Thursday, July 28, 2011

डीपाडीह

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स्मरण सन 1988 का। मार्च का महीना, ठीक धूल पंचमी के दिन डीपाडीह के लिए रवाना हुए। पृष्ठभूमि में तीन खास स्थितियां। लगभग तीन माह पहले स्वयं का विवाह, डेढ़ माह पहले डाक्टर कक्का का निधन और लगभग पांच माह से चक्रवर्ती जी का बिलासपुर प्रवास। ताला में रूद्र शिव की प्रतिमा मिली, वहां के काम से पूरी तरह उबर नहीं पाए, नये काम की शुरूआत के लिए डीपाडीह के लिए प्रस्थान हो गया।

इसके पहले सरगुजा जिले में कुछ समय के लिए रामगढ़, उदयपुर तक ही गया था, जो बिलासपुर सीमा से अधिक दूर नहीं है लेकिन इस बार लक्ष्य था, सरगुजा जिले की दूसरी सीमा पर बिहार से लगा डीपाडीह। एक दिन अम्बिकापुर, एक दिन कुसमी और फिर एक सुबह चक्रवर्ती जी काम शुरू करने की शुभकामनाओं सहित छोड़कर वापस लौट गये। मेरी स्थिति पैराशूट से अन्जान भूगोल पर कहीं टपक पड़े जैसी थी। डीपाडीह से गुजरने में ही कन्हर नदी के किनारे गांव के छोर पर बना अकेला सा कच्चा घर, जो गांव की सबसे भव्य इमारत दिखती थी, बिना मालिक और उसके इजाजत की परवाह के तय कर लिया था, आते-जाते ही काम शुरू करने के लिए मजदूर और गांव के तिराहे-बस अड्‌डे के होटल वाले द्वारा विशेष रूप से मेरे लिए किये खाने का प्रबंध हो गया।

गोदामनुमा, बिना बिजली की सुविधा वाली उस इमारत के जिम्मेदार गांव के सेठ जी थे उन्होंने सहर्ष और निशर्त चाबी मुझे सौंप दी और मामूली साफ-सफाई का इन्तजाम भी करा दिया। सुबह से गांव के अंतिम छोर के टीले, उरांव टोली से काम शुरू हुआ। काम की शुरूआत में ही अकेला होने से पूरे समय मजदूरों के साथ फिरकी बन जाना और बीच के एक घंटे के भोजन अवकाश में उरांव टोली के बच्चों के साथ आसपास के दूसरे टीलों पर घूमना और शाम को दिन ढलते-ढलते वापसी। प्रतिदिन दस-बारह किलोमीटर पैदल चलना होता था। वापस आते हुए बस्ती में खाना खाने रूकता और फिर इकट्ठे डेरे पर लौटता, इस बीच कोई सहयोगी साफ-सफाई कर चिमनी जलाकर, पीने का पानी भरकर जा चुका होता था।

बस्ती से डेरे तक का लगभग एक किलोमीटर का रास्ता आगे बढ़ते हुए सूना होता जाता, बिजली भी आधे रास्‍ते तक ही थी। होश संभालने के बाद बिना बिजली के घर में एक-दो रात तुमान में काट चुका था, यह दूसरा लेकिन लम्बा, अवधि अनिश्चितता समेत अनुभव था। अंधेरा गहराते ही बस्ती के न जाने किस कोने से मानों मेरे लिए जादुई और रहस्यात्मक स्वर लहरी और ढोल-ढमाके की आवाज पूरे परिवेश से अभिन्न, उभरने लगती थी, जैसे उजली रात की चांदनी। इसी आवाज के साथ आगे बढ़ता था। यह तो शायद देर रात तक चलता हो लेकिन डेरा पास आते-आते कन्हर के प्रवाह का पथरीला, प्राकृतिक संगीत धीरे-धीरे बढ़ते हुए हावी होता जाता और घर पर पहुंचते तक सिर्फ यही आवाज रह जाती, जो सोते तक मेरे साथ सूनापन काटते बनी रहती। कैम्प में रोजमर्रा को कुछ बदल लेना मुझे हमेशा भाता रहा, जिसमें शेविंग और मांसाहार छोड़ना मुख्‍य होता। साथ ही ऐसे प्रवास में ट्रांजिस्टर और समाचार पत्र से अपने को बचा कर रखता, मुझे बड़ी राहत मिलती कि यों बिना खबर-अखबार के दिन शुरू नहीं होता, लेकिन कैम्प से वापस आ कर आजमाने का मौका होता कि दुनिया जस की तस है।

