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Saturday, August 27, 2022

घर का पता

लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि
आपके घर का पता आप खुद नहीं जानते,
लोग आपको बताते हैं
क्योंकि 
आप तो अपने घर को जानते हैं
न कि घर का पता
इसलिए बिना किसी पहचान के
अपने घर पहुंच जाते हैं।
लोग बताते हैं कि आपका घर कहां है,
वह किस तरह से आपके घर पहुंचते हैं,
उसे पहचानते हैं।
कोई पेड़, कोई भवन या कोई दुकान,
क्या पहचान, आपके घर का पता बनता है,
इसलिए मुझे लगता है कि
आप अपने घर का पता नहीं जानते,
आप के घर का पता लोग आपको बताते हैं।
विनोद कुमार शुक्ल घर का पता बताते हैं,
‘सफेद चम्पे के फूल वाला घर‘,
तो लगता है
कोई कविता सुनाने जा रहे हैं
और कह पड़ेंगे-
‘हर बार घर लौट कर आने के लिए ...‘

गली का आखिरी मकान है यह
या मान लें पहला
इसे पहला या आखिरी ही होना चाहिए
यह गली बंद नहीं है
धर्मवीर भारती वाला ‘बंद गली का आखिरी मकान‘ नहीं,
न ही राजेन्द्र यादव के ‘हंस‘ दफ्तर की तरह
गली खुली हुई है दोनों ओर
बाएं और दाएं

बिना नाम-पट्टिका घर
अब आम, मौलश्री और सप्तपर्णी
चिड़िया और गिलहरी और ...
हरियाली, जीवन शाश्वत
सफेद चम्पा,
घर की पहचान, पता बताने के लिए?
या हर बार घर पहचान,
लौट लौट आने के लिए।

पिछले दिनों जया जादवानी जी से उनके घर और अपने घर के साथ किसी तीसरे पते की बात हुई, जहां हम दोनों को पहुंचना था। इस दौरान विनोद जी के घर जाने की बात भी मेरे मन में थी। याद आया फरवरी 2020 में आशुतोष भारद्वाज ने ‘संडे एक्सप्रेस मैगजीन‘ के लिए विनोद जी पर कवर स्टोरी की थी, उसकी शुरुआत इसी तरह पता पूछने-बताने से होती है। विनोद जी के घर तक पहुंचा, वहां नाम-पट्टिका नहीं है, अब सफेद चंपा भी नहीं। विनोद जी के पुत्र शाश्वत ने बताया कि गली का नंबर बदला है, घर वहीं है, ‘घर पर किसी का नाम नहीं लिखा है। अंदर एक आम का पेड़ है। बाहर एक ओर मौलश्री के दो पेड़ और दूसरी ओर सप्तपर्णी के दो पेड़ हैं। इन सब में बहुत से पक्षी, गिलहरी रहते हैं। हम सब इनके साथ रहते हैं। यही घर की पहचान है।‘

प्रसंगवश- विनोद जी ने राजनांदगांव के एक आयोजन में कविता पाठ के दौरान कहा था, ‘शीर्षक‘ ढक्कन की तरह होता है। एक अन्य अवसर पर उनसे बार-बार पूछा जाने वाला सवाल दुहराया गया कि आपकी पहली कविता कौन सी है? इस पर मुझे जो बात सूझी वह कुछ-कुछ कविता की तरह ही लगी-  

उनसे बार बार पूछा जाता है
आपकी पहली कविता कौन सी है
न जाने कितनी बार जवाब दे चुके वे
कुछ यूं कि अप्रकाशित, अधूरी और
न लिखी कविता ही मेरी कविता है।
जो छप गई वह पाठकों की
और पहली, वह जो पहले-पहल छपी।
फिर याद करते हैं मुक्तिबोध और श्रीकांत वर्मा को
और उन आठ कविताओं को,
जो एक साथ पहले छपी।
और आपकी पहली कविता के सवाल पर,
हर बार जवाब देते
मानों नई कविता रच जाती है।
उनके हर जन्मदिन पर
 उनसे यही सवाल कर,
मैं हर बार एक नई कविता सुनूंगा।

