Thursday, September 16, 2021

अबूझमाड़ - गिरधारीलाल

अबूझमाड़-प्रकृति तथा संस्कृति

अबूझमाड़ बस्तर जिले का दुर्गम तथा अविकसित क्षेत्र है। नृतत्वशास्त्रियों के द्वारा अबूझमाड़ के जन-जीवन का विस्तृत अध्ययन किया गया है। यह भी माना जाता है कि प्रागैतिहासिक काल के संस्कृति की झलक अबूझमाड़ के जनजातियों के मध्य अभी भी देखा जा सकता है। बस्तर अचल के अबूझमाड़ की भौगोलिक सीमा में निवास करने वाली माड़िया जनजाति को अबूझमाड़िया कहते हैं। इस क्षेत्र में सातवी सदी ई. का बौद्ध चैत्य भोंगापाल में तथा 7वीं-8वीं सदी ई. के शिवमंदिर के अवशेष छोटे डोंगर में उत्खनन से प्रकाश में आये हैं। 11वीं सदी ईसवी के पश्चात के यहां स्थापत्य अवशेषों का पटाक्षेप हो जाता है।

अबूझमाड़ का परिवेश प्रकृति के अत्याधिक सन्निकट है तथा जीवनयापन के न्यूनतम आवश्यकताओं पर अवलंबित है। वनों पर आधारित जीवन शैली इन्हें, सहज प्राकृतिक जीवन जीने के लिए उत्प्रेरित करती है। गोंड़ी बोली में ‘माड़‘ का अर्थ ‘पहाड़‘ होता है। इसी अर्थ में बस्तर जिले के अंतागढ़-नारायणपुर के तहसील के पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले अबूझमाड़िया कहे जाते है तथा मैदान में रहने वालों को दण्डामी माड़िया। अबूझमाड़ियों का मुख्य पर्वाेत्सव ककसार है, जो लगभग-लगभग ग्रीष्म ऋतु में मनाया जाता है। इसी अवसर पर मड़ई भी भरता है। गांव-गांव से स्थानीय लोक देवी-देवताओं का लाट-पताका सहित इस मंडई में सम्मिलित होकर मड़ई में घूमते हैं। इसी अवसर पर ककसार नृत्य आयोजित होता है। दण्डामी माड़ियों का गौर-नृत्य लय तथा ताल के लिए प्रसिद्ध है। इस नृत्य में स्त्री तथा पुरूष दोनों सम्मिलित होते हैं। पुरूष सिर पर गंवर सींग पहनकर तथा गले में ढाले बांधकर ठुमकते-मचलते घूम-घूमकर नाचते हैं तथा स्त्रियां पृथक झुंड में मंथर गति से तालबद्ध नाचती गाती हैं। गोंड़ों के जीवन में भी जन्म, विवाह तथा मृत्यु प्रमुख संस्कार हैं, जिन्हें वे अपने पारंपरिक ढंग से मनाते हैं। विवाह मुख्य रूप से मंगनी करके, अपहरण करके अथवा प्रेम विवाह के रूप में प्रचलित है। गोंड़ों के विवाह में भोज का भी विशेष महत्व है, जिसमें शराब-लांदा तथा बकरा और सूकर मांस का खूब उपयोग किया जाता है। इनमें मृत्युभोज की भी परंपरा पाई जाती है।

माड़िया संस्कृति के श्रेष्ठ उपादान में मृतक स्तंभ विशिष्ट हैं। डार्विन के विकासवाद अथवा हिन्दू पौराणिक ग्रंथों के अवतारवाद के सदृश्य इनके गोत्र सर्प, कछुआ. बकरा आदि मान्य हैं जो विकासवाद अथवा अवतारवाद के किसी न किसी अंश को व्यक्त करते हैं। माड़िया जनजाति के मृतक स्तंभों में सृष्टि के जीवजगत के सहित प्रकृति के दृश्यमान प्रमुख प्रतीक सूर्य तथा चन्द्रमा, पर्वत, वन, नदी, वन्य पशु, पालतू पशु, कृषि कर्म, विवाह, आखेट आदि का अंकन सामान्य रूप से पाया जाता है। इनके चिंतन की प्रक्रिया में यही सर्वाेत्तम तथ्य है कि प्रकृति एवं पर्यावरण के अन्योन्याश्रित संबंध को प्रमुखता से रूपायित करते हैं। मृतक स्तंभों में कलात्मक पक्ष भी मुखरित होता है। अधिकांश आकृति चारों ओर से सम्मुख दर्शन युक्त होते हैं तथा गतिशील विषय वस्तु को उभारदर क्षैतिजीय क्रम में निर्मित करते हैं। इनके इस कला कर्म में आकृतियां उभारदार (high relief) क्रम में निर्मित होती हैं। स्तंभ का आकार चौपहलू होता है तथा शीर्ष पर घट-कुंभ निर्मित रहता है।

माड़िया जनजाति कृषिजीवी, पशुपालक तथा आखेटजीवी होते हैं। मद्य तथा मांसाहार के ये अभ्यस्त होते हैं। इन्हें वन्य से प्राप्त होने वाले खाद्य वनस्पति के साथ वनौषधियों का भी पर्याप्त ज्ञान होता है। ये अपने रोगों की चिकित्सा पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान के आधार पर करते हैं। अदृश्य शक्ति तथा दूषित आत्मा को ये रोगों का कारण मानते हैं, जिसका शमन वे सिरहा-गुनिया के द्वारा बताये गए बलि तथा पूजा उपासना से करते हैं।

माड़िया जनजाति के जीवन क्रम में प्रकृति का व्यतिक्रम नहीं है, क्योंकि वे प्रकृति को एक आराध्य के रूप में मान्यता प्रदान करते हैं। इसलिए भूमि, जल, वृक्ष की उपासना अपने तौर तरीकों से करते हैं। उनके मान्यता के अनुसार उनके देवी-देवताएं वृक्षों पर वास करते हैं। देवगुड़ी ग्राम का सबसे पवित्र स्थल होता है, जिसमें ग्राम देवी अथवा देवता के रूप में शिलाखंड तथा कभी-कभी स्थानीय देवी-देवताओं की गढ़ित प्रतिमा एवं त्रिशूल रखे रहते हैं।

