Saturday, July 30, 2022

हरेली-रोहिणी

श्री रोहिणी कुमार वाजपेयी स्मृति व्याख्यान माला के दूसरे वर्ष ‘छत्तीसगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन और नवजागरण‘ विषय पर अटल बिहारी बाजपेयी विश्वविद्यालय द्वारा दिनांक 28 जुलाई 2022 को बिलासपुर में आयोजित कार्यक्रम में अपनी कही गई बातें, स्मृति के आधार पर आंशिक स्पष्टीकरण सहित यथासंभव यथावत यहां प्रस्तुत-

(औपचारिक संबोधन- आयोजन, अतिथियों का उल्लेख, अभिवादन और आभार)


यह अच्छा संयोग बना है कि आज हरेली के दिन हम आदरणीय रोहिणी कुमार वाजपेयी जी की स्मृति में यहां एकत्र हुए हैं। हरियाली का त्यौहार कृषि कर्म का, कृषक जीवन और कृषि संस्कृति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है और जैसा विवेक जी कह रहे थे रोहिणी कुमार जी मूलतः कृषक स्वभाव के थे। वे कृषि के माध्यम से ग्रामीण जन-जीवन, स्वावलंबन और खादी तक भी पहुंचते थे। ऐसे ही कुछ और संयोग याद आ रहे हैं।

उनके नाम के साथ यह विचार रोचक और प्रासंगिक हो सकता है कि रोहिणी को हम दो प्रकार से याद करते हैं- रोहिणी, जो 28 नक्षत्रों में से चौथा नक्षत्र है और रोहिणी, जो बलराम की माता हैं, वसुदेव की पत्नी। बलराम का एक नाम संकर्षण भी है। अब इन दोनों पर थोड़ा विचार करें। बलराम हलधर हैं और यह प्रतीक है कृषि कार्य का। वास्तव में बलराम को कृषि से जुड़ा, कृषक संस्कृति का देवता माना जा सकता है दूसरा, संकर्षण नाम उनका इसलिए आता है, क्योंकि कथा है कि वह जब भ्रूण रूप में थे, देवकी के गर्भ से उन्हें रोहिणी के गर्भ में प्रतिस्थापित किया गया था तो इसे यूं उन्नत विज्ञान का उदाहरण मान लेना मैं उचित नहीं समझता, लेकिन यह जरूर माना जा सकता है कि गर्भ प्रतिस्थापन की अवधारणा या सोच का बीज, बलराम के साथ जुड़ा हुआ है, मगर यह भी संभव है कि यह रोपाई का प्रतीक हो। इसी प्रकार उल्लेख आता है कि बलराम ने मथुरा के पास यमुना के प्रवाह को बलपूर्वक मोड़ दिया था। ऐसा प्रतीत होता है कि यह यमुना के पानी से सिंचाई, नहर-व्यवस्था बनाने की प्रतीक रूप में कथा है।

बलराम का चित्रण एक और रूप में किया जाता है, उन्हें मदिरा-पात्र लिए, चषकधारी दिखाया जाता है, उन्हें मदिरा-प्रेमी बताया गया है किंतु इसके साथ यह उल्लेख बहुत कम होता है, इसकी चर्चा कम होती है कि संभवतः वही पहले ऐसे शासक थे, महाभारत के मौसल पर्व में उल्लेख आता है, जिन्होंने अपने राज्य द्वारकापुरी में मद्य-निषेधाज्ञा जारी की थी यह बहुत महत्वपूर्ण और बलराम के चरित्र का एक उल्लेखनीय पक्ष है। वैदिक, पौराणिक, महाकाव्य ग्रंथ और उसमें जो प्रसंग आते हैं, जिन पात्रों की कथा आती है उन पात्रों की कथा बहुत सूक्ष्म और संकेत रूप में, प्रतीक रूप में बहुत सारी अवधारणाओं को साथ लिए होती है, इसलिए उन्हें समझने का प्रयास व्यापक संदर्भों और परिप्रेक्ष्य में करना आवश्यक होता है, उनकी व्याख्या वांछित होती है। इस संदर्भ में इस तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट कराना चाहूंगा कि बलराम की एक सौतेली माता का नाम भी मदिरा था, एक यह पक्ष भी चर्चा योग्य है।

रोहिणी नक्षत्र का काल सामान्यतः मई के अंतिम और जून के प्रथम सप्ताह का होता है और आप सभी जानते हैं कि मई का अंतिम सप्ताह भीषण ताप का, नौतपा का होता है। आप यह भी समझ सकते हैं जो रोहिणी कुमार जी के व्यक्तित्व से परिचित हैं कि यह उल्लेख क्यों कर रहा हूं। अगर कोई ऐसी स्थिति हो जो उन्हें अनुचित लगती हो, अप्रसन्न हों तो वे नौतपा की तरह तमतमा जाते थे, अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते थे लेकिन उसके बाद उनके व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष, नौतपा बीतते ही स्नेह की बारिश जैसा भी उतनी ही जल्दी और उतनी ही उदारता से सामने आता था।

एक संयोग यह कि आज का अवसर मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से भी पितृ पुरुषों के स्मरण का है। मेरे पिता और रोहिणी कुमार जी सहपाठी रहे हैं। मेरे पिता और रोहिणी कुमार जी के अन्य सहपाठी सीएमडी कॉलेज के दुबे परिवार वाले राजाबाबू दुबे जी थे, जब भी मिलते सांसारिक आडंबर और हकीकत का रूप बेनकाब करते। टिकरापारा वाले व्यंकटेश तेलंग जी, जिन्होंने छत्तीसगढ़ में यूथ हॉस्टल एसोसिएशन आरंभ किया, बापट जी वाले सोंठी कुष्ठ आश्रम में सेवाएं देते रहे। इसके साथ डॉ शंकर तिवारी जो प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता रहे हैं, कुटुमसर गुफा की खोज उन्होंने की थी। पुरातत्व के क्षेत्र में भीमबेटका का ‘एस बेल्ट‘ खोजा और प्राचीन सिक्कों, लिपि के भी अच्छे जानकार थे। वे मध्यप्रदेश पर्यटन मंडल के पहले अध्यक्ष रहे और तब छत्तीसगढ़ समाहित मध्यप्रदेश का पर्यटन नक्शा पहली बार उन्हीं के कार्यकाल में बना था। आप सभी से मुझे पुत्रवत स्नेह मिलता रहा है। तो इन सभी गुरुतुल्य पितृ पुरुषों को याद करते हुए एक और संयोग का उल्लेख करना चाहता हूं कि रोहिणी कुमार जी के ज्येष्ठ पुत्र जो मेरे हमनाम भी हैं राहुल और व्यंकटेश तेलंग जी की पुत्री शुभदा, जो अब शुभदा जोगलेकर, माउंट लिटेरा जी स्कूल की कर्ता-धर्ता हैं, 1974-75 में एसबीआर कॉलेज में, हम तीनों भी सहपाठी रहे हैं।

प्राचीन इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्र में रोहिणी कुमार जी की गहरी पैठ थी। इस क्षेत्र में उनकी रुचि आत्म गौरव को उजागर करने वाली और प्रेरणा देने वाली थी। उनकी रुचि का विशेष कालखंड वही है जो भारत के इतिहास में अंधकार युग कहा जाता है यानी ईसा पूर्व और ईसा की दो-दो सदियां, इस तरह जो लगभग चार-पांच सौ वर्षों का काल है, वह काल भारत के इतिहास का अंधकार युग माना जाता है। उनकी रुचि इस कालखंड के इतिहास में विशेष रूप से थी। साथ ही पुरातत्व के अनछुए पहलुओं पर उनका ध्यान केंद्रित रहता था। मैं मानता हूं कि जिस तरह से किसी नई वस्तु का, भविष्य का, उस में प्रवेश करने का रोमांच और जिज्ञासा होती है उसी तरह उनमें भूत का, अनजान इतिहास के अंधकार में प्रवेश का साहसिक उत्साह होता था। अपने इतिहास में प्रवेश का उद्यम, दरअसल एक साहसी व्यक्ति का ही होता है जो एक अनजाने क्षेत्र में, अंधकार के क्षेत्र में, भूत के क्षेत्र में प्रवेश कर, उसे भेदना चाहता है और उसके रोमांच को महसूस करता है।

