Tuesday, April 14, 2020

कोरोना में कलाकार


एक सामान्य नागरिक की तरह एक व्यक्ति, जो ‘कलाकार‘ भी हो सकता है, के जीवन-यापन और रोजगार की स्थितियों पर सहानुभूति सहित विचार करने का प्रयास करें तो कुछ बातें ध्यान में आती हैं (संभव है स्वाभिमानी कलाकारों को किसी की ‘सहानुभूति‘ की आवश्यकता न हो, फिर भी यहां उनकी स्थितियों पर तत्वतः विचार का प्रयास है) अपने संपर्क के कलाकारों, खासकर प्रदर्शनकारी कलाओं से जुड़े कलाकार और जिनमें साहित्यकारों को भी शामिल कर लिया जाय तो उनकी आवाज आपको अधिक सुनाई पड़ेगी, क्योंकि इस वर्ग की अभिव्यक्तियां अन्य की तुलना में अधिक मुखर होती हैं और उनके लिए मंच भी होता है।

ऐसे बहुतेरे कलाकार हैं जो वेतनभोगी हैं, जिनके आय का नियमित साधन है। ऐसे भी कलाकार होते हैं, जो अपनी कला के माध्यम से कोई आय उपार्जन नहीं करते, जिनमें रामधुन आदि की प्रभात-फेरी निकालने वाले, आल्हा गाने वाले, खेत-खार में ददरिया गाते, बंसी बजाने वाले और नवरात्रि के दौरान मांदर बजाने वाले, माता सेवा के गीत गाने वाले अनगिन अनाम कलाकार हैं। निसंदेह, ऐसे भी कलाकार हैं जिनका जीवन-यापन, पेशा, आजीविका का एकमात्र/मुख्य साधन कलाकारी है। यह भी याद रखना और दुहराया जाना जरूरी है कि कला-साहित्य का क्षेत्र सरस्वती की साधना है और सरस्वती-लक्ष्मी का बैर बताया जाता है। आशय यह कि बहुत सीमित, बल्कि ऐसे कलाकारों-साहित्यकारों का प्रतिशत नगण्य होगा, जिनका आसानी से गुजारा कला-साहित्य के आसरे हो जाता है।

यों तो कलाकारों की मदद के लिए सरकारी योजनाएं और प्रावधान हैं, लेकिन अप्रत्याशित विपरीत परिस्थितियों में दैनंदिन आवश्यकताओं की पूर्ति में न सिर्फ कलाकार, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ अलग किस्म की अड़चनें सामने आती हैं। कोरोना के इस दौर में कलाकारों की मदद के लिए जिज्ञासा की जा रही है। विचाारणीय है कि संकट काल में जीवन की तात्कालिक और आकस्मिक बुनियादी जरूरतों और उनके प्रति मदद के लिए लिंग, जाति, वर्ग, धर्म या अन्य किसी आधार पर वर्गीकरण किया जाना न तो आसान होगा, न व्यावहारिक इसलिए गैर-जरूरी भी। इन बातों के साथ मेरी जानकारी में, परिस्थितियों से मजबूर ऐसे जरूरतमंद, जिनके दैनंदिन जीवन के लिए आवश्यक ‘रोटी-कपड़ा-मकान‘ की कोई व्यवस्था नहीं है, उनके साथ बिना भेदभाव के शासन-प्रशासन, स्वयंसेवी संस्थाओं और निजी स्तर पर भी सहयोग के लिए हाथ आगे आए हैं। हम में ऐसे हैं जो अपनी रोजाना की जरूरत पूरी कर पा रहे हैं, बल्कि अन्य की मदद कर सकने की स्थिति में भी हैं। यह ध्यान रहे कि हम किसी के प्रति कुछ कर रहे हैं तो सब से पहले अपनी तसल्ली, अपने मन के संतोष के लिए कर रहे हैं और जिसके लिए कर रहे हैं, वह उसके प्रति उपकार नहीं, क्योंकि वह हमारी संतुष्टि के लिए निमित्त-मात्र है। अपने योगदान के लिए अपनी सीमा में आवश्यक सावधानी रखते हुए यथासंभव अपने आसपास, ऐसे जरूरतमंद, जो आपकी प्राथमिकता में हो, मदद के लिए पहल करें, प्रेरित करें।

इस दौर में हम सभी, विशेषकर ऐसे विचारवान जो अभिव्यक्ति के माध्यमों से जुड़े हैं, अपनी नागरिक जिम्मेदारी सहित अपने प्रश्न, संदेह और असंतोष के साथ, उनके हल की ओर सक्रिय और अग्रसर होकर, उस पर विजय पाने का प्रयास करें।

