Saturday, April 28, 2012

अकलतरा के सितारे

आजादी के बाद का दौर। मध्‍यप्रांत यानि सेन्‍ट्रल प्राविन्‍सेस एंड बरार में छत्‍तीसगढ़ का कस्‍बा- अकलतरा। अब आजादी के दीवानों, सेनानियों की उर्जा नवनिर्माण में लग रही थी। छत्‍तीसगढ़ के गौरव और अस्मिता के साथ अपने देश, काल, पात्र-प्रासंगिक रचनाओं से पहचान गढ़ रहे थे पं. द्वारिकाप्रसाद तिवारी 'विप्र'। यहां संक्षिप्‍त परिचय के साथ प्रस्‍तुत है उनकी काव्‍य रचना स्वर्गीय डा. इन्द्रजीतसिंह और ठा. छेदीलाल-
बैरिस्‍टर ठाकुर छेदीलाल
जन्‍म-07 अगस्‍त 1891, निधन-18 सितम्‍बर 1956
पं. द्वारिकाप्रसाद तिवारी 'विप्र'
जन्‍म-06 जुलाई 1908, निधन-02 जनवरी 1982
लाल साहब डॉ. इन्द्रजीतसिंह
जन्‍म-05 फरवरी 1906 (पासपोर्ट पर-28 अप्रैल 1906), निधन-26 जनवरी 1952

अकलतरा में सन 1949 में सहकारी बैंक की स्‍थापना हुई, बैंक के पहले प्रबंधक का नाम लोग बासिन बाबू याद करते हैं। डा. इन्द्रजीतसिंह द्वारा भेंट-स्‍वरूप दी गई भूमि पर बैंक का अपना भवन, तार्किक अनुमान है कि 1953 में बना, इस बीच उनका निधन हो गया। उनकी स्‍मृति में भवन का नामकरण हुआ और उनकी तस्‍वीर लगाई गई। लाल साहब के चित्र का अनावरण उनके अभिन्‍न मित्र सक्‍ती के राजा श्री लीलाधर सिंह जी ने किया। इस अवसर के लिए 'विप्र' जी ने यह कविता रची थी।
स्वर्गीय डा. इन्द्रजीतसिंह
(1)
जिसके जीवन के ही समस्त हो गये विफल मनसूबे हैं।
जिस स्नेही के उठ जाने से हम शोक सिंधु में डूबे हैं॥
हम गर्व उन्हें पा करते थे - पर आज अधीर दिखाते हैं।
हम हंसकर उनसे मिलते थे अब नयन नीर बरसाते हैं॥
वह धन जन विद्या पूर्ण रहा फिर भी न कभी अभिमान किया।
है दुःख विप्र बस यही- कि ऐसा लाल सौ बरस नहीं जिया॥

(2)
सबको समता से माने वे- शुचि स्नेह सदा सरसाते थे।
छोटा हो या हो बड़ा व्यक्ति- सबको समान अपनाते थे॥
वे किसी समय भी कहीं मिलें- हंस करके हाथ मिलाते थे।
वे अपनी सदाचारिता से - हर का उल्लास बढ़ाते थे॥
वह कुटिल काल की करनी से - पार्थिव शरीर से हीन हुआ।
वह इन्द्रजीत सिंह सा मानव- क्यों ''विप्र'' सौ बरस नहीं जिया॥

(3)
राजा का वह था लाल और, राजा समान रख चाल ढाल।
राजसी भोग सब किया और था राज कृपा से भी निहाल॥
जीते जी ऐसी शान रही- मर कर भी देखो वही शान।
हम सभी स्वजन के बीच ''विप्र'' सम्मानित वह राजा समान॥
तस्वीर भी जिसकी राजा का संसर्ग देख हरषाती है।
श्री लीलाधर सिंह राजा के ही हाथों खोली जाती है॥