छत्तीसगढ़ के मिट्टी की दीवाल और खाई यानि प्राकार-परिखा वाले गढ़ों में भी उनकी खासी रूचि रही। कभी उन्होंने रहौद में गढ़ होने की बात बताई थी, मुझे इसका बिल्कुल भी अनुमान नहीं था इसलिए मैंने संदेह व्यक्त किया तो उनकी कही बात अब भी मेरे कानों में गूंजती है, ‘वहां जब कभी जाओ तो देखना वहां ठुठुआ देवांगन का मकान है उसके आंगन और उसकी बाड़ी को देखना वहां किस तरह का टीला, कैसा माउंड है और उसकी बाड़ी के अंदर आगे बढ़ोगे तो तुम्हें वहां ढेर सारे पुराने मिट्टी के बर्तन और अवशेष यों ही देखने को मिलेंगे।‘ वहां जाने का अवसर मिला और तब मैंने देखा कि पामगढ़ के तो नाम में ही गढ़ है, वहां के गढ़ को सभी जानते भी हैं, लेकिन रहौद और उसके अलावा पामगढ़ से शिवरीनारायण तक हर पांच-सात किलोमीटर इस तरह के गढ़ और खाई के अवशेष अभी भी हैं। यह उन्हीं की प्रेरणा थी जिसके कारण यह इस तरह से देखने का, इसे समझने का अवसर मिला। पुरातत्वीय अन्वेषण की ऐसी दृष्टि, कुछ संस्कार मुझे उनसे मिले।

मल्हार के गढ़ में भी उनकी विशेष रूचि थी और यह रुचि मुख्यतः मल्हार से प्राप्त होने वाले प्राचीन सिक्कों और शिलालेख के कारण थी। मल्हार से प्राप्त होने वाले पुरावशेषों के प्रति वे ग्रामवासियों को तो जागरूक करते ही रहते थे, स्वयं सजग रहते थे। इसी क्रम में 1980 में एक शिलालेख मल्हार से प्राप्त हुआ था, जिसे बिलासपुर में पदस्थ तत्कालीन पुरातत्व अधिकारी श्री रिसबुड ने उनके सहयोग से बिलासपुर संग्रहालय के लिए संग्रहित किया। अब वह शिलालेख बिलासपुर संग्रहालय में प्रदर्शित है। यह महत्वपूर्ण शिलालेख, लगभग दूसरी शताब्दी ईस्वी का है। इस शिलालेख का अध्ययन और प्रकाशन पुरातत्वविदों द्वारा किया गया। यह स्मृति-लेख है, जिसमें राधिक, उपझाय, इसिनाग जैसे शब्द पढ़े गए। उसके पाठ और अनुवाद को लेकर आपने अपना मतभेद प्रकट किया। वे पुरातत्व के क्षेत्र में भाषा, यानी यह शिलालेख जो प्राकृत में था और जिसकी लिपि ब्राह्मी थी, तो वे प्राचीन लिपि और प्राचीन भाषा के भी जानकार थे और इसकी पुनर्व्याख्या करते हुए अपनी टिप्पणी की थी। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया था कि मूल पुरावशेष के स्वयं परीक्षण या उसका बारीक, स्पष्ट और विस्तृत विवरण अध्ययन के लिए आवश्यक होता है।

इसी तरह मल्हार से जो विभिन्न सिक्के प्राप्त होते थे बड़ी संख्या में उनका उन्होंने परीक्षण किया था। ऐसे तांबे के चौकोर सिक्के, देवी-लक्ष्मी और गज प्रकार के रूप में जाने जाते हैं। ऐसे और इससे मिलते-जुलते सिक्के बड़ी मात्रा में मिले जिनका उन्होंने परीक्षण किया। ऐसे सिक्कों पर सामान्यतः लिपि या किसी तरह का लेख नहीं होता लेकिन उन्हें परीक्षण के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि इनमें ऐसे भी सिक्के हैं, जिन पर लेख, कुछ ब्राह्मी के अक्षर अंकित हैं। इससे इतिहास का एक महत्वपूर्ण पक्ष उजागर होने का रास्ता बना। तब तक पुराणों के माध्यम से जानकारी थी कि मघ वंश के शासकों का इस क्षेत्र में, दक्षिण कोसल में राज्य था लेकिन इस पौराणिक साहित्यिक स्रोत के अलावा इसकी पुष्टि के लिए और कोई सामग्री नहीं मिली थी। इन सिक्कों की प्राप्ति से पुरातात्विक स्रोत के रूप में ऐसी सामग्री प्राप्त हुई जिन पर मघ वंश के विभिन्न शासकों के नाम पढ़े गए। इससे यह पुष्ट रूप से प्रमाणित हुआ कि ईसा की आरंभिक सदी में, दक्षिण कोसल क्षेत्र में मघों का आधिपत्य या प्रभाव रहा था यह एक महत्वपूर्ण पृष्ठ इतिहास में जुड़ा।

वे किसी बेहद सजग इतिहासकार की तरह, परंपरा से, प्राचीन वस्तुओं, पुरावशेषों से, साहित्य से, सभी स्रोतों से कण-कण जानकारियां एकत्र करने के लिए उत्सुक और प्रयत्नशील रहते थे और इन सभी कड़ियों को आपस में जोड़कर इस अंचल के माध्यम से पूरे भारतीय इतिहास के उन पक्षों को उद्घाटित और प्रकाशित करना चाहते थे जो हमारे आत्म गौरव का विषय हो सकता है हमारे लिए प्रेरक हो सकता है। और इस तरह के जागरण का सार्थक प्रयास उन्होंने किया था।

अपनी बात कहते हुए मुझे यह ध्यान में बराबर है कि आज डॉक्टर त्रिवेदी जी का वक्तव्य है, वे इस आयोजन के मुख्य वक्ता हैं, नवजागरण के दौर की चर्चा करने वाले हैं। डॉक्टर त्रिवेदी के उद्बोधन के प्रति सदैव उत्सुकता रहती है, उसी उत्सुकता सहित निवेदन कि व्यक्ति अपने अवदान से अमर होता है और प्रासंगिकता उसके विचार, उससे मिले संस्कार, उस परंपरा की होती है, जिस दृष्टि से रोहिणी कुमार जी की प्रासंगिकता सर्वकालिक है, उनके साथ तालमेल बिठाते देखना होगा कि हम उनके विचारों के परिप्रेक्ष्य में कितने प्रासंगिक हैं।

आप सभी को, अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय और माननीय कुलपति जी, आयोजकों को धन्यवाद देता हूं कि मुझे आप सबके बीच उपस्थित हो कर, आदरणीय रोहिणी कुमार जी के प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित करने का अवसर दिया, पुनः धन्यवाद।