Monday, April 6, 2020

सार्थक यात्राएं


बात से बात पैदा कर पाने का हुनर हर किसी के पास वैसा नहीं होता, जैसा कृष्ण बलदेव वैद के ‘दूसरा न कोई‘ या ‘कुकी की मौत‘ में आता है। साहित्य रचना के लिए एक तरह की किस्सागोई, फर्राटेदार सफर ‘फसाना-ए-आज़ाद‘ जिसका अनुवाद ‘आजाद कथा‘ है तो दूसरे छोर पर वह, जिसका उदाहरण है- 'एक आदमी अपने जीवन का सबसे बड़ा सम्मान पाकर ट्रेन में चढ़ता है। ट्रेन चलते-चलते एक स्थान पर रुक जाती है। वह आदमी पूछता है कि ट्रेन कहाँ रुकी है। जवाब मिलता है- नो व्हेयर! जवाब सुनते ही वह उठता है और यह कहते हुए उतर जाता है कि यहीं तो उसे जाना था।' (प्रभात रंजन की ‘पालतू बोहेमियन‘ से) या स्वदेश दीपक की कहानीनुमा एक रचना का आरंभिक वाक्य- 'गाड़ी ने उस स्टेशन पर नहीं रुकना था। रुक गई, पता नहीं क्यों? उसने वहां नहीं उतरना था। उतर गया। पता नहीं क्यों?' गोया, जिंदगी का सफर, है ये कैसा सफर...

साहित्य में कवि-कविता की प्रतिष्ठा सर्वोपरि, फिर गिनती में गद्यकार, कहानी-उपन्यासकार, निबंधकार, लेखक (लेख लिखने वाले) आदि, तब कहीं नंबर लगाया जाता है, यात्रा वृत्तांत और हास्य-व्यंग्य का। बहरहाल, कुछ ‘लेखक‘ ऐसे होते हैं, जिन्हें किस्सागोई के लिए, बात बनाने और बढ़ाने के लिए, सफर का सहारा-आसरा होता है। दृश्य बदलता जाता है, उसके साथ भाव भी, वही रवानी, वही कहानी। इस करोना दौर में सारी चहलकदमी स्थगित हो तो यात्रा संस्मरणों की ओर मन दौड़ता है, राहुल सांकृत्यायन याद आते हैं और देवकुमार मिश्र की ‘सोन के पानी का रंग‘ को माथे से लगा लिया है। हाथ में हैं ऐसे सफरनामे, जिनका साहित्यिक दरजा तो पता नहीं, लेकिन हिन्दी के जिस पाठक से चूका हो... साहित्यिक समझ के चलते नहीं, बल्कि बहैसियत रसिक पाठक कहूंगा, कि अब तक जिससे यह चूका, वह मेरी निगाह में वंचित श्रेणी में होगा, जैसा कुछ समय पहले तक मैं था।

राकेश तिवारी की 'सफर एक डोंगी में डगमग' दुहरा ली। पहली बार इसे पढ़ने में शुरुआत यात्रा की तरह ही ठिठक कर चली, लेकिन एक बार धारा में लय बन जाने के बाद मुकाम तक पहुंचते देर न लगी। भाषा, लाजवाब। कहीं दुहराव नहीं। हिन्दी के साथ बोलियों का मिश्रण और प्रयोग, लगातार रस-वृद्धि करता है। धार में बहते-तिरते कैसी 'तटस्थता' होती है, होनी चाहिए, महसूस कर रोमांच होता है।

दिल्ली के ओखला हेड से यमुना, गंगा होते कलकत्ता की हुगली तक के 62 दिन के पूरे सफर में स्वयं प्रेक्षक हों और विवरण में खुद को शामिल करना हो, तो स्व का इतना ही स्व-रहित होना आवश्यक है। बीच-बीच में दो किताबें याद आती रहीं, देवकुमार मिश्र की 'सोन के पानी का रंग' और कुबेरनाथ राय की 'निषाद बांसुरी' (कहीं 'किरात नदी में चन्द्र मधु भी), और फिर बनारस के जिक्र के साथ शिव प्रसाद मिश्र ‘रूद्र‘ काशिकेय की 'बहती गंगा' की भी याद आई।

अभ्यस्त साहित्यकार और हिन्दी के विश्वविद्यालयीन उपाधिधारकों के लेखन की भाषा और बुनावट का सप्रयास सपाटपन अखरता है, उससे इस पूरी कृति की- भाषा, मुहावरे, रूपक, चित्रण- एक-एक पंक्ति मुक्त है। अध्याय-योजना और उसके अंतर्गत खंड, लेखन के मूड के अनुरूप हैं, इन्हीं टुकड़े में प्रस्तुत यह यात्रा-संस्मरण निरंतरता और प्रवाह बनाए रखने में सहायक हुआ है। इसके उद्यम और रोमांच के लिए तो बस औरों की तरह मेरा भी सैल्यूट। और सैल्यूट के उतने ही हकदार यात्रा के साथी भी।