थोड़े बरस बाद ही डा. इन्द्रजीतसिंह के निधन का शोक फिर ताजा, बल्कि दुहरा हो गया। स्‍वतंत्रता संग्राम सेनानी, युग-नायक बैरिस्‍टर छेदीलाल नहीं रहे, तब 'विप्र' जी ने कविता रची-
ठा. छेदीलाल
अकलतरा के दो जगमग सितारे थे-
दोनों ने अमर नाम स्वर्ग जाके कर लिया।
विद्या के सागर शीलता में ये उजागर थे -
दोनों का अस्त होना सबको अखर गया॥
काल क्रूर कपटी कुचाली किया घात ऐसा-
छत्तीसगढ़ को तू वैभव हीन ही कर दिया-
एक लाल इन्द्रजीत सिंह को तू छीना ही था-
बालिस्टर छेदीलाल को भी तू हर लिया॥
छेदी लाल छत्तीसगढ़ क्षेत्र के स्तम्भ रहे-
महा गुणवान धर्म नीति के जनैया थे।
राजनीति के वो प्रकाण्ड पंडित ही रहे-
छोटे और बड़े के समान रूप भैया थे।
राम कथा कृष्ण लीला दर्शन साहित्य आदि-
सब में पारंगत विप्र आदर करैया थे।
गांव में, जिला में और प्रान्त में प्रतिष्ठित क्या-
भारत की मुक्ति में भी हाथ बटवैया थे॥
छिड़ा था स्वतंत्रता का विकट संग्राम -
छोड़कर बालिस्टरी फिकर किये स्वराज की।
आन्दोलनकारी बन जेल गये कई बार -
चिन्ता नहीं किये रंच मात्र निज काज की।
अगुहा बने जो नेता हुए महाकौशल के -
भारत माता भी ऐसे पुत्र पाके नाज की।
ऐसा नर रत्न आज हमसे अलगाया 'विप्र'-
गति नहिं जानी जात बिधना के राज की॥

बैरिस्‍टर ठाकुर छेदीलाल जी पर एक पोस्‍ट पूर्व में लगा चुका हूं, उन पर लिखी पुस्‍तक की समीक्षा डॉ. ब्रजकिशोर प्रसाद ने की है। अंचल के प्रथम मानवशास्‍त्री डॉ. इन्‍द्रजीत सिंह जी का शोध पुस्‍तककार सन 1944 में प्रकाशित हुआ, उनसे संबंधित कुछ जानकारियां आरंभ पर हैं इस पोस्‍ट की तैयारी में तथ्‍यों की तलाश में पुष्टि के लिए उनका पासपोर्ट (जन्‍म स्‍थान, जन्‍म तिथि के अलावा कद 6 फुट 2 इंच उल्‍लेख सहित) और विजिटिंग कार्ड मिला गया, वह भी यहां लगा रहा हूं-

ऐसे अतीत का स्‍मरण हम अकलतरावासियों के लिए प्रेरणा है।

बैरिस्‍टर साहब का जन्‍मदिन, हिन्‍दी तिथि (तीज-श्रावण शुक्‍ल तृतीया) के आधार पर पं. लक्ष्‍मीकांत जी शर्मा के ''देव पंचांग'' कार्यालय, रायपुर द्वारा परिगणित है।

Wednesday, April 25, 2012

बेरोजगारी

तब जो कुछ करता था, वह 'क्‍या करते हो?' के जवाब में पूरा नहीं पड़ता था, इसलिए 'बेरोजगार' शब्‍द टालने के लिए ही नहीं, तब उसकी तासीर समझने में भी काम आया था। लगभग बिना प्रयोजन तब लिखा अपना यह नोट 'कोरबा' के साथ मिल गया, ब्‍लागरी होती तो तभी लग जाता, अब सही...