Tuesday, July 26, 2022

नदी गोठ

‘जीवन देवइया छत्तीसगढ़ के नदिया‘ शीर्षक वार्ता, ‘मोर भुंइया‘ आकाशवाणी, रायपुर का कार्यक्रम, जिसकी प्रस्तुति श्याम वर्मा जी की तथा भाग लिया डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर, डॉ. लक्ष्मी शंकर निगम और राहुल कुमार सिंह ने। प्रथम प्रसारण तिथि- 17 जनवरी 2012.
डॉ. विष्णुसिंह ठाकुर,राहुल कुमार सिंह और डॉ. लक्ष्मीशंकर निगम
यह वार्ता आकाशवाणी से समय-समय पर दुहरा कर प्रसारित होती रही है और जब भी प्रसारित होती है, पसंद करते किसी परिचित का फोन आता है। ठाकुर सर और निगम सर के साथ बैठना और बात करना, मेरे लिए तो तीर्थ-लाभ जैसा ही है। व्यापक विषय ‘समय-सीमा‘ में, इसलिए आधी-अधूरी सी लग सकती हैं। यह ध्वन्यांकित वार्ता मामूली सुधार कर बातचीत की ही तरह यहां प्रस्तुत-

सिंह- गोठ-बात बर हमन इहां जुरे हन, डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर साहब हें, पुरातत्व क्षेत्र के अउ छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ अध्येता आयं, काफी इन सर्वेक्षण करे हावयं, चप्पा चप्पा छत्तीसगढ़ के देखे हुए हे आपके और डॉ. लक्ष्मी शंकर निगम साहब हें, आप पुरातत्व अउ विशेषकर पुरातत्व के ऐतिहासिक भूगोल के क्षेत्र म, दक्षिण कोसल के ऐतिहासिक भूगोल हे, ते कर संबंध म आप शोध करे हें। छत्तीसगढ़ कई क्षेत्र म जाए के आपो ल काफी मौका मिले हे अउ मैं राहुल कुमार सिंह, महूं पुरातत्व के विद्यार्थी रहें और ओ कर बाद अपन काम काज के दौरान मो ल बस्तर से ले के सरगुजा तक पूरा उत्तर-दक्षिण, रायगढ़ से ले के राजनांदगांव तक, अलग अलग काम से क्षेत्र म जाए आए बर मिलिस, नदिया नाहकन, नंदिया के संग-संग चलत रहेन, नदिया के उद्गम संगम ल देखत रहेन, ओइ सब चर्चा बर हमन बइठे हन। ठाकुर साहब लगातार ए क्षेत्र ल देखत रहे हें, जीवन देवइया नदिया मन के बारे म ठाकुर साहब से हम कुुछ सुनना चाहबो, जानना चाहबो

श्री ठाकुर- राहुल जी, आजकल एक ठक कहावत निकले हे ‘जल ही जीवन है‘ और ए हर प्रशासकीय स्तर से प्रचारित करे जात हे। जल देथे कोन हर, आसमान हर देथे, फेर हम पाथन कहां, बोहावत-बोहावत जउन नदिया नरवा म पानी आवत रथे तउने ल हम हर पाथन, देखथन, अउ तइहा जुग में आदमी हर अपन बसेरा नदिया के तीर में, पानी के तीर में बनावय, एकरे सेतिर पूरा भारत में हम देखबो त का बर, देखथन हमर सभ्यता हर एक साल, दू साल, तीन साल, दस साल, हजार साल, नदिया के तीर म बसे हे। परंपरा हमार जीवित हे उहां, नदिया में, तओ छत्तीसगढ़ के घलो हमर ओइ हालत हे ओइसनहे, यहां के सबले बड़े नदिया जउन ह सब नदिया मन ल बटोरत बटोरत बोहावत आथे अउ समुद्र म जा के मिल जाथे ओ महानदी ए। कांकेर से सिहावा तक एक पहाड़ी ए जउन ल राजीवनयन महातम्य जे प्रकाशित होए हे ते म कंक कहे हे अउ श्रीमदभागवत म भी ए नाम हे कंक, कंक पर्वत से निकले के सेती ए कर नाम हे कंकनंदिनी

सिंह- ए ल चित्रोत्पला गंगा के भी नाम दिए जाथे, महानदी ल

श्री ठाकुर- हं, महानदी ल चित्रोत्पला गंगा भी कहे जाथे, बिलकुल आप सही कहत हौ, चित्रोत्पला, नीलोत्पला, उत्पल याने कमल। तओ जउन राजिम नयन हे, राजिम हे वो कमल क्षेत्र में हे, कमल क्षेत्र कहलाथे, का बर, ओही मेर महानदी हर चित्रोत्पला हे, सिरपुर म आ के बिचारी हर महानदी ए।

सिंह- निगम सर से चर्चा करत हन के हमर चित्रोत्पला गंगा तो हमर महानदी ए, जे समुद्र म जाथे अउ गंगा नदी, एक मैदानी भाग म जे ग्लेशियर के नदी होथे, पहाड़ी नदी, बरफ पिघले के नदी, ते मन के स्थिति अउ हमर इहां के छत्तीसगढ़ के स्थिति कइसे रथे

श्री निगम- वइसे छत्तीसगढ़ के जे मैदान हे, ओ मैदान ह उत्तर भारत के दोआब के बाद सबसे बड़े ए, ओतका बड़ मैदान देखे बर नइ मिलय। ओ ल तैं नक्सा म देखबे त अइसे लगिही कि बिलकुल प्लेन चलत हे कहूं उंच-नीच नइ दिखत हे। दोआब जे गंगा यमुना के हे ओ म जतका पानी आथे ओ म से जादा पानी हिमालय पहाड़ से आथे, ओ बर्फीला ए, बर्फीला होए के कारण, बाद में तो बरसाती पानी आथे, अउ ठंड में, गरमी में, ठंड में तो जम जाथे, लेकिन गरमी में बरफ पिघल के फेर पानी आथे। छत्तीसगढ़ म ओ स्थिति नइए, इहां के अधिकांश नदी मन बरसात म तो बहुत बोहाथे, गरमी म कइ ठन सूख जाथे, ओ कर कारण ए हे कि ओ कर जल संग्रहण क्षेत्र हे ओ म बारों महीना पानी नइ मिलय, लेकिन ए नदी म जइसे ठाकुर साहब बताइस, सब ले बड़े नदी महानदी ए, अउ जो हर समुद्र म जाथे, त समुद्र म जाथे त बाद में जइसे जइसे बढ़त जाथे ओ कर रूप ह विकराल होत जाथे, बड़े होत जाथे अउ खासकर के सिवनाथ नदी, जो ओ कर सब ले बड़े सहायक नदी ए छत्तीसगढ़ में वहां जाए के बाद ओ कर रूप ह एकदम बदल जाथे। त महानदी के जल संग्रहण क्षेत्र काफी बड़े हे, लेकिन शिवरीनारायण, जिहां सिवनाथ हर मिलथे, ओ मेर एक ठन अउ नदी मिलथे, जोंक नदी, जोंक घलो बड़े नदी ए, उड़ीसा के माड़ागुड़ा से निकले हे, पुरातात्विक स्थल ए, अउ बोहात-बोहात शिवरीनारायण म आ के मिलथे, जोंक भी मिलथे, सिवनाथ भी मिलथे। तो जइसे राजिम एक बड़े संगम ए वइसे एक बड़े संगम बनथे ओकरे पाए के राजिम असन बड़े तीर्थ सिवरीनारायण ल घलो माने जाथे। एक बात अउ बता दंव राहुल जी, हमर इहां नदी के उद्गम, ओ कर संगम, अउ जउन मेर ओ समुद्र म मिलथे, तीनों स्थान ल बड़ा पवित्र माने जाथे,

सिंह- सब तीरथ ए

श्री निगम- सब तीरथ ए, अउ हम देखथन कि तीरथ होए के कारण ए कर धार्मिक महत्ता तो हइ हे, ए कर पुरातात्विक महत्ता भी बहुत अधिक आ गए हे अउ सब स्थान में बड़ा पुरातत्व के धार्मिक नगरी अउ तीरथ सब मिलथे। जइसे कि राजिम हे, सिवरीनारायण हे, सोमनाथ हे, मनियारी अउ सिवनाथ के संगम म ताला हे अउ आगे जइसे जइसे बढ़त जाबो वइसे वइसे संगम मिलत जाही, अउ ओ संगम के बड़ा महत्व हे।

