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Tuesday, July 11, 2023

देव-द्यूत

पिछले कुछ दिनों से जुए के फेर में पड़ गया हूं। मन ही मन पासे फेंकता, दांव-लगाता, जीत-हार का मनोराज्यं। वेद-पाठ, कला-रस और देव-आराधन का आनंद भी है इस मनोद्यूतं में। तिरी-पग्गा, तिरी-पच्चा, तिरी-पांचा, जैसे जाने कितने शब्द ‘जुआ-चित्ती‘ के लिए इस्तेमाल होते हैं। इनके करीबी है ‘तिया-पांचा‘ या ‘तीन-पांच‘, जो शायद जुए-पासे के खेल में छल-कपट के लिए ही प्रयुक्त होता है, ऐसे संकेत भी वैदिक साहित्य में मिल जाते हैं और गीता में कृष्ण ‘द्यूतं छलयतामस्मि‘ बताते हैं।

वैदिक साहित्य में ‘अक्ष‘ शब्द, पासा या गोटी के अर्थ में आता है। ऋग्वेद के दशम मंडल का चौंतीसवां सूक्त कवष ऐलूष का है। 14 मंत्रों के इस सूक्त में दुर्व्यसन जुआ का आकर्षण, उसके दुष्परिणाम और जुआरी की व्यथा फिर जुए का त्याग कर कृषि अपनाने की बात है- ‘हे द्यूतव्यसनी! जुए के पाशों से मत खेल, कृषि को जोत-खेती कर-अन्न उपजा, खेती से प्राप्त अन्न-धन-भोग से आनन्द ले, अपने को धन्य मानता हुआ प्रसन्न रह ...।‘ अथर्ववेद में ‘सं-रुध्‘ और ‘सं-लिखित‘ शब्दों का प्रयोग पासे के संदर्भ में हुआ है। वैदिक साहित्य में ‘त्रिपंचाश‘ शब्द भी आया है, जिसका सीधा मतलब तिरपन समझ में आता है, मगर विद्वान एकमत नहीं हैं और एक बड़ी संख्या का अभिव्यंजक भी माना है। याद कीजिए- ‘जाओ, तुम्हारे जैसे बहुत देखे हैं‘ वाली बात ‘... पचीसो देखे हैं‘ भी कहा जाता है। पौ-बारह, जैसे शब्द भी बाजी मार लेने के लिए आते हैं। फेंके गए पासों पर आई संख्या चार से विभाजित हो ऐसी संख्या ‘कृत‘, चार से विभाजित करने पर तीन शेष रहे तो ‘त्रेता‘, दो बचे तो ‘द्वापर और एक बच जाए तो ‘कलि‘ कहे जाने का भी उल्लेख मिलता है। छान्दोग्य उपनिषद के शंकर भाष्य में रैक्व प्रसंग में कृत-विजय का और तीन, दो, एक- क्रमशः त्रेता, द्वापर और कलि को संबद्ध किया है।

वाल्मीकि रामायण, बालकांड के चौथे सर्ग में अयोध्या का वर्णन में ‘चित्रामष्टापदाकारां‘ शब्द आया है। इस अष्टापद का अर्थ द्यूतफलक, जिस पर पासा बिछाया-खेला जाता है, बताया गया है। यहां ‘अष्टापदाकारा‘ का भाव, कि नगर के बीच राजमहल था, जिसके चारों ओर बीथियां और बीच में खाली जगहें थीं। जैन आगमों के बहत्तर कलाओं की सूची में द्यूतकला और बौद्धग्रंथ ललितविस्तर की कला सूची में अक्षक्रीड़ा भी है। इसी तरह वात्स्यायन ‘कामशास्त्र‘ और ‘शुक्रनीतिसार‘ की कलासूचियों में भी द्यूतक्रीड़ा को शामिल किया गया है। ‘मृच्छकटिकम‘ और ‘चतुर्भाणी में वेश्या, मद्यपान और द्यूतक्रीड़ा आमोद-प्रमोद के मुख्य साधन दिखते हैं। जैन प्राकृत ग्रंथ ‘वसुदेवहिण्डी‘ में द्यूत के कई अनूठे और रोचक प्रसंग हैं।

‘विधुर जातक‘ (545) में द्यूत-प्रसंग है, जहां द्यूतशाला तैयार कराई जाती है, चांदी के फलक पर सोने के पासे रखे जाते हैं। इसकी अतीत कथा में कहा गया है कि पूर्व समय में कुरु राष्ट्र में इंद्रप्रस्थ नगर में धनंजय नाम का कौरव्य राज्य करता था। विधुर-पंडित नाम का उसका अमात्य था, अर्थ-धर्मानुशासक ... इससे यह महाभारत के द्यूत-प्रसंग की याद दिलाता है। महाभारत के आरंभ में ही आदिपर्व के द्यूतपर्व में विदुर द्वारा जुए का घोर विरोध किया जाता है। स्वयं को हारने के बाद युधिष्ठिर कहते हैं- यद्यपि ऐसा करते हुए मुझे महान कष्ट हो रहा है, मगर विवेकशील धर्मराज द्रौपदी को दांव पर लगाते हैं, बड़े-बूढ़े धिक्कारते हैं। आगे चलकर वनपर्व के ‘नलोपाख्यान‘ आता है, जिसमें द्यूत प्रसंग को पिछले संदर्भ से जोड़ने का संकेत भी नहीं है मगर मानों पांडवों-युधिष्ठिर के बहाने पाठकों को बताया जाता है। कथा चलती है कि अवसर पा कर नल के शरीर में कलियुग प्रवेश करता है, इधर राजा नल का रिश्ते में भाई पुष्कर, कलियुग के ही उकसावे में उसे धर्मपूर्वक जुआ खेलने को बार-बार कह कर राजी कर लेता है। पुष्कर और नल के बीच कई महीनों तक जुआ चलता रहा। लगातार हारते नल से अंत में पुष्कर ने पत्नी-दमयंती को दांव पर लगाने के लिए कहा। किंतु कलियुग के प्रभाव में होने के बावजूद भी नल ने ऐसा नहीं किया।