बिलासपुर जिले के कोरबा-गेवरा की खुली कोयला खदान, दुनिया की अपने तरह की सबसे बड़ी खदानें हैं, जिनमें कभी न बुझने वाली आग धधकती रहती है, और कोयले के आग की तासीर भी कुछ खास होती है। राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम, एनटीपीसी, कोरबा के छंटनीशुदा कर्मचारी, 33 वर्षीय कामेश्वर सिंह ने नियमित सेवा में लिये जाने की मांग पूरी न होने के कारण 26 फरवरी को शाम 6 बजे आत्मदाह की घोषणा की थी।

समय से पहले लोग वहां जमा होने लगे और उत्तेजना बढ़ने लगी थी। उधर कामेश्‍वर एनटीपीसी कार्यालय के पास नाले पर किनारे-किनारे लुकता-छिपता आगे बढ़ रहा था। उसने मैले-कुचैले कपड़े पहन रखे थे, उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं था। 6 बजे के कुछ ही मिनटों बाद वह गेट नं. 2 पर प्रकट हुआ और माचिस की तीली से पेट्रोल बुझे अपने कपड़ो में आग लगा ली। लोगों का ध्यान इस भभकते शोले की ओर गया। कुछ ने रेत और धूल से आग बुझाने की कोशिश भी की किन्तु देखते-देखते वह 80 प्रतिशत झुलस चुका था, उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया। 22 घंटे की उसकी इस जद्दोजहद ने दम तोड़ा, 27 फरवरी को शाम 4 बजे और उसने अपनी धमकी को इस तरह कारगर कर दिखाया।

इस दुर्घटना की पृष्ठभूमि समझने के लिये कुछ दिन पीछे जाना होगा। कामेश्वर सिंह ग्राम रेवा, थाना सरैया, जिला मुजफ्फरनगर, बिहार का निवासी था। सन 1975 में मुजफ्फरपुर से बीए किया। 1978 तक बी.टी.ट्रेनिंग की। नवंबर 1978 में किसी रिश्तेदार के कहने-सुनने पर उसे एनटीपीसी में काम मिल जाने की बात बनी। 80 वर्षीया विधवा मां व 18 वर्षीय अपाहिज भाई का सहारा यह युवक कोरबा चला आया।

तब से 1 जनवरी 81 तक उसे समय-समय पर दैनिक भुगतान पर काम में रखा जाता रहा। कुछ अन्य सहकर्मियों की भांति उसे काम पर नियमित नहीं किया गया तो उसने इस आशय का एक पत्र एनटीपीसी के महाप्रबंधक को लिखा। पत्र पर कोई आशतीत प्रतिक्रिया न देखकर 16 जनवरी को आमरण अनशन पर बैठ गया। 2 दिन पश्चात ही पुलिस ने उस पर दफा 309, आत्महत्या का मामला बना दिया। इसके बाद उसका धैर्य जवाब देने लगा और अंततः उसने आत्मदाह की घोषणा कर डाली, किन्तु 2 फरवरी को महाप्रबंधक को एक पत्र में उसने लिखा कि आपके मौखिक आश्वासन पर अपने आत्मदाह की घोषणा वापस लेता हूं लेकिन आत्मदाह की तारीख 26 फरवरी निकट आते-आते उसने पुनः आत्मदाह की घोषणा कर दी।

इस घटना के बाद आत्मदाह के विभिन्न मसले इतने विवादग्रस्त हो गए कि कुछ मूल तथ्यों को छोड़ किसी भी बात पर दो मत एक जैसे नहीं है। कामेश्वर किस अमानवीयता का शिकार हुआ कि उसने अपना सहेजा-संभाला धैर्य पुनः खो डाला, कहना जरा मुश्किल है। किन्तु उसके आत्मदाह के पश्चात एनटीपीसी की ओर से दिये गये ब्यौरे के कुछ वाक्यों से स्थिति का काफी कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। जैसे- (एनटीपीसी की) ''फिर मानसिकता यह भी थी कि कोई क्यों आत्मदाह करेगा।'' ''प्रबंध तंत्र द्वारा काम पर वापस लेने के आश्वासन के उत्तर में वे कहते रहे कि अब वे एनटीपीसी में नौकरी करने में रूचि नहीं रखते। अंततः वे कतिपय तत्वों के बहकावे में आकर प्रशासन की आंखों में धूल झोंककर आत्मदाह करने में सफल रहे'' आदि। यह भी उल्लेखनीय है कि आयुक्त, जिलाधीश और पुलिस उपमहानिरीक्षक उस दिन कोरबा में ही मौजूद थे।