अब 'पवन ऐसा डोलै...' के लाजवाब सफर पर हूं।

अजय सोडानी के ‘दरकते हिमालय पर दर-ब-दर‘ के आरंभ ‘आलाप‘ में लेखक की खास साफगोई कि- ‘मैं और मेरे सहयात्री गाहे-बगाहे औपन्यासिक पात्रों में तब्दील हों, भीतर के नाद को शब्दों में बांधते दिखाई दें तो क्या आश्चर्य!‘ न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर-लेखक की पुस्तक आरंभ होती है- ‘‘आप चाहे न मानें पर ‘घुमक्कड़ी‘ को रोगों की फेहरिस्त में शुमार न कर विश्व स्वास्थ्य संगठन वालों से चूक तो हुई ही है।‘‘ कभी एक डॉक्टर मित्र ने कहा था कि मार्निंग वॉक ऐसा रोग है कि अगर लगा तो और किसी रोग को पास फटकने नहीं देता। ‘आलाप‘ में अपने वाले बिलासपुर के डॉ. रहालकर युगल (सुश्री अलका और चन्द्रशेखर जी, जो अजय जी की तरह अब तक मोबाइल फोन मुक्त हैं।) और जानकी पुल वाले प्रभात रंजन जी भी मिल गए। इंदौर वाले, कभी बिलासपुर रहे कवि- डॉक्टर शिरीष ढोबले की संगत याद आई।

पूरी किताब लोगों, नजारों और बतकही के साथ अनजाने रास्तों का ऐसा मोहक सफर, जो एक बार शुरू हो और पता न लगे कि कितने मुकाम और कब मंजिल। पुराली और पहाड़ी देवी-देवताओं की चर्चा में केसकाल, बस्तर की देवी भंगाराम से परम्पराओं की समानता, अनायास-अप्रत्याशित है। झाला का अध्याय अरुणोदय से थोड़ा पहले, पंछियों के साथ आरंभ होता है। आगे चलकर बात आती है- ‘‘ध्वनि है तो कारक हैं, कारक हैं तो कारण होंगे। अतः कारकविहीन निर्जन स्थलों पर अनपेक्षित ध्वनि हमें चौंकाती है। ... इस मामले में जंगलों में रहनेवाला कॉमन हॉक कुक्कू (केतकी, पपीहा) बहुत पाजी है। वह अंग्रेजी में पारंगत को ‘ब्रेन फिवर‘, महाराष्ट्रियनों को ‘पावस आला‘, आसामवासियों को ‘मोई केतकी‘ तथा मय के कद्रदानों को ‘वन मोर बॉटल‘ कहता सुनाई देता है।‘‘

'इरिणा लोक' का मेरा सफर शीघ्र आरंभ होगा।

दोनों पुस्तकें राजकमल प्रकाशन के उपक्रम ‘सार्थक‘ से प्रकाशित हुई हैं, पहले-पहल ‘सार्थक‘ से परिचय हुआ था, राकेश तिवारी की ‘सफर एक डोंगी...‘ पा कर। अब इससे ‘सार्थक‘ पर भरोसा मजबूत हुआ है।

Saturday, April 4, 2020

शिकारी राजा चक्रधर


छत्तीसगढ़ के रायगढ़ नरेश चक्रधर सिंह संगीतज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। रायगढ़ का कथक घराना और संगीतशास्त्र की पुस्तकें, तबला वादन और कला-संगीत संरक्षक राजा के नाम पर रायगढ़ में प्रतिवर्ष गणेश पूजा के दौरान चक्रधर महोत्सव का आयोजन होता है। रायगढ़ के बारेननाथ बैनर्जी और अकलतरावासी कला-मर्मज्ञ ठाकुर गोलन सिंह, राजा चक्रधर सिंह के अच्छे शिकारी और लेखक होने की चर्चा किया करते थे, यह बस किस्सा लगता था, किन्तु भिलाई वाले आशीष दास के संग्रह की सामग्री देखते हुए 'माधुरी' के अंक जून 1932 में पृष्ठ 707 से 713 पर प्रकाशित यह लेख मिला, यहां वही प्रस्तुत है।

शिकार 

(श्रीमान् राजा चक्रधरसिंह, रायगढ़-नरेश)

मैं इस लेख में निरीह पक्षियों के वध की बात न कहूँगा। आप लोग इसमें भोलेभाले हरिण, चीतल, साँभर आदि तृणचारी पशुओं के निधन की बात भी न पायेंगे। इस लेख में तो केवल हिंसक जीवों और उसमें भी विशेषकर शेर के शिकार ही की बात कही जायगी; क्योंकि शेष सब आखेट तो विशेषकर जिह्वा की तृप्ति के लिए किये जाते हैं, केवल यही शिकार ऐसा है जो अधिकतर लोक-कल्याण की दृष्टि से किया जाता है।

