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Sunday, October 30, 2011

हमला-हादसा

18 अक्टूबर की शाम लखनऊ में घटित, अरविंद केजरीवाल वाली घटना के बाद समाचारों में हमला और हादसा शब्द बार-बार आने लगा।
घटना, हमला और हादसा न कही जाए तो समाचारों की दुनिया सूनी होने लगती है शायद, क्योंकि बात चप्पल-जूते चलने तक हो तो यह कोई समाचार हुआ, वह तो कहीं भी, कभी भी हो जाता है।
अखबारों में यह खबर मुखपृष्ठ पर प्रमुखता से छापी गई थी, लेकिन (गनीमत रही कि) एक अखबार जो हमला-हादसा शब्द से बच रहा था, वह 'चप्पल चला दी' और 'चप्पल फेंक कर मारी' तक सीमित रहा, किन्‍तु इस अखबार में खबर एक कालम में सिमट गई है।

खबरों में बताया गया है कि अन्ना ने इसे लोकतंत्र पर हमला कहा है। यह भी कि श्री केजरीवाल पर हमले के बाद जितेंद्र की इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्यों ने जम कर पिटाई की। बाद में श्री केजरीवाल ने हमलावर को माफ भी कर दिया।
इस संदर्भ में कुछ सवाल हैं-
? हमला, हादसा और हमलावर शब्द का इस्तेमाल,
? घटना को लोकतंत्र पर हमला कहा जाना,
? इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्यों द्वारा जितेंद्र की जम कर पिटाई,
? पीटने वाले सचमुच इंडिया अगेंस्ट करप्शन के सदस्य थे,
? ऐसी जम कर पिटाई भी 'हमला' कही जा सकती है,
? जितेंद्र की पिटाई पर वक्‍तव्‍य/कार्रवाई।

ऐसा हर ''हमला-हादसा'' मेरी दृष्टि में असहमति-योग्‍य है।

इस बीच यह भी खबर है कि 6 नवम्‍बर 2001 को नागपुर में अरविंद केजरीवाल का भाषण हुआ और इस मौके पर 'घंटानाद' संस्‍था के कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध किए जाने पर उनके कार्यकर्ताओं ने विरोधियों की जम कर पिटाई की है।
(समाचार पत्र 'आज की जनधारा', रायपुर के ब्‍लॉगकोना स्‍तंभ में 27 नवंबर 2011 को प्रकाशित)

Sunday, October 16, 2011

नाम का दाम

उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ से 1978 में प्रकाशित, हिन्दी समिति प्रभाग ग्रन्थमाला-249 है ''उपनाम : एक अध्ययन'' लेखक हैं, डॉ. शिवनारायण खन्ना। लेखक ने बताया है कि ''व्यंग्य लेख 'कमल, कामिनी और कलकत्ता' शीर्षक से 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में प्रकाशनार्थ भेजा, जो 12 अप्रैल 1959 के अंक में प्रकाशित हुआ। लगभग तभी से मैं उपनामों तथा प्रच्छन्न नामों का संकलन करता रहा हूं। इस ग्रंथ में उपनामधारी लगभग 2650 साहित्यकारों के 3000 से अधिक उपनाम तथा प्रच्छन्न नाम हैं। ... उपनाम, उपनाम रखने के उद्देश्‍य, उपनाम के आधार, प्रकार तथा विशेषताओं का विवेचन इस ग्रंथ में किया गया है।''

