Tuesday, September 6, 2022

बहुभाषी बस्तर

बस्तर की छत्तीस भाषाएं, यों अतिरंजित लग सकती हैं मगर डब्लू. वी. ग्रिग्सन ने सन 1938 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘द मारिया गोंड्स ऑफ बस्तर‘ में अपने सहयोगी चेतन सिंह के प्रति आभार व्यक्त किया है, ‘जो बस्तर की सभी ‘36‘ भाषाएं जानते थे।‘ 36 भाषाओं के दुगने यानि 72 का उल्लेख मिलता है सूचना तथा प्रकाशन संचालनालय, म.प्र. द्वारा प्रकाशित (1973?) एवं चन्द्रा प्रिंटर्स भोपाल द्वारा मुद्रित-12-73-5000, ‘आपका जिला बस्तर‘ पुस्तिका में- 'संपूर्ण जिले में 72 बोलियां बोली जाती हैं, जिनमें गोंड़ी, हल्बी, भतरी, दोरली, धुरवी, मारवी, मुरिया, छत्तीसगढ़ी, हिन्दी, तेलगू, उड़िया, बंगाली, मराठी आदि प्रमुख हैं।' (सरगुजा भी कुछ ही पीछे रहा है, 1998 में प्रकाशित गजेटियर के अनुसार इस जिले में कुल मिलाकर 61 भाषाएं तथा बोलियां बोली जाती थीं।) स्पष्ट है कि बस्तर बहुभाषी (और एकाधिक लिपि) अंचल है और ऐसा स्वाभाविक है, क्योंकि छत्तीसगढ़ का यह भाग, जो दंडकारण्य और महाकांतार, जाना जाता था, भौगोलिक दृष्टि से महाराष्ट्र, आंध्र-तेलंगाना और उड़ीसा से संलग्न है, यह अंचल राम वनगमन पथ, राजा नल, सम्राट समुद्रगुप्त के पौराणिक ऐतिहासिक, साहित्यिक संदर्भों से जुड़ता है। यहां दक्षिण, पूर्व-पश्चिम और उत्तर से शासक, राजनैतिक हस्तक्षेप के अलावा ब्राह्मण व अन्य जातियों के आगमन और बसने के ऐतिहासिक प्रमाण भी हैं।

एपिग्राफिया इंडिका, वाल्युम-9, 1907-08 के शक संवत 1033 गुंड महादेवी के नारायणपाल शिलालेख का परिचय देते हुए रायबहादुर हीरालाल की टिप्पणी रोचक और महत्वपूर्ण है- 'भारत में आर्य तथा द्रविड़ जन समूह के मध्य नर्मदा, जिस प्रकार पृथक सीमारेखा खीचती है, उसी प्रकार बस्तर में इन्द्रावती की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिए यह आश्चर्यजनक नहीं है कि इन्द्रावती नदी के उत्तरी भाग से प्राप्त समस्त अभिलेख देवनागरी लिपि में हैं तथा दक्षिणी भाग में इसी समय के अभिलेख तेलुगु लिपि में हैं। ऐसा स्पष्ट ज्ञात है कि यद्यपि नागवंशी राजा इन्द्रावती के उत्तर और दक्षिणी दोनों तरफ शासन करते थे, तथापि आर्य और द्रविड़ समुदाय कीे प्रजातीय मान्यताएं एवं कम से कम भाषायी सम्प्रेषण की दृष्टि से, स्वतः के प्रभाव को विज्ञापित करने के लिए उन्होंने इन्द्रावती नदी को ही विभाजक रेखा मान्य किया था। नारायणपाल का हमारा यह अभिलेख इन्द्रावती नदी के उत्तर तटीय क्षेत्र से प्राप्त हुआ है, इसी कारण संस्कृत में है।

इस संदर्भ में दंतेवाड़ा के प्रसिद्ध दंतेश्वरी मंदिर शिलालेख का उल्लेख आवश्यक और प्रासंगिक है। यहां दो शिलालेख दिकपालदेव के हैं, जिनकी तिथि संवत 1760 अर्थात सन 1703 है। इनमें से दोनों शिलालेखों की लिपि नागरी है, एक की भाषा संस्कृत और दूसरा ‘भाषा‘ (हिन्दी, इस लेख की भाषा, छत्तीसगढ़ी का पहला अभिलिखित प्रमाण के रूप में स्थापित है) में है। दूसरे पत्थर पर उत्कीर्ण लेख, वस्तुतः संस्कृत वाले पहले का ही संक्षेप आशय प्रकट करने वाला अनुवाद है। रोचक कि दूसरे शिलालेख के आरंभ में ही कहा गया है कि ‘देववाणी मह प्रशस्ति लिषाए पाथर है महाराजा दिकपालदेव के कलियुग मह संस्कृत के बचवैआ थोरहो हैं तै पांइ दूसर पाथर मह भाषा लिषे है।‘ पुनः अंत में कहा गया है कि- ‘ई अर्थ मैथिल भगवानमिश्र राजगुरु पंडित भाषा औ संस्कृत दोउ पाथर मह लिषाए। अस राजा श्री दिकपालदेव देव समान कलि युग न होहै आन राजा।‘ आशय स्वयं स्पष्ट है।

बस्तर पर शोध करने वाले पहले भारतीय छत्तीसगढ़ निवासी डॉ. इंद्रजीत सिंह का शोध-ग्रंथ 1944 में प्रकाशित हुआ। कलकत्ता, इलाहाबाद और लखनउ से पढ़ाई करने वाले डॉ. सिंह को हिंदी, बांग्ला, अंग्रेजी, छत्तीसगढ़ी, अंग्रेजी और लैटिन का अच्छा अभ्यास था। अपने शोध के दौरान उन्हें हल्बी का अच्छा अभ्यास हो गया था और बस्तर की अन्य लगभग सभी भाषाओं को मोटे तौर पर समझने लगे थे। उनकी पुस्तक ‘द गोंडवाना एंड द गोंड्स‘ के परिशिष्ट में लगभग 300 शब्दों की शब्दावली है, यह बस्तर संबंधी जिज्ञासा रखने वाले के लिए प्रारंभिक तैयारी के लिए जरूरी शब्द-संग्रह है।

सन 1998 में रामकथा के तीन ग्रंथों- हलबी रामकथा, माड़िया रामकथा और मुरिया रामकथा का प्रकाशन मध्यप्रदेश के जनसम्पर्क विभाग से हुआ। ग्रंथों के सम्पादक भाषाविज्ञानी प्रोफेसर हीरालाल शुक्ल हैं। भारी-भरकम इन ग्रंथों का आकार कल्याण के विशेषांक जैसा और पृष्ठ संख्या क्रमशः 688, 454 और 644 है।

