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Wednesday, May 13, 2026

गुरुदेव काश्यप

छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता पर ‘छत्तीसगढ़‘ सांध्य दैनिक के सुनील कुमार से मुलाकात में बात चली, तृप्ति सोनी की किताब ‘छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता, चार पीढ़ियों की स्याही की विरासत‘ की और पहुंची, गुरुदेव काश्यप तक। मैं उनसे और उनके पत्रकार-संपादक होने से परिचित रहा हूं, मगर उनकी कविताई से बहुत कम। सुनील कुमार जी ने उनकी किताब ‘धूप का एक दिन‘ (1972) पढ़ने को दे दी। यह जानकारी न होने से अपनी चिढ़ का बदला खुद से लेने के लिए आते ही काम में लगा, पूरे संग्रह की वर्ड फाइल तैयार कर ली और ललित कुमार के ‘कविता कोश‘ में भेज दिया।

गुरुदेव काश्यप जी के साथ रायगढ़ के उन दिनों से ले कर अब तक को याद करता रहा जब सर्व माननीय किशोरी मोहन त्रिपाठी, बारेन दा, अनुपम दासगुुप्ता, प्रभात त्रिपाठी, देवेंद्र प्रताप सिंह, हरिहर सिंह, अतुल श्रीवास्तव, हरकिशोर दास, रवि मिश्रा, विनोद पांडेय, रमेश शर्मा, स्वराज करुण, शिव राजपूत, राजू और हेमचंद्र पांडेय, बिहारीलाल साहू, डॉ. बल्देव, बसंत राघव, अशोक अग्रवाल, अनिल रतेरिया, प्रमोद ब्रह्मभट्ट, गोपाल पटेल, राकेश शर्मा, अजय अटापट्टू, चंडीप्रसाद गुप्ता, अंबिका वर्मा, राजेश डेनियल, अबरार हुसैन ..., बहरहाल वापस गुरुदेव काश्यप की कविता। उनकी कविताएं पढ़ते हुए तात्कालिक पाठकीय प्रतिक्रिया बनी-

वे रविशंकर विश्वविद्यालय के मानवशास्त्र के संभवतः पहले बैच के विद्यार्थी थे छुईखदान वाले राघवेंद्र त्रिपाठी, बाद में इसी विभाग में सेवाएं देने वाले सरोज बाजपेयी भी संभवतः इस बैच में थे। उन्होंने भाषा की भी पढ़ाई की। यायावरी- गुरुदेव काश्यप की कविताओं में झलकती है मगर उनके संग्रह ‘धूप का एक दिन‘ का लगभग सारा लेखन अखबार-समाचार के बीच पनपा है, जिसमें शहर का माहौल-पर्यावरण, देश की दशा और संविधान तथा वैश्विक परिस्थितियां, अमरीका हावी है। देखा जा सकता है कि समाचार-सूचना के संवेदनशील प्रस्तोता को उस माध्यम की सीमा बेचैन करती है, तथ्यों के साथ विचार और भावनाओं के बिंब-प्रतिबिंब के लिए वहां जगह नहीं होती, वह समाचार-गद्य में लिख-चुक जाता है लेकिन शुष्क, असम्बद्ध-सी घटना और परिस्थिति के समाचारों के पीछे मानवीय रिश्ता तो महसूस होता ही है। इसलिए ऐसे गद्य-अभिलेखन समाचारों के अंदर सहज कविता प्रवाहित होती रहती है, संवेदनशील मन उसे महसूस करता सुन लेता है और भाषा-कलम पर अधिकार हो तो अभिव्यक्त कर पाता है, ऐसी ही है इस पुस्तक की कविताएं, जिसकी पहली कविता का शीर्षक है ‘भूमिका: हम ऋग्वेदपदी‘, जिससे समझा जा सकता है कि यह कवि समष्टि से एकाकार हो कर रचना कर रहा है। उनकी कुछ कविताएं-


भूमिका: हम ऋग्वेदपदी 

आहुति दो पितरों, देवताओं को। 
हे पवित्राप्रद अग्नियो, 
स्तवन करो 

हम ऋग्वेदपदी सौ हेमन्तों को लांघते 
बांहों में समेट आत्मजों को 
ऋषि-आयु भोगेंगे। 

वरणीय पृथिवी का आलिंगन करें 
स्वागत करें 
अंतरिक्ष से उभरते सूर्य का 
यह सोमधारी 
प्रजाओं के लिये 
अमृत किरणें उछालता आया है। 

आयुष्मान् बंधु, 
दाब दो किसी पत्थर के नीचे 
अपनी अकारथ मृत्यु को 

धूप का एक दिन 

धूप है-सीपी है 
सूरज एक मोती है 
कानों के रिंग में बड़ा भला लगता है 
(क्या करें, कीमती है) 

धूप है-लहरें हैं 
दिन एक समुन्दर है 
नारियल की छांव में 
नाव बने लेटे हैं 
(पाल है, मछलियां हैं, लंगर है) 

धूप है-चुम्बन है 
फेनदार किरने हैं 
लथपथ हैं ओंठ 
पैर डगमग हैं 
(शाम के कंधे हैं, शिथिल-शिथिल झरने हैं) 

सुबह की बौछार 

सुबह-सुबह 
मुक्तक-सा बरस गया पानी। 

भीग गए अधजागे फूल-पत्र 
भीग गए छत-छज्जे, गलियारे 
बिजली की कुमकुम, 
तांबे के तार, नरम अंधियारे 

पुल की वह रेलिंग भी भीग गई 
भीग गई नहर, मुरम भीग गई 
खिड़की का कासनी परदा कुछ सिमट गया 
सन्नाटा चौक के पास कहीं ठिठक गया। 

सुगबुग दरवाजे की 
कड़ी-कड़ी जगती है 
टिक कर दीवारों से 
धूप खड़ी होती है 
धुले-धुले गागर में 
सूर्य समा जाता है 
ईंधन के बोझ लिए 
दिवस चला आता है 

रात का अनबोला आंगन में सोया है 
पास का गजरा भी दबे-दबे रोया है 
दुखा गया जी को यह ऐसा अभिमानी है 
सुबह-सुबह मुक्तक-सा बरसा जो पानी है। 

दिन 

नंगे पांव फुटपाथ पर दौड़ता 
मूंगफली के छिलके बटोरता 
आहिस्ता कुछ सोच कर 
पार्क के चकेदार दरवाजे पर झूलता 
म्यूजियम की मुंडेर से झाँकता 
सिनेमा घर के सामने 
कागज के रंगीन टुकड़े बटोरता 
कभी किसी रंगीन बोर्ड को खुरचता 
फव्वारे पर 
पानी के छींटे बिखेरता 

दोपहर- 
किसी बबूल की टहनी से 
धूप की उलझी हुई पतंग को निकालता 
फेरी वालों के पीछे भागता 
रेल की पाँतों को पार करता 
नदी की रेत को रौंदता 
किसी हरवाहे की पगड़ी उछालता 
कभी दो बूढ़े बैलों को पुचकारता 

शाम- 
किसी खोमचे के नजदीक 
उदास मुंह लिये 
खाली जेबें टटोलता 
सूरज डूबे 
इसी गली की मोड़ पर 
हर रोज घेर कर 
मुझे आखरी सलाम करता 

बस यूं ही हाथ पीछे बाँधे 
अकेले किसी कोने में 
दुबक कर बैठ जाता 
उदास मन, खिन्न: 
सोचता हूं- 
किस विधवा का बेटा है 
आवारा-आवारा सा 
नाबालिग दिन। 

शाम 

जी चाहता है- 
बादलों की ऐंठी हुई पगड़ी में 
सूरज का एक दूध-मोंगरा 
खोंप दूं। 

धरती के भरे-भरे गालों से 
छाछ सी धूप छितर जाती है 
घूंघट में छांव नई ब्याही-सी 
आंगन के बाहर जो 
नजर नहीं आती है। 

पिंजड़े में सुग्गे सी 
शाम फुदक जाती है 
नई-नई बछिया सी 
हवा बिदक जाती है। 

रात की मचिया पर 
चांद बैठ जाता है 
बूंद-बूंद अमरस-सी 
चांदनी टपक गई 
कांस की कटोरी-सा 
पोखर भर जाता है 
भरे-भरे महुए से 
तारे टपका किए 
पगडंडी बैठी है 
खाली डलिया लिए। 

