिल जाए सिर्फ तभी अंगरेजी। पढ़ने में हिन्‍दी सहजता से, अंगरेजी सुस्‍ती से और छत्‍तीसगढ़ी (बचपन में बांगला) कठिनाई से। मैं हिन्‍दी का प्रबल पक्षधर, क्‍योंकि जिसे जो भी और जितनी भी आती है, हिन्‍दी ही आती है। जी हां, मेरे सहज लिख पाने की भाषा सिर्फ और सिर्फ हिन्‍दी है।

सवाल होता है, हिन्‍दी दिवस मनाने से क्‍या होगा? पता नहीं, लेकिन जवाब मैं इस सवाल से मिला कर ढूंढने का प्रयास करता हूं, क्‍या जन्‍म दिन मनाने से आयु बढ़ जाती है?

यहां आई अधिकांश बातें आशय मात्र हैं, तथ्‍य की दृष्टि से भिन्‍न हो सकती हैं। कभी टिप्‍पणी, कभी मेल पर या यहां-वहां लिख चुका हूं, वही तरतीबवार जोड़ने का प्रयास है। किसी का नाम लेने-छोड़ने या सूची बनाने का प्रयास यहां कतई नहीं है। सभी, खासकर अज्ञात, अल्‍पज्ञात हिन्‍दी सेवियों को नमन।

Sunday, July 10, 2011

नायक

रात लगभग साढ़े दस बजे यों अनजान, ब्‍लाग-परिचित का फोन आया, मेरी आधी नींद में पूछा जा रहा था, 'नायक का भेद'। मामला समझने के बदले मेल करने की बात कह कर मेरी ओर से शुभ रात्रि हुई। सुबह सिस्‍टम खोला तो मानों सचमुच नींद से जागा, मेल था- ''वार्तानुसार, नायक भेद के बारे में थोड़ा आपसे जानने की इच्छा जाहिर कर रहा हूँ, ... नायकों का चरित्र, हाव भाव, प्रकृति कैसी होती है ... आशा है, आपका स्नेह भरा मार्गदर्शन प्राप्त होगा ...''

मेल पर औपचारिकतावश यह जरूर लिखा कि- नाटक और साहित्‍य, दोनों से मेरा कोई सीधा रिश्‍ता नहीं है (संस्‍कृत शास्‍त्रों से भी), इसलिए मुझे यह अब भी स्‍पष्‍ट न हो सका है कि इस चर्चा के लिए आपने मुझ असम्‍बद्ध को क्‍यों उपयुक्‍त माना, खैर...

लेकिन यह कह कर इस सुनहरे अवसर को खोना समझदारी तो नहीं होती, क्‍योंकि अपने अधिकार का विषय न हो तो हाथ आजमाना आसान हो जाता है, बात न बने तो कोई बात ही नहीं और बन पड़ी तो क्‍या कहने। जो जवाब तब सूझा, उसमें जोड़ दिया कि इरादा बना और समय निकाल पाया तो कुछ और तैयारी कर पोस्‍ट लगा दूंगा। आइये, चलें सीधे उसी नायक विमर्श पर-

नायकों के चार प्रकार में अनुकूल, दक्षिण, शठ और धृष्‍ट मिलता है। इनमें अनुकूल, निष्‍ठावान और धृष्‍ट उसके विपरीत गुणों वाला नायक है, जबकि दक्षिण की निष्‍ठा का आकलन प्रेयसी के विशेष संदर्भ में होता है और उसके विपरीत गुणों वाला शठ कहलाता है। ध्‍यान रहे कि नायक अगुवा तो है ही लेकिन इसका एक प्रचलित तथा मान्‍य अर्थ तब भी और अब भी हीरो के रूढ़ तात्‍पर्य, 'आशिक' का भी है। यानि ऐसा लगे कि इस प्राणी का अवतरण प्रेम करने के लिए ही हुआ है, चालू शब्‍दों में 'वाह रे मेरे छैला', 'जियो रे मजनूं'।