निस्तब्ध वनस्थली में हाँके के शब्द के साथ मृदु मंथर गति से अग्रगामी होता हुया जिस समय वह कानन-सम्राट् शिकारी के मचान के समीप आ पहुँचता है, उस समय उस शिकारी के हृदय का भाव देखते ही बनता है। मेरे सर्वप्रथम व्याघ्र के शिकार का दृश्य अब तक मेरी आँखों के सामने झूला करता है। कितने वर्षों की अनवरत आशा के बाद, कितने दिनों के अविश्रान्त परिश्रम के बाद, किस प्रकार एक दिन वह विश्वनाथ-पाली के हाँके में सहसा प्रकट हो गया, किस प्रकार वह मेरे मचान के समीप आ गया, किस प्रकार मैने उछलते हुए हृदय को रोकने की चेष्टा की, किस प्रकार मैंने भाव-भरे हाथों से निशाना साधा और किस प्रकार वह विशाल शक्ति का पहाड़ एक ही गोली खाकर धूल के ढेर के समान एकदम ढह पड़ा! वे सब बात भुलाये नहीं भूलतीं। वनराज का इस प्रकार साक्षात्कार होना भी एक बड़े कौतूहल और बड़े उल्लास का विषय होता है। शिकारी के धैर्य और स्थैर्य की यहीं परीक्षा होती है। यदि निशाना ठीक बैठा, तब तो शिकारी बाज़ी मार ले गया। यदि वह चूका और शेर घायल हो गया, तो फिर जो अनर्थ न उपस्थित हो जाय, वही थोड़ा है।

लोग शिकार को व्यसन कहा करते हैं। है भी यह ऐसा ही कुछ। जिसे इसका नशा हो गया, वह सर्दी-गर्मी और भूख-प्यास की परवा न करता हुआ इसी के पीछे पागल-सा रहता है। भयंकर जाना पड़ रहा हो, चाँदनी में प्रकाश के बदले हिम के कण ही क्यों न गिर रहे हों, सघन वनस्थली प्रेतों की आवासभूमि ही क्यों न बनी रहे- निशाचरों का क्रीड़ा-मंच ही क्यों न जान पड़े; परन्तु यदि शिकारी को शिकार की आहट मिलेगी, तो वह रात-रात भर जागता बैठा रहेगा और मुँह से उफ़ तक न करेगा। जेठ का सूर्य घाम के बदले चाहे अग्नि ही बरसा रहा हो, लू के बदले चाहे दावानल ही क्यों न चल रहा हो, प्यास लगने पर चाहे पानी की बूँद भी मिलने का ठिकाना न हो, परंतु यदि शिकार की आशा है, तो शिकारी इन सब कठिनाइयों की रत्ती-भर भी चिंता न कर अपने उत्साह में आगे ही बढ़ता चला जाता है। वह अँधेरे में भी भयावह जंगलों के बीच भटका करेगा, अपनी जान को हथेली पर लेकर शेरों की माँद में घुस पड़ने का दुःसाहस करेगा, गिरने-पड़ने की परवा न कर दुरूह घाटियाँ और विषम नदी-नाले पार करने की चेष्टा करेगा तथा मृत्यु को आँखों के आगे नाचते हुए देखकर भी अविचलित भाव से अपने लक्ष्य की ओर निशाना साधने में ही दत्तचित्त रहेगा। स्वयं मैंने एक बार इसी तरह का दुस्साहस कर लिया था। घुरा का बीहड़ वन था। शेर का पीछा करते हुए हम लोग दूर तक निकल गये थे। आगे चलकर देखा कि शेर एक गड्ढे में घुसा बैठा है। केवल उसकी पीठ दिखायी पड़ रही थी। सामने बड़ा गहरा खड्ढ था और पीछे इम लोग। शेर आगे उछले तो अप्राप्य हो जाय, और पीछे लौटे तो हमीं लोग साफ़ हो जायँ। बुद्धिमानी इसी में थी कि हम लोग चुपचाप लौट आयें। परंतु उत्साही हृदय बुद्धि की इस सीख को कहाँ मान सकता था। हृदय ने विवश कर दिया। मैं गया और अपनी बंदूक की नली उस विशालकाय हिंसक पशु की पीठ पर छुला दी। दुनाली का स्पर्श होते ही शेर उछला। इधर से गोलियाँ भी भनभनाती हुई निकल पड़ीं। जब तक शेर खड्ढ में गिरे, तब तक गोलियों ने अपना काम समाप्त कर दिया था! उस खड्ढ में जीवित शेर के बदले उसकी मरी हुई लाश ही गिरी। यह काम बड़ा कठिन था। निशाना पक्का सधा हुआ होना चाहिए था। हृदय तथा हाथ पर पूरा अधिकार होना चाहिए था, निरीक्षण तथा निश्चय सच्चे होने चाहिए थे। यदि कहीं भी त्रुटि होती तो अनर्थ ही हो जाता। इसी तरह तो आकस्मिक दुर्घटनाएँ हुआ करती हैं। ईश्वर की कृपा है कि लगभग ५० शेर तथा अनेकानेक इतर जीवों का शिकार कर चुकने पर भी मुझे अब तक किसी दुर्घटना का सामना नहीं करना पड़ा है। बात यह है कि मैं इस विषय में पूर्ण सावधान रहता हूँ। अपनी सवारियाँ, अपने मचान, अपने साथी, अपने शस्त्र, अपने अभ्यास और अपनी विचारशक्ति, सभी को भली भाँति तौलकर तब कहीं ऐसे कठिन प्रसंगों में अग्रसर होना चाहिए। यदि ऐसा न किया जायगा, तो शिकारी को किसी दिन धोखा उठाना पड़ेगा।