पुस्‍तक में उपनामों संबंधी जो नाम (शब्‍द) गिनाए गए हैं, वे हैं- अपर नाम, अन्‍य नाम, अवास्‍तविक नाम और इसी तरह नाम जोड़ते चलें- असत्‍य, आंशिक, आधा, उपाधि, कल्पित, कार्य, काल्‍पनिक, काव्‍य, कृतक, कृत्रिम, गुप्‍त, गुह्य, गोपन, गौण, घरेलू, छद्म, छोटा, तूलिका, दिखावटी, दुलार का, दूसरा, नकली, नीति, धारित, परिवर्तित, पुकारने का, प्रचलित, प्रच्‍छन्‍न, प्रिय, प्रसिद्ध, बचपन का, बनावटी, भावनात्‍मक, मुंहबोला, लघु, लाक्षणिक, लेखनी, व्‍यंग्‍य, व्‍यवसाय, शिक्षा, संकेत, सम्‍पादकीय और साहित्‍य नाम के साथ इस सूची में छाप (मुहर, चिह्न, निशान), तखल्‍लुस, पदवी भी है।

पुस्‍तक में उपनामों की चर्चा शुरू होती है- बाल्‍मीकि, व्‍यास, चाणक्‍य और कालिदास के क्रम से। लेकिन मुझे याद आ रहे हैं पंडिज्‍जी, यानि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, जिन्‍होंने व्‍योमकेश शास्‍त्री, प्रचंड, रंजन, द्विरद, राधामाधव शाक पार्थिव, अभिनव तुकाराम नामों से लेखन किया और जिनकी रचनाएं चारुचन्‍द्र का लेखा- 'चारुचन्‍द्रलेख' है और है 'बाणभट्ट की आत्‍मकथा', इससे भी आगे 'अनामदास का पोथा', मानों उनका कुछ नहीं। और याद आते हैं छत्‍तीसगढि़या मुक्तिबोध, जो गजानन माधव के बिना ही अधिक जाने जाते हैं।

मुक्तिबोध कुछ अन्‍य यौगन्‍धरायण, अवन्‍तीलाल गुप्‍ता तथा विंध्‍येश्‍वरी प्रसाद, (छद्म) नामों से भी लिखते थे। मुक्तिबोध रचनावली प्रकाशित हुई, तब छान-बीन करता रहा। उनके कुछ ऐसे लेख जो मेरे पास थे, रचनावली में शामिल न पाकर बेचैनी हुई, पर बात वहीं रह गई। फिर अवसर बना, मुक्तिबोध जी के सुपुत्र दिवाकर जी से मैंने इसका जिक्र किया, उन्‍होंने तुरंत भाई सा‍हब रमेश जी को संदेश दिया और बताया कि मुक्तिबोध जी की ऐसी रचनाओं को प्रकाशित करने की तैयारी है। राजकमल प्रकाशन ने यह पुस्‍तक 2009 में छापी 'जब प्रश्‍नचिह्न बौखला उठे' शीर्षक से। पुस्‍तक की प्रस्‍तावना 'मेरी ओर से' में रमेश गजानन मुक्तिबोध जी ने उल्‍लेख किया है- ''बिलासपुर के राहुल सिंह ने अपने निजी संग्रह से 'सारथी' के कुछ-एक अंक उपलब्‍ध कराए जिनमें निबन्‍ध प्रकाशित थे। उनके सद्भाव के लिए मैं हृदय से आभारी हूं।'' मुझे इस प्रसंग में लेकिन, मुक्तिबोध की कहानी 'ब्रह्मराक्षस का शिष्‍य' वाली राहत हुई।

देखिए पुस्तक चर्चा में आत्‍मश्‍लाघा आने लगी और वह बात रह गई, जिसके लिए पोस्ट लिखने की सोचा। तो हुआ यूं कि पिछले माह एक छोटा सा पुस्तक मेला लगा। पुस्तकों से हमारा रिश्ता काफी समय से जरा नरम-गरम सा हो चला है। चाहे पुस्तक खरीदना हो या पढ़ना। व्यवस्थित रख सकने की चिंता होती है और समय पर किताब न मिले तो चिड़चिड़ाहट। नजर, वय का साथ निभा रही है, बारीक अक्षरों से मुक्ति मिल गई है और चश्मा कहीं भूला-छूटा रह जाता है, शायद चर्म चक्षु से अधिक मन की आंखें खोलने का दैवीय निर्देश है, कब तक रहें कागज की लेखी, अपरा के चक्‍कर में। पुराने पढ़े-पढ़ाए से जमा के ब्‍याज पर अब का काम चल ही जा रहा है, लेकिन सूदखोरी का धर्म निभाते हुए तगादे की तरह भटक लेते हैं, फिर आदत भी तो जाते-जाते जाती है। पुस्तक मेले में पहुंच गए एटीएम, कुछ फुटकर रकम और अपने इस आत्मविश्वास सहित जेब में हाथ डाले कि पुस्तकें लेनी तो हैं नहीं।