सुबह सूर्योदय के साथ उठकर कार्य स्थल पर जाने की तैयारी शुरू होती, नदी के सूने घाट में जाकर स्नानादि, फिर कैमरा, नोटबुक, टेप सहित उरांव टोली, बीच रास्ते में बस्ती से गुजरते हुए दोपहर के खाने जैसा नाश्ता कर रात तक के लिए फारिग होकर काम पर हाजिर। फिर वही क्रम दुहराते हुए वापसी, घर पहुंच, लगभग घंटे भर फील्ड डायरी लिखकर, काम पर जाने, खाना खाने जैसी प्रयास रहित निष्ठा से सो जाता।

यही क्रम चलता रहा, शायद चार या पांच दिन, फिर एक शाम घर लौटने की और अकेले रात गुजारने की याद आई, मशीनी ढंग से चल रही स्थिति में पहली बार संवेदनायुक्त यह सोच उपजी, लेकिन तत्काल चिमनी जलाने वाले से कमरे में एक लाठी रख देने को कहकर, निजात पा लिया। अगली सुबह कुछ अलग हुई। सिर पर बाल न होने से कंघी-शीशे का और इस बहाने अपना चेहरा देखने की स्थिति नहीं थी, नदी में मुंह धोते हुए बहते पानी में अपना प्रतिबिंब देखने की कोशिश करने लगा और शायद उसमें बिना कुछ देखे, काम बन गया की तसल्ली सहित फिर आगे की दिनचर्या शुरू हो गई, शाम वापस आने पर खाना खाते हुए क्षणिक विचार आया, बगल में ग्रामीण बैंक वालों के घर में आईना देख लूं, किन्तु हाथ धोते-धोते ही विचार भी धुल गया।

अगली शाम काम से वापस लौटते हुए अजीब अनुभूतियां हुई, जो अब याद आने पर रोमांचक सिहरन होती है। लेकिन बीच में कुछ और बातें- डीपाडीह चारों तरफ दूर पास पहाड़ियों से घिरा हुआ है, शाम होते-होते पास की पहाड़ियां गहरी हरी, उससे दूर की धूमिल और सबसे दूर की पहाड़ियां काली होने लगती थीं। इस क्षेत्र में अधिकतर लोग सफेद कपड़े पहनते हैं और आगे-पीछे पंक्तिबद्ध चलते हैं। पहाड़ियों की पृष्ठभूमि में पंक्तिबद्ध लोग सिर पर, कन्धे पर सामान लिये हुए लैण्ड मार्क बनकर चमकते, सरकते दिखते थे, घर वापसी की तैयारी में। आकाश पर चिड़ियां अपने ठिकानों की ओर उड़ान भरने लगती और सूर्य पहाड़ियों में छुप जाता। उस शाम मुझे लगने लगा कि मैं इस प्राकृतिक दृश्य से अभिन्न हूं, और इस विशाल दृश्य में समा कर खोता जा रहा हूं, अपने शरीर का और ठीक उस समय शायद अपने विचार क्रम का भी भान नहीं हो रहा था, पता नहीं कितनी देर, दो मिनट, तीन मिनट या पांच मिनट, अचानक सामने बिलासपुर से आया दफ्तर का एक कर्मचारी दिखा, जो अपने साथ ढेर सारी सरकारी, निजी डाक और भी कई जानकारियां लेकर आया था।

