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Wednesday, January 23, 2013

काल-प्रवाह

• क्रियमाण-वर्तमान की सत्ता क्षितिज की भांति है, आकाश जैसे प्रारब्‍ध-भविष्य और पृथ्वी जैसे संचित-भूत का आभासी संगम। जड़ भूत और अपरिभाषित भविष्य के बीच अभिव्यक्त (आभासी) वर्तमान। 'अर्थसत्‍ता' की जमीन पर धावमान 'राजसत्‍ता' के रथ पर 'धर्मसत्‍ता' का छत्र।

• इतिहास जो बीत गया, जो था और भविष्य जो आयेगा, जो होगा, इस दृष्टिकोण से देखने पर इतिहास के साथ जैसी तटस्थता और निरपेक्षता बरती जाती है वह कभी-कभार लावारिस लाश के पोस्‍टमार्टम जैसी निर्ममता तक पहुंच जाती है। इतिहास की जड़ता और संवेदना, वस्तुगत और विषयगत-व्यक्तिनिष्ठ के बीच का संतुलन कैसे हो? इतिहास को महसूस करने के लिए दृष्टिकोण यदि इतिहास, जो कल वर्तमान था और भविष्य जो कल वर्तमान होगा, इसे संवेदनशील बना देता है।

• इतिहास के लिए यदि एक पैमाना ईस्वी, विक्रम, शक, हिजरी या अन्य किसी संवत्सर जैसा कोई मध्य बिन्दु है, जिसके आगे और पीछे दोनों ओर काल गणना कर इतिहास का ढांचा बनता है। एक दूसरा तरीका भी प्रयुक्त होता है ईस्‍वी पूर्व-बी.सी. और ईस्वी-ए.डी. के अतिरिक्त बी.पी. before present, आज से पूर्व। अधिक प्राचीन तिथियों, जिसमें ± 2000 वर्षों का हिसाब जरूरी नहीं, उनकी गिनती बी.पी. में कर ली जाती है। तब सैद्धांतिक रूप से ही सही और इतिहास नहीं तो अन्य वस्तुस्थितियों के लिए क्या एक तरीका यह भी हो सकता है कि गणना शुरू ही वहां से हो जहां से काल शुरू होता हो या वहां से उलट गिनती करें जो अंतिम बिंदु हो-

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काल शुरू             ईसा           वर्तमान          अंतिम बिंदु 

• ऐसे बिन्दुओं की खोज सदैव मानव जाति ने की है, जॉर्ज कैन्‍टर के 'अनंतों के बीच के अनंत' की तलाश की तरह या हमारा भविष्य-पुराण (भविष्‍य भी पुराना भी), शायद इसी का परिणाम है, भारतीय चिन्तन पद्धति में वृत्तात्मक गति, मण्डल जैसी अवधारणाएं यहीं से विकसित जान पड़ती है।

• तो यदि उन आरंभिक/चरम बिन्दु को प्राप्त नहीं किया जा सकता फिर भी उसकी खोज आवश्यक है क्या? शायद यही खोज हमें नियति-बोध कराती है और अपने दृष्टिकोण को समग्र की सम्पन्नता प्रदान करती है, संवेदना प्रदान करती है, किन्तु संतुलन के बजाय इसकी अधिकता होने पर इतिहास बोध की हीनता से आरोपित होने के साथ नियतिवादी बन जाने का रास्ता अनचाहे खुलने लगता है।

• अस्तित्वमान को सिर्फ इसलिए प्रश्नातीत नहीं माना जा सकता कि वह 'घटित हो चुके का परिणाम' है, जिस तरह आगत को 'अभी तो कुछ हुआ नही' कह कर नहीं छोड़ा जाता। इतिहास क्यों? इतिहास के लिए पीछे देखना होता है तो आगे देखने की दृष्टि भी वहीं से मिलती है। इतिहास, समाज का ग्रंथागार जो है।

• इतिहास अभिलेखन का आग्रह भी तभी तीव्र होता है, जब गौरवशाली अतीत के छीन जाने का आभास होने लगे, वह मुठ्‌ठी की रेत की तरह, जितना बांधकर रखने का प्रयास हो उतनी तेजी से बिखरता जाय या फिर तब भी ऐसा आग्रह भाव बन जाता है जब आसन्न भविष्य के गौरवमंडित होने की प्रबल संभावना हो यानि जैसे राज्याभिषेक के लिए नियत पात्र की प्रशास्ति रचना, लेकिन विसंगति यह है कि ऐसे दोनों अवसरों पर तैयार किया जाने वाला इतिहास लगभग सदैव ही सापेक्ष हो जाता है यह 'इतिहास' की एक विकट समस्या भी कही जा सकती है कि उसे साथ-साथ, आगे से या पीछे से किसी (समकोण, अधिककोण या न्यूनकोण) कोण से देखें वह मृगतृष्णा बनने लगता है। ''इतिहास से बड़ा कोई झूठ नही और कहानी से बड़ा कोई सच नही'' कथन संभवतः ऐसे ही विचारों की पृष्ठभूमि पर उपजा हो। छत्‍तीसगढ़ी कहावत है- 'कथा साहीं सिरतो नहीं, कथा साहीं लबारी', अर्थात् कथा जितना सच्‍चा कुछ नहीं, लेकिन है कथा जैसा झूठा।

