Sunday, January 16, 2022

चकमक – अनुपम

परिवेश में घट रहा स्वाभाविक, कब भाषा ज्ञान के साथ कहानी बनने लगता है और लिपि ज्ञान के बाद लिख जाता है, यह अनुपम के साथ हुआ जब वे छह साल के थे, पहली कक्षा में। एक दृश्य, जिसे ठहरकर उन्होंने देखा, उनके बाल मन में कहानी सा बन गया और वे इसे सबको बताते, बार-बार सुनाते। थोड़े से प्रोत्साहन पर लिख भी डाला। वही तब ‘चकमक‘ बाल विज्ञान पत्रिका के अक्टूबर 1996 अंक में छपा।



चिड़िया और साँप

हमारे घर के पीछे मुनगा का पेड़ था। उसमें बरसात में बया घोसला बनाती थी। एक दिन क्या हुआ कि एक साँप चढ़ने लगा मुनगा के पेड़ पर। घोसला में से अण्डा खाने। सब बया ची-चीं करने लगीं। गौरैया भी आ गई। मैना आकर चिऊँ-चिऊँ करने लगी। सुनकर एक कौवा आ गया। तब तक साँप एक अण्डा खा गया। कौवा के काँव-काँव से डरकर साँप नीचे उतरने लगा। पर कौवा के उड़ जाने के बाद साँप फिर ऊपर चढ़ने लगा। फिर सब चिड़िया चिल्लाने लगीं। इस बार कौवा आया और चोंच से मारकर साँप को भगा दिया।
दार भात चुर गे
मोर किस्सा पुर गे

- अनुपम सिसौदिया, पहली, अकलतरा, बिलासपुर, म.प्र.


सस्टेनेबल डेवलपमेंट के स्नातकोत्तर पत्रोपाधिधरी अनुपम, अब वन-संपदा, जीवन और वन्य-प्राणियों और पर्यावरण जैसे क्षेत्र में रुचि लेते हैं। एक संयोग यह भी कि पत्रिका के इस अंक के मुखपृष्ठ पर मसालों की तस्वीर है, और अनुपम को खान-पान, मसालों, स्वाद, पाक-कला और पाक-शास्त्र में भी खासी रुचि है। स्वास्थ्य, स्वावलंबन, पर्यावरण और अर्थशास्त्र को जोड़ कर देखते हुए कहा करते हैं कि सप्लाई चेन-परिवहन और प्रासेसिंग को यथासंभव सीमित रखना ढेर सारे आदर्श लक्ष्यों की प्राप्ति का सहज तरीका हो सकता है।

श्री अनुपम सिसोदिया, राहुल कुमार सिंह के, यानि मेरे पुत्र हैं।

Saturday, January 15, 2022

लिटिल एंजल - नम्रता

बिलासपुर, जुलाई 1999। नार्मल स्कूल रोड पर ‘लिटिल एंजल स्कूल‘ आरंभ हुआ। पीयूष गुप्ता जी और अनिल अग्रवाल जी ने पूरी तैयारी के साथ इस शैक्षणिक संस्थान की स्थापना की। स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिष्ठित एफ. कोशी मैडम ने प्रिंसिपल पद दायित्व के साथ पूरे संस्थान के अकादमिक स्वरूप की जिम्मेदारी ली। दूसरी तरफ बिना किसी अनुभव वाली नम्रता सिंह, अपनी अवैतनिक सेवाएं देने जुड़ीं, कारण कि उनमें स्वाभाविक बचपन का ध्यान रखते, अनुशासन के साथ बच्चों के प्रति संतुलित भावनात्मक लगाव था। स्कूल में मात्र चार कक्षाएं थीं- प्री-नर्सरी, नर्सरी, केजी-1 और केजी-2 और प्रवेश की आयु दो वर्ष। अपने सीमित आकार के साथ स्कूल चल निकला। 15 अगस्त धूमधाम से मनाया गया और छोटे बच्चों की प्रस्तुति अखबारों की सुर्खियां बनी। इसके बाद किन्हीं व्यक्तिगत कारणों से कोशी मैडम ने संस्थान छोड़ दिया और वरिष्ठता के नाते जिम्मेदारी नम्रता जी यानि सिंह मैडम पर आ गई।