माड़िया जनजाति की कृषि पद्धति में वनों को काटकर तथा झाड़ झंखाड़ को जलाकर कृषि करने की पूर्व पद्धति अब संकुचित होती जा रही है तथा स्थिर कृषि को अपनाने लगे हैं। इनके कृषि पद्धति में एक ही जाति के ऐसे वानस्पतिक प्रजाति को अलग-अलग जगहों में बोया जाता है, जिससे अनावृष्टि अथवा अतिवृष्टि की स्थिति उत्पन्न होने पर बोई गई कोई न कोई एक फसल कुछ अंशों में प्राप्त हो सके। धान की विभिन्न जातियों, (मरहान धान, गटका, कोसरा, चिकमा, मड़िया) को उगाकर वे मौसम की प्रतिकूलता में भी कम अधिक दिवसों में तैयार होने वाले एक ही प्रजाति के फसल चक्र को अपनाकर कुछ प्रतिशत फसल प्राप्त कर ही लेते है । इस प्रकार से वे आधुनिक संकरित उपज देने वाले फसल की अपेक्षा सामान्य उपज प्राप्त होने वाले परंपरागत बीजों से तैयार होने वाले फसल को ही महत्व देते हैं क्योंकि ये उनकी दृष्टि में परीक्षित हैं। कम भूमि में कृषि करने के कारण वे ऐसे पौधे लगाते हैं, जिनसे उनकी आवश्यकता कम वस्तु से पूर्ति हो सके। इस प्रकार के उदाहरण में मिरची की एक विशेष जाति ‘धान मिरी‘ विशिष्ट है। धान के आकार की इस जाति के एक मिर्च से लगभग 15 से 20 व्यक्तियों के साग में तीखापन निर्मित हो जाता है। इसी क्रम में वे ऐसे सेम की जाति विशेष रूप से लगाते हैं जो आकार में छोटी होती है तथा गूदा भले ही कम हो परन्तु फलियों और बीजों की संख्या अधिक होती है, जो ग्रीष्म ऋतु में उनके लिए दाल की पूर्ति करती है। लौकी की एक ऐसी ही विशिष्ट जाति हाथी सूंड (elephant trunk) को सीधे पेड़ पर चढ़ा देते हैं जो उसके लंबे और भारी बनावट के बोझ को सम्हालता है। इसी प्रकार कुम्हड़े की नार को भी झोपड़ी के छप्पर पर चढ़ा देते हैं।

प्रकृति तथा जैव विविधता को सुरक्षित रखने की यह कला पूर्वजों से उन्हें प्राप्त होती चली आई है। मुर्गी माड़ियों के लिए सिर्फ एक आहार अथवा बलि की वस्तु नहीं है, बल्कि एक घरेलू (पालतू) कीटभक्षी मित्र पक्षी है। जो घूरे, कूड़े, पशुओं के कोठे में गिरे हुए किलनी आदि कीटों को अपने पंजों से खोद-खोदकर चुन लेती है। इस प्रकार से वह आंगन के कीड़ों का विनाश करती है। देशी प्रजाति की इन मुर्गियों में ग्रीष्म का ताप सहने के साथ-साथ वर्षा ऋतु के आर्द्रता को सहने की भी असीम क्षमता होती है। साथ ही साथ सर्प, बिल्ली, सियार के आक्रमण से बचने के लिए फुदक कर उड़ने की कला में भी चपल होते है। प्राकृतिक सुरक्षा के कवच के रूप में इन मुर्गियों को प्रकृति से रंग बिरंगे पंख मिले रहते है, जो इनके शत्रु जन्तुओं को दिग्भ्रमित करते है।

माड़िया जनजाति ही नहीं अपितु वनों के मध्य ग्राम में निवास करने वाले अन्य निवासी जाने-अनजाने जैव विविधता के साथ-साथ प्राकृतिक चक्र को भी विनष्ट होने से बचाने के लिए एक इकाई के सदृश्य उपयोगी है। चाहे अबूझमाड़ के माड़िया हों अथवा मैदानी भाग के दंडामी माडिया, इन सभी के परिधान, श्रृंगार, जीवन यापन की कला में हम इस पारंपरिक जीवन शैली के उपक्रम को अधिक से अधिक प्रोत्साहित करें, जिससे हमारी जैव विविधता तथा पर्यावरण के बीच बढ़ता असंतुलन कम से कम वन क्षेत्रों के चतुर्दिक क्रमशः बाधित होता रहे।

-जी.एल. (गिरधारीलाल) रायकवार, पुरातत्ववेत्ता
दिनांक 12.9.2002

यह नोट संभवतः अब तक अप्रकाशित है, सार्वजनिक नहीं हुआ है। शायद अंतिम रूप भी नहीं दिया गया है। इस लेखन में मुझे खास लगता है कि ऐसा व्यक्ति जो किसी समुदाय को अपने से अलग तो देखता है, लेकिन अजनबीपन से नहीं, इस तरह मानों हमेशा से साथ रह रहे हों, पैदाइशी जान-पहचान हो, कभी इस तरह देखा-सोचा न हो कि उस समुदाय के बारे में कुछ कहना होगा और ऐसा मौका आ जाए, शायद तभी इस आत्मीय तटस्थता और किसी अन्य समुदाय के प्रति सहज सम्मान, जो स्वयं से न्यूनाधिक नहीं, सम है, का भाव अभिव्यक्त हो सकता है।

बात की बात, मूलतः बस्तर निवासी रायकवार जी अपने लिखे के प्रति फक्कड़ और उदासीन रहने वाले ‘अवधूत‘, बात-बात में ‘बाबा कीनाराम‘ उचारते हैं। उनका यह नोट एक उदाहरण है। अपने लिखे पर नाम न देना, अपने लिखे को दूसरों को दे देना कि वे चाहें तो उसे अपने नाम से छपा लें, दूसरों की फरमाइश पर किसी (जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहों) के लिए भी लिख कर दे देना, वे चुटकियों में करते हैं और ‘नेकी कर दरिया में डाल‘ से एक कदम आगे, शायद इसे कोई नेकी मानते ही नहीं। तस्वीर कुछ मायनों में उन्हीं के मुकाबले फक्कड़ देवज्योति बनर्जी ने ली है, जो दोनों के यानि गिरधारी-देव चरित का कुछ हद तक अनुमान करा सकती है।

’एक फौजी अफसर हमारे बिलासपुर दफ्तर में आए, बतौर परिचय हाथ मिलाया, उन्होंने अपना नाम बताया, बातें होने लगीं, जाते वक्त मेरी ओर देखते रायकवार जी से कहा, आप दोनों का नाम और फोन नंबर (तब दफ्तर वाला) नोट कर दे दीजिए। रायकवार जी ने लिख कर पुरजा थमाया। अफसर ने उनसे पूछा- राहुल सिंह? (मेरा नाम ऊपर लिखा था और अपना नाम नीचे), रायकवार जी ने मेरी ओर इशारा किया। अफसर खड़े हुए और रायकवार जी से कहा- ‘सैल्यूट‘।