• हमारी सोच और उसका विस्तार, हमारे राजमर्रा की बातचीत और उसकी व्यापकता में पात्र फिर देश और उसके बाद अंतिम क्रम पर काल है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि सोच की गहराई में सबसे नीचे अवधारणात्मक काल ही हो सकता है, उसके ऊपर भौतिक देश और सबसे सतही स्तर पर सजीव पात्र होना ही स्वाभाविक है, किन्तु इसके विपरीत और साथ-साथ पात्र में भौतिक स्वरूप और अवधारणा का अंश प्रकटतः सम्मिलित है, देश में उसके भौतिक विस्तार के साथ अवधारणात्मक विचार निहित हैं जबकि काल की सत्ता देश और पात्र संदर्भपूर्ण विचारों या बातचीत में आकार ग्रहण कर जीवन्त हो पाता है। काल की स्वत्रंत और निरपेक्ष सत्ता वैचारिक स्तर पर भी असंभव नही तो दुष्कर अवश्य है।

• इतिहास कालक्रम का पैमाना है, लेकिन किसी पैमाने पर माप लेना, किसी वस्तु को जान लेने की बुनियादी और अकेली शर्त जैसा तय मान लिया जाता है (जैसे व्यक्ति का नाम, कद, वजन या किसी स्थान की दूरी और स्मारक की प्राचीनता) जबकि किसी को जान लेने में, चाहे वह सजीव पात्र हो, भौतिक देश हो या अवधारणात्मक काल, यह एक शर्त और वह भी गैर जरूरी की हद तक अंतिम, उसे माप लेने की हो सकती है।

• परम्परा में नदी-सा सातत्य भाव है। परम्परा, रूढ़ि नहीं है, वह केवल प्राचीनता भी नहीं है, न ही वह इतिहास है, परम्परा की सार्थकता तो उसके पुनर्नवा होने में ही है। गति का रैखिक या विकासवादी दृष्टिकोण उसे अपने मूल से विलग होकर दूर होते देखता है लेकिन वृत्तायत दृष्टिकोण से परिवर्तनशील किन्तु मूल से निरन्तर सामीप्य और समभाव बनाये पाता है।

• परम्परा का अभिलेखन अन्जाने में, तो कभी षड़यंत्रपूर्वक उस पर आघात का हथियार बना लिया जाता है। परम्परा को अभिलिखित कर उसी परम्परा की अगली पीढ़ी को उसके पुराने अभिलिखित स्वरूप का आईना दिखाकर (कहना कि यह है तुम्हारा असली चेहरा) उसे झूठा साबित करना आसान उपाय है, शायद तभी कहा गया है कि ''शैतान भी अपने पक्ष में बाइबिल के उद्धरण ला सकता है।''

• आगे (?) बढ़ते समय के साथ विकास को अनिवार्यतः जोडकर देखा जाता है, और विकास का अर्थ लगाया जाता है वृद्धि, यानि 1 से 2 और 2 से 4 किन्तु यह स्वाभाविक नही है स्वाभाविक है परिवर्तन जिसे हम अपने बनाए दुनियावी पैमाने पर आगे पीछे माप-गिन लेते है, यह आंकडों के व्यावहारिक इस्तेमाल में तो संभव है किन्तु इसे तत्वतः कैसे स्वीकार किया जा सकता है।

पिछली पोस्‍ट की तरह यह भी स्‍थापना नहीं मात्र विमर्श, मूलतः सन 1988-90 के नोट्स का दूसरा हिस्‍सा (पहला हिस्‍सा – पिछली पोस्‍ट में)