पुस्तक के फ्लैप पर परिचय, जो संभवतः स्वयं उन्होंने लिखा है, इस प्रकार है- 

जीवन को प्रथम तिथि पंक्ति, रायगढ़ दिनांक 15 अगस्त 1935। एक निम्न मध्यमवर्गीय संयुक्त परिवार के सारे अभिशापों को वर्षों तक झेलने की विवशता। वह त्रासदायी परिवेश जो शैशव में हो रीढ़ की हड्डियों को प्रौढ़ बना जाता है। शिक्षा- एम. ए., मानव शास्त्र और भाषा विज्ञान में डिप्लोमा। व्यवसाय- पत्रकारिता। विगत 20 वर्षों में अनेक क्षेत्रीय पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन एव सम्पादन। पिछले कुछ वर्षों में दैनिक ‘महाकोशल‘ रायपुर के संपादक। अभिरुचि क्रमांक 1- यायावरीः डोनापाल से डीफू तक। ‘भटक चुके आगे और भटकेगे।‘ क्र. 2- असफल प्रकाशनों के लिए सफल योजनायें तैयार कर उन्हें क्षेत्रीय प्रतिभाओं के बीच खपाना। सन 1958 से 1966 के बीच अनेक पुस्तकों का प्रकाशन, संपादन। सहयोगी काव्य संग्रह नये स्वर-3, छत्तीसगढ़ का प्रथम कहानी संग्रह, ‘मीठे कनेर का दरख्त‘, काव्य संग्रह ‘नैवेद्य‘, ब्लादीमीर नाबोकोव के चर्चित उपन्यास ‘लोलिता‘ का अनुवाद और हिन्दी मे वियतनाम संबंधी प्रथम काव्य संग्रह ‘आहत सूर्य देश में‘। उपलब्धि- मित्रों का स्नेह, नवागतुकों की श्रद्धा और यह अटूट विश्वास कि समूचे भविष्य पर अधिकार हमारा है। मध्यप्रदेश में नई कविता का सूत्रपात करने वाले प्रथम सहयोगी काव्य संकलन नये स्वर-1 (1956) के सहयोगी कवि। प्रचार प्रसार के मंच पर उपस्थित होने से सदैव भयभीत। 22 वर्षों के रचना-काल में अंततः यह प्रथम व्यक्तिगत काव्य संग्रह ‘धूप का एक दिन‘। आगामी अभिशप्त उत्कल।

Wednesday, March 12, 2025

देउरकोना - पति पाती

पत्र लेखक-पति - राहुल कुमार सिंह, डीपाडीह कलां, 26/1/89 
पत्र प्राप्तकर्ता-पत्नी - श्रीमती नम्रता सिंह, अकलतरा, 3/2/89 


देउरकोना मंदिर          (संभवतः शिव मंदिर) 
लगभग 8 वीं सदी ई.     (दक्षिण पूर्व) 
लगभग 28 साल बाद
इस रास्ते से गुजरते हुए
पुनः इस मंदिर पर आया।
अब मोबाइल-तस्वीरें भी ले ली।

त्रिरथ प्रकार का, पंचभूमि शिखर वाला पूर्वाभिमुख मंदिर है अग्रभाग खंडित होने से प्रवेश द्वार अप्राप्त है. अधिष्ठान अंशतः भूमि में दबा, अर्द्धस्तंभयुक्त प्रक्षेप वाली जंघा, चैत्य गवाक्ष, कीर्तिमुख, प्रतिमाओं (गणेश) युक्त शिखर, उपर क्षत शिखर पर आमलक शिला रखी है। 

जंघा के निचले भाग पर छोटी उत्कीर्ण प्रतिमाओं युक्त पाषाण मध्य में slit तथा उपर मकर मुख (सम्मुख युग्म) जंघा पर मालाधारी गन्धर्व तथा चैत्य में मुकुल. 

कीचक और गज का अंकन शिखर प्रक्षेप के सलिलान्तरों में। 

ईब नदी के बायें पार्श्व में लगभग 8 वीं सदी ई. का मंदिर है। 

यह स्थान सन्ना से लगभग 12 कि.मी. तथा इतना ही डीपाडीह से दूर है मार्ग के पश्चिम व्यपवर्तन (ग्राम नन्हेसर) से मात्र 1 कि.मी. दूर यहां पहुंचा जा सकता है। 

ईब उद्गम- जड़ाकोना ग्राम निकट ही है। रानीझूला पहाड़ी से निकला है। शिवालय पहाड़ी देउरकोना मंदिर के पास वटली पहाड़ी का नाम है। 

पोस्ट तथा राजस्व ग्राम - नन्हेसर 
पटवारी हल्का - 2 (खेड़ार) 
विकास खंड+तहसील - बगीचा 
थाना - सन्ना 
जिला - रायगढ़

Monday, November 7, 2022

केलो

रायगढ़, हमारे राज्य गीत ‘अरपा, पइरी के धार ...‘ में मंउरे मुकुट है। रायगढ़ की पहचान, केलो नदी की गौरव गाथा में मेरी स्मृति में बारेननाथ बैनर्जी का नाम आता है। स्टेशन से निकलते ही सबसे पहले उनके निवास पर जाते। वे सदैव चुस्त, तत्पर मिलते। इसके साथ यहां प्रस्तुत रचना में आए नामों के साथ देवेंद्र प्रताप सिंह, वेदमणि सिंह ठाकुर, डॉ. बिहारीलाल साहू, हरिहर सिंह, रवि मिश्रा, जगदीश मेहर, शिव राजपूत ‘केलो कपूत‘, अजय आठले, डॉ. अतुल श्रीवास्तव, विनोद पांडेय, राजू पांडेय, प्रताप खोड़ियार, डॉ गंगा डनसेना भी मेरे लिए रायगढ़ के साथ जुड़े रहे हैं। 

अनुपम कुमार दासगुप्ता, लंबे समय तक 'नवभारत' समाचार पत्र के सम्मानित प्रतिनिधि रहे। 13 मार्च 1978 को प्रकाशित रायगढ़ के इस विवरणनुमा कविता के रचयिता के साथ किसी का नाम नहीं है, मगर उनसे होने वाली बातों-मुलाकातों से यह अनुमान आसान कि ये पंक्तियां उन्हीं की हैं। 

नहीं थमा है, केलो तुम्हारा प्रवाह अभी... 

केलो तुम एक प्रवाह हो 
तुम्हारे सुरमय तट के घनघोर हरियाली मध्य 
शिलाओं पर उकेरता है आदिमानव 
सभ्यता का अमूल्य धरोहर 
विंध्याचल की इन पर्वत श्रृंखलाओं में जीवन्त है 
मनुष्य में जन्म लेती 
सभ्यता का प्रथम कलात्मक हस्ताक्षर 
कलात्मक अनुभूति/रंग और भावनाओं की 
प्रागैतिहासिक पाषाण पाण्डुलिपि 
सिंघनपुर, कबरा, कर्मागढ़, भैसगढ़ी से टेरम तक 
तुम्हारी तटीय सभ्यता के प्रथम दस्तावेज आज भी है। 


केलो तुम एक धारा हो 
उत्तर वैदिकाल में 
तुम्हारे सघन वनप्रान्तरों से ही होकर गुजरे थे 
चौदह वर्षीय वनवासी राम 
आखिर तुम प्रवाहित होती हो 
सरगुजा की सीता बेंगरा, जोगीमारा गुफाओं से 
दण्डकारण्य के रास्ते के मध्य। 
तुम्हारे तट पर बसे मुकडेग, केसला, आमगांव में 
यत्र तत्र बिखरी पड़ी है 
मोहनजोदड़ो सा वही प्रस्तर शिल्प-पाषाण स्तंभ 
कर्मागढ़ का पाषाण सिंह द्वार 
महाभारत कालीन प्रस्तर शिल्प का साक्ष्य। 
मौर्यों ने दक्षिण पथ की विजय यात्रा 
तुम्हारे तट से होकर की थी 
मौर्यों ने तुम्हारे ही तट पर बौद्ध धर्म का प्रसार किया था 
नेतनागर, कलमी बुनगा से पुजारी पाली तक फैला है 
जैन धर्म के प्रभाव का साक्ष्य 
तुम्हारे तट से कुछ दूर जमरगी में 
सहज ही मिलते हैं विश्व के प्राचीनतम महाजनपदकालीन आहत सिक्के 
तुम्हारे तटीय भू-भाग पर शासन करते रहे 
सातवाहन, शरमपुरी, सोमवंशी, कलचुरि, नल, नागवंशी नरेश। 