मनु ने द्यूत को बुरा खेल माना है। राजा के अधीन खेलने का उल्लेख और व्यवस्था मिलती है। यहां दो शब्दों से परिचय कर लें- पहला ‘सभिक‘ यानी जुए का अड्डा चलाने वाला और ‘कलह‘ का सामान्य अर्थ लड़ाई-झगड़ा के अलावा जुए में लगाया गया दांव है। समझाइश दी जाती है कि जुआ तो हार-जीत का, खेल भावना वाला है, उसका दांव लगाने वाला ‘कलह‘ बस बुरा है। जुआड़ियों के जीत साधने के लिए एक ‘अक्षहृदय‘ मंत्र भी है। कात्यायन ने लिखा है कि यदि द्यूत की छूट मिले तो वह खुले स्थान में द्वार के पास खिलाया जाना चाहिए, जिससे भले व्यक्ति धोखा न खाएं और राजा को कर मिले। नारद, बृहस्पति, कौटिल्य, याज्ञवल्क्य जैसे विभिन्न ग्रंथों और महाभारत में भी द्यूत की निन्दा और व्यवस्था संबंधी उल्लेख मिलते हैं। 'कंब रामायण के बालकांड, अध्याय 10- मिथिला-दर्शन पटल में नगर प्रवेश पर राम-लक्ष्मण ने- ‘कई द्यूतशालाएँ भी देखी, जहाँ माले-जैसी नुकीली आँखों वाली सुन्दर वेश्याएँ चौसर खेलती थी। वे अपने हाथ के कंगन, कर्णाभरण, रत्नहार, कलिंगदेश की बनी अमूल्य चादर, मकरवीणा आदि को भी दाँव पर रख देती थी। (खेलते-खेलते थक जाने से) उनके पुष्पालंकृत केशपाश शिथिल हो जाते थे और स्फटिक के बने कुत्ते के आकार की मुहरें उनकी हथेली की छाया से लाल दिखाई देती थी।‘ चौदहवीं सदी ईस्वी के जैन ग्रंथ ‘प्रबंधचिंतामणि' की रोवक उक्ति है- ‘ग्रहों रूपी कौड़ियों से जब तक द्युलोक में सूर्य और चंद्रमा, जुआड़ी की तरह क्रीड़ा करते रहें तब तक आचार्यों द्वारा उपदिष्ट होता हुआ यह ग्रंथ विद्यमान रहे।'

ध्यान रहे कि शास्त्रीय ग्रंथों में द्यूत पर दी गई व्यवस्था, प्रतिद्वंन्दियों के बीच होने वाले खेल के लिए है, न कि पति-पत्नी के बीच के खेल के लिए। विवाह संस्कार पूरे हो जाने के बाद बारात वापस आने पर कंकण छुड़ाने की रस्म में नवदंपति के बीच जुआ-खेल खेला जाता है। एक कथा पासे या शतरंज जैसे खेल में विश्वामित्र का पत्नी से हारने पर पत्नी के हंसने से क्रुद्ध हो कर पासा तोड़ देने की भी है। वैष्णव परंपरा में कृष्ण लीला पुरुष हैं तो इधर शिव की लीलाएं भी कम नहीं। शिल्पशास्त्रीय या प्रतिमाविज्ञान का आधार नहीं मिलता मगर शिव-पार्वती के उमा-महेश विग्रह को शिल्प में चौसर खेलते दिखाया जाता हैै, ऐसी दुर्लभ शिल्प-कृतियां कलात्मक और रोचक कल्पनाशील हैं।

उमा, पार्वती है, पर्वत-पुत्री, नगाधिराज-सुता, ऐश्वर्यशाली। उमा के पास दांव लगाने के लिए क्या कमी। मगर औघड़-फक्कड़ शिव के पास भांग-चिलम के अलावा उनके आयुध त्रिशूल, डमरू, नाग, खट्वांग ही हैं, वे सब उमा के लिए बेमतलब, किसी काम के नहीं, इसलिए जिनका दांव पर लगाया जाना, उमा को मंजूर न हुआ हो। नन्दी, कुछ काम के हो सकते थे, तो महेश की ओर से वही दांव के लिए प्रस्तुत और स्वीकृत हुए। शिल्प में नन्दी को हार जाना रूपायित किया जाता है।

छत्तीसगढ़ में अब तक ज्ञात मुख्यतः ताला-6 वीं सदी इस्वी, सिरपुर-8 वीं सदी इस्वी, भोरमदेव-11 वीं सदी इस्वी, मल्हार-12 वीं सदी इस्वी और डमरू-13 वीं सदी इस्वी की शिल्प-कृतियां हैं।

तालाएवं सिरपुर

ताला और मल्हार के ऐसे शिल्प खंडों के तीन कोष्ठों से पूरे कथानक को न सिर्फ समझा जा सकता हैै, बल्कि ध्यान देने पर, पूरे प्रसंग और पात्रों का हाव-भाव और वह क्षण भी जीवंत हो उठता है। मुख्य पात्र उमा और महेश हैं, नन्दी हैं और हैं शिवगण समूह और पार्वती परिचारिकाएं। ताला में देवरानी मंदिर के प्रवेश द्वार के अंतः-पार्श्व के शिल्पखंड के मध्य में उमा-महेश चौपड़ खेल रहे हैं। बायें कोष्ठ में शिवगण प्रदर्शित हैं और दायें कोष्ठ में पार्वती की परिचारिकाएं विजित नन्दी को खींच कर ले जाने का प्रयास कर रही हैं और अनिच्छुक नन्दी अड़ा हुआ है। सिरपुर की प्रतिमा में उपर चौपड़ के एक-एक ओर सम्मुख शिव-पार्वती को दिखाया गया है और नीचे नन्दी को हांक कर ले जाया जाना अंकित है।
मल्हार, भोरमदेव एवं डमरू

मल्हार में कथानक तीन लंबवत कोष्ठों में है, जिनमें से प्रथम में चौपड़ खेलते उमा-महेश, दूसरे में शिवगण और पार्वती की परिचारिका के बीच नन्दी के लिए विवाद हो रहा है। तीसरे कोष्ठ के अंकन से स्पष्ट अनुमान होता है कि इस विवाद में दोनों उलझ जाते हैं और नन्दी बाबा मौका पा कर सरक जाते हैं। भोरमदेव मंदिर के पूर्वी मुख्य प्रवेश पर दक्षिणी शाखा पर शैव द्वारपाल और नदी देवी के ऊपर दो कोष्ठों में शिल्पांकन है। पहले में उमा-महेश को चौकोर चौपड़ और परिचारिका-गण के साथ दिखाया गया है। इसके पार्श्व खंड में पीछे की ओर सिर घुमाए प्रतिरोध करते नंदी, दंड लिए शिव गण और पार्वती-परिचारिका को दोनों हाथ उठा कर दंड-प्रहार को रोकने का प्रयास करते दिखाया गया है। डमरु की प्रतिमा में चौपड़ खेलते शिव-पार्वती और दाहिनी ओर गणेश को पहचाना जा सकता है।