संबंधित पोस्‍ट - साहित्‍यगम्‍य इतिहास।

Tuesday, January 15, 2013

आगत-विगत

• इतिहास की पढ़ाई का हिस्सा है, इतिहास-लेख (Historiography)। जिसने इतिहास की पाठ्‌यपुस्तकीय पढ़ाई न की हो या की हो और यह पाठ्‌यक्रम में न रहा हो, तो भी इतिहास पर आड़े-तिरछे सवाल मंडराते जरूर हैं और इतिहास को समझने-पकड़ने के लिए, अपनी सोच को, अपने चिंतन को, चाहे वह अनगढ़ हो, शब्द दे कर उसका धरन-धारण बेहतर हो पाता है।

• प्रकृति का रहस्य अक्सर उसकी अभिव्यक्ति में गहराता है, उसी तरह इतिहास, कई बार पुरातात्विक प्राप्तियों (OOP, out-of-place) और उनकी व्याख्‍या में। इतिहास अपने को दुहराए न दुहराए, उसके पुनर्लेखन की आवश्यकता बार-बार होती है। जीवन-वर्तमान, मृत्‍यु-इतिहास। तथ्‍य, सत्‍य और कथ्‍य का फर्क। मौत, फकत मौत के तथ्‍य का सत्‍य हत्‍या, आत्‍महत्‍या, फांसी-मृत्‍युदंड, दुर्घटनाजन्‍य या स्‍वाभाविक मृत्‍यु, कुछ भी हो सकता है और कथ्‍य- 'नैनं छिन्‍दन्ति ...' या‍ 'हमारे बीच नहीं रहे' या 'अपूरणीय क्षति' या 'आत्‍मा का परमात्‍मा में मिलन' या 'चोला माटी का' या 'पंचतत्‍व में विलीन' या 'रोता-बिलखता छोड़ गए' या 'धरती का बोझ कम हुआ।

• पुराविद्‌, आधुनिक पंडित-वैज्ञानिक जैसे हैं, जिसकी बात पर कम लोग ही तर्क करते हैं, आसानी से मान लेते हैं, चकित होने की अपेक्षा सहित उसकी ओर देखते हैं। इस अपेक्षा की पूर्ति आवश्यक नहीं, बल्कि विश्वासजनित ऐसे अकारण मिलने वाले सम्मान के प्रति जवाबदेही तो बनती है।

• पुरातत्व, घर का ऐसा बुजुर्ग, जिसका सम्मान तो है, ''हमारे देश का गौरवशाली अतीत और महान संस्‍कृति, हमारे धरोहर और हमारी सनातन परम्‍परा''... लेकिन परवाह शायद नहीं। कई बार मुख्‍य धारा में आ कर वह आहत होने लगता है, तब लगता है कि हाशिये में रह कर उपेक्षित नहीं, बेहतर सुरक्षित है। वैसे अब हाशिये का इतिहास, अवर, उपाश्रयी, सबआल्टर्न शब्दों के साथ, अलग (प्रतिवादी) अवधारणा और दृष्टिकोण है।

• पुरातत्व का संस्कार- 'जो अब नहीं रहा' उसके लिए हाय-तौबा के बजाय 'जो है, जितना है', उसे बचाए रखने का उद्यम अधिक जरूरी है, क्योंकि बचाने के लिए भी इतनी सारी चीजें बची हैं कि प्राथमिकता तय करना जरूरी होता है। हर व्यक्ति के, अपने आसपास ही इतना कुछ जानने-बूझने को, सहेजने-संभालने को हैं कि क्षमता और संसाधन सीमित पड़ने लगता है। खंडहरों के साथ समय बिताते हुए पसंदीदा और जरूरी का टूटना, खोना, छूट जाना महसूस तो होता है, लेकिन इसको बर्दाश्‍त करने के लिए मन धीरे-धीरे तैयार भी होता जाता है। अवश्‍यंभावी नश्‍वर। जैसे डाक्‍टरों की तटस्‍थता कई बार निर्मम लगती है।

• इतिहास यदि आसानी से बनने लगे तो उसे समय की परतें आसानी से ढकने भी लगती हैं। ध्‍वंस भी सृजन की तरह, बिना शोर-शराबे के, समय के साथ स्‍वाभाविक होता है, बल्कि निर्माण कई बार रस्‍मी ढोल-ढमाके के साथ और उद्यम से संभव होता है। शाश्‍वत-नश्‍वर के बीच प्रलय-लय-विलय और प्रकृति-कृति-विकृति। ''प्रकृतिर्विकृतिस्‍तस्‍य रूपेण परमात्‍मनः।'' टाइम मशीन के दुर्लभ अनुभव की कल्‍पना, उत्खनन के दौरान काल में पर्त-दर-पर्त उतरने का वास्‍तविक अनुभव, सच्‍चा रोमांच। इतिहास जानना, भविष्य जानने के प्रयास से कम रोमांचक नहीं होता।