सिंह- नदिया मन सब बांध बनिन, बांध ले नहर बनिन एहू मन तो एक तरह से पहिली जे पुराना सभ्यता के आधार रहिसे अउ अब ओ कर आधार म जे बांध बन के, नहर बन के अलग-अलग पानी पलोये के इंतिजाम होइस, सिंचाई के इंतिजाम होइस ओहू ह एक नया तरह से जीवनदायिनी स्वरूप ए नदिया मन के

श्री ठाकुर- हां, बिलकुल ठीक कहत हव। गंगरेल बांध हे अउ गंगरेल बांध से विशाल नहर निकलथे। ओ नहर हर आधा ले जादा, पूरा रायपुर जिला अउ दुर्ग के बहुत बड़े हिस्सा ए मन ल पलोथे, गंगरेल हर। मगर पूरा छत्तीसगढ़ ल पलो सकय अतका छमता ओ म नइए। संगे संग एक विशेष बात बतावत हंव, जउन चारों कोती के पानी इकट्ठा होथे, एक स्थान में, ते ठेलका बांधा, बांध नो हय, मैदान हर अइसे ढालू हो गे चारों तरफ से अउ ढलुआ में आ के केंद्र म ओ हर जल हर भरा जाथे, ढेलका गांव में ओ बोहाथे अउ उहां से जेन नरवा निकलथे ओ गंगरेल के धारा ल ठेलका बांध म डालथें अउ ठेलका बांधा के नहर में, गांव के नहर में, जइसे गरमी के फसल बर जइसे हमार इहां नहर छोड़थें त नहर म नइ आवय, ठेलका बांधा म आथे अउ ठेलका बांधा, सब नरवा मन में जाथे चांपारन में चम्पारण जेन कथें ए मन हर तो शासकीय ए में भले बोल देथंव, मगर ओ ल मैं चंपारण नइ मानव, चांपाझर ल, वहां नरवा बोहात आथे, ओ नरवा मोर गांव से गए हे

सिंह- नदिया मन के साथ, हम जे बात करथन तओ नदी मन जइसे बरसात के दिन म जब नदी बढ़ जाथे, पूरा आथे, त ओ कर से काफी नुकसान भी होथे और ए मन ल सब ल नियंत्रित करे बर, काबू करे बर, अउ ओ कर जे जीवनदायी स्वरूप ए, जीवन देवइया ओ कर रूप ए, तइ ल एक प्रकार से बनाए रखे बर बांध, अलग-अलग बांध, देश म बड़े बड़े बांध बनिस, अउ निगम सर ओ कर बारे म कुछ जे बड़े बांध हमर इहां बने हे

श्री निगम- हमर इहां जे सब से बड़े बांध, जेन हिंदुस्तान म हे ओ तो भाखरा नंगल ए। पुराना छत्तीसगढ़ के हिस्सा रहिस संबलपुर, ते म हीराकुड म घलो बांध बने हे बहुत बड़े अउ छत्तीसगढ़ म देखबे त एक ठन बांध हे धमतरी तीर में माडम सिल्ली, ओ कर सबसे बड़े बात ए ओ समय के बने हे, जब सीमेंट के अविस्कार नइ होए रहिसे, चूना म जोड़े हे ओ ल। अउ दूसर का करे हे ओ ल साइफन तकनीक के प्रयोग करे हे ओ म पानी हर जइसे जादा होथे, खिड़की खोले के जरूरत नइ होवय साइफन से निकल जाथे। ए लगभग सौ साल होवत हे। भाखरा नंगल, हीराकुंड तो हइ हे, बाणसागर घलो नवा जीवन देहे हे ओ क्षेत्र ल। हमर इहां के जउन बांध मन हें, वइसे कहि सकत हस कि पहिली नदिया नाला के सब पानी समुद्र में जाथे, फेर बांध ल हमन बना के वापस ओ ल खेत म भेज देहेन। त ए बांध हर फेर जीवनदायिनी बन गे। पहिली तो नदी के किनारे बसना जरूरी रहिसे, अब तो जरूरत नइए, अब तैं कहूं बस जा, बांध बन गे त पानी तोर इहां पहुंच जाही। अउ जीवनदायिनी नहर घलो बन गे ओ कर शाखा।

सिंह- एक प्रकार के नहर घलउ हर नदिया के ही रूप ए, ओकरे निकास ए। तओ नदिया मन तो जीवनदायिनी हें फेर बांध के रूप म बंधिन अउ फेर नहर के रूप म बन के जीवनदायिनी एक अलग रूप म नदिया मन ही निकलिन। त ए तरह के हमर जीवन बर चाहे ओ हर फसल के रूप म होवय, हमर रोजमर्रा के जिंदगी बर होवय, हमर पूरा सभ्यता बर होवय, ए हर प्रकार से नदिया मन हमर जीवनदायिनी ए अउ कहे गए हे सप्तगंगा कहे गए हे देश के हमर जेन बड़े नदिया, अउ सिर्फ हमर देश म नहीं पूरा दुनिया म चाहे ओ नील नदी होवय या यांगटी सिक्यांग होवय, तओ ए सब नदी ह्वांग-हो नदी होवय,

श्री निगम- मिसिसिपी

सिंह- मिसिसिपी हे। हमर गंगा यमुना सरस्वती तो हइ हावयं, त ए सब मन हमर जीवनदायिनी नदी एं। ए सब नदी मन के स्मरण हर ही अपन आप म एक तीर्थ के लाभ देथे, का बर ए सब मन जीवनदायिनी एं। एकर बारे म जे बड़े बड़े पुण्य तीर्थ बनथें नदी मन धार्मिक रूप से भी ए कर बड़ा महत्व हो जाथे।

श्री ठाकुर- राष्ट्रीय स्तर पर पुराण परंपरा म जउन नदी मन के उल्लेख आए हे अउ जउन ल हम ह सामान्य परंपरा हे कि नहाए के पहिली, चाहे हम गांव के तरिया म नहावत हों, नरवा म नहावत हों, ओ पानी ल धर लेथन ओ म हम ह ओ ल अभिषिक्त करथन, गंगा यमुना याने ओ ए पानी में विराजमान हे, अउ हम फेर ओ पानी ल अपन सिर म लेथन, शरीर म लेथन नहाथन। ये गौरव परंपरा में धर्म के क्षेत्र में महानदी ल कहां तक नइ मिलिस, शिवरीनारायण के आगे तक। मगर ए स्थान में, याने मैं आपसी चर्चा में कह चुके हंव, छत्तीसगढ़ हर हमर पांचरात्र धर्म के सबसे बड़े केंद्र ए और महानदी ओ कर संवाहिका ए, शिवरीनारायण कहथन, ओ शबरी के नो हय ओ बिचारी नासिक के ए शबरी हर ओ सौरी नारायण, विष्णु के एक नाम सौरी हे, चतुर्विंशति रूप, अभी मैं श्रीमदभागवत पढ़त हंव, चतुर्विंशति रूप जउन हे ओ में आदि नारायण, ये कोन ए, जउन विग्रह ए, ओ राजिम में हे, ओही रूप सौरी में हे, शिवरीनारायण में, बिल्कुल अलग-अलग नारायण के रूप ए एमन, अउ जांजगीर तो एकमात्र अइसे जगह ए, जिहां मंदिर में चौबीस विष्णु के चौबीसो स्वरूप के चतुर्विंशति स्वरूप के अंकन हे, ठीक...