अति तो सभी कहीं वर्जित है; परंतु यदि नरेश लोग नियमित रूप से शेर के शिकार की ओर रुचि रक्खा करें, तो उन्हें बड़ा लाभ हो। इस अभ्यास से शरीर परिश्रमशील हो जाता है, शक्ति और साहस का संचार होता है, रमणीय वनस्थली के साथ विशेष संपर्क होते रहने से प्रकृति के साथ एकात्मता बढ़ती, स्वभाव में रमणीयता आती तथा स्वास्थ्य में विकास होता रहता है। इसी के बहाने उन्हें अपने राज्य के अनेकानेक स्थलों में घूमने का अवसर मिला करता है और इस प्रकार वे अपने प्रजाजनों की स्थिति का प्रत्यक्ष निरीक्षण कर सकते - - उनके सुख-दुःख का ज्ञान स्वयं उन्हीं से प्राप्त कर सकते हैं। वनवासी किसानों तथा उनके पशुओं की जीवनरक्षा तो इसमें प्रत्यक्ष है ही। राज-काज के पश्चात् जो समय बचता है, वह हानिकारक दुर्व्यथसनों में व्यर्थ बर्बाद होने के बदले मृगया सरीखे पौरुष-सापेक्ष क्षत्रियोचित कार्य में लग जाय तो उत्तम ही है। कहावत है-
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिक न गजे गजे। साधवो नहि सर्वत्र चन्दनं न वने वने।
इस श्लोक की अंतिम पंक्ति में कुछ फेरफार कर कहा जा सकता है कि "आखेटं नहि सर्वत्र व्याघ्रो नैव वने वने।" वह जंगल का राजा ठहरा। सर्वत्र कहाँ सुलभ हो सकता है। आज वह इस जंगल में है, तो कल वही पचीस-पचीस कोस दूर के किसी जंगल में जा निकलेगा। लोग उसके पंजों के निशान देखकर उसकी खोज किया करते हैं, परंतु खोजियों की वह खोज अधिकांश में असफल ही रहा करती है। हाँ, यदि सौभाग्यवश कहीं शेर द्वारा खायी हुई ताज़ी लाश (जिसे "मरी" कहते हैं) मिल जाय, तो फिर शेर का मिलना कुछ सुगम हो जाता है; क्योंकि वह अपने भक्ष्या पदार्थ को इस प्रकार छोड़कर बहुत दूर नहीं जाता। मारे हुए पशु का कुछ मांस खाकर वह दिन भर मस्त पड़ा रहता है, और संध्या के अनंतर अवशिष्ट आहार-भक्षण करने के लिए वह फिर उसी 'मरी' के पास पहुँचता है। उस समय यदि शिकारी वहीं कहीं बैठा हो, तो शेर को आसानी से मार सकता है। लोग मरी पाकर अकसर वहीं खूँटे से बाँध दिया करते हैं, ताकि शेर उसे हटाकर ले न जा सके; और फिर वहीं मचान आदि बाँधकर इस प्रकार बैठ जाते हैं कि वह मरी ठीक निशाने के अंदर रहे। यदि उजेली रात हुई तब तो कुछ कहना ही नहीं है, और यदि अँधेरी रात हुई तो टार्चलाइट (बिजली की बत्ती) का सहारा लिया जा सकता है। शेर आकर मरी को खींचता है, खड़भड़ाहट की आवाज़ होती है। बस, शिकारी की दुनाली से दन् दन् की आवाज़ उस वन की निस्तब्धता को चीरती हुई पहाड़ों से टकरा कर भयङ्कर रूप से प्रतिध्वनित हो उठती है, और वह भीमकाय पशु ज़मीन पर चारों ख़ाने चित्त लोटने लगता है।