• सभ्यता का इतिहास, पहाड़ों की कोख-कन्दरा में पलता है। सभ्यता-शिशु, गिरि-गह्वर गर्भ से जन्‍मता है। ठिठकते-बढ़ते तलहटी तक आता है, युवा से वयस्क होते मैदान में कुलांचे भरने लगता है। (अगल-बगल वन-अरण्‍य में दर्शन, चिंतन, वैचारिक सृजन और शिक्षण होता रहता है।) वयस्क से प्रौढ़ होते हुए नदी तट-मुहाने पर आ कर, उद्गम से बहाव की दिशा में आगे बढ़ता जाता है, संगम पर तट भी बदल पाता है। अपने अलग-अलग संस्करणों में परिवर्तित होता कायम रहता है, कभी स्थान बदल कर, कभी रूप बदल कर। बहती नदी, समय का रूपक है?

• प्राकृत-पालि या लौकिक संस्‍कृत का दो हजार साल से भी अधिक पुराना साहित्‍य, जातक या पंचतंत्र पढ़ते हुए यह लगातार महसूस होता है कि संसार में यातायात, संचार साधनों, भौतिक स्‍वरूप में जो भी परिवर्तन आया हो, हमारी दृष्टि, हमारा मन वही है।

• हर कहानी की शुरुआत होती है- 'किसी समय की बात है, एक देश में राजा या राजकुमारी या किसान या व्यापारी या ब्राह्मण या सात भाई थे' या कि 'बहुत पुरानी बात है, फलां शहर में ...', ज्यों अंग्रेजी में 'लांग लांग अ गो / वन्स अपान अ टाइम, देअर वाज अ किंग ...' यानि हर कहानी बनती है देश, काल और पात्र से। 'देश', जड़ है, धरती की तरह, भूत-इतिहास। 'काल', अवधारणा है, हवा की तरह, संभावना-भविष्य। और 'पात्र', मनुष्य है, क्षितिज की तरह, आभासी-वर्तमान। जातक का जन्‍म फलां स्‍थान में, अमुक समय हुआ। तीन आयाम मिले, तस्‍वीर ने आकार ले लिया, बात की बात में रंग भरा और बन गई जन्‍म-कुंडली। बात ठहराने के लिए जरूरत होती है इन्हीं तीन, देश-काल-पात्र की। कहानी हो या इतिहास, होता इन्हीं तीन का समुच्चय है। जहां यह नहीं, वह शब्दातीत-शाश्वत।

• मानविकी - दर्शन, अध्यात्म, कला, भाषा, नैतिकता, मूल्य, मानवता - भविष्य।
  सामाजिक विज्ञान - अर्थ, राजनीति, समाज, पूर्वापर काल - वर्तमान।
  प्राकृतिक विज्ञान – भू-भौमिकी, गणना, भौतिकी - भूत।
Natural Science
Social Science
Bio-science
Psychology-Philosophy
Biology
Sociology
Chemistry
Economics-Political Science
Physics
History-Geography
Maths
Language

• पुरातत्‍व की सुरंग और इतिहास की पगडंडियों पर एकाकी चलते, राह दिखलाते तर्क-प्रमाणों की संकरी गलियों में सरकते, कभी आसपास गुजरते लोक-विश्‍वास के जनपथ पर साथ आ कर बहुमत बन जाना जरूरी होता है, क्‍योंकि जो लिख दिया गया वह शास्‍त्र बना, दर्ज हुआ वह इतिहास बन कर समय (और दूरी) को लांघ गया, लेकिन कई बार इस तरह तय किए सफर का मुसाफिर अपने परिवेश में बेगाना हो जाता है। शोध, अपने संदेहों पर भरोसा करना सिखलाता है, अनुसंधान का परिणाम अविश्‍वसनीय के प्रति आश्‍वस्‍त करता है, आत्‍म-विश्‍वास पैदा करने में मददगार होता है।

• इतिहास, विषय के रूप में एक अनुशासन है और प्रत्येक अनुशासन का विशिष्ट होते, उसका महत्व होता है तो उसकी अपनी सीमाएं भी होती हैं, जिस तरह किसी अपराधी को सबूतों के अभाव में सजा नहीं दी जा सकती, उसी तरह पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में इतिहास में भी, विश्वास और मात्र निजी सूचना के आधार पर, स्थापनाएं मान्य नहीं होतीं। यह भी ध्यान रखने की बात है कि अपने विश्वास को इतिहास की कसौटी पर अनावश्यक कसने का प्रयास न करें, यह उसी तरह अनावश्यक है, निरर्थक साबित होगा जैसे अपनी मां के हाथ बने व्यंजन के सुस्वादु होने, अपनी पसंद को प्रमाणित करने का तर्क और प्रमाण देना। आशय यह कि किसी विषय की सीमा उसकी दिशा निर्धारित करती है, मर्यादा उसे संकुचित कर उसमें सौंदर्य भरती है।