समाज को प्रतिबिंबित करती, ब्लाग पर पसरी, महरिन की गैरहाजिरी और सड़क पर छेड़खानी, ऐसे बिगड़ते रिश्‍ते जो बने ही नहीं थे, पंचायतीय और मुन्सीपाल्टीय-वार्ड स्‍तरीय आफतों से ले कर अन्ना, भ्रष्टाचार, देश का पैसा विदेशों में, टाटा-बाटा के शाब्दिक जूतम-पैजार में अलविदा टाइप 'घनघोर संकट' वाली पोस्‍टों के साथ ढेर साथी हैं जो यहां अपनी चिंता और दुख बांटते समाज की तस्‍वीर बदलने में निरंतर जुटे हैं जी-जान से। मनोहर श्याम जोशी के शब्‍दों के सहारे कहना चाहूं तो त्रासद होते हास्य और हास्यास्पद बन जाने वाले त्रास के बीच छोटे-छोटे सुख मुझसे टकराते रहते हैं इसलिए लगा कि पुस्‍तक मेला की किताब के बहाने 'महंगाई डायन' और 'हाय पेट्रोल' के दौर में एक अच्छी खबर क्‍यों न बांट ली जाय।

इस सजिल्द 562+14 पृष्ठ की किताब का मूल्य है, उन्नीस रुपये। मेला छूट (या फुटकर की समस्‍या) के कारण मुझसे लिए गए पन्द्रह रुपये और हां, बारीक हिसाब करूं तो मेले में प्रवेश के पांच रुपये। फिर तो ले ही आया अच्‍छे अच्‍छों पर बीस पड़ने वाली उन्‍नीस की यह किताब, चश्मा मिल गया है, पढ़ने के बाद यह पुस्तक भी अपनी जगह पा ही लेगी। कुल जमा बात इतनी, उपनाम की इस पुस्तक का दाम तो बस नाम का हुआ।
(समाचार पत्र 'आज की जनधारा', रायपुर के ब्‍लॉगकोना स्‍तंभ में 27 नवंबर 2011 को प्रकाशित)

Saturday, October 8, 2011

राम की लीला

6 अक्‍टूबर, फिल्‍म रास्‍कल्‍स आम नियत रिलीज दिन शुक्रवार से एक दिन पहले आ गई है, दशहरे पर। 25-26 हजार आबादी वाले कस्‍बे अकलतरा में फिल्‍म का पोस्‍टर, जिस पर श्री सुदर्शन सिनेमा में यूएफओ प्रदर्शन की चिप्‍पी है।
अकलतरावासी, जो इन दिनों प्रवासी हैं उनके लिए खास खबर। मेरे लिए ग्‍लोबलाइज होती दुनिया का एक पहलू। कभी अस्‍थायी, टीन-टप्‍पर वाले, टूरिंग टाकीज सुदर्शन सिनेमा, जहां नई फिल्‍मों के लिए बरसों इंतजार करना होता, के एयरकंडीशंड यूएफओ केबिन और वहां के झरोखे से रिलीज के ही दिन फिल्‍म की झलक देखा। घनघोर किस्‍म के हिन्‍दीवादियों के लिए चिंता की खुराक होगी कि फिल्‍म का न सिर्फ नाम अंगरेजी में है, बल्कि देवनागरी में लिखा भी नहीं गया है।
टाकीज के पास ही रावण पुतला और चौपहिया प्रचार वाहन खड़ा है।

