सरकारी कामकाज के दौरान आज शाम तक की प्राथमिकता, कल सुबह कार्यालय पहुंचने पर पता लगता कि कल शाम तक जो टॉप प्रियारिटी है, वह अब ‘उसे छोड़ो, बेकार की बात है, यह कर के लाइए, उच्च स्तरीय बैठक है‘ घंटे भर का समय होता, आप काम पर बैठें, शुरू कर पाएं, बुलावा आने लगता, ‘हुआ, हो गया ... और कितना समय लगेगा‘ आपलोग किसी काम की प्राथमिकता नहीं समझते, मंत्रालय से फोन आ रहा है। जब तक कहें कि आप बैठने दें, तब तो काम कर पाएं, फिर से मंत्रालय से आने वाले फोन की घंटी बज जाती ...। ‘आफिस-आफिस‘ खेल इसी तरह चलता रहता।
ऐसी ही नौबत आई, जब कहा गया कि राज्य की संस्कृति पर संकट है, लोक-कलाएं विलुप्त और नष्ट हो रही हैं। इनका संरक्षण-संवर्धन आवश्यक है, इस पर तुरंत एक नोट तैयार करना है। पुरातत्व-प्रशिक्षित का स्वभाव कुछ-कुछ बोदा-सा माना जा सकता है, वह जाने कितनों को बनते-बिगड़ते को देखा-समझा होता है, और ऐसी सभी बातों, वस्तुओं को दशकों में नहीं सदियों में सोचता है। बहरहाल, हासिल यह कि कभी ऐसा काम भी करना होता, जो शायद दबाव में ही संभव हो। आज यह नौबत आए तो तुरंत एआइ की मदद याद आएगी, तब यह स्थिति नहीं थी, और सहयोगियों की मदद से जो नोट बना, समझ नहीं पाता कि वह कितना सार्थक है, फिर भी ... वह इस प्रकार था-
लोक कलाओं का संरक्षण एवं संवर्धन
परिचय -
छत्तीसगढ़ कला और संस्कृति की दृष्टि से समृद्ध भूभाग है। यह विविधतापूर्ण पारंपरिक लोक संस्कृति से अनुप्राणित है। लोक संस्कृति की यह सम्पन्नता इस अंचल के विशिष्ट भौगोलिक स्थिति की वजह से भी है। यह चारो ओर से विभिन्न भाषा-भाषी राज्यों से जुड़ा हुआ है। यहाँ की स्थानीय जनजातीय और मैदानी लोकसांस्कृतिक तत्त्वों में उत्तर में सरगुजा अंतर्गत उत्तरप्रदेश और झारखण्ड, पूर्व में ओडिशा, दक्षिण में आंध्रप्रदेश और तेलंगाना तथा पश्चिमी भाग में महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश के लोक सांस्कृतिक विशेषताओं का प्रभाव व समन्वय देखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ में इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मुख्य आधार इसका भूगोल ही है।
कला रूप -
छत्तीसगढ़ में लोक कलाओं के विविध रूप विद्यमान हैं, जिन्हें यहाँ इस प्रकार वर्गीकृत कर प्रस्तुत किया गया है-
1. लोकगाथा, लोकगीत एवं पारंपरिक वाद्य यन्त्र- यहाँ के अधिकांश लोकगीतों में किसी न किसी रूप में लोकगाथा का समावेश है। ये वस्तुतः गेय कहानियां होती हैं। इसके अंतर्गत पंडवानी, आल्हा-ऊदल, ढोलामारू, लोरिक चंदा और सरवन कुमार आदि उल्लेखनीय हैं।