अगले दिन से ही मैंने जो अब तक गांव में कुछ भी न देखा-समझा था, सभी कुछ पहचाना सा लगने लगा। गांव के लोग, गलियां, घर, आने-जाने वाली बसें, बच्चे और मंदिरों के टीले सभी से अपनापन महसूस हुआ। बाद में तो गांव के भांजे-दामादों और समधियान को भी जानने लगा। वापस आने पर जब मित्रों से चर्चा हुई तो उन्होंने पहले डायरी लिख डालने को कहा और मुझमें अचानक उमड़े बागवानी-वनस्पति, पशु-पक्षी और प्रकृति प्रेम को इस घटना से जोड़ा, मित्रों ने अनुसार वह ऐसा बिन्दु था जहां या तो पूरी स्थितियों से स्थायी विराग हो सकता था या यह दूसरी स्थिति जिसमें सब कुछ आत्मीय और घनिष्ठ बन जाए। ... लिखने के क्रम में कई बात छूटी और विचार प्रवाह टूटा, फिर भी ...

बाद में स्वयं भी मैं काफी दिनों तक उधेड़बुन में पड़ा रहा। लगा कि मौन विकसित करके इस दुर्लभ स्थिति को शायद महसूस किया जा सके जो मुझे अनायास मिली। अपना अस्तित्व और 'मैं' की अस्मिता थोथे और निरर्थक संदर्भों से जुड़कर बनती है और निर्जीव वस्तुएं, घर की सीढ़ियों और फर्नीचर की जमावट में हम आंख मूंदकर चल सकते हैं उनसे अपनी अस्मिता अनुभूति के लिए। लेकिन सभी सुलभ संदर्भ- आपकी जानी-पहचानी जगह, जाने-पहचाने लोग, आपसी बातचीत-सम्भाषण, आपके जाने हुए या आपको जानने वाले सन्दर्भ, और उसमें सहायक खुद अपना चेहरा शीशे में देखना न हो सके तो हमारा मजबूत लेकिन नकली सन्दर्भ-अस्तित्व भरभराकर गिर सकता है, और वह बिन्दु अपनी पहचान करने का अवसर देता है तो व्यक्तित्व में स्थायी परिवर्तन ला सकता है।

डीपाडीह, सरगुजा 1988 से 1990 तक के तीन साल का जैसे पता-ठिकाना ही हो गया था। वहां हजार-एक साल की परतें उघारते हुए, उसे मन ही मन महसूस करते हुए हासिल, सामत सरना का टीला जिस रूप में उभरा-

बीतते दिनों के साथ धूमिल पड़ने के बजाय स्‍मृतियों में जिसके रंग और चटक होते जाते हैं-

सभ्‍य और सामाजिक आचरण के मूल में आदिम मन ही सक्रिय होता है।

तब तक मैं थोरो के 'वाल्‍डन' का नाम भी ठीक से नहीं जानता था, पढ़ा तो अब भी नहीं है।