अब इस घटना पर विभिन्न तरह की चर्चाएं हो रही हैं। एक नेता ने तो इस कांड की न्यायिक जांच की मांग करते हुए स्वयं भी आत्मदाह करने की घोषणा कर दी है। न जाने और किन-किन स्वार्थों की रोटी इस आग में सेंकी जायेगी। हो सकता है सरकार की ओर से मृतक के परिवार को कुछ सहायता दे दी जाय और एनटीपीसी प्रशासन को कुछ कड़े निर्देश दे दिये जाएं। किन्तु अब कामेश्वर नहीं हैं, लेकिन उनके पीछे उठने वाले सवाल जरूर हैं। आत्मदाह की स्थितियां पैदा करने के कारण और तात्‍कालिक परिस्थितियां, इसे रोका क्‍यों नहीं जा सका और सवाल यह भी कि एक बेरोजगार को अपनी स्थिति से ज्यादा सुखद जलकर मर जाना लगे तो बेरोजगारी के आग की तासीर क्या होगी।

Friday, April 20, 2012

कोरबा

रत्नगर्भा धरा के कोष में अनमोल प्राकृतिक खजाना छुपा हुआ है, जो उजागर होकर हमें चमत्कृत और अभिभूत कर देता है। इसका आकर्षण, ऐसे सभी केन्द्रों पर मानव के लिये प्रबल साबित होता है, जैसा कोरबा और उसके चतुर्दिक क्षेत्र में दृष्टिगोचर है। यह भूमि इतिहास के प्रत्येक चरण में मानव जाति की क्रीड़ा भूमि रही है। यह क्षेत्र नैसर्गिक सम्पदा से परिपूर्ण रहा है। हसदेव के सुरम्य और तीक्ष्ण प्रवाह से सिंचित तथा सघन वनाच्छादित उपत्यकाओं से परिवेष्टित यह भूभाग आदि मानवों द्वारा संचारित रहा हैं इसके प्रमाण स्वरूप हसदेव लघु पाषाण उपकरण प्राप्त होते हैं, और कोरबा से संलग्न रायगढ़ जिले का सीमावर्ती क्षेत्र तो मानो आदि मानवों का महानगर ही था। आदि मानवों को विभिन्न गतिविधियों के प्रमाण इस क्षेत्र में सुरक्षित हैं। इसी पृष्ठभूमि पर ऐतिहासिक-पौराणिक ऋषभतीर्थ और अब छत्‍तीसगढ़ का औद्योगिक तीर्थ कोरबा विकसित हुआ है।
ईस्वी पूर्व के धार्मिक-पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख और घटनाओं की संबद्धता से भी इस क्षेत्र की प्राचीनता पर प्रकाश पड़ता हैं महाभारत में उल्लेख है कि दक्षिण कोसल के प्रसिद्ध स्थल, ऋषभतीर्थ में गौदान करने से पुण्य अर्जित होता है। इस उल्लेख की ऐतिहासिकता निकटस्थ गुंजी के शिलालेख से प्रमाणित होती हैं ईस्वी की आरंभिक शताब्दी से संबंधित इस लेख में राजपुरूषों द्वारा सहस्त्र गौदान किया जाना अभिलिखित है। लेख का पाठान्तर इस प्रकार है- ''सिद्धम। भगवान को नमस्कार। राजा श्रीकुमारवरदत्त के पांचवें संवत्‌ में हेमन्त के चौथे पक्ष के पन्द्रहवें दिन भगवान के ऋषभतीर्थ में पृथ्वी पर धर्म (के समान) अमात्य गोडछ के नाती, अमात्य मातृजनपालित और वासिष्ठी के बेटे अमात्य, दण्डनायक और बलाधिकृत बोधदत्त ने हजार वर्ष तक आयु बढ़ाने के लिए ब्राह्मणों को एक हजार गायें दान की। छवें संवत में ग्रीष्म के छठे पक्ष के दसवें दिन दुबारा एक हजार गायें दान की। यह देखकर दिनिक के नाती ... अमात्य (और) दण्डनायक इंद्रदेव ने ब्राह्मणों को एक हजार गायें दान में दीं।'' इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि इस क्षेत्र में वैदिक परंपराओं की गतिविधियां सम्पन्न हुआ करती थीं। किरारी (चंदरपुर) का काष्ठ स्तंभ लेख तो अद्वितीय ही है, जिसमें राज्य अधिकारियों के पद नाम हैं।