श्री जी. एल. रायकवार ने सागर-जबलपुर अंचल की ऐसी तीन प्रतिमाओं की पहचान पहले-पहल की थी और 1984 के ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान‘ दीपावली विशेषांक में इस पर रोचक लेख प्रकाशित कराया था। उन्होंने यह भी बताया कि ऐसी स्तुतियां हैं, जिनमें पार्वती और शिव के बीच द्यूत क्रीड़ा और पार्वती का गंगा के प्रति डाह उजागर होने का संवाद है। इसी प्रकार कुछ शिलालेखों की स्तुतियों में भी द्यूत-क्रीड़ारत शिव-पार्वती की वंदना की गई है।

क्षेपक की तरह एक कथा सुनने को मिली है कि जुए में नन्दी को हारने के बाद हुआ यह कि भटकते रहने वाले भोला-भंडारी वाहन-विहीन हो गए और घर पर ही पार्वती के पास रहने लगे। कुछ दिन इसी तरह बीते। पार्वती को अपनी पुरानी शिकायत याद आई कि शिव ने गंगा को सिर पर बिठा रखा है, जबकि वह किसी काम-धाम की नहीं है, और कैलाश पर पानी की समस्या होती है तो उन्होंने इस शर्त पर नंदी को वापस लौटाया कि शिव, गंगा को रोज घर का पानी भरने के काम पर लगा दें। की तरह एक कथा सुनने को मिली है कि जुए में नन्दी को हारने के बाद हुआ यह कि भटकते रहने वाले भोला-भंडारी वाहन-विहीन हो गए और घर पर ही पार्वती के पास रहने लगे। कुछ दिन इसी तरह बीते। पार्वती को अपनी पुरानी शिकायत याद आई कि शिव ने गंगा को सिर पर बिठा रखा है, जबकि वह किसी काम-धाम की नहीं है, और कैलाश पर पानी की समस्या होती है तो उन्होंने इस शर्त पर नंदी को वापस लौटाया कि शिव, गंगा को रोज घर का पानी भरने के काम पर लगा दें। प्रसंगवश, निबंध ‘गंगा-यमुना-सरस्वती‘ में कुबेरनाथ राय किसी पौराणिक संदर्भ का हवाला नहीं देते, मगर लिखते हैं- ‘रुद्र की अलका में भटकती हुई प्रेमिका। रुद्र के सिर पर चढ़ी हुई प्रेमिका! इस प्रकार पुरानी गौरी गंगा अब नयी गौरी पार्वती की सौत बन गयी। ... द्वितीय सांस्कृतिक विकास में यह मकरवाहनी भगवती ‘गंगा‘ बन गयी और रुद्रपत्नी नयी ‘गौरी‘ की सौत बन गयी।

इस नोट को तैयार करने में सर्वश्री रायकवार, डॉ. के पी. वर्मा, श्री हयग्रीव परिहार, श्री प्रभात सिंह, श्री अमित सिंह ठाकुर ने सहयोग किया है।

Friday, December 14, 2012

बुद्धमय छत्तीसगढ़

सोलहवें नक्षत्र विशाखा के मास में, षोडश कला युक्त चन्द्रमा की तिथि- वैशाख पूर्णिमा; बुद्ध के जन्म के साथ-साथ, सम्बोधि और निर्वाण की तिथि भी मानी गई है। इस तिथि पर आज हम बुद्ध का सामूहिक स्मरण करने के लिये एकत्र हैं। समाप्ति-आसन्न इस शताब्दी की परिस्थितयां, आशा और उल्लास के बदले गहन तिमिर निशा को उन्मुख हैं, तब इस बुद्ध पूर्णिमा की निर्मल, शीतल आभा, प्रेरणा की ऐसी किरण बन सकती है, जिसने पचीस सौ साले पहले भी मानव सभ्यता का मार्ग प्रशस्त किया था।

गौतम बुद्ध के लिये एक प्राच्य अध्येता की टीप है- ''यदि उनके मरणोपरान्त, उनके वैश्विक प्रभावों का ही मूल्यांकन किया जाय, तब भी वे निश्चय ही भारत में जन्मे महानतम व्यक्ति थे।'' इस प्रभाव के आंकलन हेतु छत्तीसगढ़ अंचल से प्रकाश में आये पुरावशेष सक्षम हैं, किन्तु इसके पूर्व बुद्ध समग्र के प्रति बट्रेंड रसेल और अल्बर्ट आईन्सटीन के कथन उल्लेखनीय हैं। रसेल के शब्दों में- बुद्धिमता और गुणवत्ता की जिस ऊंचाई पर क्राइस्ट हैं, क्या इतिहास में वहां कोई और है - मुझे बुद्ध को इस दृष्टि से, क्राइस्ट से ऊपर रखना होगा। आइन्सटीन का विचार है कि यदि कोई धर्म आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वय स्थापित कर सकता है, तो वह बौद्ध धर्म ही है। यही दृष्टिकोण आज बुद्ध स्मरण की वास्तविक प्रासंगिकता है।

बौद्ध पुरावशेष, विशेषकर बुद्ध प्रतिमाएं, आरंभिक काल में और हीनयान सम्प्रदाय में तो संभव नहीं हुई, किन्तु महायान और वज्रयान से लेकर जेन और नव-बौद्ध तक, जो कहीं न कहीं बुद्ध शिक्षा की मूल परम्परा का ही विकास है, इन सभी ने अपनी रचनात्मकता से भारतीय कला और परंपरा को सम्पन्न बनाया है। इसलिये बौद्ध प्रतिमाएं मात्र कलावशेष न होकर बौद्ध धर्मशास्त्र को भी रूपायित करती है। इनका निर्माण बौद्ध दर्शन और सम्प्रदाय के विचारों पर आधारित और विकसित बौद्ध प्रतिमा शास्त्र के मानदण्डों के अनुरूप हुआ है।