बाद के वर्षों में संचालकों ने स्कूल संचालन से स्वयं को अलग करते संस्थान की पूरी जिम्मेदारी सिंह मैडम को सौंप दी। इसके बाद स्कूल का संचालन दो अन्य भवनों से हुआ, लेकिन स्कूल की प्रतिष्ठा बनी रही। यह स्कूल आगे की पढ़ाई के लिए शहर के बड़े स्कूलों में बच्चों के प्रवेश-परीक्षा में सफलता की गारंटी माना जाता था। अभिभावकों को अलग से तैयारी नहीं करानी पड़ती, बल्कि कुछ बड़े संस्थानों में तो लिटिल एंजल के बच्चों को साक्षात्कार टेस्ट की औपचारिकता कर प्रवेश मिल जाता था।

इस स्कूल की प्रतिष्ठा, बच्चों के रंगारंग वार्षिकोत्सव के कारण थी साथ ही बच्चों के बॉटल-फीड, टिफिन, खाने और टॉयलेट की आदतों में भी सकारात्मक बदलाव आता, कारण होता स्कूल की सामाजिकता और प्रिंसिपल मैडम और पूरे स्टाफ का इस ओर ध्यान देना। अभिभावक, बच्चों की किसी व्यवहारगत समस्या के लिए सिंह मैडम से समय ले कर अलग से मिलने आते। यह भी पता लगा कि कुछ बच्चे अपने माता-पिता की बात पसंद न आने पर कहते कि सिंह मैडम को बता देंगे।
एक वार्षिकोत्सव के अवसर पर
सिंह मैडम का स्वागत भाषण

पांच शैक्षणिक सत्रों के बाद सिंह मैडम के बिलासपुर से रायपुर आ जाने के कारण स्कूल बंद हो गया। इस दौरान सिंह मैडम के पास लगभग प्रतिदिन बच्चों के व्यवहार के किसी अनूठे पक्ष का अनुभवों होता, उन्हें डायरी में लिखने का सुझाव दिया जाता, लेकिन वे ऐसा नियमित न कर पाईं, मगर बाल-शिक्षण से जुड़े अपने अनुभवों को उन्होंने एक लेख का रूप दिया, जो उस दौरान बिलासपुर, नवभारत समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ था। लेख इस प्रकार था-

वर्षा की फुहारों के साथ नया शैक्षणिक सत्र आरंभ होने वाला है। व्यावसायिक पाठ्यक्रमों से लेकर उच्च शिक्षा के लिए अच्छे शिक्षा संस्थानों में दाखिला पाने के लिए भागदौड़ हो रही है। दूसरी तरफ प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के लिए भले ही नई कक्षाओं में प्रवेश हो चुका है, किन्तु किताब-कापी में जिल्द, टिफिन बाक्स और वाटर बाटल सहित यूनिफार्म के कपड़े, जूते-मोजे और टाई की खोज फिर से शुरू हो गई है। कुछ बच्चे उत्साहित हैं तो कुछ को छुट्टियां खत्म होने का अफसोस भी हो रहा है। इसी माहौल में ऐसे भी अभिभावक हैं, जो अपने बच्चे का पहला या दूसरा जन्मदिन मना चुके हैं और इस सवाल का बार-बार सामना कर रहे हैं कि बच्चा स्कूल जाने लगा? ऐसे अभिभावकों के मन में सवाल होता है कि क्या बच्चे की उम्र इतनी हो गई कि उसे स्कूल भेजना शुरू किया जाए? इस सवाल के साथ ढेरों संदेह, आशंकाएं उनके मन में पनपने लगती हैं। यह स्थिति कई बार अभिभावकों और उनके बुजुर्गों के बीच तो कई बार पति-पत्नी के आपसी मतभेद का रूप ले लेती है।