ऋषभतीर्थ, गुंजी या दमउदहरा
इस क्षेत्र को रामायण के कथा प्रसंगों से भी जोड़ा जाता है। यह क्षेत्र राम के वनगमन का क्षेत्र तो माना ही गया है, सीतामढ़ी आदि नाम इसके द्योतक हैं निकटस्थ स्थल कोसगईं में प्राप्त पाण्डवों की प्रतिमाएं क्षेत्रीय पौराणिक मान्यताओं को और भी दृढ़ करती है। कोरबा के नामकरण को भी कौरवों से जोड़ा जाता है और सहायक तथ्य यह है कि इस क्षेत्र के आसपास कोरवा और पण्डो, दोनों जनजातियां निवास करती हैं। एक ऐतिहासिक तथ्य यह भी है कि बिलासपुर जिले के ही लहंगाभाठा नामक स्थल से लगभग 12-13 वीं सदी ईस्वी का शिलालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें तत्कालीन कौरव राजवंश की जानकारी मिलती है, जिन्होंने अपने समकालीन प्रसिद्ध क्षेत्रीय राजवंश कलचुरियों पर भी विजय प्राप्त कर ली थी। संभव है कि इस राजवंश की राजधानी कोसगईं, कोरबा क्षेत्र में रही हो। इस क्षेत्र में प्रचलित पंडवानी और फूलबासन (सीता प्रसंग) गाथा में ऐतिहासिक सूत्र खोजे जा सकते हैं।
सीतामढ़ी, कोरबा की गुफा में पूजित राम-लक्ष्‍मण-सीता प्रतिमा
'अष्‍टद्वारविषये' उल्लिखित शिलालेख
कोरबा के सीतामढ़ी में एक शिलालेख है, जिसमें लगभग आठवीं सदी ईस्वी का जीवन्त स्पन्दन है। इस शिलालेख के अनुसार यह क्षेत्र अष्टद्वार विषय में सम्मिलित था और यहां किसी वैद्य के पुत्र का निवास था। अष्टद्वार विषय का अर्थ तत्कालीन अड़भार क्षेत्र है। सातवीं सदी ईसवी के लगभग सक्ती के निकट स्थित अड़भार ग्राम प्रसिद्ध नगर था। यहां से प्राप्त एक ताम्रपत्र में भी इस क्षेत्र का नाम 'अष्टद्वार विषय' उल्लिखित है। संभवतः यह नाम अड़भार के अष्टकोणीय (तारानुकृति) मंदिर अथवा आठ द्वार युक्त मिट्‌टी के परकोटे वाले गढ़ के नाम के आधार पर है। उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में एक अन्य प्राचीन ऐतिहासिक प्रमाणयुक्त ग्राम बाराद्वार (बारहद्वार) भी है। अंचल में प्रचलित विभिन्न दन्तकथाओं में कोरबा तथा गुंजी को अड़भार से सम्बद्ध किया जाता है।
दैनिक लोकस्वर, कोरबा संस्करण के
शुभारंभ दिनांक 1 अगस्त 1992
के पूर्ति अंक के लिए तैयार किया गया,
पृष्ठ -1 पर प्रकाशित मेरा आलेख।
 अखबार की प्रति तो मिली नहीं,
अपना लिखा यह पन्‍ना मिल गया
परवर्ती काल में कोरबा, जिले की विशालतम जमींदारी का मुख्‍यालय बना, जो यहां के राजनैतिक-प्रशासनिक महत्व का द्योतक है। यह जमींदारी 341 गांवों और 856 वर्गमील में फैली थी तथा संभवतः सबसे अंत में रतनपुर राज्य में सम्मिलित की जा सकी अन्यथा इनकी पृथक और स्वतंत्र सत्ता थी। दूरस्थ, दुर्गम और शक्तिशाली जमींदारी होने के कारण ही यह संभव हुआ था। कोरबा जमींदार दीवान कहे जाते थे। संभवतः धार्मिक उदारता के कारण इस क्षेत्र में कबीरपंथ को प्रश्रय मिला, फलस्वरूप कुदुरमाल, कबीरपंथियों के महत्वपूर्ण केन्द्र के रूप में स्थापित हुआ। यहां प्रतिवर्ष माघ में पंथ समाज का मेला भरता है। कुदुरमाल में दो कबीरपंथी सद्‌गुरूओं के अलावा प्रमुख कबीरपंथी धर्मदास जी के पुत्र चुड़ामनदास जी की समाधि है।