मरी पर का ऐसा सुवर्णावसर सदैव समुपलब्ध नहीं हुआ करता। इसीलिए कृत्रिम उपायों से मरी का प्रबन्ध किया जाता है। इस कृत्रिम उपाय को 'गारा' कहते हैं। व्याघ्र महोदय की क्षुधानिवृत्ति के लिए भैंसा, घोड़ा या ऐसा ही कोई पशु उपयुक्त वन के किसी अभीष्ट स्थल पर बाँध दिया जाता है। रात्रि के समय नैश पर्यटन करते हुए पंचानन महाराज यदि उधर से निकल पड़े, तो इस प्रकार का अनायास उपलब्ध आहार देखकर एकदम लालाक्लिन्न आनन से, विद्युद्गति के साथ उस पर झपट पड़ते हैं। पशु तो बँधा ही रहता है, इसलिए शार्दूल शर्माजी आतृप्ति भोजन कर अपने सौभाग्य की श्लाघा करते हुए समीप ही के किसी शयन योग्य सुस्थल पर पहुंचकर स्वप्नसंसार का आनंद लेने लगते हैं। इधर सबेरे खोजियों द्वारा गारा हो चुकने (पशु के मारे जाने) का पता पाकर शिकारी वहीं जा धमकता है और हाँका प्रारंभ हो जाता है। बस, हाँके का शब्द शेर की सुखनिद्रा में व्यतिक्रम उत्पन्न कर देता है और वह सालस्य नेत्रों को कभी खोलता कभी बन्द करता, खीझता, झुँझलाता, मन ही मन उस शब्द के उद्गमस्थल को कोसता हुआ, एक-दो पग आगे बढ़ता, फिर ठहर कर हाँफना हुआ विश्राम करने की चेष्टा करता है। परन्तु हाँके का वह निर्दय शब्द उसे विश्राम ही नहीं लेने देता।

अंकुशबिद्ध मातंग की भाँति वह फिर आगे बढ़ता और फिर रुक जाता है। इसी प्रकार वह क्रमशः ठीक मचान के पास आ जाता है। बेचारे को क्या पता कि गारेवाले पशु के वध का बदला इस प्रकार हाथोंहाथ चुकाना पड़ेगा --- कल जिस स्थान पर बद्ध पशु को तड़पाया था, आज वहीं स्वयं तड़पना पड़ेगा। कदाचित् वह उस समय भी यही विचार करता जाता है कि कब यह निष्ठुर शब्द बन्द हो और कब में सुख-शयन में खाये हुए आहार का परिपाक करके अवशिष्ट आहार को समाप्त करने योग्य बन जाऊँ। ठीक इसी समय दायँ-दायँ का वज्रनिनाद निर्घोषित हो उठता है और सहसा वह वनराज, वह पंचानन, वह प्रबल शक्ति का विशाल पुंज अपने को अशक्त, असहाय और काल के गाल में एकदम गिरा हुआ पाता है। इस अवसर पर कवि का निम्नलिखित श्लोक कितना चरितार्थ होता है---
रात्रिर्गमिष्यति भविष्यति सुप्रभातं भास्वानुदेष्यति हसिस्यति पङ्कजश्रीः।
इत्थं विचिन्तयति कोषगते द्विरेफे हा हन्त हन्त नलिनीं गज उज्जहार।।
अथवा--- बीतेगी रात प्रभात समय निकलेगी सूरज की लाली;
फिर से विकसित हो जायेगी पंकज की मतवाली प्याली;
भौंरा यों था जब सोच रहा उस सरसिज-कलिका में फँसकर,
हाथी ने जब से तोड़ उसे भर लिया गहन मुख के भीतर।
बस, सब मन के मनसूबे मन ही में रह गये और अपनी अभिलाषाएँ अपने साथ लिये वह दूसरे लोक का प्रवासी बन गया।

शेर को घोड़े का गारा बहुत पसंद है। यदि उसे घोड़े का गारा मिल जाय तो फिर वह उस जंगल को छोड़कर कहीं न जायगा। बहुत बड़े अफसरों के लिए जब शेर के शिकार का प्रबंध करना पड़ता है तब वह इसी तरह एक ही जंगल में पाल लिया जाता है। गारे पर गारा समाप्त करता हुआ वह उसी जंगल में पड़ा रहता है।