छत्तीसगढ़ में बौद्ध पुरावशेषों की चर्चा का आरंभ नेपाली परम्परा के एक अपेक्षाकृत परवर्ती ग्रन्थ ''अवदान शतक'' के उल्लेख से किया जाना उपयुक्त होगा, जिसके अनुसार बुद्ध की चरण-धूलि से दक्षिण कोसल अर्थात्‌ वर्तमान छत्तीसगढ़ की भूमि भी पवित्र हुई है। एक अन्य महत्वपूर्ण विवरण प्रसिद्ध चीनी यात्री युवान-च्वांग (व्हेनसांग) का है, जिसने सातवीं सदी ईस्वी में सोलह वर्ष भारत में व्यतीत करते हुये प्रमुख बौद्ध केन्द्रों का भ्रमण किया था। उसने कलिंग (उड़ीसा) होते हुए उत्तर-पश्चिमी दिशा में पहाड़ों और जंगलों के रास्ते किआओ-सा-लो अर्थात्‌ (दक्षिण) कोसल में प्रवेश किया। वह लिखता है कि यहां के लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं और ऐसे भी लोग हैं जो बौद्ध धर्म को नहीं मानते। आगे विवरण मिलता हे कि यहां का राजा बौद्ध धर्म का आदर करता है। उसके आंकड़ों के अनुसार यहां के सौ बौद्ध विहारों में महायान सम्प्रदाय के लगभग दस हजार भिक्षु निवास करते हैं। उसने करीब सत्तर देव मंदिर भी देखे, जिनमें भक्तों की बड़ी भीड़ होती थी। तत्कालीन पुरावशेषों और इतिहास का उल्लेख करते हुये उसका कथन है कि राजधानी की दक्षिण दिशा में एक प्राचीन स्तूप था, जिसे अशोक ने निर्मित कराया था, इस स्थान पर तथागत ने अविश्वासियों को चमत्कार दिखाकर वश में किया था। बाद में इस विहार में नागार्जुन ने निवास किया था, तब इस देश का राजा सातवाहन था। युवान-च्वांग कोसल से आंध्र, कांचीपुरम्‌ की ओर आगे बढ़ा। वैसे तो युवान-च्वांग के कोसल और उसकी राजधानी पर विद्वानों का मतैक्य नहीं है, किन्तु सिरपुर के पुरावशेषों से उसके विवरण का सर्वाधिक साम्य प्रतीत होता है। प्रसंगवश सिरपुर की खुदाई से आठवीं सदी ईस्वी के चीनी शासक काई-युवान के सिक्के की प्राप्ति भी उल्लेखनीय है।
सिरपुर स्‍तूप

लगभग सातवीं सदी ईस्वी के शासक भवदेव रणकेसरी के भांदक (?) शिलालेख में शाक्य मुनि बुद्ध के मंदिर निर्माण की जानकारी है। इसी पाण्डुवंश के प्रतापी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के मल्हार ताम्रलेख में बौद्ध संघ को कैलासपुर नामक गांव दान में दिये जाने का उल्लेख है। बालार्जुन के काल में ही बौद्ध विहार, मंदिर और भिक्षुओं का उल्लेख सिरपुर से प्राप्त एक शिलालेख में आया है। युवान-च्वांग का कथन कि यहां का राजा बौद्ध धर्म का आदर करता था, शैव धर्मावलम्बी बालार्जुन के अभिलेखों और तत्कालीन निर्माण से मेल खाता है और उसकी धार्मिक उदारता और सहिष्णुता के परिचायक हैं।

कलचुरि शासक जाजल्लदेव प्रथम के रतनपुर शिलालेख के अनुसार रूद्रशिव स्वयं के व अन्य धर्म सिद्धातों के अतिरिक्त दिग्नाग के प्रामाणिक कार्य का भी ज्ञाता था। पृथ्वीदेव द्वितीय के कोनी शिलालेख प्रशस्ति का रचयिता काशल बौद्ध आगमों का ज्ञाता था। इन उल्लेखों से स्पष्ट होता है कि बारहवीं सदी ईस्वी तक निश्चय ही छत्तीसगढ़ अंचल में बौद्ध धर्म का अध्ययन व उसका पर्याप्त सम्मान होता था। इसीलिये बौद्ध धर्म का ज्ञान किसी व्यक्ति के गुणों में विशेष रूप से उल्लेख किये जाने योग्य कारक होता था।

बौद्ध स्थापत्य अवशेषों की दृष्टि से अंचल के सिरपुर, मल्हार तथा भोंगापाल (बस्तर, नारायणपुर से 30 किलोमीटर) महत्वपूर्ण स्थल है। सिरपुर में 1954-55 में आरंभ हुई खुदाई से मुख्‍यतः आनंदप्रभकुटी विहार, स्वस्तिक विहार एवं कुछ अन्य बौद्ध विहार अवशेष प्रकाश में आये। आनंदप्रभकुटी विहार में मुख्‍य संरचना के साथ संलग्न पक्के धरातल वाले विशाल प्रांगण के चारों ओर कोठरियों की क्रमहीन पंक्तियां हैं। मुख्‍य संरचना की योजना वर्गाकार है, जिसमें उत्तर की ओर नक्काशीदार तोरण द्वार तथा द्वारपाल, यक्षों की प्रतिमाओं का स्थान निर्धारित है। सभामण्डप सोलह स्तंभ पीठिकायुक्त है। पृष्ठवर्ती कोठरियों की पंक्ति के मध्य भूस्पर्श मुद्रा में बुद्ध की अतिमानवाकार प्रतिमा स्थापित है।

स्वस्तिक विहार का नामकरण उसकी विशिष्ट आकार की योजना के कारण निर्धारित हुआ। यहां मध्य में खुले आंगन के चारों ओर तीन-तीन कोठरियों की पंक्ति के साथ प्रमुख कक्ष में विशाल आकार की भूस्पर्श बुद्ध प्रतिमा है। दोनों विहारों में बुद्ध के साथ पद्‌मपाणि भी स्थापित हैं, जबकि स्वस्तिक विहार की खुदाई से लाल बलुए पत्थर की हारीति प्रतिमा भी प्राप्त हुई थी। स्वस्तिक विहार के निकट ही पांच अन्य विहारों के अवशेष भी उद्‌घाटित हुए, जिनमें सामान्यतः खुला आंगन, चारों ओर कोठरियां और मध्य में उपास्य देव की स्थापना के लिये प्रधान कक्ष की योजना होती थी। इनमें से एक विशेष उल्लेखनीय विहार में विशाल मात्रा में कांच एवं सीप की चूड़ियां प्राप्त हुई हैं, जिससे अनुमान होता है कि यह भिक्षुणियों का विहार रहा होगा। इन्हीं विहारों में एक लघु स्फटिक स्तूप, सुनहला वज्र तथा बौद्ध मंत्र लेख युक्त मिट्‌टी की पकी मुहरों के साथ अभिलिखित बौद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं।