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Friday, July 22, 2011

सूचना समर

सूचना का महत्व सदैव रहा है, किन्तु सूचना और सूचक की भूमिका ने जैसा रुख पिछले दशकों में अख्तियार कर लिया है, उसे सूचना समर कहा जाना ही उपयुक्त लगता है। सूचकों द्वारा बरते जा रहे शब्दों में यह पूरी तरह से साफ-साफ दिखाई पड़ता है। सद्‌भावना विकसित और स्थापित करने के उद्देश्य से आयोजित खेल की खबरों में पहले तो पहलवानी अखाड़े के मुहावरे इस्‍तेमाल होते रहे- दूसरे दल, विरोधी को पछाड़ा जाता, पटखनी दी जाती, चारों खाने चित्‍त कर धूल चटाया जाता। अब खेल-खबरों में दुश्‍मन को दांत खट्टे कर मजा तो चखाया ही जाता है, टांग और कमर तोड़ते हुए फतह भी होती है, रौंदकर मटियामेट किया जाता है, भारत और श्रीलंका के मैच राम-रावण युद्ध बन जाता है। इस दौर में संजय द्विवेदी का संकलन 'इस सूचना समर में' मीडिया की नब्ज पर रखी वह उंगली है, जो पाठक को सहज ही बीमार का हाल बता देती है। संकलन की सभी 66 टिप्पणियां, मूलतः 5-6 वर्षों में अलग-अलग लिखी गई सूचना की आवश्यकता-पूर्ति के लिए की गई रचनाएं हैं।
इस समर के और दो पहलुओं का उल्लेख प्रासंगिक होगा। कबीर कहते थे- 'तू कहता कागज की लेखी, मैं कहता आंखन की देखी'। ताल-ठोंक, ठेठ लहजे में कही गई बात अब उलटबांसी लगती है। कुछ वर्षों पूर्व समाचार के रूप में पढ़े और सुने जाने वाले शब्दों को विश्वसनीय बनाने के लिए तथ्य-सूचना एकत्र कर खबर गढ़ी जाती थी लेकिन अब, जब खबरों के दृश्य माध्यम का चलन बढ़ गया है, 'आंखन देखी' के लिए फाइल चित्र भी सहज-सच्चे बन जाते हैं या किसी घटना के दौरान संयोगवश विसंगत कोई दृश्य मिल जाने पर वह समाचार को एक्सक्लूसिव बना देता है और ऐसे दृश्य से बहुधा घटना की अविश्वसनीय व्याख्‍या भी हो जाती है। समाचार दर्शक को इस पर विश्वास करना ही पड़ता है, 'आंखन देखी' जो है।

विचारणीय पहलू यह भी है कि आतंक, हिंसा और दंगा क्षेत्रों से सनसनीखेज खबरें ही आती हैं, सौहार्द-प्रसंग नहीं, अगर आए तो समाचार का वैसा दर्जा उन्हें नहीं मिल पाता क्‍योंकि वह समाचार नहीं, साफ्ट स्टोरी है। रिपोर्टर भी क्या करे, कंपनी ने उसे खर्च कर मौके पर इसलिए तो भेजा नहीं है कि वह दंगा क्षेत्र से अमन का पैगाम ले कर आए, वह तो आया है अधिक से अधिक क्रूर और वीभत्स, उन्माद और हिंसा के जीवंत दृश्य के फुटेज इकट्ठा करने। अन्ततः, रोमांचक नजारों के साथ सनसनीखेज खबरें, साम्प्रदायिक खतरनाक स्थितियों सहित आशंकापूर्ण भविष्य की झांकी गढ़ डालती हैं और ऐसे परिणाम लाती हैं, जो लक्षित कतई नहीं होता।

पुस्तक के दो खण्डों में 'राजनीति' और 'लोग' हैं। 'राजनीति' में, तत्कालीन राजनैतिक स्थितियों और दलों पर न सिर्फ बेलाग टिप्पणी है, बल्कि सटीक विश्लेषण भी किया गया है। यह विश्लेषण अखबारी होते हुए भी तत्कालीन परिस्थितियों से उपजी प्रतिक्रिया का 'हॉट केक' नहीं है, इसलिए समय बीत जाने पर भी प्रासंगिक और पठनीय है। 'लोग' खण्ड विशेष उल्लेखनीय है, जिसमें राजनीतिज्ञों के साथ-साथ, सामाजिक सरोकार रखने वाले अन्य चरित्रों का भी चित्रण है। व्यक्तित्वों में सुभाषचंद्र बोस और राममनोहर लोहिया से लेकर निर्मल वर्मा और अरूंधती राय सहित टी.एन. शेषन और राष्ट्रीय प्रमुख नेताओं को एक साथ रखना अपने आप में उल्लेखनीय है। इन सभी व्यक्तित्वों के मूल्यांकन का आधार मुख्‍यतः उनकी कथनी नहीं, बल्कि उनकी करनी को बनाया गया है इसलिए यह न्यायोचित हो जाता है, विशेषकर इसलिए भी, जब उनके मानवीय सकारात्मक पक्षों पर अधिक बल देते हुए उस पर गंभीरता से विचार किया गया हो।