उनकी तमीजदार इस लिक्खाड़ी प्रतिभा का एक नमूना मेरे लिए अविस्मरणीय है। किसी बड़े आयोजन की तैयारी में महामहिम राज्यपाल, माननीय मुख्यमंत्री और माननीय विभागीय मंत्री के भाषण के लिए नोट बना कर देना था और वह भी दो-दो, यानि शुभारंभ के लिए अलग और समापन के लिए अलग। तय नहीं था कि कौन, किस अवसर पर आएंगे, लेकिन तैयारी तो चाक-चौबंद करनी थी। रायकवार जी का चमत्कार, एक तरफ इस्तेमाल हुए कागज की गड्डी ले कर तुरंत बैठ गए और घंटे भर में इस प्रयोजन के छह नोट तैयार कर दिया। उन पर अंकित नहीं था कि कौन, किसका, किस अवसर का है। लेकिन कमाल की बात कि उसे पढ़ कर यह समझने, तय करने में कोई परेशानी नहीं हुई कि कौन सा, किसके लिए और किस अवसर के लिए लिखा गया है।

पुनश्च-
अबूझमाड़ विभिन्न कारणों से चर्चा में रहा है, अब भी है। उनमें से उल्लेख एडवर्ड जे. जे की पुस्तक ए ट्राइबल विलेज आफ मिडिल इंडिया (Edward J. Jay, A Tribal Village Of Middle India) का और उसके साथ जुड़ी बस्तर वाले गुलशेर खां ’शानी’ की 1986 में प्रकाशित पुस्तक ‘शालवनों का द्वीप‘ का (शुभ्रांशु चौधरी की पुस्तक ‘उसका नाम वासु नहीं - Let's Call Him Vasu' में लिखते हैं कि ‘अबूझमाड़ एक गोंडी शब्द है अबूझ का अर्थ साल और माड़ का अर्थ जंगल है।‘)। जे की पुस्तक एन्थ्रोपोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया से मेमायर नं. 21, 1968 सन 1970 में छपी थी। इस पुस्तक में श्री नोरोन्हा का नाम आर. पी. के बजाय न जाने क्यों एन. पी. नरोन्हा 'Shri N. P. Noronha, I.C.S., the then Commissioner Of Raipur District' और 'रायपुर जिले के कमिश्नर'? (न कि रायपुर संभाग के) उल्लिखित है। बहरहाल, बाद के वर्षों में किसी विदेशी द्वारा किए महत्वपूर्ण शोध कार्य के रूप में यह विशेष उल्लेखनीय है और शानी की पुस्तक मानों इसकी आवश्यक पूरक। एडवर्ड जे. जे का शोध 1958-60 के दौरान किए गए फील्ड वर्क का परिणाम है। शानी की पुस्तक की भूमिका जे ने जोहार लिख कर पूरा किया है, तब वे कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी, हेवर्ड, संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रोफेसर थे।

Wednesday, September 15, 2021

जैन परंपरा - पत्रक

छत्तीसगढ़ में जैन धर्म- पुरातत्व एवं परंपरा

वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य का भू-भाग प्राचीन काल में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। ऐतिहासिक काल में उड़ीसा का सीमावर्ती कुछ भू-भाग भी इसमें सम्मिलित था। यह भू-भाग प्राचीन काल में सघन वनों से आच्छादित तथा दुर्गम रहा है, तथापि विभिन्न संस्कृतियों की पारस्परिक समन्वय स्थली भी था। ऐतिहासिक काल में इस भू-भाग से शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन धर्म के प्रमाण प्राप्त होने लगते हैं। इस श्रृंखला में मल्हार, सिरपुर, आरंग, महेशपुर, धनपुर, रतनपुर, बकेला, कुरुसपाल, बारसूर अनेक स्थलों में विविध धर्माे से संबंधित पुरावशेष प्राप्त होते हैं। यह उल्लेखनीय है कि उपरोक्त स्थल तत्कालीन राजधानी, धार्मिक केन्द्र अथवा व्यापारिक केन्द्र के रूप में विकसित रहे हैं। इन स्थलों में जैन स्मारकों के निर्माण में तत्कालीन राजवंशों के अतिरिक्त धनाढ्य वर्ग तथा जन-साधारण ने भी विपुल योगदान दिया।

विद्वानों के मतानुसार सरगुजा जिले के रामगढ़ की पहाड़ी में स्थित जोगीमारा गुफा की छत पर निर्मित चित्र जैन धर्म से संबंधित है। निरंतर प्राकृतिक दुष्प्रभाव के कारण ये चित्र अत्याधिक धूमिल तथा अस्पष्ट हो चुके हैं। रामगढ़ की गुफा में उत्कीर्ण अभिलेख के पुरालिपि प्रमाण के आधार पर इन्हें दूसरी-तीसरी ईस्वी पूर्व (मौर्यकाल) का माना जाता है। द्वितीय शती ईस्वी के कुमारवरदत्त के गुंजी अभिलेख (दमउ दहरा, सक्ती) में उल्लेखित उषभ तीर्थ को प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ से संबंधित माना जाता है। उक्त आधार पर दक्षिण कोसल में जैन धर्म का प्रादुर्भाव ईसा पूर्व से माना जा सकता है तथापि प्रारंभ से ऐतिहासिक काल के 6वी शती ईस्वी के मध्य की जैन प्रतिमायें तथा स्थापत्य अवशेष इस क्षेत्र से अनुपलब्ध है।

सातवीं आठवीं शताब्दी ईस्वी से जैन धर्म से संबंधित प्रतिमायें छत्तीसगढ़ में उपलब्ध होने लगती हैं। कालक्रम की दृष्टि से छत्तीसगढ़ में जैन धर्म से संबंधित कलात्मक प्रतिमायें 7वीं-8वीं शताब्दी ईस्वी से लेकर 12वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य प्राप्त होती हैं। उपरोक्त प्रतिमायें सोमवंशी, कलचुरि, फणिनाग एवं छिन्दक नाग शासकों के काल में निर्मित हुई हैं। सोमवंशी शासकों के द्वारा निर्मित जैन कलाकृतियों का प्रमुख केन्द्र मल्हार रहा है। इसके अतिरिक्त सिरपुर से भी जैन प्रतिमायें प्राप्त हुई हैं। त्रिपुरी के कलचुरि शासकों के काल में सरगुजा जिले के महेशपुर (उदयपुर के समीप) एवं धनपुर (पेण्ड्रा के सन्निकट) में जैन मंदिर के भग्नावशेष हैं। रतनपुर के कलचुरियों के काल में समग्र छत्तीसगढ़ में जैन धर्म की लोकप्रियता में प्रचुर वृद्धि हुई। इस काल के जैन पुरावशेष रतनपुर, मल्हार, आरंग, नगपुरा, नेतनागर (रायगढ़) आदि स्थलों से मिलते हैं। कवर्धा के फणिनाग शासकों के काल के जैन स्थापत्य अवशेष हाफ नदी के किनारे बकेला एवं कटंगी नामक ग्राम से प्राप्त हुये हैं। बस्तर के छिन्दक नाग शासकों के काल में ग्राम कुरुसपाल एवं बारसूर में जैन पुरावशेष उपलब्ध हुए हैं। तत्कालीन राजवंशों के धर्म निरपेक्षता तथा उदारता के फलस्वरूप जैन धर्म छत्तीसगढ़ में पर्याप्त लोकप्रिय रहा है।