यह अवश्य विचारणीय है कि स्कूल में प्रवेश के लिए बच्चे की क्या उम्र होनी चाहिए? बड़े-बुजुर्ग अपने दिनों को याद करते हैं कि स्कूल में तब तक दाखिला नहीं दिया जाता था, जब तक बच्चा सिर पर से हाथ घुमाकर कान न पकड़ ले यानि लगभग छह साल को उपयुक्त आयु माना जाता था। छह साल तक बच्चे के लिए उसकी प्री-स्कूलिंग पाठशाला, उसका अपना घर ही होता था, जहां वह भाई-बहनों और हमउम्र पड़ोसी बच्चों के साथ खेलते-कूदते बड़ा होता था और सामाजिकता का पहला पाठ पढ़ता था। वे दिन संयुक्त परिवार के थे, जब आमतौर पर अधिकतर बच्चों को खेलने के लिए खुली जगह मिल जाती थी। मौसम और स्थितियों को लेकर बच्चों के लिए इतने कठोर बंधन नहीं हुआ करते थे, हिदायतें जरूर दी जाती थीं। आज की बदली हुई परिस्थिति में स्वाभाविक ही सामाजिक स्थितियों के साथ-साथ अभिभावकों की रोजमर्रा की जिंदगी और पारिवारिक स्थितियों में अंतर आया है तो बच्चों का बचपन भी प्रभावित हुआ है। इस स्थिति में बच्चों के स्कूल में प्रवेश की आयु के साथ धीरे-धीरे प्री-स्कूलिंग (स्कूल-पूर्व शिक्षा) की आवश्यकता के साथ, प्रवेश की उम्र घटती जा रही है।

इस सवाल पर निर्णय लेने के लिए अभिभावकों को कुछ बिंदुओं पर अवश्य विचार करना चाहिए। प्रत्येक बच्चे का जन्म, नई आशा का जन्म होता है। वर्तमान जीवन परिस्थितियों में बच्चों को प्रकृति से साहचर्य, संयुक्त परिवार में मिलने वाला लाड़ प्यार, पालकों की व्यस्तता के कारण बच्चों को मिलने वाला उनका समय और दूसरे बच्चों से मेल-मुलाकात प्रभावित हुई है। इन स्थितियों के कारण आमतौर से अभिभावकों की शिकायत होती है- बच्चे का चिड़चिड़ापन, भूख न लगना, टेलीविजन, वीडियो गेम या कम्प्यूटर से चिपके रहना, दूसरे बच्चे के अपने घर आने पर अथवा स्वयं दूसरों के घर जाने पर असामान्य व्यवहार करना जैसे-अभिभावकों से मारपीट, हिंसक और उत्तेजनात्मक खिलौनों, रिवाल्वर-बंदूक के प्रति उनका बढ़ता आकर्षण आदि। ऐसी स्थितियों के प्रति अभिभावकों को चिन्ता होती है, लेकिन अधिकतर वे इसके कारण के रूप में बदली हुई परिस्थिति को साफ-साफ नहीं समझ पाते। यह स्थिति बच्चों के निश्छल और सहज बचपन सहित विकास की दृष्टि से निसंदेह चिन्ताजनक है।

अतएव वर्तमान परिस्थितियों में यह आवश्यक हो गया है कि यदि आप बच्चे का दूसरा जन्मदिन मनाने की तैयारी कर रहे हैं या मना चुके हैं तो बच्चे के लिए किसी ऐसे स्कूल का पता जल्द कर लीजिए जहां उन्हें खेल-खेल में भाषा, भोजन और सामाजिकता के पाठ सहित उनके स्वाभाविक विकास के साथ उनके शिक्षा की बुनियाद तैयार की जाती है। उनके सहज-स्वाभाविक बचपन के साथ उनमें आवश्यक संस्कार विकसित करने का प्रयास किया जाता है। यह ध्यान रखिए कि आपके बच्चे का लालन-पालन आपसे बेहतर कोई नहीं कर सकता, किन्तु प्रतिष्ठित स्कूलों में, जिनमें बच्चों की संख्या सीमित रखी जाती है, लगातार बच्चों के सम्पर्क में रहने से वे आपके बच्चे की समस्या को समझकर उसका निदान अच्छी तरह से कर सकते हैं। ऐसे स्कूलों में स्वयं जा कर संस्था प्रमुख, शिक्षक-शिक्षिकाओं, पूरे स्कूल स्टाफ व उनकी पृष्ठभूमि की अच्छी तरह जानकारी लेकर ही अपने बच्चे को स्कूल में प्रवेश दिला कर, उसे स्कूल भेजने की तैयारी करें।

श्रीमती नम्रता सिंह, राहुल कुमार सिंह की, यानि मेरी पत्नी हैं और यह लेख लिखने के लिए मैंने उन्हें प्रोत्साहित कर मदद की थी।