'राजनीति' खण्ड के कुछ शीर्षकों का उल्लेख आवश्यक है, जो आकर्षक तो हैं ही अर्थवत्ता और रचना की गहराई का आभास कराने में भी समर्थ हैं। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण बिन्दु है जहां संजय की लेखनी पत्रकारिता और साहित्य की रूढ़ सीमा को झुठलाती हुई, पाठक को इस भेद के मात्र आभासी होने का विश्वास दिला देती है। इस खण्ड के कुछ शीर्षक हैं- लालकिला केसरिया होगा, सोनिया को सराहौं या सराहौं सीताराम को, कौरवों ने फिर किया अभिमन्यु वध या कौन काटेगा नफरत के ये जंगल; किन्तु एक संवेदनशील पत्रकार की उकताहट 'इस फिजूल बहस से फायदा क्या है ?' जैसे शीर्षक में झलक जाती है।

कुछ शब्द और जुमलों की आवृत्ति बार-बार हुई है। अलग-अलग प्रकाशित होने पर यह रचनाकार की शैली या उसे आकर्षित करने वाले शब्द माने जाते और खटकते भी नहीं, किन्तु संकलन में पढ़ते हुए, इनका दुहराया-तिहराया जाना, बाधा डालता है। संभवतः इन रचनाओं को संकलन के लिए संपादित करने के बजाय यथावत रखे जाने से ऐसा हुआ है।

संक्षेप में 'समर' के इस माहौल में भी टकसाली शब्दों के साथ संतुलित विश्लेषण और संयत रचनात्मक दृष्टि के कारण संकलन प्रभावित करता है। राष्ट्र और राजनीति के ऐसे 'टर्निंग प्वाइन्ट', जो सूचना समर में 'बैनर' न बनें, लेकिन दूरदर्शी के लिए विचारणीय बिन्दु होते हैं और उनका महत्व भी दीर्घकालिक होता है, ऐसी सामग्री का समावेश ही इस पुस्तक को पठनीय और संग्रहणीय बनाता है।

2003 में प्रकाशित इस पुस्तक को पढ़ कर, मेरे द्वारा उसी समय लिया गया नोट, जिसमें पुस्‍तक पर कम और पुस्‍तक के बहाने मीडिया पर अपनी सोच की बात अधिक है, मेरी जानकारी में अब तक अप्रकाशित भी है, इसकी प्रति संजय जी को दी थी या नहीं, याद नहीं।

Thursday, July 14, 2011

रायपुर में रजनीश

सन्‌ 1979 में दुर्गा महाविद्यालय से स्नातक हो कर, स्नातकोत्तर के लिए मैंने प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विषय का चयन किया। पुरातत्व में स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए गुरूजी श्री डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर की प्रेरणा रही और फलस्वरूप न सिर्फ रायपुर बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ के अनूठे शिक्षण संस्थान शासकीय दूधाधारी श्रीवैष्णव स्नातकोत्तर संस्कृत महाविद्यालय में प्रवेश हुआ।

1979 से 1981, स्नातकोत्तर अध्ययन के दो साल, मेरे लिए स्मरणीय हैं और रहेंगे बल्कि यादों से कहीं अधिक इस अवधि का प्रभाव स्वयं पर महसूस करता हूं। इस संस्था के प्रति मेरा भाव, सहपाठियों की याद सहित महाविद्यालय और छात्रावास के भवन और गुरुजन की स्मृति के रूप में मेरे साथ जुड़ा है। सर्वप्रथम गुरू डॉं. लक्ष्मीशंकर निगम, प्राचार्य डॉं. रामनिहाल शर्मा, डॉ. राजेन्द्र मिश्र, डॉ. सुल्लेरे, डॉ. लक्ष्मीकांत शर्मा, डॉ. श्रीवास्तव/ पाठक, कान्हे और जैन मैडम/ स्‍वामी, नाग, पाण्‍डेय, चौधरी, सारस्वत, कान्हे, अग्रवाल सर और इन सब के साथ ग्रंथपाल श्रीमती छवि चटर्जी। संस्कृत अध्ययन के वातावरण में यहां अधिकतर विद्यार्थी आयुर्वेदिक कॉलेज में प्रवेश के इच्छुक होते थे। कुछ छात्रसंघ की राजनीति के लिए यहां आते, कुछ की रुचि संस्कृत में होती, तो कुछ को छात्रवृत्ति का आकर्षण होता, बहरहाल ये सब संस्कृत वाले होते थे लेकिन हम पुरातत्व के विद्यार्थी ऐसे होते थे जो संस्कृत महाविद्यालय के छात्र होकर भी संस्कृत को विषय के रूप में नहीं पढ़ते थे।