अधिक चर्चित नायक प्रकार- धीरोदात्‍त, धीरप्रशान्‍त, धीरललित और धीरोद्धत का उल्‍लेख मूलतः अग्निपुराण का बताया जाता है, भरत मुनि ने भी शायद चर्चा की हो, विशिष्‍ट प्रयोजन हेतु मूल ग्रंथों, उनकी प्रामाणिक टीका देखना होगा, लेकिन शब्‍दार्थ से कामचलाऊ बात कुछ इस तरह हो सकती है -
नायक का प्राथमिक गुण धीर है, जिसका अर्थ होगा शूरवीर या बहादुर, साहसी, दृढ़ आदि। नायक की शूरवीरता में और क्‍या जुड़ा होगा, इसी पर नायकों के चार प्रकार बनते हैं-
धीरोदात्‍त- सुविचारों वाला। सुनील दत्‍त, मनोज कुमार या राजेन्‍द्र कुमार जैसा। धीरप्रशांत- शांत। अशोक कुमार, बलराज साहनी, संजीव कुमार, गिरीश कर्नाड, बाबू मोशाय या फिल्‍म इम्तिहान के विनोद खन्‍ना, सदमा के कमल हसन जैसा। धीरललित- क्रीड़ाप्रिय, लापरवाह। धर्मेन्‍द्र, गोविंदा या फिल्‍म रंगीला के आमिर, दबंग के सलमान जैसा। धीरोद्धत - अभिमानी। राजकुमार, शत्रुघ्‍न सिन्‍हा, रजनीकांत जैसा।

उदाहरणों से फिल्‍मी नायकों की कुछ और कोटियां-
त्रिलोक कपूर, प्रेम अदीब, मनहर देसाई, अभिभट्टाचार्य, जीवन (नाटकीय नारद) जैसे धार्मिक स्‍पेशल/
सोहराब मोदी, पृथ्‍वीराज कपूर, पारसी थियेटर शैली के इतिहास-पुरुष/ रंजन, जान कवास, महिपाल, कामरान, चन्‍द्रशेखर, जयराज, तलवारबाज स्‍टंट हीरो/
देवदास वाले ट्रेजडी किंग पहले सहगल फिर दिलीप कुमार, बैजू बावरा के भारत भूषण, गुरुदत्‍त/
भोला हीरो वाले राजकपूर/
रंग-रंगीले सदाबहार देवानंद/
पहलवान हीरो दारासिंग, शेख मुख्‍तार/
कामेडियन हीरो अलबेले मास्‍टर भगवान, किशोर कुमार, जानीवाकर, जिनके नाम से फिल्‍म भी बनी और महमूद/
विश्‍वजीत, जाय मुखर्जी, ऋषि कपूर वाले चाकलेटी हीरो/
किंग खान टाइप संजय और फिरोज खान/
राजेश खन्‍ना जैसे रोमांटिक हीरो/
सचिन, रणधीर, वो सात दिन या बेटा वाला अनिल कपूर किस्‍म का देहाती हीरो/
शम्‍मी कपूर, जितेन्‍द्र, मिथुन जैसे डान्‍सर हीरो/
अमोल पालेकर, फारुख शेख जैसा पड़ोसी लड़का/
नान ग्‍लैमरस साधु मेहर, नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, पंकज कपूर/
अभिताभ, शाहरुख, नाना पाटेकर जैसे एंग्री यंग मैन, एंटी हीरो से ले कर 'हीरो' जैकी श्राफ तक और 'नायक नहीं खलनायक' तक- भी बन सकती हैं।

दो नाम दुहराना है बहुरूपिए संजीव कुमार का नया दिन नई रात के लिए और कमल हसन का दशावतार के लिए, लेकिन मल्‍टी डायमेन्‍शनल हीरो के रूप में तो दिलीप कुमार और अमिताभ बच्‍चन का ही नाम दुहराना होगा। नये जमाने के उदाहरण नहीं हैं, क्‍योंकि वह तो आप सबको मालूम ही है और अगर नहीं तो 'हम साथ-साथ हैं।'

शास्‍त्रों की बात है यहां, इतने पर ही नहीं रुकती, कुछ अवान्‍तर से नायक के 40 भेद हो जाते हैं। बस, बस, होते रहें शास्‍त्रों में 40, यहां न तो उसका निरूपण है न सूचीकरण, बस मामूली सी एक ब्‍लाग पोस्‍ट। लेकिन इस शास्‍त्रीय सांचे में फिट होने को कई और नेता-अभिनेता, जननायक-राजनायक, योगी-भोगी नायक तैयार हैं, सबको दिमागी दरवाजे पर वेटिंग में रखा है हमने, किसी को एंट्री नहीं। अब आप चाहें तो खेलें जिग-सा पजल, और बिठाएं सबको उनके उपयुक्‍त खांचों में। हम अपनी पोस्‍ट पर विराम लगाते हैं।

Thursday, December 2, 2010

दिनेश नाग


'फॅंस गए रे ओबामा' सुनकर एकबारगी लगता है कि अमरीकी राष्‍ट्रपति की पिछले दिनों भारत यात्रा का कोई संदर्भ है, लेकिन ऐसा कतई नहीं। फिल्‍म की कहानी है आर्थिक मंदी की, जिसे अपहरण के साथ लपेट कर, मजेदार ढंग से दिखाया गया है।