एक गद्य कविता-
बात करीब बीस साल पुरानी है। 
एक भूले से मगर प्रतिष्ठित साहित्यकार को 
छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद याद कर, 
पत्र भेजा गया। 
पता अनुमान से लिखा गया था। 
पत्र उन्हें मिल गया, 
उनका जवाब आया, जिसमें दो खास बात थी। 
पहली कि उनके लेटर हेड पर 
शहर के नाम के साथ अब भी म.प्र. था, 
मगर दूसरी बात कि 
उन्हें जिस पते पर पत्र भेजा गया था,
उस पर अपनी खिन्नता प्रकट करते लिखा था- 
‘पता, जिस पर डाकिया पत्र पहुंचा जाया करता है‘ 
मेरे साथी ने कहा कि साहित्यकार भी अजीब होते हैं, 
सीधी सी बात, सीधे नहीं कहते। 
ऐसा लगता है कि पता, पत्र पाने का ही है, 
उनके निवास का नहीं, रहते कहीं और हैं। 
मुझे साहित्य(कारों) का प्रतिपक्ष बने रहने से, 
अपनी जगह उचित लगती है 
बल्कि यों भी प्रतिपक्ष बने रहना। 
मगर यहां मैंने उन साहित्यकार का पक्ष लिया कि 
इसमें गड़बड़ क्या है, हम भी तो ‘डाक का पता‘ लिखते हैं, 
इसका भी मतलब निकाला जा सकता है कि 
यह डाक का पता है, निवास का नहीं। 
तब मित्र ने तर्क दिया, मगर यह रूढ़ हो गया हैै। 
मैंने आगे कुछ न कह कर संवाद विराम किया। 
याद करने लगा कि पहले पत्र में लिखने का चलन था- 
मु.पो. यानि मुकाम और पोस्ट। 
इसी तरह कुछ अधिक बारीक लोग 
हाल मुकाम और खास मुकाम, बताते थे 
यानि वर्तमान पता और स्थायी पता। 
बहरहाल, पता बताने और खोजने की अधिक सावधानी, 
प्रकारांतर से खुद की तलाश होने लगती है, 
पता वही रहता है, हम ही खोए रहते हैं, 
कभी पता बताते, कभी तलाशते।

Monday, March 21, 2022

कविताई

आज ‘कविता दिवस‘ पर मन का मैल-मलाल।

कला, साहित्य, संस्कृति- एक होती है समझ में आने वाली और दूसरी समझने-समझाने वाली। अमूर्त कला, कुछ खास संगीत और अधिकतर कविता के लिए मेरी संकीर्ण सीमा है कि वह व्याकरण, नियम, सिद्धांत के आग्रह बिना सहज बोध से समझ में आए। इसलिए रथन्तर-मार्गी के बजाय वृहत्साम-देशी तक सीमित रहना भाता है। छंद-लय तो स्वाभाविक होता है, मात्रा गिन की गई (अजीब, चौंकाने वाली बेतुकी) तुकबंदी या जोड़-तोड़ कर बिठाए गए शब्दों से, कविता नहीं हो जाती। अपरा से भ्रम होता है कि जीवन की कविता के परा को, उसके व्याकरण और विन्यास सहित सीख-समझ/पा लिया है।

बकौल प्लेटो, सुकरात का संवाद है- ‘ये (कवि) उन दिव्यदर्शी तथा भविष्यवक्ताओं जैसे ही हैं, जो बहुत-सी गूढ़ बातें कहते हैं, परन्तु स्वयं उनका अर्थ नहीं जानते।‘ या दूसरे शब्दों में ‘कवि ऐसी महान और ज्ञान भरी बातें कहते हैं जो वो खुद नहीं समझते।‘ यह कम रोचक नहीं कि स्वयं ‘कवि‘ प्लेटो कहता है कि आदर्श गणतंत्र में कवियों का कोई स्थान नहीं है। दूसरी तरफ प्लेटो के प्रति अरस्तू की अनेक शिकायतों में एक यह भी थी कि प्लेटो कवि था।