केलो तुम इतिहास के कालचक की मूक साक्षी हो 
अलिखित इतिहास हो 
कोई चार शताब्दी पहले 
तुम्हारे ही तट पर किसी राज्य की नींव रखी थी, 
चांदा के नागवंशी गोड़ों ने 
हटराज साय के स्थापित इस राज्य में 
जुझारसिंह, देवनाथ सिंह थोड़ा बहुत जुझे जरूर 
पर जिसे युद्ध कहा जाए वह कभी हुआ नहीं 
भूपदेवसिंह ने जिस कला परम्परा की आधार शिला रखी
... त कर गए चक्रधर सिंह 
कला साहित्य संस्कृति की दृष्टि से 
इस शताब्दी का वह चौथा दशक 
आज भी तुम्हारे तट पर बसे इस नगरी का 
कहते हैं वह स्वर्णकाल था 
तुम्हारे इस शासक के 
अवसान और अकाल मृत्यु का कारण न पूछो 
इतिहास के कुछ तथ्य नेपथ्य में रहने दो 
व्यक्ति कालजयी नहीं होता 
उसका ललित कला प्रेम चिरस्थायी रह गया। 

केलो तुम एक संस्कृति हो 
तुम्हारे तट की इस कला धनी नगरी में 
उस काल में कौन नहीं आया 
संगीत ऋषि विष्णु दिगम्बर पुलस्कर से मल्ल सम्राट राममूर्ति तक 
गायक मनहर बर्वे, नृत्याचार्य लच्छू महाराज, अच्छन महाराज, सितारादेवी, 
डा. रामकुमार वर्मा, जानकी वल्लभ शास्त्री, पं. माखनलाल चतुर्वेदी, आनन्द मोहन बाजपेई। 
चक्रधर पुरस्कार के अधिकारी बने 
कवि जगन्नाथ ‘भानु‘/डा. रामकुमार वर्मा/कवि अंचल 
और अनेकों नाम हैं 
प्रति वर्ष लगता था महाव्यापी गणेश मेला 
पर अब वह अतीत की बाते हैं 
तुम्हारे इस नरेश को सद्बुद्ध देने विद्वानों का साथ था 
मानस मर्मज्ञ डा. बल्देव मिश्र/दीवान जे. एन. महंत प्रभृति विद्वान थे 
पर ये सभी राजशाही के अंग भी थे 
दबाव के उनके अपने तरीके थे 
इसीलिए लोकमत तेजी से जागा नहीं 
आजादी के बिना मन रमा नहीं 

केलो तुम एक प्रेरणा हो 
तुम्हारे तट के महल में 
माटी के कलाकारों ने ऊंचाई को छुआ 
कार्तिक/कल्याण/बर्मन/बडकू मिया/जगदीश सिंह ‘दीन‘ 
बहुत कुछ सीखा और पीढ़ियों में बांटा। 
अनन्तराम पाण्डेय ने हिन्दी में प्रथम सानेट लिखा 
डॉ. बलदेव प्रसाद मिश्र ने तुलसी दर्शन की रचना की 
पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय ने भारतीय इतिहास की खोई कड़ियों को कालक्रम से एकबद्ध किया। 
पं. मुकटधर पाण्डेय ने हिन्दी में छायावाद को अवतरित किया 
चिरंजीव दास ने गीत गोविन्द हिन्दी में रचा 
बनमाली प्रसाद शुक्ल ने हिन्दी को प्रथम बीजगणित दिया 
इससे भिन्न कलमकार सजग प्रहरी की तरह रहे 
राजपथ से जनपथ की दिशा देते रहे 
महादेव प्रसाद मिश्र ‘अतीत‘/मनोहर प्रसाद मिश्र/अमरनाथ तिवारी, बन्दे अली फातमी
अपने कलम का पैनापन बराबर दर्शाते रहे, जगाते रहे 
किशोरी मोहन त्रिपाठी हर दौर में साथ रहे 
कभी सामने रहे कभी नेपथ्य में रहे 
आजादी के बाद नये कलमकार आए 
... धूमकेतु की तरह छाये 
... ... तेवर उभरे 
...प्रकृति के नये गीत गाए 
किरोड़ीमल ने शहर को नया रूप दिया 
पालू ने पंच का दायित्व निबाहा 
रामकुमार ने सामंती विरोध को जनवादी तेवर दिया 
उमाशंकर ‘दद्दू‘ ने नई पौध को विचारों का रंग मंच दिया 
राममूर्ति बचई यायावर की तरह जीया। 

केलो तुम्हारे तट की प्रतिभाएं कहीं कुठित नहीं हैं 
प्रमोद वर्मा, गुरूदेव कश्यप, अशोक झा, प्रभात त्रिपाठी ने 
इस शहर को फिर प्रसिद्धि दी है 
मुस्तफा/जीवतसिंह ठाकुर/दिनेश पाण्डेय/डा. महेन्द्र परमार/डा. बल्देव/
अम्बिका वर्मा/ मुमताज भारती/हरिकिशोर दास/हेमचन्द्र पाण्डेय/रवीन्द्र चौबे अभी सजग हस्ताक्षर हैं 
यहां राजनीति का तेवर अभी वाम नहीं है 
राजशाही से वर्तमान तक खंडित पहचान नहीं है 
कल जो रंक थे आज वे वक्त के शहजादे हैं 
कल जो खास थे आज वे खाक हो रहे हैं। 
बढ़ते शहर को, बढ़ते विचारों को 
अभी तेज चलना है 

केलो तुम्हारा प्रवाह अभी थमा नहीं है। 
अभी तुम्हें और बहना है, और बहना है।

रायगढ़ के साथ मेरी स्मृति में स्थायी दर्ज यह चित्र।
सन 1948 में बने श्री गौरीशंकर मंदिर में
दशावतारों के बीच नेहरू-गांधी हैं।


Friday, October 28, 2022

कथा गढ़ते झारा-शिल्पी

एकताल, रायगढ़ जिले का अनूठा गांव है। छोटी सी आबादी वाले गांव में बहुत से राष्ट्रपति पुरस्कृत शिल्पी और शिल्प गुरु गोविंदराम झारा का गांव। मोमक्षय विधि से पीतल की आकृतियां गढ़ने वाले शिल्पी कथाएं भी गढ़ते हैं। पायली, दिया जागर और लक्ष्मी बनाने वाले कलाकार, करम झाड़ के बाद कथाओं को शिल्प का रूप देने लगे और शिल्प की कथा भी गढ़ने लगे। ‘विद्वान कला समीक्षकों‘ के सवालों के साथ धीरे-धीरे, उन ‘विशेषज्ञों‘ का मन पढ़ना भी इन शिल्पियों ने सीख लिया। शिल्प-कृति कोई भी हो, हर-एक आ कर पूछता है, इसकी कहानी क्या है। सरकारी मुलाजिमों की पूछ-परख का ध्यान रखते कुछ वैसी योजनाओं को भी आकार देने का प्रयास। शिल्पियों ने जान लिया कि सिर्फ कथाओं को शिल्प में गढ़ने से काम नहीं सधेगा, कलाकृति की कथा भी सोचनी, गढ़नी, कहनी पड़ेगी।

गोविंदराम झारा, जैसे हुनरमंद शिल्पी हैं, उतने ही किस्सागो और लोक गायक भी कम नहीं। अब बाकी ने भी कथाकारी सीख ली है और कई तो शिल्पी से अधिक कथाकार हो गए हैं। शंकरलाल, पुन्नीबाई, पटेल कुमार, संतोसिनी, शत्रुघन से बातें करता हूं, वे अब लिखा प्रिंट आउट किस्सा सौंप देते हैं, दसेक साल पुरानी बात। मैं फिर भी उनसे मुंह-अखरा किस्सा सुनने का आग्रह करता हूं। वे किस्सा सुनाते हैं, कागज की लेखी और कही-सुनी ...