स्मारक-स्थल
छत्तीसगढ़ में प्राचीन काल का एक मात्र अवशिष्ट जैन मंदिर रायपुर जिले के आरंग में विद्यमान है। यह भांड देवल के नाम से प्रसिद्ध है। पश्चिमाभिमुखी यह मंदिर 11वीं शती ईस्वी में निर्मित है। मंदिर का गर्भगृह तथा शिखर भाग अवशिष्ट है। मंदिर ताराकृति भू-योजना पर आधारित है। मंदिर की जगती पर गजथर, अश्वथर और नरथर निर्मित है। जंघा में प्रतिमायें दो तल में सुसज्जित है जिस पर जैन शासन देव देवियां, दिक्पाल, अप्सरायें, मिथुन प्रतिमायें, उपासक आदि प्रमुखता से दर्शायी गई है। जंघा पर हिन्दू धर्म से संबंधित कुछ प्रतिमायें भी दृष्टव्य है। गर्भगृह में शांतिनाथ, श्रेयांसनाथ एवं अनंतनाथ की विशालकाय प्रतिमायें प्रतिष्ठापित है। ये प्रतिमायें तालमान की दृष्टि से अत्यन्त संतुलित हैं। काले ओपदार प्रस्तर पर निर्मित इन प्रतिमाओं में अद्भुत लावण्य है तथा अजस्र शांति प्रवाहित है।

छत्तीसगढ़ अंचल में जैन धर्म से संबंधित स्थलों में आरंग सर्वाधिक प्राचीन स्थल ज्ञात होता है। महाशिवगुप्त बालार्जुन के सिरपुर से प्राप्त ताम्रपत्र लेख में आरंग का पूर्व नाम ‘अर्य्यंगाभोगिय‘ उत्कीर्ण है। सातवीं शती ईस्वी से पल्लवित जैन धर्म की उदात्त परम्परा में आरंग कलचुरि काल तक छत्तीसगढ़ का महत्वपूर्ण स्थल बना रहा है। दुर्ग जिले के नगपुरा ग्राम में जैन मंदिर के भग्नावशेष विद्यमान हैं। यह मंदिर भी कलचुरि कालीन है। वर्तमान में इस स्थल पर तीर्थंकर पार्श्वनाथ की मूल प्रतिमा प्रतिष्ठापित है तथा नाग बाबा के रूप में सार्वजनिक रूप से पूजित है।

बस्तर जिले में जैन धर्म से संबंधित प्रतिमायें तत्कालीन छिन्दक नागवंशी शासकों के काल में निर्मित हैं। कुरुसपाल से प्राप्त सोमेश्वर देव के अभिलेख में जिनग्राम का उल्लेख है। कुरुसपाल के समीपस्थ ग्रामों से जैन धर्म से संबंधित आदिनाथ, पार्श्वनाथ के अतिरिक्त अन्य अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। जगदलपुर नगर में भी जैन धर्म से संबंधित प्रतिमायें स्थानीय देवालयों में रखी हुई हैं। संभवतः ये प्रतिमायें कुरुसपाल से संग्रहित की गई है। बस्तर जिले के विशेष महत्वपूर्ण पुरातत्वीय स्थल बारसूर में भी जैन धर्म से संबंधित प्रतिमायें संग्रहीत हैं। सरगुजा जिले के महेशपुर नामक स्थल में त्रिपुरी के कलचुरियों के काल में निर्मित जैन मंदिर के भग्नावशेष विद्यमान हैं। इस स्थल में तीर्थकर आदिनाथ की प्रतिमा मूल रूप में प्रतिष्ठापित है। यह प्रतिमा अत्यन्त भव्य है तथा अष्टप्रतिहार्य युक्त है।

कवर्धा जिले के परिसीमा में प्रवाहित हाफ नदी के तट पर बकेला ग्राम के सन्निकट फणिनाग शासकों के काल में निर्मित जैन मंदिर के भग्नावशेष हैं। यहां से संग्रहीत तीर्थंकर पार्श्वनाथ की भव्य आसनस्थ अभिलिखित प्रतिमा पंडरिया के जैन मंदिर में प्रतिष्ठापित है। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ में आदिनाथ, धर्मनाथ, पार्श्वनाथ, सहित अन्य तीर्थकर प्रतिमायें भी संग्रहीत है। जिला पुरातत्व संघ संग्रहालय, राजनांदगांव में अनेक स्थलों से जैन प्रतिमायें संग्रहीत कर रखी गई हैं। बिरखा, कटंगी के प्राचीन शिव मंदिर के प्रांगण में एक जैन प्रतिमा रखी हुई है, जो किसी जैन मंदिर के भग्नावशेषों से संग्रहीत की गई होगी।

बिलासपुर जिले में जैन धर्म से संबंधित प्रचुर अवशेष मल्हार, रतनपुर तथा धनपुर से ज्ञात हैं। मल्हार में स्थानीय संग्रहालय में विभिन्न तीर्थकरों की अनेकों प्रतिमायें संग्रहीत हैं। कलचुरियों के काल में समग्र छत्तीसगढ़ में मल्हार जैन धर्म का सर्वाधिक महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है। ग्राम में अनेक स्थलों में जैन प्रतिमायें रखी हुई है। परगनिहा नामक स्थल में जैन तीर्थकर की विशालकाय प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। रतनपुर की अधिकांश प्रतिमायें काले ग्रेनाइट प्रस्तर से निर्मित हैं। यहां से प्राप्त प्रतिमायें बिलासपुर तथा रायपुर संग्रहालय में प्रदर्शित हैं। रायगढ़ जिले के नेतनागर तथा पुजारीपाली से जैन प्रतिमाओं की जानकारी मिलती है। छत्तीसगढ़ के सुदूरवर्ती जशपुर जिले के ग्राम रेडे, बागबहार आदि से जैन प्रतिमायें उपलब्ध होने विषयक जानकारी है।