इस तरह संस्कृत महाविद्यालय में संस्कृत पढ़ने वालों और संस्कृत न पढ़ने-पढ़ाने वालों का अलग वर्ग था। बावजूद इसके कि संगत का लाभ सदैव और बराबर एक-दूसरे को मिलता था। अल्पमत में होने के बावजूद भी हमारी भिड़ंत अक्सर संस्कृत वालों से हो जाया करती थी। संस्कृत के लोग, उसे देवभाषा कहते तो हम उस की भाषा वैज्ञानिकता और व्याकरण नियम पर कुतर्कपूर्ण टिप्पणी करते कि इसमें कोट पहले सिल लिया जाता है और उसके अनुसार हाथ-पैर छिलकर फिटिंग लाई जाती है यानि संस्कृत में बोलने की स्वाभाविकता पर व्याकरण के कठोर नियम हावी रहते हैं। ऐसे सभी तर्क-वितर्क के बावजूद विद्यार्थियों के लिए शिक्षण का सौहार्दपूर्ण वातावरण कभी प्रभावित नहीं होता।

डॉ. राजेन्द्र मिश्र अपने व्यक्तित्व के चकाचौंध सहित आते तो हिन्दी के कम अंग्रेजी विभाग के अधिक लगते। कक्षाओं से कहीं अधिक समय चर्चाओं के लिए देते और कोई भी छात्र, जिसे साहित्य में रूचि हो, उसे बराबरी का अवसर देते हुए बात करने को हमेशा तैयार रहते। अच्छा साहित्य पढ़ने का संस्कार डालने के उनके निरन्तर उद्यम में उनका व्यक्तित्व और वक्तृत्व प्रभावी होता। अगर कोई एक ही खास बात इस संस्थान के लिए कहनी हो तो ''यह ऐसा शिक्षण संस्थान रहा कि यहां प्रत्येक व्यक्ति अपने ढ़ंग से ज्ञान-दान के लिए सदैव तत्पर रहता। प्राचार्य डॉ. शर्मा से लेकर ग्रंथपाल मैडम चटर्जी तक।'' मैडम चटर्जी अनुशासन की इतनी पक्की थीं कि शुरू में लाईब्रेरी में संभलकर प्रवेश करना होता लेकिन धीरे-धीरे जैसे ही वे भांप लेती कि विद्यार्थी वास्तव में अध्ययनशील है तो फिर उसके लिए किताबें खोजना, किताबों की जानकारी के साथ हरसंभव मदद के लिए तैयार रहतीं।