फिल्‍म में एक तरफ भारत लौटे अमरीकावासी एनआरआइ ओम शास्‍त्री (नायक रजत कपूर) हैं तो दूसरी तरफ मुम्‍बई अंडरवर्ल्‍ड की रानी फिमेल गब्‍बर सिंह (नायिका नेहा धूपिया) और इन दोनों के बीच है, ओम शास्‍त्री का भांजा कन्‍हैया लाल, यानि हमारा हीरो, छत्‍तीसगढ़ का दिनेश नाग। दिनेश ऐसा अभिनेता है, जिसकी आंखें तो क्‍या चेहरा भी बोलता है।


छत्‍तीसगढ़ को आदिम संस्‍कृति के चर्चित (जनजाति और उनके घोटुल) केन्‍द्र, बस्‍तर और अबुझमाड़ के कारण भी जाना जाता है। अबुझमाड़-ओरछा का मुहाना है अब का जिला मुख्‍यालय नारायणपुर। इसीसे लगा गांव है गढ़ बेंगाल, जो सन 1957 में पूरी दुनिया में जाना गया था दस वर्षीय बालक चेन्‍दरू के साथ। चेन्‍दरू नायक था, अर्न सक्‍सडॉर्फ की स्‍वीडिश फिल्‍म 'एन डीजंगलसागा' ('ए जंगल सागा' या 'ए जंगल टेल' अथवा अंगरेजी शीर्षक 'दि फ्लूट एंड दि एरो') का। फिल्‍म में संगीत पं. रविशंकर का है, उनका नाम तब उजागर हो ही रहा था। सन 1998 में अधेड़ हुए चेन्‍दरू और इस पूरे सिलसिले को नीलिमा और प्रमोद माथुर ने अपनी फिल्‍म 'जंगल ड्रीम्‍स' का विषय बनाया। चेन्‍दरू, इन दिनों अपने गांव में 'गैर-फिल्‍मी' दिनचर्या बसर कर रहा है, किन्‍तु फिल्‍मों का पहला छत्‍तीसगढ़ी सुपर स्‍टार वही है।

नारायणपुर से लगे गांव माहका का निवासी है दिनेश नाग। स्‍कूली शिक्षा रामकृष्ण मिशन, विवेकानन्द विद्यापीठ, नारायणपुर से 2001 में पूरी हुई, आगे की पढ़ाई के लिए दिनेश भिलाई आ गए लेकिन उनका मन रमने लगा नाटकों में। 2004 में रायपुर में राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय की कार्यशाला हुई। दिनेश की मानों मुराद पूरी हुई। कार्यशाला में उनकी अभिनय प्रतिभा को अमिताभ श्रीवास्तव, विनोद चोपड़ा और विभा मिश्रा ने पहचाना। इसी क्रम में दिनेश को अपनी प्रतिभा निखारने का मौका मिला, भोपाल की कार्यशाला में, जहां उन्‍हें देवेन्द्र राज अंकुर, राजेन्द्र गुप्ता, भानु भारती और रतन थियम जैसे गुरु मिल गए। इसके बाद 2005 में दिनेश ने मुंबई की राह पकड़ ली।


बॉलीवुड के खट्टे (-मीठे की शुरुआत शायद अब हो) अनुभवों के साथ दिनेश इडियट बॉक्स, रन भोला रन और स्‍ट्राइकर फिल्‍मों से जुड़े रहे, लेकिन इनसे उनकी पहचान न बनी।

दिनेश बताते हैं 8 नवम्‍बर को फिल्‍म के म्‍यूजिक रिलीज के अवसर पर उन्‍हें कन्‍हैया लाल के रूप में पहचाना गया इससे उन्‍हें भरोसा है कि 3 दिसम्‍बर को फिल्‍म रिलीज के साथ उनकी पहचान बनने लगेगी, हमारी भी यही कामना है। उनकी आने वाली फिल्‍म कॉल सेंटर पर आधारित 'तीस टका' होगी।

दिनेश नाग का फोन नं. +919867745061 है। इस पोस्‍ट के लिए जानकारी और फोटो का सहयोग अभिषेक झा (फोन नं.- +919424287102) और सोमेश (फोन नं.- +919993294086) से मिला है।



परिशिष्‍टः

रामकृष्‍ण मिशन, विवेकानंद आश्रम, रायपुर के संस्‍थापक प्रातः स्‍मरणीय स्‍वामी आत्‍मानंद जी ने बिलासपुर व अमरकंटक आश्रम सहित नारायणपुर आश्रम, विवेकानंद विद्यापीठ की नींव रखी, जिसके माध्‍यम से अबुझमाड़ इलाके में मुख्‍यतः चिकित्‍सा और शिक्षा की नई अलख जगी। इस यज्ञ में उनके सहयोगी संतोष भैया, देवेन्‍द्र भैया, राजा भैया, शत्रुघ्‍न भैया, सतीश भैया, चटर्जी सर याद आ रहे हैं।