एक अन्य उल्लेख- अपने जीवन काल में मिथक बन गए बस्तर के महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव ने छोटी सी पुस्तक लिखी थी ‘आइ प्रवीर द आदिवासी गॉड‘। अब एक अन्य ताजा उल्लेख, कांकेर रियासत के आदित्य प्रताप देव, जो दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफंस कॉलेज में इतिहास पढ़ाते हैं, उनकी इसी वर्ष 2022 में प्रकाशित पुस्तक ‘किंग्स, स्पिरिट एंड मेमोरी इन सेंट्रल इंडिया‘ ‘एनचांटिंग द स्टेट‘ का। यह पुस्तक उनके सुदीर्घ और गंभीर शोध का परिणाम है ही, कांकेर को बस्तर से अलग देखने और कुछ अर्थों में प्रवीरचंद्र भंजदेव के ‘आइ प्रवीर ...‘ से अलग ‘‘द किंग एज ‘आइ‘‘, जो इस पुस्तक का पहला अध्याय है, दृष्टिगत है। अपनी पुस्तक में वे वास्तविक अवधारणाओं को समझने में पारिभाषिक बना दिए गए शब्दों, रूढ़ मुहावरों के चलते समझ की भाषाई सीमा का उल्लेख करते हैं। कांकेर में बोली जाने वाली भाषा के संबंध में स्पष्ट करते हैं कि छत्तीसगढ़ी और हिंदी बोलते हैं, जिसमें कई शब्द हल्बा और गोड़ी के होते हैं। साथ ही विशिष्ट शब्दों का अर्थ स्पष्ट करने के लगभग डेढ़ सौ शब्दों की शब्दावली है।

बस्तर की जबान (भाषा-बोली) के लिए जितना मैं समझ सका हूं, बस्तर की संपर्क भाषा हल्बी है। (यहां उल्लेखनीय कि पुराने बस्तर जिले या वर्तमान बस्तर संभाग के कांकेर या केसकाल घाटी तक छत्तीसगढ़ी प्रचलित है।) हल्बी पर छत्तीसगढ़ी और मराठी का प्रभाव है, बल्कि कुछ स्वतंत्र और मौलिक प्रयोगों के साथ वह इन्हीं दो भाषाओं का मिश्रण है। इसी तरह अधिकतर उड़ीसा से जुड़े क्षेत्र में बोली जाने वाली भतरी पर उड़िया प्रभाव-मिश्रण है। दोरली को गोंडी का रूप माना जा सकता है, जिसमें सुकमा वाली दोरली पर उड़िया का और बीजापुर वाली पर मराठी का प्रभाव होने से दोनों में अंतर आ जाता है, मगर दोनों भाषा-भाषी को एक-दूसरे की बात समझने में कठिनाई नहीं होती। इसके अलावा गोंडी है। मगर ध्यान रहे कि माड़ (अबुझमाड़) की गोंडी अलग है, जबकि इससे भिन्न दंतेवाड़ा, बीजापुर, कोंटा की गोंड़ी आपस में मिलती जुलती है। माड़ की गोंड़ी और दक्षिण-पश्चिमी गोंडी में इतना फर्क हो जाता है कि इन्हें एक-दूसरे की जबान समझ पाना कठिन होता है।

प्रसंगवश, भाषा संपर्क और अभिव्यक्ति का माध्यम है तो औपचारिक दूरी बनाने का भी साधन है। पुराने नाटकों में राजा और पुरोहित जैसे पात्रों के संवाद संस्कृत में होते हैं, वहीं नारी पात्र, सेवक, ग्रामवासी और विदूषक आदि अपभ्रंश जैसी भाषा बोलते थे। रामायण का प्रसंग है- 'अहं ह्यतितनुश्चैव ... ... ... शक्या नान्यथेयमनिन्दिता।।' हनुमान सोचते हैं कि वानर हो कर भी मैं यहां मानवोचित, द्विज की भाँति संस्कृत का प्रयोग करूँगा तो सीता मुझे रावण समझकर भयभीत हो जाएंगी, ऐसी दशा में अवश्य ही मुझे उस सार्थक भाषा का प्रयोग करना चाहिये, जिसे अयोध्या के आस-पास की साधारण जनता बोलती है। कालिदास के कुमारसंभव का सातवां सर्ग शिव-पार्वती विवाह प्रसंग है, जिसमें कुछ इस प्रकार कहा गया है कि- सरस्वती ने वर की स्तुति संस्कृत में और वधू की स्तुति सुखग्राह्य (प्राकृत?) भाषा में की। ... शिव-पार्वती ने अलग-अलग भाषा की शैलियों से निबद्ध, अप्सराओं द्वारा खेला नाटक देखा। दो अन्य प्रसंग। पहला, जिसमें राजा भोज राह चलते ग्रामीण महिला से प्राकृत में सवाल करते हैं और वह शुद्ध संस्कृत में जवाब देती है। इसी तरह विद्यानिवास मिश्र ने काशी में विवाह के अवसर पर महामहोपाध्याय शिवकुमार शास्त्री और टहल नाई के प्रसंग का उल्लेख किया है, जिसमें शास्त्रीजी द्वारा शास्त्रीय विधि के अनुमोदन और नाई द्वारा लोकाचार स्मरण कराने पर, शास्त्रीजी द्वारा बार-बार एक ही बात दुहराते उसकी बात खारिज करने पर नाई ने ‘सर्वत्रैव षड् हलानि‘ कह कर, पंडितजी को विस्मय में डाल दिया।

सरकार में जनप्रतिनिधि, जनता के बीच जाकर उनकी भाषा का प्रयोग कर आत्मीयता का प्रयास करते हैं तो दूसरी ओर कामकाज या सरकारी सहयोगी-मातहतों के साथ अंग्रेजी-हिंदी। इसी प्रकार वरिष्ठ अधिकारी, कनिष्ठ अधिकारियों से अंगरेजी में बात करते हैं और सामान्यतः उनकी अपेक्षा होती है कि मातहत उनसे हिंदी में बात करे न कि (बढ़-चढ़ कर) अंगरेजी में, ऐसा तब भी, जब दोनों छत्तीसगढ़ी भाषी होते हैं। यही व्यवहार अधिकारियों और मातहत या जनता के बीच होता है। अधिकारी हिंदी बोलते हैं और सहायक, मजदूर या ग्रामवासी जनता छत्तीसगढ़ी, दोनों आमतौर पर अलग-अलग भाषा का प्रयोग करते, एक-दूसरे की बात अच्छी तरह समझते होते हैं। ऐसा परिवार में भी होता है। एक ही घर के विभिन्न सदस्यों के बीच, खासकर बुजुर्ग महिलाएं छत्तीसगढ़ी बोलती हैं और अन्य सदस्य उनसे हिंदी में बात करते हैं, जबकि दोनों को एक-दूसरे की बात आसानी से समझ में आती है। प्रसंगवश, गुलेरी जी ने ‘खड़ी बोली: म्लेच्छ भाषा‘ में बताया है कि ‘हिंदू कवियों का यह सम्प्रदाय रहा है कि हिंदू पात्रों से प्रादेशिक भाषा कहलवाते थे और मुसलमान पात्रों से खड़ी बोली।‘