कला-शैली
छत्तीसगढ़ में जैन धर्म से संबंधित पुरावशेषों के व्यापक क्षेत्र से यह ज्ञात होता है कि यहां पर भी सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी से लेकर 12वीं सदी ई. तक शैव, वैष्णव एवं बौद्ध के साथ-साथ जैन धर्म भी विशेष रूप से लोकप्रिय रहा है। इस काल में जैन धर्म से संबंधित अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ। जैन धर्म का भारतीय कला में भी विशिष्ट योगदान है। स्थापत्य कला, रंगीन भित्ति चित्र, चित्रित ग्रंथ तथा अपभ्रंश साहित्य में जैन धर्म का विपुल योगदान है। छत्तीसगढ़ में जैन धर्म से प्राप्त कलाकृतियां स्थापत्य शास्त्र से अनुशासित हैं। इन प्रतिमाओं में शैलीगत विशिष्टतायें भी दृष्टिगोचर होती हैं। तीर्थकर प्रतिमायें प्रायः अष्ट प्रतिहार्य युक्त हैं। मुख गोलाकार तथा प्रशांत है एवं नेत्र अर्धनिमीलित हैं। केशराशि उष्णीषबद्ध है। सिंहासन पर उत्कीर्ण पटल, तल तक विस्तृत है। अधिष्ठान भाग पर प्रतिष्ठापक दम्पत्ति अथवा आराधनारत उपासकों का अंकन है।

छत्तीसगढ़ क्षेत्र से कुछ विशिष्ट जैन प्रतिमायें ज्ञात हुई है। इनमें सिरपुर से प्राप्त धातुनिर्मित प्रतिमायें अत्यन्त कलात्मक है। सिरपुर से प्राप्त तीर्थंकर आदिनाथ की धातु प्रतिमा गुजरात में अहमदाबाद के लालभाई दलपत भाई प्राच्य निकेतन के संग्रह में है। मुनि कांति सागर के ग्रंथ ‘खंडहरों का वैभव‘ में सिरपुर से प्राप्त तीर्थंकर आदिनाथ की धातु प्रतिमा का विवरण प्राप्त होता है। ये कांस्य प्रतिमा छत्तीसगढ़ क्षेत्र में जैन धर्म के प्रचार-प्रसार तथा उच्च कला कौशल के परिचायक है। ऐसी ही दुर्लभ प्रकार की स्फटिक निर्मित तीन तीर्थकर प्रतिमायें आरंग से प्राप्त हुई थीं तथा संप्रति रायपुर के दिगम्बर जैन मंदिर में पूजित स्थिति में रखी हुई हैं। इनमें से एक तीर्थकर पार्श्वनाथ की है तथा शेष दो शीतलनाथ की प्रतिमायें हैं। इन स्फटिक प्रतिमाओं में शिल्प कला, परम्परा तथा धार्मिक आस्था का सुन्दर सामंजस्य है। बिलासपुर संग्रहालय में बाहुबलि की एक दुर्लभ प्रतिमा संग्रहीत है। छत्तीसगढ़ में बाहुबलि की यह एकमात्र ज्ञात प्रतिमा है। बाहुबलि के कठिन तपश्चर्यारत निश्चल देह पर लता-गुल्म के अंकन सहित आरोहित छिपकली भी दृष्टव्य है। इन कथानकों के सृजन में शिल्पी की मौलिक कल्पना और पौराणिक परम्परा परस्पर आत्मसात है। धनपुर में एक विशाल आकार के एकाश्म शिला में उत्खचित तीर्थकर प्रतिमा (स्थानीय नामकरण बेनीबाई) भी महत्वपूर्ण है। कला शैली की अपेक्षा यह प्रतिमा आकार की दृष्टि से उल्लेखनीय है।

जैन धर्म के प्रमुख सिद्धांतों में सत्य, अहिंसा और परमार्थ सर्वाेपरि है। यह विस्मयोत्पादक सत्य है कि जैन धर्म में साधनात्मक पक्ष के साथ-साथ प्रकृति को भी सन्निहित करते हुए वनस्पति तथा जीव जगत के प्राणियों के अवदान को स्वीकार करते हुए उन्हें तीर्थंकरों के द्वारा लांछन के रूप में स्वीकार किया गया है। सभी तीर्थकरों ने पुष्प, फल, छाया, सुगंध तथा काष्ठ के रूप में प्राणियों के लिये निरंतर उपयोगी वनस्पतियों को चैत्य वृक्ष के रूप में अंगीकार किया है। जैन धर्म का यह अवगाहन प्रकृति का काव्य है जिसमें विश्व के साथ जीवन जीने की कला का संदेश है। जैन धर्म में अर्हत के साथ सिद्ध, साधु, उपाध्याय तथा सज्जनों को अत्यन्त सम्मान दिया गया है तथा ‘णमोकार‘ महामंत्र से इनकी उपासना की जाती है। महापुरुषों, आचार्य, विद्वान तथा श्रेष्ठ पुरुषों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन का यह सर्वाेत्तम माध्यम है। समग्र रूप में जैन धर्म समष्टि का स्वरूप है। छत्तीसगढ़ अंचल में जैन धर्म से संबंधित तीर्थ परम्परा में नगपुरा (जिला दुर्ग) का विशिष्ट महत्व है। यह स्थल धार्मिक आराधना के अतिरिक्त प्राकृतिक चिकित्सा, गो सदन तथा शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर प्रगति कर रहा है।

छत्तीसगढ़ अंचल में प्राचीन काल से ही धार्मिक सद्भावना सर्वत्र विद्यमान रही है। पुरातत्वीयस्थलों से ज्ञात अवशेषों के माध्यम से यह प्रमाणित होता है कि यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध तथा जैन धर्म साथ-साथ विकसित होते रहे हैं। इसके साथ ही साथ परस्पर सांस्कृतिक समन्वय विशेषकर कला के क्षेत्र में स्पष्ट दिखाई पड़ता है। स्थापत्य कला में मातृकायें, दिक्पाल तथा नवग्रह समान रूप से सभी देवालयों में प्राप्त होते हैं। जैन यक्षी अम्बिका शैव तथा वैष्णव मंदिरों के जंघा अलंकरण में सर्वत्र प्रदर्शित है। छत्तीसगढ़ में जैन शिल्प सम्पदा न्यूनाधिक दूरस्थ अंचलों से प्राप्त हुए हैं जो इसके लोकप्रियता का प्रमाण है। संस्कृति विभाग इस क्षेत्र में जैन धर्म से संबंधित पुरातत्वीय स्थलों का अन्वेषण, संरक्षण तथा संवर्धन करने के लिये प्रयत्नशील है।

