Monday, March 29, 2021

जन्म-जन्मांतर

एक बच्चा है।
बचपन में पूर्व जन्म की यादें ताजा रहती हैं।
बड़े होने पर धुंधली पड़ती जाती हैं, खोने लगती हैं।
कथावाचक कहानी सुना रहे हैं।
बच्चा कहानी सुन रहा है।
तैंतीस कोटि योनियां हैं।
मनुष्य तन बड़े भाग्य से मिलता है।
पंचतंत्र की कहानियां।
गज-ग्राह, मगर-बंदर।
बुद्ध के पूर्वजन्म की कहानियां सुनता है।
जातक कथा सुनता है।
अब बच्चा असमंजस में है।
उसके मन में दुविधा होने लगी है।
उसे कभी लगता कि पंछी है, तितली है, शेर है।
चींटी, मधुमक्खी, चूहा, हाथी।
कभी लगता मछली है, सांप है।
सांप-सीढ़ी का खेल है।
यह मेरे पूर्वजन्मों के कारण है।
मानव तन मिला है, लेकिन पूर्वजन्मों से मुक्त न हुआ।
पिछले जन्म की योनियों का असर इस जन्म में भी बाकी रह गया है।
वह कोतवाल चिड़िया की कहानी पढ़ता है।
उसे आकाश में उड़ते चील का पीछा करते देखता है।
कभी वह बड़ों से झगड़कर भी छोटों को बचा लेने की बात सोचता है।
क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल, हनी बजार्ड, फिशिंग आउल, किंगफिशर।
क्या ऐसा औरों को भी लगता है।
साथी बच्चे उसकी हंसी उड़ाते।
हर दिन ऐसा होता।
संयुक्त परिवार है।
स्कूल जाता है।
किसी ने डांटा, किसी ने पुचकारा।
झगड़ा होते देखा, भागमभाग देखा।
सजा मिली, नजर बचा लिया।
अपनी किसी पूर्व योनि में भटकने लगता।
अपने खुद की खोज में भटकने लगता है।
मेरे साथ क्या होता है और मैं हूं कौन?
आत्म संधान, स्व की खोज, अपने आप की तलाश।
जीव, आत्मा, देह।
संचित, क्रियमाण, प्रारब्ध का ऋत।

Tuesday, March 23, 2021

राग मारवा

‘राग मारवा‘ संग्रह की कहानियों का विराग-अनुराग अपनेपन से बांध लेता है। इन कहानियों की कमी या खूबी यही है कि यहां कुछ भी नया और अलग नहीं जान पड़ता। रचनाकार का अनुभव संसार उसका अपना निजी होते हुए भी, इतना आत्मीय और समावेशी है कि वह अगल-बगल घटते जान पड़ता है। खास यह कि भाव ऐसी न्यायपूर्ण संगति से शब्दों में बदलते हैं, वह रस-सृष्टि अपने साथ चलने के लिए रोक रखती है।

संग्रह की पहली दमदार कहानी ‘राग मारवा‘ और आगे भी पढ़ते हुए लगा कि बगल से गुजरती कोई जिंदगी, समानांतर अक्सर ओझल रह जाती है, लेकिन एक धीमी कराह पर ध्यान अटके, तो वह राग मारवा की तरह मन में झरने लगता है। मनोहर श्याम जोशी की कहानी, ’सिल्वर वेडिंग’ याद आती है। पता हो कि यह रचनाकार का पहला संग्रह है तब शायद पाठक का नये परिचित लेखन पर ध्यान अलग ढंग का होता है और बुक मार्क लगाते हुए दीख पड़ता है कि कहानियों में भाषा, भाव, अनुभव, सजग दृष्टि, अवलोकन, संवेदनशील मन और अभिव्यक्ति, यह सब किसी प्रौढ़ रचनाकार की कलम की तरह सधा हुआ है, जिसमें संतुलन ऐसा कि सहज प्रवाह बना रहे। पहला संग्रह है लेकिन अनगढ़ता कहीं नहीं। रचनाएं, अभ्यस्त लेखन की करीने से प्रस्तुति है।

कहानी में अरमानों का ‘गुलाबी दुपट्टा‘ इस तरह लहराता है कि त्रास का सपाटपन, बयां करते और भी त्रासद हो जाता है। कहानी में सुघड़ परिपक्वता है। ‘जनरल टिकट‘ में भाषा का बढ़िया इस्तेमाल, कहानी के मूड को संभाले हुए है। ‘फैमिली ट्री‘, बच्चे के मन में बच्चों-सा सहज हो कर उसमें उतरा-पढ़ा गया है। कहानी का शीर्षक जरूर मिसमैच लगता है। कहानी ‘आवाज में ...‘ तसल्ली से की गई महीन बुनावट, जिसके चलते इस प्रेम कहानी में दरार भी, तल्खी के साथ नहीं, स्वाभाविक आता दिखता है।