यह भूमिका एक ही पत्र पर दो लिपि और दो भाषा में उत्कीर्ण, अपने किस्म के अनूठे उदाहरण के लिए, जो जगदलपुर से प्राप्त महाराजा राजपालदेव का ताम्रपत्र है। इसका प्रकाशन COPPER PLATE INSCRIPTION OF KAKATIYA RĀJAPĀLADEVA By Shri Balchandra Jain, M. A., Sahityashastri, M. G. M. Museum, Raipur. इस प्रकार शीर्षक से  The Orissa Historical Research Journal, Vol-X, No. 3 पेज 57-60 पर हुआ था, जिसे हीरालाल शुक्ल ने यथावत, 1986 में प्रकाशित History of Chhattisgarh (seminar papers) में Historical Source of Pre-Modern Bastar शीर्षक अंतर्गत शोधपत्र में शामिल किया। साथ ही श्री शुक्ल ने अपनी पुस्तक ‘आदिवासी बस्तर का बृहद् इतिहास‘ के चतुर्थ खंड में लगभग शब्दशः शामिल किया है, मूलतः श्री बालचन्द्र जैन द्वारा राष्ट्रबंधु साप्ताहिक के अंक 24.7.1969 में प्रकाशित कराया गया था, जो यहां प्रस्तुत है-

रायपुर के महंत पासीदास स्मारक संग्रहालय में बस्तर के राजवंश से संबंधित एक महत्वपूर्ण ताम्रपत्र है जो बस्तर के कलेक्टर से प्राप्त हुआ था। पत्र टूटकर दो टुकड़ों में विभाजित है। उसकी चौड़ाई लगभग ३१ से० मी०, ऊंचाई लगभग १८ से० मी० और वजन ३७५ ग्राम है। उससे ऊपरी दायें भाग पर अर्धचन्द्र और पंजे की आकृतियां हैं किन्तु बाँयें भाग के प्रतीक खण्डित हो गये हैं। ताम्रपत्र के निचले भाग में बीचों-बीच दुहरी रेखाओं से बने वर्ग में नागरी अक्षरों में सही शब्द उत्कीर्ण है। उपरले भाग के मध्य में राजमुद्रा है। यद्यपि राजमुद्रा का अधिकांश खंडित है किंतु वंश के अन्य राजा भैरमदेव की मुद्रा के आधार पर प्रस्तुत ताम्रपत्र की मुद्रा का लेख पूरा करके इस प्रकार पढ़ा जा सकता है:-

उपर्युक्त मुद्रालेख से विदित होता है कि महाराज राजपालदेव प्रौढ़प्रतापचक्रवर्ती की उपाधि धारण करते थे और माणिक्येश्वरी देवी के भक्त थे। माणिक्येश्वरी दुर्गा का ही एक रूप है। उसके वाहन सिंह की आकृति भी मुद्रा के मध्य में उत्कीर्ण है। ऐसा अनुमान किया है कि दन्तेवाड़ा की सुप्रसिद्ध दन्तेश्वरी देवी को माणिक्येश्वरी मी कहा जाता था। ताम्रपत्र पर छह पंक्तियों का एक लेख उड़िया और नागरी अक्षरों में उत्कीर्ण है। वह इस प्रकार है:- (उड़िया अक्षरों में) ।। श्री जगन्नाथ श्री बलभद्र श्री सुभद्रा सहित एहि किति निमित को साक्षी ।। श्री रक्षपालदेव राजा चालकी वंश राज्यपरियन्त पपलाडण्डि बह्मपुरा घर तीनि शए जीवन दण्ड नाही मरण मुसाली नाही शरण मार नाही ए बोलन्ते न पाल ई ताहार सुअर मा अ गधा बाप ए बोलन्कथ चन्द्र सूर्य वंश जग लोकपाल धर्मराज साक्षी वारि घरे मेलिया बांचे (नागरी अक्षरों में) जब लै श्री चालकी वंश राजा तब लै ब्रम्हपुरा क्षाडनो नाहि ए बोल छाडि कै पपलावडि आ जाइ तो सुअर माइ बाप गादह अष्टलोकपाल धर्मराज साक्षि (उड़िया अक्षरों में) वसाल सूर्य र वान कूप धौ मच्छ ते जहींकार एहि रेखा। सही

लेख से विदित होता है कि राजा रक्षपाल देव (राजपालदेव) ने पपलाडंडी के तीन सौ (ब्राह्मण) परिवारों को कुछ विशेषाधिकार देकर अपने नगर में बसाया था। राजा ने जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की साक्षीपूर्वक वचन दिया था कि जब तक चालकी वंश का राज्य रहेगा तब तक पपलाडंडी से आकर ब्रम्हपुरा में बसे तीन सौ परिवारों को जीवनदण्ड नहीं दिया जायगा, यदि उनमें से किसी की निपूते मृत्यु हो जायगी तो भी राज्य उनकी सम्पत्ति नहीं लेगा तथा शरण में लोगों आये लोगों को शारीरिक दण्ड नहीं दिया जायगा। बस्तर में आकर बसे उपर्युक्त ब्राम्हनों ने भी उसी प्रकार अष्ट दिक्पाल और धर्मराज की साक्षीपूर्वक वचन दिया था कि जब तक बस्तर में चालकी वंश राज्य करेगा तबतक हम लोग ब्रम्हपुरा नहीं छोड़ेगे। दोनों ही पक्षों ने इस शाप वचन को भी स्वीकार किया था कि प्रतिज्ञा का पालन न करने वाले व्यक्ति की माता शूकरी और पिता गधा होगा।

ध्यान देने की बात है कि प्रस्तुत ताम्रपत्रलेख दो भाषाओं और दो लिपियों में है। हिन्दी भाषी राजा की प्रतिज्ञा उड़िया भाषा में और उड़िया भाषी ब्राम्हणों की प्रतिज्ञा हिन्दी भाषा में लिखी गई है ताकि प्रत्येक पक्ष समझौते की शर्तें पढ़ और समझ सके। ताम्रपत्रलेख में कोई तिथि नहीं दी गई है किन्तु उसमें चालुकी वंश के राजा रक्षपालदेव का उल्लेख है यह राक्षपाल काकतीय वंश के राजपालदेव दिक्पालदेव के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। दिक्पालदेव का उल्लेख दन्तेवाड़ा के वि० सं० १७६० (ईस्वी १७०३) के शिलालेख में मिलता है जिसमें उनकी दन्तेवाडा यात्रा का विवरण है। उस यात्रा के समय राजपालदेव युवराज थे और अपने पिता के साथ वे भी दन्तेश्वरी देवी के दर्शन करने गये थे। इस आधार यह अनुमान करना कठिन नहीं है कि राजपालदेव वि० सं० १७६० के पश्चात ही कभी बस्तर के राज सिंहासन पर अभिषिक्त हुये होंगे। तदनुसार प्रस्तुत ताम्रपत्र शासन की तिथि भी वि० स. १७६० के पश्चात की ही विचारी जा सकता है।

बस्तर का राजवंश काकतीय नाम से प्रसिद्ध है किन्तु प्रस्तुत ताम्रपत्रलेख में राजा राजपालदेव अपना वंश चालकी (चालुक्य) बताते हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है।

इस पर मेरी संक्षिप्त टिप्पणी कि चालकी, बस्तर के स्थानीय प्रशासनिक ढांचे मे एक पद भी होता है तथा लेख में आया शब्द ‘मेलिया‘ अन्यत्र मेरिया आता है, जिसका अर्थ नरबलि होता है।