रेणु, त्रिलोचन में शमशेर-नागार्जुन के जोड़-घटाव का हिसाब बिठाते हैं, मगर यह भी कहते हैं कि- 'मुझे यह कबूल करने में कभी लाज-शर्म नहीं आयी कि मैं कविता नहीं समझता। मेरे लिए कविता समझने की चीज कभी नहीं रही। इसीलिए अपने मन में उठनेवाले इस सवाल का जवाब- शमशेर-त्रिलोचन-नागार्जुन की कविताओं में मैं कभी नहीं ढूँढ़ता।'

यों तो तुलसी स्वयं के लिए ‘कबि न होउं ...‘ और ‘कबित बिबेक एक नहीं मोरें ...‘ कहते हैं, शायद यही कारण है कि कभी न अबूझ लगे, न कठिन। तब भी जब शिव से कहलाते हैं- ‘सत हरि भजनु जगत सब सपना।‘ यह भी कहा गया है कि ‘शास्त्र केवल इंगित-भर करते रहते हैं। स्वयं तो वे केवल शब्दजाल हैं। . . . अपनी कल्पनाओं को ही तार्किक लोग ‘शास्त्र‘ माना करते हैं।‘ प्रस्थान-त्रयी में ‘स्मृति‘ महाभारत युद्ध के आरंभ में कही गई गीता है। युद्ध के पश्चात आश्वमेधिक पर्व में गीता से भी विस्तृत अनुगीता है, जिसकी भूमिका रोचक है। अर्जुन कृष्ण से कहते हैं कि आपने ज्ञान का उपदेश दिया था, वह भूल गया, अतः पुनः सुना दीजिए। कृष्ण कहते हैं कि तुमने अपनी नासमझी के कारण उसे याद नहीं रखा, यह मुझे अप्रिय है, तुम श्रद्धाहीन हो, तुम्हारी बुद्धि बहुत मंद जान पड़ती है। फिर मानों स्वयं भी स्वीकार कर रहे हों, कहते हैं- अब पूरा-पूरा स्मरण होना संभव नहीं जान पड़ता। उसको ज्यों का त्यों नहीं कह सकता, फिर से दुहरा देना मेरे वश की बात भी नहीं है। यहां अर्जुन का स्मृति-प्रस्थान श्रीमद्भगवतगीता का उपदेश भूल जाना, उसे कृष्ण का न दुहरा पाना, मानों ज्ञान का रहस्य रचते, श्रुति-स्मृति-न्याय की परतें भी खोल देता है।

महाभारत के एक प्रसंग में गंधर्व चित्रांगद, शांतनु पुत्र चित्रांगद से कहता है- राजकुमार! तुम मेरे सदृश नाम धारण करते हो, . . . नाम की एकता के कारण ही मैं तुम्हारे निकट आया हूं। मेरे नाम द्वारा व्यर्थ पुकारा जाने वाला मनुष्य मेरे सामने से सकुशल नहीं जा सकता। इस प्रसंग में व्यक्ति के अहम् और नाम-रूप को दुहरे चरित्र के सहज सूत्र से उजागर किया गया है। वाल्मीकि रामायण में केकय नरेश समस्त प्राणियों की बोली समझते हैं, तिर्यक् योनि में पड़े हुए प्राणियों की बातें भी उनकी समझ में आ जाती थीं। मेरे लिए इसका मर्म भी सहज ग्राह्य है, मगर . . .