स्थानीय/आंचलिक लोक सांस्कृतिक परम्पराओं का संवहन लोकगीतों के माध्यम से होता है। यहाँ के अनेक लोकगीत और लोकनृत्य आपस में संबद्ध हैं। सुआ, भोजली, ददरिया, सधौरी, बिहाव गीत, गौरा-गौरी, डण्डा, करमा, मड़ई, बांस, जंवारा, देवार, रहस आदि यहाँ के प्रमुख लोकगीत हैं।
लोकगीतों, लोकगाथाओं और लोकनृत्य/नाट्य इन सभी गेय अथवा प्रदर्शनकारी लोककलाओं में पारम्परिक वाद्यों की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण होती है। ये दर्शकों के मनोभाव को तरंगित करते और विधा को प्रभावोत्पादक बनाते हैं। छत्तीसगढ़ में भांति-भांति के पारंपरिक वाद्य यन्त्रों का प्रयोग यथा अवसर किया जाता है। ये वाद्य यन्त्र उस अवसर के अनुकूल मानवीय संवेदना को प्रगाढ़ करते हैं। यहाँ प्रचलित वाद्यों में ढोल, नगाड़ा, ढोलक, बांसुरी, हारमोनियम, बैंजो, तबला, मंजीरा, दफडा, निशान, चिकारा, सरांगी, इसराज, ढूगरू, राऊत बांसुरी, नमडेवन, खंझेरी, खल्हर, मंदरी, अलगोजा, चांग या डफ, ताशा, करताल, झांझ, मोहरी, बांस बाजा, सींग बाजा, मोहरी, धनकुल आदि हैं.
2. लोकनृत्य- विभिन्न समुदायों के अपने-अपने पारंपरिक नृत्य हैं जो किसी खास अवसर पर कियो जाते हैं। इस अंचल में सरगुजा से लेकर बस्तर तक लोकनृत्यों की एक श्रृंखला दिखाई पड़ती है जो इस प्रकार हैं- करमा, डण्डा/शैला, सरहुल, सुआ, पंथी, रावत, डोमकच, गेंडी, ककसार आदि। इन लोकनृत्यों की भी अनेक स्थानीय शैलियाँ हैं।
3. पारंपरिक नाट्य/मंचीय प्रस्तुतिकारी विधाएं- यहाँ की अनेक पारम्परिक लोकगाथाएं और लोकगीत जैसे पण्डवानी और रहस विधा का नाट्य शैली में प्रदर्शन प्रचलित है। इनके साथ ही नाचा, गम्मत, भतरा नाट, माओपाटा आदि प्रसिद्ध प्रस्तुतिकारी लोकनाट्य प्रचलित हैं।
वर्तमान परिदृश्य -
वर्तमान में छत्तीसगढ़ के प्रायः सभी कलारूपों के स्वरूप में समय के साथ हुये परिवर्तन को देखा जा सकता है। गांव के गुड़ी-चौपाल में होने वाली विभिन्न प्रदर्शनकारी कलाओं का मंचन अब राज्यस्तरीय/राष्ट्रीय लोक मंचों पर होने लगा है जिसके कारण इनके स्वरूप में धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगा है। जैसे पंडवानी की शास्त्रीय वेदमती शैली को पद्मविभूषण तीजनबाई एवं अन्य कलाकारों द्वारा एक नई शैली कापालिक के रूप में विकसित किया गया। इसी तरह ख्यात पंथी कलाकार स्व. श्री देवदास बंजारे द्वारा एक्रोबैटिक प्रदर्शन के प्रभाव से पंथी नृत्य कला के स्वरूप में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। इन लोककलाओं को विशेष ख्याति प्राप्त हुई।
इस क्रम में कतिपय ऐसी लोककलाएं भी हैं जिनका प्रचलन अलग-अलग कारणों से समय के साथ कम होता गया और इनमें से कुछ तो विलुप्ति के कगार पर हैं। जैसे रहंस (रास) और जगार कई दिनों तक चलने वाले विशाल अनुष्ठानिक व्यय साध्य आयोजनों के कारण अब इनका सीमित आयोजन ही होता है। कुछ लोककला विधाएं, उनके साथ जुड़ी विचित्र मान्यताओं के कारण उनका प्रचलन कम हो गया है। तारे-नारे/घोड़ा नाच जैसे लोकप्रिय विधाओं का प्रचलन ऐसी ही मान्यताओं के कारण कम हो गया है। ऐसा माना जाता है कि इसमें भूमिका का निर्वाह करने वाले पात्र/चरित्र के साथ अनिष्ट हो जाता है।