लगभग दस वर्ष पूर्व आयोजित संगोष्ठी के अवसर पर छत्तीसगढ़ शासन, संस्कृति विभाग के अंतर्गत यह पत्रक संचालनालय, संस्कृति एवं पुरातत्व द्वारा प्रकाशित हुआ था, जिसमें प्रकाशन वर्ष उल्लिखित नहीं है। इसमें लखनी देवी मंदिर, रतनपुर तथा अकलतरा जैन मंदिर से बिलासपुर संग्रहालय में लाई गई प्रतिमाओं का उल्लेख रह गया था। यह आलेख हम विभागीय अधिकारियों ने मिलकर तैयार किया था, किंतु भाषा-शैली से निसंदेह कि इसे अंतिम रूप जी.एल.रायकवार जी ने दिया था।

Sunday, September 12, 2021

बस्तर - वेदप्रकाश

बस्तर के पुरातत्व संबंधी सूचनाएं, शासकीय अभिलेखों में सन 1975 से नियमित दर्ज होने लगीं और कई अल्पज्ञात स्थलों, पुरावशेषों की जानकारियां क्रमशः सार्वजनिक होने लगीं। 1987 से 1992 तक का दौर सर्वेक्षण, खुदाई आदि कार्यों की दृष्टि से उल्लेखनीय है। इसी दौरान गढ़धनोरा, भोंगापाल स्थलों पर कार्य हुए, जिसमें मुझे भी शामिल होने का अवसर मिला। 1988 में जगदलपुर के ऐतिहासिक परलकोट बाड़ा में संग्रहालय स्थापित हुआ।

मध्यप्रदेश शासन का पाक्षिक ‘मध्यप्रदेश संदेश‘ के 10 जून 1988 के अंक में बस्तर पर विशेष सामग्री प्रकाशित हुई, जिसमें पुरातत्व पर रायपुर में पदस्थ तत्कालीन अधिकारी वेदप्रकाश नगायच जी का यह लेख सम्मिलित था, उनकी अनुमति से यहां प्रस्तुत-

बस्तर जिले का पुरातत्वीय वैभव

अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण दण्डाकारण्य यानि प्राचीन बस्तर अपने सीमावर्ती क्षेत्रों यथा दक्षिण कोशल, विदर्भ, आंध्र, उड़ीसा से प्रायः अलग रहा है, जिसके फलस्वरूप यह क्षेत्र आधुनिक सभ्यता के सम्पर्क में कम ही आ पाया।

मध्यप्रदेश के दक्षिणी किनारे पर स्थित बस्तर जिला आज भी सामान्य लोगों के लिए कौतुहल का विषय बना हुआ है। बस्तर क्षेत्रफल में केरल राज्य से भी बड़ा है, तथा आदिम जनजातियों तथा घने जंगलों के लिए प्रसिद्ध है। घने जंगलों तथा आवागमन के सीमित साधनों के कारण यह क्षेत्र आज भी पुरातत्वीय सर्वेक्षण से अछूता रहा है।

बस्तर में चारों पाषाणकालों के अवशेष इस क्षेत्र की मुख्य नदियों इन्द्रावती, शबरी एवं नारंगी के तटों से प्राप्त हुए हैं।

इस क्षेत्र से पुरापाषाणकाल के अनगढ़े मूठदार छुरे तथा गढ़े हुए अधिक सुघड़ तथा त्रिकोणाकार छुरे प्राप्त हुए हैं। इन्द्रावती के तट पर बसे कालीपुर ग्राम से कर्तन उपकरण भी हाल ही में मिले हैं।

इन्द्रावती के तट पर स्थित देउरगांव, गढ़चंदेला, बिन्ता, घाटलोहंगा तथा नारंगी नदी के तट पर स्थित राजपुर एवं गढ़बोधरा नामक स्थानों से मध्य पाषाण युग के उपकरण खुर्चन यंत्र, अण्डाकार मूठ-छुरा तथा छेदक अस्त्र पाए गए हैं। उत्तर पाषाण युगीन उपकरण चित्रकूट, घाटलोहंगा तथा गढ़चंदेला से मिले हैं। ये उपकरण ब्लेड, स्क्रेपर आदि बहुतायत में मिले हैं। दक्षिण बस्तर से नुकीले बटवाली कुल्हाड़ी भी मिली है।

बस्तर में महापाषाणीय स्मारकों तथा शवाधान काष्ठ स्तम्भ (अलंकरणयुक्त) प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। काष्ठ स्तम्भ का प्रचलन तो आज भी माड़िया जनजाति में पाते हैं जिनके द्वारा शवाधान के समय काष्ठ स्तम्भ गाड़े जाते हैं, जिन पर काफी नक्काशी होती है।

बस्तर जिले की वैदिक कालीन स्थिति का स्वरूप अस्पष्ट है परन्तु महाकाव्यकाल की जो भी थोड़ी बहुत जानकारी मिलती है वह मात्र अनुश्रुतियों एवं पौराणिक कथाओं के माध्यम से पाते हैं। राजा दण्डक के इस क्षेत्र पर राज्य होने से यह क्षेत्र दण्डकारण्य कहलाया ऐसा मानना है कि जिस पर इतिहासज्ञों में मतान्तर भी है।

इसके ठीक काफी अंतराल के पश्चात 5-6 वीं शती के अवशेष इस क्षेत्र में पाते हैं। वैसे भी समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति में दक्षिणपथ विजय में महाकान्तार का सम्बन्ध वर्तमान बस्तर सम्भाग से ही है। कुछ इतिहासकारों ने महाकान्तार के व्याघ्रराज को नलवंशी शासक माना है। वैसे भी नलवंश का प्रमुख केन्द्र उड़ीसा प्रान्त एवं बस्तर का क्षेत्र रहा है। निष्कंटक क्षेत्र होने से सम्भवतः लम्बी अवधि तक इस क्षेत्र पर नलवंशी शासकों ने शासन किया हो। ये शैव धर्मावलम्बी थे जिसकी पुष्टि सिक्कों में नन्दी के अंकन से भी होती है। इस वंश के शासक वराहराज, भवदत्त तथा अर्थपति की 32 स्वर्णमुद्राएं बस्तर के एडेंगा नाम स्थान से मिली हैं, तथा चार अभिलेखों में एक महाराष्ट्र के ऋद्धिपुर, दो उड़ीसा के पोड़ागढ़ तथा केसरीबेड़ा से तथा एक राजिम (रायपुर) से मिला है।

नल राजवंश की सत्ता के पराभव के बाद 11 वीं शती से नागवंश के उत्थान को बस्तर क्षेत्र में पाते हैं ये रतनपुर के कलचुरियों के प्रतिद्वंद्वी थे। ये शासक अपने को छिदक कुल तथा कश्यप गोत्र का मानते थे जिससे इन्हें छिदक नाग भी कहा जाता है। इनकी दो शाखाएं थीं जिनमें एक शैव तथा दूसरी वैष्णव मतावलम्बी थी।