अधिकतर आदरणीय कवियों से ले कर आधुनिक वालखिल्य-व्यास-वाल्मीकियों के मुझ प्रमाता-पाठक को कई बार ऐसा लगता है कि अजीब सी गुलजारनुमा बातें कहने का आत्मविश्वास भी कविताओं को जन्म दे सकता है। प्रेमचंदों को तो कोई ऐरा-गैरा भी पढ़ लेता है मगर मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा और विनोद कुमार शुक्ल ऐसे नाम हैं, जिनका पाठक हो कर ही गौरवान्वित महसूस करता हूं, पसंद हैं ही, उनके प्रति आदर है, किंतु कई-कई बार आतंकित भी कम नहीं करते। ‘चांद का मुंह टेढ़ा है‘ की वक्रता मेरे लिए आज तक ज्यों की त्यों है, क्योंकि वहां ‘लटकी है पेड़ पर/ कुहासे के भूतों की सॉंवली चूनरी-/ चूनरी में अटकी है कंजी ऑंख गंजे सिर/ टेढ़े-मुॅंह चॉंद की।‘ चांद की सुंदरता में रोटी, हंसिया, बुढ़िया, खरगोश देखा जाता रहा है, मगर मुंह टेढ़ा यानि चांद को कुछ नापसंद है, मानव के चंद्र अभियान से रूसा-फूला है, या उसकी बनावट में ही कुछ गड़बड़ हो गई है, सीधे मुंह वाला चांद कैसा होता है! यह प्लास्टिक सर्जरी वाले डॉक्टर का विज्ञापन तो नहीं या ...! ‘कोसल में विचारों की कमी है‘ पढ़ कर सोच में पड़ जाता हूं कि विचारों में कमी की नाप कैसे संभव हुई होगी, क्या यह समूचे कोसलवासियों के लिए कही गई है या नियंता-नायकों के लिए। उस दौर में कहीं काशी, मगध, अवंती में विचारों की अधिकता भी रही होगी? क्या विचारों की कमी घातक होती है, तो विचारों की अधिकता कर्मनाशा तो नहीं हो जाएगी, फिर विचारों का सम क्या है? विचारों का सम, क्या सभ्यता को जड़ न कर देगा!

कई कवि और उनकी कुछ कविता, आपको रसिक पाठक होने की खुशफहमी से वंचित कर देने के लिए पर्याप्त होती हैं। ऐसी कविताओं का रस, समीक्षक ले पाते हैं या उनका जात-भाई, कोई अन्य कवि। कविता को हमारे शरीर जैसा होना चाहिए। शरीर में जिगर, गुर्दा न जानने वाला भी स्वस्थ, आनंदित रह सकता है और जानकार डाक्टर भी अपने शरीर के लिए समस्या पैदा कर लेता है। इसलिए बिंब, प्रतीक, रस, छंद, व्याकरण के शास्त्र से अनभिज्ञ, सामान्य समझ के पाठक भी रस पा ले वही सच्ची कविता अन्यथा एलीट साहित्य। 

अपनी कविता ‘नासमझी‘ के सिलसिले मे सर्वेश्वरदयाल सक्सेना‬ की कविता याद आती है। ‘धीरे-धीरे रे मना ...‘ और ‘शनैः कंथा शनैः पंथा ...‘ के साथ कैसा लगेगा जब पढ़े-
'धीरे-धीरे'
मुझे सख़्त नफ़रत है‪
इस शब्द से।
‪धीरे-धीरे ही घुन लगता है
अनाज मर जाता है,‪
धीरे-धीरे ही दीमकें सब-कुछ चाट जाती हैं‪
साहस डर जाता है।‪
धीरे-धीरे ही विश्वास खो जाता है‪
संकल्प सो जाता है।

इसी तरह कुँवर नारायण‬‬ के लिए मन में बात आती है कि ‘यह भी कोई कविता है महराज‘- ‪
कभी-कभी टहलते हुए निकल जाता हूँ‪
बाज़ारों की तरफ़ भी:‪
नहीं, कुछ ख़रीदने के लिए नहीं,
‪सिर्फ़ देखने के लिए कि इन दिनों
‪क्या बिक रहा है किस दाम
‪फ़ैशन में क्या है आजकल‬‬।

समझ नहीं पाता कि शमशेर बहादुर की इन पंक्तियों में आह-वाह वाली क्या बात है-
‘‘वकील करो-
अपने हक के लिए लड़ो।
नहीं तो जाओ
मरो।‘‘