Saturday, September 3, 2022

दानीपारा शिलालेख-1969

पिछली पोस्ट, दानीपारा शिलालेख-2006 की पाद टिप्पणी 6 में विष्णुसिंह ठाकुर की पुस्तक ‘राजिम‘ में आए उल्लेख के आधार पर इस शिलालेख के राष्ट्रबंधु साप्ताहिक के दीपावली विशेषांक में संक्षिप्त प्रकाशन का लेख किया गया है। इस संदर्भ को स्पष्ट करने के लिए राष्ट्रबंधु पत्र के संपादक श्री हरि ठाकुर के पुत्र श्री आशीष सिंह के सत्प्रयासों से उपलब्ध कराई गई सामग्री को उनकी सहमति उपरांत यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।

उल्लेखनीय कि राष्ट्रबंधु साप्ताहिक में इस शिलालेख की प्राप्ति पहले समाचार के रूप में प्रकाशित हुई थी और उसके पश्चात लेख के रूप में। राष्ट्रबंधु में प्रकाशित लेख में शिलालेख के चर्चा या प्रकाश में आने की पृष्ठभूमि की भी जानकारी मिलती है। प्रथम दृष्टया लिपि के आधार पर शिलालेख का काल बारहवीं शताब्दी अनुमान किया गया था, किंतु संपादन करते हुए तिथि, पंद्रहवीं शती निर्धारित की गई। यहां प्रस्तुत करते हुए जानकारी अद्यतन करना समीचीन होगा कि लेख में आए नाम श्री कृष्ण कुमार जी दानी, के तीन पुत्र (स्व.) अनिरुद्ध दानी, विजय दानी, अजय दानी (अजय माला प्रकाशन वाले) हुए। अपनी सीमा में मेरे द्वारा शिलालेख की वर्तमान स्थिति जानने और फोटो लेने के प्रयास में पता लगा कि वर्तमान में दानीपारा वाले उक्त मकान में परिवार के सदस्य निवास नहीं कर रहे है। इस भूमिका के साथ, राष्ट्रबंधु में प्रकाशित दोनों अंश-

राष्ट्रबंधु साप्ताहिक, रायपुर के दिनांक 17-4-69 में ‘बारहवीं शताब्दी का महत्वपूर्ण शिलालेख प्राप्त‘ - ‘रायपुर नगर की प्राचीनता पर नया प्रकाश‘ शीर्षक से प्रकाशित समाचार-

रायपुर के दानीपारा में इसी सप्ताह एक ऐसे महत्वपूर्ण शिलालेख को जानकारी मिली है जिसे लिपि के आधार पर बारहवीं शताब्दी का माना जा रहा है। पुरातत्व के प्रकांड विद्वान श्री बालचन्द्र जैन को ज्यों ही इस शिला लेख की सूचना मिली, वे स्थल पर पहुंच गये किन्तु उनके पास उस शिला लेख की छाप लेने की सामग्री नहीं थी। उन्होंने स्थानीय म्युजियम के अधिकारी से इस संबंध में सामग्री मांगी किन्तु उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। इस दन्तनिपोरी के पश्चात श्री जैन ने किसी प्रकार शिलालेख का छाप ले ली है और जहां तक वे उसे पढ़ पाने में सफल हुए हैं उससे ज्ञांत होता है कि यह शिलालेख बारहवीं शताब्दी का है। इस शिलालेख में रायपुर, राजिम तथा आरंग में विभिन्न निर्माण कार्याे का उल्लेख है। इस शिलालेख की एक विशेषता यह भी है कि इसमें गोठाली नामक स्थान का भी उल्लेख है। इस स्थान का उल्लेख रतनपुर के शिलालेख में भी मिलता है। शिला लेख में सेनापति तथा प्रमुख वंशों के पुरुषों के नाम भी आये हैं।

शिलालेख के नीचे का भाग टूट गया है और अप्राप्य है। किन्तु जितना भी हिस्सा उपलब्ध है उससे यह स्पष्ट है कि रायपुर नगर चौदहवीं शताब्दी से पूर्व बस गया था। इस सम्बन्ध में जब तक प्राप्त सूचनाओं के आधार पर रायपुर में प्राप्त यह प्राचीनतम शिलालेख कहा जा सकता यदि हरिठाकुर को प्राप्त शिलालेख को छोड़ दिया जाये।

राष्ट्रबंधु साप्ताहिक, रायपुर के दीपावली विशेषांक, दिनांक 6-11.69 में श्री बालचन्द जैन लिखित लेख-

पन्द्रहवीं शताब्दी
रायपुर में प्राप्त
एक अप्रकाशित शिलालेख 
लेखक- श्री बालचन्द्र जैन

प्रस्तुत शिलालेख श्री कृष्ण कुमार जी दानी के दानीपारा (रायपुर) स्थित घर में रखा हुआ है। पहले यह उनके पुराने मकान की एक मोटी दीवाल में जड़ा हुआ था। पर जब उस मकान का पुनर्निर्माण कराया गया तो शिलालेख को वहां से हटाकर मकान के आंगन में लाकर रख दिया गया और तब से वह वही रखा हुआ है। लेखयुक्त प्रस्तर खंड की चौड़ाई 55 से.मी. और ऊंचाई 45 से.मी. है।

लेख में चौदह पंक्तियां हैं जो 40 से.मी. चौड़े और 29 से.मी. ऊंचे स्थान में उत्कीर्ण है। लेख की ऊपरली दो पंक्तियों के प्रारंभ का आधा भाग क्षत हो जाने के कारण वह भाग पढ़ा नहीं जा सकता। उसी प्रकार सबसे नीचे की पंक्ति के लगभग सभी अक्षरों का निचला भाग क्षतिग्रस्त है। बाकी पूरा लेख अच्छी हालत में है। अक्षर साफ, सुडौल हैं।

लेख की लिपि नागरी है। उसमें तिथि तो नहीं पड़ी है पर अक्षरों की बनावट के आधार पर उसे पंद्रहवीं शती ईसवी का अनुमान किया जा सकता है। शिलालेख की भाषा संस्कृत है प्रारंभ में ‘‘श्री गणेशाय नमः‘‘ और अंत में ‘‘मंगल‘‘ को छोड़कर बाकी पूरी रचना छन्दोबद्ध है। कुल श्लोक दस हैं और उन पर क्रमांक पड़े हुए हैं। तीसरे श्लोक के अंत में भूल से क्रमांक 2 पड़ गया है किंतु आगे के श्लोकों में वह भूल सुधार ली गई है। पहले और तीसरे से लेकर आठवें श्लोकों की रचना अनुष्टुप छंद में की गई है। बाकी तीन श्लोक अर्थात 2, 9 और 10 शार्दूलविक्रीड़ित छंद में हैं। ध्यान देने की बात है कि तीसरा श्लोक में छह चरण है। ऐसे उदाहरण पौराणिक काव्यों में पाए जाते हैं। रायपुर में ही प्राप्त हुए एक दूसरे शिलालेख कलचुरी वंश के राजा ब्रह्मदेव के राज्य काल में विक्रम संवत 1458 में लिखा था। प्रस्तुत लेख में ब के स्थान पर सर्वत्र व अक्षर लिखा गया है। पंक्ति 6 में चंद्रशेखर के ख के स्थान पर रट्ट और उसी प्रकार पंक्ति चार में द्वि के स्थान पर द्धि उत्कीर्ण है। श्लोकों के द्वितीय चरणों के अंत में भी दो दण्डों का प्रयोग किया गया है जबकि एक दंड का ही प्रयोग होना चाहिए था। श्लोकों के अंत में आने वाले म् को भी अनावश्यक रूप से अनुस्वार में परिवर्तित किया गया है।