सिंह- ए मन ल कई प्रकार के नया नया रूप देथे नदिया हर तओ कइसे ढंग से दिखथे हम ल

श्री निगम- अभी ठाकुर साहब जे बात करिस ओ म एक बात अउ ख्याल आत हे, महानदी जो हमर हे, ओ जगन्नाथ जी के यात्रा के भी नदी ए। आज जगन्नाथ पुरी ल कहिथें, कि जगन्नाथ जी के बड़े केंद्र ए, लेकिन जगन्नाथ जी के मंदिर हे ओ कर पहिली हमर इहां शिवरीनारायण म जगन्नाथ जी के दर्शन हो जाथे। अउ मो ल तो अइसे लगथे कि जगन्नाथ जी हे न, ते छत्तीसगढ़ से ही होत होत जगन्नाथ पुरी पहुंचे हे।

श्री ठाकुर- राय ब्रह्मदेव के समय में राजिम में जगन्नाथ मंदिर दाउजी हर बनाए हे, ए कर अभिलेख हे, बालचंद जैन ओ ल प्रकाशित करे हे, अभी भी दीवाल म ओ लिखे हुए रखे हे ओ कर इहां अउ ओ कर बाद शिवरीनारायण में भी होए हे। तओ दोनों क्षेत्र, जिहां तीन नदिया के संगम मानथन हम परंपरागत रूप से, जिहां भी महानदी के तीन नदिया मन के बीच संगम होए हे ओ पांचरात्र धर्म के केंद्र रहे हे।

सिंह- ए तो नस-नाड़ी भी ए, एक प्रकार के जीवन के प्रवाह हे, जे नस-नाड़ी कहे जाथे नदिया मन ल, कभू अइसनहा जमाना भी रहिस हे कि जब शायद सड़क के अतका इंतिजाम नइ रहिस तओ

श्री ठाकुर- नइ राहुल, सुरता होही आप जानत हौ, जांजगीर के आगे चांपा के रास्ता में हसदो

सिंह- हसदो नहाकथे, जी, जी हां 

श्री ठाकुर- हंस दो, दो हंस, द्वि हंस के कथा अउ ए हसदो कतेक ...

सिंह- ए सब मन तो नदी मन जे प्रकार से जीवन संचार ए, रक्त प्रवाह ए, तइ प्रकार से ए हावयं, ए मन के बताहीं निगम सर

श्री निगम- छत्तीसगढ़ में जो नदी हे, हमन नदी के तो सुरता बहुत करेन, ओ कर वैभव ल गाथा ल, लेकिन यहां कोन कोन नदी हे ओकरो बारे म थोरकन बता देतेव आप।

सिंह- एक सोन ल, सोन के नांव सब ले पहिली मैं लेना चाहिहंव। ओ ए नांव से कि सोन के बारे म अक्सर कहे जाथे कि ए हर अमरकंटक ले निकले हे, अइसनहा लेकिन मान्यता ए, ए हर। सच्चाई ए हे कि ए हर पुराना पेंड्रा जमींदारी के गांव रहिस सोन बचरवार, ए सोन बचरवार हर आज भी छत्तीसगढ़ के हिस्सा ए, जिहां से ए सोन नदी के उद्गम हावय और कुछ हिस्सा ही ए कर छत्तीसगढ़ म होवय लेकिन एकर उद्गम सोन के, छत्तीसगढ़ म हे ओइ नांव से ए कर नांव लेना जरूरी हे सोन के नांव कि जइसे देश म हम ब्रह्मपुत्र के नांव लेथन, तओ ब्रह्मपुत्र ल पुल्लिंग नदी माने जाथे, नदी आमतौर से स्त्रीलिंग ए, लेकिन कुछ नदी अइसनहा हे जे मन ल नदी नहीं, नदी के बदला म नद कहे जाथे त ओ म ब्रह्मपुत्र एक हावय बड़े नद ए, अउ ओ रूप म देखन अगर हम अपन क्षेत्र म, छत्तीसगढ़ म त दूसर शायद सब ले महत्वपूर्ण अउ बड़े नद ए, जे हर सोन ए और अइसनहे हमर इहां शिवनाथ जे हर महानदी के प्रमुख सहायक जलधारा ए ओहू ल पुल्लिंग माने गए हे नद माने गए हे, एक सरगुजा के जल प्रवाह हे कन्हर, कन्हर घलौ ल कहे जाथे ओ कर बारे म मान्यता हे। जशपुर म नदी मन ल ले के बहुत, जशपुर के नदी के कहानी हे, जशपुर से लगे हुए पांच-सात किलोमीटर दूर नदी निकलथे, एक नदी हे सिरी अउ दूसर नदी हे बांकी, दुनों छोट छोट नदी ए, सिरी ल पुल्लिंग माने जाथे, पुरुष नद माने जाथे, ओ कर बहाव के दिशा सीधा हे और बांकी के नाम शायद अइ नांव से बांकी पड़े हे का बर एकर बड़ा सरपीला, टेढ़ा-मेढ़ा एकर बहाव हावय और दुनों के उद्गम एके जगह ले हे एके पहाड़ी ले हे, दुनों ल माने जाथे कि दुनों के चूंकि उद्गम एक ही ए, ते नांव से दुनों ल भाई-बहिनी माने जाथे। त हमर इहां ए नदी मन के स्वरूप ल आमतौर से और नदी मन के पवित्रता हे, मंदिर मन म बहुत महत्वपूर्ण ओ कर एक चित्रण होथे सर, ओ कर बारे म कुछ, नदी मन ल जे स्थान दिए गए हे मंदिर म जेन प्रकार से

श्री निगम- ए हर अइसे लगथे, गुप्त काल म चालू होए रहिस हे। कालिदास अपन कुमारसंभव म लिखे हे कि मंदिर के द्वार में गंगा-यमुना के अंकन करना चाहिए। त ओ परंपरा फेर अइसे चलिस कि हर मंदिर में गंगा-यमुना के अंकन द्वार में हो जाथे अउ अइसे कह सकत हस कि अगर तोर तिर पानी नइए, अउ तैं पवित्र हो के नइ आए, त ओ कर दर्शन मात्र से तैं पवित्र हो गएस, मंदिर म घुसे के पहिली, नदी के दर्शन हो जाथे, ओ कर पूजन हो जाथे त आदमी पवित्र हो जाथे,

सिंह- प्रतीक रूप म हो जाथे। 

श्री निगम- प्रतीक रूप म हो जाथे। त इही सब बात ए अब पुराना सियान मन काए सोच सोच के लिखे हें, बनाए हें ओ तो शास्त्र भी जानथे अउ पुरातत्व भी जानथे, लेकिन आम आदमी ओ ल नइ समझत हे, ओ कर वजह से थोड़ा समस्या हो जाथे त ओ ल जानना भी चाहिए अउ हमर मन के काम बताए के घलो आय।

सिंह- जीवन, नदी मन, पवित्रता के परिचायक ए, हमर धार्मिक विश्वास, सभ्यता के लेकिन निश्चित रूप से अलग अलग ढंग से देखे जाए त मनुष्य के जीवन बर कतका जरूरी ए और कोन प्रकार से ओ मन जीवनदायिनी स्वरूप देथें, ते कर हम ल हमेशा प्रत्यक्ष उदाहरण देखे बर मिलत रथे, चाहे हमर सभ्यता होवय, संस्कृति होवय, हमर खान-पान होवय, हमर यातायात परिवहन ए और जल के आवश्यकता तो हइ हे ओ कर तो पूर्ति करते हावयं, सिंचाई म, खेती बाड़ी म सब जगह तओ ए जीवनदायिनी नदी मन ल हम आज याद करत हन। नदिया मन हमर तो जइसे महानदी हे, राजिम हे, आरंग हे सिरपुर हे, शिवरीनारायण हे, नारायणपुर हे। अइसनहा बहुत अकन स्थान हे जे सिर्फ धार्मिक स्थान नो हय, ए कर संग म व्यापारिक स्थान भी ए, राजधानी भी ए, तओ ओ कर बारे म आपके साथ देखे हुए निगम साहब के