बहरहाल, विचारों के साथ यह भी होता है कि ‘वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह‘, जहां आदमी के धब्बे के अंदर आदमी है, पेड़ का धब्बा बिलकुल पेड़ की तरह है और रद्दी नस्ल के घोड़े का धब्बा रद्दी नस्ल के घोड़ा की तरह, पढ़ कर घबराहट होती है मगर ‘हताशा से बैठ गया व्यक्ति‘ और ‘अपनी भाषा में शपथ‘ जैसी सीधी बात, पसंद आती है। अज्ञेय और नागार्जुन जैसे दिग्गज शब्दों से खेल-खिलवाड़ करते रहे हैं, उससे आगे निराला की कवितानुमा ‘उटपटांग‘ पंक्तियों को माना जाता है कि मानसिक असंतुलन का परिणाम है, जबकि मुझे लगता है कि निराला ऐसी रचना से बताना चाहते थे कि कई बार वैसा ही प्रलाप, कविता मान ली जा सकती है।

अब, मेरी ऐसी कुछ पंक्तियां, जिन्हें कविताई के दावे की तरह रख रहा हूं-

निन्यानबे के अधूरेपन
और एकसौएक के पूरेपन के दौरान
सदी, शतक, सौ, 'K' का सपना।
आभासी क्षितिज सा
सपना-
अपूर आकांक्षा का,
अधमुंदी स्मृति का और
आगत-अनागत के बीच
आशा का।

***
पेड़, चिड़िया, तितली
नदी, बच्चे, मछली
बादल, चांद
आदिवासी, स्त्री, अल्पसंख्यक
दलितों, तुम्हें मालूम न होगा
क्या बेमानी और बेहूदा
खपाई जाती हैं तुम्हारे नाम पर
रूपक, बिंब, प्रतीक के साथ
कविता और विमर्श कह कर

रोटी, गरीब, भूख
शोषण, दोहन, उत्पीड़न का छौंक
कितना लजीज बनाता है।
कविता की तरह पेश
चटखारेदार बलात्कार
सैनिक, देशप्रेम और मां हो तो,
लिजलिजी सी बात के भी क्या कहने
किसकी मजाल है कि
आह-वाह न करे।

***

वृक्षारोपण!

पेड़!
कैसे जंगली हो,
फैलते हो मनमाना, बेतरतीब
जहां चाहे उग जाते हो
इसीलिए कटते हो
माना कि बोल नहीं सकते,
मगर हो तो चेतन
सोच सकते होगे,
फिर भी दोयम दर्जे के,
मजबूर अपनी जड़ों से बंधे
उसी के भरोसे पलते-बढ़ते
देखो और कुछ तो सीखो
अपने कुल के परजीवियों से
मनमर्जी उग आते हो,
कहीं भी काबिज हो जाते हो
अड़ते हो अपनी जगह
और एहसान जताते कि
फल, छाया, लकड़ी देते हो।
नहीं चलने देंगे तुम्हारी मनमानी
हम रोपेंगे तुम्हें, पोसेंगे,
प्लांटेशन, ट्रांसप्लांटेशन,प्लांटनेशन
तुम्हें वहां उगना होगा, वैसा रहना है, जैसा हम चाहें, तय करें।
'निशुकरे' कहीं के,
क्यों नहीं समझते कि
तुम्हारे लिए ही है,
यह वृक्षारोपण महाअभियान।
(मानते हुए कि पेड़, बच्चे, चिड़िया, नदी पर कुछ भी लिख मारो, कविता बन जाती है।)


गुरुओं की नसीहत है, जो पसंद हैं, जिनके प्रति आदर हो, उन्हें प्रश्नातीत नहीं मान लेना चाहिए। सवाल और संदेह करते अपने समझ की धूल-गर्द साफ करते रहना चाहिए। यहां इसी का पालन करते हुए छत्तीसगढ़ के तीन कवि, जिनमें दिवंगत मुक्तिबोध और श्रीकांत वर्मा ने कविता के साथ पत्रकारिता और विविध, विपुल गद्य लेखन किया है। रचना-सक्रिय विनोद कुमार शुक्ल, अपने गद्य में भी कवि हैं, तीनों के प्रति आदर सहित यह ‘काव्यशास्त्र विनोदेन‘, कभी केदारनाथ सिंह ने भी प्रश्नाकुल किया था।

