Monday, March 29, 2021
जन्म-जन्मांतर
Tuesday, March 23, 2021
राग मारवा
Saturday, February 20, 2021
बिलासपुर की त्रिवेणी-1966
इस पुस्तिका में छपा छायाचित्र और स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी जी का लेख प्रस्तुत है। पुस्तिका, प्रातःस्मरणीय हरि ठाकुर के संग्रह से उनके पुत्र आशीष सिंह द्वारा उपलब्ध कराई गई है।
[द्वारा- स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी]
बिलासपुर की साहित्यिक त्रिवेणी का यह सम्मान लगता है कि जैसे पुण्य तीर्थराज प्रयाग यहां साकार हो उठा है। आदरणीय मधुकर जी, प्यारेलाल जी गुप्त तथा यदुनन्दन प्रसाद जी श्रीवास्तव ने अपनी अकथ तपस्या और अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत का सदैव ही पथ प्रदर्शन किया है।
आदरणीय मधुकर जी को काव्य शक्ति तो पैतृक विरासत में मिली है। मुझे स्मरण है कि मधुकर जी के पुण्य स्मरणीय पिता जी बिलाईगढ़ में चाकरी की अवधि में रायपुर आकर जब अपने सहयोगी के यहाँ जो मेरे किरायेदार थे, ठहरते थे तब हम बालकों का मनोरंजन यह कहकर किया करते थे “पुरानी है पुरानी है। मेरी डिबिया पुरानी है। जमाने भर की नानी है” आदि आदि। वयस्क होने पर जब मुझे ज्ञात हुआ कि वे मधुकर जी के पिता श्री थे तो मेरा मन अकस्मात ही उनके प्रति श्रध्दावनत हो गया। ऐसे मधुकर जी ७५ वर्ष पार कर साहित्य साधना में यदि आज भी युवकों को मात दे रहे हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
आदरणीय गुप्त जी कवि, आलोचक, पुरातत्वज्ञ, इतिहासकार आदि क्या नहीं है? को-आपरेटिव्ह बैंक की सेवा करते हुए जमा खर्च के शुष्क आंकड़ों में व्यस्त रहते हुए भी उनका हृदय साहित्य की अमृतधारा से परिपूरित है।
और यदुनन्दन प्रसाद जी श्रीवास्तव तो “कलम के जादूगर“ हैं ही। अपनी सशक्त लेखनी के द्वारा पत्रकारिता के क्षेत्र में तथा अपनी वाणी और सक्रियता के द्वारा राजनीति के क्षेत्र में उनका योगदान स्मरणीय रहेगा।
आज उनके अभिनन्दन के अवसर पर इस त्रिवेणी-स्वरूपा त्रिमूर्ति की सेवा में पुष्पान्जलि अर्पित कर कौन अपने को धन्य नहीं समझेगा?