मल्हार में 1975 से आरंभ हुए उत्खनन के तृतीय काल (ईस्वी 300 से ईस्वी 650 तक) स्तर में शिव मंदिर, आवासीय अवशेषों के साथ वज्रयान सम्प्रदाय का बौद्ध मंदिर और चैत्य के अवशेष प्राप्त हुए हैं। मंदिर के बीच ईंट रोड़े का धरातल बनाकर, उस पर पकी ईंटों का फर्श है। यहां हेवज्र की प्रतिमा स्थापित थी। मंदिर की योजना में प्रदक्षिणा पथ, बरामदा और पांच कक्षों का भी प्रावधान है। मल्हार उत्खनन की एक अन्य संरचना के पश्चिमी भाग में अर्द्धवृत्ताकार ऊंचे चबूतरे के संकेत मिले, जिस पर मुख्‍य प्रतिमा स्थापित रही होगी। यहीं चार द्वार स्तंभ, एक बड़े स्तूप संरचना की संभावना और बौद्ध प्रतिमाओं के साथ ही बौद्ध मंत्र अंकित विविध मृण्मुद्राएं तथा स्तूपाकार स्फटिक खंड भी प्राप्त हुआ।

बस्तर में बौद्ध स्थापत्य अवशेषों-स्तूप आदि का अनुमान पूर्व से किया जाता रहा, किन्तु बौद्ध स्थापत्य के पुष्ट प्रमाण 1990 की खुदाई से उजागर हुये। भोंगापाल नामक ग्राम में लगभग पांचवीं-छठी सदी ईस्वी के शैव व शाक्त मंदिरों के साथ एक विशाल आकार (36×34×5.5 मीटर) के टीले से ईंट निर्मित चैत्य के अवशेष प्रकाश में आए, जिस पर पूर्व से ही पद्‌मासन ध्यानी बुद्ध की प्रतिमा अवस्थित थी। अर्द्धवृत्ताकार पृष्ठ वाले सर्वांग चैत्य की योजना में चबूतरा, मंडप, प्रदक्षिणा पथ, गर्भगृह, बरामदे एवं पार्श्वकक्ष है। दुर्गम महाकान्तार की तत्कालीन स्थितियों में नल शासकों के काल में हुए इस चैत्य का निर्माण धार्मिक समन्वय व सद्‌भाव के साथ बौद्ध धर्म की लोकप्रियता का प्रबल प्रमाण है।

हीनयान की मूर्तिकला में मुख्‍यतः जातक कथाओं, यक्ष-यक्षिणियों और लोक जीवन के दृश्यों के साथ बुद्ध को उनके प्रतीकों, यथा- चक्र, छत्र, बोधिवृक्ष, चरण चिन्ह आदि अंकनों से प्रदर्शित किया गया है, जबकि महायान और वज्रयान की कला के माध्यम से बौद्ध देवकुल के ध्यानी बुद्ध मानुषी बुद्ध, शाक्य मुनि गौतम और बोधिसत्वों के साथ ही बुद्ध और बोधिसत्वों की शक्तियां तारा की अवधारणा और प्रतिमा शास्त्र के अनुरूप प्रतिमाओं का निर्माण आरंभ हुआ। ध्यानी बुद्धों में अमिताभ, अक्षोम्य, वैरोचन, अमोघसिद्धि और रत्नसंभव क्रमशः पांच अधिभौतिक तत्वों संज्ञा, विज्ञान, रूप, संस्कार और वेदना का रूपांकन है। शाक्य मुनि गौतम को मुख्‍यतः ध्यान, भूस्पर्श और धर्मचक्र मुद्रा में प्रदर्शित किया जाता है। बोधिसत्वों में प्रमुख मैत्रेय, पद्मपाणि अवलोकितेश्वर, मंजुश्री और वज्रपाणि हैं। इनमें मैत्रेय, भावी बोधिसत्व होते हुए भी बोधिसत्व के रूप में मान्य हैं। पद्मपाणि, बोधिसत्वों में प्रधान और दयापूर्ण है। मंजुश्री, बुद्धि को प्रखर कर, मूल और मिथ्या का नाश करने के लिये खड्‌ग धारण करते हैं और अपेक्षाकृत कठोर बोधिसत्व, वज्रपाणि पाप और असत्‌ के शत्रु हैं। तारा के साथ अन्य देवियों, व्यन्तर देवताओं और हिन्दू देवताओं के वज्रयानी स्वरूप की निर्माण परम्परा भी ज्ञात होती है।

छत्तीसगढ़ अंचल से प्राप्त बौद्ध प्रतिमाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिरपुर की धातु प्रतिमाएं हैं। लगभग सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी में सिरपुर धातु प्रतिमा निर्माण का केन्द्र था। यहां प्रतिमाओं को टुकड़ों में अलग-अलग ढालकर जोड़ लिया जाता था इसके वस्त्राभूषण गढ़कर उस पर सोने का मुलम्मा कर, आंखों में चांदी का जड़ाव, बालों में काला रंग, ओंठ पर ताम्बे का रंग चढ़ाकर अंत में असली रत्नों सहित आभूषण से अलंकृत किया जाता था। सिरपुर से लगभग 25 धातु प्रतिमा की दुर्लभ निधि 1939 में अनायास श्रमिकों के हाथ लगी (कहीं कहीं यह संखया 44 और 60 भी बताई गई है), जिसमें से छः मूर्तियां तत्कालीन मालगुजार ने विभिन्न लोगों को भेंट में दे दी। दो प्रतिमाएं मुनि कांतिसागर को प्रदान की गई, उनमें से एक सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली तारा की प्रतिमा को मुनि ने भारत विद्या भवन, मुम्बई को सौंप दिया, किन्तु यह प्रतिमा आजकल लास एंजिलिस, अमरीका के काउन्टी म्यूजियम में प्रदर्शित है। इस निधि की ग्यारह प्रतिमाएं रायपुर संग्रहालय में है जिसमें तीन प्रतिमाएं बुद्ध की, चार पद्मपाणि की, एक वज्रपाणि की, दो मंजुश्री की तथा एक तारा की है। इसके साथ ही खुदाई से प्राप्त भूस्पर्श बुद्ध की लघु प्रतिमा कला प्रतिमान की दृष्टि से उच्च कोटि की है। सिरपुर की यह निधि न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि संपूर्ण भारतीय कला की अनुपम निधि है।