यह स्‍थापना नहीं मात्र विमर्श, मूलतः सन 1988-90 के नोट्स का पहला हिस्‍सा (दूसरा हिस्‍सा – अगली पोस्‍ट में)

संबंधित पोस्‍ट - साहित्‍यगम्‍य इतिहास।
'जनसत्‍ता' 23 दिसंबर 2013 के
संपादकीय पृष्‍ठ पर यह पोस्‍ट 

Tuesday, November 22, 2011

साहित्यगम्य इतिहास

यह पोस्‍ट, 7 से 9 मार्च 2000 को बिलासपुर में आयोजित संगोष्‍ठी के लिए साहित्‍य वाले डॉ. सरोज मिश्र जी और इतिहास वाले डॉ. ब्रजकिशोर प्रसाद जी के सुझाव पर मेरे द्वारा तैयार किया गया परचा, शुष्‍क आलेख है, जिनकी रुचि साहित्‍य एवं इतिहास विज्ञान में न हो, उनके लिए इसे पढ़ना उबाऊ और समय का अपव्‍यय हो सकता है।

''जन केन्द्रित और समग्र मानव इतिहास के लिए विभिन्न सामाजिक विज्ञानों का सहयोग और सहकार आवश्यक है। अनुशासनों से जुड़े गर्व के कारण इन विषयों के बीच का संवाद अब तक, पीटर बर्क के शब्दों में बहरों की बातचीत रहा है। इन अनुशासनों ने एक दूसरे को पूर्वाग्रह, शंका और भय की दृष्टि से देखा है। हमने उनकी सीमाओं पर विचार किया है, उपलब्धियों और संभावनाओं पर नहीं।'' प्रसिद्ध समाजशास्त्री श्यामाचरण दुबे के इस कथन में ''इतिहास और साहित्य-इतिहास लेखन का अंतरावलंबन'' की पड़ताल में यहां इतिहास की दिशा से प्रवेश का प्रयास है।

''राजतरंगिणी'' भारतीय साहित्य का वह बिन्दु है, जहां इतिहास और साहित्य के लेखन और अंतरावलंबन की पड़ताल सुगम है। बारहवीं सदी ईस्वी में काश्मीर के शासक जयसिंह के समकालीन कल्हण की यह रचना, प्रथम इतिहास ग्रंथ मान्य है। कल्हण की यह कृति साहित्य की रचना करते हुए, इतिहास का लेखन है, इसलिए अंतरावलंबन का यह बिन्दु विचार प्रस्थान के लिए उपयुक्त है। राजतरंगिणी इतिहास की शब्दगम्य श्रेणी है। इसके अतिरिक्त वस्तुगम्य और बोधगम्य इतिहास श्रेणियां कही जा सकती हैं। वस्तुगम्य इतिहास की सीमा में पुरातात्विक वस्तुओं के रूप में उत्खननों से प्राप्त प्रमाण से लेकर जीवाश्म और पूरा भौतिक संसार है, जो प्राकृतिक इतिहास के रूप में जाना जाता है और बोधगम्य इतिहास- मूल्य, मान्यता, आचार, व्यवहार, शैली और परम्परा यानि समष्टि लोक है।

पुनः प्रस्थान बिन्दु राजतरंगिणी पर दृष्टि केन्द्रित कर विचार करें। कालक्रम में इसके पूर्व, वैदिक युग है, जिस काल का शब्दगम्य इतिहास बन पाता है, वस्तुगम्यता नगण्य है। दूसरी स्थिति अशोक के अभिलेख हैं, जहां इतिहास गढ़ते हुए, साहित्य की रचना होती चलती है। इसके पश्चात्‌ गुप्त युग है, जो अधिकतर पुराणों का रचनाकाल माना गया है। पुराणों के साथ रोचक यह है कि हिन्दू (भारतीय) धर्म-शास्त्रीय ग्रंथों के अंतिम क्रम में होने के बावजूद उन्हें पुराना और साथ ही इतिहास-पुराण सामासिक रूप में कहा गया है, इसीलिए इतिहास-साहित्य के अंतरावलंबन का यह बिन्दु महत्वपूर्ण हो जाता है। यह भी रोचक है कि एक विरोधाभासी भविष्यत्‌ पुराण का उल्लेख आता है। अन्य पुराणों की शैली से अनुमान होता है कि पुराणों में प्राचीन गाथाओं के साथ समकालीन घटनाओं का भी विवरण संग्रह है, लेकिन प्राचीन गाथाओं को अद्यतन और समकालीन घटनाओं को भविष्यवाणी के रूप में रखा गया है। इस प्रकार पुराण, न सिर्फ इतिहास-पुराण सामासिक पद के रूप में प्रयुक्त हुए हैं, बल्कि भारतीय पद्धति में इतिहास-साहित्य लेखन के संघटन को समझने का अवसर भी प्रदान करते हैं।