Friday, January 14, 2022

मुकुट-प्यारे-हरि

हरि ठाकुर, छत्तीसगढ़-गौरव के शोध, लेखन, प्रकाशन जैसे सभी क्षेत्र में निरंतर सक्रिय रहे। इतिहास को कण-कण समेटने के लिए उनका उद्यम लाजवाब और व्यग्रता अनूठी थी, लेकिन इसके इस्तेमाल में वे संयत रहते थे। इसके ढेरों प्रमाण अब भी उनके योग्य उत्तराधिकारी पुत्र आशीष सिंह सहेजे हुए हैं। यह भूमिका, हरि ठाकुर की लिखावट वाले यहां प्रस्तुत किए जा रहे 7 पृष्ठों के दस्तावेज के लिए है।

यह दस्तावेज मुकुटधर पांडेय द्वारा प्यारेलाल गुप्त को सन 1963 में लिखे पत्र की प्रतिलिपि है। गुप्त जी अपनी संकलित सामग्री, पत्रों आदि की चर्चा ठाकुर जी से करते, उन्हें दिखलाते और ऐसी किसी भी सामग्री की नकल उतार कर उसे सुरक्षित करने में ठाकुर जी देर नहीं करते। यह पत्र उसी का एक नमूना है।

यों तो पत्र का मजमून, गंभीर शोध-आलेख से कम नहीं, जिस पर पूरी टीका लिखी जानी चाहिए, किंतु यहां कुछ बिंदुओं का उल्लेख समीचीन होगा। छत्तीसगढ़-उड़ीसा संबंधों और इतिहास की दृष्टि से रायगढ़-संबलपुर के साथ सारंगढ़ का विशेष महत्व है। इस दृष्टि से दो महत्वपूर्ण ग्रंथों ‘सम्बलपुर इतिहास‘ और ‘जयचंद्रिका‘ का उल्लेख पत्र में आया है। वे ‘पूज्याग्रज‘ संबोधन, पं. लोचन प्रसाद पांडेय जी के लिए प्रयोग करते थे।

प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ में लिखी जाने वाली हिन्दी की रोचक चर्चा है, जिसमें 2 ताम्रपत्रों की प्रतिलिपियां भेजने का उल्लेख है। ये ताम्रपत्र संभवतः वही हैं, जो सारंगढ़ में होने की जानकारी अन्य स्रोतों से मिलती है। (मेरे द्वारा इस संबंध में बहुत पहले प्रयास किया जा रहा है, लेकिन सफलता अब तक नहीं मिली है।)

अठारहवीं सदी मध्य अर्थात् रतनपुर राज पर मराठा भोंसलों के आधिपत्य के पूर्व रतनपुर-सम्बलपुर के तनाव और राजनैतिक षड़यंत्र, अस्थिरता का उल्लेख आया है। इस दौर के इतिहास में सारंगढ़-रायगढ़ राजा की भूमिका का महत्व भी उजागर हुआ है।

रोचक यह भी कि इस लंबे गंभीर शोध-सूचनापूर्ण पत्र का समापन करते हुए लिखा गया है कि- ‘‘इससे अधिक मुझे कुछ नहीं मालूम। जानिएगा।‘‘ और ‘‘लिखते २ थक गया हूं। विशेष विनय लिखने को और कुछ है भी नहीं।‘‘

अपनी ओर से मेरी बात बस इतनी कि धन्य हमारे ऐसे पुरखे। (प्रसंगवश पत्रिका ‘हमर छत्तीसगढ़‘ का अंक-3, जनवरी-दिसंबर 2003 मुकुटधर जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर केंद्रित था, जिसमें डॉ. रमेन्द्रनाथ मिश्र ने अपने लेख में बताया है कि पाण्डेय जी द्वारा 1959 से 1975 के मध्य प्यारेलाल गुप्त जी को लिखे गए लगभग 121 पत्रों को मैंने पढ़ा‘ इस पर श्री मिश्र से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि उनके पास पं. मुकुटधर के बहुत से पत्रों का संग्रह सुरक्षित है, मैंने उनसे निवेदन किया है कि उसे सुरक्षित और सार्वजनिक करने के लिए डिजिटाइज कर वेब पर लाना आवश्यक मानता हूं और इसमें उन्हें मेरे सहयोग की आवश्यकता हो तो मैं सहर्ष तैयार रहूंगा।)