सिरपुर से प्राप्त पाषाण बौद्ध प्रतिमाओं में कनिंघम को प्राप्त विशाल प्रतिमा शीर्ष, विहारों से प्राप्त प्रतिमाओं के अतिरिक्त गंधेश्वर मंदिर की भूस्पर्श बुद्ध की लगभग डेढ़ मीटर ऊंची प्रतिमा उल्लेखनीय है। प्रतिमा पार्श्व में पारंपरिक सिंह व्याल के स्थान पर मेष व्याल का अंकन है। प्रतिमा के साथ मोर व सर्प का भी अंकन है अतएव इसकी पहचान अक्षोभ्य से भी की गई है। गंधेश्वर मंदिर की एक अन्य प्रतिमा पर उड़ीसा कला शैली का प्रभाव परिलक्षित होता है इस प्रतिमा के उष्णीश-शीर्ष पर बौद्ध मंत्र अभिलिखित है। प्रतिमा का सौम्य भाव मुग्ध करने में सक्षम है। रायपुर संग्रहालय में भी सिरपुर से प्राप्त बौद्ध पाषाण प्रतिमाएं सुरक्षित है, जिनमें पद्मपाणि एवं तारा के साथ स्थानक बुद्ध प्रतिमा महत्वपूर्ण है। कमलासन पर स्थित तीनों प्रतिमाएं लय और भंगिमा की दृष्टि से अत्यंत आकर्षक है, जिसमें कलाकार के सुदीर्घ कलाभ्यास से विकसित उत्कर्ष के सहज दर्शन होते हैं। इसके अतिरिक्त सिरपुर के स्थानीय संग्रह में भी कुछ आकर्षक बौद्ध प्रतिमाएं सुरक्षित हैं।

मल्हार में बुद्ध की भूस्पर्श प्रतिमा, ध्यानी बुद्ध, हेवज्र, पद्मपाणि, तारा तथा विशेष उल्लेखनीय बोधिसत्व प्रतिमा है। इस चतुर्भुजी आसनस्थ प्रतिमा का अलंकरण चक्राकार कुंडल, ग्रैवेयक, कटिबंध, केयूर आदि से किया गया है। प्रतिमा के ऊपरी भाग में विभिन्न मुद्राओं में पांच ध्यानी बुद्ध तथा तारा व मंजुश्री अंकित है। मल्हार स्थानीय संग्रहालय के एक स्तंभ पर बुद्ध के जीवन चरित का अंकन किया गया है। ग्राम के एक निजी भवन में प्रयुक्त, प्राचीन अलंकृत स्तंभ भी उल्लेखनीय है, जिस पर कच्छप और उलूक जातक के कथानकों का दृश्यांकन है। मल्हार से संलग्न ग्राम जैतपुर से विविध बौद्ध प्रतिमाएं ज्ञात हैं। मल्हार के स्थानीय संग्रह तथा ग्राम में विभिन्न स्थानों पर भी बौद्ध प्रतिमाएं देखी जा सकती है। कला शैली के आधार पर यह स्पष्ट अनुमान किया जा सकता है कि मल्हार सातवीं-आठवीं सदी ईस्वी से बारहवीं सदी ईस्वी तक बौद्धों का महत्वपूर्ण केन्द्र रहा है और यहां हिन्दू धर्म के सभी सम्प्रदायों का जैन और बौद्ध सम्प्रदाय के साथ सह-अस्तित्व था। तत्कालीन यह वातावरण वर्तमान के लिये प्रेरक होकर अधिक प्रासंगिक हो जाता है।

छत्तीसगढ़ अंचल के अन्य स्थलों, यथा-हथगढ़ा (रायगढ़), राजिम, आरंग, तुरतुरिया आदि से भी महत्वपूर्ण बौद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुई है। एक विशेष प्रतिमा खैरागढ़ विश्वविद्यालय के संग्रहालय में सुरक्षित है। इस मानवाकार बुद्ध प्रतिमा के परिकर में बुद्ध के जन्म, सम्बोधि, धर्मचक्र प्रवर्तन तथा परिनिर्वाण का दृश्यांकन है। रतनपुर से प्राप्त बुद्ध की भूस्पर्श मुद्रा की एक प्रतिमा, बिलासपुर संग्रहालय के संग्रह में है। छत्तीसगढ़ में बौद्ध पुरावशेषों के साथ अंचल की परम्परा का संक्षिप्त उल्लेख समीचीन होगा। जिला गजेटियर की सूचना के अनुसार तुरतुरिया में बौद्ध भिक्षुणियों का मठ था। सरगुजा के मैनपाट की आधुनिक संरचनाओं में विद्यमान वहां के धार्मिक वातावरण को आत्मसात करते ही बौद्ध धर्म की काल निरपेक्ष पवित्रता का आभास सहज सुलभ हो जाता है और अन्ततः बिलासपुर में भी वार्ड क्रमांक 33 में एक आधुनिक किन्तु उपेक्षित मंदिर है, जहां बुद्ध की प्रतिमा स्थापित है।

बौद्ध पुरावशेषों की चर्चा करते हुए यह स्वाभाविक स्मरण होता है कि इस भूमि से प्रारंभ और विकसित यह धर्म देश में पुरावशेषों के अनुपात में अत्यल्प अवशिष्ट रह गया था। 1951 की जनगणना के अनुसार देश में कुल 2487 बौद्ध मतावलम्बी थे, किन्तु 1961 की जनगणना में बौद्ध धर्मावलंबियों की संख्‍या 32,50,227 हो गई। निश्चय ही यह बौद्ध धर्म के पुनरूद्धार का दौर है। आज के इस वक्तव्य को रंजीत होसकोटे के उद्धरण से विराम देता हूं। धर्म-दर्शन विषय के टीकाकार होसकोटे ने हाल के वर्षों में बौद्ध धर्म के नैतिक एवं राजनैतिक पक्षों पर भारत के दलित वर्ग के विशेष संदर्भ में व्यापक कार्य किया है। होसकोटे का बुद्धवचन का निरूपण है- ''बुद्ध के लिये आनंद हमसे घृणा करने वालों से घृणा करने में नहीं अपितु ऐसी भावनाओं से दूषित होने के नकार में है- जो घातक सोच के दबाव से मुक्ति है।''



सम्यक विचार मंच, बिलासपुर द्वारा बुद्ध जयंती दिनांक 30 अप्रैल 1999 को ''अतीत-वर्तमान'' श्रृंखलान्तर्गत प्रेस क्लब बिलासपुर में आयोजित कार्यक्रम में प्रस्तुत मेरा आलेख। यह व्याख्‍यान, आधार वक्तव्य बन गया और इसके बाद बौद्ध परम्परा पर लंबी चर्चा हुई थी, जिसमें भाग लेने वाले चित्र में दिखाई दे रहे हैं- आयोजक सर्वश्री कपूर वासनिक, राजेश तिवारी, डा. चन्द्रशेखर रहालकर, आनंद मिश्र, नंद कश्यप, प्रदीप पाटिल, शाकिर अली, सी के खाण्‍डे, रत्‍नाकर पहाड़ी, डा. हेमचन्‍द्र पांडे, डा. आर जी शर्मा, उदय प्रताप सिंह चंदेल, रोहिणी कुमार बाजपेयी आदि।