श्री निगम- राजधानी बर अइसे ए कि बहुत जरूरत हे, बहुत पानी लगथे, बिन पानी के राजधानी नइ चल सकय, घर-मकान बनाबे, सेना रइही, घोड़ा रइही, हाथी रइही, ओ कर नहाए धोए बर, खाए पिए बर लगिही, त ए बड़ा अइसे स्थान होना चाहिए, जहां पानी के साधन रहय। और नदिया से बढ़िया साधन तो कुछ हो नइ सकय। जब नदिया नइ रहय त तरिया बना लेथें, लेकिन तरिया म तो इकट्ठा करबे, ए म तो प्रवाहित होत हे। त छत्तीसगढ़ म जब राजधानी के बात चलिस त मोर ख्याल से सबसे जुन्ना राजधानी महानदी के तीर में सिरपुर ह मिलथे। सिरपुर के राजधानी आप देखो ईंटा के मंदिर बने हे उहां। ईंटा के मंदिर का बिना पानी के बना सकिहीं,

सिंह- बहुत जरूरी हे

श्री निगम- बहुत जरूरी हे, भट्ठा लगाए बर, ईंटा बनाए बर, त पूरा राजधानी हर वहां से बने हे, ईंट के मकान भी बने हे वहां, कई ठन मंदिर बने हे अउ अइसे कहे जाथे कि सिरपुर में पहिली अतका खजाना छुपे हे कि पूरा पृथ्वी हर दू दिन तक खा सकत हे, त ए हर महानदी के समृद्धि ए। महानदी के तीर म बस गे, सबे प्रकार के उहां व्यापार भी होत रहिस हे, हम ल जानकारी मिले हे कि वहां अनाज के भंडार रहिस हे। गंध के व्यापारी रहयं वहां, ओकरे नांव से गंधेश्वर महादेव नाम पड़े हे, तओ व्यापारी रहिन हें उहां, चीनी यात्री ह्वेनसांग आए रहिस हे, यात्रा पथ घलो ए। मगध के राजकुमारी के शादी होए रहिस हे इहां के राजा संग, वासटा आए रहिस हे। मगध तक रस्ता रहिस होही तभे तो।

सिंह- चीनी सिक्का, रोमन सिक्का

श्री निगम- चीनी सिक्का, रोमन सिक्का मिलथे, त ए हर व्यापार के बहुत बड़े केंद्र रहिस हे, धर्म के बड़े केंद्र रहिस हे और राजनीति के तो सत्ता रहिबे करिस हे ए म राजवंश के जे भूमिका हे ते तो हइ हे लेकिन ए म बहुत बड़े भूमिका नदी मन के घलो हे अउ ओकरे पाए के आप देखो जहां भी होही राजधानी नगर के नदी के तीर में बसथे।

सिंह- सिरकट्टी ल भी माने जाथे कि बंदरगाह ए, प्राकृतिक रूप से सिरकट्टी म ...

श्री ठाकुर- सिरकट्टी में बंदरगाह डॉ. चन्द्रौल सिद्ध करे हे। फिंगेस्वर करा,

श्री निगम- पांडुका तीर हे। 

श्री ठाकुर- पांडुका के उपर म और वहां नौकायन, नौका से अउ हम जे भुवनेश्वर के संबंध म जे इतिहास हे महानदी के मार्ग से नौका म आदमी आवय, व्यापारी अपन व्यापारिक माल ल ले के आवय, और सरकट्टी म बकायदा बने हुए हे सीधा जा के नाव ह खड़ा होवय अउ अइसे तट के तीर में गड्ढा सीधा, तओ नौका हर अइसे तट के तीर म आ गे, माल उतार चढ़ा, अउ ओकर बाद, ओ हर अइसे गिंजर के अइसे दूसर लाइन म आवय

सिंह- पथरा हावय, संयोग से तट मिल गए हे पत्थर के

श्री निगम- बहुत बढ़िया हे अइसे कि नदिया के तट म पथरा हे पथरा ह घुस गए हे, अइसे लेगबे त तो जमीन मिल जाही नदी के भीतर पथरा मिल गे त ओ ल काट दिन ओ मन, अउ चेनल बना देहे हे, कई ठन डोंगा ल उहां रख सकत हस।

सिंह- धमतरी के पास म लीलर म भी ए प्रकार के माने जाथे कि अइसे व्यवस्था हे

श्री निगम- अइसे लगथे कि पुराना जमाना म ए सब नदी बंदरगाह रहिन हें

सिंह- एक मल्हार के भी नाम मिलथे, मल्लालपत्तन

श्री ठाकुर- मल्लालपत्तन नाम ही सूचक हे कि यहां नदिया के, नौकायन के केंद्र रहे हे, व्यापारिक

सिंह- रोमन सिक्का उहों ले मिले हे, पुराना रोमन सिक्का मिले हे और अलग-अलग तरह के बीड मिलथे, मनका मिलथे

श्री ठाकुर- पुरातात्विक सामग्री के तो भंडार आय

श्री निगम- एक चीज अउ राहुल जी बतावं मैं, छत्तीसगढ़ के नदिया मन के बारे में। पुराण म बड़ा कथा मिलथे, कथा तो नइ, जानकारी बहुत मिलथे। ए बात थोड़ा सा गड़बड़ जरूर रथे कि पुराणकार हर बोलथे कि कोई भी नदिया हर झील से निकलथे, अउ झील हर पहाड़ के तलहटी म बसिही, वहीं से निकलही ओइ पा के जतका नदिया हम पढ़त रहेन स्कूल के जमाना म महानदी, सिहावा पर्वत से निकल के बंगाल की खाड़ी में जाती है, अइसे पढ़त रहेन

सिंह- पुराण मन म अइसनहे नाम मिलथे

श्री निगम- पुराण में तो येही नाम तो नइ मिलय मगर हमर छत्तीसगढ़ के बहुत सारा नदी के नाम मिलथे, मिलान हो जाथे अउ काफी कोसिस करे हें विद्वान मन, जे म चित्रोत्पला, महानदी हो जाथे, शुनि शिवनाथ नदी ए, अरपा हे ओकरो नाम मिलथे कृपा के नाम से, खारुन ल क्रमु बोलथें, त अइसे बहुत सारा नदी मन हें, अभी ठाकुर साहब हरिशंकरी के नाम बताइस, त ए सब हर पुराण म मिलथे, त ए बात से स्पष्ट होथे कि छत्तीसगढ़ के नदिया मन के बारे में पुराणकार जानत रहिस हे, अउ न केवल जानत रहिस, बल्कि बताए हे कि कोन सा नदिया कोन से पर्वत से निकले हे, ओ म थोड़ा से गड़बड़ हो गए हे शायद हमर पुरातत्ववेत्ता अउ भूगोल वाला मन नइ जानत रहिन कोन नदिया कहां से निकलथे, का पाए के जब नदिया पहाड़ से निकलथे त कई ठन धारा आथे, त धारा के कारण भ्रम हो जात रहिस ओ मन ल लेकिन नदिया मन के बारे म जानकारी मिलथे।

श्री ठाकुर- राहुल जी, निगम जी मन जइसे बताइन न कि जइसे पुराण साहित्य में छत्तीसगढ़ के नदिया मन के बारे म उल्लेख मिलथे, बिलकुल मिलथे, ओ कर बारे म कोई कथा नइ मिलय

सिंह- लोक जीवन म खूब कथा हे 

श्री ठाकुर- त ए बिलकुल आप सही कहत हौ, लोकजीवन से जुड़े हे ए हर नदी मन, लोक संस्कृति, नागरक संस्कृति उभय संस्कृति एक साथ 