शंकरलाल-पुन्नीबाई और पटेल सपरिवार

शंकरलाल चौथी कक्षा तक पढ़े भजन गायन भी करते हैं। गायकी और शिल्पकारी माता-पिता से सीखी। उड़िया, छत्तीसगढ़ी और हिन्दी बोलते हैं। ‘संसार सार गीता‘ का विशेष अध्ययन किया है। अपने शिल्प के बारे में बताते हैं-

सतयुग में विष्णु का अवतार से शेषनाग के उपर में अनंत सज्या समुद्र के उपर में साथ में आदि माता की कहानी प्रस्तुत करता हूं। 

नाभि कमल से ब्रम्हा निर्माण, 
साथ वाहन गरूड़ जी,
मधु और कैटप नामक राक्षस विष्णु जी के मैल से जन्म की कहानी, 
शंखासुर नामक राक्षस का जन्म और उसका उपद्रव।

इसके साथ उन्हीं के शब्दों में-


विष्णु भगवान के दस अवतार

(1) मत्स्य अवतार में जन्म और उनके द्वारा शंखासुर का अंत।
(2) कछप अवतार में पृथ्वी को अपने पीठ पर धारण करना। 
(3) वराह अवतार में अपने खीशे से पृथ्वी को धारण करना।
(4) नरसिंह अवतार में हिरण्यकश्यप राक्षस का वध।
(5) वामन अवतार में बली राजा से तीन पग भूमि दान का याचना करना।
(6) परशुराम अवतार में 21 बार पृथ्वी को निःक्षत्रिय करना। 
(7) राम अवतार में रावण का वध।
(8) कृष्ण अवतार में कंश का वध। 
(9) बुद्ध अवतार में मौन रूप धारण। 
(10) कलंकी अवतार का कलीयुग में जन्म।


भगवान विष्णु का ‘‘मतस्य अवतार और शंखासुर का वध’’ की कहानी-

अनंत कोटी कोटी कल्प युग के बाद धरती की युग अनुसार अनंत कोटी जीव जन्तु ज्ञात हुआ और बहुत सारे पशु पक्षी कीट पंतग जीव दानव-मानव तथा राक्षसों का जन्म हुआ और सागर में शंखासुर नामक राक्षस का जन्म हुआ और वह राक्षस अपने बाहुबल से ब्रम्हा आदि सभी दवताओं एवं सुर साधुओं के वेद पुराण शास्त्र सर्व सम्पद का हरण कर लिया। ब्रम्हा ने वेद पुराण के बिना हवन पूजा-पाठ आदि सभी कार्य करना बंद कर दिया। हवन न होने के कारण गंधर्व, नारद ऋषि मुनियो का जीना मुश्किल हो गया। ऋषि मुनी वर्ग में देवताओं ने एक साथ मिलकर बैकुण्ठ में जाने का प्रस्ताव किया। उस समय भगवान विष्णु अनंत शयन में थे। लक्ष्मी माता चरण चाप कर रही थी। शंखासुर का अत्याचार और देवताओं का कष्ट भगवान विष्णु को दिव्य ज्ञान से ज्ञात हो गया था। और इस बात को लेकर भगवान विष्णु ने लक्ष्मी माता पर ध्यान देकर ब्रम्हा आदि ऋषियों के बारे में सोच रहे थे। इसी समय ब्रम्हा अपने साथ सब ऋषि और देवताओं को लेकर बैकुण्ठ पहुंच गये। और भगवान विष्णु को जगाने का प्रयास किया लेकिन भगवान विष्णु खुद जाग गये और कहने लगे कि अब तुम्हारा सब दुख दूर हो जाएगा। अब चिंता की कोई बात नही। मैं छल-बल से शंखासुर का वध करके आपका वेद पुराण वापस लाउंगा। यह कहकर ब्रम्हा जी ने सबको आराम से विश्राम करने को कहा।

दक्षिण समुद्र के पास सरस्वती नामक नदी थी। उस नदी के पास विध्य नामक पर्वत था। उस पर्वत में कश्यप नामक ऋषि रहते थे। कार्तिक मास में ऋषि प्रतिदिन नदी में स्नान करने जाते थे। एक दिन ऋषि प्रातः स्थान करके अपने पितृ पिता को अर्ध्य देकर सूर्य देवता के लिये अंजलि कर में जल का अर्पण कर रहे थे। उस समय प्रभु नरसिंह भगवान ने छोटा सा मत्स्य रूप धारण कर ऋषि के हाथ में आ गये उसे देखकर ऋषि ने उसे अपने कंमडल पर रख दिये। उस छोटे से मत्स्य के रूप स्वयं विष्णु भगवान थे। ऋषि को उसका ज्ञान नही था। कमंडल में रहते हुए मछली ने कहा कि मुझे सारस खा जाएंगे, मेरा काया बड़ा होने जा रहा है मुझे बड़ा जघा चाहिए। ऋषि ने सोचा कि मछली सारसों के डर से मेरे शरण में आ गया है, इसे सुरक्षित रखना चाहिए। ऋषि ने अन्य सभी ऋषि-मुनियों को बुलाया और कहा कि इस मत्स्य ने कमंडल में रहते हुए कह रहा है कि यह जगह छोटा पड़ रहा इसलिये मुझे रहने के लिये बड़ा जगह चाहिए। ऋषियों ने विचार कर कहा कि इसे सरोवर में छोड़ देना चाहिए। मत्स्य सरोवर से भी बड़ा होने लगा, कहा मुझे और भी बड़ा जगह चाहिए। सब ऋषियों ने विस्मित होकर सोचने लगे कि यह भगवान विष्णु की लीला है, इसे समुद्र में छोड़ देना चाहिए। फिर सबने मिलकर मत्स्य को समुद्र मे छोड़ दिया। मत्स्य ने अपना स्वरूप धारण करके काया विस्तार करने लगा और स्वर्णमय मत्स्य रूप धारण करके सब देवताओ को बुलाया। छोटा बड़ा मीन का रूप लेकर समुद्र में प्रलय किये। मत्स्य ने उथल पुथल कर हुंकार करके छलांग लगाकर समुद्र का पानी खत्म कर दिये। जल खत्म होने के कारण सब मछलियों इकट्ठा होकर सोचने लगे शंखा मछलियों के साथ बहुत गाभिर में छुपा था। उसे देखकर भगवान विष्णु ने उसके पास पहुंच स्वंय रूप धारण किया शंखासुर को लेकर बद्रिका चल पड़े। गोविंद ने उसका भुजा पकड़ करके शंखासुर को पटक दिया शंखा चुर्ण चुर्ण होकर इधर उधर चारों दिशाओं में बिखर गया, धरती डगमगाने लगा, पर्वत हिलने लगे, भगवान विष्णु ने सांत्वना देकर कहा कि डरने की कोई बात नहीं मैने शंखासुर का वध कर दिया है। सब खुशी से झुमने लगे स्वर्ग से देवताओं ने पुष्प वृष्टि की। ब्रम्हा विष्णु आदि सभी देवताओं ने अपना अपना वेद पुराण, शास्त्र पाकर बहुत खुश हुए और अपना-अपना हवन शुरू किया। तत्पश्चात सभी देवगण अपने-अपने धाम पहुंच गये। संसार में सभी सुखपूर्वक रहने लगे।

इसलिये लोग कार्तिक माह में एकादशी के दिन विष्णु जी की पूजा सत्यनारायण निराकार के रूप में उपवास करके ब्रत किया जाता है। भगवान विष्णु शंखासुर को कार्तिक माह में मारकर बैकुण्ठ का उद्धार किये।

आद्य अवतार भगवान विष्णु जी की जय।

पटेल झारा के पिता, भाई और भाभी यानि घर के तीन सदस्य राष्ट्रपति पुरस्कृत हैं, उनकी लेखी कहानी, उनकी जबानी- 

धरती सृजना और पृथ्वी जन्म एवं मानव जन्म, मानव उधार - 
दुखयारी मां और दुखयारी चटीयन पक्षी की कहानी


धरती सृजना एवं धरती उधार -

जिस समय धरती विनाशकारी प्रलय से घिरा हुआ था। वह समय राजा सत्यवर्त एक दीन गनडूकी नामक नदी में स्नान कर सूर्य को जल दे रहे थे, तभी हाथ में एक छोटी-सी मछली हाथ में आ गयी और बोलने लगी की हे राजा! मुझे समुद्र एवं नदियों में बडे़-बड़े मछली और मगरमच्छ खा जायेेंगे मेरी रक्षा करो तभी राजा मछली को पकड़ कर महल पर ले गया और एक छोटे से कटोरी में रखा और राजा आगे बढ़ा पलट कर देखा तो मछली बहुत बड़ी हो गयी, और मछली, राजा को बोली कि मुझे इसमें घुटन एवं चलने-फिरनें के लिये दिकतें हो रही है। तभी राजा और उससे भी बड़ा-सा कटोरा मंगावा कर मछली को रखा और फिर मछली देखते ही देखते और अधिक बड़ी हो गयी, इतने में राजा सत्यवर्त को समझने में देर नहीं लगा, राजा बोला हे मछली तु कौन है, कृपा कर आप सही रूप में दर्शन देने का कष्ट करें। तभी मछली के रूप में भगवान विष्णु राजा सत्यवर्त को दर्शन दिया । और कहा हे! राजन् आज से सात दिन बाद धरती विनाश प्रलय में डूब जायेगा। तुम समस्त ऋषि मुनि जीव-जन्तु को नाव पर सवार करना जब धरती प्रलय के समीप होगा तभी मैं मछली के रूप नाव पर सवार ऋषि मुनि जीव-जन्तु का रक्षा करूंगा। यह कहकर अतर्ध्यान हो गये, देखते ही देखते धरती प्रलय से डूबने लंगा और धरती का विनाश हो गया। उस समय ब्रम्हा, विष्णु, महेश चारों वेद पुराण से धरती का निर्माण हुआ साथ हि साथ मानव का भी जन्म हुआ, यह सही एवं सत्य है। इस प्रकार है।