हाल के वर्षों में, जिसका विवरण यहां नहीं है, मुख्‍यतः सिरपुर उत्‍खनन से महत्‍वपूर्ण बौद्ध अवशेष, यहां विहार व स्‍तूप के चित्र लगाए गए हैं, प्रकाश में आए हैं।

Monday, January 23, 2012

मल्हार

विन्ध्य और सतपुड़ा का संगम और इसके बीचों-बीच मेकल का गर्वोन्नत शिखर। मेकल के पादतल पर छत्तीसगढ़ का खुला और विस्तृत मैदान। महानदी, शिवनाथ के जल-प्रवाह से सिंचित होकर इस मैदान में विकसित हुआ है सभ्यता का वह शिशु, जो आदिम जनजातियों में सांस लेता है, जन-जन में धड़कता है और पुराने अवशेषों में आंखें खोल कर मानों अपनी निश्छल और मासूम हंसी बिखेर देता है, तब छत्तीसगढ़ का यह धान का कटोरा लबालब भर जाता है सम्पन्नता से और जिसकी सौम्यता, आभूषण बन अपनी चमक से स्वाभाविक ही आकर्षित करती है।

देवालयों के खण्डहर, टूटी-फूटी मूर्तियां, पत्थर और तांबे पर कुरेदे अजीब अक्षर, पकी मिट्‌टी के खिलौने-ठीकरे और सोने, चांदी, तांबे के सिक्के। ढेरों तरह के अवशेष और न जाने कितने पुराने। पर हैं पुराने जरूर। किसी की नजर पड़ती है और वह तय कर लेता है काल का अंतर और अंतर इतना साफ है कि अवशेष मानव निर्मित होंगे, मानने का मन नहीं होता। शायद यह सब कुछ परमात्मा ने ही गढ़ा है। कोई राजा, महाप्रतापी और बहुत पुराना तो जरूर रहा होगा। शायद उसने सिरजा हो यह सब, वह भी सतजुग में-
रइया के सिरजे रइया रतनपुर,
राजा बेनू के सिरजे मलार।

कौन है बेनू राजा, गायक देवार भी नहीं जानता, लेकिन गाता है। इतिहास से अधिक जीवंत लोक-जीवन की साम-वाणी। इतिहास, और खासकर पुरातत्व तो अंधेरे में चलाया तीर है, निशाने पर लगा तो लगा नहीं तो तुक्का? जितना कुछ मिला, खोजा उतना इतिहासकार ने हमें बताया, बाकी जिज्ञासा शांत करने का जवाबदार तो वह नहीं है। इसीलिए देवार कवि-गायक का स्वर फूटता है या कोई साहित्यकार लिख जाता है-
गजानन अंबिका की गोद में सानंद रहते हैं।
करे कल्याण जो जन का उन्हें केदार कहते हैं॥
करे जो देवि को शोभित उसे श्रृंगार कहते हैं।
करे हर मन को जो मोहित उसे मल्हार कहते हैं॥

हमारा इतिहास इसी तरह मिथक दंतकथाओं से जीवंत रहा है और हमारे सामाजिक परिवेश हमारी चेतना में, धर्म-संस्कृति से मिलकर एकरूप सपाट बुनावट कस जाती है कि उनके ताने-बाने को देख पाना सरल नहीं है, यही हमारी मानसिकता की उदार, संतुलित, वृहत्तर संसार की पृष्ठभूमि बनती है।

मल्हार, मलार और मल्लालपत्तन; नाम तीन, लेकिन स्थान एक ही, बिलासपुर से 33 किलोमीटर दूर, मस्तूरी-जोंधरा मार्ग पर मामूली सा कस्बा है यह। किन्तु पुरानी कला-संस्कृति के प्रमाण और काल का विस्तार मानों मल्हार के सीमित दायरे में ही सिमट आया है, काल और कला का इतना सघन विस्तार अन्यत्र दुर्लभ है। राह चलते यहां आपसे कोई ठीकरा या प्रतिमा खंड ठोकर खाकर लुढ़क सकता है, ऐसा टुकड़ा जो समृद्धि-गौरव से गुरु-गंभीर मौन हो और अपने किसी आत्मीय पुराविद को पाकर यकायक मुखर हो उठे।

मल्हार और आसपास के वर्तमान गांव- चकरबेढ़ा, बेटरी, जुनवानी, नेवारी, जैतपुर, बूढ़ीखार; शायद यह पूरा क्षेत्र पहले विशाल नगर का हिस्सा रहा होगा। वर्तमान जैतपुर और बेटरी गांव लीलागर नदी के किनारे हैं यानि मल्हार पूर्व में लीलागर, पश्चिम में कुछ दूरी पर अरपा और दक्षिण में कुछ और दूर शिवनाथ नदी, इस सलिला-त्रयी की गोद में है। तालाब भी कोई पांच-पचीस नहीं 'छै आगर छै कोरी' यानि पूरे एक सौ छब्‍बीस।

मलार का मल्हार नाम परिवर्तन तो हाल के वर्षों में हुआ, शायद अधिक ललित और साहित्यिक नाम के रूप में सुधारने की कोशिश में ऐसा हुआ। यद्यपि मूल स्थान नाम मलार, मल्लालपत्तन से सीधे व्युत्पन्न है। स्थान नाम का पत्तन शब्द महत्वपूर्ण है, पत्तन यानि बाजार-हाट या गोदी। पुराविदों का मत है कि मल्हार कभी प्रशासनिक मुख्‍यालय या राजधानी रहा हो, ऐसा पुष्ट प्रमाण नाममात्र को मिलता है, किन्तु धर्म, कला, व्यवसाय का महत्वपूर्ण केन्द्र जरूर रहा है। जलमार्ग से होने वाले व्यापारिक आवागमन की दृष्टि से मल्हार में आज भी केंवट-मल्लाहों का बाहुल्य है और केंवट आबादी के क्षेत्र भसर्री में पुराने अवशेषों की भरमार है, यहां घर की नींव खोदते हुए पुरानी नींव निकल सकती है और कुंआ खोदते हुए निकल आया पुराना कुंआ तो अब भी मौके पर देखा जा सकता है।