इस प्रशस्ति में पीलाराय नामक व्यक्ति के चार पुत्रों द्वारा विभिन्न स्थानों पर कराए गए पुण्य कार्यों का विवरण दिया गया है। प्रशस्ति के प्रारंभ में गणेश जी को नमस्कार किया गया है। उसके बाद प्रथम श्लोक में किसी देवी की वंदना है। लेख का अंश खंडित हो जाने के कारण देवी का नाम नहीं मिलता पर संभवतः वह सरस्वती है। दूसरे श्लोक में शिवदास का उल्लेख मिलता है। उनके दो पुत्र थे, एक पीलाराय और दूसरा प्राणनाथ। तीसरे श्लोक में पीलाराय के चार पुत्रों के नाम गिनाए गए हैं और बताया गया है कि वे सभी धर्म तत्पर तथा गो-ब्राह्मणों के सेवक थे। पीलाराय के ज्येष्ठ पुत्र दरियाव के गोठाली नाम का एक रमणीक सरोवर खुदवाया था, चंद्रशेखर (शिव) के मंदिर का निर्माण कराया था और अत्यंत मनोहर बगीचा लगवाया था। ये सभी कार्य रायपुर में कराए गए थे जैसा कि पांचवें श्लोक से जान पड़ता है क्योंकि उस श्लोक में बतलाया गया है कि उस ज्ञानी और परमार्थी दरियाव ने ही रायपुर में राम भक्त मारुति (हनुमान) के मंदिर का भी निर्माण कराया था। छठे श्लोक में कहा गया है कि दरियाव से छोटे तेजीराज ने रायपुर में ही पाटी नाम का एक सुंदर स्वच्छ सुविख्यात और भव्य सरोवर खुदवाया था। तीसरे भाई महाराज (शुद्ध नाम महाराज) ने अपने पुण्य कार्यों को राजिम और आरंग में केंद्रित किया। सातवें और आठवें श्लोक से विदित होता है कि उसने राजीवनयन नामक स्थान में एक जगन्नाथ जी का मंदिर और एक खूब मजबूत शिव मंदिर का निर्माण कराया तथा उसी प्रकार का आरिंग ग्राम में प्रफुल्ल कमलों से सुशोभित सरोवर और महामाया का मंदिर बनवाया।

प्रशस्ति के नौवें श्लोक में कनिष्ठ भ्राता मधुसूदन के गुणों की प्रशंसा की गई है। उसके द्वारा कराए गए निर्माण कार्यों का उल्लेख संभवतः दसवें श्लोक में कहा हो पर शिलालेख ही अंतिम पंक्ति अपाठ्य होने के कारण वह ज्ञात नहीं हो सका है। इस प्रशस्ति की रचना महेश्वर नामक पंडित ने की थी। उसने सभी प्रकार की विद्याएं प्राप्त कर ली थीं। दसवें श्लोक में रायपुर नगर की प्रशंसा की गई है। प्रशस्ति का पूरा पाठ नीचे दिया जा रहा है। इसे मैंने रायपुर के सुप्रसिद्ध फोटोग्राफर श्री दिलीप विरदी द्वारा उतारे गए फोटोग्राफ से पढ़ा है।

(प्रशस्ति का पाठ चित्र में देख सकते हैं, पृथक से नहीं दिया जा रहा है।)

बालचन्द्र जैन जी का अंगरेजी में प्रकाशित शोध-लेख


Thursday, September 1, 2022

दानीपारा शिलालेख-2006

छत्तीसगढ़ के प्रमुख नगर रायपुर की पहचान व्यापारिक, प्रशासनिक केंद्र के रूप में रही है। छत्तीसगढ़ राज्य की राजधानी बनकर इसके नगर रूप में निरंतर तेजी से विकास हो रहा है। इसके समानांतर नगर के धरोहर की चर्चा होने पर संकोच सा होता है। नगर में ऐसे भवन, स्मारक, स्थल कम रहे हैं, जो रहे हैं उनका स्वरूप बदल गया या अस्तित्व ही नहीं रहा। शहर और आबादी का दबाव होता ही है, दैनंदिन जीवन की आपाधापी के बीच कई बार हमारे धरोहर उपेक्षित, नजरअंदाज रह जाते हैं। यों रायपुर अपने में सुखी-सा शहर है, मगर जब कोई मेहमान आता है और शहर में देखने लायक क्या है, कुछ दिखाने की बात आती है तो हमारा ध्यान इस ओर जाता है कि उसे शहर में क्या दिखाएं, कहां ले जाएं और आमतौर पर बात मॉल से शुरू और मॉल पर ही पूरी हो जाती है, जिससे कोई भी शहरी आगंतुक अपने शहर में देखा-उबा होता है।

इन्टैक, रायपुर की योजना, जिसमें पुरानी बस्ती के स्थल, स्मारक-स्थलों का भ्रमण ‘हेरिटेज वाक‘ होता था, स्मार्ट सिटी परियोजना में नगर के इन धरोहर को साजने-संवारने का प्रयास किया गया, किंतु संभवतः वित्तीय लक्ष्य और भौतिक लक्ष्य तो प्राप्त कर लिया गया, वास्तविक उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो पाई। प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि देश के सबसे पुराने संग्रहालयों में से एक, रायपुर के महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में विशिष्ट पुरावशेष, विशेषकर अभिलेख, सिक्के तथा कांस्य प्रतिमाओं का संग्रह है, जिसका प्रदर्शन आकर्षण का विषय हो सकता है। इस क्रम में पुरानी बस्ती, दानीपारा के शिलालेख की चर्चा प्रसंगानुकूल होगी। निजी भवन में होने के कारण सामान्य रूप से इसका देखा-दिखाया जाना संभव नहीं होता और जिस पर निगाहें न हों, उसका ध्यान से उतरना कितना स्वाभाविक होता है, out of sight, out of mind का यह उदाहरण है।

इस शिलालेख का महत्व इसलिए भी है कि छत्तीसगढ़ में कलचुरि शासक रत्नदेव तृतीय और प्रतापमल्ल के बाद वाहरसाय, ब्रह्मदेव और अमरसिंहदेव के अभिलेख मिलते हैं। इस काल के सीमित अभिलेख होने के कारण साथ ही इस मायने में कि किसी राजसत्ता, राजपुरुष का नहीं है, यह विशिष्ट हो जाता है।