डॉं. सुल्लेरे पास ही विज्ञान महाविद्यालय के पीछे रहते और महाविद्यालय के अलावा घर पर भी, कभी भी, मार्गदर्शन के लिए तैयार रहते। डॉ. निगम क्लास की पढ़ाई के साथ-साथ चाय की कैन्टीन में भी गपशप के बहाने इतिहास और इतिहास अध्ययन की मनोरंजक बातें, घटनाएं, संदर्भ सुनाते और उच्चस्तरीय तथा ताजे शोध की जानकारी देकर पढ़ने को प्रेरित करते रहते। जेब खर्च न होने पर भरोसा रहता कि चाय तो निगम सर जरूर पिला देंगे यह भरोसा कभी नहीं टूटा, बल्कि रोड साइड क्लास अधिक लंबी खिंचने लगे तो मनी कैंटीन का समोसा भी हो जाता। निगम सर के हरे रंग की राजदूत मोटरसाईकिल बिना चाबी के स्टार्ट हो जाती लेकिन उसे चलाना मुश्किल होता। 'चला सको, तो ले जाओ' की अलिखित शर्त के साथ यह सबके लिए उपलब्ध रहती थी। हम कुछ लोग इस सुविधा का अक्सर लाभ लेते और वापस स्टॉफ रूम के सामने लाकर खड़ी कर देते। कई बार ऐसा भी होता कि इंतजार के बाद भी मोटरसाईकिल नहीं लौटती तब 'कल ले लेंगे' के सहज भाव सहित निगम सर, लिफ्ट लेकर या रिक्शे से वापस घर लौटते।

डॉ. रामनिहाल शर्मा और सारस्वत सर से उनके निधन-पूर्व तक सम्पर्क बना रहा और मैं हर मुलाकात में उनसे लाभान्वित होता रहा। डॉ. निगम, डॉ. राजेन्द्र मिश्र और अग्रवाल सर से उनकी थोड़ी बदली भूमिकाओं के बावजूद अभी भी सम्पर्क बना हुआ है और संस्कृत महाविद्यालय का विद्यार्थी होने का लाभ इन गुरुजनों से मुझे अब भी मिलता रहता है।

यहीं पढ़ाई के दौरान मुझे बोर्ड ऑफ स्टडीज और फिर विश्वविद्यालय के अकादमिक कौंसिल के छात्र प्रतिनिधि के रूप में सदस्य रहने का अवसर मिला और इसी महाविद्यालय की शिक्षा का परिणाम मेरे लिए एम.ए. में सर्वोच्च अंकों के लिए स्वर्ण पदक के रूप में सर्वाधिक उल्लेखनीय रहा। इसी पढ़ाई और परिणाम के बदौलत मेरा प्रवेश आगे की पढ़ाई के लिए बिरला इस्टीट्‌यूट, भोपाल में सहज ही हो गया और फिर यही मेरे पुरातत्व/संस्कृति विभाग की इस शासकीय सेवा की पृष्ठभूमि बना लेकिन इन सब उपलब्धियों की तुलना में यह महाविद्यालय गुरूकुलनुमा आत्मीय माहौल के साथ संस्कार केन्द्र के रूप में अधिक स्मरणीय है। वर्ष 2005 इस महाविद्यालय के लिए स्वर्ण जयंती का वर्ष मात्र नहीं विगत 50 स्वर्णिम वर्षों के गौरवशाली इतिहास का साक्षी वर्ष भी है।

2005 में महाविद्यालय की स्वर्ण जयंती वर्ष में प्रकाशित स्‍मारिका के लिए मेरा लिखा लेख, जो लगभग इसी तरह प्रकाशित हुआ है।

पूर्णिमा परिशिष्‍ट

आषाढ़ की पूर्णिमा, गुरु अथवा व्‍यास पूर्णिमा भी है। कहा जाता है कि व्‍यास का जन्‍म इसी तिथि को हुआ था, जिनका अधिक प्रचलित नाम वेदव्‍यास है। इन्‍हें 28 व्‍यासों की नामावलि में अंतिम, कृष्‍ण द्वैपायन कहा गया है। इनका एक अन्‍य नाम बादरायण भी है। इस अवसर पर गुरुओं और अपने बादरायण संबंधों के कुछ उल्‍लेख-