कार्य योजना -
कम प्रचलित/विलुप्त होती लोककला शैलियों की पहचान कर सूची तैयार करना
लोक संस्कृति हमारी अस्मिता और पहचान हैं, इसलिये इनका संरक्षण-संवर्धन अत्यावश्यक है। इसलिए ऐसी विधाएं जिनका प्रचलन कम हो गया/रहा है अथवा जो विलुप्ति के कगार पर हैं, उनके संरक्षण-संवर्धन के लिए दीर्घकालिक कार्य योजना बनाकर उनका क्रियान्वयन जरूरी है।
ऐसी लोककला विधाएं जिनका प्रचलन कम होता जा रहा है अथवा विलुप्त होते जा रहे हैं, मुख्य रूप से इन 03 क्षेत्रों से संबंधित हैं-
1. गायन- लोकगीत/लोकगाथा जैसे बांसगीत, चंदैनी, डोलामारू, भरथरी, गोपीचंदा, रतनपुरिहा भजन आदि.
2. वादन- विविध वाद्य जैसे चिकारा, सरांगी, इसराज, हिरकी, ढुंगरू, राऊत बांसुरी, बांस, टामोक, तुड़बुड़ी, खंझेरी, हिरनांग, रोंजो, डांहक, टमड़िया, खल्हर, मंदरी, अलगोजा, चांग, दफड़ा, निसान, करताल, झांझ, मोहरी, सींग बाजा, धनकुल, तमूरा, आदि.
3. नृत्य- कोरवा, बायर, छैला नाच आदि.
4. नाट्य रूप- तारे-नारे, नाचा, गम्मत, नाटक, भतरा नाट, आनुष्ठानिक प्रस्तुतियाँ जैसे रहस, लक्ष्मी जगार, तीजा जगार आदि.
कम प्रचलित/विलुप्त होती लोककला शैलियों की सूची का अद्यतनीकरण -
1/ इन क्षेत्रों के विभिन्न लोककला शैलियों की पहचान कर सूची को अद्यतन करने के लिए यह आवश्यक होगा कि इस संबंध में जानकारी इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़, लोक कला के क्षेत्र में राष्ट्रीय/राज्य स्तरीय सम्मान/पुरस्कार प्राप्त तथा अन्य प्रतिष्ठित विशेषज्ञों, संभागायुक्तों के माध्यम से जिला स्तर पर, पंचायत विभाग, आदिम जाति कल्याण विभाग, उच्च शिक्षा एवं स्कूल शिक्षा विभाग तथा स्थानीय विशेषज्ञों कलाकारों के माध्यम से जानकारी एकत्र कराई जाए।
2/ इसके लिए तीन दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया जाए जिसमें लोककला विशेषज्ञ और कलाकार सहभागिता करेंगे और वे लोककलाओं के प्रचलन कम होने/विलुप्त होने के कारणों पर विमर्श कर उनके संरक्षण-संवर्धन के लिये ठोस नीति तैयार करने हेतु सुझाव देंगे।
3/ विलुप्त होती विधाओं जैसे लोक गायन और लोक वाद्य पर पांच दिवसीय कार्यक्रम जिसमें दिन में डिमान्सट्रेशन लेक्चर और सायंकालीन प्रस्तुतियों का आयोजन किया जाए।
4/ तदन्तर संरक्षण-संवर्धन के लिए योजना तैयार कर उसका मैदानी स्तर पर क्रियान्वयन की कार्यवाही की जाए।
मान्य होने पर बजट प्रस्ताव तैयार कर प्रस्तुत किया जा सकेगा।