आगे पत्र का पूरा मजमून-

श्रीराम
रायगढ़
२-१०-६३

मान्यवर गुप्त जी,

७-९ का कार्ड कल मिला। कल रात को डा. शर्मा ने उडिया भाषा में प्रकाशित सम्बलपुर इतिहास नामक पुस्तक ला कर दी जिसकी पृष्ठ संख्या ६४० है। लेखक हैं श्री शिवप्रसाद दाश B.A. M.Ed. विश्व भारती प्रेस सम्बलपुर में सन् १९६२ में प्रथम बार मुद्रित हुई है। कीमत है १५) । ये शिवप्रसाद दाश जी वही हैं जिनका नामोल्लेख स्व. पूज्याग्रज की जीवनी में ”सुधी समादर” के शीर्ष में हुआ है। वे सन् १९२४ में अपने इसी ग्रंथ के संबंध में ‘जयचंद्रिका‘ काव्य की नकल लेने को बालपुर पधारे थे। ‘जयचंद्रिका‘ का उल्लेव ग्रंथ में अनेक स्थलों पर हुआ है पर ग्रन्थकार ने पूज्याग्रज का नामोल्लेलख कहीं नहीं किया है जिनके द्वारा जयचंद्रिका पहले-पहल उन्हें देखने को मिली। खैर! प्रायः ४० वर्ष के उनके परिश्रम का फल है यह ग्रंथ। लगभग सौ पुस्तकों से उन्होंने सहायता ली है जिनका नामोल्लेख अंत में किया है, लेखक ने परिश्रम बहुत किया है, तभी ऐसे ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं।

आपको आश्चर्य होगा, मैंने सरसरी तौर से कल रात को ही १२ बजे तक पूरी किताब देख ली जो बातें आपके मतलब की मिलीं, लिख रहा हूं-

(१) प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ में कैसी हिन्दी लिखी जाती थी ‘शीर्षक‘ लेख के काम की दो चीजें मिली- २ ताम्रपत्र जिनकी प्रतिलिपियॉं भेज रहा हूं। इनमें से एक-रतनपुर के राजा राजसिंह के पत्र का समसामयिक है। राजसिंह का पत्र संवत् १७४५ का है, छत्रसाय का लेख संवत १७४७ का। रतनपुर और सम्बलपुर में लगभग ६० कोस का अन्तर है। भाषा-विज्ञान की दृष्टि से इनका अध्ययन बड़ा मजेदार होगा। बस्तर वाला लेख संवत् १७६० का है। दूसरा ताम्रपत्र जैतसिंह का लगभग ८० वर्ष पीछे का है संवत् १८३८ का। अब आपको ४ प्राचीन लेख मिल गए - चारों प्रामाणिक। इन ताम्रपत्रों से तो प्रमाणित होता है कि उस समय सम्बलपुर (उड़ीसा हीराखंड) की राजभाषा हिन्दी थी।

(२) इस ग्रंथ के द्वारा पता चलता है कि सम्बलपुर के महाराजा छत्रसाय की (सं. १७४७ के लगभग) जिनके ताम्रपत्र का जिक्र उपर आया है, १२ रानियां थीं। रतनपुर की हैहय राजकुमारी उनकी अन्यतमा महिषी थीं। इस रानी के गर्भ से बूढ़ा राय का इस जन्म हुआ। नवजात शिशु को देखने के लिए रतनपुर राजा सम्बलपुर गये थे (राजा का नाम नहीं दिया है पर संवत् १७४७ के लगभग रामसिंह रतनपुर के राजा थे जिनका पत्र सं० १७४५ का लभ्य है, यह स्पष्ट है।) रत्नपुर की राजकुमारी पुरुषोत्तम सिंह और मान मिश्र नामक दो राजकर्मचारियों को बहुत मानती थी। अन्यान्य कर्मचारी उनसे ईर्ष्या करते थे। उन्होंने राजा छत्रसाय से चुगली खाई कि रतनपुर के राजा और राजकुमारी बूढ़ाराय को गद्दी पर बिठाने का षड़यन्त्र कर रही हैं। उन्होंने जालसाजी द्वारा मिथ्या आरोप को प्रमाणित कर दिया। इस पर राजा ने माता-पुत्र को जीवन्त समाधि का दण्ड दिया। खबर पा कर रत्नपुर के राजा बड़े क्रुद्ध हुए। उन्होंने नागपुर के भोंसलों की सहायता से सम्बलपुर पर आक्रमण कर छत्रसाय को बन्दी बनाया। छत्रसाय क्षमा-भिक्षा मांगने पर मुक्त हुए। उन्होंने शेष जीवन पुरी क्षेत्र में व्यतीत कर पाप का प्रायश्चित किया। पुरी में उनकी मृत्यु हुई।

ज्ञातव्य यह है कि क्या रतनपुर के इतिहास से इन बातों की पुष्टि होती है?