यह देख कर दशहरा-रामलीला से अनुपम टाकीज, भोंपू, सायकल, रिक्‍शे से आगे बढ़ता प्रचार और श्रुति-स्‍मृति से जो चलचित्र मानस पटल पर धावमान है, वह खुद देखते हुए लगा कि ढंग की किस्‍सागोई आती तो बता पाता। खैर, हाजिर की हुज्‍जत नहीं, गैर की तलाश नहीं। यह है, करीब 80 साल पुराना अकलतरा रामलीला का पोस्‍टर, जिसमें विज्ञापन शीर्षक से सूचना है। तब इस गांव की आबादी पांच हजार भी न रही होगी। गांव की अपनी लीला का दौर बीता, खास मौकों पर रहंस-गम्‍मत के आयोजन में दूर-पास के कलाकार आते रहे।

लगभग सन 1950 में छः-एक हजार हो गई आबादी वाले अकलतरा में पहले-पहल 'गणेश' टाकीज स्‍थापित हुई। इसके कर्ता-धर्ता शिवरीनारायण नाटक-लीला से जुड़े द्वारिका प्रसाद खण्‍डेलिया जी थे। अकलतरा रामलीला से जुड़े मुलमुलावासी प्रसिद्ध तबलावादक भानसिंह जी के पुत्र जीतसिंह जी ने राजलक्ष्‍मी टूरिंग टाकीज शुरू कर, केन्‍द्र अकलतरा को रखा। इस टाकीज के साथ लोग याद करते हैं सोहराब मोदी के शेर मार्का मिनर्वा मूवीटोन वाली फिल्‍म 'झांसी की रानी'। राजलक्ष्‍मी टाकीज के रुपहले परदे पर पहली बार यह रंगीन चलचित्र प्रदर्शित हुआ। विदेशी तकनीशियनों की मदद से बनी संभवतः पहली टेकनीकलर हिन्‍दुस्‍तानी फिल्‍म थी यह। रामलीला के सूत्रधार बैरिस्‍टर छेदीलाल जी के भतीजे केशवकुमार सिंह जी (उनके न रहने का यह पहला दशहरा था मेरे लिए) ने लगभग इसके साथ ही सन 1957 में अनिल टाकीज शुरू की।

इसी साल रामलीला में प्रमुख भूमिका निभाने वाले शिवाधीन महराज के पुत्र रमेश दुबे जी ने 'जय अम्‍बे' फिल्‍म प्रदर्शन के साथ अनुपम टाकीज शुरू किया। उनकी श्री टाकीज बनी और सक्‍ती से रघुवीर टूरिंग टाकीज आती-जाती रही। तब तक बिजली आई नहीं थी, जनरेटर का सहारा होता। 'ओम जै जगदीश हरे और हरे मुरारे मधुकैटभारे...' आरती रिकार्ड के साथ भारतीय समाचार चित्र, फिल्‍म्‍स डिवीजन की भेंट, आरंभ होता। फिल्‍म में मध्‍यांतर तो होता ही, बीच में ''कृपया शांत रहें, रील बदली जा रही है'' स्‍लाइड दिखाया जाता। एक तरफ मर्दाना तो दूसरी तरफ जनानी-बच्‍चों की बैठक और बीच में स्‍क्रीन वाली व्‍यवस्‍था भी प्रचलित रही। चाह रहा हूं, वैसी बात, वह रफ्तार और रवानी नहीं बन पा रही, सो वापस दशहरे पर।