वासुकी धरती माता -

यह इस प्रकार है कि भगवान सर्वत्र हैं अर्जुन भगवान के स्थान के खोज में निकले तभी अर्जुन वासुकी धरती माता के पास पहुंचे और बोला की हे नागवली मुझे अंदर जाने दो तभी नागवली अंदर जाने के लिये मना कर दिया। अर्जुन गुस्से में बोला कि मैं सारे नागवली मेरे एक ही तीर में विनाश कर दूंगा। तभी वासूकी धरती माता बोली हे अर्जुन तुझमें इतना साहस है मैं यह धरती को सुख एवं दुःख भरी समस्त प्राणी सहित धरती को अपनी सिर में उठाई हूं, अगर तूझमें साहस है तो इस धरती को सात दिन तक उठा कर देख तभी अर्जुन अपने धनुष के टंकक से धरती को उठाया और अंत में अर्जुन नागवली के साथ विवाह किया।

दसावतार

मछावतारः- मच्छ रूप में जब शंकासूर ने पृथ्वी सहित चारों वेद पुराण को लेकर समुद्र के अंदर छिपा तभी भगवान मच्छ अवतार लिये शंकासूर का वध किया।

कछवतारः- जिस समय देव और दानव मिलकर समुद्र मंथन किया उसमें लक्ष्मी, अयरावती, अष्टापसरा का जन्म हुआ साथ-साथ हलाल से निकला व विष को पीकर भगवान शंकर नीलकंठ कहलाये एवं सारंग धनुष का जन्म हुआ। जिससे शिव प्राप्त किया, लक्ष्मी को विष्णु ने विवाह किया। 

बराहावतारः- इस अवतार में पृथ्वी उधार एवं हिराणाक्ष का वध किया। 

परशुरामावतारः- इस अवतार में अपने अस्त्र-शस्त्र से अनेकों राजाओं एवं क्षत्रियों को अपनी खड़क से सिर काटा एवं देवों का उध्धार किया। 

नरसिंहावतारः- नरसिंह अवतार में हिरणकस्यपू का उध्धार एवं भक्त प्रहलाद को राजा। 

बावनोवतारः- जब बली नामक का एक राजा था जो धर्मिक राजा के साथ-साथ चक्रवर्ती भी थे एवं सत्यवंत राजा थे, जब बलीराजा ब्रम्हयंज्ञ कर रहे थे तब वहां भगवान ब्राम्हण के रूप में पहुंचा और देखा कि राजा तीन सत्य कर रहे हैं तभी राजा देख ब्राम्हण को बोले आपको क्या चाहिये उन्होने बोले कि मुझे आपसे तीन पांव जमीन चाहिये, जब ब्राम्हण एक पैर आगे बढ़ाया तो एक ही पैर से पूरे धरती को नापा और दूसरा पैर स्वर्ग में रखा एवं तीसरे पैर बली राजा के सिर में रखा।

रामअवतारः-इस अवतार में राम 14 वर्ष बनवाश एवं रावण व और राक्षसों का विनाश किया। इस प्रकार रामअवतार है। 

कृष्णावतारः- इस रूप में गीता भगवत् प्रेम सागर के प्रेम से लीन राधा कृष्ण का मिलन एंव आजीवन करावास कंश वध देवकी उद्धार। 

बुधावतारः- बुध रूप में दुनिया के शांति के लिये एवं ऋषि मुनियांे के रक्षा के लिये भगवान बुधावतार में बैठे। 

कलंकी अवतारः- कलंक में भाई-भाई में दूश्मन एवं एक-दूसरे में नफरत माता-पिता का न ही आदर-सम्मान और न ही विश्वास करते है। यह कलंकी अवतार है। 

मानव शादी-विवाह पति-पत्नि के जीवन कई जन्म का बंधन इस प्रकार है- 

समाज में लड़की पुरया घर की होती है, जब लड़की 18-19 वर्ष का हो जाती हैं तो दूर-दूर के रिस्तेदार जाति-समाज के लोग आते हैं। जाति वर्ग सुलझाते हैं। दोनों लड़का-लड़की का विवाह पक्की कराते हैं। मांगनी (सगाई) करते हैं आदिवासी क्षेत्र में शादी चार लकड़ी के खंबा को चारों दिशा में गाड़ते हैं और बीच में एक मौउहा के पेड़ के डाल को गाड़ते हैं और चारों दिशा में कलश रखते हैं। ऊपर में जामुन के टहनीयं को बिछाते हैं शादी में चूरका को शाम के समय करते हैं। जिसमें देवुल गुड़ी में जाकर पूजा करतें हैं वहां जूठन चावल हल्दी को लाकर लड़का-लड़की के शरीर में लीप करते हैं। शादी में तीन दिन तक लिप किया जाता हैं। लड़का-लड़की एक दिन के लिये उपासना रहते हैं। लगातार तीन दिन शादी के उत्सव में खाना-पिना एवं मास-मदिरा कर समाज के बुजूर्ग महिला एवं पुरूष नाच-गान करती हैं जिसमें पुरूष वादयंत्र ढोलक बजाते हैं और एक ओर महिला समूह में नृत्य करते हैं। लड़का अपनी विवाहित कन्या को अपनी गोद में बैठाकर लड़का को साथ दोनो को नहलाते हैं, कपड़ा के जरीये तब दोनों को नये वस्त्र पहनाकर शादी मंडप में बैठा कर दोनों को जीवन भर के लिये पति-पत्नि बना देते हैं। वहीं पर लड़का और लड़की विवाह के कई जन्मो के लिये बंधन में बंध जाते हैं वहीं से दोनों की नई जीन्दगी शुरूवात हो जाती है। सही एवं सत्य है।

जेजकी महिला

जब महिला गर्भवती होती है तो शिशु को जन्म देती है। 

गर्भवती महिला की दर्द भरी कहानी इस प्रकार है। लड़का हो तो दस महिना दस दिन मां अपनी पेट में रखती हैं वह महिला न तो ठीक से सो पाती है और न ही पेट भर खा नहीं पाती और ठीक से रह नहीं पाती। दसवां महिना दसों दिन तक तखलीफ झेलती है। जब दसवां महिना और दस दिन पूरे होते हैं तब महिला शिशु को पैदा करने के लिये घर में महिला उसकी सहायता के लिये आ जाते हैं। गर्भवती महिला को एक महिला सामने और दूसरी महिला पिछे कमर को दबाती हैं। जब महिला को अधीक तखलीफ होती है तो अपनी मन में हे धरती माता हे भगवान मुझे तकलीफ न दो कह कर सहन करती है। इसके बाद शिशु को खून में लतपत धरती में गिराती है। एक दो मिनिट बाद महिलाएं एक कांसे के बर्तन को लेकर बजाते हैं खून में लतपत लांभी को काटकर शिशु के स्नान करते हैं और पहली मां का दूध अमृत दूध कहलाता है। जब तक अपने परिवार को कोई भी महिला नहीं बताती है कि उसकी बेटा या बेटी हुई है। इसके बाद 10 मिनिट बाद बताते है कि लड़का है या लड़की। 

