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Wednesday, April 28, 2010

अर्थ-ऑवर





27 मार्च को अर्थ-ऑवर की सुगबुगाहट इस साल सन्‌ 2010 में रायपुर में भी हुई। रात साढ़े आठ से साढ़े नौ बजे तक निर्धारित इस अवधि में विद्युत मंडल के अनुसार बिजली की खपत लगभग दस फीसदी कम हुई। अगले दिन सुबह टहलते हुए, धूप निकलते तक स्ट्रीट लाइट जलती देखा। कोई चालीस साल पहले पढ़ा, विज्ञान का पाठ 'फोटो सेल' याद आया, जिसमें पढ़ाया जाता था कि किस तरह से यह रोशनी के असर से काम करता है और स्ट्रीट लाइट के जलाने-बुझाने को नियंत्रित कर सकता है। मैं सोचता था गुरूजी बता रहे हैं, किताब में लिखा है, सच ही होगा, ताजा-ताजा अविष्कार है, विदेशों में इस्तेमाल हो रहा होगा, हमारे यहां भी आ जाएगा, विज्ञान का यह वरदान।

28 मार्च 2010 के किसी अखबार में यह खबर भी थी कि अर्थ-ऑवर पर भारी पड़ा 20-20 क्रिकेट, यानि मैच और खेल प्रेमी दर्शकों पर इसका कोई असर नहीं हुआ तब याद आया दस साल पहले का एकदिवसीय क्रिकेट का डे-नाइट मैच, जिसमें बताया जा रहा था कि फोटो सेल नियंत्रित फ्लड लाइट ढलते दिन की कम होती रोशनी में इस तरह से एक-एक कर जलती हैं कि खिलाड़ियों पर संधि बेला का फर्क नहीं होता और उजाला दिन-रात में एक सा बना रहता है।

अब सब बातें मिलाकर सोचता हूं कि फोटो सेल का पाठ यदि मैंने चालीस साल पहले पढ़ा, तो यह उससे पहले का अविष्कार तो है ही, फिर उसका प्रयोग हमारे देश में भी होने लगा है यह डे-नाइट क्रिकेट मैच में देख चुका हूं, तो फिर यह इस शहर की सड़कों तक, स्ट्रीट लाइट के जलने-बुझने के नियंत्रण के लिए क्यों नहीं पहुंचा? चालीस साल पहले तो फोटो सेल का इस्तेमाल क्यों नहीं हो रहा है, नादान मन ने अपने को समझा लिया था, लेकिन 'चिप' के दौर में, आज इस सवाल का जवाब नहीं मिल रहा है।

अर्थ-ऑवर पर बिजली की बचत के लिए दो और बातें। पहली तो पुरानी यादों में से ही है, जब सुबह आठ बजे दुकानें खुल जाया करती थीं और शाम सात बजे से दुकान बढ़ाई जाने लगती थी, रात आठ बजते-बजते बाजार सूना हो जाता था। आज का बाजार सुबह ग्यारह बजे अंगड़ाई ले रहा होता है और शाम सात बजे के बाद शबाब पर आता है। रविवार को बाजार का खुलना-बंद होना चर्चा का विषय बन जाता है, लेकिन 27 मार्च के एक घंटे बत्ती गुल कर, क्या इस तरह की बातें सोची-याद की जा सकती हैं और एक दिन, एक घंटे में सोची गई इन बातों को पूरे साल के लिए विस्तार क्यों नहीं दिया जा सकता?

हम मन चंगा रखने के लिए कठौती में गंगा ले आते हैं। हर मामले के लिए हमने अलग-अलग आकार-प्रकार के कठौते बना लिए हैं। वैलेन्टाइन का, महिला, बच्चों, बूढ़ों का, हिन्दी का, भाषा का एक-एक दिन, कभी सप्‍ताह और पखवाड़ा, हर तरह के कठौते। हलषष्ठी पर तालाब तो अनंत चतुर्दशी पर पूरा समुद्र अपने आंगनों में रच लेते हैं। लेकिन चिंता और अवसाद-ग्रस्त मन के रचे कठौते, कूप-मण्डूक बना सकते हैं और आंख मूंद लेने की शुतुरमुर्गी सुरक्षा महसूस करा सकते हैं। ध्यान रखना होगा कि कठौते से कभी-कभार ही और सिर्फ तभी काम चलता है, जब मन चंगा हो।