पुरानी रामलीला, न जाने कब दशहरे की झांकी में सीमित हो गई है। सोचता हूं लीला पुरुष तो कृष्‍ण हैं और राम मर्यादा पुरुषोत्‍तम, लेकिन अवतार और विग्रह लीला ही है, राम की हो या कृष्‍ण की। सामने से झांकी गुजर रही है। राम-रावण दरबार साथ-साथ ट्रेक्‍टर की एक ही ट्राली पर। गीत बज रहा है 'डीजे'- ''इश्क के नाम पर करते सभी अब रासलीला हैं, मैं करूं तो साला, कैरेक्टर ढीला है'' - क्‍या यह रावण की ओर से कहा जा रहा है?
रावण-वध की तैयारी है। तीनेक साल का बच्‍चा कंधे पर सवार, सवाल किए जा रहा है और मचल रहा है, पापा! हमू लेमनचूस (लॉलीपाप) लेबो, ओ दे रावन घलो धरे हे।
सब प्रभु की माया, राम तेरी लीला न्‍यारी।

कुछ दिनों से बार-बार ध्‍यान में आता है कि सभ्‍यता का सब-आल्‍टर्न इतिहास- गनीमत है कि यह दलित, शोषित, उपेक्षित, वंचितों का इतिहास नहीं, बल्कि हाशिये का या उपाश्रयी इतिहास कहा जाता है, सही मायनों में ब्‍लाग पर ही लिखा जा रहा है।

Tuesday, October 4, 2011

लोक-मड़ई और जगार

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सांस्कृतिक अस्मिता के गौरव-प्रदेश छत्तीसगढ़ में इस वर्ष (सन 2004) का नवम्बर-दिसम्बर माह एक विशेष संदर्भ में उल्लेखनीय है। छत्तीसगढ़ राज्य की चौथी वर्षगांठ पर राज्‍य स्‍थापना दिवस 1 नवंबर, राज्योत्सव से आरंभ होकर वैसे तो यह मड़ई-मेला और जगार का समय है, लेकिन लोक-मड़ई और जगार का जिक्र यहां उत्सव-मात्र के संदर्भ में नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ में लोक संस्कृति और परम्परा पर केन्द्रित प्रकाशन के गम्भीर प्रयासों के लिए है।

रावत नाच महोत्सव का आयोजन बिलासपुर के शनिचरी में पारंपरिक रूप से आयोजित होने वाले मातर-मड़ई का परिष्कृत रूप है। यह आयोजन रावत नाच महोत्सव समिति, बिलासपुर द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है। आयोजन समिति द्वारा महोत्सव के साथ 10वें वर्ष 1987 से 'मड़ई' पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया गया।

'मड़ई' के आरंभिक अंकों में अधिकतर यादव कुल की संस्कृति और परंपरा, रावत नाच और उससे संबद्ध विभिन्न पक्षों पर स्थानीय और आंचलिक लेखकों की रचनाएं हैं, किन्तु साल में एक बार प्रकाशित होने वाली इस निःशुल्क पत्रिका ने छत्तीसगढ़ की संस्कृति के विभिन्न पक्षों को गंभीरता से उजागर करने में धीरे-धीरे अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। आगे चलकर पत्रिका में छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य क्षेत्रों से संबंधित लेख और लोक संस्कृति के महत्वपूर्ण अध्येताओं, विशेषज्ञों के लेखों का समावेश होने लगा और लोक संस्कृति पर गम्भीर विमर्श भी 'मड़ई' में प्रकाशित हुए।

'मड़ई' के ताजे 18वें अंक (वैसे इसे वर्ष-6, अंक-1 बताया गया है) का कलेवर पिछले अंकों से भिन्न है। इसका स्वरूप राष्ट्रीय लोक संस्कृति की पत्रिका का हो गया है, जिसमें देश के विभिन्न अंचल की लोक-सांस्कृतिक परम्पराओं से संबंधित लेख प्रदेशवार शामिल किए गए हैं और एक रचना 'वेस्‍टइंडीज की कविताएं' भी है, जिससे मड़ई का वितान अब छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रहा, लेकिन मड़ई के अंकों में प्रकाशित छत्तीसगढ़ लोक संस्कृति की रचनाओं के कारण अब सुलभ न होने के बावजूद आरंभिक अंक पठनीय, उपयोगी और संग्रहणीय हैं। इस अंक के संपादक के रूप में डॉ. कालीचरण यादव और संपादन में डॉ. राजेश्‍वर सक्‍सेना के अलावा 10 और नाम हैं।