जेजकी महिला को कपड़ा पहनाते हैं इसके सात दिन तक देख-भाल में 3-4 महिलाये गर्भवती महिला के पेट को जारा नामक पत्ता को आग में सेंक कर पेट की सिकाई करते हैं। जेजकी महिला को केवल सुबह खाना दी जाती है, ताकि किसी प्रकार के बीमार में ना पड़े तब 21 दिन बाद या सात दिन बाद जन्म शिशु का नामकरण एवं नया जीवन नाम रखने के लिये दूध दही दारू घांस चावल एवं नये वस्त्र पहनाकर शिशु के शिर के बाल मुंडन कर उसे जाति समाज के बैठे के बुजूर्गों के सामने शिशु को लाया जाता है और कांसे के बर्तन में रखी पानी बच्चे के हाथ-पैर धोते हैं इसके बाद कांसे के बर्तन में रखी पानी में घांस और चावल को छोड़कर बुजूर्ग बोलते हैं कि नाति-पाति छन्ति यह तीन पार्ट बाद आया शिशु को बोलकर पानी में तैरते हुए घांस के पिछे चावल को छोड़कर घांस को दौड़ने के लिये बोलते है। जब चावल घांस को पकड़ लेता हैं तो उसे अपने पिता के तीन पाठ कहकर कोई अच्छा सा नाम देते हैं। तब खुसी-खुसहाली में बुजूर्ग गीत गोविंद कर नृत्य करते हैं। यह सारी तखलीप को मां सहन करती है। और कहती है कि मार खुद कुड़ा बापर सुनामुड़ अर्थात मां कहती है 10 महिना 10 दिन बच्चे को पेट में रखते है। और बच्चे को जन्म देती है और कहती है, कि तू 40 या 50 साल का भी हो तो मेरे लिए लाल बेटा एवं कलेजे का टुकटा ही होगा। इस प्रकार का कहानी सही एवं सत्य है।

छोटा परिवार सुखी परिवार 

इस प्रकार है कि छोटा परिवार सुखी परिवार अत्यन्त सुखमय परिवार है एक विवाहित पती-पत्नि के दो बच्चे थे। जिसमें एक लड़का और लड़की जो खुशी परिवार सुख शान्ति से रहने खाने पिने आंनद जींदगी व्यतीत करती है । इस प्रकार माता कहते है कि हम दो हमारे दो। सही एवं सत्य है। पिता - कहते हैं कि हम दो हमारे दो। सही एवं सत्य है।

बड़ा परिवार दुखी परिवार 

इस प्रकार है कि बड़ा परिवार में दुख के सिवाय कुछ भी नही है बड़ा परिवार न तो चैन से रह सकते है न तो अपने आप को शान्ति से रहना पड़े। एक ऐसे परिवार जिसमें 6 बच्चे और माता-पिता सहित 8 परिवार में परेशानी ही परेशानी है। बड़ा परिवार के सदस्य अर्थाथ बच्चों की सुख सुविधा के लिए अधिक परिश्रम करनी पड़ती है। बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करने नही पाते है। अशिक्षित परिवार जो शान्ति से जीवन व्यतीत नही कर पाते हैं। बच्चों की आवश्यकता के लिए माता-पिता मजदूरी से पेट भरने के लिए परिश्रम करते है परन्तु समाज में उनका कोई महत्व नही रहता इनको सहारागी नही मिलता व बीमारी तथा तंगी से परेशान रहते है इनकें बच्चे न तो ठीक से पढ़ लिख सकते है और चिथड़े में पड़े रहते हैं। उनके बच्चे आगे बढ़ने के लिए कुछ भी उन्निती कर नही पाते उनके बच्चे चोरी, चपाटी कर एवं मार पिट, गाली गलौच का सामना ग्लाज करना पड़ता है। उनका पिता इन सब बच्चों के कार्य को परेशानी को देखकर परेशान और तखलीव होकर सिर पकड़ कर बैठे सोच में डूबे रहते है। मन ही मन हम दो और हमारे दो होते वो यह सुखमय जीवन में हमारे नसीब होता बड़ा परिवार में दुखी एंव अशान्तिय परिवार होती है। अर्थाथ बड़ा परिवार दुखी परिवार एवं छोटा परिवार यह सही एवं सत्य है।

मां और एक गोरियान (चोटिया) पक्षी

दोनों की अत्यन्त दुख दर्द भरी कहानी इस प्रकार है कि एक छोटा सा सुखमय परिवार रहते थे उनके छोटे छोटे दों बच्चे थे उसमें एक लड़का और एक लड़की थी। उनके माता-पिता खेती किसानी का कार्य करते थे वह दोनो पति-पत्नि खुशी-खुशियाली एवं शांति से रहते थे एक दिन गरीब किसान की पत्नि घर के अंदर अपनी बच्चों को खाना खिला रही थी उसी समय उनके घर में में दरवाजे के सामने दो गोरियान पक्षी (चाटिया और चटियन) एक एक घास एवं तिनका से उनके रहने एवं बसने के लिए एक घोसला बनाये और अंत में दोनों पक्षी (पति पत्नि) सुख जीवन बिताते थे। गोरियान (चटियन) पक्षी ने गर्ववर्ती हुई और दो पक्षी गोरयान पक्षी ने दो पक्षी बच्चों को जन्म दिया उन दोनों पक्षी पति-पत्नि सुखमय जीवन बिताते थे। उन दोनों पक्षी को गरीब किसान की पत्नि और उसकी पति दोनों, रोज सुबह शाम पक्षी परिवार को देखकर बहुत ही आंनद से रहते थे। एक दिन अचानक किसी शिकारी ने गोरियान पक्षी (चोटियन) को मार दिया। तो चटिया ने अपनी पत्नि के वियोग में इधर-उधर रोते विलकते रो रही थी गरीब किसान की पत्नि अपने बच्चें को खाना खिला रही थी तभी किसान की पत्नि की नजर पक्षीयों पर पड़ा और रोते विलकते पक्षीयों को देख किसान की पत्नि सोचा की चटिया की चुटियन को किसी ने दुष्ट शिकारी ने मार दिया। इसके बाद उसने सोचा बच्चों के लिए दूसरी मां शादी की बच्चों के लिए वह दूसरी मां लाया तथा अपने लिए प्रमिका लाया। किसान की पहली वगवास पत्नि के दो बच्चे थे जो सौतेली मां रोज उन बच्चों के साथ गाली-गलौच मार पिट कर दोनों बच्चो को दुख देती थी। उन दो बच्चो सौतेली मां भर पेट खाना नही देती है। एक दिन दोनों बच्चो को खाने में जहर मिलाकर बड़े लाड़ प्यार से गोद में उठाकर खिलाने की कोशिश की परन्तु दोनों बच्चों ने अपने स्वर्गवास मां की याद में खाना नही खाये और इस प्रकार बिना मां बाप के बच्चे पूरे संसार में जीवन जीने के लिए अत्यन्त कठिनाई एवं दुख दर्द सहन करना पड़ता है।

प्रौढ़ शिक्षा अभियान

आज से 40-50 साल पहले प्रौढ़ शिक्षा अभियान लागू किया गया था। उस समय गांव-गांव में न स्कूल था इसलिए गांव के लोग साक्षर नहीं थे। अशिक्षित लोग पढ़ने वाले 30-40 साल के महिला एवं पुरुष और बुर्जग पढने के लिए पेड़ पौधों के नीचे बैंठकर पढ़ते थे, तथा रात में लालटेन के नीचे पढ़ा करते थे। भारत में अशिक्षित से शिक्षित बनने के साथ साथ भारत के उन्नती थोड़ा बहुत भी विकास हुआ इस प्रकार कहानी है। जो सही एवं सत्य है।

आंगनबाड़ी कार्यालय

घर में बच्चे मां से सबसे पहले मां शब्द कहने के लिए सीखते है। इसके साथ साथ बच्चों को एक बूंद जीदंगी के लिए अर्थात् पल्स पोलियो पिलाया जाता है। एक साल के बच्चे को केवल पांच बार पिलाया जाता है। चार साल बाद आंगनबाड़ी में जाकर अपनी गुरु माता से अ, आ, इ, ई पढ़ते है, और इसके बाद ही आगे उनकी पढ़ाई करने को जाते है। यही आंगनवाड़ी का कार्य है।

कामकाजी शिल्पियों के किस्सों का खजाना अकूत है। अब वापस दुनियादार में जुटने का समय, उनका और मेरा भी। अगली किश्त तक के लिए। कही-सुनी है, इसलिए शोध प्रयोजन के लिए उपयोगी नहीं। शोध हेतु प्राथमिक स्रोतों पर अर्थात सीधे इन शिल्पियों से सुनना चाहिए।