श्री निगम- छत्तीसगढ़ म दिखथे 

श्री ठाकुर- नदिया मन के माध्यम से मिलथे। 

सिंह- लीलागर बर, सिवनाथ बर, सब बर कहानी हावय, कुछ न कुछ कहानी मिल जाथे, ओ मन ल बड़ा जीवन स्वरूप, ओ मन के मानवीकरण कर के कहानी ओ मन के बहुत प्रचलित हावय।

श्री ठाकुर- लोक संस्कृति में अधिकांश नदी मन के बारे म कहानी मिलथे

श्री निगम- लेकिन ओ ल ठीक से व्यवस्थित करे के आवश्यकता हे। जे म पुराणकार अउ जउन लोक संस्कृति हे, दुनों के जब सम्मिश्रण होही, तब छत्तीसगढ़ के नदिया उपर बहुत सुंदर प्रकास पड़ सकत हे। 

श्री ठाकुर- बिल्कुल सही कहथौ, नागरक संस्कृति अउ लोक संस्कृति दुनों के हम ल दर्शन करे बर, हम ल मिलही

सिंह- दुनों ल शायद मिला के देखे के जरूरत हे, मतलब हमर एक ज्ञान के परंपरा हे, अध्ययन के परंपरा हे, हमर लोक जीवन, हमर अनुभव के परंपरा हावय, अउ ज्ञान के अउ अनुभव के दुनों के एक साथ मिलन जे प्रकृति के रूप म नदी हर हे, सभ्यता के रूप म मानव जीवन हे तओ ए कर सम्मिलन, लेकिन ए सब चीज हर, कहीं न कहीं ए देखे बर मिलथे कि नदी के संग संग होत हावय, नदी के किनारे किनारे म होत हे अउ नदी के पूरा एक अपन संस्कृति हो जाथे, सभ्यता हो जाथे अउ जे कर से सिर्फ न राजनैतिक स्थिति ल, व्यापारिक स्थिति ल भी, आर्थिक स्थिति ल भी अउ जीवन के सांस्कृतिक पक्ष ल हर दृष्टि से नदी के संग जोड़ के देखे जा सकत हे अइसनहा सब हमर नदिया मन हें, हमर जीवनदायिनी नदी मन हें, ठाकुर साहब आप बात म हिस्सा लेय, निगम साहब आपके भी धन्यवाद, बड़ा एक आनंददायक चर्चा रहिस, धन्यवाद।

Wednesday, July 20, 2022

वाट्सएप विनोदेन

विश्वविद्यालय मानद उपाधि भी देते हैं, दूसरी तरफ वाट्सएप जैसे मंचों से जुड़े लोगों ने इन माध्यमों को ‘मानद-विश्वविद्यालय‘ उपाधि दे दी है। मगर लगा कि संस्मरण, डायरी, पत्र की तरह अब एक विधा, वाट्सएप-संवाद भी है। इस साल अपने वाट्सएप संपर्कियों में से, विनोदेन मेरे संदेशों का एक हिस्सा यहां, जिसमें आवश्यक संदर्भ स्पष्ट करने के लिए कुछ जोड़ा-घटाया है, अन्यथा यथावत-

23 जून 2022
* ‘तद्भव‘ का जनवरी 2022 अंक देख रहा हूं, लगभग सारी सामग्री पठनीय, स्तरीय।

21 मई 2022
* बनारस ज्ञानवापी के संदर्भ में याद करते हुए, बनारस में मेरा देखा सबसे पुराना, सुरक्षित और कंदवा तालाब के साथ स्थित, सुंदर परिवेश वाला मंदिर कर्दमेश्वर महादेव का है।

उड़ीसा और दक्षिण भारत (तमिल-कर्नाट) में पारंपरिक स्थपति और शिल्पकार अब भी हैं। उत्तर भारत में मेरी जानकारी में अकेला परिवार सोमपुरा (प्रभाकर ओ.) ही है, जो शिल्प शास्त्र का जानकार और उसके अनुसार मंदिर रचना करता है।

15 मई 2022
* उम्र के साथ धीरे-धीरे अभ्यास कि अपने जीवन और विचारों को यथासंभव सार्वजनिक कर दिया जाय, का हिमायती हूं। आश्वस्त रहें मूल विचार-बोध श्रुति अपरिवर्तित रहता है। स्मृति, देश-काल-पात्र अनुरूप प्रकट होती है और न्याय, तर्क-प्रमाण।

गांधी का हिंद स्वराज, श्रुति है, उपनिषदों वाली प्रश्नोत्तर शैली, उनकी उम्र लगभग 40 वर्ष। आत्मकथा, स्मृति है ही, उम्र लगभग 50 वर्ष। और बाकी सारा लेखन न्याय, जिसके लिए वे कहते हैं कि 1920 के बाद का उनका जीवन सार्वजनिक है। न्याय, तर्क-प्रमाण आश्रित है, अतः उसमें परिवर्तन संभव है।

सुकरात ने कुछ लिखा नहीं, शिष्य अफलातून यानि प्लेटो ने उनसे सुनी, उनकी बातों को अपने ढंग से लिखा, प्लेटो के शिष्य अरस्तू ने इन सभी बातों को अपनी दृष्टि के साथ तर्क की कसौटी पर कसा। तो कह सकते हैं सुकरात-श्रुति, उनके शिष्य प्लेटो-स्मृति, और आगे उनके शिष्य अरस्तू-न्याय।

18 अप्रैल 2022
* सारी गड़बड़ी मालिक और नियंता बन जाने के कारण है।

कुआं, निजी स्तर पर खुदवाया जाए फिर भी नैतिक बाध्यता होती थी कि उसका पानी लेने से अन्य किसी को मना नहीं किया जा सकता।

एक सच्चा किस्सा गनियारी गांव का है। उस गांव के प्रमुख रहे दिघ्रस्कर परिवार के एक सदस्य के साथ मैं गनियारी गया। आधे घंटे का रास्ता, घंटे भर रुक कर वापस आना था, मगर चलते हुए उन्होंने पीने का पानी साथ रखा। मुझे लगा कोई बात होगी, शायद उबला पानी पीते हों, मगर पूछ लिया कि इसकी क्या जरूरत है, प्यास लगे तो गांव में भी पानी तो मिलेगा ही, वे टाल गए। वापसी में मैंने फिर पूछा, तब उन्होंने बताया कि उनके परिवार के बुजुर्ग बिलासपुर में रहते थे, लेकिन गांव में पानी की समस्या देखते गांव वालों के लिए कुआं खुदवाना शुरु किया, इसी बीच किसी की कही बात उनके कान में पड़ी कि मालिक अपने लिए कुआं खुदवा रहे हैं। जिस दिन कुआं खुद कर पूरा हुआ, पूजा-पाठ के साथ पानी निकालना शुरू हुआ, उन्होंने वहां इकट्ठा हुए गांववालों के सामने घोषणा की, यह कुआं हमलोगों ने गांव वालों के लिए खुदवाया है, इसलिए मैं इसका पानी नहीं पियूंगा और मेरे वंश का भी कोई इस कुएं का या गनियारी गांव का पानी नहीं पिएगा।

संभव है इसमें इस पूरी बात में कोई अतिशयोक्ति हो, मगर यह बात उस गांव के बुजुर्गों में भी प्रचलित है।