कोरबा के चतुर्दिक क्षेत्र में गुंजी, अड़भार, रायगढ़ जिले के प्रागैतिहासिक स्थलों के साथ-साथ कोसगईं, पाली, रैनपुर, नन्दौर आदि ऐसे कई स्थल है जहां पुरातत्वीय सामग्री के विविध प्रकार उपलब्ध हैं। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध और दर्शनीय स्थल पाली है। पाली ग्राम का मंदिर ''महादेव मंदिर'' के नाम से विख्‍यात है। मूलतः बाणवंशी शासक विक्रमादित्य प्रथम द्वारा निर्मित 9-10 वीं सदी ई. के इस मंदिर का जीर्णोद्धार कलचुरि शासक जाजल्लदेव ने 11वीं सदी ई. में कराया। पूर्वाभिमुख यह मंदिर प्राचीन सरोवर के निकट जगती पर निर्मित है। मंदिर की बाह्यभित्तियां प्रतिमा उत्खचित, अलंकृत हैं। प्रतिमाओं में शिव के विविध विग्रह, चामुण्डा, सूर्य, दिक्पालों के साथ-साथ अप्सराएं, मिथुन दृश्य और विभिन्न प्रकार के व्यालों का अंकन है। अलंकरण योजना और स्थापत्य की दृष्टि से यह मंदिर छत्तीसगढ़ का विकसित किन्तु संतुलित स्थापत्य और मूर्तिशिल्प का अनूठा उदाहरण है।
सचमुच कोरबा क्षेत्र की नैसर्गिक सम्पन्नता और ऐतिहासिक अवशेषों का आकर्षण प्रबल है। जो पहले कभी ऋषभतीर्थ के रूप में श्रद्धालुओं को आकर्षित करता था, औद्योगिक तीर्थ बनकर कोरबा, आज भी लोगों को आकर्षित कर रहा है।

इस पोस्‍ट के छायाचित्रों के लिए श्री हरिसिंह क्षत्री ने तथा कुछ जानकारियों के लिए डॉ. शिरीन लाखे व गेंदलाल शुक्‍ल जी ने मदद की।