गुप्तकालीन स्थितियों में चौथी सदी ईस्वी में रचित हरिषेण की प्रयाग-प्रशस्ति और पांचवीं सदी ईस्वी में रचित वत्सभटि्‌ट की मन्दसौर प्रशस्ति शिलालेख, जैसी रचनाएं तत्कालीन इतिहास की स्रोत-सामग्री तो हैं ही, इनका साहित्यिक मूल्य तत्कालीन साहित्यिक कृतियों से कम नहीं हैं। इसी युग के ताम्रपत्र, जिन पर दान के विवरण के साथ दान की प्रतिष्ठा 'आचन्द्रार्क तारकाः' यानि जब तक सूरज, चांद और तारे रहें, काल अवधि तक के लिए बताई जाती है, किन्तु इतिहास के कालक्रम का ढांचा तैयार करने में समस्या तब होती है जब ऐसे अनेक ताम्रपत्रों पर तिथि किसी प्रचलित संवत्‌ के स्थान पर शासक के राज्य वर्ष की संख्‍या में अंकित की गयी है।

शब्दगम्य इतिहास में विदेशी यात्रियों के यात्रा-वृत्तांत और अन्य लिपियुक्त अवशेषों, साहित्यिक सामग्रियों का विवरण पाठ्‌य पुस्तकों में पर्याप्त है, किन्तु राजतरंगिणी के पश्चात्‌ काल के शब्दगम्य इतिहास में विवेच्य प्रयोजन हेतु अंतिम आधुनिक चरण आरंभ होता है- 15 जनवरी सन 1784 से, जब सर विलियम जोन्स ने कलकता में एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की। इसके साथ इतिहास के वैज्ञानिक और व्यवस्थित लेखन के प्रयास का सूत्रपात हुआ। सन 1788 से 'एशियाटिक रिसर्चेज' शोध पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ और कुछ वर्षों बाद ही सेन्ड्राकोट्टस को चन्द्रगुप्त मौर्य से समीकृत किया गया, जोन्स का यह प्रसिद्ध शोध लेख भारतीय इतिहास को कालगत क्रम में व्यवस्थित करने का आधार बना। इसके बाद के उस दौर का भी स्मरण यहां आवश्यक है, जब राहुल सांकृत्यायन की 'वोल्गा से गंगा', रामधारी सिंह दिनकर की 'संस्कृति के चार अध्याय' और भगवतशरण उपाध्याय की 'पुरातत्व का रोमांस' जैसी पुस्तकें प्रकाशित हुई।

इतिहास लेखन की दृष्टि से कुछ विचार-कथनों का स्मरण कर लें, इससे भारतीय इतिहास-दृष्टि की न्यायसंगत समीक्षा आसान हो सकेगी। कौटिल्य ने इतिहास को पुराण, इतिवृत्त, आख्‍यायिका, उदाहरण, धर्मशास्त्र एवं अर्थशास्त्र से समन्वित माना है। नेहरू, इतिहास के साथ महाकाव्य, परम्परा और कहानी-किस्से को जोड़ते हुए मानों कौटिल्य के कथन की टीका करते हैं- दंतकथाएं, महाकाव्यों तक महदूद नहीं हैं, वे वैदिक काल तक पहुंचती हैं और अनेक रूपों और पोशाकों में संस्कृत साहित्य में आती हैं। कवि और नाटककार इनसे पूरा फायदा उठाते हैं और अपनी कथाएं और सुंदर कल्पनाएं इनके आधार पर बनाते हैं। नेहरू यह भी स्पष्ट करते हैं कि ''तारीखवार इतिहास लिखने की या घटनाओं का कोरा हाल इकट्‌ठा कर लेने की खास अहमियत नहीं रही है। जिस बात की उन्हें ज्यादा फिक्र रही है, वह यह है कि इन्सानी घटनाओं का इन्सानी आचरण पर क्या प्रभाव और असर रहा है।''