Saturday, December 21, 2019

हाशिये पर

• हमारे सम्माननीय 80 पार चुके बुजुर्ग हैं शर्मा जी, पिछले दिनों तटस्थ भाव से कहा, पत्नीे बिस्तर पर हैं, मेरे सामने चली जाएं तो ठीक, हमने हंसी की, उन्होंने भी साथ दिया फिर संजीदा हुए, कहा, यदि मैं पहले गया तो उनकी देखभाल कौन करेगा। हम आपस में बात करने लगे कि उनके बच्चे बहू..., सब हैं, 'भरा-पूरा परिवार', दोनों नौकरी-पेशा, किसी और शहर, दूर देश में हैं। मां-बाप का ध्यान नहीं, अपने में ही मगन। मगर बुजुर्गों की सयानी बात। शर्मा जी कहने लगे, जिसका दाना-पानी जहां लिखा। बेटा-बहू, अपने ही बच्चों की देखभाल नहीं कर पा रहे थे सो हास्टल में दाखिला कराया है, मां-सासू मां के लिए क्या और कितना कर पाएंगे। किसी पक्ष की आलोचना की जा सकती है, लेकिन है यह वस्तुतः आज की सहज, सामान्य, स्वाभाविक परिस्थितियां।

• कुछ बरस पहले बिलासपुर में एक अखबार ने जानना चाहा कि ऐसा कौन सा सरकारी दफ्तर है, जो सबसे कम जनोपयोगी है (या जिसे बंद किया जा सकता है), इसमें अव्वल नंबर पर था पुरातत्व विभाग यानि मेरा कार्यालय। मैंने उन पत्रकार महानुभाव का पता करने की कोशिश की, प्रेस ने तो नहीं बताया लेकिन पता लग गया, वे युवा पत्रकार परिचित निकले और स्वयं पहल कर खेद व्यक्त किया। फोन पर धन्यवाद देने पर उन्हें लगा कि मैं व्यंग्य या खीझ में ऐसा कह रहा हूं। बाद में प्रत्यक्ष मुलाकात में मैंने स्पष्ट‍ किया कि यह तो मेरे लिए अपेक्षित था, क्योंकि इस (और ऐसे अन्य सर्वेक्षण संबंधी) कार्यालय का सामान्य-जन से सीधा ताल्लुक कम ही होता है। मैं यह भी मानता हूं कि पुरातत्व‍-संस्कृति जैसी चीज हाशिये पर ही होनी चाहिए। मुख्य धारा में तो रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्य्य, शिक्षा, बिजली, पानी, सड़क और भू-राजस्व के साथ कानून-व्यवस्था को ही होना चाहिए। राग-रंग को हाशिये पर ही होना चाहिए। पुरातत्व-संस्कृति मुख्य धारा में आए तो इनका और समाज दोनों का बंठाधार होते देर नहीं। वैसे भी हाशिया महत्वपूर्ण, विशेष उल्लेखनीय और ध्यान देने योग्य के लिए नियत स्थान है। 

• चर्चित, पुरस्कृत कलाकार-साहित्यकार सब से अच्छे न माने जाएं, लेकिन अधिकतर अच्छे कलाकार जरूर होते हैं और कुछ उदाहरणों में अनूठे और श्रेष्ठ भी। सम्मानित-पुरस्कृत कलाकारों में आमतौर पर (अन्य से अलग) अपनी कला क्षमता के साथ 'नागर समाज या मुख्य धारा' में उपयुक्त साबित हो कर हाशिये पर सुशोभित होने के लिए आवश्यक अतिरिक्त गुण (जागरूकता और उद्यम), अन्य की अपेक्षा अधिक होता है। 