1023 ई.के एर्राकोट स्थान से प्राप्त शिलालेख से इस राजवंश का प्रथम शासक नृपतिभूषण का उल्लेख मिलता है। इन छिंदकनाग शासकों की राजधानी बारसूर थी, जो इनके कला एवं स्थापत्य का भी प्रमुख केन्द्र रही। कुछ वर्ष पहले भैरमगढ़ से छिदकनाग शासक जगदेव भूषण के 6 ताम्रपत्र प्राप्त हुए थे, जिसमें संवत 985 अर्थात 1063 ई. का उल्लेख है। राजपुर ग्राम से भी 1065 ई. का ताम्रपत्र मिला है जिसमें शासक मधुरान्तकदेव का उल्लेख है।

नागवंशी शासकों की इस क्षेत्र पर राजसत्ता 11 से 14 वीं शती तक रही जिसमें धर्म, कला, स्थापत्य की उन्नति हुई। नारायणपाल, बस्तर एवं बारसूर के मन्दिर इसके प्रमाण हैं।

बस्तर से उत्तर दिशा में करीब 125 किलोमीटर स्थित कांकेर (काकरण) राज्य था जो सोमवंशीय शासकों की राजधानी थी। इस राजवंश का प्रथम शासक सिंहराज था फिर व्याघ्रराज, वोपदेव, कृष्ण, जैतराज आदि हुए। इस राजवंश के अभिलेख कांकेर, तहनकापार, दुर्ग जिले के गुरूर एवं रायपुर जिले के देवकूट व सिहावा से मिले हैं। यद्यपि प्रारम्भ में यह राज्य कलचुरियों के अधीन रहा है। इनका काल भी 11 से 14 वीं शती तक रहा है।

लगभग 14 वीं शती के समीप बस्तर क्षेत्र में काकतीय राजवंश का उदय हुआ। इनकी अल्पकालीन राजधानी मधोता नामक स्थान पर थी। अन्नमदेव, हमीरदेव, मयराजदेव आदि कई शासकों ने 19 वीं शती तक यहां राज्य किया।

इस प्रकार बस्तर क्षेत्र के राजवंशों के इतिहास की क्रमबद्ध श्रृंखला पाते हैं। सिक्को, ताम्रपत्रों, शिलालेखों से उनके कार्यों तथा राज्य विस्तार का स्पष्ट अभिज्ञान होता है। कला एवं स्थापत्य में भी उनका योगदान अप्रतिम है। जिनका विवरण निम्नानुसार है-

भोंगापाल
जगदलपुर से 60 कि.मी. उत्तर कोण्डागांव स्थित है, जहां से 51 कि.मी. नारायणपुर तहसील के अन्तर्गत 25 कि.मी. जंगल में ग्राम भोंगापाल के पास एक टीला विद्यमान है जो ईंट निर्मित है। यहां से बुद्ध की आसनस्थ प्रभामण्डल युक्त प्रतिमा प्राप्त हुई है, जो 5-6 वीं शती ई. की है तथा इसी के समीप नाले के दूसरी तरफ सप्तमातृका प्रतिमा प्राप्त हुई है।

इस स्थल की मलबा सफाई के पश्चात ही वस्तुस्थिति स्पष्ट होगी। परन्तु अभी ऐसा प्रतीत होता है कि इस स्थल पर सिरपुर की तरह बौद्ध बिहार रहा होगा। 

गढ़धनौरा
यह स्थल केशकाल से लगभग 12 कि.मी. दूर गढ़धनौरा स्थित है। यहां किले के ध्वंसावशेष मिले हैं तथा ईंटों के बने शिव मन्दिर के अवशेष शिवलिंग सहित तथा पास ही में चतुर्भुजी विष्णु प्रतिमा मिली है। यहां जगह-जगह ईंटों के टीले हैं। मलबा सफाई के पश्चात् ही सम्पूर्ण वस्तुस्थिति स्पष्ट होगी। अनुमानतः यह शिव मन्दिर व मूर्तियां 8-9 वीं शती ई. की होगी।

बस्तर 
बस्तर ग्राम में प्राचीन शिव मन्दिर है जो ऊंची जगती पर निर्मित है जिसका अधिष्ठान कई मोल्डिंगों में विभाजित है। मण्डप भग्नप्राय स्थिति में तथा मन्दिर के शिखर का आमलक खण्डित अवस्था में है। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। यह मन्दिर 10-11 वीं शती ई. का है।

नारायणपाल
जगदलपुर से करीब 40 कि.मी. दूर इन्द्रावती नदी के तट पर नारायणपाल ग्राम स्थित है। वस्तुतः यह शिव मन्दिर है जो पूर्वाभिमुख है जिसकी जलहरी से निकास हेतु सिंहमुख परिखा बनी है। परन्तु परवर्तीकाल में इसमें विष्णु की प्रतिमा प्रतिष्ठापित कराई गई है। मन्दिर का द्वार अलंकृत, बेसर शैली का उच्च शिखर वाला, ऊंची जगती पर बना है। मन्दिर में प्रवेश द्वार, मण्डप एवं गर्भगृह है प्रदक्षिणापथ नहीं है। मन्दिर का ऊपरी भाग खण्डित है। इस मन्दिर में दो शिलालेख भी लगे हुए हैं। यह मन्दिर 11 वीं शती ई. का वास्तुशिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण इस क्षेत्र में है।

बारसूर
जगदलपुर से 80 कि.मी. दूर बारसूर इन्द्रावती नदी के किनारे स्थित है। इसे मन्दिरों का नगर कहना अतिश्योक्ति न होगी। यहां देवरली मन्दिर जिसका शिखर ढह गया है, चन्द्रादित्य मन्दिर, मामा-भांजा मन्दिर (मूलतः शिवमन्दिर) बत्तीस स्तम्भों पर आधारित खुले मण्डपयुक्त बत्तीसा मन्दिर, गणेश की विशालकाय प्रतिमा तथा ग्राम के दूसरे किनारे एक कक्ष में प्रतिमाएं रखी हैं जिसे दन्तेश्वरी मन्दिर कहते हैं। ये सभी मन्दिर 11-12 वीं शती के हैं।

समलूर
गीदम से समलूर लगभग 12 कि.मी. दूर स्थित है जो दन्तेवाड़ा तहसील के अन्तर्गत आता है यहां प्राचीन शिव मन्दिर है जो स्थापत्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। प्रवेशद्वार पर अलंकृत नन्दी व गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है। मन्दिर उड़ीसा के मन्दिरों की शैली का बना है।