गारा हो जाने पर हाँके का प्रबंध एकदम हो जाना चाहिए। हाँका उस हल्ले को कहते हैं जो मनुष्यों द्वारा जंगल का घेरा डालकर किया जाता है। हाँकेवाले अधिकतर १०० से ५०० तक रहा करते हैं । वे दस-दस या बीस-बीस कदम के अंतर पर रहकर जंगल को घेर लेते और नगाड़ा, ताली या लकड़ी बजाते तथा हाँ-हाँ इत्यादि चिल्लाते हुए क्रमशः मचान की बढ़ते हैं। उस घेरे के भीतर फँसा हुआ जानवर भी क्रमशः उस हल्ले के कारण आगे बढ़ता जाता है और इस प्रकार वह मचान तक आ पहुँचता है। मचान अकसर ऐसी ही घाटी में बाँधा जाता है जहाँ होकर जानवर आया-जाया करते हैं। मचान के अगल-बग़ल, कुछ दूर हटकर, कुछ आदमी वृक्षों पर बैठा दिये जाते या कपड़े तानकर छिपा दिये जाते हैं। यदि जानवर मचान के पास न आया और कटकर इधर-उधर जाने लगा, तो इन मनुष्यों का (जिन्हें टोंकहार कहते हैं) काम होता है कि यह तालियाँ बजाकर या और भी किसी तरआवाज़ करके जानवर को चौकन्ना कर दें, ताकि वह अपना मार्ग बदलकर मचान की ओर चला जाय। यह सब प्रबंध बड़ी सावधानी से करना पड़ता है। यदि जानवर को शंका हो गई कि यह सब उसके फँसाने का जाल है, तो वह फिर न हँकहारों की परवा करता है और ना टोंकहारों की। वह मनुष्यों के घेरे को तोड़ता हुआ मनमानी दिशा में भाग निकलता है। गोली की आवाज़ सुनकर शेर अकसर भड़क उठता है और इधर-उधर भाग निकलता है। इसीलिए जिस हाँके में शेर के निकलने की आशा हो, उसमें दूसरे जानवर पर गोली नहीं चलाई जाती। हाँ, यदि कोई कौतूहलपूर्ण अथवा भयावह जीव पहले ही मिल जाय, तो फिर उसे छोड़ना भी ठीक नहीं रहता; क्योंकि अँगरेज़ी में कहावत है कि "हाथ आयी हुई एक चिड़िया घोंसले में बैठी हुई दो चिड़ियों के बराबर मूल्यवान है।" एक बार ऐसे ही शिकार में मुझे एक बड़ा भयंकर भालू देख पड़ा। उसे यों ही चले जाने देना मैंने उचित न समझा; क्योंकि कई अवसरों पर ऐसा भालू एक बड़े बाघ से भी अधिक हानिकर और हिंसक हो जाता है। इसलिए मैंने उसे ही पहिले साफ़ कर दिया। परंतु अकसर बाघ की आशा में ऐसे जानवरों को छोड़ देना ही अच्छा होता है।

हाँका जितना अधिक संगठित होगा, शिकार उतना ही सफल और निरापद होगा। अशिक्षित हाँकेवाले गोली चलाने पर अकसर भाग निकलते हैं और धक्कम-धक्के से एक दूसरे को गिराते चलते हैं। ऐसा करने से अकसर चोट लग जाती है और घायल शेर को भी आदमी पर झपटने का अवसर मिल जाता है। यदि बड़े जंगल का हाँका धीरे-धीरे किया गया, तो मचान तक पहुँचते-पहुँचते एकदम अंधेरा हो जाता है। ऐसी स्थिति में शिकार करना ख़तरे से खाली नहीं रहता। जाँगी-पहाड़ी के हाँके में मुझे एक बार ऐसा ही अवसर आ गया था। अंधेरी रात थी। जाड़े के दिनों के सात बज चुके थे। घनघोर अंधकार ने संपूर्ण वन को अपने काले लबादे से ढक लिया था। आँखों के आगे अभेद्य कालिमा के अतिरिक्त और कुछ दिखायी ही न देता था। हाँके की आवाज़ बराबर आ रही थी। इसलिए मैं मचान से उतर भी न सकता था। कुछ देर बाद मैंने कुछ खटका सुना। ईश्वर का नाम ले उसी शब्द पर लक्ष्य लगाकर मैंने गोली चला दी। फिर एकदम सन्नाटा हो गया। हाँकेवाले समीप आये तब प्रकाश किया गया और उसके आलोक में देखने से पता चला कि वहाँ एक शेर मरा पड़ा है। ईश्वरेच्छा से वह शब्दमेवी निशाना ऐसा भरपूर बैठा था कि शेर चीख़ तक न सका और एक ही गोली में ढेर हो गया। परंतु अँधेरे में ऐसा दुस्साहस अच्छा नहीं होता। अनभ्यस्त मृगया-प्रेमी तो ऐसा कदापि न करे, क्योंकि ऐसा करने पर शेर के घायल होकर भाग निकलने ही की सम्भावना अधिक रहती है। यदि ऐसा हुआ, तो अँधेरे में वह कई हँकहारों के प्राणों का ग्राहक बन सकता है। कभी-कभी हाँके में कई शेर निकल पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में उतावनी दिखाने से भरपूर गोली नहीं पड़ने पाती। निशाना ठीक साधकर जितने शेर मारते बने, उतने मार लेना चाहिए। झुनझुनी के जंगल में मैंने एक ही हाँके में तीन शेर तक मारे हैं। इससे अधिक मारने का मुझे अवसर नहीं मिला। दो शेर एक साथी तो कई हाँकों में मिले और मारे गये हैं।