Tuesday, April 27, 2010

दिल्ली-6


छत्तीसगढ़ी लोक अस्मिता और उसकी पहचान को लेकर जितने सवाल और विचार 'दिल्ली-6' के इस गीत सिलसिले में उठे, उनमें स्मृति की गहराई तो थी, व्यापक संदर्भों की चर्चा भी हुई लेकिन पूरे मामले में उल्लेख का इकहरापन ही नजर आया, यानि ज्यादातर हवाले और संदर्भ खुद को जोड़कर देखे जाते रहे। इस पूरे दौर में नये पुराने-नाम आते रहे, लेकिन वह नदारद रहा, जो अधिक जरूरी था, वह यह कि इस बहाने हम शोध का गंभीर नजरिया अपनाते हुए, अपने लोकगीतों की परम्परा में उनकी याद दुहराते, जो इस और इस तरह के अन्य गीतों के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोक सुर संसार के संवाहक रहे।

दिल्ली-6 के गीत 'सास गारी देवै' की बात की जाए तो इस संदर्भ में हबीब तनवीर को तो याद किया ही जाएगा, लेकिन पूरे महत्व के साथ भुलवाराम यादव, बृजलाल लेंझवार, लालूराम और बरसन बाई, चम्पा जैसे नामों का बार-बार उल्लेख जरूरी है। इन दोनों समूहों की अलग-अलग जानकारी मिल रही है, जिनके स्वर में यह गीत रिकार्ड हुआ है, तो यह वक्त है, इस गीत और उसके गायकों के बहाने अपनी परम्परा को खंगालने-टटोलने का।

ददरिया गीत की यह पारंपरिक कृति, लोक की थाती है। ददरिया में सवाल-जवाब किस्म की आशु तुकबंदियां होती है, और इसलिए गायक के साथ जोड़-घटाव और परिवर्तन आसानी से संभव होता है और परम्परा में यह हर गाने वाले के साथ अपना हो जाता है। ददरिया, श्रम-श्रृंगार गीत कहा जा सकता है, जिसका श्रम 'मैन पावर' का 'लेबर' नहीं, बल्कि जीवन में समाहित सुर-ताल है। ऐसा श्रम, जिसका पसीना सौंदर्य का रस है।

इस ददरिया गीत 'सास गारी देवै' का एक सिलसिला हबीब तनवीर तक पहुंचा और कोई 40 साल पहले रिकार्ड बनकर आकाशवाणी से गूंजता रहा और दूसरा रघुवीर यादव से होकर ए आर रहमान तक गया, भूले जा चुके से इस गीत की प्रासंगिकता फिर से बनी। जब निजता और मौलिकता की सीमा लांघते हुए इस गीत को अलग पहचान मिली है तो यह मौका, अपनी इकहरी होती याद को संदर्भ के साथ व्यापक करने का, आत्म सम्मान को परम्परा के सम्मान में समाहित करने का और लोक-संगीत में जीवन का लय पाकर संकीर्ण स्व से निकलकर अपनी समष्टि की ओर दृष्टिपात का है, जो लोक-परम्परा बनकर संस्कृति को संबल देता है।

Saturday, April 24, 2010

आईपीएल

आईपीएल, 12 अप्रैल, शुक्रवार को किसी फिल्म रिलीज की तरह शुरू हुआ, इसी के साथ खबर छपी कि अब डेढ़ महीने (आईपीएल चलते तक) कोई बड़ी फिल्म रिलीज नहीं होगी। एक दिन पहले ही एसएमएस मिला कि आइनॉक्स में फिल्म अथवा आईपीएल का मजा बड़े स्क्रीन पर लीजिए।

आईपीएल के मैच, फिल्म हो रहे हैं, बिना री-टेक और रिपीट वाली, लेकिन री-प्ले वाली फिल्में, जिसमें 'वाह क्या सीन है' को बार-बार देखा जा सकता है। हर खिलाड़ी मैच खेलते हुए सात-आठ प्रयोजकों के लिए मॉडलिंग कर रहा है। प्रदर्शनकारी कलाकार या अभिनेता की तरह खिलाड़ी अपनी भूमिका का निर्वाह तो कर ही रहा है।


आईपीएल के मालिक, फिल्‍मी कलाकार भी हैं। ये पुराने फिल्म निर्माता कंपनी के मालिक- निर्माता-निर्देशकों की तरह हैं, जो खिलाड़ी-कलाकार का प्रदर्शन कराते हैं और भी समानताओं पर बात हो सकती है। फिर क्रिकेट खिलाड़ियों द्वारा अपनी भूमिका को कुछ अलग अंदाज से निभाने के लिए 'मैच फिक्सिंग' पर भी नये नजरिए से सोचा जा सकता है।