कहानी ‘धुँध‘, मन में बसा घर, समय के साथ टू बीएचके और फिर कम्पार्टमेंट होता जाता है। तीन अलग सेट के टुकड़ों वाला जिगसा पजल। बच्चों में बंटवारा तो करना ही होता है, लेकिन वह मां-पिता को कैसे मंजूर हो। बुकमार्क लगाते हुए ध्यान जाता है कि किस तरह अगल-बगल से गुजरती जिंदगी, नजर भर देखा, नब्ज टटोला कि अफसाना बन जाती है। कहानी ‘आसमानी कागज...‘ और ‘सुरमई‘ में कहे-अनकहे के बीच पनपते-मुरझाते रिश्ते हैं तो ’विदाई’ में भी सीमित पात्रों से बुना गया सघन समीकरण है। ‘पानी पे लिखा...‘ मन में फूटा-बहता यादों और भाव का सोता, न जाने क्या और कहां बहा ले जाए, कब किनारे टिका दे।

विविध भारती की रेडियो सखी ममता सिंह की कहानियां, महानगर, रेडियो, विविध भारती, गीत-संगीत से सराबोर हैं। राग मारवा में डूबते-उतराते कहानी ‘आखिरी कॉन्ट्रैक्ट‘ के आखिरी शब्दों के साथ, रुपहला ख्वाब मानों बदल जाता है सुनहरा सबेरा में- ‘...उसमें हम घोलेंगे प्यार का गुलाबी रंग... ।‘

Saturday, February 20, 2021

बिलासपुर की त्रिवेणी-1966

छत्तीसगढ़ की पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था ‘भारतेन्दु साहित्य समिति, बिलासपुर द्वारा पुस्तक प्रकाशन माला के पंचदश पुष्प के रूप में साहित्यिक त्रिमूर्ति अभिनंदन समारोह पत्रिका का प्रकाशन महाशिवरात्रि सं. 2022 यानि 18 फरवरी 1966 को किया गया था।
इसमें जिन तीन साहित्यिक विभूतियों का अभिनंदन हुआ, उनके बारे में पुस्तिका के आरंभ में कहा गया है-
जिन तीनों ने किया पल्लवित साहित्यिक उद्यान।
वे तीनों हैं ‘विप्र‘ के काव्य रसिक भगवान।।

इस पुस्तिका में छपा छायाचित्र और स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी जी का लेख प्रस्तुत है। पुस्तिका, प्रातःस्मरणीय हरि ठाकुर के संग्रह से उनके पुत्र आशीष सिंह द्वारा उपलब्ध कराई गई है।


।। बिलासपुर की त्रिवेणी ।।

[द्वारा- स्वराज्य प्रसाद त्रिवेदी]

बिलासपुर की साहित्यिक त्रिवेणी का यह सम्मान लगता है कि जैसे पुण्य तीर्थराज प्रयाग यहां साकार हो उठा है। आदरणीय मधुकर जी, प्यारेलाल जी गुप्त तथा यदुनन्दन प्रसाद जी श्रीवास्तव ने अपनी अकथ तपस्या और अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर छत्तीसगढ़ के साहित्य जगत का सदैव ही पथ प्रदर्शन किया है।

आदरणीय मधुकर जी को काव्य शक्ति तो पैतृक विरासत में मिली है। मुझे स्मरण है कि मधुकर जी के पुण्य स्मरणीय पिता जी बिलाईगढ़ में चाकरी की अवधि में रायपुर आकर जब अपने सहयोगी के यहाँ जो मेरे किरायेदार थे, ठहरते थे तब हम बालकों का मनोरंजन यह कहकर किया करते थे “पुरानी है पुरानी है। मेरी डिबिया पुरानी है। जमाने भर की नानी है” आदि आदि। वयस्क होने पर जब मुझे ज्ञात हुआ कि वे मधुकर जी के पिता श्री थे तो मेरा मन अकस्मात ही उनके प्रति श्रध्दावनत हो गया। ऐसे मधुकर जी ७५ वर्ष पार कर साहित्य साधना में यदि आज भी युवकों को मात दे रहे हैं, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है। 

आदरणीय गुप्त जी कवि, आलोचक, पुरातत्वज्ञ, इतिहासकार आदि क्या नहीं है? को-आपरेटिव्ह बैंक की सेवा करते हुए जमा खर्च के शुष्क आंकड़ों में व्यस्त रहते हुए भी उनका हृदय साहित्य की अमृतधारा से परिपूरित है। 

और यदुनन्दन प्रसाद जी श्रीवास्तव तो “कलम के जादूगर“ हैं ही। अपनी सशक्त लेखनी के द्वारा पत्रकारिता के क्षेत्र में तथा अपनी वाणी और सक्रियता के द्वारा राजनीति के क्षेत्र में उनका योगदान स्मरणीय रहेगा। 

आज उनके अभिनन्दन के अवसर पर इस त्रिवेणी-स्वरूपा त्रिमूर्ति की सेवा में पुष्पान्जलि अर्पित कर कौन अपने को धन्य नहीं समझेगा?