केवल गारा और हँकहारों का विचार ही शिकार के लिए पर्याप्त नहीं है। मचान की ओर भी भली भाँति ध्यान रखना आवश्यक रहता है। मचान यदि बहुत ऊँचा रहेगा, तो गोली का निशाना ठीक न लगेगा। यदि बहुत नीचा हुआ, तो बैठनेवाले निरापद न होंगे। इसलिए मचान अक्सर सात से नौ फुट की ऊँचाई पर बाँधा जाता है, और पत्तों आदि से इस प्रकार ढक दिया जाता है कि आदि को किसी अस्वाभाविकता की शंका न हो। वह ऐसी घाटी पर बाँधा जाता है, जिसकी एक ओर तो अच्छा जंगल और दूसरी ओर सामान्य झाड़ी हो। जंगल का हाँका होने पर शेर आदि उस झाड़ी की ओर उसी घाटी की राह होकर जाना चाहेंगे। शेर के सामने आते ही गोली नहीं चला दी जाती। उसे बग़ल से निकलने का अवसर दिया जाता है और तब उसके सामने के पैर और वक्षःस्थल की जोड़ पर निशाना साधकर गोली चलायी जाती है। अन्य स्थितियों में गोली चलाने से अकसर निशाना चूकने का या शेर घायल होकर निकल भागने का डर रहता है। शिकार में हाथी रखना उत्तम है; क्योंकि यदि शेर घायल होकर निकल जाय तो हाथियों की सहायता से सफलतापूर्वक उसका पीछा किया जा सकता है।

शेर का शिकार जाड़े में अच्छा बन पड़ता है। उस समय हँकहारों को भी कष्ट नहीं होता और शेर गहन वनों को छोड़ गाँवों के समीप भी आ जाता है। इस समय का उसका चमड़ा भी सघन केशों से आच्छादित रहा करता है। इसीलिए अच्छे शिकारी इसी समय को बहुत पसंद करते हैं। वे बड़े दिनों आदि की छुट्टियों में शेर के शिकार के लिए दूर-दूर देशों का चक्कर लगाया करते हैं। फिर भी मैंने बहुत-से ऐसे बड़े-बड़े अफसर देखे हैं, जो जंगल-जंगल भटका करते हैं; परंतु सारी उम्र एक सामान्य बाघ भी शिकार के लिए नहीं पा सके हैं। यह पहले ही कहा जा चुका है कि शेर अनायास ही नहीं मिला करते और हर एक जंगल में वे होते भी नहीं। उन्हें पाने के लिए न केवल प्रयत्न किंतु प्रारब्ध का भी सहारा ढूँढना पड़ता है।

शेर का चमड़ा भव्य भवनों की सजावट तथा साधुओं के सुखासन में काम आता है। उसकी चर्बी गठिया-वात रोगियों के रोगियों की प्रिय वस्तु है। उसका मांस डब्बे की बीमारी में बच्चों को दिया जाता है। उसकी हड्डी के लेप से उठते हुए फोड़े दब जाते हैं। उसके नाखून बच्चों के गले में पहनाये जाते हैं। उसके दाँत आँखों की ओषधि में काम आते हैं। उसकी मूछें विष का काम देती हैं। उसकी वीर हड्डियां बड़े सौभाग्य की वस्तुएँ मानी जाती हैं। इन सबसे बढ़कर उसका विनाश गृह-पशुओं को अभयदान देता और वनवासी दीन कृषकों के जीवन-पथ को कंटकरहित करता है। मचान पर बैठकर उसकी प्रतीक्षा में जिस उत्तेजना-भरी उत्सुकता का तथा जिस आशा, निराशा, भय, उत्साह, सफलता, असफलता आदि के द्वंद्व का अनुभव होता है, उसका आनंद भुक्तभोगी ही जान सकते हैं। ऐसी स्थिति में यदि राजाओं और राजपुरुषों की प्रवृत्ति शेर के शिकार की ओर रहे, तो वह क्योंकर अनुचित कही जा सकती है।