Sunday, December 26, 2021

‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ का परिचय

राजनांदगांव-रायगढ़ के साथ जिन विभूतियों का नाम जुड़ा है, उनमें डा. बलदेव प्रसाद मिश्र हैं। मिश्र जी के विपुल लेखन में एक खास ‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ है। पुस्तक का पहला संस्करण संभवतः 1955 में आया। छत्तीसगढ़ की अन्य विभूतियों और कृतियों की तरह, इस पुस्तक पर ढेरों बातें पढ़ने-जानने को मिलती रहीं थीं, लेकिन पुस्तक देखने का अवसर नहीं मिला था। यह पुस्तक चौथी बार हिन्द प्रकाशन (मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री रहे, गांधीवादी चित्रकांत जायसवाल जी के परिवार का जूनी लाइन, बिलासपुर स्थित छापाखाना) से 1960 में छपी, जिसकी प्रति देखने को मिली, तब इस कृति से मेरा वास्तविक परिचय हुआ। मिश्र जी की पूरी पुस्तक भी यही एक मैंने पढ़ी है। अन्यथा उन पर संस्मरण, जीवनी, टीका-टिप्पणी, जै-जैकार तो देखने को मिल जाता है, उनका लिखा मूलतः सहज उपलब्ध नहीं होता। 1928 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘जीव विज्ञान‘ के लिए पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी की प्रतिक्रिया थी- ‘पुस्तक के अवलोकन से मुझे अनेक तत्व रत्नों की प्राप्ति हो गई। ... आप धन्य हैं।‘ इसी प्रकार 1938-39 के उनके डी.लिट. शोध-प्रबंध ‘तुलसी दर्शन‘ के लिए परीक्षक पं. रामचंद्र शुक्ल ने इसे ‘महान अध्यवसाय और व्यापक अध्ययन का परिणाम‘ बताया था। पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने ‘तुलसी दर्शन‘ की प्रति पा कर लिखा कि ‘आपने मुझे संजीवनी का दान दे डाला।‘

पिछले दिनों चर्चाओं के दौरान यह अनुमान हुआ कि मिश्र जी को जानने वाले, इस पुस्तक के नाम से तो परिचित हैं, उनकी कृतियों की सूची में इसे शामिल करते हैं, लेकिन पुस्तक देखा-पढ़ा नहीं है, इसलिए आवश्यक माना कि इस पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ का संक्षिप्त परिचय देने का प्रयास करूं। यह भी ध्यान में आया कि राजनांदगांव की त्रिवेणी के बख्शी जी और मुक्तिबोध जी का लगभग संपूर्ण लेखन, रचनावली-समग्र के माध्यम से प्रकाशित हो चुका है, मिश्र जी का महत्व उनसे कम नहीं, इसके बावजूद उनका समग्र, हम उनके उत्तराधिकारी, अभी तक नहीं तैयार कर पाए हैं, उनका साहित्य राजनांदगांव की त्रिवेणी में अब भी सरस्वती की तरह लुप्त जैसा ही है, बहरहाल ...

‘छत्तीसगढ़ परिचय‘ के 128 पृष्ठों में कुल 25 शीर्षक हैं, जिनमें 24 लोक कथाएं हैं, तथा पचीसवां लेख परिचय (इतिहास) शीर्षक से है। ‘इतिहास‘ की ऐसी रोचक प्रस्तुति, जिसमें उत्तर छत्तीसगढ़ का रामगिरि तो दक्षिण छत्तीसगढ़ का दन्तेवाड़ा भी शामिल है, अनूठी है। अनूठी इस अर्थ में कि अक्सर छत्तीसगढ़ की बात करते हुए राज्य का उत्तरी हिस्सा, सरगुजा और दक्षिणी हिस्सा, बस्तर पूरी तरह छूट जाता है। अधिकतर मध्य मैदानी छत्तीसगढ़ को ही समग्र मान लिया जाता है। साथ ही स्थानीय मान्यताओं, दंतकथाओं के साथ इतिहास को प्रस्तुत करने की शैली रायबहादुर हीरालाल और लोचन प्रसाद पांडेय की थी उसी तरह वह यहां भी पूरे सम्मान सहित दर्ज है। साथ ही इसमें किसी सजग इतिहासकार की तरह तथ्यों और विश्वास-मान्यता को स्पष्ट रखा गया है इसलिए जहां आवश्यक हो, ‘बताया जाता है‘, ‘कहा जाता है‘, ‘इतिहास प्रसिद्ध है‘, ‘स्पष्ट संकेत‘, ‘रहा होगा‘, ‘जान पड़ता है‘ जैसा प्रयोग है।

पुस्तक के बारे में बताया जाता है कि यह स्कूल के पाठ्यक्रम में भी शामिल रही है। पाठ के रूप में ऐसी सामग्री हो तो विद्यार्थी-पाठक सहज ही आत्मीय रूप से अपने राज्य से जुड़ जाता है और संस्कारित होता है। मेरा मानना है कि यही छत्तीसगढ़ से परिचित होने का सही तरीका है। आगे सीधे परिचित होने के लिए पुस्तक के कुछ अंश-

दो शब्द

इस ‘परिचय‘ का उद्देश्य है छत्तीसगढ़ के विद्यार्थियों को अपने अतीत की उज्वलता के प्रति उत्साहित बनाना और अपने वर्तमान के प्रति व्यापक राष्ट्रीयतायुक्त देखना। इसकी कहानियां विविध जिलों के हिन्दी तथा अंग्रेजी ‘गजेटियरों और सुनी सुनाई किम्वदन्तियों के आधार पर पल्लवित की गई हैं। मनोरंजन के साथ ही उपर्युक्त उद्देश्य को ध्यान में रख कर ही ये लिखी गई हैं। इनके शीर्षक प्रायः स्थानपरक ही हैं और इन कहानियों में छत्तीसगढ़ जिलों का समावेश हो जाता है आशा है छत्तीसगढ़ के बाहर भी इन रचनाओं का स्वागत होगा। ।

-बलदेव प्रसाद मिश्र
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विषय सूची

१-सिंहनपुर (रायगढ़), २-सिहावा, ३-रतनपुर (१) ४-रामगिरि (सुरगुजा), ५-विमलामाता (डोंगरगढ़), ६-रतनपुर (२), ७-शिवरीनारायण, ८-राजिम, ९-दुर्ग, १०-बनबरद, ११-देव बलौदा, १२-पाटन, १३-दन्तेवाड़ा, १४-खलारी, १५-माली घोड़ी, १६-गुंडरदेही, १७-विंद्रा नवागढ़, १८-उपरौड़ा, १९-सोरर, २०-सक्ती, २१-शिवनाथ नदी, २२-अम्बागढ़ चौकी, २३-ओड़ार बांध, २४-भंडार, २५-परिचय (इतिहास)
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इसी विंध्याचल के समीप भारत का केन्द्र बनकर उसके मध्य में अपना ‘मध्यप्रदेश‘ बसा हुआ है। इसी का बहुत सा भाग पहिले दण्डकारण्य के नाम से विख्यात था जो रामायण में प्रसिद्ध है। इस अरण्य का पूर्वी भाग पुराण-प्रसिद्ध नर्मदा नदी से और पश्चिमी भाग चित्रोत्पला गंगा (महानदी) से प्रभावित है। इन दोनों नदियों के किनारे अनेक ऋषि मुनि रह चुके हैं। नर्मदा किनारे का भेड़ाघाट भृगु ऋषि का आश्रम कहा जाता है जिनके वंश में परशुरामजी हुए। कार्तवीर्य सहस्रार्जुन की लीला भूमि भी नर्मदा के किनारे ही मण्डला या माहिष्मती के आसपास बताई जाती है। लङ्का का राजा रावण भी इसी क्षेत्र के चक्कर लगाया करता था और उसने इस ओर अपने सैनिक आदि नियुक्त कर रखे थे यह भी इतिहास प्रसिद्ध है। नर्मदा और महानदी के आसपास की कई अनार्य जातियाँ अब तक अपने को रावणवंशी कहती हैं। महानदी के उद्गम के पास शृङ्गी ऋषि, अंगिरा ऋषि, मुचकुन्द आदि के आश्रम बताये जाते हैं। बस्तर के समीप अब भी धर्मशाला का स्थान बताया जाता है जहाँ, भगवान राम ने विश्राम किया था और जहाँ से सीता हरण हुआ था। बिलासपुर का शवरी नारायण स्थल इस बात का स्पष्ट संकेत करता है कि राम की शवरी से भेंट वहाँ कहीं हुई होगी। खरोद खरदूषण का स्थान है। लवन और महासमुन्द उस खारे सागर की याद दिलाते हैं जो भगवान राम के समय इधर रहा होगा। वन्य आदि निवासियों के गीतों में रावण की गाथा सुनकर और खरौद, लवन, शवरी नारायण सरीखे स्थान देखकर रायबहादुर हीरालाल सरीखे विद्वान तो यहाँ तक मान चुके हैं कि रावण भी नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक पहाड़ के आस-पास कहीं रही होगी।