लोक मड़ई उत्सव समिति, आलीवारा, राजनांदगांव द्वारा 'लोक मड़ई' का प्रकाशन सन्‌ 2000 से आरंभ हुआ। प्रतिवर्ष प्रकाशित होने वाली यह निःशुल्क पत्रिका, उत्सव आयोजन के साथ जुड़ी है। पत्रिका के आरंभिक अंकों में लोक संस्कृति के विभिन्न वैचारिक पक्षों के साथ छत्तीसगढ़ की लोक-कला के कलाकारों, विधाओं, संस्कृति और शिल्प पर अंचल के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों की भागीदारी रही। 'लोक मड़ई' लगातार निखरती गई और 2002 के अंक से नई लीक पड़ी। इस अंक में स्फुट रचनाओं के साथ पत्रिका का महत्वपूर्ण भाग, 'विवाह' के सांस्कृतिक पक्ष पर पठनीय रचनाएं हैं।

'लोक मड़ई' का पिछले साल का अंक 'हरियाली' पर केन्द्रित रहा। ठेठ कृषक संस्कृति के त्यौहारों का विशिष्ट छत्तीसगढ़ी स्वरूप सावन अमावस्या की 'हरेली' जैसे एक विषय पर केन्द्रित पत्रिका का यह स्वरूप निःसंदेह अब अधिक उपयोगी हो गया है और इस वर्ष समिति के सदस्य और रचनाकारों के लगभग पूरे साल भर के उद्यम के परिणामस्वरूप पत्रिका का ताजा अंक तैयार हुआ है जो देश के विभिन्न अंचलों में प्रचलित प्रसिद्ध लोकगाथा जसमा ओड़न के छत्तीसगढ़ के अपने निजी लोकगाथा स्वरूप दसमत ओड़निन, 'दसमत कैना' पर एकाग्र है। इसकी तैयारी के पीछे की दृष्टि और मेहनत, अंक में स्वयं उजागर है।

जगार का तात्कालिक संदर्भ है कि बस्तर के पारंपरिक 'लछमी जगार' का आयोजन, इस वर्ष के अंतिम सप्ताह में कोण्डागांव क्षेत्र में खोरखोसा ग्राम में किया जा रहा है। एक सप्ताह तक चलने वाले इस जगार का सबसे महत्वपूर्ण अंश 'नारायण राजा और महालखी का विवाह' 30 दिसम्बर को दोपहर 12 बजे से रात 9 बजे तक चलेगा। बस्तर की लोक गाथाओं के गंभीर अध्येता श्री हरिहर वैष्णव द्वारा कराया जा रहा यह आयोजन अपने आपमें विशिष्ट है, क्योंकि यह संकल्प ऐसे व्यक्ति का है जो इस परंपरा के द्रष्टा ही नहीं, भोक्ता भी हैं।

प्रसंगवश बस्तर में तीन अन्य गाथाएं भी प्रचलित हैं- 'तिजा जगार' 'आठे जगार' और 'बाली जगार'। इस परिप्रेक्ष्य में 'लछमी जगार' की मौखिक परम्परा का लिप्यंतर और प्रकाशन का महत्वपूर्ण कार्य हुआ है। बस्तर की धान्य देवी की कथा 'लछमी जगार' का संक्षेपीकरण, अनुवाद, एवं संपादन हरिहर वैष्णव द्वारा सी.ए.ग्रेगॅरी के सहयोग से किया गया है। जिसके प्रकाशन में आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी का सहयोग है।