अमरीका के प्रसिद्ध विधिवेत्ता ऑलिवर वेन्डल होम्स मानो जिरह करते हैं- ''इतिहास का पुनर्लेखन होना चाहिए क्योंकि इतिहास कारणों और पूर्ववृत्त के ऐसे सूत्रों का चयन है, जिनमें हमारी रुचि है और रुचियां पचास वर्षों में बदल जाती हैं।'' अंगरेज इतिहासकार ईएच कार अपनी प्रसिद्ध कृति ''इतिहास क्या है?'' में दिखाते हैं- ''ऐतिहासिक तथ्य मात्र वे हैं, जो इतिहासकारों द्वारा जांच के लिए छांटी गयी हैं'' वे स्पष्ट करते हैं कि लाखों लोगों के बावजूद सीजर का रूबिकन पुल पार करना महत्वपूर्ण हुआ (और मुहावरा बन गया) वे आगे कहते हैं- ''सभी ऐतिहासिक तथ्य इतिहासकारों के समसामयिक मानकों से प्रभावित हुई अभिव्यक्ति के परिणामस्वरूप हम तक आते हैं।''

भारत में इतिहास, हमारी काल चिंतन पद्धति के अनुरूप रहा है। भारतीय, बल्कि समूचा प्राच्य चिंतन, काल तथा उसके सापेक्ष वस्तुओं, घटनाओं को परिवर्तनशील वृत्तायत दृष्टि से देखता है न कि पाश्चात्य, रैखिक विकास की दृष्टि से। साथ ही हमारा सुदीर्घ, अबाध और जीवन्त क्रम, सनातन माना जाकर इतिहास के बजाय स्वाभाविक ही परम्परा में बदल सकता है। परम्परा, जिसकी सार्थकता उसके पुनर्नवा होने में है, उसमें नदी सा सातत्य है। वह प्राणवान 'भवन्ति' का स्पंदित प्रवाह है, न कि खण्डित 'अस्ति' का संवेदनारहित समूह। वस्तुतः इतिहास और परम्परा किसी तथ्य अथवा घटना के दो लगभग विपरीत, किन्तु पूरक बनकर, दोनों सार्थक दृष्टिकोण हैं। परम्परा से जुड़ा व्यक्ति उसके प्रति विषयगत हो जाता है तो, बाहरी व्यक्ति इसके प्रति रूक्ष होकर इसके कपोल-कल्पना साबित करने में जुट जाता है। इसी स्थिति में भारतीयों पर 'इतिहास-बोध' न होने का आरोप लगता है, जिसकी सफाई में कुछ कहने के बजाय भारतीय मानस में 'नियति बोध' का दर्शन पा लेना अधिक आवश्यक है, किन्तु यहीं अभिलेखन के भारतीय दृष्टिकोण का एक उल्लेख पर्याप्त होगा, वृहस्पति का कथन है-
षाण्मासिके तु सम्प्राप्ते भ्रान्तिः संजायते यतः।
धात्राक्षराणि सृष्टानि पत्रारूढान्‍यतः पुरा॥
''किसी घटना के छः मास बीत जाने पर भ्रम उत्पन्न हो जाता है, इसलिए ब्रह्‌मा ने अक्षरों को बनाकर पत्रों में निबद्ध कर दिया है।''

इतिहास लेखन की यह एक विकट समस्या है कि समकालीन इतिहास, घटना के प्रभाव के प्रति तटस्थ नहीं हो पाता। इतिहास का आग्रह अधिकतर तभी तीव्र होता है, जब गौरवशाली अतीत के छीनने का आभास होने लगे। वैभव, जब मुट्‌ठी की रेत की तरह, जितना बांधकर रखने का प्रयास हो उतनी तेजी से बिखरता जाय अथवा ऐसा आग्रह भाव तब भी बन जाता है जब आसन्न भविष्य के गौरवमंडित होने की प्रबल संभावना हो, जैसे राज्याभिषेक के लिए नियत पात्र की प्रशस्ति रचना या प्रस्तावित छत्तीसगढ़ राज्य का पृथक अस्तित्व होने के पूर्व, उसे राज्य इकाई मानकर किया जाने वाला लेखन, लेकिन प्रयोजनीय होने से ऐसे दोनों अवसरों पर तैयार किया जाने वाला इतिहास लगभग सदैव सापेक्ष हो जाता है। इस तरह घटनाओं को साथ-साथ देखते चलें, आगे से देखें या पीछे से, इतिहास के लिए दृष्टि समकोण हो, अधिककोण या न्यूनकोण, वह मृगतृष्णा बनने लगता है।