इस क्षेत्र में रुचि लेने वाले कुछेक की ही जानकारी में यह है, इसका अध्ययन और इतिहास के इस महत्वपूर्ण पक्ष पर ध्यान भी इक्का-दुक्का ने ही दिया है, इनमें डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम, तत्कालीन आचार्य एवं अध्यक्ष, प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व अध्ययन शाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्व विद्यालय, रायपुर हैं, जिन्होंने तत्कालीन सहयेगी अतिथि आचार्य, डॉ. चन्द्रशेखर गुप्त तथा शोध छात्र तकनीकी सहायक, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, छत्तीसगढ़ शासन, रायपुर प्रभात कुमार सिंह के साथ इस शिलालेख पर शोधपत्र तैयार किया था। यह शोध पत्र श्री कावेरी शोध संस्थान, उज्जैन की शोध-पत्रिका, वाल्यूम 15, 1-2 (अप्रैल-जुलाई, 2006-जुलाई-सितंबर, 2006) में पृष्ठ-16 से 21 पर प्रकाशित हुआ था। हमारी धरोहर का गौरवशाली यह पक्ष सर्वसुलभ और सहज उपलब्ध रहे, अतएव इसे यहां प्रस्तुत किया जा रहा है।

दानीपारा, रायपुर (छत्तीसगढ़) शिलालेख पर नया प्रकाश

रायपुर (छत्तीसगढ़ की राजधानी का नगर) ईस्वी पन्द्रहवीं शताब्दी में कलचुरियों की एक शाखा की राजधानी के रूप में अस्तित्व में आया। रतनपुर के कलचुरियों में प्रतापमल्ल अंतिम प्रतापी नरेश था, जिसके निर्बल आठ-दस उत्तराधिकारियों ने मराठों के हाथों पराजित होने व पहले सत्ता संभाले रखी। प्रतापमल्ल की कुछ पीढ़ियों पश्चात् लक्ष्मीदेव और उसका पुत्र सिंहण राजा हुए। सिंहण के दो पुत्र थे- डंघीर तथा रामचन्द्र। रामचन्द्र ने रायपुर बसा कर अपनी राजधानी स्थापित की।1 इसके पूर्व राजधानी खल्वाटिका (आधुनिक खलारी, जिला महासमुन्द)2 में थी जहाँ से प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि रामचन्द्र ने फणि (नाग) वंशी भोणिंगदेव को जीता था। उसके पुत्र ब्रह्मदेव के काल के (विक्रम संवत 1458) ई. स. 1402 तथा 1470 (ई. स. 1415) दो शिलालेख रायपुर तथा खलारी से प्राप्त हुए हैं जिनसे इन स्थानों में क्रमशः नायक हाजिराज द्वारा हाटकेश्वर3 तथा मोची देवपाल द्वारा नारायण4 मंदिरों के निर्माण का उल्लेख है। ये दोनों अभिलेख सम्प्रति महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय में स्थानांतरित कर दिये गये हैं।

रायपुर के दानीपारा नामक मोहल्ले के प्रतिष्ठित दानी परिवार के घर में एक शिलालेख मुनि कांतिसागर ने देखा था, किंतु मात्र उल्लेख के5 उन्होंने और कोई जानकारी नहीं दी। मध्यप्रदेश पुरातत्त्व तथा संग्रहालय विभाग के सेवानिवृत्त उपसंचालक, श्री बालचन्द्र जैन ने इस शिलालेख का सर्वप्रथम वाचन कर इसके महत्त्व पर प्रकाश डाला और छायाचित्र सहित इसका प्रकाशन किया था।6 पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय की प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व अध्ययनशाला द्वारा राजिम विषयक अध्ययन के दौरान इस अभिलेख का महत्त्व उद्घाटित हुआ कि इस अभिलेख में श्री पीलाराय के पुत्रों द्वारा रायपुर, आरंग (आरंग नाम से उल्लिखित)7 तथा राजिम (राजिव-नयन नाम से चर्चित जो राजिवलोचन का पर्यायवाची है) में बनवाये गये तालाब तथा मंदिरों की चर्चा है। अतः इस लेख का पुनरअध्ययन किया गया। इस उद्देश्य से शोध छात्र श्री प्रभात कुमार सिंह ने श्री दानी के घर जाकर लेख की एक छाप ली। दुर्भाग्यवश लेख दीवार में जड़े जाने के कारण और सीमेंट की छपाई के कारण कुछ स्थानों पर दुर्वाच्य हो गया है और अंतिम पंक्ति अब पूर्णतः छिप गयी है। फिर भी कुछ भाग का वाचन कर लेख का पुनर्सम्पादन किया जा रहा है जिसके दो कारण हैं। पहला श्री जैन का लेख अंग्रेजी में होने के कारण सभी को ज्ञात नहीं है और इसका समुचित उपयोग नहीं हुआ है, अतः हिन्दी में प्रकाशन की आवश्यकता थी। दूसरे इस लेख में वर्णित स्थलों तथा निर्माणों की यद्यपि श्री जैन ने चर्चा की है, तथापि वह अत्यंत संक्षिप्त थी। 

यह अभिलेख 45 सेमी.X35 सेमी.8 नाप की एक आयताकार शिला पर उत्कीर्ण है। पहली दो तथा अंतिम पंक्तियों के कई अक्षर अस्पष्ट और अवाच्य है। यह लेख चौदह पंक्तियों में ईस्वी पन्द्रहवीं शताब्दी की नागरी लिपि में उत्कीर्ण है। लेखक कोई दक्ष या कुशल लिपिक नहीं जान पड़ता। उसने ‘ब‘ स्थान पर हर बार ‘व‘ का प्रयोग किया है (उदाहरणतः ब्रह्म, व भूव, ब्राह्मण आदि); एक जगह ‘आ‘ (ा) की मात्रा छूट गयी है (महरज- पं. 9)। लेख का रचनाकार महेश्वर अवश्य अच्छी कोटि का साहित्यिक था। उसकी भाषा दोषमुक्त और प्रभावी है। प्रारम्भिक मंगलाचरण को छोड़ शेष माग पद्यबद्ध है। यह कुल दस श्लोकों में (क्रं. 1 तथा 3 से 8 अनुष्टुप छंद में तथा क्रमांक 2, 9 और 10 शार्दूलविक्रीडित छंद में) निबद्ध हैं। श्लोक क्रमांक 3 के स्थान. पर 2 लिखा गया है जो लेखक की भूल प्रतीत होती है। इस श्लोक के छह पाद हैं, जो खंड या महाकाव्य में प्रयुक्त किये जाते हैं। यहाँ यह तथ्य उल्लेखनीय है कि ब्रह्मदेव के काल के रायपुर शिलालेख में भी एक श्लोक (क्र. 13) इसी भाँति छह पादों से युक्त है।9