भैरमगढ़
बीजापुर तहसील से करीब 40 कि.मी. जगदलपुर मार्ग पर भैरमगढ़ स्थित है। यहां एक प्राचीन किले का द्वार तथा अनेक तालाब एवं प्राचीन मन्दिरों के खण्डहर पाए गए हैं। गुमना तालाब के किनारे पेड़ के नीचे गणेश प्रतिमा रखी है। भैरमगढ़ के जंगल में ही लखौरी तालाब के किनारे ध्वस्त मन्दिर के अवशेष मिले हैं जिनमें चन्द्रशिला, भग्न-स्तम्भ तथा प्रतिमाएं हैं जिनमें विष्णु, सूर्य, गणेश, शिव, पार्वती, नन्दी आदि की प्रतिमाएं मुख्य हैं। ये सभी काले पत्थर की निर्मित हैं। यह समस्त प्रतिमाएं चारों ओर बिखरी हैं तथा काफी कुछ भग्नप्राय स्थिति में है। 

भैरमगढ़ में शिवमन्दिर में दो भैरव प्रतिमाएं एक विशालकाय दूसरी छोटी स्थापित है।

माता मन्दिर के पास खेत में एक पंक्ति में करीब 20 प्रतिमाएं रखी हैं ये सभी सैनिक प्रतिमाएं हैं। 

छिंदगांव
यह ग्राम जगदलपुर-चित्रकूट मार्ग पर बण्डाजी से 6-7 कि.मी. अन्दर इन्द्रावती नदी के किनारे स्थित है जहां एक प्राचीन पूर्वाभिमुख शिवमन्दिर भग्नावस्था में स्थित है। तल विन्यास में प्रवेशद्वार अर्धमण्डप, मण्डप एवं गर्भगृह हैं। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है, शिखरविहीन मन्दिर ऊंची जगती पर बना है। मन्दिर की द्वार शाखाएं सादी, ललाटबिम्ब में गणेश का अंकन है। मन्दिर के स्तम्भ चतुष्कोणीय व अष्टकोणीय है। मन्दिर-स्थापत्य की दृष्टि से यह लगभग 12 वीं शती ई. का नागवंशीय शासकों द्वारा निर्मित है। इसके पास ही नवीन मन्दिर में गणेश, नटराज, चामुण्डा एवं नृसिंह हिरण्यकश्यप का वध करते आदि प्रतिमाएं स्थापित हैं।

दन्तेवाड़ा
गीदम से 15 कि.मी. दूर प्रसिद्ध दंतेश्वरी देवी का मंदिर है जो इस क्षेत्र का सर्वाधिक पूजनीय स्थल है। यद्यपि मंदिर के स्थान पर आधुनिक भवन में लकड़ी का जालीयुक्त यह मंदिर है। मां दंतेश्वरी देवी की गर्भगृह में प्रतिष्ठित प्रतिमायुक्त तथा नागवंशी शासकों के शिलालेखों एवं विविध कालों की प्रतिमाओं को इस भवन में प्रदर्शित किया गया है। मंदिर के द्वार पर मानवाकार गरूड़-स्तम्भ अद्वितीय है।

चित्रकूट
जगदलपुर से 40 कि.मी. दूर स्थित चित्रकूट जलप्रपात के पास घुमरकुंडपारा स्थल पर एक भग्नशिव मंदिर को पाते हैं, जिसका केवल गर्भगृह है जिसमें एक विशाल शिवलिंग स्थापित है। द्वारशाखाओं में नदी देवियों को पाते हैं, जो मंदिरा से अलग है। मंदिर अधूरा है यानि छत का शिखर विहीन है, जिसके अवशेष यत्र-तत्र बिखरे हैं। इनमें एक गणेश प्रतिमा भी है। यह 14-15वीं शती का नलवंशीय शासकों द्वारा निर्मित प्रतीत होता है। चित्रकूट ग्राम के पास खालेपारा में एक नवीन मढ़िया में उमामहेश्वर, हनुमान, स्कन्दमाता, महिषासुर-मर्दिनी, भैरव, योद्धा आदि प्रतिमाएं लगी एवं रखी हैं जो 13 से लेकर 17 वीं शती की हैं।

कुरूसपाल
यह ग्राम भानपुरी से 15 कि.मी. नारायणपाल के समीप है। यहां पूर्व में प्राचीन मन्दिर रहा होगा जिसकी कुछ प्रतिमाएं एक नवीन मढ़िया की दीवालों, अन्दर एवं मढ़िया के परिसर में लगी है। इनमें तीर्थकर, उमा महेश्वर, गणेश, विष्णु, चामुण्डा, सरस्वती, योद्धा, महिषासुर मर्दिनी, कुबेर, नवग्रह पगड़ीधारी राजा आदि प्रतिमाएं प्रमुख हैं, जो 12 वीं से लेकर 18 वीं शती ई. तक की है।

छोटे डोंगर 
नारायणपुर से लगभग 50 कि.मी. बारसूर मार्ग पर छोटे डोंगर नामक ग्राम स्थित है जहां एक प्राचीन मन्दिर के भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं तथा सती प्रतिमा एवं देवी प्रतिमाएं मिली हैं। मन्दिर 12-13 वीं शती ई. का प्रतीत होता है।

केशरपाल 
जगदलपुर से करीब 40 कि.मी. दूर भानपुरी से 10 कि.मी. पश्चिम में मारकण्डेय नदी के किनारे केशरपाल ग्राम स्थित है। जहां प्राचीन मन्दिर रहा होगा अब मात्र प्रतिमाएं ही शेष हैं जिन्हें एक नवीन मढ़िया बनाकर उसकी दीवालों में लगा दिया गया है। इन प्रतिमाओं में उमा महेश्वर, कुबेर, महिषासुर मर्दिनी, गणेश, नन्दी, नदी देवी, सैनिक प्रतिमा प्रमुख हैं ये सभी 12-14वीं शती ई. की हैं।

पोषणपल्ली
भोपालपटनम तहसील मुख्यालय से करीब 20 कि.मी. पोषणपल्ली ग्राम है जो चिन्ताबागू नदी के किनारे अवस्थित है। इस स्थल को सकल नारायण नाम से जाना जाता है। यहां नवीन चौकोर मढ़िया में करीब 16-17 प्रतिमाएं प्रदर्शित हैं। जिनकी स्थानीय लोगों द्वारा पूजा की जाती है। इनमें उमा महेश्वर, विष्णु, गणेश, नन्दी, कृष्ण, महिषासुर मर्दिनी मुख्य हैं। जो 10 से 14 वीं शती ई. की हैं। प्रतिवर्ष मार्च माह में यहां एक विशाल मेला लगता है।

इस प्रकार बस्तर जिला प्रागैतिहासिक काल से ऐतिहासिक काल तक विविध रूपों में पुरातत्वीय धरोहरों से प्रभूत सम्पन्न है।

वेदप्रकाश नगायच