• विनोद कुमार शुक्ल के चर्चित उपन्यास 'नौकर की कमीज' का अंगरेजी अनुवाद, संभवतः 2000 प्रतियों का संस्करण, 'द सर्वेन्ट्स शर्ट' पेंगुइन बुक्स ने 1999 में छापा था, उन्हें 2001 में छत्तीसगढ़ शासन का साहित्य के क्षेत्र में स्थापित पं. सुंदरलाल शर्मा सम्माःन मिला। लगभग इसी दौर में एक विवाद रहा, जैसा मुझे याद आता है- पेंगुइन बुक्स ने श्री शुक्ल को पत्र लिखा कि उनकी पुस्तकें बिक नहीं रही हैं, यों ही पड़ी हैं, जिन्हें वे लुगदी बना देने वाले हैं, लेकिन श्री शुक्ल चाहें तो पुस्तक की प्रतियों को किफायती मूल्य पर खरीद कर पुस्तकों को लुगदी होने से बचा सकते हैं, यह बात समाचार पत्रों में भी आ गई। साहित्य बिरादरी, विनोद जी के प्रशंसकों, और खुद उनके लिए यह अप्रत्याशित था, प्रमाण जुटाने के प्रयास हुए कि किताब खूब बिक रही है और प्रकाशक रायल्टी देने से बचने के लिए ऐसा कर रहा है। 

बहरहाल, इस भावनात्मक उबाल को मेरी जानकारी में, समय और बाजार ने जल्द ही ठंडा कर दिया और अंततः क्या हुआ मुझे पता नहीं, लेकिन लुगदी बना देने वाली बात से यह सवाल अब तक बना हुआ है कि सामाजिक-जासूसी उपन्यास, जो लुगदी साहित्य कह कर खारिज किए जाते हैं, बड़ी संख्या में छपते-बिकते और पढ़े जाते हैं, सहेज कर रखे भी जाते हैं। तब सोचें कि ‍'लुगदी-पल्प' मुहावरा और शब्दशः के फर्क की विवेचना से क्या बातें निकल सकती हैं। लुगदी की तरह मटमैले कागज पर छपने वाला लेखन होने के कारण लुगदी साहित्य कहा जाता है या छपने-पढ़ने के बाद जल्द लुगदी बना दिए जाने के कारण। यह निसंदेह कि प्रतिष्ठित साहित्यकार भी अधिक से अधिक बिकना चाहता है और लुगदी लेखन करने वाले, साहित्यिक बिरादरी में अपने ठौर के लिए व्यग्र दिखते हैं।

Wednesday, September 14, 2016

हिन्दी का तुक


समय-समय पर और खासकर हिन्दी दिवस के अवसर पर हिन्दी के साथ तुक मिला कर बिन्दी-चिन्दी जैसे शीर्षकों वाले लेख छपते हैं, इनमें भाषा-साहित्य की बखिया भी उधेड़ी जाती रहती है। आज रायपुर के अखबारों में एक शीर्षक है 'बाजार के जरिये विश्व भाषा बन रही है हिंदी'। हिन्दी दिवस पर 'अविरल व्यक्तित्व के धनी क्रान्तदृष्टा साहित्यकार-पत्रकार श्री रावलमल जैन 'मणि' की 108वीं कृति के प्रकाशन अवसर पर दो पेज में फैला 'विशेष' भी है। और विनोद कुमार शुक्ल से बातचीत छपी है, जिसका शीर्षक है- 'हिन्दी जनता की भाषा है' - 'और जनता से बड़ा ग्राहक कौन होगा?' इसी तारतम्य में दो बातें याद आ रही है, सैकड़ों हिन्दीे पुस्तकों के लेखक-बेस्ट सेलर सुरेन्द्र मोहन पाठक, जिनके एक उपन्यास की लगभग ढाई करोड़ प्रतियां बिकने की चर्चा दुनिया भर में हुई थी, पिछले माह एक कार्यक्रम में रायपुर आए थे और इसके साथ बेतुकी सी लग सकने वाली बात कि-