इतिहास के तथ्य, तर्क-प्रमाण आश्रित होते हैं, परम्परा की तरह स्वयंसिद्ध नहीं। इसलिए इतिहास-नायकों को चारण-भाट की आवश्यकता होती है, जो उनकी सत्ता और कृतित्व के प्रमाणीकरण हेतु काव्य रच सकें, पत्थर-तांबे पर उकेर सकें लेकिन परम्परा के लोक नायकों के विशाल व्यक्तित्व की उदात्तता, जनकवि को प्रेरित और बाध्य करती है, गाथाएं गाने के लिए। इतिहास के तथ्य, तर्क-प्रमाणों से परिवर्तित हो सकते हैं, इसलिए संदेह से परे नहीं होते किन्तु लोक मन का सच, काल व समाज स्वीकृत होकर सदैव असंदिग्ध होता है। इसलिए जिस समाज के जड़ों की गहराई और व्यापकता परम्परा-पोषित जनजीवन में व्याप्त है, वह आंधी तूफान सहता, पतझड़ के बाद बसंत में फिर उमगने लगता है।

इतिहास लेखन में समस्या तब अधिक गंभीर होती है, जब किसी स्रोत-सामग्री का नाम लेना उसके जान लेने की एकमात्र बुनियादी शर्त बन जाती है। इतिहासकार अपना दायित्व वस्तु-घटनाओं के वर्गीकरण और उसकी सांख्यिकीय जमावट तक अपने को सीमित कर लेता है, वह इतिहास को परिवर्तन के बजाय, इकहरे क्रमिक विकास की दृष्टि से देखता है। भारतीय स्थापत्य के इतिहास का उदाहरण इसे अच्छी तरह स्पष्ट करता है। हम पाते हैं कि यहां आरम्भ में हड़प्पा सभ्यता में निर्माण हेतु ईंट प्रयुक्त हुए, वैदिक युग का स्थापत्य घास-फूस, लकड़ी और पत्थर की कुम्भियों का था, मौर्य युग में ढूह (स्तूप) और स्तम्भ तथा काष्ठ वास्तु की तरह रेलिंग बनने लगी, फिर अचानक संरचनात्मक के स्थान पर शिलोत्खात (लेण और गुहा) वास्तु का दौर आता है, संयोगवश लगभग यही काल भारतीय इतिहास का अंधकार युग कहा जाता है, फिर गुप्त युग में क्रमशः सीधे-सपाट संरचनात्मक वास्तु का पुनः आरंभ होता है, इसके बाद देश के कुछ हिस्सों, विशेषकर छत्तीसगढ़ में फिर ईंटों का प्रचलन हो गया और इसी प्रकार परिवर्तन अब तक होते रहे हैं। अब यदि इसे विकास क्रम में जमाने का प्रयास करें तो कुछ तथ्यों को छोड़कर आगे बढ़ना होगा या फिर कुछ मनगढ़ंत सम्मिलित करना विवशता होगी।

इस प्रकार पाश्चात्य पद्धति ने हमारी इतिहास दृष्टि को जागृत करने में सहायता की, जिसके माध्यम से हम मंदिरों का, मूर्तियों का, सिक्कों का, लिपियों का, बोली-भाषाओं का और साहित्य के इतिहास का ढांचा तैयार कर सके, किन्तु शायद इसी ने समग्रता के इतिहास से जो परम्परा से सम्बद्ध होकर मानव का, उसकी संस्कृति का, इतिहास हो सकता था, दूर कर दिया। यह विवेचन अंगरेजों को उत्तरदायी ठहराने के लिए नहीं, अपने स्वाभाविक वर्तमान का आकलन करने के लिए है।

निष्कर्ष यह कि हमारे व्यक्तित्व के ढांचे में, चेतना के स्तर पर समष्टि सूत्रों से हम सृष्टि में प्रकृति के सहोदर हैं, लोक-जन हमारे अग्रज हैं, वे ही हमारे मूल से वर्तमान को जोड़ने का परिचय-माध्यम हो सकते हैं, सूत्र बन सकते हैं। आज हम जहां हैं, वहां होने की तार्किकता, अपने आदि से कार्य-कारण संबंध तलाश कर, उसमें छूटे स्थानों को पूरी आस्था सहित लोक और जन से पूरित कर, यानि चेतना के स्तर पर अपने इतिहास से अपने वर्तमान का सातत्य पाकर हम वास्तविक अर्थों में मनुज कहलाने के अधिकारी हो सकते हैं। यह विश्लेषण आश्रित शब्दगम्य इतिहास मात्र से संभव नहीं, इसके लिए वस्तुगम्य इतिहास की व्याख्‍या और बोधगम्य इतिहास सम्पदा को साहित्य का सम्मान देते हुए, तैयार किया गया इतिहास ही सार्थक होगा।