लेख में प्रस्तुत अभिलेख को प्रशस्ति कहा गया है (पं. 12, श्लोक क्र. 9-प्रशस्ति भरिवले), जो विषयवस्तु को देखते हुए सही जान पड़ती है। लेख गणेश तथा सरस्वती के नमन से प्रारम्भ होता है।10 आगे शिवदास का तथा उसके दो पुत्रों पीलाराय तथा श्री प्राणनाथ का उल्लेख हुआ है। पीलाराय के चार पुत्र थे - दरियाव, तेजिराज, महाराज और मधुसूदन। बड़े पुत्र दरियाव ने ‘गोठाली‘ नामक तालाब, ‘चन्द्रशेखर‘ नामक शिव मंदिर तथा सुंदर उद्यान (आराम) बनवाये थे। उसी ने रायपुर में रामभक्त मारुती का मंदिर मी बनवाया था। पीलाराय के दूसरे पुत्र तेजिराम ने ‘पाटी‘ नामक सुविख्यात और स्वच्छ जलयुक्त एक सुंदर सरोवर बनवाया था (श्लोक क्र. 6 पाटी नाम्ना सुविख्यातं स्वच्छं चारु सरोवरम्)। महाराज नामक तीसरे पुत्र ने राजीवनयन में जगन्नाथ तथा शंभु का मंदिर सुदृढ़ किया था मंदिर सुदृढ बनवाया11 तथा आरंग (आरिंग) में कमल पुष्पों से युक्त सरोवर और महामाया मंदिर का निर्माण कराया।12 अंतिम पुत्र मधुसुदन ने कुछ निर्माण करवाया था, जो स्पष्ट नहीं है। सम्भवतः इसके द्वारा राजिम में ही रामभक्त यात्रियों के विश्राम हेतु कुछ धर्मशाला जैसा निर्माण किया गया था। यह प्रशस्ति महेश्वर नामक कवि की रचना थी। मधुसूदन को देव तथा ब्राह्मणों का सेवक कहा गया है। 

यह प्रशस्ति किसी काल-गणना का उल्लेख नहीं करती किन्तु पुराभिलेख की लिपि ईस्वी पन्द्रहवीं शताब्दी की होने के कारण तथा रायपुर के इसी काल में विशाल नगर के रूप में विकसित किये जाने के आधार पर माना जा सकता है कि शिवदास और उसके वंशजों ने यहाँ और समीपवर्ती आरंग और राजिम में निर्माण कार्य करवाए होंगे। प्रतीत होता है यह वंश वर्तमान हामी परिवार से सम्बद्ध था और ये उन्हीं के वंशज हैं। इस अनुमान का आधार मुख्यतः यह है कि यह न केवल परम्परा से पुष्ट ही है, वरन शिलालेख पीढ़ियों से उनके पुश्तैनी घर में ही पाया गया है।13 दानीपारा पुरानी बस्ती है और ‘दानी‘ शासकीय रसद पूर्ति करने वाले व्यापारी समाज की उपाधि थी।

लेख में उल्लिखित ‘गोठली‘ तथा ‘पाटी‘ नामक तालाबों की पहचान तो निश्चित रूप में अब संभव नहीं है। हाँ, कुछ अनुमान लगाये जा सकते हैं कि ‘गोठली‘ तथा ‘पाटी‘ यह क्रमशः वर्तमान कंकाली तथा बूढ़ा तालाब हो सकते हैं। ‘बूढ़ा‘ शब्द प्राचीनता का प्रतीक है।14 और जब तक कोई निश्चित अभिलेख नहीं मिल जाता, यह समीकरण स्वीकार किया जा सकता है। रायपुर में 120 तालाबों की उपस्थिति बतायी जाती हैं। बस्ती बसाने के क्रम में अधिकांश तालाब पटते गये और अब बहुत कम बचे हैं। इसमें मुख्य हैं - कंकाली तालाब, तेलीबांधा तालाब, खो-खो तालाब बंधवा तालाब, महराजबंद तालाब, नैया तालाब तथा बूढ़ा तालाब। इन्हीं में ‘पाटी सरोवर‘ तेजीराज द्वारा बनवाया गया होगा।

दरियाव द्वारा निर्मित हनुमान (मारुती) मंदिर का भी अभिज्ञान नहीं है। रायपुर के महामाया मंदिर में हनुमान की एक मूर्ति15 है, जो इसी काल की प्रतीत होती है। कंकाली तालाब के मध्य एक शिव मंदिर है जो लेख में चर्चित चन्द्रशेखर मंदिर का प्रतिनिधि हो सकता है। इसके निर्माण का श्रेय गोस्वामी पंथ के साथ कृपालगिरि को दिया जाता है; किन्तु अधिक संभावना इस बात की है कि उन्होंने इस मंदिर का जीर्णाेद्धार करवाया होगा। गोस्वामी पंथ मुख्यतः वैष्णव मतावलम्बी है, अतः मंदिर निर्माण की बात संदिग्ध प्रतीत होती है।16 

पीलासाव के तीसरे पुत्र महाराज द्वारा राजीवनयन स्थान में जगन्नाथ तथा शुभ मंदिर बनवाये गये थे जिनका समीकरण डॉ. जैन द्वारा राजिम के जगन्नाथ तथा कुलेश्वर मंदिर से किया गया है। यह सर्वथा उचित है। राजीवनयन वर्तमान राजीवलोचन का पर्याय है पर यह स्थान नाम के रूप में उल्लिखित होने से महत्वपूर्ण है। राजिम के नामकरण के विषय में जो विविध दंतकथाएँ मिलती हैं उनमें से एक ‘लोचन‘ नाम से भी सम्बद्ध है। राजीवनयन उल्लेख उसकी प्राचीनता तथा प्रामाणिकता का खंडन करता है। कुलेश्वर मंदिर चर्चित लेख के काल से प्राचीन है यह उसके स्थापत्य, शिल्प तथा वहाँ के अभिलेख की लिपि से स्पष्ट है। यहाँ मंदिर निर्माण का उल्लेख न होकर उसके सुदृढीकरण (पं. 9-10 सुदृद शंभु मंदिर) की बात कही गयी है। हाल तक इस टापू के हर बार बाढ़ में कटाव होने के कारण चबूतरे की बारंबार निर्मिति होती रही है। अतः इस कार्य सुदृढीकरण की चर्चा यहाँ अभीष्ट है तथा मंदिर के जीणोद्वार की बात भी इसमें निहित है। 

(यहां उद्देश्य इस महत्वपूर्ण लेख से परिचित कराना मात्र है, अतः शोधपत्र में आए लेख का मूल पाठ यहां नहीं दिया जा रहा है। शोध-रुचि के व्यक्ति, मूल स्रोत अथवा लेखकों से संपर्क कर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।) 

संदर्भ तथा टिप्पणियाँ 

1. - रतनपुर तथा रायपुर के कलचुरियों की संयुक्त वंशावली इस प्रकार हैं. 