दो हजार साल से भी अधिक पुरानी बताई जाने वाली वासुदेव-विष्णु की अद्वितीय प्रतिमा सहित अनगिनत कलाकृतियां। देव-प्रतिमाएं इतनी कि कहावत चलती है- 'सब देवता बसे मलार।' प्रसन्नमात्र के एकमात्र ज्ञात तांबे के सिक्के और मघ शासकों के दुर्लभ सिक्कों सहित ढेरों सिक्के, मुद्रांक, व्याघ्रराज और महाशिवगुप्त के अभिलेखों सहित सैकड़ों-हजारों शब्दों का उत्कीर्ण प्राचीन साहित्य, बेशकीमती और ठोस पत्थरों की गुरिया और मनकों की तो खान ही है।
पुरानी कीमियागिरी में प्रेरणा की भूमिका आदिम इच्छा ने ही निभाई, यानि यौवन और स्वर्ण या कहें कालजयी होने की ललक और भौतिक सम्पन्नता, ऐश्वर्य की चाह। मल्हार की प्राचीन कलाकृतियां आज कालजयी होकर हमारे समक्ष विद्यमान हैं और सोना तो 'कनक कनक ते सौ गुनी मादकता अधिकाय' है ही। कहते हैं मल्हार में कभी सोने की बरसात हुई थी और यहां दुनिया के लिए ढाई दिन का राशन पूरा कर सकने की सम्पदा धरती के गर्भ में समाई हुई है। नाम भी है- सोनबरसा खार। इन कथनों में चाहे जितनी सचाई हो लेकिन मल्हार में आज भी यह सच्ची कहावत पूरी तरह लागू है कि 'संफरिया नांगर नई चलय' यानि हल अकेले-अकेले ही जोतते है किसी के साथ नहीं, क्योंकि कहीं भी, कभी भी और कुछ भी मिल जाने की आशा अब भी लोगों को होती है।

मल्हार के पुरातत्व का काल और क्षेत्र-विस्तार धार्मिकता के तीन बिंदुओं पर केन्द्रित हो गया है- पातालेश्वर या केदारेश्वर मंदिर, देउर और डिड़िन दाई। पातालेश्वर मंदिर परिसर में इस ग्राम और क्षेत्र की धार्मिक आस्थाओं के साथ विविध गतिविधियां जुड़ी हैं। यहीं स्थानीय संग्रहालय है। मल्हार महोत्सव पर पूरे छत्तीसगढ़ के लोक-कलाकारों का मेला यहां लग जाता था और महाशिवरात्रि पर दस दिन के मेले में तो मानों पूरा क्षेत्र ही उमड़ पड़ता है।

देउर का प्राचीन मंदिर का टीला देउर कहा जाता था और दो विशाल मूर्तियों के कारण भीमा-कीचक भी। किसी प्राचीन स्थल की पूरी रहस्यात्मकता सहित इस टीले की रहस्य की परतें तीसेक साल पहले खुलनी शुरू हुईं। रहस्य के साथ भौतिकता की भव्य कल्पना सदैव जुड़ जाती है और यह प्रकाशित होते ही लोक-मानस को निराशा ही होती है देउर के स्थान पर प्रकाश में आया आठवीं सदी की महत्वपूर्ण स्थापत्य संरचना लेकिन लोक-मानस का मनो-महल भरभरा कर ढह गया, इसीलिए शायद वह धार्मिक महत्व न पा सका।

और डिड़िन दाई से तो जैसे पूरे मल्हार की धर्म-भावना अनुप्राणित हुई है। काले चमकदार पत्थर से बनी देवी। डिड़वा यानि अविवाहित वयस्क पुरुष और डिड़िन अर्थात्‌ कुंवारी लड़की। माना जाता है कि मल्हार के शैव क्षेत्र में डिडिनेश्वरी शक्ति अथवा पार्वती का रूप है, जब वे गौरी थीं, शिव-वर पाने को आराधनारत थीं। डिड़िन दाई का मंदिर पूरे मल्हार और आसपास के जन-जन की आस्था का केन्द्र है।

सरकारी पुरातत्व विभाग द्वारा तो यहां संरक्षण, अनुरक्षण, शोध और संकलन किया ही गया है, सागर विश्वविद्यालय द्वारा उत्खनन भी यहां कराया गया लेकिन ग्रामवासी भी कुछ पीछे नहीं हैं। लगभग सभी घरों में कोई अलंकृत नक्काशी का टुकड़ा देखा जा सकता है और कुछ ऐसे लोग भी हैं, प्राचीन अवशेषों का संकलन और सुरक्षा, जिनकी दिनचर्या में शामिल है। जो ऐसे माहौल में जन्मा, पला-बढ़ा उसकी विशिष्ट संवेदना और मल्हार से लगाव तो स्वाभाविक ही है तथा मल्हार के गौरव को प्रकाशित करने के प्रयास भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं और इस परिवेश में संस्कृति के अन्य पक्ष- संगीत, गायन और साहित्यिक चेतना का विकास भी स्वाभाविक है। इस छोटे से कस्बे में राष्ट्रीय स्तर की कवि गोष्ठियां, लोकमंच के कार्यक्रम और सांस्कृतिक उत्सवों के आयोजन से लेकर राजनैतिक कार्यक्रम तक आयोजित हुए हैं, होते रहते हैं। पुरातत्व से जुड़े दुनिया भर के लोगों का तो तीर्थ यह है ही।

टीपः

मल्‍हार ब्लॉग वाले श्री पा ना सुब्रमनियन और श्रीमती शुभदा-श्री विवेक जोगलेकर जी से बीसेक साल पहले पुरातत्‍व पर बात होती तो मेरी प्रशिक्षित बौद्धिकता और अर्जित ज्ञान (सूचना) से काम न चल पाता, इससे मुझे दिशा मिली और पुराने स्‍मारक-स्‍थलों को अपने विषय-विधा की सीमा से निकल कर देखने में मदद हुई। साथ ही श्री जी एल रायकवार की भटकी-सी लगने वाली बातों से पुरातत्‍वीय परिवेश के लिए न सिर्फ नजर खुली रखने, बल्कि उसके प्रति सम्‍मान का भाव विकसित करने का रास्‍ता बना। तभी यह प्रयोग किया था कि किसी पुरातत्‍वीय स्‍थल पर ऐसा कुछ लिखूं, जिसमें पुरातत्‍व न-सा हो।