(३) रायगढ़ और सारंगढ़ के केवल उन्हीं राजाओं का उल्लेख यहां पाया जाता है जिनका सम्बलपुर के इतिहास से सम्बंध रहा है, यों वे सम्बलपुर के करद राजा थे, अठारह गढ़ों में सारंगढ़ और रायगढ़ भी थे।

सारंगढ़ के राजा बड़े पराक्रमी थे। उन्होंने २ बार सम्बलपुर के महाराजाओं को राज्य-भ्रष्ट होने पर उनका सहाय्य कर उन्हें फिर से गद्दी पर बिठाया। वे पहले देवान कहलाते थे।

(अ) नरवर राय के पुत्र भीखराय देवान ने महाराजा बलभद्र साय के लिए बौत्नू-विजय करके उनसे ‘सोहागपुर सरखों‘ नामक १२ गॉंव पुरस्कार में प्राप्त किए थे। भीखराय देवान ने संवत् १६२४ से १६४४ तक राज्य किया था।

(ब) सम्बलपुर के महाराजा छत्रसाय के समय सैनिकों ने विद्रोह कर राजधानी को हस्तगत कर लिया। छत्रसाय अपने पुत्र अजित सिंह को साथ लेकर सारंगढ़ आए। उस समय उद्योतसाय सारंगढ़ के देवान थे। सैनिक विद्रोह का हाल पा कर उन्होंने अविलम्ब अपनी सेना सज्जित कर महाराजा सहित उत्तराभिमुख यात्रा की। वे रायगढ़ पहुंचे रायगढ़ में उस समय ठाकुर दुर्जय सिंह सम्बलपुर के सहायक सामन्त राजा थे। उन्होंने भी अपनी सेना उनके साथ कर दी। सारंगढ़ और रायगढ़ की सेना ने मिलकर सम्बलपुर के सैनिक विद्रोह का दमन किया। महाराजा छत्रसाय ने प्रसन्न होकर किकरदा परगने से ४२ गांव उद्योतसाय को ताम्रपत्र के द्वारा पुरस्कार में दिए। (संवत् १७१७)

(स) सबलपुर के राजा जैतसिंह के समय अकबर राय दीवान सर्वेसर्वा बन गया। महाराजा उसके भय से मंडला भाग गए। सारंगढ़ के राजा विश्वनाथ साय अपनी सेना लेकर सम्बलपुर गये। अकबर राय देवान को मार कर जैतसिंह को फिर से गद्दी पर बिठाया। तब उन्हें सरिया का परगना इनाम में मिला। इसका प्रमाण जैतसिंह द्वारा प्रदत्त सं० १८३८ का ताम्रपत्र है।

(4) रायगढ़ के सम्बंध में इतना ही लिखा है- ‘‘ठाकुर दुर्जय सिंह महाराजा छत्रसाय के समय सम्बलपुर के सहायक सामंत राजा थे। वे गौड़ (गोंड) वंश के थे। छत्रसाय ने उन्हें राजा की उपाधि दी थी। दुर्जय सिंह के पूर्व पुरुष नागपुर के अन्तर्गत बैरागढ़ (चांदा?) से आकर प्रथम फुलझर में रहे, उसके बाद सारंगढ़ और अंत में, रायगढ़ आए जहां उन्होंने अपने वंश की प्रतिष्ठा की। परवर्ती काल में रायगढ़ के राजा को बरगड़ का परगना भी प्राप्त हो गया। बाज पक्षी इनका वंश या राजचिन्ह है।