लक्ष्मीदेव 
 । 
सिंघ (सिंहण) 
 -----------------------------             
।                                     ।
डंधीर                        (प्रथम) रामचंद्र
।                                        ।
(द्वितीय) रामचन्द्र         ब्रह्मदेव 
।
 रतनसेन - गुडायी 
 ।
 बाहर 

2 खलारि पहले से बसा स्थान होने के कारण आरंभ में राजधानी यहीं स्थापित की गयी होगी। सुदेवराज के महासमुंद ताम्रपट्ट द्वारा तीसरे राज्यवर्ष में दिया गया खलपद्रक नामक गाँव खलारी से अभिन्न माना जा सकता है। इंडोलॉजिकल रिसर्च इन इण्डिया (सिलेक्टेड वर्क्स ऑफ प्रो. के. डी. बाजपेयी), ईस्टर्न बुक प्रिंटर्स, दिल्ली 2003, पृ. 283।

3 उत्कीर्ण लेख बालचन्द्र जैन, महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय, सूची पत्र क्र. 6, रायपुर, 1961, पृ. 29, 143-148।

4. पूर्वाेक्त, 148 151

5. खंडहरों का वैभव, ज्ञानपीठ, काशी

6. विष्णुसिंह ठाकुर ने अपनी पुस्तक राजिम (मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी), भोपाल, 1972, पृ. 13, पादटीप 1) में श्री बालचन्द्र जैन द्वारा इस शिलालेख का संक्षिप्त प्रकाशन राष्ट्रबन्धु साप्ताहिक के दीपावली विशेषांक में किये जाने का उल्लेख किया गया है। ‘रायपुर स्टोन इंस्क्रिप्शन ऑफ पीताराय एण्ड हिस संस, ‘जर्नल ऑफ मध्यप्रदेश इतिहास परिषद्, सं. कृ.द. बाजपेयी, भोपाल 1969, पृ. 55-57 यहाँ शीर्षक में गलती से ‘पीलाराय‘ के स्थान पर ‘पीताराय‘ छप गया है।

7. उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में नागपुर के रेसीडेंट रिचर्ड जेनकिंस के शीघ्र-सहायक श्री विनायक राव औरंगाबादकर ने भोंसला राज्य का दौरा कर पुरावशेषों पर एक प्रतिवेदन तैयार किया था जो अब लंदन के इंडिया ऑफिस लायब्रेरी में सुरक्षित है। इस प्रतिवेदन में भी ‘आरिंग‘ नाम प्राप्त होता है- एपिग्राफिया इंडिका, खण्ड 23, पृ. 116 117, खण्ड 26, पृ. 227। यह उल्लेखनीय है कि स्थानीय लोग आरिंग नाम का ही प्रयोग करते हैं।

8 श्री जैन ने शिला को 55X45 सेमी. तथा अभिलेख 43X29 सेंमी. नाप का बताया है।

9. जैन, पूर्वाेद्धृत, पृ. 55

10. अन्य नामों के साथ आदरार्थी ‘श्री‘ की योजना न होने के कारण यह नाम का हिस्सा मानना अधिक उपयुक्त है। अतः यहाँ नाम श्रीप्राणनाथ होगा, श्री प्राणनाथ नहीं।

11. मंदिर आदि की रचना दृढ़ स्वरूप की ही की जाती है कि वह अधिक से अधिक दिन (आचन्द्रादित्य काल तक टिकने की कामना की जाती है) स्थिर रहे। यहाँ सुदृढ़ीकरण का संकेत कुलेश्वर मंदिर के चबूतरे के संदर्भ में प्रतीत होता है, जो हर साल बाढ़ में क्षतिग्रस्त हो जाता था।

12, आरंग के महामाया मंदिर तथा तालांब का यह पहला अभिलेखीय उल्लेख है। आरंग, ताम्रपत्रादि अभिलेखों तथा सिक्कों की प्राप्ति के आधार पर महाजनपदकालीन से बसा प्रमाणित होता है- बालचन्द्र जैन, पूर्वाेद्घृत, पृ. 4-5, चित्र 3, चन्द्रशेखर गुप्त, ‘आरंग से प्राप्त ब्राह्मी अभिलेख, मेधा, अं. 7, भा 1 - 2, (1969-70, 1970-7), शा. दू. श्री वै. संस्कृत महाविद्यालय, रायपुर, 41-47. 

13. यह शिलालेख निर्माण किये स्थलों में से कहीं लगाया न जा कर घर की दीवार में क्यों लगाया गया है, यह विचारणीय है। यह संभव है कि वर्तमान दानीपारा में तत्कालीन बस्ती न होकर ताल या उद्यान (आराम) आदि के निर्माण में कहीं यह लगा था तथा बाद में यहाँ बस्ती बस गयी हो। यह भी संभव है कि तत्कालीन राजा का उल्लेख नहीं होने से सार्वजनिक स्थान पर लगाने अनुमति नहीं दी गयी हो, अतः इसे घर में ही सीमित कर दिया गया हो।

14. बूढ़ा आदिवासी देवता बूढ़ादेव से संबंधित हो सकता है- रायपुर दर्शन, भारतीय सांस्कृतिक निधि, छत्तीसगढ़ अध्याय, रायपुर द्वारा प्रकाशित पत्रक

15. उपरोक्त

16. इसकी पुष्टि पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर की प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व अध्ययन शाला में कार्यरत श्री ढेलऊराम की साक्ष्य से होती है जिन्होंने कंकाली तालाब का पानी निकाल जीर्णाेद्धार होते देखा है। उनके अनुसार लगभग चालीस वर्ष पूर्व यह कार्य किया गया था और मंदिर में जमा मिट्टी खोद कर शिवलिंग, जो गहरायी में स्थापित है, उद्घाटित किया गया था। तैर कर या नाव से यहॉं पहुंच जा सकता है। चर्चित शिलालेख में जिस गोठाली सरोवर और चन्द्रशेखर मंदिर का उल्लेख है वह इसी कंकाली तालाब तथा शिव मंदिर से अभिन्न हो सकते हैं। गोठाली का कंकाली में परिवतित होना सहज संभव है। गोठाली नाम संभवत कुछ विशेष महत्व रखता था। रतनपुर के कलचुरि नरेश द्वितीय पृथ्वीदेव के कलचुरि संवत 915 (1163-64 ईस्वी) के रतनपुर शिलालेख में भी एक गोठाली नामक ग्राम तथा वहाँ के सर (तालाब) का उल्लेख मिलता है। यह सरोवर द्वितीय पृथ्वीदेव के सामंत ब्रह्मदेव ने बनवाया था। इस का वर्णन इस प्रकार किया गया है -

गोठाली नामीन ग्रामे चकार सरसीं शुभाम्।
अनिमेष दृशां वृन्दैदिवमध्यासितामिव।।32।।
(गोठाली नामक गाँव मे शुभ तालाब) ब्रह्मदेव ने बनाया, जो महिलाओं से ऐसा भरा हुआ है जैसे स्वर्ग (देवों से)।

- बालचन्द्र जैन, उत्कीर्ण लेख, पृ. 115, पं. 27-28, पृ. 118
यहाँ देवों के स्थान पर अप्सराएँ अधिक उपयुक्त अभिप्राय होगा, क्योंकि यहाँ स्त्रियों का उल्लेख है, पुरुषों का नहीं और स्वर्ग अप्सराओं के लिए विख्यात है।

यहां आए राष्ट्रबंधु साप्ताहिक में प्रकाशित लेख से संबंधित पोस्ट दानीपारा शिलालेख-1969शीर्षक पर लिंक है।