इसी तरह तेल निकालने का साधन ‘तिरही‘, तेल निकालने का, कोल्हू से पहले का तरीका, जिसमें दो भारी लट्ठों के बीच ‘लीवर‘ के दबाव से तेल निकाला जाता है, सच्चे अर्थों में ‘कोल्ड प्रेस, डबल वर्जिन‘, कच्ची घानी से भी एक कदम आगे यह। रख-रखाव की जिम्मेदारी इसे स्थापित करने वाले की होती है, मगर तेल निकालने का मौका उसके लिए तभी होता है, जब अन्य कोई न हो। अन्य स्थान से आए को प्राथमिकता होती है, क्योंकि जिसकी तिरही है, जिसके घर के सामने स्थापित है, वह तो कभी इस्तेमाल कर सकता है।

वैसे ही कुएं में पानी भरने की प्राथमिकता कुआं-मालिक के बजाय बाहिरी को होती थी, जबकि कुएं का रख-रखाव, सफाई करवाने की जिम्मेदारी, उसकी, अकेले की होती थी। पानी भरते हुए किसी बाहिरी की बाल्टी या बर्तन कुएं में गिरा छूट जाए तो समय-समय पर कुएं में कांटा डाल कर, गिरे हुए सब बर्तन निकलवाना और किसका है, पता कर, उस तक खबर कराना और न पहुंच पाए तो उस तक पहुंचवाना भी कुआं-मालिक की जिम्मेदारी होती थी।

* अंतःस्थित मृत्यु के साथ जीवन का सम-लय।

भ्रम है कि शरीर में जीवन है और मृत्यु आ कर उसे हर लेगी। मृत्यु तो काया में सदैव स्थित है और जीवन प्रतिपल उसमें प्रविष्ट हो रहा है, सांस बन कर, आहार के साथ।

* बरसत हरषत लोग सब करषत लखै न कोइ। तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होइ।

सूर्य का पानी सोखना और बरसात पर तुलसी का दोहा। 

* पानी पुराना रास्ता याद करता है और राह रोकने पर नये रास्ते तलाश भी करता है। अपनी राह भी बदलता है।

अनुपम जी की ‘पानी की अपनी स्मृति‘ की बात को मैं इस तरह समझता हूं कि पृथ्वी पर जल एकत्र होने और निकासी की प्राकृतिक व्यवस्था है। सूखे दिनों में या कम बरसात होने पर हम भूल जाते हैं कि कौन सा स्थान पानी जमाव का, या उसके प्रवाह का रास्ता है। हम निर्माण कर जमाव/प्रवाह को प्रभावित करते हैं, वैकल्पिक नालियां खोदकर कामचलाउ इंतजाम करते हैं, किंतु धरातल पर कंटूर, प्रवाह का रास्ता और जमाव का स्थान वही रहता है, यही पानी की स्मृति है, वह अपने स्थान पर लौटना चाहता है।

ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें पानी निकास के लिए पिछले कुछ वर्षों के आधार पर पुल बनाया गया, अधिक बरसात हुई, तो पानी ने अपना कोई बहुत पुराना रास्ता तलाश लिया और पुल के नीचे से बहा ही नहीं। मैंने ऐसा कटघोरा पेंडरा के बीच जटगा के पास नाले के साथ देखा था। इसी तरह सरगुजा, सूरजपुर जिले में सारासोर स्थल है, महान नदी पर विशिष्ट प्राकृतिक संरचना। इसके आसपास ढेरों आधुनिक निर्माण हुए थे, 5-6 साल पहले भारी बाढ़ आई और सभी निर्माण को ध्वस्त कर दिया। ऐसी ही स्थिति मैंने जांजगीर जिले में महानदी और हसदेव के संगम पर देखी थी।

पानी का जमाव व बहाव। प्रभावित-भुक्तभोगी और लाभार्थी।

17 अप्रैल 2022
# नमक-आयोडाइज्ड
# तेल-रिफाइंड
# दूध-पाश्चराइज्ड
# चावल-पहले पालिश्ड अब फोर्टिफाइड
# पानी-प्यूरीफाइड फिल्टर
# हम-फेसबुक्ड

06 अप्रैल 2022
* शिमला के थापा जी का किस्सा पढ़ा। उनकी आंखों से पहाड़ कोई देख रहा हो, दिल कुछ कुछ कइयों का उसी तरह धड़कता है, पिछले दिनों अपने घटे दिन पर एक छोटा नोट लिखा था-

एक फिल्म-संवाद है- जिस रास्ते से गुजरा हूं, कदमों के निशान भी मिटा दिए हैं, मैंने। ताओ कहता है- अच्छा पथ अपने पीछे कोई लकीर नहीं छोड़ता।

उम्र के पड़ाव पर, कोई दिन ऐसा बीते कि दरवाजे पर दस्तक न हो, फोन की घंटी न बजे, और यह आपको बेचैन न करे, तब मान लीजिए आपने सार्थक जीवन जिया है। स्वयं को जगत की स्मृति से लोप होते देखने सा संतोष, स्थिर आनंद और कुछ नहीं।

31 मार्च 2022
* आप जैसे युवा मित्रों की असहमतियों के लिए मैं लगभग लालायित रहता हूं। जानता हूं कि मेरी आयु और बहुत हद तक मधुर व्यवहार के कारण मेरे विचार, अभिव्यक्ति पर ऐसी प्रतिक्रियाएं उनको रोकती हैं, जिनमें प्रतिवाद हो, इसलिए आप जैसे युवा साथियों की टिप्पणी मेरे लिए बहुत कीमती होती है, मुझे खुद को दुरुस्त करने या कम से कम पुनर्विचार करने का अवसर मिलता है।

(28 मार्च 2020- मैं प्रयास करता हूं मेरे कुछ आलोचक, जिनमें एक आशुतोष हैं, दूसरे मेरे पुत्र अनुपम, तीसरे युवा साथी बालमुकुंद, एक और भाई असीम, जो यह बार-बार आगाह करते हैं कि मेरी बातों में जो विज्डम होता है (और सहज रोचकता) वह मेरे लिखने में नहीं आता। मैं अपने बचाव में बस यही कह पाता हूं कि मैं लेखक नहीं, साहित्यकार तो कतई नहीं, वाचिक परम्परा का ‘गोठकार‘ हूं। मन ही मन थोड़ा प्रयास जरूर करता हूं कि उनकी शिकायत दूर कर सकूं, पर अब तक ओके सर्टिफिकेट दुर्लभ है।🙂)

21 फरवरी 2022
* सम्राट अशोक की पोट्रेट अभिलिखित प्रतिमा है। इस पर कभी अंशुमन तिवारी जी ने स्टोरी की थी, एस्केवेशन रिपोर्ट आया, उपिंदर सिंह ने अपनी किताब में शामिल किया (यह किताब आपके पास होनी चाहिए), यह भी निर्धारित हुआ कि इसी तरह की सांची से प्राप्त कलाकृति भी अशोक की ही मूर्ति होनी चाहिए।

03 फरवरी 2022
* इस नारी प्रतिमा का पिछले वर्षों में स्तन को ढका गया है। 12 वीं सदी की है। स्थानीय समिति ने स्तन पर कंचुकीनुमा कपड़ा लगा दिया।

मूर्तियों पर चांदी की आंख लगाना और carved होने के बाद भी ऊपर से आभूषण पहनाया जाना अब आम है। गनीमत है खजुराहो जैसी मूर्तियों को ढकने की मांग नहीं उठी।

आस्था के चलते देव-प्रतिमाओं का लिंग परिवर्तन, यानि पुरुष प्रतिमा को नारी के रूप में पूजे जाने के भी उदाहरण हैं।

06 जनवरी 2022
* बनारस के लिए मुझे प्रिय भानुशंकर मेहता और मोतीचंद्र जी का लेखन और पुस्तकें, शिवप्रसाद सिंह और काशीनाथ सिंह तो हैं ही। बहती गंगा, शिवप्रसाद मिश्र रूद्र काशिकेय, लाजवाब है। गुलेरी जी के दो लेख और भारतेन्दु जी के तो क्लासिक हैं।