गढ़ बेंगाल, चेन्‍दरू के साथ बेलगुर, पंडी, जैराम द्वय, शंकर द्वय, बुधसिंह, रूपसिंह, सोबराय, मनीराम, पिसाड़ू कचलाम जैसे अनेकों कलाकार-शिल्‍पकारों का सभ्‍य-सुसंस्‍कृत गांव है और यहां किसी सियान को ढुसीर बजाकर घोटुल पाटा और लिंगोपेन की महान गाथा गाते देख-सुन सकते हैं।

नारायणपुर के पास कोई 40 साल पहले सोनपुर के अपने प्रवास के बाद वहां से 30 किलो मीटर दूर कोई 20 साल पहले, घनघोर अंदरूनी इलाके का डेढ़ हजार साल पुराना बौद्ध अवशेषों सहित प्राचीन स्‍थल भोंगापाल का उत्‍खनन कैम्‍प, वहीं बांसडीह, बलिया के सिंह गुरुजी का संग व मार्गदर्शन, खुदाई के साथी चेलिक और मोटियारी के साथ घोटुल संस्‍था को पहली बार करीब से देखने-समझने का अवसर बना।

याद कर रहा हूं, भोंगापाल में स्विस युवा पर्यटक से मुलाकात हुई और फिर सन 1990-91 में रेनॉल्‍ड पेन नया-नया था, जिसके साथ बहुतों की बालपेन से लिखने की आदत बनी और फाउन्‍टेन पेन छूटा। लेकिन पहली खेप के बाद रायपुर के बाजार में इसकी कमी हो गई। नारायणपुर के इतवार बाजार से कैम्‍प के सौदा-सुलुफ के बाद बस स्‍टैंड पर पान की दुकान में रेनॉल्‍ड पेन दिख गया और एक साथ पेन की जोड़ी खरीद लिया।

अब सोचता हूं ''नारायणपुर में रेनॉल्‍ड पेन और भोंगापाल में स्विस युवा'' शीर्षक से उदारीकरण और वैश्‍वीकरण पर महसूस किए, याद रहे, पहले-पहल अनुभवों पर एक पोस्‍ट लिखूं, गल्‍फ-वार के चलते कैम्‍प के लिए किरोसीन और सफर के लिए डीजल संकट से मुकाबले को जोड़कर, जो समाप्‍त हो अंकल सैम के नारे के साथ।

इन सबका साक्षी और कुछ हद तक सहभागी रहने के चलते गौरव अनुभव कर रहा हूं और नक्‍सलवाद की याद अब आई, लेकिन 'बाबू ले बहुरिया गरू झन हो जाय' इसलिए फिलहाल बस इतना ही।

पुनश्‍चः 5 दिसंबर को ''आज की जनधारा'' समाचार पत्र ने स्‍तंभ 'ब्‍लॉग कोना' में इस पोस्‍ट को साभार प्रकाशित किया है।

Saturday, April 24, 2010

आईपीएल

आईपीएल, 12 अप्रैल, शुक्रवार को किसी फिल्म रिलीज की तरह शुरू हुआ, इसी के साथ खबर छपी कि अब डेढ़ महीने (आईपीएल चलते तक) कोई बड़ी फिल्म रिलीज नहीं होगी। एक दिन पहले ही एसएमएस मिला कि आइनॉक्स में फिल्म अथवा आईपीएल का मजा बड़े स्क्रीन पर लीजिए।

आईपीएल के मैच, फिल्म हो रहे हैं, बिना री-टेक और रिपीट वाली, लेकिन री-प्ले वाली फिल्में, जिसमें 'वाह क्या सीन है' को बार-बार देखा जा सकता है। हर खिलाड़ी मैच खेलते हुए सात-आठ प्रयोजकों के लिए मॉडलिंग कर रहा है। प्रदर्शनकारी कलाकार या अभिनेता की तरह खिलाड़ी अपनी भूमिका का निर्वाह तो कर ही रहा है।


आईपीएल के मालिक, फिल्‍मी कलाकार भी हैं। ये पुराने फिल्म निर्माता कंपनी के मालिक- निर्माता-निर्देशकों की तरह हैं, जो खिलाड़ी-कलाकार का प्रदर्शन कराते हैं और भी समानताओं पर बात हो सकती है। फिर क्रिकेट खिलाड़ियों द्वारा अपनी भूमिका को कुछ अलग अंदाज से निभाने के लिए 'मैच फिक्सिंग' पर भी नये नजरिए से सोचा जा सकता है।