दण्डकारण्य का यह इलाका दक्षिण कोसल कहाता था। कवि कालिदास ने, जो आज लगभग दो हजार साल पहिले हो चुके हैं, अयोध्या के राज को उत्तर कोसल लिखा है। ‘उत्तर कोसल‘ शब्द ही बताता है कि उस समय ‘दक्षिण कोसल‘ नाम भी जरूर चलता होगा। इसका ‘महाकोसल‘ नाम कब से और किसके कारण चल पड़ा इसका कोई पक्का पता नहीं। जान पड़ता है कि कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन के वंशज चेदि हैहयों ने जिनका कि इस ओर लगभग डेढ़ हजार वर्षों तक राज्य रहा, इसकी महत्ता बढ़ाने के लिये इसे महाकोसल कहना प्रारम्भ कर दिया हो-ठीक उसी तरह जैसे नदी का नाम महानदी हो गया, छोटे इलाके का नाम महासमुन्द हो गया, आराध्या देवी का नाम महामाया हो गया और राजाभों का नाम भी ‘महाशिवगुप्त‘ आदि हो गया। इस दक्षिण कोसल अथवा महाकोसल का विशेष भाग इस समय छत्तीसगढ़ कहाता है। वास्तव में छत्तीसगढ़ की बोली भी उत्तर कोसल की अवधी से विशेष मेल खाती है और यही नर्मदा तथा महानदी दोनों के उद्गम हैं। यहाँ का क्षेत्रफल भी बहुत बड़ा है और प्राचीन चिन्ह तथा सांस्कृतिक समन्वय के उदाहरण भी महत्वपूर्ण हैं। महाकोसल का शेष अंश है बुन्देल खन्ड तथा मालवा का कुछ कुछ भाग।
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विभिन्न संस्कृतियों का जैसा मजेदार संगम छत्तीसगढ़ में देखने को मिल सकता है वैसा भारत के अन्य स्थल में बहुत कम मिलता है।
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शरीरश्रम और स्वच्छता के विषय में तो उनके नियम अनुकरणीय हैं। सामाजिक नियमों के सम्बन्धों में उनकी सादगी कई दृष्टियों से सुग्राह्य है। उनका सामाजिक संगठन भी देखने और सीखने की वस्तु है। जिस प्रांत में साहित्य-वाचस्पति लोचन प्रसाद पांडेय और साहित्य वाचस्पति पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी के समान महानुभाच विद्यमान हों उसकी साक्षरता के विषय में अब कहना ही क्या है? यहाँ के नर रत्नों ने न केवल भारत में वरन् विदेशों में भी नाम किया है और नाम करते जा रहे हैं अतः हम सभी दृष्टियों से कह सकते हैं कि जिस प्रकार छत्तीसगढ़ का अतीत उज्ज्वल रहा है उसी प्रकार उसका भविष्य भी उज्ज्वल होकर रहेगा। अतीत के समान ही नहीं वरन् उससे बहुत बढ़कर।

प्रसंगवश स्मरण कि राजनांदगांव जिले के निर्माता के रूप में किशोरी लाल शुक्ल का नाम आता है। किंतु राजनांदगांव जिला निर्माण समिति के पदाधिकारियों की 1952 की सूची में खैरागढ़ की श्रीमती रानी पद्मावती देवी का नाम दूसरे क्रम पर और डा. बलदेव प्रसाद मिश्र का नाम सर्वोपरि है। एक अन्य तथ्य कि राजनांदगांव जिले की मांग किस तार्किक ढंग से की गई थी, (स्पष्ट अनुमान होता है कि मजमून भी मिश्र जी ने ही तैयार किया होगा।) कि बस्तर और कांकेर स्टेट को मिलाकर बस्तर जिला बनाया गया है, सरगुजा, कोरिया और चांगभखार को मिलाकर सरगुजा जिला तथा रायगढ़, सारंगढ़, सक्ती(?), उदयपुर और जशपुर को मिला कर रायगढ़ जिला बनाया गया है। इसी प्रकार नांदगांव, खैरागढ़, छुईखदान और कवर्धा (शिवनाथ स्टेट्स) को मिलाकर राजनांदगांव को जिला मुख्यालय घोषित किया जाना चाहिए।
गणेश शंकर शर्मा जी,
निवासी ‘हर्रा गोदाम‘ भरकापारा नांदगांव द्वारा
उपलब्ध कराई छायाप्रति

प्पुनः, संस्कृति का विद्यार्थी होने के कारण इस शब्द ‘संस्कृति‘, और इसके आशय को समझने का प्रयास करता रहा हूं। इसकी जितनी सुबोध और विस्तृत व्याख्या डा. बलदेव प्रसाद मिश्र ने ‘भारतीय संस्कृति को गोस्वामी तुलसीदास का योगदान‘ में की है, मेरी अब तक की समझ में सर्वोपरि है। उसके कुछ अंश इस प्रकार हैं- अपनी नैसर्गिक प्रवृत्तियों से प्रेरित मानवहृदय की स्वाभाविक अवस्था ही प्रकृति है। जब यह अवस्था आत्मिक ध्येय के अनुसार मानवी प्रयत्नों द्वारा परिमार्जित कर दी जाती है- मांज संवार दी जाती हैं- तब इसे ही संस्कृति कहते हैं। और जब सर्वांगीण प्रगति के विपरीत अवस्था उत्पन्न हो जाती है, चाहे वह निसर्ग निर्मित हो चाहे मनुष्य निर्मित, तब उसे ही विकृति कहते हैं। ... संस्कृति व्यक्तिगत अन्तर्वृत्ति का सामाजिक संस्करण है। ... 
मानव समाज की संस्कृति एक होते हुए भी उसके देशज, कालज और पात्रज भेद मान लिये जाया करते हैं। एक देश की संस्कृति के तत्व दूसरे देश के लिए असांस्कृतिक हो सकते हैं, एक काल की संस्कृति दूसरे काल के लिए विकृति भी बन सकती है, एक व्यक्ति की सांस्कृतिक कृति दूसरे के लिए अनधिकार चेष्टा भी कहा सकती है। ... 
मानवता और संस्कृति पर्यायवाची शब्द नहीं क्योंकि मानवता है मनुष्य का आदर्श और उस आदर्श की प्राप्ति का जो साधन है उसका नाम है संस्कृति। ... 
धर्म और संस्कृति भी पर्यायवाची शब्द नहीं। ... 
धर्म श्रद्धापरक होने के कारण रूढ़िवादी हो जाता है, संस्कृति विवेकपरक होने के कारण विकसित होती रहती, और अवस्था के अनुसार व्यवस्थाएं रचा करती है। ... 
धर्म उधार भी हो सकता है परंतु संस्कृति एकदम नकद माल है। ... 
संस्कृति विश्वमानव के कल्याण की वस्तु है अतएव उसमें राष्ट्रीयता की सी संकीर्णता हो नहीं सकती। ... विश्व संस्कृति मोटे रूप से छः वर्गों में विभक्त हुई जिनका नामकरण यों किया जा सकता हैः- 
(१) अनार्य (अफ्रीकी तथा दक्षिण द्वीपसमूही) संस्कृति (२) आर्य (भारतीय) संस्कृति (३) मंगोल (चीनी जापानी) संस्कृति (४) ईसाई (यूरो अमरीकी) संस्कृति (५) इस्लामी (अरबी फ़ारसी) संस्कृति (६) कम्यूनिस्ट (रूसी) संस्कृति। 
अनार्य संस्कृति, कदाचित निरक्षर होने के कारण, अप्रबुद्ध है। मंगोल संस्कृति विशेषतः अपनी ही सीमा में आबद्ध है और आर्य बौद्धों की संस्कृति से पर्याप्त प्रभावित है। काले और पीले लोगों की ये संस्कृतियां तो बची हुई भी हैं। लाल लोगों की तो संस्कृति ही नगण्य हो गई। रहे श्वेत लोग सो उन्हीं की संस्कृति के शेष चार रूप ऊपर बताये गये हैं। ये चारों रूप अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। और भारत में तो इन चारों का संपर्क, संघर्ष समन्वय सभी कुछ हुआ और होता जा रहा है। भारत स्थित इसी समन्वित संस्कृति का नाम है भारतीय संस्कृति।

कामना कि इतने विस्तृत फलक पर, विविध आयाम उद्घाटित करने वाली छत्तीसगढ़ की ऐसी महान विभूति का समग्र लेखन, संकलित-प्रकाशित हो कर शीघ्र सुलभ उपलब्ध हो।