मदनसिंह1 जिसका जिक्र आपने अपने कार्ड में किया है दुर्जय सिंह के पहले हुए या पीछे। मदन सिंह का काल निर्णय पं. ज्वा. प्र. मिश्र ने यदि किया होगा तो पता चलेगा। दुर्जय सिंह महाराजा छत्रसाल के समय थे जिनका काल संवत् १७४७ के लगभग है।
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रायगढ़ के राजवंश के संबंध में मुझे इतनी और जानकारी है कि ईस्ट इंडिया कम्पनी का राज्य जब बंगाल और नागपुर में भोसलों का राज्य था तब राजा जुझार सिंह के समय रायगढ़ का राज्य बड़ा शक्तिशाली था। वह उन दोनों बड़े राज्यों के मध्य में Buffer State के समान था। जुझार सिंह के साथ ईस्ट इंडिया कम्पनी की संधि हुई थी। जुझार सिंह ने ही शायद बरगड़ का किला सर किया था। रायगढ़ राज्य की खरसिया तहसील में बरगड़ का परगना है। मैं जब राजशाही में दण्डाधिकारी था मैंने बरगड़ परगने का दौरा किया था, तभी बरगड़ के कुछ भग्नावशेषों को जा कर देखा था।

जुझार सिंह का समय क्या है, नहीं कह सकता। पं. ज्वा. प्र. जी ने शायद कुछ जानकारी दी हो। इससे अधिक मुझे कुछ नहीं मालूम। जानिएगा। लिखते 2 थक गया हूं। विशेष विनय लिखने को और कुछ है भी नहीं।

आपका
मुकुटधर

सारंगढ़ के किसी ऐसे सज्जन का नाम मुझे नहीं मालूम जो आपको आवश्यक जानकारी दे सके।


मुकुटधर पांडेय जी का एक अन्य पत्र, जिसका महत्व स्वयं स्पष्ट है-
पोस्ट कार्ड पर रायगढ़ डाकखाने की मुहर 23.1.88 की
तथा अंबिकापुर 28.1.88 की है।

श्रीराम

रायगढ़ 22-1-88

(ठीक दिखता नहीं अन्दाज़ से लिख रहा हूं। जानिएगा।)

श्री छात्राएं
शासकीय कन्या उ.मा. शाला
अम्बिकापुर

आप लोगों का मुद्रित पत्र
प्राप्त हुआ। धन्यवाद।
आप लोगों को यह जान कर
दुःख होगा कि इस समय
(93 वर्ष की अवस्था में)
मोतियाबिन्दु से पीड़ित हूं-
आंखें काम नहीं कर रही हैं,
डा. ऑपरेशन की सलाह दे रहे हैं,
पशोपेश में हूं।

मुझे इस बात का अत्यन्त
खेद है कि मैं आप लोगों की
मांग पूरा करने में असमर्थ हूं।
मेरी बहुत सी कविताएं
संग्रह ग्रन्थों में आपको
मिलेंगी। आप उनमें से कोई

कविता अपने संग्रह के लिए
ले सकती हैं। मुझे कोई
आपत्ति नहीं। इस अवस्था में
चित्र भी भेजने में असमर्थ हूं,
क्षमा चाहता हूं।

प्रस्तावित संग्रह ग्रन्थ की
सफलता के लिए शुभकामना
सहित, आप लोगों का

मुकुटधर पाण्डेय

श्री छात्राएं
द्वारा प्राचार्य
शा.क.उ.मा. शाला
अम्बिकापुर (म.प्र.)
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हरिप्रसाद अवधिया जी के उपन्यास की लिए उनकी शुभाशंसा का नमूना भी उल्लेखनीय है-

‘मुझे सबसे बड़ी प्रसन्नता यह है कि अवधिया जी ने ‘धान के देश में‘ नाम देकर पहली बार उपन्यास को रचना की है। उपन्यास रचना में उन्हें कितनी सफलता हुई है इसका निर्णय तो सुविज्ञ आलोचक और मर्मज्ञ पाठक ही करेंगे। अवधिया जी पर मेरा विशेष स्नेह है। अपने स्नेह पात्रों की रचनाओं में हम लोग गुण-दोष की विवेचना नहीं करते। मैं तो यही कहूँगा कि उनकी इस प्रथम कृति से मुझे असन्तोष नहीं हुआ है। मुझे यह आशा भी है कि जब वे अन्य उपन्यास लिखेंगे तो उन्हें उत्तरोत्तर अधिक से अधिक सफलता प्राप्त होगी।‘
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