छात्रावास में रहते हुए हम सब अपने को इस पूरे परिसर के लिए जिम्‍मेदार मानते और मेरी अनुशासनप्रियता का एक ही उदाहरण काफी होगा, लगभग छः म‍हीने बाद एक दिन तबियत नरम-गरम होने के कारण मुझे पता चला कि छात्रावास में प्रतिदिन सन्‍ध्‍या प्रार्थना भी होती है, जो सबके लिए अनिवार्य है। तब दिन भर का तो अपना ठिकाना नहीं रहता था, लेकिन अपनी निशाचरी के कारण, रात की जिम्‍मेदारी चौकीदारों के साथ मैं अपनी भी मानता। रात चौकीदारी वाले साथियों सर्वश्री अंजोरदास, नरहर, कातिक और गुहाराम को भी गुरुओं के साथ स्‍मरण कर रहा हूं, गुरु शब्‍द की एक व्‍याख्‍या है- 'गरति सिञ्चति कर्णयोर्ज्ञानामृतम् इति गुरुः' अर्थात् गुरु, जो कानों में ज्ञानरूपी अमृत का सिंचन करे। उन दिनों के इन निशाचर साथियों से मैंने न जाने कितने किस्‍से सुने हैं भूत-परेत, धरम-करम-कुकरम, समाज-लोकाचार के और जीवन का पाठ पढ़ा है, वह सब मुझे अमृत सिंचन की तरह ही प्रिय होता था।

इसी संदर्भ में गुरु पदासीन महापुरुषों का स्‍मरण- कभी इस महाविद्यालय के विद्यार्थी रहे छत्‍तीसगढ़ के महान संत कवि श्री पवन दीवान जी, जिनके लिए नारा बना 'पवन नहीं ये आंधी है, छत्‍तीसगढ़ का गांधी है', जो राजनीति में सक्रिय रहते हुए कई पदों के साथ सांसद और कभी जेल मंत्री भी रहे, तब कहते, जिसका मंत्री हूं, वही दे सकता हूं।... इसी संस्‍था में छात्र रहे राजेश्री महंत रामसुंदरदास जी महाराज।... तीन विद्यार्थियों वाले कक्ष क्र. 12 में लगभग पूरे दो साल मैं अकेले रहा। कभी-कभार गालव साहू और तजेन्‍द्र शर्मा रूकते थे। तजेन्‍द्र के संदर्भ से छत्‍तीसगढ़ के पांडुका गांव में जन्‍म लिए महेश प्रसाद वर्मा यानि विश्‍व गुरु महर्षि महेश योगी से अपना जुड़ाव महसूस करता हूं। तजेन्‍द्र, पढ़ाई के बाद महर्षि जी की संस्‍था से संबद्ध हो गए थे।

अब क्‍लाइमेक्‍स, यानि आ जाएं रायपुर में रजनीश पर। छात्रावास का मुझे मिला कमरा खाली रहने से मुझे सुविधा ही थी। कुछ समय बाद पता चला कि छात्रावास में कई भूत हैं, उनकी चहलकदमी खाली पड़े मेस हॉल में, छत पर और इस कमरे क्र. 12 में रहती है। यह भी बताया गया कि इसी कमरे में कभी किसी छात्र ने आत्‍महत्‍या कर ली थी। (मन ही मन चाहता रहा कि इन किस्‍सों पर सबका भरोसा बना रहे और मैं अकेला इस कमरे में काबिज रहूं, लेकिन) इस बात की शिकायत ले कर पहले मैं वार्डन से मिला फिर प्राचार्य शर्मा जी से। उन्‍होंने धैर्य से मेरी बातें सुनी, फिर बताया कि तुम्‍हें तो वह खास कमरा दिया गया है, (संभव है मेरा मन रखने को, लेकिन मैं क्‍यों न मान लूं) जिसमें कभी रजनीश रहते थे। मैंने अविश्‍वासपूर्वक कहा, आचार्य रजनीश! यहां, रायपुर में। इस पर, शर्मा सर ने यह तस्‍वीर दिखाई-

आप भी देखिए, तब फोटो-वोटो अंगरेजी कारबार माना जाता था शायद, इसीलिए तो संस्‍कृत कालेज के इस समूह चित्र पर लेखी अंगरेजी में है और चित्र के साथ नाम का अनुमान आप लगा ही सकते हैं, Shri R. C. Mohan यानि श्री रजनीश चन्‍द्र मोहन, आचार्य रजनीश, भगवान रजनीश, ओशो।