Wednesday, April 21, 2010

यूनिक आईडी




‘मैं सोचता हूं, अतः मैं हूं।’ 17 वीं सदी में डेन्यूब के किनारे किसी सैन्य शिविर में युवा फौजी रेने देकार्त के चिंतन का परिणाम। यह वाक्य विधि स्नातक, गणितज्ञ देकार्त का दार्शनिक आधार पद बना और सोच की नई राहें खुलीं, जिनमें से एक 20 वीं सदी का अस्तित्ववादी चिंतन भी है। मनुष्य के अस्तित्व पर अलग ढंग से विचार होने लगा, वह खुद अस्मिता के लिए अधिक सचेत हुआ और उसकी पहचान सिर्फ अपने और गैर का मामला नहीं रह गया, बल्कि सार्वजनिक, सामाजिक और व्यवस्था की जरूरत बन गई।

अब दुनिया अंकों में तब्दील, डिजिटाइज हो रही है। फूल का रंग, चिड़िया की उड़ान, स्वाद और महक का सोंधापन भी अंकों में बदल सकता दिख रहा है। विचार, शब्दों में बदलते हैं और शब्द अंकों में परिवर्तित हो रहे हैं। मूर्त और अमूर्त के बीच का रिश्ता भी भाषा और अंकों से ही जुड़ता है। ‘प्रेम’ का भाव शब्दों में अभिव्यक्त होता है और ढ़ाई के आंकड़े में भी। अंकों का यह सिलसिला आगे बढ़ा है, भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण के गठन और देश के प्रत्येक नागरिक को विशिष्ट पहचान संख्‍या देने की तैयारियों के साथ, जिसमें मतदाता परिचय पत्र के दौर को ध्यान में रखना आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति अमीर-गरीब, अगड़े-पिछड़े, सभी के लिए सामान्यतः जिन दैनंदिन और वैधानिक स्थितियों में आयु-जन्म तिथि की आवश्यकता होती है वे हैं- जन्म-मृत्यु पंजीयन, विवाह पंजीयन व आयु, बालिग-नाबालिग, मतदान आयु, सेवा की आयु सीमा और सेवा निवृत्ति, वरिष्ठ नागरिकता आदि।

इस तरह हर नागरिक की पहचान संख्‍या सरलतम और विशिष्टतम होनी ही चाहिए। इस दृष्टि से व्यक्ति के जन्म का वर्ष, माह, दिनांक, समय (घंटा, मिनट और सेकंड) तथा इसके बाद सरल क्रमांक के तीन अंक और पंजीयन क्षेत्र का क्रमांक तीन अंक, इस प्रकार कुल 20 अंक, व्यक्ति की विशिष्ट पहचान संख्‍या होनी चाहिए। यानि 31 मार्च 2010 को शाम चार बजकर पैंतीस मिनट छत्तीस सेकंड पर पैदा होने वाले बच्चे की विशिष्ट पहचान संख्‍या होगी- 20100331163536। ठीक इसी वक्त पैदा होने वाले एकाधिक बच्चों के लिए पंजीयन क्रम में तीन अंकों में सरल क्रमांक दिया जा सकता है तथा इसके बाद पंजीयन क्षेत्र को तीन अंकों में दर्ज किया जा सकता है।

विशिष्ट पहचान संख्‍या का आधार यही होना चाहिए। इससे व्यक्ति द्वारा अपनी विशिष्ट संख्‍या को याद रखना आसान होगा। इसमें आवश्यकतानुसार तथा संभावित आंकड़ों को दृष्टिगत कर आंशिक परिवर्तन किया जा सकता है, जैसे जन्म के समय में सेकंड को छोड़ा जा सकता है और यह आगे चल कर वैश्विक स्तर पर भी स्वीकार और मान्य होगा, यह मानते हुए सरल क्रमांक के लिए चार अंक निर्धारित किए जा सकते हैं साथ ही पंजीयन क्षेत्र की संख्‍या को इसमें जोड़ने, न जोड़ने पर विचार किया जा सकता है। लेकिन जन्म के वर्ष, माह, तिथि, घंटा और मिनट के 12 अंक तो इसी प्रकार रखना होगा।