इस ग्रंथ में पूरी गाथा को 4 खण्ड और 36 अध्यायों में समेटा गया है। ग्रंथ का परिचय हिन्दी और अंग्रेजी में है और गाथा हल्बी, हिन्दी व अंग्रेजी में समानान्तर रूप से तीन कॉलम बनाकर छापी गई है। ग्रंथ परिचय में जगार अनुष्ठान, उसके आयोजन भूगोल, गायक, वाद्ययंत्र, गीत, कथा, प्रतीक/मिथक, मूल्य और आनुष्ठानिक स्वरूप की चर्चा है। ककसाड़ प्रकाशन, सरगीपालपारा, कोण्डागांव जैसे अजाने से स्थान से प्रकाशित यह सचित्र ग्रंथ छत्तीसगढ़ में हो रहे गम्भीर, स्तरीय और सुरूचिपूर्ण प्रकाशन का मानक स्थापित करता है। बस्तर की संस्कृति और परम्पराओं के प्रलेखन-प्रकाशन में हरिहर वैष्णव द्वारा संपादित 'बस्तर का लोक साहित्य' भी विशेष उल्लेखनीय है, जिसमें मिथक, कथा, गीत, गाथा, मुहावरे और पहेलियां मूल रूप में हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित हैं।

छत्तीसगढ़ की संस्कृति के अध्ययन और प्रकाशन के दौर में यह चर्चा इस क्षेत्र में हुए और हो रहे अन्य कामों को खारिज करने के लिए कतई नहीं है, बल्कि यह रेखांकित करने के लिए है कि छपाई आसान हो जाने के दौर में छत्तीसगढ़ की संस्कृति के कथित विशेषज्ञ और स्वयंभू दावेदारों के संख्‍या-बल, उस भीड़ और उसके दबाव में गुम होने से मुकाबिल कोशिशों में से कुछ-एक मड़ई, लोक मड़ई और जगार हैं।

टीप -
ब्‍लाग युग में लिखने, काट-छांट, फेयर करने, छपने भेजने, न छपने, रचना वापस आने- न आने का अनुभव कैसे हो। अपनी कहूं तो न छपने का अनुभव, छपने की तुलना में कम से कम दस गुना अधिक है। रचना न छपती, वापस आती, तो पहला हफ्ता संपादक को गरियाने में बीतता, अगले कुछ दिन 'जुगाड़ का जमाना है' पर विशद चर्चा होती, इसी तरह कोई महीने भर बाद ध्‍यान जाता कि रचना फिर से पढ़ ली जाए, तब ज्‍यादातर समझ में आ जाता कि संपादक का निर्णय गलत न था। फिर अक्‍सर रचनाएं फाड़ कर फेंक दी जातीं और कुछ मोहवश या यूं ही बची रह जातीं। अब ऐसा भी होने लगा है कि अपना लिखा कुछ, जो कहीं छपने लायक नहीं लगता लेकिन ब्‍लाग के लिए अनुकूल जान पड़ता है। रचना, किसे और कैसे भेजें, उसे ही क्‍यों यह भी प्रश्‍न होता और कुछ रचनाएं इस उधेड़बुन में भी छूटी रह जातीं। कम्‍प्‍यूटर पर लिखी, अब तक अप्रकाशित पड़ी रह गई यह समीक्षा, बस मोहवश, अब अपने ब्‍लाग पेज पर प्रकाशित करने की सुविधा के कारण इरादा बना कि इस्‍तेमाल कर ली जाए। बताने का एक कारण कि कई बार रचना तैयार होने के पहले समीक्षा-समीक्षक तय होते हैं लेकिन यहां अब कहने की जरूरत नहीं रही कि इन तीनों प्रकाशन से जुड़े लोगों से परिचित अवश्‍य हूं, पर कोई वादा नहीं था कि ऐसा कुछ लिखूंगा।