विनोद जी के चर्चित उपन्या‍स 'नौकर की कमीज' का अंगरेजी अनुवाद, संभवतः 2000 प्रतियों का संस्करण, 'द सर्वेन्ट्स शर्ट' पेंगुइन बुक्स ने 1999 में छापा था, उन्हें 2001 में छत्तीसगढ़ शासन का साहित्य के क्षेत्र में स्थापित पं. सुंदरलाल शर्मा सम्मान मिला। लगभग इसी दौर में एक विवाद रहा, जैसा मुझे याद आता है- पेंगुइन बुक्स ने श्री शुक्ल को पत्र लिखा कि उनकी पुस्त‍कें बिक नहीं रही हैं, यों ही पड़ी हैं, जिन्हें वे लुगदी बना देने वाले हैं, लेकिन श्री शुक्ल‍ चाहें तो पुस्तक की प्रतियों को किफायती मूल्य पर खरीदे जाने की व्यवस्था कर सकते हैं, यह बात समाचार पत्रों में भी आ गई। साहित्य बिरादरी, विनोद जी के प्रशंसकों, और खुद उनके लिए यह अप्रत्याशित था, प्रमाण जुटाने के प्रयास हुए कि किताब खूब बिक रही है और प्रकाशक रायल्टी देने से बचने के लिए ऐसा कर रहा है।

बहरहाल, इस भावनात्मक उबाल को मेरी जानकारी में, समय और बाजार ने जल्द ही ठंडा कर दिया और अंततः क्या हुआ मुझे पता नहीं, लेकिन लुगदी बना देने वाली बात से यह सवाल अब तक बना हुआ है कि सामाजिक-जासूसी उपन्यास, जो लुगदी साहित्य कह कर खारिज किए जाते हैं, बड़ी संख्या में छपते-बिकते और पढ़े जाते हैं, सहेज कर रखे भी जाते हैं, पुनर्प्रकाशित हो रहे हैं। सोचें कि ‍'लुगदी-पल्प' मुहावरा और शब्दशः के फर्क की विवेचना से क्या बातें निकल सकती हैं। लुगदी की तरह मटमैले कागज पर छपने वाला लेखन होने के कारण लुगदी साहित्य कहा जाता है या छपने-पढ़ने के बाद जल्द लुगदी बना दिए जाने के कारण। यह निसंदेह कि प्रतिष्ठित साहित्यकार भी अधिक से अधिक बिकना चाहता है और कथित लुगदी लेखन करने वाले, साहित्यिक बिरादरी में अपने ठौर के लिए व्यग्र दिखते हैं।

इस तारतम्य में याद आता है कि बिलासपुर के एक महानुभाव ने अपनी आत्मकथा लिख डाली और उसे छपाने का इरादा कर बैठे। कुछ दिन भटकने के बाद पाकेट बुक छापने वाली एक लोकप्रिय प्रकाशन संस्था तैयार हुई, अपनी तर्ज, शर्त-खर्च के साथ। बाजार की नब्ज समझने वाले इन लेखक को सभी शर्तें सहज-स्वाभाविक लगीं, बात तय होने को थी तभी उन्होंने इस बात की चर्चा मुझसे की। वे पांडुलिपि मुझे पढ़ा चुके थे, मैंने उनसे कहा कि इन शर्तों पर तो कोई अच्छा, प्रतिष्ठित प्रकाशक भी इसे छापने को तैयार हो सकता है। इस पर उन्होंने कहा कि स्वयं की गणना साहित्यकार में कराने की उनकी कोई रुचि नहीं है, वे तो बस यह चाहते हैं कि लोग इसे खरीदें, बस स्टैंड और रेल्वे स्टेशनों पर, सफर में पढ़ें और अपनी जिंदगी के साथ कुछ समानता पा कर थोड़ा मन बहला लें। पता चला कि कुछ महीनों बाद इस किताब का संस्करण छपने वाला है और उस प्रकाशक की फरमाइश पर वे अपनी आत्मकथा का दूसरा भाग लिख रहे हैं।

पुनश्चः और अब साहित्य नोबल पुरस्कार के लिए बाब डिलन का नाम, इस तारतम्य में उल्लेखनीय है।